शनिवार, 6 सितंबर 2014

"तुम जियो हज़ारों साल...", आशा जी के जन्मदिन पर यही कह कर उन्हें शुभकामनाएँ देते हैं


एक गीत सौ कहानियाँ - 40
 

‘तुम जियो हज़ारों साल...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्युटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 40वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'सुजाता' के गीत "तुम जियो हज़ारों साल..." के बारे में। 

फ़िल्म-संगीत की एक ख़ास बात यह रही है कि इसमें मानव जीवन के हर रंग को, हर मूड को, हर त्योहार-पर्व को, और रोज़-मर्रा के जीवन के हर पहलू को दर्शाने वाले गीत मौजूद हैं। ये गीत हमारे पारिवारिक, सामाजिक, और धार्मिक जीवन से इस तरह से जुड़े हुए हैं कि अगर इन गीतों को हमारे जीवन से निकाल दिया जाये तो ये पर्व, ये त्योहार बड़े ही बदरंग, बड़े ही सूने से लगने लगेंगे। जन्मदिन पर बजाये या गाये जाने वाले गीत भी बहुत सारे बने हैं समय-समय पर। लेकिन जिन दो गीतों की गिनती सबसे पहले होती रही है, वो हैं फ़िल्म 'फ़र्ज़' का "बार-बार दिन यह आये, बार-बार दिन यह गाये" और दूसरा गीत है फ़िल्म 'सुजाता' का "तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार"। ये गीत फ़िल्मी गीत होते हुए भी फ़िल्म की कहानी के बाहर भी उतने ही सार्थक हैं। दूसरे शब्दों में यूँ कह सकते हैं कि ये यूनिवर्सल गीत हैं जो हर दौर में, हर समाज में, हर उम्र में समान अर्थ रखते हैं। 'सुजाता' को हिन्दी सिनेमा का एक माइलस्टोन फ़िल्म कहा जा सकता सकता है। इसमें बिमल राय ने नायक सुनील दत्त के एक निम्न जाति की लड़की सुजाता (नूतन द्वारा अभिनीत) से प्यार को दिखाया गया है। 'सुजाता' नाम का चुनाव भी बड़े सोच-समझ कर रखा गया था क्योंकि 'सुजाता' शब्द का अर्थ है 'अच्छी जाति का'। इस फ़िल्म में नूतन के जानदार और दिल को छू लेनेवाले अभिनय ने उन्हें जितवाया उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार। गीत-संगीत की बात करें तो सचिनदेव बर्मन के सुरीले संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी के अर्थपूर्ण बोलों ने इस फ़िल्म के गीतों को अमर बना दिया है। "जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये" को न केवल तलत महमूद के सर्वोत्तम गीतों में माना जाता है, बल्कि रोमांटिक गीतों की श्रेणी में भी बहुत ऊपर स्थान दिया जाता है। दादा बर्मन की आवाज़ में "सुन मेरे बन्धु रे" हमें बंगाल के भटियाली जगत में ले जाता है तो रफ़ी साहब का गाया "वाह भई वाह" हमें गुदगुदा जाता है। गीता दत्त और आशा भोसले की आवाज़ों में "बचपन के दिन भी क्या दिन थे", गीता जी की एकल आवाज़ में "नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना", तथा आशा जी की एकल आवाज़ में "काली घटा छाये मोरा जिया तड़पाये" को सुनना जैसे एक स्वर्गिक अनुभूति है।

अगर आप यह सोच रहे हैं कि उपर इस फ़िल्म के गीतों और गायक कलाकारों का उल्लेख करते हुए "तुम जियो हज़ारों साल" का उल्लेख क्यों नहीं किया गया, तो उसके पीछे एक कारण है। और वह कारण यह कि एक लम्बे समय तक इस बात पर संशय बना रहा कि आख़िर इस गीत को गाया किसने है - गीता दत्त या फिर आशा भोसले। और यही है इस गीत से जुड़ा हुआ सबसे मज़ेदार किस्सा। हुआ यूँ कि सचिनदेव बर्मन ने शुरू शुरू में इस फ़िल्म के चार फ़ीमेल सोलो गीतों में से दो गीत गीता दत्त के लिए और दो गीत आशा भोसले के लिए विभाजित कर रखे थे। (लता मंगेशकर से हुए मन-मुटाव के कारण उन दिनों लता और उनका आपस में काम बन्द था)। "तुम जियो हज़ारों साल" गीत को दादा ने गीता दत्त की झोली में डाल रखा था और उनकी ही आवाज़ में इसे रेकॉर्ड भी कर लिया। गाना बहुत अच्छा बना, गीता दत्त ने भी बहुत ख़ूब गाया, दादा बर्मन को किसी भी शिकायत का मौका नहीं दिया। पर बर्मन दादा को पता नहीं क्यों इस गीत में कुछ कमी सी महसूस होने लगी। सब कुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद उन्हें ऐसा लग रहा था कि कुछ तो कमी है इस गीत में। जब कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने यह निर्णय लिया कि वो इस गीत को दोबारा आशा भोसले की आवाज़ में रेकॉर्ड करेंगे। इस बात का पता न गीता जी को चला और ना ही आशा जी को यह किसी ने बताया कि गीता जी यह गीत रेकॉर्ड करवा चुकी हैं। नतीजा, आशा जी की आवाज़ में भी यह गीत रेकॉर्ड हो गया। और इस बार सचिन दा को गीत पसन्द आ गया और उन्होंने इसे ही फ़िल्म में और साउण्डट्रैक में रखने का फ़ैसला किया। और इसी फेर-बदल के चलते 'बिमल राय प्रोडक्शन्स' ने गलती से आशा जी के गाये इस गीत के लिए गीता जी का नाम डाल कर HMV को भेज दिया। इस तरह से ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के कवर पर गीता दत्त का नाम प्रकाशित हो गया। अब आशा जी और गीता जी की आवाज़ों में और अंदाज़ में थोड़ी-बहुत समानता तो थी ही, जिस वजह से जनता तो क्या फ़िल्म-संगीत के बड़े से बड़े समीक्षक भी धोखा खा गए। सालों तक इस गीत के रेकॉर्ड पर गीता जी का नाम छपता चला गया। यहाँ तक कि गीता दत्त के देहान्त के बाद जब HMV ने उन पर एक LP जारी किया 'In Memorium Geeta Dutt' के शीर्षक से, उसमें आशा भोसले के गाये इस गीत को शामिल कर दिया गया। यह अपने आप में बहुत बड़ी गड़बड़ी थी। राहुलदेव बर्मन, जो इस गीत के निर्माण के समय अपने पिता के सहायक के रूप में कार्य कर रहे थे, ने यह कन्फ़र्म किया कि गीता जी के गाये गीत को उनके पिता ने दोबारा आशा जी से गवाया। HMV ने इस ग़लती का इल्ज़ाम अपने सर लेने से यह कहते हुए मना कर दिया कि उन्होंने वही छापा है जो उन्हें 'बिमल राय प्रोडक्शन्स' के तरफ़ से मिला था। लेकिन यह वाक़ई आश्चर्य में डालने वाली बात है कि बिमल राय, सचिन देव बर्मन, आशा भोसले और गीता दत्त में से किसी ने भी कभी इस बात का उल्लेख कभी नहीं किया! इस गीत के बनने के 27 साल बाद, 1986 में आशा भोसले ने यह स्वीकारा कि उन्होंने इस गीत को गाया था, पर उन्हें इस बात का पता ही नहीं चला कि रेकॉर्ड पर गीता दत्त का नाम दिया गया है क्योंकि न तो वो कभी रेडियो सुनती थी और न ही अपने गाये हुए गीतों को। गीत एक बार रेकॉर्ड हो गया तो वो अगले दिन से अगले गीत के पीछे लग जाती। आशा जी के इस खुलासे के बाद HMV ने इस ग़लती को सुधारा और आशा भोसले के गाये गीतों के अगले कलेक्शन में इस गीत को शामिल करवा दिया, तथा गीता जी के कलेक्शन से हटा दिया। आशा जी ने बड़प्पन का परिचय देते हुए और इस विवाद को ख़त्म करते हुए अन्त में कहा - "अगर इस गीत के लिए गीता जी को क्रेडिट दिया भी गया है, तो इससे न उनके नाम को कोई फ़र्क पड़ता है और न ही मेरे नाम को। यह बहुत ही छोटी सी बात है। और मैं उनकी बहुत इज़्ज़त करती हूँ।"
और अब आप यही गीत सुनिए-

फिल्म - सुजाता : 'तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार...' : आशा भोसले : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रविवार, 31 अगस्त 2014

‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : SWARGOSHTHI – 183 : DADARA BHAIRAVI


स्वरगोष्ठी – 183 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 2 : भैरवी दादरा


उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का गाया दादरा जब मन्ना डे ने दुहराया- ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख, चित्र दृश्य माध्यम और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम के मिले-जुले रूप में प्रस्तुत होते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंक हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। 

‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला में हम कुछ ऐसी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके पारम्परिक रूप को बरकरार रखते हुए अथवा आंशिक परिवर्तन के साथ फिल्म में भी इस्तेमाल किया गया है। पिछले अंक में हमने आपको राग झिंझोटी में निबद्ध एक परम्परागत ठुमरी उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में सुनवाया था। आज के अंक में हम ‘आफ़ताब-ए-मौसिकी’ के खिताब से नवाज़े गए उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। साथ ही उनका गाया भैरवी का एक दादरा- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” और इसी ठुमरी का फिल्म ‘दूज का चाँद’ में किये गए रोचक उपयोग की चर्चा करेंगे।




न्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक से लेकर पिछली शताब्दी के मध्यकाल तक के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें सिद्धि प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा घराना’ के ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई।

आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। 1938 में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर गीत में चार-चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। आज हम आपको उनका गाया भैरवी का बेहद लोकप्रिय दादरा- ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ सुनवाते हैं।


भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ






 
उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में प्रस्तुत भैरवी का यह दादरा श्रृंगार-रस प्रधान है। नायिका, नायक से सौतन के घर न जाने की मान-मनुहार करती है, और यही इस दादरा का प्रमुख भाव है। यह दादरा 1960 में प्रदर्शित, देव आनन्द, नूतन और महमूद अभिनीत फिल्म ‘मंज़िल’ में संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने प्रयोग किया था। यद्यपि इस फिल्म के प्रायः सभी गीत लोकप्रिय हुए थे, किन्तु पार्श्वगायक मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत यह दादरा सदाबहार गीतों की श्रेणी में शामिल हो गया था। फिल्म में यह दादरा हास्य अभिनेता महमूद के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। गीत चूँकि महमूद पर फिल्माना था इसलिए बर्मन दादा और मन्ना डे ने इस श्रृंगार प्रधान गीत को अपने कौशल से हास्य गीत के रूप में ढाल दिया। मूल दादरा की पहचान को बनाए रखते हुए गीत को फिल्म में शामिल किया गया था। हाँ, स्थायी के शब्दों में ‘चलो’ के स्थान पर ‘हटो’ अवश्य जोड़ा गया और गीत के अन्तिम भाग में तीनताल जोड़ा गया। लीजिए अब आप इस दादरा का फिल्मी संस्करण सुनिए-


भैरवी दादरा : फिल्म – मंज़िल : ‘बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...’ : मन्ना डे : संगीत – सचिनदेव बर्मन







'स्वरगोष्ठी' की इस श्रृंखला में अब हम आपको आज के इस आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य रूप प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आप इस प्रस्तुति का आनन्द लीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन 






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 183वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। 
 



1 – कण्ठ संगीत की इस रचना के अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो हमें गायक का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 185वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 181वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी झिंझोटी की ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग झिंझोटी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस के साथ ही हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस बार हमारे एक नए प्रतिभागी गोविन्द मकवाना ने भी पहेली में हिस्सा लिया है। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आपको ‘स्वरगोष्ठी’ का यह स्वरूप कैसा लगा? हमें अवश्य बताइएगा। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन  
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

शनिवार, 30 अगस्त 2014

"हवा हवा ऐ हवा ख़ुशबू लुटा दे", क्या आपकी भी स्कूल-कालेज के दिनों की यादें जुड़ी हुई हैं इस गीत के साथ?


एक गीत सौ कहानियाँ - 39
 

‘हवा हवा ऐ हवा ख़ुशबू लुटा दे...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ - 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 39-वीं कड़ी में आज जानिये हसन जहाँगीर के गाये मशहूर गीत - "हवा हवा ऐ हवा ख़ुशबू लुटा दे..." के बारे में। 




1980 के दशक में जब फ़िल्म-संगीत का स्तर गिरने लगा, तब इसके साथ क़दम से क़दम मिला कर संगीत की दो अन्य धाराएँ भी बहने लगी। ये धाराएँ थीं ग़ज़लों की और पॉप गीतों की। जहाँ एक तरफ़ ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह, चन्दन दास, पंकज उधास, पिनाज़ मसानी, हरिहरन् आदि ने ग़ज़लों को क्लास से मास तक पहुँचाया, वहीं दूसरी तरफ़ नाज़िया हसन, पार्वती ख़ान, अलिशा चिनॉय, बिद्दू, बाबा सहगल, उषा उथुप जैसे गायक-गायिकाओं ने पॉप-संगीत जगत में हंगामा पैदा कर दिया। इसी कड़ी में साल 1987 में सर्वाधिक लोकप्रिय और हंगामाख़ेज़ जो पॉप गीत आया, वह था हसन जहाँगीर का "हवा-हवा"। यह गीत न केवल गली-गली गूँजा बल्कि इसके ऑडियो कैसेट्स की भारत में 1.5 करोड़ प्रतियाँ बिकी। इस गीत ने हसन जहाँगीर को, जो 80 के दशक के शुरुआती सालों से एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के हिट गीत के लिए कोशिशें कर रहे थे, रातों रात दक्षिण एशिया के देशों में पॉप स्टार बना दिया। हसन जहाँगीर को पाकिस्तान में पॉप संगीत का जनक भी कहा जाता है; उनका पहला एकल ऐल्बम 1982 में आया था जिसका शीर्षक था "Imran Khan is a Superman"। "हटो बचो", "शादी ना करना यारों" और "आ जाना दिल है दीवाना" हसन जहाँगीर के कुछ और लोकप्रिय गीत रहे हैं।

कूरोश याघमाई
"हवा हवा ऐ हवा ख़ुशबू लुटा दे...", यह हसन जहाँगीर का प्राइवेट ऐल्बम का गीत था, और इस गीत को लिखा और कम्पोज़ भी उन्होंने ही किया (कम से कम कैसेट कवर में किसी और को क्रेडिट नहीं दिया गया है)। कहा जाता है कि रीमिक्स का दौर होने के बावजूद उस ज़माने में हसन जहाँगीर ने किसी भी रीमिक्स कम्पनी को इस गीत या ऐल्बम के रीमिक्स वर्ज़न जारी करने की अनुमति नहीं दी। इस तरह से इस गीत पर हसन जहाँगीर ने अपना एकाधिपत्य बनाये रखते हुए करोड़ों का मुनाफ़ा कमाया। यह गीत 1987-88 के दौरान जैसे एक ऐन्थेम बन गया था। स्कूल-कालेजों के फ़ेअरवेल फ़ंक्शन हो या घर-परिवार की पार्टियाँ, गली-मोहल्लों, दुकानों, हर जगह से सुनाई पड़ती थी "हवा-हवा"। लेकिन रोचक या यूँ कहें कि चौकाने वाली बात यह है कि जिस "हवा हवा" ने हसन जहाँगीर को शोहरत की बुलन्दी तक पहुँचाया, और जिस "हवा-हवा" ने रातों-रात अपनी कामयाबी का झण्डा चारों तरफ़ फ़हराया, वह दरअसल हसन जहाँगीर का अपना ख़ुद का कम्पोज़िशन नहीं था। क्योंकि प्राइवेट ऐल्बमों पर गीतकार या संगीतकार का नाम नहीं लिखा जाता था और जिस कलाकार का वह प्राइवेट ऐल्बम हो, जिसने उस पर पैसे खर्च किये हो, सिर्फ़ उसी का नाम प्राइवेट ऐल्बमों पर अक्सर देखा गया है। इस वजह से किसी ने इस तरफ़ शुरू-शुरू में ध्यान ही नहीं दिया कि "हवा-हवा" की धुन ऑरिजिनल नहीं है, बल्कि यह एक इरानी गीत की धुन है। "हवा हवा" की धुन इरानी गायक / संगीतकार कूरोश याघमाई की एक रचना है जिसके बोल हैं "हवार हवार" जो 'अरायाशे खोरशीद' ऐल्बम का एक गीत है और यह ऐल्बम साल 1980 में जारी हुआ था। मात्र 10 वर्ष की आयु में कूरोश को मिला था उनका पहला वाद्य सन्तूर, जिस पर वो इरानी लोक धुनें बजाया करते थे। आगे चलकर उन्होंने गिटार को अपना साथी बना लिया और अपने ग्रुप की स्थापना की जिसके वो लीड गिटारिस्ट व गायक बने। 1974 में उनका पहला ऐल्बम आया 'गोल-ए-यख'। साल 2011 तक वो सक्रिय रहे।

"हवा-हवा" का जादू उस ज़माने में कुछ इस क़दर छाया हुआ था कि केवल आम ही नहीं बल्कि ख़ास भी इससे बच नहीं सके। हुआ यूँ कि 1988 में सुरेश सिन्हा की फ़िल्म 'बिल्लू बादशाह' बन रही थी। फ़िल्म में थे शत्रुघन सिन्हा, अनीता राज, गोविन्दा और नीलम प्रमुख। उस समय "हवा-हवा" हर किसी की ज़ुबान पर चढा हुआ था और गोविन्दा भी उन्हीं में से एक थे। तो एक बार फ़िल्म के सेट पर गोविन्दा इस गीत को गा रहे थे और उन्हें गाते हुए सुन लिया फ़िल्म के निर्देशक शिशिर मिश्र ने। उनको एक विचार आया कि क्यों न इसी धुन पर गोविन्दा से ही एक गीत गवाया जाये और इसे फ़िल्म के किसी सिचुएशन में डाल कर कहानी का हिस्सा बना लिया जाये! सभी को यह प्रस्ताव अच्छा लगा। गोविन्दा शुरू-शुरू में गीत गाने से हिचकिचा रहे थे पर फ़िल्म के संगीतकार जगजीत सिंह के सलाह पर गाने के लिए तैयार हो गये। सभी को पता था कि इस धुन के इस्तेमाल से हसन जहाँगीर कोई कानूनी कार्यवाई नहीं कर पायेंगे क्योंकि मूल धुन उनका भी नहीं है, इसलिए गीतकार निदा फ़ाज़ली से केवल बोल नये से लिखवा लिये गये और धुन बिल्कुल वही रखा गया।

इस तरह से हसन जहाँगीर का गाया "हवा-हवा ऐ हवा ख़ुशबू लुटा दे..." बन गया गोविन्दा का गाया "जवाँ जवाँ हो जवाँ इश्क़ जवाँ है..."। यह गीत भी ख़ूब चला, पर "हवा-हवा" जैसा नहीं। गोविन्दा के गाये गीत को सुन कर संगीतकार बप्पी लाहिड़ी (जो दूसरों की धुनों से प्रेरित होने के लिए मशहूर रहे हैं) ने भी सोचा कि क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिया जाये! अर्थात जब 1989 की फ़िल्म 'आग का गोला' में एक आइटम नम्बर बनाने की बारी आयी तो बप्पी दा ने भी इसी धुन को अपनाते हुए अलका याज्ञनिक के साथ स्वर मिलाते हुए गाया "आया आया वो आया, यार मेरा आया रे..."। गीत फ़िल्माया गया सनी देओल और अर्चना पूरन सिंह पर। दरसल यह धुन इतना कैची है कि हर बार यह धुन कमाल कर जाता है। "हवा-हवा" हो या "जवाँ-जवाँ" या फिर "आया आया", इन तीनों गीतों को जनता ने स्वीकारा। यही नहीं "हवा हवा" गीत को 1988 की विडियो फ़िल्म 'डॉन 2' में भी शामिल किया गया था जो अभिनेता जीत उपेन्द्र पर फ़िल्माया गया था।

हसन और हृदय
"हवा हवा" बनने के लगभग 22 साल बाद, साल 2009 में 'हरि ओम साईं प्रोडक्शन्स' के मैनेजिंग डिरेक्टर मंगेश डफाले ने मीडिया को बताया कि उनकी अगली फ़िल्म 'आप के लिए हम' में हसन जहाँगीर के गाये "हवा-हवा" को रखने का प्रस्ताव हसन साहब को दिया गया है और वो उनकी आवाज़ में इसे दोबारा फ़िल्म के लिए रेकॉर्ड करना चाहते हैं। हसन जहाँगीर इस प्रस्ताव से बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने न केवल अनुमति दी बल्कि अपनी आवाज़ में इसे दोबारा रेकॉर्ड भी करवाया। जया बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती, मनीषा कोइराला, रवीना टण्डन अभिनीत यह फ़िल्म 2013 में रिलीज़ तो हुई पर बुरी तरह से पिट गई और इस गीत की तरफ़ भी किसी का ध्यान नहीं गया। 'आप के लिए हम' फ़िल्म के बनने में इतना समय लग गया कि मौके का फ़ायदा उठाते हुए फ़िल्मकार हृदय शेट्टी ने अपनी फ़िल्म 'चालीस चौरासी' में भी इस गीत को रखने का फ़ैसला किया। हृदय शेट्टी के अनुसार - "इस फ़िल्म के संगीत की योजना बनाते समय मैं एक ऐसा पुराना गीत चाहता था जो कि सभी चार अभिनेता - नसीरुद्दीन शाह, अतुल कुलकर्णी, के के मेनन और रवि किशन पर फ़िल्माया जा सके। मैं अपने पसन्दीदा संगीतकार आर. डी. बर्मन के किसी गीत को लेने के बजाय "हवा हवा" को ही चुना। जब मैंने हसन जहाँगीर को इन्टरनेट पर ढूँढने की कोशिशें की तो कुछ जगहों पर यह लिखा हुआ था कि उनका अल्पायु में निधन हो चुका है। मैं हताश हो गया; पर जब मैंने अपने पाक़िस्तानी और दुबई के दोस्तों को फ़ोन लगाया तो हक़ीक़त पता चली और हसन साहब से भी सम्पर्क स्थापित हो गया।" हृदय ने फिर फ़िल्म की कहानी हसन को सुनाई और यह भी बताया कि यह गीत फ़िल्म के सभी अभिनेताओं पर एक रीमिक्स गीत के रूप में एक डान्स पार्टी में फ़िल्माया जायेगा। यह सुन कर हसन जहाँगीर बहुत ख़ुश हुए और तुरन्त गीत के अधिकार उन्हे दे दिये। साथ ही अपनी आवाज़ में भी इस गीत को फिर एक बार गाने का ऑफ़र भी दे दिया। यही कारण है कि "हवा हवा" गीत 'चालीस चौरासी' के म्युज़िक ऐल्बम में दो बार शामिल किया गया है, एक बार नीरज श्रीधर और अमिताभ नारायण की आवाज़ों में, और दूसरी बार हसन जहाँगीर की आवाज़ में। अभिनेता अतुल कुलकर्णी के कहा, "मैं भूल नहीं सकता कि यह गीत उस ज़माने में किस हद तक पॉपुलर हुआ था। मैं उस वक़्त 20 साल का था, और आज मेरे उपर यह गीत फ़िल्माया जा रहा है सोच कर एक अजीब सा रोमांच हो रहा है।" 'चालीस चौरासी' में "हवा हवा" के प्रस्ताव पर हसन जहाँगीर का कहना था, "हृदय शेट्टी के ज़रिये हवा-हवा के साथ मैं बॉलीवुड में दोबारा एन्ट्री करने जा रहा हूँ। उनके साथ काम करते हुए मुझे बहुत अच्छा लगा और उनके काम से मैं बहुत मुतासिर भी हुआ। उनकी क्रिएटिविटी ही उनकी ताक़त है। मुझे फ़िल्म की कहानी अच्छी लगी जिस वजह से मैं अपने इस गीत के अधिकार उन्हे सौंपे और मुझे इस फ़िल्म के लिए इस गीत को एक बार फिर से रेकॉर्ड करते हुए बहुत अच्छा लगा।"

"हवा-हवा" के इतने ज़्यादा लोकप्रिय होने पर भी हसन जहाँगीर को बॉलीवुड फ़िल्मों में गाने के मौके क्यों नहीं मिले यह कह पाना मुश्किल है। पर सम्भव है कि भारत-पाक़िस्तान मसले की वजह से वो आसानी से भारत आ पाने में असमर्थ रहे होंगे। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार हसन जहाँगीर ने केवल एक हिन्दी फ़िल्म में गीत गाया है। यह है फ़िल्म 1990 की 'सोलह सत्रह', जिसमें संगीतकार नदीम श्रवण ने हसन जहाँगीर से गवाया था एक गीत "अपन का तो दिल है आवारा, उसे प्यार करे जो लगे प्यारा", जो अभिनेता अरबाज़ पर फ़िल्माया गया था। फ़िल्म के फ़्लॉप होने की वजह से इस गीत की तरफ़ भी किसी का ज़्यादा ध्यान नहीं गया, पर उस ज़माने में यह गीत रेडियो पर कुछ समय तक ज़रूर बजा करता रहा। यह सच है कि हसन जहाँगीर ने फ़िल्मों के लिए ज़्यादा नहीं गाये पर बस एक "हवा-हवा" गीत अन्य हज़ार गीतों पर भारी पड़ता है। इस गीत के साथ हम सब की जवानी के दिनों की यादें जुड़ी हुई हैं, शायद यह भी एक कारण है इस गीत को दिल के करीब महसूस करने का। आपका क्या ख़याल है? लीजिए, चलते-चलते अब आप भी यह गीत सुन लीजिए।

ऐल्बम गीत : "हवा हवा ऐ हवा ख़ुशबू लुटा दे..." : हसन जहाँगीर 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ