मंगलवार, 5 अगस्त 2014

ईमान की लूट - लघु कथा - अनुराग शर्मा

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं नई पुरानी, रोचक कहानियाँ। पिछली बार आपने माधवी चारुदत्ता के स्वर में दो पुरानी लोककथाओं के अनुराग शर्मा द्वारा लेखनीबद्ध आधुनिक संस्करण "तरह तरह के बिच्छू" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम लेकर आये हैं अनुराग शर्मा की लघुकथा "ईमान की लूट", उन्हीं की आवाज़ में।

कहानी "ईमान की लूट" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 9 सेकंड है। कहानी का गद्य बर्ग वार्ता ब्लॉग पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो देर न करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क करें।



कई कलाकारों की दुकान जमाने में उनके अभिनय से अधिक योगदान उनके मेकअप आर्टिस्ट का होता है।
~ अनुराग शर्मा



"बोलती कहानियाँ" में हर सप्ताह सुनें एक नयी कहानी


वकील बोला कि गैंग को बचाने के लिए झूठ बोलते-बोलते उसकी ईमानदारी सबसे पहले खर्च हो जाती है।
(अनुराग शर्मा की "ईमान की लूट" से एक अंश)


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ईमान की लूट MP3

#Seventh Story, Iman Ki Loot: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2014/07. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 3 अगस्त 2014

‘सावन की रातों में ऐसा भी होता है...’ : SWARGOSHTHI – 179 : Raag Des Malhar & Jayant Malhar




स्वरगोष्ठी – 179 में आज

वर्षा ऋतु के राग और रंग – 5 : राग देस मल्हार और जयन्त मल्हार


दो रागों के मेल से सृजित मल्हार अंग के दो राग






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे राग मेघ मल्हार, मियाँ की मल्हार, गौड़ मल्हार, रामदासी मल्हार और सूर मल्हार पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक में हम वर्षा ऋतु के दो ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जो सार्वकालिक राग हैं, किन्तु मल्हार अंग के मेल से इनका सृजन किया गया है। राग देस एक स्वतंत्र और पूर्ण राग है। मल्हार अंग के मेल से राग देस मल्हार का सृजन होता है। इसी प्रकार राग जैजैवन्ती और मल्हार का मेल होता है तो यह जयन्त मल्हार या जयन्ती मल्हार कहलाता है। आज के अंक में हम इन्हीं दो रागों पर चर्चा करेंगे और इनमें पगी कुछ रचनाओं का आस्वादन भी करेंगे।




राग देस, भारतीय संगीत का अत्यन्त मनोरम और प्रचलित राग है। प्रकृति का सजीव चित्र उपस्थित करने में यह पूर्ण सक्षम राग है। यदि इस राग में मल्हार अंग का मेल हो जाए तो फिर 'सोने पर सुहागा' हो जाता है। आज हम आपको राग देस मल्हार का संक्षिप्त परिचय देते हुए इस राग में निबद्ध एक रचना सरोद पर प्रस्तुत करेंगे, जिसे सुविख्यात वादक उस्ताद अली अकबर खाँ ने बजाया है। इसके अलावा इसी राग पर आधारित फिल्म ‘प्रेमपत्र’ का एक गीत लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। राग देस मल्हार के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह स्वतंत्र राग देस और मल्हार अंग के मेल से निर्मित राग है। राग देस अत्यन्त प्रचलित और सार्वकालिक होते हुए भी वर्षा ऋतु के परिवेश का चित्रण करने में समर्थ है। एक तो इस राग के स्वर संयोजन ऋतु के अनुकूल है, दूसरे इस राग में वर्षा ऋतु का चित्रण करने वाली रचनाएँ बहुत अधिक संख्या में मिलती हैं। राग देस औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसमें कोमल निषाद के साथ सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। राग देस मल्हार में देस का प्रभाव अधिक होता है। दोनों का आरोह-अवरोह एक जैसा होता है। मल्हार अंग के चलन और म रे प, रे म, स रे स्वरों के अनेक विविधता के साथ किये जाने वाले प्रयोग से राग विशिष्ट हो जाता है। राग देस की तरह राग देस मल्हार में भी कोमल गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है। राग का यह स्वरुप पावस के परिवेश को जीवन्त कर देता है। परिवेश की सार्थकता के साथ यह मानव के अन्तर्मन में मिलन की आतुरता को यह राग बढ़ा देता है।

अब हम आपको राग देस मल्हार सरोद पर सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत किया है, उस्ताद अली अकबर खाँ ने। मैहर घराने के उस्ताद अली अकबर खाँ का जन्म तो हुआ था त्रिपुरा में, किन्तु जब वे एक वर्ष के हुए तब बाबा अलाउद्दीन खाँ सपरिवार मैहर जाकर बस गए। उनके संगीत की पूरी शिक्षा-दीक्षा मैहर में ही हुई। बाबा के कठोर अनुशासन में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना और अपने चाचा फकीर आफताब उद्दीन से अली अकबर को पखावज और तबला-वादन की शिक्षा मिली। नौ वर्ष की आयु में उन्होने सरोद वाद्य को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया और साधनारत हो गए। एक दिन अली अकबर बिना किसी को कुछ बताए मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) चले गए। बाबा से सरोद-वादन की ऐसी उच्चकोटि की शिक्षा उन्हें मिली थी कि एक दिन रेडियो से उनके सरोद-वादन का कार्यक्रम प्रसारित हुआ, जिसे मैहर के महाराजा ने सुना और उन्हें वापस मैहर बुलवा लिया। 1936 के प्रयाग संगीत सम्मेलन में अली अकबर खाँ ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उनके द्वारा प्रस्तुत राग ‘गौरी मंजरी’ को विद्वानों ने खूब सराहा था। इसमें राग नट, मंजरी और गौरी का अनूठा मेल था। कुछ समय तक आप आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र पर भी कार्यरत रहे। इसके अलावा कई वर्षों तक महाराजा जोधपुर के दरबार में भी रहे। आज हमने आपको सुनवाने के लिए उस्ताद अली अकबर खाँ का सरोद पर बजाया राग देस मल्हार चुना है। इस राग में उन्होने आलाप, जोड़, झाला और मध्यलय सितारखानी ताल में एक मोहक रचना प्रस्तुत किया है। तबला संगति पण्डित शंकर घोष ने की है।


राग - देस मल्हार : सरोद पर आलाप, जोड़, झाला और सितारखानी ताल में रचना : उस्ताद अली अकबर खाँ 




राग देस मल्हार पर आधारित आज प्रस्तुत किया जाने वाला फिल्मी गीत हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्रेमपत्र’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी थे, जिनके आजादी से पहले के संगीत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का स्वर मुखरित होता था तो आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द हुआ करती थी। सलिल चौधरी भारतीय शास्त्रीय संगीत, बंगाल और असम के लोक संगीत के जानकार थे तो पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था। उनके संगीत में इन संगीत शैलियों का अत्यन्त सन्तुलित और प्रभावी प्रयोग मिलता है। आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत- ‘सावन की रातों में ऐसा भी होता है...’ में उन्होने राग देस मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर राग के स्वरुप का सहज और सटीक चित्रण किया है। इस गीत को परदे पर अभिनेत्री साधना और नायक शशि कपूर पर फिल्माया गया है। फिल्म के निर्देशक हैं विमल रोंय, गीतकार हैं गुलज़ार तथा झपताल में निबद्ध गीत को स्वर दिया है लता मंगेशकर और तलत महमूद ने। इस गीत में सितार का अत्यन्त मोहक प्रयोग किया गया है। लीजिए, आप इस गीत का रसास्वादन कीजिए।


राग – देस मल्हार : ‘सावन की रातों में ऐसा भी होता है...’ : लता मंगेशकर और तलत महमूद : संगीत - सलिल चौधरी : फिल्म – प्रेमपत्र 




अब हमारी चर्चा में राग जयन्ती मल्हार अथवा जयन्त मल्हार है। वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों में यह भी एक प्रमुख राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग जैजैवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जैजैवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जैजैवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं- सा, रे प, म प नि (कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं- सां ध नि (कोमल) म प, प म ग रे ग (कोमल) रे सा। इसराज और मयूरवीणा के सुप्रसिद्ध वादक पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार के दोनों रागों का कलात्मक और भावात्मक मिश्रण क्लिष्ट व विशेष प्रक्रिया है। पूर्वांग में जैजैवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तरांग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं।

आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन और मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में अपनी संगीत रचनाओं का अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह रचना आप भी सुनिए।


राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन




आज हम राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे। बसन्त देसाई ने मल्हार अंग के रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना की थी। मल्हार अंग के रागों के प्रति उनका लगाव इतना अधिक था कि इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह तीसरा गीत प्रस्तुत है। इस लघु श्रृंखला में आप फिल्म 'गुड्डी' से राग मियाँ की मल्हार पर आधारित गीत- 'बोले रे पपीहरा...' और राग सूर मल्हार पर आधारित 1967 की फिल्म 'रामराज्य' का गीत- 'डर लागे गरजे बदरवा...' सुनवा चुके हैं। ‘शक’ जिस दौर की फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार के ओर अधिक हो गया था। फिल्म संगीत का मिजाज़ भी बदल गया था। परन्तु बसन्त देसाई ने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा। फिल्म ‘शक’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों पर आधारित फिल्म ‘शक’ का जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने। आइए सुनते हैं यह रसपूर्ण गीत। इसी गीत के साथ श्रृंखला के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए। 



राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : संगीत – बसन्त देसाई : फिल्म – शक





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 179वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 - कण्ठ संगीत की इस रचना का अंश सुन कर गायिका की आवाज़ को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

2 – यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 181वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 177वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में राग सूर मल्हार के खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित भीमसेन जोशी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग सूर मल्हार। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम ऋतु के अनुकूल रागों अर्थात वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं। अगले अंक में हम एक और वर्षाकालीन संगीत शैली पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 2 अगस्त 2014

"वो हैं ज़रा ख़फ़ा-ख़फ़ा..." - किस बात पर ख़फ़ा हुए थे लता और रफ़ी एक दूजे से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 37
 

वो हैं ज़रा ख़फ़ा ख़फ़ा...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 37-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'शागिर्द' के गीत "वो हैं ज़रा ख़फ़ा-ख़फ़ा" के बारे में। 


ह वर्ष 1967 की बात है। निर्माता सुबोध मुखर्जी बना रहे थे फ़िल्म 'शागिर्द'। उन दिनों लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के बीच मनमुटाव चल रहा था। रॉयल्टी के किस्से को लेकर दोनों में न केवल बातचीत बन्द थी, बल्कि एक दूसरे के साथ गीत गाना भी बन्द कर दिया था। ऐसे में जब भी लता-रफ़ी डुएट की बारी आती किसी फ़िल्म में, या तो लता की जगह सुमन कल्याणपुर की आवाज़ ली जाती या फिर रफ़ी के बदले महेन्द्र कपूर या मुकेश की। तो 'शागिर्द' फ़िल्म के कुल 6 गीतों में से 5 गीतों को तो एकल गीतों के रूप में ही निपटा लिया गया, पर रोमान्टिक फ़िल्म में एक भी युगल गीत न हो, यह भी किसी को गवारा नहीं हो रहा था। तय हुआ कि रफ़ी साहब और सुमन कल्याणपुर की ही आवाज़ों में एक युगल गीत रेकॉर्ड कर लिया जाये। तैयारियाँ होने लगी थीं कि इंडस्ट्री में ख़बर फैल गई कि लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी का झगड़ा खत्म हो चुका है और दोनों एक दूसरे के साथ गाने के लिए अब तैयार हैं। इस ख़बर के फैलते ही संगीतकारों ने जैसे चैन की साँस ली और जैसे एक होड़ सी लग गई लता-रफ़ी के डुएट्स रेकॉर्ड करने की। यह 1967 का ही वर्ष था। इस वर्ष लता-रफ़ी के पुनर्मिलन के बाद जो तीन सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रेकॉर्ड हुए, वो थे सचिन देव बर्मन के संगीत में फ़िल्म 'ज्वेल थीफ़' का "दिल पुकारे, आ रे आ रे आ रे", कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में 'आमने-सामने' फ़िल्म का "कभी रात-दिन हम दूर थे, दिन रात का अब साथ है" तथा तीसरा गीत था लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के निर्देशन में फ़िल्म शागिर्द का - "वो हैं ज़रा ख़फ़ा-ख़फ़ा, सो नैन यूँ चुराये हैं..."। इन तीनों गीतों के बोलों पर अगर ध्यान दिया जाये तो अहसास होता है कि ये तीनों गीत लता-रफ़ी के पुनर्मिलन या नाराज़गी के क़िस्से की तरफ़ इशारा करते हैं। वाक़ई इत्तेफ़ाक़ की बात है, है ना? बाक़ी दो गीतों का नहीं कह सकते, पर फ़िल्म 'शागिर्द' के इस युगल गीत के बोल इत्तेफ़ाकन नहीं थे। यह लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, मजरूह सुल्तानपुरी और सुबोध मुखर्जी के नटखट दिमाग़ की उपज थी। इन्होंने सोचा कि क्यों न लता जी और रफ़ी साहब को थोड़ा छेड़ा जाये, उनकी ज़रा चुटकी ली जाये, और उन्हें परेशान करने के लिए ही फ़िल्म की कहानी में एक ऐसा सिचुएशन डाला गया कि जिसमें नायक-नायिका एक दूसरे से ख़फ़ा हैं। मजरूह ने भी पूरा पूरा मज़ा लेते हुए लिख डाला "वो हैं ज़रा ख़फ़ा-ख़फ़ा, सो नैन युं चुराये हैं के ओ हो..."। साल 2005 में रफ़ी साहब को श्रद्धांजलि स्वरूप प्यारेलाल जी जब 'विविध भारती' पर विशेष जयमाला प्रस्तुत करने आये थे तो उसमें इस गीत को बजाते हुए कहा था, "हाँ तो फ़ौजी भाइयों, एक मज़ेदार बात बताऊँ आपको? फ़िल्म 'शागिर्द' में एक डुएट गाना था 'वो हैं ज़रा ख़फ़ा-ख़फ़ा'; रिहर्सल होने के बाद जब फ़ाइनल टेक रेकॉर्ड हो रहा था, तब रफ़ी साहब और लता जी दोनों ऐसे मूड में गा रहे थे कि ऐसा लग रहा था कि वो दोनों वाक़ई एक दूसरे से ख़फ़ा हैं। बहुत ही प्यारे ढंग से गाया है दोनों ने"।

लता और रफ़ी के बीच सुलह
करवाया  जयकिशन ने
फ़िल्म 'शागिर्द' के इस गीत के बनने की कहानी तो पता चल गई पर इससे भी बड़ी बात यह कि आख़िर लता जी और रफ़ी साहब के बीच मनमुटाव किस बात को लेकर हुआ कि 1961 से लेकर 1967 तक दोनों ने न तो एक दूसरे के साथ बातचीत की और न ही साथ में कोई गीत गाया? क्या था रॉयल्टी का वह मसला, जान लेते हैं ख़ुद लता जी के ही शब्दों में जो उन्होंने अमीन सायानी को कहा था एक साक्षात्कार में। "हुआ क्या था कि हमारी ऐसोसिएशन थी प्लेबैक सिंगर्स की, उसमें तलत साहब, मुकेश भ‍इया, ये सब मेरे साथ, मतलब, मैंने उनको बताया कि मैं रॉयल्टी लेती हूँ, प्रोड्युसर मुझे रॉयल्टी देते हैं, तो हम सबके लिए क्यों न माँगे? क्योंकि कभी कभी प्लेबैक सिंगर को काम मिलना बन्द हो जाता है, काम कम हो जाता है, तो कम से कम रॉयल्टी तो आती रहेगी! तो जब मैंने यह कहा ऐसोसिएशन में तो सब राज़ी हो गए। पर HMV ने कहा कि हम नहीं देंगे, आप प्रोड्युसर से लीजिये। प्रोड्युसर्स ने कहा कि ये तो HMV को देना चाहिये। HMV ने कहा कि हम प्रोड्युसर्स को ज़्यादा देते हैं। तो ऐसे में हम सब ने तय किया कि अब हम गायेंगे गाना पर HMV में जायेगा नहीं गाना। इस तरह से बिमल दा की एक पिक्चर, 'प्रेम पत्र' शायद, उसके गाने रेकॉर्ड हुए लेकिन HMV में गये ही नहीं। तो इस तरह जब हमने शुरू किया तो कुछ, अब मैं नाम नहीं लूँगी, पर कुछ म्युज़िक डिरेक्टर्स और कुछ सिंगर्स ऐसे थे, जिन्होंने आपस में यह तय किया कि ये सब पागलपन है, हमें कोई रॉयल्टी नहीं चाहिये, और उसमें रफ़ी साहब को भी उन लोगों ने खींचा। अच्छा रफ़ी साहब इतने सीधे थे, जो सामने वाला कहे वो मान जाते थे। तो एक दिन, मुकेश भ‍इया ने आकर मुझसे कहा कि लता, आज मीटिंग्‍ है, तो यह बात ज़रा क्लीयर कर लेना कि हमने सुना है कि दो तीन सिंगर्स हैं जिन्होंने HMV में अपने गाने देने के लिए हाँ किये हैं और रेकॉर्डिंग हुई है। तो मैंने वहाँ कहा कि मैंने ऐसा सुना है कि रेकॉर्डिंग हुई है तो रफ़ी साहब, आप क्या कहते हैं इस बारे में? तो रफ़ी साहब ने भी गाया था, तो वो ज़रा नाराज़ हो गये, बोले, "देखो भई, हमारा तो कुछ नहीं है, हम गाते हैं, प्रोड्युसर हमको पैसे देते हैं, बात खत्म"। मैंने कहा कि बात यहाँ खत्म नहीं होती है, हम लोगों के गाने की वजह से उनके गाने चलते हैं, तो हमें भी रॉयल्टी मिलनी चाहिये। तो मुकेश भ‍इया ने भी कहा कि लता बिल्कुल सही कह रही है, तलत साहब ने भी कहा, और मुबारक़ बेग़म थी, उन्होंने भी कहा। रफ़ी साहब को, हमारे एक सिंगर थे, उन्होंने जाकर कुछ कहा कि ये लता सब गड़बड़ कर रही है, हालाँकि मुझे रॉयल्टी मिल रही थी। मैंने कहा कि देखिये मुझे रॉयल्टी मिल रही है, फिर आप क्यों इस तरह सोचते हैं? तो मुकेश भ‍इया ने कहा कि रफ़ी साहब बोलिये क्या करना है? रफ़ी साहब बोले कि मैं क्या बोलूँ, ये महारानी बैठी हैं न, इनको पूछो? तो मैंने कहा कि आप मुझे महारानी क्यों कह रहे हैं? तो कहने लगे कि आप इस तरह से मेरे साथ बात करेंगे तो मैं गाऊँगा नहीं आपके साथ। मैंने कहा कि आप क्यों तक़लीफ़ कर रहे हैं, मैं ही नहीं गाऊँगी आपके साथ। और मैं वहाँ से चली आई, और मैंने सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स को टेलीफ़ोन किया कि रफ़ी साहब के साथ डुएट हो तो आप मुझे नहीं बुलायेंगे, किसी और से ले लीजिये। तो इस तरह से तीन-साढ़े तीन साल तक हमारा गाना साथ में नहीं हुआ। जयकिशन जी एक दिन आकर बोले कि आप दोनो साथ में नहीं गायेंगे तो हम बना नहीं सकते गाना। हमें बड़ी तकलीफ़ होती है। तो इस तरह से सुलह हुई। तो मैंने उनसे लेटर लिखवा लिया था कि जो मैंने कहा वो ग़लत था। पर वहाँ से एक बात हुई कि रॉयल्टी का इश्यु ख़तम हो गया, और लोगों को रॉयल्टी नहीं मिली।"

शाहिद रफ़ी
उपर्युक्त साक्षात्कार में लता जी ने ज़िक्र किया कि उन्होंने रफ़ी साहब से लिखवा लिया था कि जो रफ़ी साहब ने कहा वह ग़लत था। इस साक्षात्कार के इस हिस्से की तरफ़ शायद किसी का ध्यान नहीं गया होगा, पर यही बात जब लता जी ने साल 2012 में एक साक्षात्कार में कही तो हंगामा ख़ड़ा हो गया। रफ़ी साहब के बेटे शाहिद रफ़ी ने जब यह इन्टरव्यू पढ़ा तो भड़क गये और प्रेस-कॉन्फ़्रेन्स बुलाकर कहा - "My father was national property. I am hurt and so are his fans. His fan following is much bigger than any other artist. If she can prove that my father had written an apology letter to her, then I am ready to apologise. But the main thing is that she should come forward and produce that letter. All I want is that the truth should come out." शाहिद रफ़ी ने कहा कि प्रेस कॉन्फ़्रेन्स बुलाने से पहले उन्होंने लता जी को फोन इसलिए नहीं किया क्योंकि वो हमेशा ही व्यस्त रहती हैं, पहले भी जब भी कभी उन्हें फ़ोन किया तो हर बार यही जवाब मिला कि वो व्यस्त हैं। जैसा कि लता जी ने बताया कि जयकिशन ने दोनों के बीच सुलह करवाई और रफ़ी साहब से लिखित माफ़ी मँगवाई, इस पर शाहिद रफ़ी ने कहा कि रफ़ी साहब ने ऐसा कोई भी ख़त नहीं लिखा था और न ही उन्होंने माफ़ी माँगी। बल्कि हक़ीक़त यह है कि लता जी ने ही जयकिशन को कहा कि वो जाकर उन दोनों के बीच सुलह करवाये क्योंकि लता जी को यह बात खाये जा रही थी कि सारे अच्छे डुएट गाने रफ़ी साहब सुमन कल्याणपुर के साथ गाते चले जा रहे हैं। सुमन कल्याणपुर को अपने रास्ते से हटवाने के लिए उन्होंने जयकिशन का सहारा लेकर रफ़ी साहब से सुलह करवा ली। शाहिद रफ़ी ने लता जी को चुनौती देकर कहा है कि अगर रफ़ी साहब ने ऐसी कोई चिट्ठी लिखी भी है तो वो गई कहाँ? या तो लता जी उस चिट्ठी को दुनिया को दिखाये, रफ़ी साहब के गुज़रे 25 साल हो चुके हैं और अब लता जी उस चिट्ठी के बारे में बता रही हैं। लोग मूल्यवान वस्तुओं को सालों तक सम्भाल कर रखते हैं और यह ख़त तो लता जी का सम्मान और बढ़ा सकती थी, तो लता जी ने इसे सम्भाल कर क्यों नहीं रखा? शाहिद रफ़ी ने प्रेस को बताया कि अगर लता जी ने 10-12 दिनों में कोई ठोस जवाब नहीं दिया तो उनके ख़िलाफ़ वो मानहानी का मुक़द्दमा कर देंगे। लेकिन इसके बाद क्या हुआ कुछ पता नहीं चल पाया। शाहिद रफ़ी से फ़ेसबुक पर एकाधिक बार सम्पर्क करने पर भी वो चुप्पी ही साधे रहे। बस यही थी लता-रफ़ी के झगड़े की दास्तान। आइए, फिल्म 'शागिर्द' का वही युगलगीत सुनते हैं।

फिल्म - शागिर्द : 'वो हैं जरा खफा खफा तो नैन यूँ चुराए हैं...' : लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी : संगीत - लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी 



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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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