Saturday, June 7, 2014

"रस्म-ए-उल्फ़त" के बाद और कोई गाना मत बजाना


एक गीत सौ कहानियाँ - 33
 

रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 33वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'दिल की राहें' की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे..." के बारे में.




"मैं यह समझता हूँ कि हर फ़नकार का जज़्बाती होना ज़रूरी है, क्योंकि अगर उसमें इन्सानियत का जज़्बा नहीं है, तो वो सही फ़नकार नहीं हो सकता। भगवान ने कुछ फ़नकारों को ज़्यादा ही जज़्बाती बनाया है। यह गाना मुझे बहुत पसन्द है, बहुत ख़ूबसूरती से गाया गया है, सुन के कुछ एक अजीब सी कैफ़ियत तारी होती है। दर्द भरा गाना है, पर दर्द भी इन्सान की ज़िन्दगी का हिस्सा है। इससे इन्सान कब तक दूर भाग सकता है?", ये शब्द निकले थे संगीतकार मदन मोहन के मुख से विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़िल्म 'दिल की राहें' की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे" सुनवाने से पहले। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों व ग़ज़लों की बात करें तो ऐसा अक्सर हुआ कि वो फ़िल्में नहीं चली पर उन फ़िल्मों को आज तक अगर लोगों ने याद रखा तो सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके गीतों की वजह से। केवल 70 के दशक की ही अगर बात करें तो 'महाराजा', 'दस्तक', 'माँ का आँचल', 'हँसते ज़ख़्म', 'मौसम' और 'दिल की राहें' कुछ ऐसी फ़िल्में हैं जो बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा कमाल नहीं दिखा सके, पर आज इन फ़िल्मों के ज़िक्र पर सबसे पहले इनके गानें याद आते हैं। मदन मोहन की मौसिक़ी और लता मंगेशकर की आवाज़ में जितनी भी ग़ज़लें बनीं हैं, वो सभी एक से बढ़ कर एक है, और उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे ये जन्नत में बन कर धरती पर उतारे गये हैं। इन ग़ज़लों का पूरा श्रेय मदन मोहन और लता जी को दे दें और इनके शायरों को याद न करें, यह बहुत ग़लत बात जो जायेगी। राजा मेहन्दी अली ख़ाँ, राजेन्द्र कृष्ण और मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे ग़ज़लों को मदन मोहन ने सबसे ज़्यादा स्वरबद्ध किया। पर 1973 में दो फ़िल्में ऐसी आईं जिनमें बतौर गीतकार नक्श लायलपुरी साहब ने कमान सम्भाली। ये फ़िल्में थीं 'प्रभात' और 'दिल की राहें'। फ़िल्म 'प्रभात' में लता के गाये कई गीत थे जिनमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है मुजरा गीत "साक़ीया क़रीब आ, नज़र मिला..."। और फ़िल्म 'दिल की राहें' के गीतों और ग़ज़लों के तो क्या कहने! मन्ना डे और उषा मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो, मेरा गीत अमर हो जाये..." और लता मंगेशकर की गायी "रस्म-ए-उल्फ़त..." फ़िल्म की दो श्रेष्ठ रचनायें थीं। इन दो फ़िल्मों के अलावा नक्श साहब ने मदन जी के साथ एक और फ़िल्म के लिए भी गीत लिखे पर वह फ़िल्म नहीं बनी। 

नक्श ल्यायलपुरी और लता
"रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें" ग़ज़ल के बनने की कहानी चौंकाने वाली है। हुआ यूँ कि एक सिचुएशन पर गीत लिखने के लिए मदन मोहन ने नक्श लायलपुरी को एक धुन दे दी थी और नक्श साहब को गीत लिख कर रविवार की सुबह मदन जी के घर ले जाना था। और वह गीत अगले दिन (सोमवार) को रेकॉर्ड होना था क्योंकि लता जी ने डेट दे रखा था। तो नक्श साहब गीत लिख कर मदन मोहन के घर पहुँचे रविवार सुबह 11 बजे। उनका लिखा हुआ गीत मदन जी ने पढ़ा और उनसे कहा कि फ़िल्म के निर्माता (सुल्तान एच. दुर्रानी और एस. कौसर) ने कहा है कि उन्हें अपनी फ़िल्म में मदन मोहन से एक ग़ज़ल चाहिये। अगर मदन मोहन के साथ ग़ज़ल नहीं बनायी तो फिर क्या काम किया, ऐसा निर्माता महोदय ने मदन मोहन से कहा है। तो अब मदन जी भी चाहते हैं कि उसी धुन पर नक्श साहब एक ग़ज़ल लिख दे। अब नक्श साहब मदन जी को ना भी नहीं कह सकते थे, वो दुविधा में पड़ गये। यह तनाव भी था कि अगले ही दिन रेकॉर्ड करना है, अगर लिख ना सके तो क्या होगा! लता जी की डेट बेकार हो जायेगी, वगेरह वगेरह। ये सब सोचते सोचते वो मदन जी के घर से बाहर निकल आये। उन्होंने घड़ी देखा, सुबह के 11 बज रहे थे। उन्होंने सोचा कि अगर वो पेडर रोड से मुलुंड वापस जाकर लिखेंगे तो काफ़ी समय बरबाद हो जायेगा, और फिर वापस भी आना है, इसलिए वो चौपाटी में फुटपाथ के एक कोने में जाकर बैठ गये। और मन ही मन सोचने लगे कि इतने कम समय में लिखें तो लिखें कैसे, गीत को ग़ज़ल बनायें तो बनायें कैसे, इस मुसीबत से निकले तो निकले कैसे? और ये सब सोचते-सोचते उनके मुख से निकल पड़े कि रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे। बस, कलम चलने लगी, कभी रुकती, कभी चलती, कभी वो सोचते, कभी मुस्कुराते, ऐसा करते करते ग़ज़ल पूरी हो गई। और शाम 4 बजे नक्श साहब जा पहुँचे मदन मोहन जी के घर। अगले दिन ग़ज़ल रेकॉर्ड हो गई। लता और मदन मोहन की जोड़ी के ग़ज़लों के बारे में तो सब जानते थे, इस बार नक्श साहब की भी ख़ूब तारीफ़ हुईं। नक्श साहब ने एक मुलाक़ात में बताया था कि बरसों बाद मदन मोहन जी की याद में मुंबई के चेम्बुर में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था जिसमें नक्श साहब को भी आमन्त्रित किया गया था। जब इस ग़ज़ल को बजाया गया, तब किसी ने कहा कि "रस्म-ए-उल्फ़त" के बाद और कोई गाना मत बजाना।

अपने मनचाहे साज़ के साथ मदन जी
मदन मोहन के बारे में गीतकार और शायर नक्श लायल्पुरी के क्या विचार हैं, उन्हीं के शब्दों में पढ़िये - "उनसे मिलने से पहले मैंने जो कुछ भी सुन रखा था मदन मोहन के बारे में, कि वो शॉर्ट-टेम्पर्ड हैं, वगेरह वगेरह, वो सब ग़लत बातें हैं। वो ऐसे पहले संगीतकार थे जिन्होंने मेरे सर पर कभी पहाड़ नहीं रखा। वो गीतकारों और शायरों को छूट देते थे। वो किसी सिटिंग्‍ में ज़्यादा से ज़्यादा 20 मिनट बैठते और मुझे कभी भी किसी गीत को पूरा करने के लिए कभी समय की पाबन्दी नहीं दी। निर्माता जब किसी धुन को सिलेक्ट कर लेते थे, तब मदन जी मुझे बुलाते और समझाते। वो समय के बड़े पाबन्द थे और अगर कोई देर से आया तो वो ग़ुस्सा हो जाते थे। किसी गीत को कम्पोज़ करने के लिए वो 10 मिनट का समय लेते थे। लेकिन जब कोई निर्माता उन्हें साइन करवाने आते तो वो उनसे एक महीने का समय माँग लेते ताकि उन्हें अपना मनपसन्द स्टुडियो, मनपसन्द कलाकार और साज़िन्दों से डेट्स मिल जाये। इन सब चीज़ों के लिए वो किसी की ख़ुशामद करना बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। स्टुडियो, साज़िन्दे और गायक तय हो जाने पर वो पाँच-छह गीत एक के बाद एक रेकॉर्ड कर लेते, एक गीत प्रति दिन के हिसाब से।" नक्श लायलपुरी के उस मुलाक़ात में उन्होंने यह बताया कि मदन मोहन फ़िल्म 'लैला मजनूं' में नक्श साहब को बतौर गीतकार लेना चाहते थे। मदन मोहन साहिर लुधियानवी को नहीं लेना चाहते थे क्योंकि साहिर अपने गीतों में फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते और उधर मदन मोहन की आदत थी कि हर गीत में कुछ न कुछ फेरबदल कर देते थे। पर 'लैला मजनूं' के निर्माता एच. एस. रवैल साहिर के पक्ष में थे, और मदन जी को झुकना पड़ा क्योंकि उन्हें उस वक़्त पैसों को सख़्त ज़रूरत थी अपने लोनावला के बंगले के निर्माण के लिए। 'लैला मजनूं' के रिलीज़ के बाद मदन मोहन जब नक्श लायलपुरी से मिले तो उनसे कहा कि वो 'लैला मजनूं' से भी बड़े फ़िल्म में नक्श साहब से गीत लिखवायेंगे, पर वह दिन आने से पहले ही मदन जी अचानक इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। उसी मुलाक़ात में जब नक्श साहब से यह पूछा गया कि मदन जी का कौन सा गीत उन्हें सर्वाधिक पसन्द है, तो उन्होंने फ़िल्म 'अनपढ़' के "आपकी नज़रों ने समझा" की तरफ़ इशारा किया। नक्श साहब ने यह भी बताया कि इसी गीत के मीटर पर उन्होंने फ़िल्म 'दिल की राहें' में ही एक गीत लिखा था "आप की बातें करें या अपना अफ़साना कहें, होश में दोनो नहीं हैं किसको दीवाना कहें"। पर "रस्म-ए-उल्फ़त" ही ज़्यादा मशहूर हुआ।

उस्ताद रईस ख़ाँ

मदन मोहन के गीतों में बहुत बार हमें सुन्दर सितार की ध्वनियाँ सुनने को मिली हैं। अन्य गीतों की तरह "रस्म-ए-उल्फ़त" में भी जो सितार के सुरीले पीस बजे हैं, उन्हें बजाया है सितार के उस्ताद रईस ख़ाँ साहब ने। ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और पहली बार सन 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में सितार बजाया था। विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' के शीर्षक संगीत में इसी गीत के शुरुआती संगीत का अंश सुनाई देता है जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था। इस गीत के बाद मदन जी के बहुत सारे यादगार गीतों में उन्होंने सितार बजाया और सितार के इन टुकड़ों ने गीतों को सजाने-सँवारने में अलंकार का काम किया। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी टाइमिंग कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लतफ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया हमेशा के लिए। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। नक्श साहब की ख़ुशक़िस्मती थी कि 1973 में 'दिल की राहें' बन गईं और उनकी इस अमर ग़ज़ल को रईस ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगाये। बस इतनी सी थी आज के गीत की दास्तान। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए। गीत आरम्भ होने से पहले मदन मोहन की ही आवाज़ में वह टिप्पणी भी सुनिए जिसका उल्लेख इस आलेख के आरम्भ में किया गया है। गीत के अन्त में उस्ताद रईस खाँ का बजाया सितार पर झाला भी आप सुन सकते हैं।


फिल्म - दिल की राहें : 'रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...' : गायिका - लता मंगेशकर : संगीत - मदन मोहन : गीत - नक्श लायलपुरी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, June 5, 2014

सुन दर्द मेरा बेदर्द सनम...

खरा सोना गीत - बेईमान बालमा 
प्रस्तोता - श्वेता पाण्डे
स्क्रिप्ट - सुजोय चट्टरजी
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन

Wednesday, June 4, 2014

एक चुराई हुई धुन के मोहताज़ हुए ज़रदोज़ी लम्हें

ताज़ा सुर ताल - ज़रदोज़ी लम्हें 

अक्सर हमारे संगीतकार विदेशी धुनों की चोरी करते हुए पकडे जाते हैं, पर आज जिक्र एक ऐसे नए गीत का जो लगभग २० साल पहले बना एक खूबसूरत मगर कमचर्चित गीत हिंदी गीत की ही हूबहू नक़ल है. 1996 में बाली सागू जो भारत में रेमिक्सिंग के गुरु माने जाते हैं, ने अपनी पहली मूल गीतों की एल्बम 'रायिसिंग फ्रॉम द ईस्ट' लेकर आये. संगीत प्रेमियों ने इस एल्बम को हाथों हाथ लिया, तुझ बिन जिया उदास, दिल चीज़ है क्या  और नच मलंगा  जैसे हिट गीतों के बीच उदित नारायण का गाया बन में आती थी एक लड़की  शायद कुछ कम सुना ही रह गया था, और इसी बात का फायदा उठाया आज के संगीतकार संजीव श्रीवास्तव ने और फिल्म रोवोल्वर रानी  में इसी तर्ज पर बना डाला ज़रदोज़ी लम्हें . लीजिये पहले सुनिए बाली सागू का बन में आती थी एक लड़की 



और अब सुनिए ये बेशर्म नक़ल, वैसे फिल्म रेवोल्वर रानी  में कुछ बेहद अच्छे गीत भी हैं, जिनकी चर्चा फिर कभी...
    

Monday, June 2, 2014

बड़ी बड़ी अंखियों से डर गया जी....


खरा सोना गीत - जाने कहाँ मेरा जिगर गया 
प्रस्तोता - श्वेता पाण्डे
स्क्रिप्ट - सुजोय चट्टरजी
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन

Sunday, June 1, 2014

सौ रंग बिखेरती मधुर सारंगी


स्वरगोष्ठी – 170 में आज


संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 8



मानव-कण्ठ का अनुकरण करने में सक्षम लोक और शास्त्रीय तंत्रवाद्य सारंगी 
 



 ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की आठवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। वाद्य परिचय श्रृंखला की आज यह समापन कड़ी है और आज की इस कड़ी में हम आपसे एक ऐसे गज-तंत्र-वाद्य की चर्चा करेंगे जो सम्भवतः सबसे प्राचीन तंत्रवाद्य है। इस बहुउपयोगी वाद्य का प्रचलन क्रमशः कम होता जा रहा है, किन्तु लोक और शास्त्रीय, दोनों मंचों पर आज भी इसे देखा जा सकता है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमारे साथी सुमित चक्रवर्ती सारंगी के दो लोक स्वरूप पर चर्चा कर रहे हैं। 



लाखा खाँ  (सारंगी) और दाने खाँ (ढोलक)
श्चिमी राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है- ‘ताल मिले तो पगाँ रा घुँघरू बाजे’, अर्थात ‘संगीत में यदि सधी हुई ताल की संगति मिल जाए तो पैरों के घुँघरू स्वतः बज उठते हैं’। राजस्थानी लोक संस्कृति में लोकवाद्यों का काफ़ी प्रभाव रहा है। प्रदेश के विभिन्न अंचलों में वहाँ की संस्कृति के अनुकूल स्थानीय लोकवाद्य खूब रचे-बसे हैं। जिस क्षेत्र में स्थानीय वाद्यों को फलने-फूलने का अवसर मिला, उन वाद्यों की धूम देश के कोने-कोने से लेकर विदेशों तक मची है। ऐसा ही एक राजस्थानी लोक-तंत्र-वाद्य ‘सारंगी’ है। सारंगी शब्द ‘सौ’ और ‘रंग’ शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है सौ रंगों को बिखेरने वाला वाद्य। ऐसा नाम शायद इसे इसलिए मिला कि मानव के गले की प्रायः सभी हरकतों के अनुकरण का गुण इस वाद्य में मौजूद है। सारंगी प्राचीन काल में घुमक्कड़ जातियों का वाद्य रहा है। मध्यकाल में जब गायन, वादन और नर्तन को राजदरबारों का संरक्षण मिला तो यह गायन और नृत्य का प्रमुख संगति वाद्य बना। शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठित होने के बावजूद सारंगी का लोक स्वरूप फलता-फूलता रहा। इसका प्राचीन नाम ‘सारिन्दा’ था जो कालान्तर के साथ ‘सारंगी’ हुआ। राजस्थान में सारंगी के विविध रूप दिखाई देते हैं। मिरासी, लंगा, जोगी, माँगणियार आदि जाति के कलाकारों द्वारा बजाया जाने वाला यह वाद्य गायन तथा नृत्य की संगति की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। संगति वाद्य के अलावा यह स्वतंत्र वाद्य के रूप में बजाया जाता है। पश्चिमी राजस्थान क्षेत्र की लंगा जाति का यह प्रमुख वाद्य है इनकी सारंगी को सिन्धी सारंगी कहा जाता है। आइए, अब हम आपको इस सारंगी का रसास्वादन कराते हैं। लंगा सारंगी वादकों में एक प्रमुख नाम लाखा खाँ का है। इनकी सारंगी को ‘लोदी’ कहा जाता है। लाखा खाँ का लोदी वादन देश-विदेश में प्रसिद्ध है। अब आप लाखा खाँ का सारंगी वादन सुनिए। ढोलक संगति उनके पुत्र दाने खाँ ने की है।


सारंगी वादन : राजस्थानी लोकधुन : वादक – लाखा खाँ लंगा : ढोलक संगति – दाने खान लंगा




श्याम नेपाली 
भरत नेपाली 
विभिन्न क्षेत्रों की लोक सारंगी भी कई प्रकार की होती है। थार क्षेत्र में ही दो अलग-अलग आकार-प्रकार की सारंगी होती है। इनमें सिन्धी सारंगी और गुजराती सारंगी अधिक लोकप्रिय है। सिन्धी सारंगी आकार में बड़ी होती है। इसे जैसलमेर और बाड़मेर ज़िले के लंगा माँगणियार द्वारा बजाया जाता है। गुजराती सारंगी, सिन्धी सारंगी से आकार में छोटी होती है। सारंगी का निर्माण शीशम और रोहिडे की लकड़ी से होता है। इसका निचला हिस्सा जिसे कुंडी कहा जाता है, बकरे की खाल से मढ़ा जाता है। इसके पेंदे के ऊपरी भाग में सींग की बनी घोड़ी होती है। घोड़ी के छेदों में से तार निकालकर किनारे पर लगे चौथे में उन्हें बाँध दिया जाता है। इस वाद्य में 29 तार होते हैं तथा मुख्य बाज में चार तार होते हैं जिनमें से दो तार स्टील के व दो तार ताँत के होते हैं। ताँत के तार को ‘राँदा’ कहते हैं। बाज के तारों के अलावा झोरे के आठ तथा झीले के 17 तार होते हैं। बाज के तारों पर गज, की रगड़ से सुर निकलते हैं। सारंगी के ऊपर लगी खूँटियों को झीले कहा जाता है। पैंदे में बाज के तारों के नीचे घोड़ी में आठ छेद होते हैं। इनमें से झारों के तार निकलते हैं। एक प्रतीकात्मक समस्वरित सारंगी की आवाज़ किसी मधुमक्खी के छत्ते से आती भनभनाहट जैसी होती है। सारंगी वाद्य बजाने में राजस्थान की सबसे पारंगत जाति है, सारंगिया लंगा।

सारंगी की सुरमई तान और लोकगायकी जब एक साथ निकलती है तब सुनने वाला हर दर्शक और श्रोता सब कुछ छोड़ कर इसमें खो जाता है, क्योंकि इस वाद्ययंत्र में अनूठी विशेषताएँ हैं। यह नेपाल का भी पारम्परिक वाद्य है, परन्तु नेपाली सारंगी में केवल चार तार होते हैं। नेपाली सारंगी का प्रयोग आमतौर पर लोक गायक करते हैं। ये गायक अपने गायन के दौरान स्वयं सारंगी वादन भी करते हैं। आइये, आज की चर्चा को यहीं विराम देते हुए आपको नेपाली सारंगी वादन का एक उदाहरण सुनवाते हैं। नेपाल के दो लोक कलाकार, भरत नेपाली और श्याम नेपाली क्रमशः दो लोकधुन प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इन लोकधुनों का आनन्द लीजिए और हमें ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


नेपाली सारंगी वादन : लोकधुन : वादक – भरत नेपाली और श्याम नेपाली





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक की पहेली में आज हम आपको गायन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – भारतीय संगीत की इस शैली का नाम बताइए।

2 – गीत का यह अंश सुन कर राग पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 172वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 168वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘बारादरी’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- तालवाद्य – घड़ा या घटम। पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- कहरवा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के अन्तर्गत सारंगी वाद्य के लोक स्वरूप के बारे में चर्चा की। भारतीय संगीत वाद्यों पर इस लघु श्रृंखला को अब हम यहीं विराम देते हैं। भविष्य में इस प्रकार की श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत करेंगे। अगले अंक में हम आपका परिचय एक ऐसे संगीत-साधक से कराएँगे जिनका योगदान मंच प्रदर्शन से कहीं अधिक भारतीय संगीत के प्रचारक और विस्तारक के रूप में है। यह अंक ‘व्यक्तित्व’ श्रृंखला के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जाएगा। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे। 



आलेख : सुमित चक्रवर्ती
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, May 31, 2014

"हरि दिन तो बीता शाम हुई..." - जानिये गायिका राजकुमारी के इस अन्तिम गीत की दास्तान


एक गीत सौ कहानियाँ - 32
 

हरि दिन तो बीता, शाम हुई ...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 32वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'किताब' के राजकुमारी की गायी लोरी "हरि दिन तो बीता शाम हुई..." के बारे में। 


1977 की यादगार फ़िल्म 'किताब' आपने ज़रूर देखी होगी। बहुत ही सुन्दर फ़िल्म, किरदार ऐसे कि जैसे हमारी-आपकी ज़िन्दगी के किरदार हों। फ़िल्म की मूल कहानी विख्यात बांग्ला लेखक समरेश बसु की कहानी 'पथिक' थी जिसे गुलज़ार साहब ने 'किताब' के रूप में हिन्दी दर्शकों के लिए प्रस्तुत किया। बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद कार्य में भूषण बनमाली और देबब्रत सेनगुप्ता ने गुलज़ार की मदद की। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे उत्तम कुमार, विद्या सिन्हा, दीना पाठक, मास्टर राजू और मास्टर टिटो प्रमुख। फ़िल्म की हर बात अनोखी थी, और उतने ही अनोखे थे इस फ़िल्म के सभी गानें। गुलज़ार और पंचम की जोड़ी हर बार कुछ न कुछ कमाल कर जाते। पर इस फ़िल्म में तो इनकी जोड़ी ने वह कमाल किया है कि इसके जैसे गानें फिर किसी अन्य फ़िल्म में सुनाई नहीं दिये। फ़िल्म में कुल चार गीत थे - पंचम का गाया "धन्नो की आँखों में रात का सुरमा", पद्मिनी और शिवांगी की आवाज़ों में "मास्टरजी की आ गई चिट्ठी", सपन चक्रवर्ती का गाया "मेरे साथ चले ना साया" और राजकुमारी की आवाज़ में लोरी "हरि दिन तो बीता शाम हुई रात पार करा दे"। पहला और दूसरा गीत जितना मशहूर हुआ उसकी तुलना में बाकी दो गीत ज़्यादा सुनाई नहीं दिये और आज तो इन्हें दुनिया लगभग भुला ही चुकी है। इन चारों गीतों की एक ख़ास बात यह थी कि इन्हें उस दौर के लोकप्रिय गायकों से नहीं बल्कि कमचर्चित या कमसुने गायकों से गवाये गये। एक गीत तो पंचम ने ख़ुद गाया, एक गीत अपने सहयोगी सपन चक्रवर्ती से गवाया; पद्मिनी और शिवांगी को भी पंचम पहले से ही जानते थे, फ़िल्म 'यादों की बारात' से जिसमें इन दोनों ने लता मंगेशकर के साथ फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया था। 

तीन गीतों के गायक कलाकार फ़ाइनल हो गये, पर चौथे गीत की गायिका का चयन अभी बाक़ी था। पंचम और गुलज़ार, दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किससे यह गीत गवाया जाए! यह गीत एक लोरी थी जो दीना पाठक पर फ़िल्माया जाना था। इसलिए किसी कम उम्र की आवाज़ या किसी जानी-पहचानी आवाज़ से गवाना उन्हें उचित नहीं लग रहा था। जब दोनों की यह बातचीत चल रही थी तब वहाँ गुलज़ार साहब के ऐसिस्टैण्ट प्रदीप दुबे भी बैठे थे। जानते हैं ये प्रदीप दुबे कौन हैं? गायिका राजकुमारी जी के बेटे। राजकुमारी गुमनामी के अन्धेरे में चली गईं थीं। 40 के दशक के अन्त तक राजकुमारी ने पार्श्वगायन जगत में राज किया, पर लता, आशा, गीता आदि नये दौर की गायिकाओं के आने पर धीरे धीरे पिछड़ती गईं और धीरे धीरे दुनिया उन्हें भुलाती चली गई, और उनकी माली हालत भी गिरती चली गई। घर चलाने के लिए कल की मशहूर गायिका अब कोरस में नज़रे चुरा कर गातीं। 1972 की फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के बैकग्राउण्ड स्कोर की जब रेकॉर्डिंग हो रही थी, तब नौशाद साहब ने अचानक कोरस में खड़ीं राजकुमारी को पहचान लिया। वो चौंक गये। नौशाद साहब को राजकुमारी की यह अवस्था देख कर बहुत बुरा लगा। संगीतकार बनने से पहले जिस गायिका के गानें सुना करते थे, जिनकी वो इतनी इज़्ज़त करते थे, वही गायिका दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए अब उन्हीं के कोरस में गा रही है, यह सोच कर उनकी आँखें नम हो गईं। उन्होंने फ़ौरन फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के लिए एक गीत तैयार किया और राजकुमारी की एकल आवाज़ में रेकॉर्ड किया। यह गीत था "नजरिया की मारी"। लेकिन इस गीत के बाद भी किसी और संगीतकार ने उनकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। अब वापस आते हैं उनके बेटे प्रदीप दुबे पर जो गुलज़ार और पंचम के यहाँ बैठे थे। प्रदीप को देख कर गुलज़ार साहब को अचानक ख़याल आया कि क्यों न यह लोरी राजकुमारी जी से गवाया जाये। पंचम को भी आइडिया अच्छा लगा। दोनों के कहने पर प्रदीप ने पंचम और राजकुमारी की मुलाक़ात फ़िक्स कर दी। राजकुमारी उन दिनों मुंबई के किसी चाल में रहती थीं और अपनी गरीबी से जूझ रही थीं। तो उनसे मिलने पंचम ख़ुद उस चाल में गये। गुलज़ार-पंचम के बनाये गीत को गाने का ऑफ़र सुन कर राजकुमारी चौंक गईं और डर भी गईं कि क्या वो गा पायेंगी, क्या वो गीत के साथ न्याय कर पायेंगी! पंचम के समझाने पर वो मान गईं और इस तरह से रेकॉर्ड हुआ यह नायाब गीत जिसकी तुलना किसी अन्य गीत से नहीं की जा सकती। इस गीत को राजकुमारी जी का गाया अन्तिम फ़िल्मी गीत माना जाता है। पर कुछ लोगों का कहना है कि इसके बाद भी पंचम ने एक और गीत उनकी आवाज़ में रेकॉर्ड किया था, पर उसकी जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी।

पंचम और सपन चक्रवर्ती
"हरि दिन तो बीता शाम हुई" दरअसल एक बांग्ला गीत का हिन्दी संस्करण है। केवल धुन ही नहीं बल्कि गीत के बोल भी बांग्ला गीत के बोलों का ही लगभग अनुवाद है। मूल गीत एक बांग्ला लोकगीत है जिसके बोल हैं "होरि दिन तो गेलो शोन्धा होलो, पार कोरो आमारे" जिसका हिन्दी अनुवाद है "हरि, दिन तो बीता शाम हुई, मुझे पार करा दे", जिसका भाव यह है कि ज़िन्दगी तो बीत चुकी है, अब उस पार पहुँचा दे भगवान। पर 'किताब' के हिन्दी गीत में भाव को थोड़ा सा बदल कर उस पार पहुँचाने के स्थान पर रात पार कराने अर्थात दुखद या मुश्किल की घड़ियों को पार कराने की बात कही गई है। किस चतुराई से एक दार्शनिक भजन को लोरी में परिवर्तित किया है पंचम और गुलज़ार ने। वैसे कहा जाता है कि इस धुन की तरफ़ पंचम का ध्यान सपन चक्रवर्ती ने ही दिलाया था। एक और बात यह कि इस बांग्ला लोकगीत को सत्यजीत रे ने अपनी 1955 की माइलस्टोन फ़िल्म 'पौथेर पाँचाली' में चुनीबाला देवी से गवाया था। 2006 में बांग्ला फ़िल्म 'कृष्ण आमार प्राण' फ़िल्म में शिल्पि पाल ने इस भजन को गाया था। 2012 की बांग्ला फ़िल्म 'इडियट' में इस गीत के मुखड़े को लेकर नये अंदाज़ में एक गीत ज़ुबीन ने गाया था। ऐसी बात नहीं कि हिन्दी फ़िल्मों में इस धुन का इस्तेमाल केवल 'किताब' के इस गीत में ही हुआ है। राजेश रोशन एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होंने एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि कई कई बार रबीन्द्रसंगीत और अन्य बांग्ला धुनों का प्रयोग अपने गीतों में किया है। इस धुन का इस्तेमाल उन्होंने 1998 की फ़िल्म 'युगपुरुष' के गीत "चले हम दो जन सैर को चले संग चली हरियाली" में किया था जिसे कुमार सानु और रवीन्द्र साठे ने गाया था। 

रेडियो ब्रॉडकास्टर अमीन सायानी ने जब एक इंटरव्यू में राजकुमारी जी से पूछा कि इतने अच्छे गाने गाने के बाद भी फ़िल्मों में गाना क्यों छोड़ा, तो राजकुमारी जी ने जवाब दिया - "मैंने फ़िल्मों के लिए गाना कब छोड़ा, मैंने छोड़ा नहीं, मैंने कुछ छोड़ा नहीं, वैसे लोगों ने बुलाना बन्द कर दिया। अब यह मैं नहीं बता पायूंगी कि क्यों बुलाना बन्द कर दिया"। कितना कष्ट हुआ होगा उन्हें ये शब्द कहते हुए इसका अन्दाज़ा लगाना कठिन नहीं। संयोग की बात देखिये कि उनके गाये इस अन्तिम गीत के बोल कैसे उन्हीं पर लागू हुए। हरि दिन तो बीता शाम हुई, रात पार करा दे। और एक दिन सचमुच युं लगा मानो मायूसी के अन्धेरों में घिरी हुई उस लम्बी काली रात का अन्त हो गया हो। जैसे निराशा के थपेड़ों में घिरी उस कश्ती को किनारा मिल गया हो। साल 2000 में गरीबी में घिरी राजकुमारी जी सदा के लिए शान्त हो गईं, भगवान ने उनकी रात पार करा दी। बस इतनी सी थी आज की कहानी।

फिल्म - किताब : 'हरि दिन तो बीता, शाम हुई...' : गायिका - राजकुमारी : संगीत - राहुलदेव बर्मन : गीत - गुलजार


 


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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, May 28, 2014

एक दर्द भरा नगमा हिमेश मार्का

ताज़ा सुर ताल - दर्द दिलों के  (एक्सपोस)

जब से हिमेश रेशमिया संगीत निर्देशन में आये हैं, तब से हम उन्हें बहुत से मुक्तलिफ़ रूपों में देख चुके हैं, हिमेश केवल हिट गीत देने में विश्वास रखते हैं और बहुत अधिक अपने 'कम्फर्ट ज़ोन' से बाहर जाकर काम नहीं करते हैं, बावजूद इसके उनकी धुनों में एक ख़ास मिठास हमेशा से रही है (ओढ़नी , क्यों किसी को वफ़ा के बदले, तेरी मेरी प्रेम कहानी  आदि), हिमेश इन दिनों अपने निर्माताओं को डबल बोनान्जा बाँट रहे हैं, यानी कि जो उनकी अपनी कहानी पर फिल्म बनायेगा उसके लिए वो अभिनय भी करेगें और जाहिर है जब अभिनय करेगें तो संगीत में भी अपनी पूरी ताकत झोंक देंगें. कुछ ऐसा ही है उनकी ताज़ा पेशकश एक्सपोस  का हाल. इस एल्बम में भी हर मूड के गीत हैं और सब के साब हिमेश की पक्की छाप वाले. कुछ बहुत नया न देते हुए भी हिमेश ऐसे गीत बनाने में कामियाब हुए हैं जिनका हिट होना लगभग तय है. खासकर ये गीत जो हम आपको सुना रहे हैं इसमें वही चिर परिचित हिमेशिया माधुर्य भी है और शास्त्रीयता की मिठास भी. मोहम्मद इरफ़ान ने बहुत दिल से गाया है इसे (शुक्र है हिमेश ने खुद नहीं गाया ये गीत). समीर के लिखे इस गीत में, हर तबके में हर उम्र के लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाने की कुव्वत है. बस दर्द को उभरने के लिए इरफ़ान की आवाज़ में जो जबरन कम्पन पैदा किया गया है वो कुछ खटकता है....खैर आज सुनिए ये ताज़ा तरीन गीत.  

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