रविवार, 4 अगस्त 2013

वर्षा ऋतु के रंग : कजरी गीतों के संग

  
स्वरगोष्ठी – 131 में आज

कजरी गीतों पर एक चर्चा


‘घिर के आई बदरिया राम, श्याम बिन सूनी सेजरिया हमार...’



‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत प्रेमियों का मनभावन वर्षा ऋतु के परिवेश में हार्दिक स्वागत करता हूँ। बसन्त और पावस, दो ऐसी ऋतुएँ हैं, जो मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करतीं हैं। इन दिनों आप पावस ऋतु का भरपूर आनन्द ले रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के अनेक पाठको / श्रोताओं ने वर्षा ऋतु के गीत सुनवाने के लिए हमसे अनुरोध किया है। आप सब संगीत प्रेमियों की फरमाइश पर हम दो अंकों की एक लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : कजरी के संग’ प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत की प्रत्येक विधाओं में वर्षा ऋतु के गीत उपस्थित हैं। इस प्रकार के गीत मानव-मन को लुभाते हैं और संवेदनशील भी बनाते हैं। लोक संगीत के क्षेत्र में कजरी एक सशक्त विधा है। आज के इस अंक और अगले अंक के माध्यम से हम आपके साथ कजरी गीतों पर चर्चा करेंगे और कजरी के उपशास्त्रीय तथा लोक स्वरूप में गूँथे कुछ कजरी गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



भारतीय पञ्चाङ्ग के अनुसार आषाढ़ मास से लेकर आश्विन मास तक पूरे चार महीने उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल और बिहार के तीन चौथाई हिस्से में कजरी गीतों की धूम मची रहती है। पावस ऋतु ने अनादि काल से ही जनजीवन को प्रभावित किया है। ग्रीष्म ऋतु के प्रकोप से तप्त और शुष्क मिट्टी पर जब वर्षा की रिमझिम फुहारें पड़ती हैं तो मानव-मन ही नहीं पशु-पक्षी और वनस्पतियाँ भी लहलहा उठती है। मूल रूप से कजरी लोक-संगीत की विधा है, किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जब बनारस (अब वाराणसी) के संगीतकारों ने ठुमरी को एक शैली के रूप में अपनाया, उसके पहले से ही कजरी परम्परागत लोकशैली के रूप विद्यमान रही। उपशास्त्रीय संगीत के रूप में अपना लिये जाने पर कजरी, ठुमरी का एक अटूट हिस्सा बनी। इस प्रकार कजरी का मूल लोक-संगीत का स्वररोप और ठुमरी के साथ रागदारी संगीत का हिस्सा बने स्वररोप का समानान्तर विकास हुआ। अगले अंक में हमारी चर्चा का विषय कजरी का लोक-स्वरूप होगा, किन्तु आज के अंक में हम आपसे कजरी के रागदारी संगीत के कलासाधकों द्वारा अपनाए गए स्वरूप पर चर्चा करेंगे। आज की संगोष्ठी का प्रारम्भ हम विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी, श्रृंगार रस से अभिसिंचित एक कजरी से करते है। इस प्रस्तुति में आपको उपशास्त्रीय संगीत के अंग के साथ लोक संगीत का रंग भी मिलेगा।


कजरी : भींज जाऊँ मैं पिया बचाए लियो...’ : विदुषी गिरिजा देवी




मूलतः लोक-परम्परा से विकसित कजरी आज गाँव के चौपाल से लेकर प्रतिष्ठित शास्त्रीय मंचों पर सुशोभित है। कजरी-गायकी को ऊँचाई पर पहुँचाने में अनेक लोक-कवियों, साहित्यकारों और संगीतज्ञों का स्तुत्य योगदान है। कजरी गीतों की प्राचीनता पर विचार करते समय जो सबसे पहला उदाहरण हमें उपलब्ध है, वह है- तेरहवीं शताब्दी में हज़रत अमीर खुसरो रचित कजरी-‘अम्मा मोरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया...’। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की एक रचना- ‘झूला किन डारो रे अमरैया...’, आज भी गायी जाती है। कजरी को समृद्ध करने में कवियों और संगीतज्ञों योगदान रहा है। भोजपुरी के सन्त कवि लक्ष्मीसखि, रसिक किशोरी, शायर सैयद अली मुहम्मद ‘शाद’, हिन्दी के कवि अम्बिकादत्त व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेमधन’ की कजरी रचनाएँ उच्चकोटि की हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने तो ब्रज, भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरियों की रचना की है। भारतेन्दु की कजरियाँ विदुषी गिरिजा देवी आज भी गाती हैं। कवियों और शायरों के अलावा कजरी को प्रतिष्ठित करने में अनेक संगीतज्ञों की स्तुत्य भूमिका रही है। वाराणसी की संगीत परम्परा में बड़े रामदास जी का नाम पूरे आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होने भी अनेक कजरियों की रचना की थी। अब हम आपको बड़े रामदास जी द्वारा रचित एक कजरी का रसास्वादन कराते है। इस कजरी को प्रस्तुत कर रहे हैं- देश के जाने-माने गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र। दादरा ताल में निबद्ध इस कजरी के बोल है- ‘बरसन लागी बदरिया रूम-झूम के...’


कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम-झूम के...’ : पण्डित छन्नूलाल मिश्र




कजरी गीतों के सौन्दर्य से केवल गायक ही नहीं, वादक कलाकार भी प्रभावित रहे हैं। अनेक वादक कलाकार आज भी वर्षा ऋतु में अपनी रागदारी संगीत-प्रस्तुतियों का समापन कजरी धुन से करते हैं। सुषिर वाद्यों पर तो कजरी की धुन इतनी कर्णप्रिय होती है कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर तो कजरी ऐसी बजती थी, मानो कजरी की उत्पत्ति ही शहनाई के लिए हुई हो। लोक संगीत में कजरी के दो स्वरूप मिलते हैं, जिन्हें हम मीरजापुरी और बनारसी कजरी के रूप में पहचानते हैं। भारतीय संगीत जगत में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ एक ऐसे अनूठे कलासाधक रहे हैं, जिनकी शहनाई पर समूचा विश्व झूम चुका है। अब हम आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत बनारसी कजरी का रसास्वादन कराते हैं। यह मनमोहक कजरी दादरा और कहरवा ताल में बँधी है।


शहनाई वादन : दादरा और कहरवा ताल में निबद्ध कजरी धुन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ



वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभियक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित है। कजरी गीतों के आकर्षण से शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत विधाओं के कलासाधक स्वयं को मुक्त नहीं कर सके। ठुमरी और गजल गायकी में सिद्ध विदुषी बेगम अख्तर ने भी अपने कण्ठ पर अनेक कजरी गीतों को धारण कर न केवल वर्षा ऋतु के परिवेश को साकार किया बल्कि ऐसे मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं को भी सार्थक किया है। आज की इस कड़ी को विराम देने से पहले हम आपको विदुषी बेगम अख्तर की गायी एक कजरी सुनवा रहे हैं, जिसमें घुमड़ते बादलों के बीच विरहणी नायिका की वेदना की अनुभूति भी होती है।



कजरी : ‘घिर के आई बदरिया रामा, श्याम बिन सूनी सेजरिया हमार...’ : विदुषी बेगम अख्तर




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 131वीं संगीत पहेली में हम आपको बेहद लोकप्रिय कजरी गीत के अन्तरे का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक से हमारी नई श्रृंखला (सेगमेंट) आरम्भ हुई है। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अन्तरा सुन कर पहचानिए कि इसकी स्थायी (मुखड़े) की पंक्तियाँ क्या है?


2 – यह गीत किस गायिका के स्वर में प्रस्तुत किया गया है?


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 133वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 129वीं संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद विलायत खाँ द्वारा प्रस्तुत सितार वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग शंकरा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक उस्ताद विलायत खाँ। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हुई लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : कजरी गीतों के संग’ अगले अंक में भी जारी रहेगी। श्रृंखला के आगामी और समापन अंक में हम आपको कजरी गीतों के लोक स्वरूप पर चर्चा करेंगे और कुछ मोहक कजरी गीतों का रसास्वादन भी कराएंगे। आप भी हमारी आगामी कड़ियों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

शनिवार, 3 अगस्त 2013

सिने पहेली – 75 -ये युद्ध नहीं है खेल है प्यारे

सिने पहेली – 75


ये युद्ध नहीं है खेल है प्यारे !
  
सिने पहेली के 75 वें अंक में सभी प्रतियोगियों का बहुत बहुत स्वागत है. 

साथियों जिस तरह से सिने पहेली 74 में प्रतियोगियों के बीच में बहस हुई है हमें नहीं लगता कि यह एक स्वस्थ प्रतियोगिता की पहचान है. 

हमारा उद्देश्य है कि रेडिओ प्लेबैक इण्डिया आप सबको स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करती रहे. 

दारूवाला  जी आपकी बात सही है कि हर साईट को ट्रेफिक चाहिए लेकिन रेडिओ प्लेबैक इण्डिया किसी एक व्यक्ति की साईट नहीं है. हाँ शुरुआत कुछ लोगों ने जरूर करी थी लेकिन आज ये एक परिवार है और इसकी सफलता हमारे पाठकों और दर्शकों का जूनून है.  

यहाँ हर कोई अपना योगदान देने के लिए स्वतंत्र है और अगर आप पुराने पाठक / श्रोता हैं तो आप इसे बखूबी जानते होंगे. केवल एक बात कहना चाहूँगा कि रेडिओ प्लेबैक इण्डिया को   ट्रेफिक बढ़ाने के लिए  छद्म प्रतियोगी बनाकर उत्तर देने की कोई जरूरत ही नहीं है. हम संख्या में नहीं अपने पाठकों और श्रोताओं में विश्वास करते हैं.

हम तो आपसे भी गुज़ारिश करते हैं कि आप अपना पूर्ण परिचय दीजिये और हमारे साथ अपना कन्धा मिलाइए और कुछ नया करने में अपना योगदान दीजिये.

अनमोल चौहान जी  हम आपकी भावनाओं की कद्र करते हैं पर प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार हर प्रतियोगी को अपना परिचय देना जरूरी है. आप अपना पता, मोबाईल नम्बर हमें मेल कर दीजिये और हम आपसे सम्पर्क करके आपके छद्म न होने की पुष्टि कर लेंगे. 

कृपया इसे अन्यथा न लीजिये क्योंकि यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि विजेता होने की सूरत में हमारे लिए पुरस्कार राशि प्रदान करना आसान रहेगा.

अब रही सारे सवालों के उत्तर सही देने की. तो ये काम किसी एक ने नहीं बल्कि तीन प्रतिभागियों ने करा है. आप सबको हार्दिक बधाई.

अनमोल जी हम आपके परिणाम को प्रकाशित जरूर करेंगे लेकिन अंक तालिका में तब तक नहीं शामिल कर पाएंगे जब तक आपके छद्म न होने की पुष्टि नहीं हो जाती.

मेरा सभी प्रतियोगियों से निवेदन है कि आप लोग उत्तेजित नहीं होइए और अपने बड़े होने की गरिमा बनाये रखिये.

इस बार के प्रतियोगियों के अंक आप सवालों के बाद देख सकते हैं.

आज की पहेली के पाँच सवाल नीचे हैं , ध्यान से उत्तर दीजिये और पूरे अंक प्राप्त करने का मौका मत छोड़िये.

आज की पहेली के लिए आप सबको शुभकामनाएँ.

इस अंक से प्रतियोगिता में जुड़ने वाले नये खिलाड़ियों का स्वागत करते हुए हम उन्हें यह भी बताना चाहेंगे कि अभी भी कुछ देर नहीं हुई है। आज से इस प्रतियोगिता में जुड़ कर भी आप महाविजेता बन सकते हैं। यही इस प्रतियोगिता की विशेषता है। इस प्रतियोगिता के नियमों का उल्लेख नीचे किया गया है, ध्यान दीजियेगा। 

तो  आइए, आरम्भ करते हैं, आज की पहेली का सिलसिला।


आज की पहेली

सवाल-1: गोल्डन वॉयस (2 अंक)


इस आवाज को सुनकर आपको बतलाना है कि ये आवाज किसकी है. इस सवाल के पूरे 2 अंक हैं. 

हिन्ट: ये गायिका होने के साथ साथ संगीतकार, अभिनेत्री और फिल्म निर्माता भी थीं.


 

सवाल-2: पहचानिए तो सही (4 अंक)


भारत भूषण अभिनीत इस फिल्म पर आधारित हैं कुछ सवाल. 
  1. आपको पहचानना है कि ये किस गाने का दृश्य है. (2 अंक) 
  2. फिल्म के निर्देशक का नाम ( 1 अंक) 
  3. इस गाने की एक महत्वपूर्ण विशेषता को पहचानिए (1 अंक)




सवाल- 3 : गाना कौन सा? (4 अंक)

इस गाने के मुखड़े की धुन को ध्यान से सुनिए और निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिये.
  1. यह किस गाने की धुन है (2 अंक). 
  2. गायक का नाम बतलाइए (1 अंक) 
  3. इस गाने का संगीत किसने दिया है. (1 अंक).
 हिंट: इस गाने में हिन्दी के एक प्रसिद्ध मुहावरे का इस्तेमाल हुआ है.  


 

सवाल - 4: मैं कौन हूँ (4 अंक)


मैंने बतौर बाल कलाकार अपने अभिनय की शुरुआत 6 साल की उम्र में करी. 13 साल की उम्र में मुझे बतौर मुख्य कलाकार मौका मिला. मेरी माँ और पिता दोनों अलग अलग धर्म से थे और दोनों ही फ़िल्मी दुनिया से जुड़े थे. मेरी माँ एक गायिका, संगीतकार , अभिनेत्री और फिल्म निर्माता थीं. मेरी पहली फिल्म का संगीत मेरी माँ ने दिया था. मैंने राज्य सभा के सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्व करा और अपने कार्यकाल के दौरान ही मैंने यह दुनिया छोड़ दी. मेरे पुत्र ने बतौर नायक बहुत सफलता अर्जित करी. 
  1. मुझे पहचानिए (२ अंक) 
  2. मेरी पहली फिल्म के निर्देशक का नाम (२ अंक) 

सवाल - 5: बूझो तो जाने (4 अंक)

हम आपको सुनवा रहे हैं एक गाने की सिर्फ एक लाइन. 
  1. आपको गाने को पहचानना है (1 अंक), 
  2. गीतकार का नाम बताइए(1 अंक) 
  3. संगीतकार का नाम बताइए(1 अंक)
  4. इस फिल्म की अभिनेत्री का नाम ( १ अंक)





जवाब भेजने का तरीका


उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 75" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 8 अगस्त, शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली का हल
 
प्रश्न 1: वो दिन याद करो, हसरत जयपुरी , टी प्रकाश राव
प्रश्न 2: बेटी बेटे  , एल. वी. प्रसाद
प्रश्न 3: भीगा भीगा प्यार का समा , शमशाद बेगम, प्रेम धवन और अमिता
प्रश्न 4: कृष्ण चन्द्र डे , चंडीदास, प्रबोध चन्द्र डे
प्रश्न 5: डैनी डेन्जोंगपा

पिछली पहेली के विजेता

सिने पहेली – 74 के विजेताओं के नाम और उनके प्राप्तांक निम्नवत हैं।


1- पंकज मुकेश, बैंगलुरु – 19 अंक

2- प्रकाश गोविन्द, लखनऊ – 19 अंक 

3- अनमोल चौहान , (जगह अज्ञात) - 19 अंक 

4- 
क्षिती तिवारी – 15 अंक

5- विजय कुमार व्यास, बीकानेर - 15 अंक

6 - इन्दू  पुरी, चित्तोडगढ - 15 अंक 

7- चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ  – 11 अंक





आठवें  सेगमेण्ट का  स्कोरकार्ड


नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।


कैसे बना जाए ‘सिने पहेली महाविजेता'

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। सातवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...

4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम।


'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार।
  


प्रस्तुति : अमित तिवारी 


शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

गैंगस्टरों की खूनी दुनिया में प्रीतम के संगीत का माधुर्य

कुछ गीत हमेशा ही जेहन में ताज़ा रहते हैं, प्रीतम का स्वरबद्ध पी लूँ  और तुम जो आये  गीत भी इसी श्रेणी में आते हैं. वंस अपोन अ टाइम इन मुम्बई  की सफलता में इन गीतों की कामियाबी का बहुत बड़ा हाथ रहा. मुम्बई अंडरवर्ड के काले दौर को गुजरे समय की एक दास्ताँ बता कर पेश किया गया था इस फिल्म में, अब इसके दूसरे संस्करण में इसी कहानी को आगे बढ़ाया गया है. जहाँ तक गीत संगीत की बात है यहाँ भी प्रीतम दा ही हैं अपने लाजवाब फॉर्म में और उन्हें साथ मिला है निर्देशक गीतकार रजत अरोड़ा का, रजत डर्टी पिक्चर के हिट गीत लिखकर अपनी एक खास पहचान बना चुके हैं. आईये देखें क्या इस दूसरे संस्करण का संगीत भी श्रोताओं की उम्मीद पर खरा उतर पाया है या नहीं. 

अभी हाल ही में मुर्रब्बा, रंगरेज  और मेरा यार  जैसे शानदार गीत गाकर जावेद बशीर इन दिनों छाये हुए हैं, उन्हीं की करारी आवाज़ जो तीर की तरफ सीधे दिल को भेद जाती है, में है पहला गीत ये तुने क्या किया , एक खूबसूरत कव्वाली. शुरू के शेरों से ही समां सा बांध जाता है. रजत के शब्द और प्रीतम की धुन दोनों ही उत्तम है. कोरस का इस्तेमाल भी खूब जमता है. 

अगला गीत भी एक कव्वाली ही है, पर ये ओरिजिनल नहीं है. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की हिट धुन तैयब अली  को एक बार फिर जमाया गया है एक नए सिचुएशन पर. इतने हिट गीत का ये संस्करण अपने मूल से कम से कम १० कदम पीछे होगा. रजत के शब्द यहाँ बेअसर से लगते हैं. जावेद अली की जोशीली आवाज़ को छोड़ कर गीत में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे ८० के दशक के उस बेहद सफल गीत के साथ जोड़ा जाए, अगर मूल गीत को ही थोडा और आकर्षक बना कर रखा जाता तो शायद बढ़िया रहता. 

एक बार फिर ८० का साउंड लौटता है सुनिधि की आवाज़ में, पहले संस्करण में पर्दा  गीत में जो जोश उनकी आवाज़ ने भरा था वही तू ही ख्वाहिश  में भी झलकता है. लंबे समय तक इस गीत का जादू बरकरार रहेगा ये तय है. शब्द सामान्य हैं पर प्रीतम ने पंचम सरीखा क्लब संगीत रचकर समां सजाया है पर गीत का असली आकर्षण तो सुनिधि क्रिस्टल क्लीयर आवाज़ ही है. पूरी उम्मीद है उन्हें इस गीत के इस साल का फिल्म फेयर नामांकन मिले. 

एल्बम का अंतिम गीत फिर एक बार सूफियाना रंग में रंगा है. गीत कहीं कहीं इश्क सूफियाना  की झलक देता है. जावेद अली की आवाज़ प्रमुख है जिसे साहिर अली के फ्लेवर्ड स्वरों का अच्छा साथ मिला है. चुगलियाँ  गीत में सबसे आकर्षक चुगलियाँ  शब्द का उच्चारण ही है. कुछ बहुत अलग न देकर भी ये रोमांटिक गीत सुरीला लगता है. 

वंस अपोन ए टाइम दुबारा  का संगीत औसत से बढ़कर है. तैयब अली  को छोड़ दिया जाए तो अन्य तीनों गीत काफी अच्छे बन पड़े हैं. हमारी टीम ने दिए हैं इस एल्बम को ३.८ की रेटिंग. आप बताएं अपनी राय....  

सबसे  बहतरीन गीत - ये तुने क्या किया , तू ही ख्वाहिश 

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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