शुक्रवार, 3 मई 2013

भारतीय सिनेमा के सौ साल : विशेषांक


एक शताब्दी का हुआ भारतीय सिनेमा

‘राजा हरिश्चन्द्र’ से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा का इतिहास



आज से ठीक एक शताब्दी पहले, आज के ही दिन अर्थात 3 मई, 1913 को विदेशी उपकरणों से बनी किन्तु भारतीय चिन्तन और संस्कृति के अनुकूल पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का प्रदर्शन हुआ था। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ढुंडिराज गोविन्द फालके, उपाख्य दादा साहेब फालके द्वारा निर्मित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ को भारत के प्रथम कथा-चलचित्र का सम्मान प्राप्त है। इस चलचित्र का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव, मुम्बई स्थित तत्कालीन कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। इस ऐतिहासिक अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से सभी पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। आज के इस विशेष अंक में हम आपके लिए लेकर आए हैं, प्रथम भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का एक ऐतिहासिक और दुर्लभ वीडियो अंश। 

दादा साहेब फालके
पिछली एक शताब्दी में भारतीय जनजीवन पर सिनेमा का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है। सामान्य जीवन के हर क्षेत्र को सिनेमा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। यहाँ तक कि सिनेमा ने हमारे खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाजों, पहनावे आदि पर भी गहरा प्रभाव डाला है। परम्परागत भारतीय कला-विधाएँ प्रत्येक युग में अभिव्यक्ति की सशक्त माध्यम रही हैं। इन पारम्परिक कला-विधाओं में नए-नए प्रयोग होते रहे और इनका परिमार्जन भी होता रहा। कुछ विधाएँ कला और तकनीक के साथ संयुक्त होकर विकसित होती है। ऐसी ही एक कला-विधा है- सिनेमा, जिसमें नाट्य, संगीत और अन्यान्य ललित कलाओं के साथ-साथ यान्त्रिक कौशल का भी योगदान होता है। यह सुखद आश्चर्य का विषय है कि भारत में सिनेमा का विकास, विश्व-सिनेमा के लगभग साथ-साथ हुआ। बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में जब परदे पर चलती-फिरती तस्वीरों को देख पाना सम्भव हुआ तब भारत में भी इस नई विधा में प्रयोग आरम्भ हुआ। यन्त्र विदेशी, किन्तु कथानक, वेषभूषा और चरित्र विशुद्ध भारतीय, जनमानस के सुपरिचित थे। आवाज़ रहित सिनेमा के बावजूद दर्शक, सदियों से जनमानस में बसे पौराणिक चरित्रों को परदे पर देखते ही पहचान लेते थे।

कार्यरत फालके 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में ढुंडिराज गोविन्द फालके, उपाख्य दादा साहेब फालके द्वारा निर्मित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ को भारत के प्रथम कथा-चलचित्र का सम्मान प्राप्त है। इस चलचित्र का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव, मुम्बई स्थित तत्कालीन कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। इस प्रदर्शन तिथि के अनुसार आज के दिन अर्थात 3 मई, 2013 भारतीय सिनेमा का शताब्दी वर्ष पूर्ण हो चुका है। ‘राजा हरिश्चन्द्र’ भारत में और भारतीयों द्वारा निर्मित प्रथम मूक, पूर्णकालिक कथा-फिल्म थी। इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक आदि सब कुछ दादा साहब फालके ही थे। अयोध्या के राजा सत्यवादी हरिश्चन्द्र की लोकप्रिय पौराणिक कथा पर आधारित तत्कालीन गुजराती नाटककार रणछोड़ भाई उदयराम का नाटक उन दिनों रंगमंच पर बेहद सफल हुआ था। फालके ने इसी नाटक को अपनी फिल्म की पटकथा के रूप में विकसित किया था। चालीस मिनट की इस फिल्म में राजा हरिश्चन्द्र की भूमिका दत्तात्रेय दामोदर दुबके, महारानी तारामती की भूमिका पुरुष अभिनेता सालुके और विश्वामित्र की भूमिका जी.वी. साने ने निभाई थी। उन दिनों नाटकों में नारी चरित्रों का निर्वहन पुरुष कलाकार ही किया करते थे। जब नाटकों में महिला कलाकारों का पदार्पण सामाजिक दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता था, तो भला फिल्मों के लिए महिला कलाकार कहाँ से उपलब्ध होतीं।

फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के चरित्रों की वेषभूषा और भंगिमाओं पर तत्कालीन विश्वविख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा द्वारा सृजित पौराणिक चरित्रों के चित्रांकन का गहरा प्रभाव था। 40 मिनट की इस फिल्म की कुल लम्बाई लगभग 3700 फीट थी। फिल्म तैयार हो जाने के बाद 21अप्रैल, 1913 को मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) के ग्राण्टरोड स्थित ओलम्पिया थियेटर में इसका प्रीमियर शो हुआ। फिल्म का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव स्थित कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। परदे पर चलती-फिरती तस्वीरों को देखना दर्शकों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के इस प्रदर्शन से भारत में फिल्म निर्माण के द्वार खुल गए। आज इस ऐतिहासिक अवसर पर हम आपके लिए ‘यू-ट्यूब’ के सौजन्य से फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का एक वीडियो प्रस्तुत कर रहे हैं। फिल्म के आरम्भिक भाग में दादा साहब फालके के व्यक्तित्व, तत्कालीन फिल्म निर्माण की विधि और कुछ मूक फिल्मों के दृश्य भी शामिल किए गए हैं।


वीडियो : प्रथम भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के कुछ सजीव दृश्य 



Raja Harishchandra is a 1913 silent Indian film directed and produced by Dadasaheb Phalke, and is the first full-length Indian feature film


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के अन्तर्गत आज हमने आपके लिए पहली भारतीय फिल्म 'राजा हरिश्चन्द्र' के साथ-साथ मूक युग की कुछ अन्य गतिविधियों के दृश्य प्रस्तुत किये। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। अपनी प्रतिक्रिया, समालोचना और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

गुरुवार, 2 मई 2013

‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’ तीसरा भाग


पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की श्रद्धांजलि

‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना...' 



फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की गायिकाओं में शमशाद बेगम का 23 अप्रैल को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खनकती आवाज़ की धनी इस गायिका ने 1941 की फिल्म खजांची से हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायन क्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई थी। आत्मप्रचार से कोसों दूर रहने वाली इस गायिका को श्रद्धांजलि-स्वरूप हम अपने अभिलेखागार से अगस्त 2011 में अपने साथी सुजॉय चटर्जी द्वारा प्रस्तुत दस कड़ियों की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…' के सम्पादित अंश का तीसरा भाग प्रस्तुत कर रहे हैं। 


‘ओल्ड इज़ गोल्ड' में शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ इन दिनों गूँज रही है, उन्हीं को समर्पित लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे...' में। आज हम जिस संगीतकार की रचना सुनवाने जा रहे हैं, उन्होंने भी शमशाद बेगम को एक से एक लाजवाब गीत दिए और उनकी आवाज़ को 'टेम्पल बेल वॉयस' की उपाधि देने वाले ये संगीतकार थे, ओ.पी. नैयर। नैयर साहब के अनुसार दो गायिकाएँ हैं जिनकी आवाज़ ओरिजिनल हैं, वे हैं गीता दत्त और शमशाद बेगम। दोस्तों, विविध भारती पर नैयर साहब का एक लम्बा साक्षात्कार प्रसारित हुआ था, ‘दास्तान-ए-नैयर’ शीर्षक से। उस साक्षात्कार में कई बार शमशाद जी का ज़िक्र छिड़ा था। आज और अगली कड़ी में हम उसी साक्षात्कार के चुने हुए अंशों को पेश करेंगे जिनमें नैयर साहब शमशाद जी के बारे में बताते हैं। जब उनसे पूछा गया कि वो अपना पहला पॉपुलर गीत किसे मानते हैं, तो उनका जवाब था- “फिल्म ‘आरपार’ का गाना ‘कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र...’, जो शमशाद बेगम का पहला सुपरहिट गाना था:। शमशाद बेगम के गाये गीतों में नैयर साहब डबल बेस का ख़ूब इस्तेमाल किया करते थे, इस बारे में भी जानिये उन्हीं से- “मैं जब, जैसे चाहता था, एक दिन मुझे एक रेकॉर्डिस्ट नें कम्प्लिमेण्ट दिया कि नैयर साहब, आप रेकॉर्डिंग् करवाना जानते हो, बाकी किसी को ये पता नहीं। आपने सुना “जरा हट के ज़रा बच के, ये है बॉम्बे मेरी जान...” और उसमें, शमशाद जी के गानों में “लेके पहला पहला प्यार...”, “कभी आर कभी पार...”, “बूझ मेरा क्या नाम रे...” आदि। इन सभी गीतों में डबल बेस का खेल है"।

नैयर साहब के इंटरव्यूज़ में एक कॉमन सवाल जो होता था, वह था लता से न गवाने का कारण। ‘दास्तान-ए-नैया’ में जब यह बात चली कि मदन मोहन के कम्पोज़िशन्स को कामयाब बनाने के लिए लता जी का बहुत बड़ा हाथ है, उस पर नैयर साहब नें कहा, "लता मंगेशकर का बहुत बड़ा हाथ था, और हम हैं वो कम्पोज़र हैं जिसने लता मंगेशकर की आवाज़ पसन्द ही नहीं की। वो गायिका नम्बर एक हैं, पसन्द क्यों नहीं की, क्योंकि हमारे संगीत को सूट नहीं करती। 'थिन थ्रेड लाइक वॉयस' हैं वो। मुझे चाहिये थी सेन्सुअस, फ़ुल ऑफ़ ब्रेथ, जैसे गीता दत्त, जैसे शमशाद बेगम। टेम्पल बेल्स की तरह वॉयस है उसकी। शमशाद जी की आवाज़ इतनी ऑरिजिनल है कि बस कमाल है।"

तो आइए दोस्तों, नैयर साहब और शमशाद जी के सुरीले संगम से उत्पन्न तमाम गीतों में से आज हम एक गीत सुनते हैं। 1956 की फ़िल्म सी.आई.डी. का यह गीत है- “कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...”। मजरूह सुल्तानपुरी के बोल हैं और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया यह सदाबहार नग़मा। 


फिल्म सी.आई.डी.: “कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...” : संगीत – ओ.पी. नैयर



‘रात रंगीली गाये रे, मोसे रहा न जाए रे, मैं क्या करूँ...'


‘ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक और नए अंक में आप सभी का मैं, सुजॉय चटर्जी, स्वागत करता हूँ। इन दिनों इस स्तम्भ में जारी है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम के गाये गीतों से सुसज्जित लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे...'। पिछले अंक में हमने शमशाद जी का गाया, ओ.पी. नैयर का स्वरबद्ध किया, फिल्म सी.आई.डी. एक गीत सुनवाया था। नैयर साहब के साथ शमशाद जी की पारी इतनी सफल रही कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए आज के अंक में भी नैयर-शमशाद जोड़ी की धूम रहेगी। ‘दास्तान-ए-नैयर' सीरीज में जब नैयर साहब से पूछा गया-

कमल शर्मा : शमशाद जी से आप किस तरह मिले?

ओ.पी. नैयर : शमशाद जी को मैं लाहौर से ही जानता हूँ, रेडियो से। वो मुझसे 4-5 साल बड़ी हैं। मैं तो बच्चा हूँ उनके आगे। उनको बहुत पहले से सुना, पेशावर में, पश्तो गाने गाया करती थीं। फिर रेडियो लाहौर में आ गईं। बड़ी ख़ुलूस, बहुत प्यार करने वाली ईमोशनल औरत है।

कमल शर्मा : क्या खनकती आवाज़ है। ओ.पी. नैयर : टेम्पल वायस साहब, उनका नाम ही टेम्पल वॉयस है।

यूनुस खान : नैयर साहब, आपके कई गाने शमशाद बेगम नें गाये हैं, और आपने कहा है कि शमशाद बेगम आपको ख़ास हिन्दुस्तानी धरती से जुड़ा स्वर लगता है।

ओ.पी. नैयर : उसकी आवाज़ का नाम है टेम्पल बेल, जब मन्दिर में घंटियाँ बजती हैं, गिरजाघर में घंटे बजते हैं, इस तरह की खनक है उनकी आवाज़ में, जो किसी फ़ीमेल आर्टिस्ट में नहीं है और न कभी होगी।

यूनुस खान : आपके कम्पोज़ किये और शमशाद बेगम के गाये हुए जो आपके गीत हैं, उनके बारे में हमको बताइए, कि शमशाद बेगम की क्या रेंज थी?

ओ.पी. नैयर : उनकी रेंज कम नहीं थी। ऑरिजिनल वॉयसेस जो हैं, वो शमशाद और गीता ही हैं। आशा की कई क़िस्म की आवाज़ें आपको आज भी मिलेंगी, लता जी की आवाज़ें आपको आज भी मिलेंगी, लेकिन गीता और शमशाद की आवाज़ कहीं नहीं मिलेगी। यह हक़ीक़त है। देखिये पहले तो मैं गीता जी, शमशाद जी, इनसे काफ़ी मैं गानें लेता रहा, और बाद में आशाबाई आ गईं हमारी ज़िन्दगी में, तो वो हमसे भी मोहब्बत करने लगीं और हमारे संगीत से भी।

और इस तरह से दोस्तों, आशा भोसले के आ जाने के बाद गीता दत्त और शमशाद बेगम, दोनों के लिए नैयर साहब ने अपने दरवाज़े बन्द कर दिए। लेकिन तब तक ये दोनों गायिका उनके लिए इतने गानें गा चुकी थी कि जिनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है। उसी लम्बी फ़ेहरिस्त से आज प्रस्तुत है 1956 की फिल्म 'नया अंदाज़' से ‘रात रंगीली गाये रे, मोसे रहा न जाए रे, मैं क्या करूँ...’, जिसे मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया था। जाँनिसार अख़्तर साहब का लिखा हुआ गीत है, और खनकती आवाज़ शमशाद बेगम की। मीना कुमारी, जो बाद में ट्रैजेडी क्वीन के रूप में जानी गईं, इस फ़िल्म में उनका किरदार एक सामान्य लड़की का था। आइए आपको सुनवाते हैं, यह गीत और इसी गीत के साथ इस विशेष श्रद्धांजलि श्रृंखला को यहीं विराम देने की हमे अनुमति दीजिए।


फिल्म नया अंदाज़ : ‘रात रंगीली गाये रे, मोसे रहा न जाए रे, मैं क्या करूँ...’ : संगीत – ओ.पी. नैयर



आपको हमारा यह विशेष श्रद्धांजलि अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिए। पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को श्रद्धांजलि अर्पित करती इस श्रृंखला के बारे में हमें आपके सुझावों और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं। 


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

बुधवार, 1 मई 2013

शमशाद बेगम को गीतों सजी श्रद्धान्जली

प्लेबैक  इंडिया साप्ताहिक ब्रोडकास्ट
शमशाद बेगम के गाये राग आधारित फ़िल्मी गीत 

स्क्रिप्ट  - कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति - संज्ञा टंडन

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