रविवार, 24 मार्च 2013

विविध संगीत शैलियों में राग-रस-रंग से परिपूर्ण होली



स्वरगोष्ठी – 113 में आज 
होली अंक
‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : संगीत की विविध शैलियों में होली


भारतीय पर्वों में होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें संगीत-नृत्य की प्रमुख भूमिका होती है। जनसामान्य अपने उल्लास की अभिव्यक्ति के लिए मुख्य रूप से देशज संगीत का सहारा लेता है। इस अवसर पर विविध संगीत शैलियों के माध्यम से भी होली की उमंग को प्रस्तुत करने की परम्परा है। इन सभी भारतीय संगीत शैलियों में होली की रचनाएँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं। आज के अंक में हम आपके लिए कुछ संगीत शैलियों में रंगोत्सव के कुछ चुने हुए गीतों पर चर्चा करेंगे। 


न्द्रधनुषी रंगों में भींगे तन-मन लिये ‘स्वरगोष्ठी’ के अपने समस्त पाठकों-श्रोताओं का, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः अबीर-गुलाल के साथ स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। रंगोत्सव के उल्लासपूर्ण परिवेश में आज हम आपसे ध्रुवपद संगीत शैली के अभिन्न अंग ‘धमार’ की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही खयाल शैली के अन्तर्गत राग काफी की ठुमरी शैली के अन्तर्गत होरी की और होली के रस-रंगों से भीगी फिल्मी ठुमरी पर भी चर्चा करेंगे।

भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली के अन्तर्गत धमार गायकी तो पूरी तरह रंगों के पर्व होली पर ही केन्द्रित रहती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला 14 मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली का वर्णन मिलता है। कुछ धमार रचनाओं में फाल्गुनी परिवेश का चित्रण भी होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको धमार गायकी के माध्यम से रंगोत्सव का एक अलग रंग दिखाने का प्रयास करेंगे। ध्रुवपद-धमार गायकी के एक विख्यात युगल गायक हैं- गुंडेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा), जिन्हें देश-विदेश में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से ‘स्वरगोष्ठी’ के होली अंक के लिए हमने एक धमार अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध का मान रखते हुए रमाकान्त गुंडेचा ने हमें तत्काल राग केदार का यह मनमोहक धमार, आपको सुनवाने के लिए उपलब्ध कराया। गुंडेचा बन्धु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, राग केदार का यह धमार पस्तुत है, जिसके बोल हैं- 'चोरी चोरी मारत हो कुमकुम, सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...'। 

धमार- राग केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : स्वर – गुंडेचा बन्धु 


हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जाती हैं। आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। ग्वालियर परम्परा की गायकी में दक्ष, युवा गायिका विदुषी मीता पण्डित ने राग काफी में एक होरी रचना का बड़ा ही मनमोहक गायन प्रस्तुत किया है। इस रचना में राम और सीता के होली खेलने का प्रसंग है। आम तौर पर विभिन्न संगीत शैलियों में राधा-कृष्ण की होली का उल्लेख मिलता है, किन्तु इस प्रस्तुति में राम-सीता की होली का प्रसंग है। विदुषी मीता पण्डित के स्वरों में सुनिए, राग काफी की यह होरी।

राग काफी होरी : ‘राम-सिया फाग मचावत...’ : विदुषी मीता पण्डित 


राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। उपशास्त्रीय संगीत में होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें ब्रज की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी-

राग मिश्र काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : विदुषी गिरिजा देवी


यूँतो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उप-शास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। आज की इस सतरंगी गोष्ठी का समापन हम एक फिल्मी ठुमरी गीत से करेंगे। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म, ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग में कई गीत शामिल थे। इन्हीं में से एक ठुमरी गीत में होली के परिवेश को चित्रित करता एक अत्यन्त मोहक गीत भी था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। गायिका आशा भोसले के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी गीत सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस प्रकार निखरते है? 


राग पीलू : फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : आशा भोसले



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 113वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग-संगीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग पर आधारित है?

2 – गायक की आवाज़ को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 115वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 111वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से उस्ताद अमीर खाँ के गायन और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के शहनाईवादन की जुगलबन्दी से युक्त रागमाला गीत का आरम्भिक भाग सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भटियार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- शहनाई। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की इस वर्ष की समय-सारिणी के अनुसार माह के पाँचवें रविवार की ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक हमारे किसी अतिथि लेखक द्वारा प्रस्तुत किया जाना निश्चित किया गया था। अगला रविवार मार्च माह का पाँचवाँ रविवार है। इस अंक को प्रस्तुत करने के लिए हमने वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र से अनुरोध किया था, जिसे उन्होने स्वीकार कर लिया है। अगले अंक में मिश्र जी एक ही स्वर से निर्मित विविध रागों पर चर्चा करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


शनिवार, 23 मार्च 2013

स्वाधीनता संग्राम और फ़िल्मी गीत (भाग-3)



विशेष अंक : भाग 3


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में फिल्म संगीत की भूमिका 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, इन दिनों हर शनिवार को आप हमारी विशेष श्रृंखला 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' पढ़ रहे हैं। पिछले सप्ताह हमने इस विशेष श्रृंखला का दूसरा भाग प्रस्तुत किया था। आज प्रस्तुत है, इस श्रृंखला का तीसरा भाग।


गतांक से आगे...

1943 में ही नितिन बोस निर्देशित फ़िल्म ‘काशीनाथ’ में पंडित भूषण का लिखा, पंकज मल्लिक का स्वरबद्ध किया और असित बरन का गाया एक देशभक्ति गीत था “हम चले वतन की ओर, खेंच रहा है कोई हमको”। सन्‍1944 में मुमताज़ शान्ति, मोतीलाल, शेख मुख्तार, कन्हैयालाल अभिनीत ‘रणजीत मूवीटोन’ की फ़िल्म ‘पगली दुनिया’ में रामानन्द का लिखा और बुलो सी. रानी का स्वरबद्ध किया भोला का गाया एक देश भक्ति गीत था “सोए हुए भारत के मुकद्दर को जगा दे”। यह बुलो सी. रानी की पहली फ़िल्म थी बतौर संगीतकार। पहली फ़िल्म की बात करें तो संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम की भी इसी वर्ष पहली फ़िल्म आई ‘चाँद’ जिसमें गीत लिखे क़मर जलालाबादी ने। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत मंजू की आवाज़ में था, जिसके बोल थे “दो दिलों को ये दुनिया मिलने ही नहीं देती”। पर मंजू, दुर्रानी और साथियों का गाया फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत “वतन से चला है वतन का सिपाही” भी फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण गीत था। भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिस तरह पुरुषों ने अपना बलिदान दिया, वैसे ही महिलाएँ भी पीछे नहीं रहीं। किसी ने अपने गहने दिए तो किसी ने अपना बेटा, किसी ने अपना पति दिया तो बहुत सी महिलाएँ ऐसी भी थीं जो ख़ुद ही लड़ाई के मैदान में उतरीं। ऐसे में महिलाओं को प्रोत्साहित करने हेतु ‘फ़िल्मिस्तान’ की 1944 की फ़िल्म ‘चल चल रे नौजवान’ में रफ़ीक ग़ज़नवी का गाया एक देशभक्ति गीत आया - “आया तूफ़ान आया तूफ़ान, जाग भारत की नारी...”।

1944 की एक और उल्लेखनीय फ़िल्म रही ‘पहले आप’। इस फ़िल्म का महत्व इस बात के लिए बढ़ जाता है कि इसमें मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला फ़िल्मी गीत मौजूद है। फ़िल्म के संगीतकार नौशाद अली के शब्दों में – “जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आए, तब वर्ल्ड वार ख़त्म हुआ चाहता था। मुझे साल याद नहीं। उस वक़्त फ़िल्म प्रोड्यूसर्स को कम से कम एक वार-प्रोपागण्डा फ़िल्म ज़रूर बनानी पड़ती थी। रफ़ी साहब लखनऊ से मेरे पास मेरे वालिद साहब का एक सिफ़ारिशी ख़त लेकर आए। छोटा सा तम्बूरा हाथ में लिए खड़े थे मेरे सामने। मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने संगीत सीखा है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ से सीखा है, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के छोटे भाई थे। मैंने उनको कहा कि इस वक़्त मेरे पास कोई गीत नहीं है जो मैं उनसे गवा सकता हूँ, पर एक कोरस ज़रूर है जिसमें अगर वो चाहें तो कुछ लाइनें गा सकते हैं। और वह गाना था “हिन्दुस्तां के हम हैं हिन्दुस्तां हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा”। रफ़ी साहब ने दो लाइने गायीं जिसके लिए उन्हें 10 रुपये दिए गए। शाम, दुर्रानी और कुछ अन्य गायकों ने भी कुछ कुछ लाइनें गायीं।” और इस तरह से मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत बाहर आया। पर रेकॉर्ड पर इस गीत को “समूह गीत” लिखा गया है। यह गीत न केवल रफ़ी साहब के करियर का एक महत्वपूर्ण गीत बना, बल्कि इसके गीतकार डी. एन. मधोक के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण था क्योंकि इस गीत में उनके धर्मनिरपेक्षता के शब्दों के प्रयोग के लिए उन्हें “महाकवि” के शीर्षक से सम्मानित किया गया था। ब्रिटिश राज ने इस गीत का मार्च-पास्ट गीत के रूप में विश्वयुद्ध में इस्तमाल किया। यह गीत न तो स्वाधीनता संग्राम के लिए लिखा गया था और न ही ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़, पर साम्प्रदायिक एकता का पाठ ज़रूर इस गीत ने पढ़ाया। एक ऐसा ही साम्प्रदायिक सदभाव सिखाता गीत इसी वर्ष आया ‘कारवाँ पिक्चर्स, बम्बई’ की फ़िल्म ‘भाई’ में। गीतकार ख़ान शातिर ग़ज़नवी का लिखा और मास्टर ग़ुलाम हैदर का स्वरबद्ध किया यह गीत था “हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, आपस में है भाई-भाई”। ‘लक्ष्मी प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘मिस देवी’ में अशोक घोष स्वरबद्ध सुरेन्द्र का गाया एक देशभक्ति गीत था “जागो जागो नव जवान, भारत माता की सन्तान” जिसने नौजवानो को देश पर मर-मिटने के लिए उत्साहित किया।

1945 में ‘इन्द्रपुरी प्रोडक्शन्स, बम्बई’ की एक देशभक्ति फ़िल्म आई थी ‘स्वर्ग से सुंदर देश हमारा’ (अंग्रेज़ी में ‘Call of the Motherland’ के शीर्षक से)। देबकी बोस निर्देशित इस फ़िल्म जो देश भक्ति गीत था उसे फ़िल्म में तीन भागों में विभाजित किया गया था। बोल थे “देश हमारा, सुंदर देश, हमारा, स्वर्ग से सुंदर देश हमारा”। इसी वर्ष की फ़िल्म ‘ग़ुलामी’ में एस. के. पाल का संगीत था। इसमें रेणुका देवी और मसूद परवेज़ ने अभिनय के साथ साथ अपने गीत स्वयं ही गाए। जोश मलीहाबादी का लिखा फ़िल्म का एकमात्र गीत एक देशभक्ति गीत था “ऐ वतन, मेरे वतन, तुझपे मेरी जाँ निसार”, जिसे रेणुका और मसूद ने ही गाए। जोश मलीहाबादी 1925 में हैदराबाद के ओसमानिया यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे। पर वहाँ के निज़ाम के विरुद्ध नज़्म लिखने की वजह से उन्हें हैदराबाद से निकाल दिया गया। उसके बाद उन्होंने उर्दू पत्रिका ‘कलीम’ को शुरू किया जिसमें उन्होंने बिल्कुल खुले तरीके से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाया तथा भारत की स्वाधीनता के पक्ष में कड़े विचार व्यक्त किये। उनकी कलम में वह जोश था कि जल्दी ही लोग उन्हें ‘शायर-ए-इनक़िलाब’ कहने लगे। आगे चलकर जोश मलीहाबादी अपनी लेखनी के माध्यम से स्वाधीनता संग्राम में और ज़ोर-शोर से जुट गये और उस समय के कई बड़े राज नेताओं के निकट सम्पर्क में आये। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरु मुख्य रूप से शामिल थे। ब्रिटिश राज के समाप्त होने के बाद 1947 में जोश ‘आज-कल’ नामक प्रकाशन के सम्पादक बने। इस तरह से जोश मलीहाबादी का लिखा फ़िल्म ‘स्वर्ग से सुंदर देश हमारा’ का शीर्षक गीत फ़िल्म जगत और स्वाधीनता संग्राम, दोनों के लिए बहुत महत्व रखता है। सन् 1945 की कुछ और प्रविष्टियों में ‘भावनानी प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘बीसवीं सदी’ का ज़िक्र आना चाहिए जिसमें पन्नालाल घोष का संगीत था। कहा जाता है कि इस फ़िल्म के संगीत का अधिकांश कार्य अनिल बिस्वास ने ही किया था। फ़िल्म के दो देशभक्ति गीत थे “भारत की सन्तान, हम हैं भारत की सन्तान” और “बीसवीं सदी, बीसवीं सदी, आई है इनक्लाब लिए”। इन गीतों के गायकों की जानकारी नहीं मिल पायी है। पंडित गोबिन्दराम के संगीत में ‘अत्रे पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘परिन्दे’ में ज़ोहराबाई की आवाज़ में देशभक्ति गीत था “डूबते भारत को बचाओ मेरे करतार, तूफ़ान में कश्ती है” जिसे राम मूर्ति चतुर्वेदी ने लिखा था।

‘इण्डियन पीपल थिएटर ऐसोसिएशन’ (IPTA) का गठन 1943-44 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान हुआ था। इप्टा का उद्देश्य था नामचीन कलाकारों के माध्यम से लोगों में जागरूकता लाना, उनके सामाजिक दायित्वों को याद दिलाना, और राष्ट्रीय एकता के महत्व को समझाना। ख्वाजा अहमद अब्बास (के.ए.अब्बास के नाम से प्रसिद्ध), डॉ. भाभा, अनिल डे’सिल्वा, अली सरदार जाफ़री और दादा शरमालकर द्वारा गठित इप्टा ने बहुत जल्दी ही एक राष्ट्रीय आन्दोलन का दर्जा हासिल कर लिया। भारतीय थिएटर की प्रचलित शैलियों से आगे निकलकर इप्टा ने इस क्षेत्र में नई क्रान्ति ला दी और अगले छह दशकों में इसमें कई बड़े नाम जुड़े जिनमें शामिल हैं पंडित रविशंकर, कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, बलराज साहनी, शैलेन्द्र, प्रेम धवन और भी न जाने कितने। थिएटर के अलावा इप्टा ने कई फ़िल्मों का भी निर्माण किया। 1946 में इप्टा ने बनाई ‘धरती के लाल’ जिसमें इप्टा के कलाकारों ने सारा काम किया। के. ए. अब्बास निर्देशित इस फ़िल्म में शम्भु मित्र, ऊषा दत्त, बलराज साहनी जैसे कलाकारों ने अभिनय का पक्ष सम्भाला तो अली सरदार जाफ़री, प्रेम धवन, नैमीचन्द जैन और वामिक ने गीत लिखे। संगीत था रविशंकर का। कहा जाता है कि बिमल राय की इतिहास रचने वाली फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ इसी फ़िल्म की कहानी पर आधारित थी। बतौर गीतकार प्रेम धवन और अली सरदार जाफ़री की यह पहली फ़िल्म थी। प्रेम धवन ने इप्टा में रहते कई ग़ैर फ़िल्मी गीत भी लिखे थे जिनमें एक गीत “अरे भागो लंदन जाओ” बहुत मशहूर हुआ था। ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ लिखा यह गीत कुछ यूं था – “अरे अब भागो, लंदन जाओ, काहे सौ सौ मकर बनाओ, अरे तुमरी नीयत खोटी, तुमरा हर वादा है बोदा, और लड़ने मरने की बातों में ज़ालिम कैसा सौदा, अरे ख़ून का बदला ख़ून है, सुन लो आज़ादी का भाव, अरे अब भागो लंदन जाओ। अरे कैसे भूलें जलियांवाला बाग़ को कैसे भूलें, अरे कैसे भूलें ऐसे गहरे दाग़ को कैसे भूलें, एक नहीं हमरे सीने पे तो लाखों हैं घाव, अरे अब भागो लंदन जाओ। अरे बरसों चुपके चुपके तुमने जेब हमारी काटी, जाग उठे घर के रखवाले अपनी ख़ैर मनाओ, अरे अब भागो लंदन जाओ। और ये भाड़े के टट्टू राजे ये माटी के माधव, अब इनके भी दिन बीते अब इनके भी बिस्तर बांधो, अरे साहिब अपने संग अपने कुत्ते भी ले जाओ, अरे अब भागो लंदन जाओ।” यह गीत लोगों में बहुत लोकप्रिय हो गया था और ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ कई जल्सों और प्रदर्शनों में इस गीत को गाया गया। इप्टा द्वारा निर्मित 1946 की एक और फ़िल्म थी ‘नीचा नगर’ जिसे निर्देशित किया चेतन आनन्द ने। इसमें भी रविशंकर का संगीत था और गीत लिखे विश्वामित्र आदिल और मनमोहन आनन्द ने। “उठो के हमें वक़्त की गरदिश ने पुकारा” और “कब तक घिरी रात रहेगी” जैसे गीत इस फ़िल्म में थे जिन्होंने स्वाधीनता के सपने को लोगों के मन-मस्तिष्क में और भी ज़्यादा बुलंद किया। ‘नीचा नगर’ को ‘कान फ़िल्म महोत्सव’ में दिखाया गया था।
अब आप सुनिए 1944 में प्रदर्शित फिल्म 'पहले आप' का वह गीत जिसमे गायक मुहम्मद रफी को पहली बार गाने का अवसर मिला था।


फिल्म पहले आप : ‘हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा...’ : मोहम्मद रफी और साथी




आपको हमारा यह विशेष अंक कैसा लगा, हमे अवश्य लिखिए। आपका प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ बहुत जल्द नई साज-धज के साथ पुनः आरम्भ होगा। आज के इस विशेष अंक के बारे में आप अपने विचार हमे radioplaybackindia@live.com के पते पर अवश्य अवगत कराएँ। 

शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी


शुक्रवार, 22 मार्च 2013

सुधियों के गाँव में विचरते रोहित रूसिया और मनोज जैन मधुर से मिलें

दोस्तों रेडियो प्लेबैक पर हम निरंतर नए और उभरते हुए गायकों, गीतकारों और संगीतकारों को अपने श्रोताओं से जोड़ते चले आये हैं, आज इस सूची में हम जोड़ रहे हैं एक ऐसे अनूठे कलाकार का नाम भी जो एक अच्छे गायक होने के साथ साथ शब्दों के अच्छे पारखी भी है और किसी भी कविता /गीत को सहज धुन में पिरो लेने की महारत भी रखते हैं. ये हैं रोहित रूसिया जो मध्य प्रदेश के छिंदवाडा जिले से हैं, आज अपनी पहली प्रस्तुति के रूप में ये लाये हैं कवि मनोज जैन 'मधुर' की रचना. हालाँकि संगीत संयोजन रोहित नहीं कर पाए पर गीत अपनी मधुरता में किसी भी पूर्ण रूप से संयोजित गीत से कम नहीं है. आप भी सुनें और इस प्रतिभाशाली फनकार को अपनी प्रतिक्रिया देकर प्रोत्साहित करें- 







# A Radio Playback Original 

Man Paakhi Ud chal re 

Lyrics - Manoj Jain Madhur 
Music and Vocals - Rohit Rusia 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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