Tuesday, August 16, 2011

चलो झूमते सर पे बाँधे कफ़न...जब मजरूह साहब ने जगाई खून में गर्मी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 723/2011/163



स्वतन्त्रता दिवस की 64वीं वर्षगाँठ के अवसर पर श्रृंखला ‘वतन के तराने’ कीतीसरी कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत है। कल की कड़ी में हमने आपसे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की अप्रतिम वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के प्रेरक जीवन-प्रसंग के कुछ अंश को रेखांकित किया था। आज हम आपसे उसके आगे के प्रसंगों की चर्चा करेंगे।



झाँसी के महाराज गंगाघर राव से विवाह हो जाने के बाद मनु अब झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई बन कर महलों में आ गईं। विवाह के समय मनु की आयु 14 वर्ष और महाराज की आयु लगभग 50 वर्ष थी। वास्तव में इस बेमेल विवाह की जिम्मेदार तत्कालीन परिस्थितियाँ थी, जिन्हें अंग्रेजों ने ही उत्पन्न किया था। देशी राजाओं के राज्यों को हड़पने के लिए अंग्रेजों ने एक कानून बना दिया था कि जिन राजाओं की अपनी सन्तान नहीं होगी, उस राज्य को राजा के निधन के बाद अंग्रेजों की सत्ता के अधीन कर लिया जाएगा। उस समय झाँसी को विदेशी सत्ता के अधीन होने से बचाने के लिए महाराज गंगाधर राव को अपने एक उत्तराधिकारी की आवश्यकता थी। इसीलिए इस बेमेल विवाह को हर पक्ष से मौन स्वीकृति मिली।



दूसरी ओर लक्ष्मीबाई में बाल्यावस्था से प्रशासनिक महत्वाकांक्षा, युद्ध-कौशल और देश-प्रेम का जो बीजारोपण हुआ था, उसके पुष्पित-पल्लवित होने के लिए अनुकूल वातावरण मिलने लगा। विवाह के बाद लक्ष्मीबाई राज्य की शासन व्यवस्था में महाराज का सहयोग करने लगी। उन्होने सेना का संगठन नये सिरे से किये और राज्य प्रबन्ध में फैली अव्यवस्था में सुधार की नई योजनाएँ बनाईं। रानी ने सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह किया कि महिलाओं की एक अलग सेना बनाई और स्वयं उन्हें प्रशिक्षित भी किया। सेना की इस टुकड़ी का व्यायाम, घुड़सवारी, अश्व-संचालन आदि देख कर महाराज गंगाधर राव चकित रह गए। स्त्री जाति को वह अबला मानते थे, किन्तु इन वीरांगनाओं को देख कर उन्हें अपना विचार बदलना पड़ा। लक्ष्मीबाई राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ गृहस्थ जीवन में भी कुशल थी। कुछ समय बाद महारानी को पुत्र-रत्न की प्राप्ति और राज्य को एक उत्तराधिकारी मिला। पूरे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई, किन्तु अंग्रेजोंके खेमे में शोक छा गया। एक पक्ष की प्रसन्नता और दूसरे पक्ष के शोक का अनुपात बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सका। झाँसी के उत्तराधिकारी की असमय मृत्यु से महाराज को राज्य-कार्य से विमुख कर दिया। लक्ष्मीबाई ने शासन-व्यवस्था अपने हाथ में लेकर भारतीय परम्परा के अनुसार अपने ही वंश के एक बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र बनाया और अंग्रेजों को सीधी चुनौती दे दी।



दोस्तों, झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की यह अमर गाथा आज के अंक में भी पूर्ण नहीं हो सकती। महारानी के त्याग और बलिदान की इस गाथा को हम कल के अंक में जारी रखते हुए थोड़ी चर्चा आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत पर करते हैं। आज हम आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म “काबली खान” से लिया गया ऊर्जा से भरा हुआ एक गीत सुनवाएँगे। मजरूह सुल्तानपुरी के गीत को चित्रगुप्त ने संगीतबद्ध किया है। देशभक्त सैनिकों में उत्साह और ऊर्जा का संचार करने वाले इस गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। जिस प्रकार रानी झाँसी ने अंग्रेजों को ललकारते हुए अपने देशभक्त सैनिकों का उत्साहवर्द्धन किया था, ऐसा ही कुछ भाव इस गीत में भी है। लीजिए आप भी सुनिए यह गीत-



फिल्म - काबली खान : ‘चलो झूमते सर पे बाँधे कफ़न..’ – गीतकार : मजरूह सुल्तानपुरी





(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)



और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - कृष्णमोहन जी के शब्दों में कहें तो एक बलिदानी के अन्तिम मनोभावों की अभिव्यक्ति है ये गीत.

सूत्र २ - आजमगढ़ उत्तर प्रदेश में जन्में थे इसके शायर.

सूत्र ३ - एक अंतरे में हुस्न और इश्क का जिक्र है.



अब बताएं -

संगीतकार कौन है - ३ अंक

शायर बताएं - २ अंक

फिल्म के निर्देशक कौन हैं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

वाह शरद जी जबरदस्त वापसी की और ३ अंकों के साथ बधाई



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, August 15, 2011

जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा....सुनिए समृद्ध भारत की कहानी राजेंद्र कृष्ण की जुबानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 722/2011/162



ज स्वतन्त्रता दिवस के पावन पर्व पर आप सब संगीत-प्रेमियों को ‘आवाज़’ परिवार की ओर से बहुत-बहुत बधाई। आज के पावन दिन को ही ध्यान में रख कर हम ‘ओल्ड इज गोल्ड’ स्तम्भ पर श्रृंखला ‘वतन के तराने’ प्रस्तुत कर रहे हैं। दोस्तों, इस श्रृंखला में हम गीतों के बहाने कुछ ऐसे महान स्वतन्त्रता सेनानियों की चर्चा कर रहे हैं जिन्होने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी। आज के अंक में हम वीरांगना लक्ष्मीबाई के त्याग और बलिदान का स्मरण करेंगे और एक प्यारा सा गीत सुनेंगे, जिसमें अपने राष्ट्रीय गौरव का गुण-गान किया गया है।



19नवम्बर, 1835 को काशी (वाराणसी) में महाराष्ट्रीय ब्राह्मण मोरोपन्त और भगीरथ बाई के घर एक विलक्षण कन्या का जन्म हुआ। कन्या का नाम रखा गया- मनु। मनु के जन्म के कुछ ही समय बाद मोरोपन्त के आश्रयदाता चिमोजी अप्पा का निधन हो गया। चिमोजी अप्पा बिठूर (कानपुर) में निर्वासित जीवन बिता रहे पेशवा बाजीराव के भाई थे। अपने समय के सशक्त पेशवा का परिवार अंग्रेजों के षड्यंत्रके कारण ही छिन्न-भिन्न होकर अलग-अलग स्थानों पर निर्वासित जीवन बिता रहा था। चिमोजी अप्पा के देहान्त के बाद मोरोपन्त उनके भाई पेशवा बाजीराव के आश्रय मे बिठूर आकर रहने लगे। अभी मनु की आयु मात्र चार वर्ष की ही थी, तभी उसकी माँ भगीरथ बाई का निधन हो गया। मोरोपन्त ने धैर्य के साथ नन्ही मनु का पालन-पोषण किया। मनु को बचपन के खेल-खिलौने या गुड़ियों से खेलने मेंकोई रुचि नहीं थी। उसे तो तीर-तलवार से खेलना और साहसपूर्ण करतब ही भाते थे।



पेशवा बाजीराव मनु को पुत्रीवत मानते थे और उसे ‘छबीली’नाम से पुकारते थे। उन्होने राज परिवार के अन्य बालकों के साथ मनु की शिक्षा की व्यवस्था गंगा तट पर स्थित गुरु आश्रम में कर दी। गुरु केआश्रम में मनु, पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब, राव साहब और पाण्डुरंग राव (तात्या टोपे) के साथ शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा पाने लगी। धीरे-धीरे मनु दस वर्ष की हो चुकी थी। वह घुड़सवारी, भाला,तीर, तलवार आदि चलाने में अपने से बड़ी आयु के बालकों की तुलना में अधिक कुशल हो गई थी। इसके साथ ही धर्मग्रंथों के अध्ययन में भी ऐसी प्रवीण हुई कि पिता मोरोपन्त, पेशवा बाजीराव और स्वयं उसके गुरु भी चकित थे। एक दिन मनु ने गुरुदेव से प्रश्न किया –‘मुट्ठीभर अंग्रेज़ आज हमें हमारे ही देश में अपने इशारों पर नचा रहे हैं। क्या हम निर्बल हैं? क्या हमारी आत्मा मृत हो चुकी है?उस दिन गुरुदेव ने उन्हें हिंसा और अहिंसा का भेद समझाया और कहा कि आततायी के साथ अहिंसा की नीति अपनाना व्यर्थ है। उस दिन नाना साहब, तात्या टोपे और मनु ने प्रण किया- “हम स्वाधीन होने का प्रयत्न करेंगे। पराधीन होकर जीने से तो मर जाना अच्छा है।“ बचपन में लिया गया यह प्रण तीनों ने निभाया।



मनु जब तेरह वर्ष की हुई तो मोरोपन्त को उसके विवाह की चिन्ता हुई। एक दिन पेशवा बाजीराव ने मोरोपन्त को सूचित किया कि झाँसी के राजा गंगाधर राव का मनु से विवाह का प्रस्ताव आया है।दरअसल गंगाधर राव की कोई सन्तान नहीं थी। मनु से उनके विवाह करने का उद्देश्य था- झाँसी को अंग्रेजों की कुदृष्टि से बचाना। काफी विचार-विमर्श के बाद यह विवाह सम्पन्न हुआ और मनु झाँसी की रानी बन कर झाँसी के राजमहल में आ गई। विवाह के उपरान्त मनु का नामकरण हुआ लक्ष्मीबाई।दोस्तों, वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की गाथा के लिए सैकड़ों पृष्ठ भी कम होंगे, यह तो हमारी श्रृंखला का एक अंक मात्र है। आज के अंक में हमने लक्ष्मीबाई के जन्म से लेकर झाँसी की रानी बननेके प्रसंग और उस काल के राजनैतिक परिवेश का संकेत देने का प्रयास किया है। कल के अंक में हम आपसे रानी के सैन्य संगठन की क्षमता, युद्ध कौशल और बलिदान की गाथा की चर्चा करेंगे।



और अब हम स्वतन्त्रता की 64वीं वर्षगाँठ के पावन दिन‘सोने की चिड़िया’भारत के यथार्थ स्वरूप का दर्शन एक गीत के माध्यम से करेंगे। यह गीत 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘सिकन्दरे आजम’ से लिया गया है। पाँचवें और छठे दशक में राजेन्द्र कृष्ण फिल्म जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकार थे। उन्हीं के गीत –“जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा, वह भारत देश है मेरा....” की संगीत रचना संगीतकार हंसराज बहल ने की थी। फिल्मी दुनिया में श्री बहल को ‘मास्टर जी’ के सम्बोधन से पुकारा जाता था। राग शुद्ध कल्याण की छाया लिये देश के इस गौरव गान को मुहम्मद रफी ने स्वर देकर इसे अमर कर दिया। लीजिए, आप भी सुनिए यह गौरव-गान-



फिल्म - सिकन्दरे आजम : ‘जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़ियाँ करतीं हैं बसेरा..' : गीतकार - राजेन्द्र कृष्ण





(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)



और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - स्वर है लता मंगेशकर का.

सूत्र २ - गीतकार दादा साहब फाल्के सम्मान से सम्मानित हैं.

सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है "कफ़न".



अब बताएं -

संगीतकार कौन है - ३ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

फिल्म के निर्देशक कौन हैं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

हिन्दुस्तानी जी भूल सुधरने के लिए धन्येवाद. और २ अंको की बधायी भी लें, सभी श्रोताओं को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ और हम सबके प्रिय शम्मी कपूर को भावभीनी श्रद्धाजन्ली...इस पूरे आलेख को भी पढ़ें



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, August 14, 2011

जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है....भारत व्यास के शब्दों में मातृभूमि का जयगान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 721/2011/161



नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों का हार्दिक स्वागत है इस नए सप्ताह में। दोस्तों, कल है 15 अगस्त, इस देश का एक बेहद अहम दिन। 200 वर्ष की ग़ुलामी के बाद इसी दिन 1947 में हमें आज़ादी मिली थी। पर इस आज़ादी को प्राप्त करने के लिए न जाने कितने प्राण न्योछावर हुए, न जाने कितनी औरतें विधवा हुईं, न जाने कितने गोद उजड़ गए, और न जाने कितने बच्चे अनाथ हो गए। अपने देश की ख़ातिर प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों को समर्पित करते हुए प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'वतन के तराने'।



देशभक्ति गीतों की इस शृंखला को हम सजा रहे हैं दस अलग-अलग ऐसे गीतकारों की लिखी हुई देशभक्ति की रचनाओं से जिनमें स्तुति है जननी जन्मभूमि की, वंदनवार है इस शस्य श्यामला धरा की, राष्ट्रीय स्वाभिमान की, देश के गौरव की। ये वो अमर गानें हैं दोस्तों, जो गाथा सुनाते हैं उन अमर महर्षियों की जिन्होंने न्योछावर कर दिये अपने प्राण इस देश पर, अपनी मातृभूमि पर। "मातृभूमि के लिए जो करता अपने रक्त का दान, उसका जीवन देवतूल्य है उसका जन्म महान"। स्वर्ग से महान अपनी इस मातृभूमि को सलाम करते हुए इस शृंखला का पहला गाना हमने चुना है गीतकार भरत व्यास का लिखा हुआ। वीरों की धरती राजस्थान में जन्म हुआ था भरत व्यास का। लेकिन कर्मभूमि उन्होंने बनाया मुंबई को। भरत व्यास के फ़िल्मी गीत भी साहित्यिक रचनाओं की श्रेणी में स्थान पाने योग्य हैं। काव्य के शील और सौंदर्य से सम्पन्न जितने उत्कृष्ट उनके रूमानी गीत हैं,उतने ही उत्कृष्ट हैं उनके देशभक्ति की रचनाएँ। और इनमें से जिस रचना को आज हमनेचुना है वह है फ़िल्म 'सम्राट पृथ्वीराज चौहान' का, "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है..."।मन्ना डे और साथियों के गाये इस गीत को स्वरबद्ध किया था, वसंत देसाई नें। भरत व्यास - वसंत देसाई की जोड़ी का एक और उत्कृष्ट देशभक्ति गीत है फ़िल्म 'लड़की सह्याद्रि की' में पंडित जसराज की आवाज़ में "वंदना करो, अर्चना करो"।



पृथ्वीराज (1149-1192), जो सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाम से जाने जाते हैं, हिन्दू चौहान साम्राज्य के राजा थे जिन्होंने 12वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अजमेर और दिल्ली पर राज किया। पृथ्वीराज चौहान अंतिम हिन्दू राजा थे जो दिल्ली के सिंहासन में बैठे। अपने नाना बल्लाल सेन (बंगाल के सेन साम्राज्य) से 20 वर्ष की आयु में सन्‍ 1169 में पृथ्वीराज को अजमेर और दिल्ली का शासन मिला था। उन्होंने वर्तमान राजस्थान और हरियाणा मेंराजपूतों को एकत्रित कर विदेशी आक्रमणों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। पृथ्वीराज नें 1175 में कन्नौज के राजा जयचन्द्र राठौड़ की बेटी संयोगिता को भगाकर ले गए। पृथ्वीराज-संयोगिता की प्रेम कहानी भारत में मशहूर है, जिसे चौहान साम्राज्य के कवि और मित्र चन्द बरदाई नें अपनी कविता में क़ैद किया। तरैन की पहली लड़ाई में 1191 में पृथ्वीराजचौहान नें शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी को परास्त किया। गोरी नें अगले ही वर्ष दोबारा आक्रमण किया जिसमें पृथ्वीराज को हार स्वीकारनी पड़ी। उन्हें क़ैद कर लिया गया और गोरी उन्हें ग़ज़नी ले गए जहाँ उन्हें मृत्यु प्रदान की गई। और इस तरह से दिल्ली हिन्दू राजाओं के हाथ से निकल कर विदेशी मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं के कब्ज़े में चला गया। पृथ्वीराज चौहान की देशभक्ति की गाथा अमर वीरगाथाओं में शोभा पाता है। आइए 'वतन के तराने' शृंखला की पहली कड़ी में इस वीर योद्धा को नमन करते हुए उन्हीं पर बनीफ़िल्म का गीत सुनें "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है"। साथ ही स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर हम अपने सभी श्रोता-पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं।



फिल्म – सम्राट पृथ्वीराज चौहान : ‘जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है’ : गीतकार –भरत व्यास





(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)



और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - गीतकार हैं राजेंद्र कृष्ण.

सूत्र २ - ये फिल्म दुनिया के एक महान योद्धा की अमर दास्तान है.

सूत्र ३ - गीत में देश के उस नाम का जिक्र है जिस नाम से ये देश जाना जाता था.



अब बताएं -

संगीतकार कौन है - ३ अंक

गायक बताएं - २ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी बढ़िया शुरुआत....अवध जी को भी बधाई



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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