रविवार, 17 अप्रैल 2011

मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है....अरे नहीं साहब ये तो गाने के बोल हैं, हमारे अंगने में तो आपका ही काम है...आईये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 636/2010/336

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज हम एक नए सप्ताह में क़दम रख रहे हैं और इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'सितारों की सरगम', जिसके अंतर्गत हम कुछ ऐसे गीत सुनवा रहे हैं जिन्हें आवाज़ दी है फ़िल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों नें। शृंखला के पहले हिस्से में जिन पाँच सितारों की सरगमी आवाज़ से आपका परिचय हुआ वो थे राज कपूर, दिलीप कुमार, मीना कुमारी, नूतन और अशोक कुमार। आइए आज से शुरु हो रही इस शृंखला के दूसरे हिस्से में बात करें अगली पीढ़ी के सितारों की। ऐसे में शुरुआत 'मेगास्टार ऒफ़ दि मिलेनियम' के अलावा और किनसे हो सकती है भला! जी हाँ, बिग बी अमिताभ बच्चन। साहब उनकी आवाज़ के बारे में क्या कहें, यह तो बस सुनने की चीज़ है। और मज़े की बात यह है कि फ़िल्मों में आने से पहले जब उन्होंने समाचार वाचक की नौकरी के लिए वॊयस टेस्ट दिया था, तो उसमें वो फ़ेल हो गये थे और उन्हें बताया गया था कि उनकी आवाज़ वाचन के लिए सही नहीं है। और क़िस्मत ने क्या खेल खेला कि उनकी वही आवाज़ आज उनकी पहचान है। बच्चन साहब नें जो सफलता और शोहरत कमाई है अपने लम्बे करीयर में और जो सिलसिला आज भी जारी है, इस ऊँचाई तक बहुत कम लोग पहुँच पाते हैं। हमारे बौने हाथ उनकी उपलब्धि को छू भी नहीं सकते। बहुत साल पहले विविध भारती के एक मुलाक़ात में बच्चन साहब से पूछा गया था कि "अमित जी, आप जिस मुकाम पर आ गये हैं वहाँ संघर्ष आपको छू भी नहीं सकता, पर जब पहली बार आपको सफलता मिली थी, उस वक़्त आपको कैसा महसूस हुआ था?"; इसके जवाब में अमित जी का कहना था, "पहली बात तो यह है कि संघर्ष कभी ख़त्म नहीं होती, आज भी मुझे उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना उस ज़माने में करना पड़ता था। मेरे बाबूजी कहते हैं कि जब तक जीवन है संघर्ष है। और जहाँ तक सफलता का सवाल है, ख़ुशी तो हुई थी, पर उसके लिए कोई ख़ास तरीक़े से मनाया नहीं गया था।"

दोस्तों, अमिताभ बच्चन साहब के अभिनय का लोहा तो हर किसी ने माना ही है, उनकी गायन क्षमता की भी जितनी दाद दी जाये कम है। उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत गाया है और कई बार संवाद भी ऐसे निराले तरीक़े से कहे हैं गीतों में कि उस वजह से गीत एक अलग ही मुकाम तक पहुँच गया है। ऐसा ही एक गीत है फ़िल्म 'सिलसिला' का "ये कहाँ आ गये हम युंही साथ साथ चलते"। फ़िल्म 'ख़ुदा गवाह' में भी उनका बोला हुआ संवाद "सर ज़मीन-ए-हिंदुस्तान' को सॊंग् साउण्डट्रैक में शामिल किया गया था। 'नसीब' के "चल चल मेरे भाई" और 'अमर अक्बर ऐंथनी' में "माइ नेम इज़ ऐंथनी गोल्ज़ल्वेज़" में भी उनके हुए संवाद यादगार हैं। अमिताभ बच्चन के गायन से समृद्ध फ़िल्मों में जो नाम सब से पहले ज़हन में आते हैं, वो हैं - 'सिलसिला', 'मिस्टर नटवरलाल', 'लावारिस', 'पुकार', 'जादूगर', 'महान', 'तूफ़ान', 'बागबान'। 'सिलसिला' में दो गीत उन्होंने गाये थे, "नीला आसमाँ सो गया" और "रंग बरसे भीगे चुनरवाली"। यह होली गीत तो शायद सब से लोकप्रिय होली गीत होगा फ़िल्म जगत का! 'मिस्टर नटवरलाल' में "मेरे पास आओ मेरे दोस्तों", 'पुकार' में "तू मयके मत जैयो, मत जैयो मेरी जान", 'जादूगर' में "पड़ोसी अपनी मुरगी को रखना सम्भाल मेरा मुर्गा हुआ है दीवाना", 'महान' में "समुंदर में नहाके और भी नमकीन हो गई है", 'तूफ़ान' में "बाहर है प्रॊब्लेम अंदर है प्रॊब्लेम", और 'बागबान' में "होली खेले रघुवीरा", "चली चली देखो चली चली" और "मैं यहाँ तू वहाँ, ज़िंदगी है कहाँ" जैसे गीत ख़ूब लोकप्रिय हुए। लेकिन जो एक गीत जिसके उल्लेख के बग़ैर बच्चन साहब के गीतों की चर्चा अधूरी है, वह है फ़िल्म 'लावारिस' का "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। अमिताभ बच्चन और अल्का याज्ञ्निक द्वारा अलग अलग गाये यह डबल वर्ज़न गीत लोक शैली में रचा हुआ एक हास्य गीत है जिसमें पत्नी की अलग अलग शारीरिक रूप को हास्य व्यंग के द्वारा दर्शाया गया है। अमिताभ बच्चन वाले वर्ज़न में अमित जी ख़ुद ही महिला का भेस धारण कर इन अलग अलग शारीरिक रूपों को दर्शाते हैं जिससे इस गीत को सुनने के साथ साथ देखना भी अत्यावश्यक हो जाता है। 'लावारिस' के संगीतकार थे कल्याणजी-आनंदजी, जिन्होंने कई अभिनेताओं से गीत गवाये हैं। जब उनसे इसके बरे में पूछा गया था 'विविध भारती' के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में, तब उन्होंने कहा था, "इत्तेफ़ाक़ देखिये, शुरु शुरु में पहले ऐक्टर्स ही गाया करते थे। एक ज़माना वो था जो गा सकता था वो ही हीरो बन सकता था। तो वो एक ट्रेण्ड सी चलाने की कोशिश की जब जब होता था, जैसे राइटर जितना अच्छा गा सकता है, अपने वर्ड्स को इम्पॊर्टैन्स दे सकता है, म्युज़िक डिरेक्टर नहीं दे सकता, जितना म्युज़िक डिरेक्टर दे सकता है कई बार सिंगर नहीं दे सकता, एक्स्प्रेशन-वाइज़, सब कुछ गायेंगे, अच्छा करेंगे, लेकिन ऐसा होता है कि वो सैटिस्फ़ैक्शन कभी कभी नहीं मिलता है कि जो हम चाहते थे वो नहीं हुआ। तो ये हमने कोशिश की, जैसे कि बहुत से सिंगरों ने गाया भी, कुछ कुछ लाइनें भी गाये, बहुत से कॊमेडी कलाकारों नें भी गाये, लेकिन बेसिकली जो पूरे गाने गाये, वो अमिताभ बच्चन जी थे, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। तो आइए सुना जाये इस अनोखे सदाबहार गीत को जिसे लिखा है अंजान साहब नें।



क्या आप जानते हैं...
कि अमिताभ बच्चन को चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार और १४ बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वो भारतीय संसद के निर्वाचित सदस्य भी रहे १९८४ से १९८७ के बीच।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 7/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इस युगल गीत में किशोर दा की भी आवाज़ है.

सवाल १ - किस बड़ी अभिनेत्री ने अपने लिए पार्श्वगायन किया है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - परदे पर इस अभिनेत्री के साथ कौन दिखते है अभिनय करते - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दरअसल अमित जी का पहला उत्तर गलत था, गुड्डी में धर्मेन्द्र की भूमिका अतिथि की थी, समित ने अमिताभ वाला रोल उनसे छिना था, खैर किसी और ने इसका सही जवाब नहीं दिया और खुद अमित जी ने ही अंततः समित का नाम लिया तो ३ अंक के हकदार वो ही हुए, हिन्दुस्तानी जी और शरद जी भी सही निकले. अनजाना जी कहाँ गायब रहे.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - सात सुरों को जसरंगी किया पंडित जसराज ने

सुर संगम - 16 - पंडित जसराज
१४ वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे।

मस्कार! सुर-संगम के इस साप्ताहिक स्तंभ में मैं, सुमित चक्रवर्ती आपका स्वागत करता हूँ। हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है। इस कला को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है। आज हम सुर-संगम में ऐसे हि एक विशिष्ट शास्त्रीय गायक के बारे में जानेंगे जिनकी आवाज़ मानो सुनने वालों को सीधा उस परमेश्वर से जाकर जोड़ती है। एक ऐसी आवाज़ जिन्होंने मात्र ३ वर्ष की अल्पायु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले केवल सात स्वरों के साथ कदम रखा, आज वही सात स्वर उनकी प्रतिभा का इन्द्रधनुष बन विश्व-जगत में उन्हें विख्यात कर चले हैं। जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत शैली के समकालीन दिग्गज, संगीत मार्तांड पंडित जसराज जी की। आईये पंडित जसराज के बारे में और जानने से पहले सुनें उनकी आवाज़ में यह गणेश वंदना।

गणेश वन्दना - पं० जसराज


पंडित जसराज क जन्म २८ जनवरी १९३० को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे ४ पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। जैसा कि आपने पहले पढ़ा कि पं० जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली परन्तु जब वे मात्र ३ वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अलि खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बडे़ सुपुत्र अर्थात् पं० जसराज के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पं० मणिराम जी ने। इन्हीं की छत्रछाया में पं० जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन सीखा। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा १४ वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामि वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। बचपन से ही आदर्शों के पक्के पंडित जसराज के पक्के सुरों की चर्चा आगे बढ़ाने से पहले लीजिये सुनें उनके द्वारा प्रस्तुत राग गुर्जरी तोड़ी।

राग गुर्जरी तोड़ी - पं० जसराज


पं० जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामि महाराज के सानिध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। तो क्यों न जुगलबन्दी के इस रूप को भी सुना जाए पंडित जी के ही दो शागिर्दों विदुषी डॉ० अश्विनि भिड़े-देशपाण्डे और पं० संजीव अभ्यंकर की आवाज़ों में? डॉ० देशपाण्डे इस जुगलबन्दी में राग ललित गा रही हैं जबकि पं० अभ्यंकर गा रहे हैं राग पुर्ये-धनश्री।

जसरंगी जुगलबन्दी - डॉ० अश्विनि भिड़े-देशपाण्डे एवं पं० संजीव अभ्यंकर


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए और पहचानिए कि यह कौन सा भारतीय वाद्‍य यंत्र है? इसपर आधारित होगा हमारा आगामी अंक।



पिछ्ली पहेली का परिणाम: इस बार एक नयी श्रोता व पाठिका श्रीमति क्षिति तिवारी जी बाज़ी ले गईं हैं। आपको मिलते हैं ५ अंक, हार्दिक बधाई!

लीजिए हम आ पहुँचे हैं आज के सुर-संगम के इस अंक की समप्ति पर, आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| और हाँ! शाम ६:३० बजे हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के प्यारे साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - जब गुड्डो दादी नें बताया पंडित बागा राम व पंडित हुस्नलाल के परिवार के साथ उनके पारिवारिक संबंध के बारे में

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गानें रेकॉर्ड/ कैसेट्स/ सीडी'ज़ के ज़रिये अनंतकाल तक सुरक्षित रहेंगे, इसमें कोई शक़ नहीं है, और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सुनहरे दौर के फ़नकार भी अमर रहेंगे। लेकिन जब हम इन अमर फ़नकारों के बारे में आज जानना चाहते हैं तो कुछ किताबों, पत्र-पत्रिकाओं और विविध भारती के संग्रहालय में उपलब्ध कुछ साक्षात्कारों के अलावा कोई और ज़रिया नहीं है। इन कलाकारों के परिवार वालों से भी जानकारी मिल सकती है लेकिन उन तक पहुँचना हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में अगर हमें कोई मिल जाये जिन्होंने उस ज़माने के कलाकार को या उनके परिवार को करीब से देखा है, जाना है, तो उनसे बातचीत करनें में भी एक अलग ही रोमांच हो आता है। यह हमारा सौभाग्य है कि 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार के श्रोता-पाठकों में भी कई मित्र ऐसे हैं जिन्होंने न केवल उस ज़माने से ताल्लुख़ रखते हैं बल्कि स्वर्णिम युग के कुछ कलाकारों के संस्पर्श में भी आने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ऐसी ही एक शख़्स हैं हमारी गुड्डो दादी।

अभी हाल ही में जब मुझे सजीव जी से पता चला कि गुड्डो दादी बहुत साल पहले पंडित हुस्नलाल के घर गई थीं, मुझे रोमांच हो आया, और मैंने दादी से गुज़ारिश की अपनी यादों के उजालों को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिखेरने की। बड़े ही उत्साह के साथ दादी नें न केवल उस अनुभव के बारे में हमें लिख भेजा, बल्कि अमरीका से ख़ुद मुझे टेलीफ़ोन भी किया। ७२ वर्ष की उम्र में भी टेलीफ़ोन पर उनकी आवाज़ में जिस तरह का उत्साह मुझे मेहसूस हुआ, उससे हम नौजवान बहुत कुछ सीख सकते हैं। बहुत साल पहले की बात होने की वजह से दादी को बहुत ज़्यादा तो याद नहीं, लेकिन जितना भी याद है, वो हमारे लिये कुछ कम नहीं है। तो आइए रोशन करते हैं आज की यह महफ़िल गुड्डो दादी की सुनहरी यादों के उजाले से।

सुजॉय - गुड्डो दादी, एक बार फिर स्वागत है आपका 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। यकीन मानिए, आप जैसी वरिष्ठ मित्रों के संस्पर्श में आकर हमें बहुत अच्छा लगता है, और एक रोमांच भी हो आता है यह जानकर कि आप सहगल साहब, पं. हुस्नलाल-भगतराम, और सुरिंदर कौर जैसी कलाकारों से मिली हैं, या उन्हें सामने से देखा है। आज हम आपसे जानना चाहेंगे पं. हुसनाल-भगतराम के बारे में। मैंने सुना है कि आपके परिवार का संबंध है उनके परिवार के साथ?

गुड्डो दादी - जी हाँ! पंडित बागा राम जी के साथ हमारा पारिवारिक सम्बन्ध है। मेरे पैदा होने से भी पहले हमारे परिवार का काफी आना जाना था।

सुजॉय - ये पंडित बागा राम जी कौन हैं?

गुड्डो दादी - पं. बागा राम जी हुस्नलाल जी के ससुर थे। और वो ख़ुद भी संगीतकार थे। मेरे ख़याल में उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी संगीत दिया है। और हुस्नलाल भगतराम को भी बहुत कुछ सिखाया है। पंडित बागा राम जी बहुत सीधे सादे किस्म के इंसान थे, बढ़ी सफ़ेद दाढ़ी, खुली कंधे पर लाल कपडे का अंगोछा डाले रखते थे।

सुजॉय - अच्छा!! क्या आप बता सकती हैं कि बागा राम जी नें किन फ़िल्मों में संगीत दिया था?

गुड्डो दादी - पंडित बागा राम जी ने कौन सी फिल्म में संगीत दिया या लिखा मुझे जानकारी नहीं हैं, क्योंकि उन दिनों हमें दूर ही रखा जाता था गीत आदि से, और दूर संचार के साधन भी कम थे। रेडियो तो १९४७ तक किसी किसी के घर में ही होता था।

सुजॉय - मैंने इंटरनेट पर काफ़ी ढूंढा पर बागा राम जी के बारे मे कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सका, और न ही उनके किसी फ़िल्म या गीत की। ऐसे में आप से उनके बारे में सुन कर बहुत ही अच्छा लग रहा है। दादी, मैंने सुना है कि आप हुस्नलाल जी के घर गई थीं। कहाँ पे था उनका घर?

गुड्डो दादी - मुझे जितना याद है या पता है, वह बागा राम जी का घर था। हुस्नलाल जी का वहाँ ख़ूब आना जाना था। उनका घर था दिल्ली के पहाड़गंज में इम्पीरियल सिनेमा के पीछे। एक पारिवारिक वातावरण था, सबसे मिलते थे आदर के साथ, हंस मुख भी थे। हुस्नलाल-भगतराम जी नया गीत अपने मित्र मंडली के साथ तैयार करते थे, जिसमे पंडित बागा राम जी बहुत सहायता करते थे। बहुत से गीत और धुनें दुसरे संगीतकारों ने चोरी कर अपनी फिल्मो में शामिल कर लिया, नाम तो नहीं लिखूँगी। हम भी दिल्ली में रहते थे। बेटी और पति के साथ बहुत बार गई उनके घर। वहाँ एक कमरा वाद्यों से सुज्जित रहता था जिसमें सितार, हारमोनियम, घड़ा, तबला शामिल थे। मसंद गोल तकिये, उन पर सफ़ेद कवर, ज़मीन पर कालीन और कालीन पर सफ़ेद चादर भी बिछी होती थी। उनके घर हमनें खाना भी खाया, बहिन के हाथों बना चाय भी पी, बड़ी बहिन ने खाने पर आमन्त्रण दिया था। बहिन, यानी हुसनाल जी की पत्नी, जिनको मैं बड़ी बहन बोलती हूँ सम्मान के साथ, उन्होंने भी फ़िल्म में गीत गाया है। मुझे जितना याद है फ़िल्म 'चाकलेट' में उन्होंने गीत गाया था।

सुजॉय - अच्छा! हुस्नलाल जी की पत्नी, यानी कि बागा राम जी की बेटी! यह जो फ़िल्म 'चाकलेट' की बात बतायी आपने, इस फ़िल्म में संगीत था मोहन शर्मा का और गीतकार थे सी. एम. कश्यप। यह १९५० की फ़िल्म थी। अच्छा दादी, गायिकाओं की बात करें तो सुरैया जी के साथ हुस्नलाल-भगतराम के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत हुए। इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी?

गुड्डो दादी - गायिका सुरैया की बहुत इज्ज़त करते थे दोनों। एक दूसरी मशहूर गायिका नें जब अपनी गीतों की 'श्रद्धांजली' सी.डी. बनायी तो उन्होंने हुस्न लाल जी के गीत एक भी नहीं शामिल किये। और आप यकीन नहीं करेंगे कई गायक गायिकाओं नें भी उनकी धुनें चुराकर दूसरे संगीतकारों को दी। गायक महेंदर कपूर जी ने भी गायन की शिक्षा हुसनलाल जी से ली थी।

सुजॉय - अच्छा दादी, आप तो उनके परिवार के करीब थीं, आप बता सकती हैं कि हुस्नलाल जी के निकट के मित्रों में कौन कौन से कलाकार हुआ करते थे?

गुड्डो दादी - गीतकार पंडित सुदर्शन जी, अभिनेता सोहराब मोदी, जयराज सहगल जी, जिल्लो बाई, जुबैदा, बोराल जी, डी एन मधोक, वाई बी चोहान, कारदार साहब, हरबंस, डायरेक्टर मुकंद लाल और बहुत से फिल्म के लोग थे उनकी मित्र मंडली में। एक साल पहले तलत अज़ीज़ से फोन पर बात हुई थी हुस्नलाल जी के विषय में, उनके मुख से यही निकला कि चित्रमय संसार में हम उन्हें बहुत याद करते हैं, और बहुत नाम है उनका | कभी कहते भी थे आपके बनाये हुए गीत फलाना फिल्म में बज रहे है, तो उनके मुख से यही निकलता था बजने दो मेरे मन को बहुत शान्ति मिलती है, यहीं सभी कुछ छोड़ जाना है, सभी कुछ!

सुजॉय - हुस्नलाल जी के अंतिम दिनों के बारे में आप कुछ बता सकती हैं?

गुड्डो दादी - उनके अंतिम दिन बहुत ही खराब व दयनीय दशा में निकले। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन किसी के आगे अपना हाथ नहीं फैलाया। कुछ भी हो सुबह के वक़्त सैर अवश्य करने जाते थे। और एक दिन सुबह दिल्ली के ताल कटोरा बाग में दिल की धडकन रूकने से वहीं उनका देहांत हो गया। धुन बनाने वाले, चुराने वाले, गाने वाले, कोई भी कुछ नहीं ले गया, सब कुछ यहीं रह गया, फिल्म 'मेला' का गीत "ये जिंदगी के मेले" दरअसल फिल्म 'मोती महल' का गीत था "जाएगा जब यहाँ से कुछ भी ना साथ होगा"।

सुजॉय - वाक़ई दिल उदास जाता है ऐसे शब्द सुन कर। अच्छा दादी, चलते चलते आप अपनी पसंद का कोई गीत पंडित हुस्नलाल-भगतराम जी का सुनवाना चाहेंगे हमारे श्रोताओं को?

गुड्डो दादी - "वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाये रहते हैं"

सुजॉय - वाह! आइए सुना जाये यह गीत सुरैया की आवाज़ में, फ़िल्म 'बड़ी बहन' का यह गीत है, क़मर जलालाबादी के बोल और यह वर्ष १९४९ की तस्वीर है।

गीत - वो पास रहे या दूर रहे (बड़ी बहन)


सुजॉय - दादी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया, बागा राम जी और हुस्नलाल जी के जीवन और संगीत सफ़र के बारे में युं तो किताबों और पत्रिकाओं से जानकारी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन आपनें जो बातें हमें बताईं, वो सब कहीं और से प्राप्त नहीं हो सकती थी। यह हमारा सौभाग्य है आप से बातचीत करना। आगे भी हम आप से सम्पर्क बनाये रखेंगे, आप भी 'आवाज़' पर हाज़िरी लगाते रहिएगा, बहुत बहुत शुक्रिया, नमस्कार!

गुड्डो दादी - मेरी तरफ़ से आप को बहुत बहुत आशिर्वाद और धन्यवाद!

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