Sunday, April 3, 2011

कैसे सजन घर जईबे हो रामा....पारंपरिक चैत गीतों की मधुरता

सुर संगम - 14 - चैत्र मास की चैती
जब महिला या पुरुष इसे एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है| इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं | 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी बदल जाती है| इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं| कभी-कभी दो दलों में बँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है, इसे 'चैता दंगल' कहा जाता है।


सुर-संगम के इस साप्ताहिक स्तंभ मे सभी श्रोता-पाठकों का स्वागत है। परंपरागत भारतीय संगीत शैलियों को आज़ादी के बाद सुप्रसिद्ध संगीतविद व सांस्कृतज्ञ ठाकुर जयदेव सिंह ने 'आकाशवाणी' के लिए चार वर्गों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत में वर्गीकृत किया था| इन शैलियो के अलग-अलग रंग हैं और इन्हें पसंद करने वालों के अलग-अलग वर्ग भी हैं| लोक संगीत, वह चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, उसमें ऋतुओं के अनुकूल गीतों का समृद्ध खज़ाना होता है| लोक संगीत की एक ऐसी ही शैली है- 'चैती'| उत्तर भारत के पूरे अवधी-भोजपुरी क्षेत्र तथा बिहार के भोजपुरी-मिथिला क्षेत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली 'चैती' है| हिन्दू कैलेण्डर के चैत्र मास में गाँव के चौपाल में महफिल सजती है और एक विशेष परंपरागत धुन में श्रृंगार और भक्ति रस में रचे 'चैती' गीतों का देर रात तक गायन किया जाता है।| जब महिला या पुरुष इसे एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है| इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं | 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी बदल जाती है| इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं| कभी-कभी दो दलों में बँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है, इसे 'चैता दंगल' कहा जाता है।

'चैती' गीतों का विषय मुख्यतः भक्ति और श्रृंगार रस होते हैं। भारतीय पञ्चांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा(पहली तिथि) से नया वर्ष शुरू होता है| नई फसल के घर आने का भी यही समय होता है जिसका उल्लास 'चैती' में प्रकट होता है| चैत्र नवरात्र प्रतिपदा के दिन से शुरू होता है और नवमी के दिन राम-जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाता है| 'चैती' में राम-जन्म का प्रसंग लौकिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है| इसके अलावा अपने भर्ता के लिए नायिका की विरह-व्यथा का चित्रण भी इन गीतों में होता है| कुछ चैती गीतों का साहित्य पक्ष इतना सबल होता है कि श्रोता संगीत और साहित्य के सम्मोहन में बँध कर रह जाता है| पटना की लोक संगीत विदुषी विंध्यवासिनी देवी की एक चैती में अलंकारों का प्रयोग देखें - 'चाँदनी चितवा चुरावे हो रामा, चईत के रतिया ....' इस गीत की अगली पंक्ति का श्रृंगार पक्ष तो अनूठा है - 'मधु ऋतु मधुर-मधुर रस घोले, मधुर पवन अलसावे हो रामा...'| चैती गीत गायन के मोहक परिवेश और इसकी आकर्षक धुन के कारण कबीर दास ने अपने कुछ निर्गुण भी चैती के स्वरों में पिरो दिए| कबीर की एक ऐसी ही निर्गुण चैती हम आपको सुनवा रहे हैं, वाराणसी के सुप्रसिद्ध शास्त्रीय-उप शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र के स्वर में| उन्होंने इस चैती को ठुमरी अंग में गाया है| पहले आप ठुमरी अंग में यह चैती सुनिए, उसके बाद हम चैती के शास्त्रीय पक्ष पर चर्चा करेंगे|

कैसे सजन घर जईबे हो रामा - पं० छन्नूलाल मिश्र


चैती की एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है| यदि चैती गीत में प्रयोग किये गए स्वरों और राग 'यमनी बिलावल' के स्वरों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो आपको अद्भुत समानता मिलेगी| अनेक प्राचीन चैती में बिलावल के स्वर मिलते हैं किन्तु आजकल अधिकतर चैती में तीव्र माध्यम का प्रयोग होने से राग यमनी बिलावल का अनुभव होता है| यह उदाहरण भरतमुनि के इस कथन की पुष्टि करता है कि लोक कलाओं की बुनियाद पर ही शास्त्रीय कलाओं का भव्य महल खड़ा है| आइए सुप्रसिद्ध गायिका निर्मला देवी के स्वरों में सुनते हैं ठुमरी अंग में एक श्रृंगार प्रधान चैती| इसमें चैती का लोक स्वरुप, राग 'यमनी बिलावल' के मादक स्वर, दीपचन्दी और कहरवा ताल का जादू तथा निर्मला देवी की भावपूर्ण आवाज़ आपको परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ होंगे| हमनें आपसे पिछली कड़ी की पहेली में इसी ठुमरी का टुकड़ा सुनाया था और पूछा था गायिका के बारे में जो आज के दौर के एक सुप्रसिद्ध अभिनेता की माँ थीं। तो आप अब समझ ही गए होंगे कि हम बात कर रहे हैं निर्मला देवी की ही जो प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता 'गोविंदा' की माँ थीं। हम चैती के शास्त्रीय पक्ष पर चर्चा जारी रखेंगे सुर-संगम की आगामी कड़ी में|

येहि थईयाँ मोतिया हिराए गैली रामा - निर्मला देवी


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए चैती के इस टुकड़े को जो एक हिन्दी फ़िल्म से लिया गया है। आपको पहचानना है कि यह चैती किस राग पर आधारित है?


पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी ने दोनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये और पा गये हैं १० अंक। साथ ही अवध जी को हम ५ बोनस अंक देंगे क्योंकि उन्होंने यह भी बताया कि गायिका किस प्रसिद्ध अभिनेता की माँ थीं। बधाई!

यह थी प्रसिद्ध लोक शैली - चैती पर आधारित हमारी पहली कड़ी। आशा है आपको यह कड़ी पसन्द आई। चैती के बारे में अभी और भी रोचक बातें बाकी हैं जिन्हें हम आपसे बाँटेंगे अगले रविवार को। साथ ही हम आभार व्यक्त करेंगे लखनऊ के श्री कृष्‍णमोहन मिश्र का इस प्रस्तुति में योगदान के लिए। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| शाम ६:३० बजे अपने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख - कृष्‍णमोहन मिश्र
प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Saturday, April 2, 2011

शनिवार विशेष में आज हम दे रहे हैं एक भावभीनी श्रद्धांजली स्वर्णिम दिनों के संगीतकार अजीत मर्चैण्ट को

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार। मैं, सुजॊय चटर्जी एक बार फिर हाज़िर हूँ इस साप्ताहिक विशेषांक के साथ। यह करीब दो साल पहले की बात है। मुझे मेरे दोस्त रामास्वामी से गुज़रे ज़माने के इस विस्मृत संगीतकार का टेलीफ़ोन नंबर प्राप्त हुआ था। उस वक़्त मैं ख़ुद इंटरव्युज़ नहीं करता था और 'हिंद-युग्म' से बस जुड़ा ही था। यह सोच कर कि अगर इस भूले बिसरे संगीतकार का इंटरव्यु 'विविध भारती' पर प्रसारित हो जाये, तो कितना अच्छा हो! इस ख़याल और लालच से मैंने इस संगीतकार का टेलीफ़ोन नंबर 'विविध भारती' के एक उच्च अधिकारी को भेज दिया और उनसे इस इंटरव्यु की गुज़ारिश कर बैठा। लेकिन पता नहीं इनकी कोई मजबूरी ही रही होगी कि यह इंटरव्यु संभव नहीं हो पाया। पिछले कुछ महीनों से जब मैंने ख़ुद इंटरव्युज़ लेना शुरु किया तो इस संगीतकार का नाम भी मेरी लिस्ट में था। दो तीन महीनों से मैं सोच ही रहा था कि किसी रविवार के दिन उन्हें टेलीफ़ोन करूँगा और उनसे कुछ बातचीत करूँगा। आप शायद मेरी बात का यकीन न करें कि मैं पिछले ही रविवार २७ मार्च को उन्हें फ़ोन करने ही वाला था कि उससे पहले किसी कारणवश मैंने रामास्वामी को फ़ोन कर लिया। और रामास्वामी नें मुझे बताया कि संगीतकार अजीत मर्चैण्ट का पिछले १८ मार्च २०११ को लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया है। कुछ पल के लिए मेरे मुंह से शब्द ही नहीं निकल पाये। हताशा और अफ़सोस की सीमा न थी। अजीत जी की काफ़ी उम्र हो गई थी; प्राकृतिक नियम से उनकी मृत्यु अस्वाभाविक नहीं थी, लेकिन मुझे एक अपराधबोध नें घेर लिया कि काश मैं कुछ दिन पहले उन्हें फ़ोन कर लिया होता। वो बीमार थे, इसलिए इंटरव्यु तो शायद मुमकिन नहीं होता, पर कम से कम उनकी बोलती हुई आवाज़ तो सुन लेता। और यह अफ़सोस शायद मेरे साथ एक लम्बे समय तक चलेगा। अफ़सोस इस बात का भी है कि अजीत जी की मृत्यु की ख़बर न किसी राष्ट्रीय अख़्बार में छपी, और न ही किसी टीवी चैनल नें अपना 'ब्रेकिंग् न्युज़' बनाया, जो किसी बिल्ली के पानी की टंकी के उपर चढ़ जाने और फिर नीचे न उतर पाने की ख़बर को भी 'ब्रेकिंग् न्युज़' में जगह दिया करते हैं। गुजरात के अखबारों और इंटरनेट के माध्यम से उनकी मृत्यु-संवाद लोगों तक पहुंचा। दोस्तों, अजीत जी से मैं ख़ुद आपका परिचय तो नहीं करवा सका, लेकिन आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह विशेषांक उन्हीं को समर्पित कर अपने दिल का बोझ थोड़ा कम करना चाहता हूँ, जिस बोझ को मैं पिछले कुछ दिनों से अपने साथ लिए घूम रहा हूँ।

१९५७ की फ़िल्म 'चंडीपूजा' के कवि प्रदीप के लिखे और गाये गीत "कोई लाख करे चतुराई" को आप नें कई कई बार विविध भारती के 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में सुना होगा। यह अभिनेत्री शांता आप्टे की अंतिम हिंदी फ़िल्म थी। 'चंडीपूजा' के कुछ गीत लोकप्रिय हुए तो थे लेकिन उनका श्रेय प्रदीप को ज़्यादा और अजीत मर्चैण्ट को कम दिया गया। अजीत मर्चैण्ट उसी बिल्डिंग् में रहते थे जिसमें गायक मुकेश भी रहते थे। लेकिन मुकेश नें जहाँ सफलता के नभ चूमें, अजीत जी की झोली ख़ाली ही रही। एक से एक सुरीली धुन देने वाले अजीतभाई एक कमचर्चित संगीतकार के रूप में ही जाने गये और आज की पीढ़ी नें तो शायद उनका नाम भी नहीं सुना होगा। पर गुज़रे ज़माने के संगीत रसिक अजीत मर्चैण्ट का नाम सम्मान के साथ लेते हैं।

अजीत मर्चैण्ट एक गुजराती फ़िल्म संगीतकार के रूप में ज़्यादा जाने गये और उन्हें शोहरत भी गुजराती फ़िल्मों से ही प्राप्त हुई। १९५० की गुजराती फ़िल्म 'दीवादांडी' में दिलीप ढोलकिया के गाये लोकप्रिय भजन "तारी आँखनो अफ़ीनी" के संगीतकार के रूप में अजीत मर्चैण्ट हमेशा याद किए जायेंगे। ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह को पहला मौका अजीत मर्चैण्ट नें ही दिया था। गुजराती में "लागी राम भजन" को जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनना भी एक अनोखा अनुभव है। अभी कुछ साल पहले, जगजीत सिंह पर एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था 'माइ लाइफ़ माइ स्टोरी'। उसमें जगजीत जी नें अपने भाषण में कहा था, "जब मैं संघर्ष कर रहा था, एक गुजराती भाई नें अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया था"। जज़्बाती जगजीत सिंह नें फिर ज़ोर से आवाज़ लगाई, "आप कहाँ पर हो अजीत भाई?" अजीत जी बिल्कुल पीछे की तरफ़ बैठे हुए थे। जगजीत साहब नें दोबारा आवाज़ दी, "आप कहाँ पर हो अजीत भाई?" जब अजीत जी नें अपना हाथ उपर किया, तब जगजीत सिंह ख़ुद मंच से उतरकर अजीत भाई के पास गये और उनसे गले मिले। दोनों के ही आँखों में आँसू थे।

दोस्तों, मेरा वही मित्र रामास्वामी एक बार अजीत मर्चैण्ट से जाकर मिला। मौका था एक नये म्युज़िक क्लब 'गीत-गुंजन' का गठन, जिसमें अजीत जी को बतौर मुख्य अतिथि निमंत्रित किया गया था। स्थान था गुजराती सेवा मंडल, माटुंगा, मुंबई। उस कार्यक्रम में अजीत जी को संबोधित करते हुए प्रकाश पुरंदरे नें यह जानकारी दी कि अजीत मर्चैण्ट नें हिंदी और गुजराती मिलाकर कुल ४५ फ़िल्मों में संगीत दिया है, और बहुत सारे ड्रामा में भी संगीत दिया है, जिसकी संख्या २५० से उपर है। एक दिलचस्प बात जिसका ज़िक्र प्रकाश जी नें किया, वह यह कि कवि प्रदीप नें "ऐ मेरे वतन के लोगों" अजीत जी के ही घर पर लिखा था। उस जल्से में अजीत मर्चैण्ट के स्वरबद्ध २० गीत सुनवाये गये जिसका सुभाष भट्ट नें संकलन किया था। ये रहे वो २० गीत। इस लिस्ट के ज़रिए आइए आज हम भी यादें ताज़ा कर लें अजीत जी के सुरीले गीतों का।

१. तारी आँखेनो अफ़ीनी (दीवादांडी - गुजराती), गायक- दिलीप ढोलकिया, गीत- बाल मुकुंद दवे
२. वगदवच्चे तलावाडी ने (दीवादांडी - गुजराती), गायक- दिलीप ढोलकिया, रोहिणी रॊय, गीत- बाल मुकुंद दवे
३. पंछी गाने लगे: भाग-१ (इंद्रलीला, १९५६), गायक- मोहम्मद रफ़ी, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
४. पंछी गाने लगे: भाग-२ (इंद्रलीला, १९५६), गायक- मोहम्मद रफ़ी, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
५. पर्वत हट जा धरती फट जा (इंद्रलीला, १९५६), गायक- आशा भोसले, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
६. सुन लो जिया की बात (इंद्रलीला, १९५६), गायक- आशा भोसले, गीत- सरस्वती कुमार दीपक
७. पूरब दिसा की चंचल बदरिया (चंडीपूजा, १९५७), गायक- सुधा मल्होत्रा, साथी, गीत- कवि प्रदीप
८. अजी ओ जी कहो (चंडीपूजा, १९५७), गायक- शम्शाद बेगम, मोहम्मद रफ़ी, गीत- कवि प्रदीप
९. सुनो सुनाओ तुम एक कहानी (चंडीपूजा, १९५७), गायक व गीत- कवि प्रदीप
१०. कोई लाख करे चतुराई (चंडीपूजा, १९५७), गायक व गीत- कवि प्रदीप
११. रूप तुम्हारा आँखों से पी लूँ (सपेरा, १९६१), गायक- मन्ना डे, गीत - इंदीवर
१२. रात नें गेसू बिखराये (सपेरा, १९६१), गायक- मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१३. मैं हूँ सपेरे तेरे जादू के देश में (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१४. बैरी छेड़ ना ऐसे राग (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१५. बोलो बोलो बोलो पिया (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत - इंदीवर
१६. ओ री पिया मोरा तड़पे जिया (सपेरा, १९६१), गायक- सुमन कल्याणपुर, गीत- इंदीवर
१७. कुछ तुमनें कहा कुछ हमनें सुना (चैलेंज, १९६४), गायक- आशा भोसले, गीत- प्रेम धवन
१८. मैं भी हूँ मजबूर सजन (चैलेंज, १९६४), गायक- मुकेश, आशा भोसले, गीत- प्रेम धवन
१९. बदले रे रंग बदले ज़माना कहीं (चैलेंज, १९६४), गायक- लता मंगेशकर, साथी, गीत- प्रेम धवन
२०. मैं हो गई रे तेरे लिए बदनाम (चैलेंज, १९६४), गायक- आशा भोसले, गीत- प्रेम धवन


अजीत मर्चैण्ट के बारे में और विस्तारित जानकारी आप पंकज राग लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' तथा योगेश जाधव लिखित किताब 'स्वर्णयुग के संगीतकार' से प्राप्त कर सकते हैं। अजीत मर्चैण्ट की प्रतिभा का मूल्यांकन हम इस बात से भी कर सकते हैं कि इस ज़मानें में कई जानेमाने संगीतकार अजीत जी से उनकी धुनें १०,००० रुपय तक में ख़रीदना चाहते थे। और इस राह में राज कपूर जैसे स्तंभ फ़िल्मकार भी पीछे नहीं थे। लेकिन अजीत जी नें कभी अपनी धुनें नहीं बेची। इससे ज़्यादा अफ़सोस की बात क्या हो सकती है संगीत के लिए। आज अजीत जी हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके स्वरबद्ध तमाम गुजराती गीत और 'इंद्रलीला', 'चंडीपूजा', 'सपेरा', 'लेडी-किलर' और 'चैलेंज' जैसी फ़िल्मों के गानें हमें उनकी याद दिलाते रहेंगे, जिन्हें सुन कर कभी हम ख़ुश होंगे और कभी यह सोच कर मन उदास भी होगा कि अजीत मर्चैण्ट तो वो सबकुछ क्यों नहीं मिल पाया जो उनके समकालीन दूसरे सफल संगीतकारों को मिला? 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार की तरफ़ से स्वर्गीय अजीत मर्चैण्ट को भावभीनी श्रद्धांजली। अब इस प्रस्तुति को समाप्त करने से पहले आइए सुनें फ़िल्म 'चण्डीपूजा' का वही मशहूर गीत "कोई लाख करे चतुराई", और इसी के साथ इस विशेष प्रस्तुति को समाप्त करने की दीजिए इजाज़त, नमस्कार!

गीत - कोई लाख करे चतुराई


आलेख - सुजॉय चट्टर्जी

सुनो कहानी: राजा - असग़र वजाहत

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में मुंशी नवल किशोर की "एक शिक्षाप्रद कहानी" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं असग़र वजाहत की लघुकथा "राजा", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस शिक्षाप्रद कहानी का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 4 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का मूल पाठ विकीस्रोत पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



रात के वक्त़ रूहें अपने बाल-बच्चों से मिलने आती हैं।
~ असगर वज़ाहत

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

‘‘अरे सुनो भाई. . .अरे इधर आना लालाजी. . .बात तो सुनो पंडितजी।’’
(असग़र वजाहत की लघुकथा "राजा" से एक अंश)


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#124th Story, Aag: Asghar Wajahta/Hindi Audio Book/2011/7. Voice: Anurag Sharma

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