बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

खुशी की वो रात आ गयी..... और माहौल में गम की सदा भी घुल गयी, एल पी और मुकेश का गठबंधन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 509/2010/209

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! इन दिनों इस स्तंभ में आप सुन रहे हैं फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के स्वरबद्ध गीतों से सजी लघु शृंखला 'एक प्यार का नग़मा है'। आज इस शृंखला की नौवी कड़ी में हम चुन लाये हैं मुकेश की आवाज़ में फ़िल्म 'धरती कहे पुकार के' का एक ऐसा गीत जिसमें है विरोधाभास। विरोधाभास इसलिए कि गीत के बोलों में तो ख़ुशी की बात की जा रही है, लेकिन गायकी के अदाज़ में करुण रस का संचार हो रहा है। "ख़ुशी की वह रात आ गयी, कोई गीत जगने दो, गाओ रे झूम झूम"। इस तरह के गीतों का हिंदी फ़िल्मों में कई कई बार प्रयोग हुआ है। सिचुएशन कुछ इस तरह की होती है कि नायिका की शादी नायक के बजाय किसी और से हो रही होती है, और शादी के उस जलसे में नायक नायिका को शुभकामनाएँ देते हुए गीत गाता तो है, लेकिन उस गीत में छुपा होता है उसके दिल का दर्द। कुछ ऐसे ही गीतों की याद दिलाएँ आपको? फ़िल्म 'पारसमणि' का गीत "सलामत रहो, सलामत रहो", फ़िल्म 'मिलन' में मुकेश का ही गाया हुआ कुछ इसी तरह का एक गीत "मुबारक़ हो सब को समा ये सुहाना, मैं ख़ुश हूँ मेरे आँसुओं पे ना जाना, मैं तो दीवाना दीवाना दीवाना", और फिर किशोर दा ने भी तो फ़िल्म 'एक बार मुस्कुरा दो' में नय्यर साहब के कम्पोज़िशन में गाया था "रूप तेरा ऐसा दर्पण में ना समाये... पलक बंद कर लूँ कहीं छलक ही ना जाये"। फ़िल्म 'धरती कहे पुकार के' के प्रस्तुत गीत को लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने, और एल. पी ने क्या ग़ज़ब का संगीत संयोजन किया है। दिल को छू लेने वाले विदाई के सुर में सजे शहनाई के करुण पीसेस और उस पर ढोलक के ठेके, गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे किसी की शादी की महफ़िल में ही हम शरीक हो गये हों। गाने का जो रीदम है, उसमें एल.पी की ख़ास शैली और स्टाइल सुनने को मिलता है। दोस्तों, हमने पहले भी शायद कभी कहा होगा कि एल.पी, कल्याणजी-आनंदजी और आर.डी. बर्मन, इन तीनों के स्वरबद्ध गीतों में हम फ़रक कर सकते हैं उनके रीदम पैटर्ण को समझ कर। इस गीत का जो रीदम पैटर्ण है, वो ख़ास ख़ास एल.पी का स्टाइल है, यह कहने की नहीं बल्कि महसूस करने की बात है। राग यमन की छाया लिए इस गीत में मुकेश जी ने भी क्या दर्द डाला है कि जैसे गीत उनकी आवाज़ पा कर जी उठा हो।

'धरती कहे पुकार के' सन् १९६९ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था दीनानाथ शास्त्री ने। दुलाल गुहा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे जीतेन्द्र, नंदा, संजीव कुमार, निबेदिता, कन्हैयालाल, दुर्गा खोटे आदि। ध्वनि विभाग में थे रॊबिन चटर्जी जो एक मशहूर रेकॊर्डिस्ट रहे हैं। अनगिनत फ़िल्मों के गीत और बैकग्राउण्ड म्युज़िक उन्होंने रेकॊर्ड किये हैं एक लम्बे अरसे तक। उनकी पहली फ़िल्म बतौर सॊंग् रेकॊर्डिस्ट थी १९५१ की 'बाज़ी', और आख़िरी फ़िल्म थी १९९१ की 'पत्थर'। भले ही उनका नाम बतौर रेकॊर्डिस्ट ज़्यादा हुआ, उन्होंने ४० के दशक के कई बांगला फ़िल्मों में संगीत भी दिया है। ख़ैर, वापस आते हैं लक्ष्मी-प्यारे पर। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला के उस इंटरव्यु में जब कमल शर्मा ने प्यारेलाल जी से यह पूछा कि "मेल सिंगर्स की बात करें तो मुकेश जी ने भी आप के लिये...", उन्होंने बस इतना ही कहा था कि प्यारेलाल जी कह उठे - "देखिये, 'एम' लेटर जो है ना, ये सब सिंगर्स के लिए दिया गया है। आप किसी भी सिंगर का नाम लीजिए, लता मंगेशकर लीजिए, आशा मंगेशकर लीजिए, मोहम्मद रफ़ी हैं, महेन्द्र कपूर हैं, मुकेश हैं, तलत महमूद हैं। तो 'एम' लेटर जो है, इनका मध्यम जो है वह 'प्योर' है। और म्युज़िक भी जुड़ा हुआ है, 'म्युज़िक' में भी 'एम' है। वही बता रहा हूँ, मध्यम, मैं बहुत मानता हूँ इन सब चीज़ों को। ल ता मं गे श क र, कितने हो गये, सात, यानी सात सुर" दोस्तों, प्यारेलाल जी तो मुकेश से लता जी पर आ गये। ख़ैर कोई बात नहीं, जब यह बात आ ही गयी है तो यहाँ आपको यह बता दें कि कल के गीत में आप मुकेश और लता, दोनों की आवाज़ें सुन पायेंगे। लेकिन फिलहाल आइए मुकेश जी की एकल आवाज़ में सुनते हैं "ख़ुशी की वह रात गयी"। बेहद ख़ूबसूरत गीत है और शायद आपका मनपसंद भी, है न?



क्या आप जानते हैं...
कि लक्ष्मीकांत की मई, १९९८ में जब मृत्यु हो गई उस समय एल.पी की जोड़ी गिरीश कर्नाड की 'स्वराजनामा' और 'आम्रपाली' जैसी फ़िल्मों के लिए काम कर रहे थे, लेकिन यह काम अधुरा ही रह गया। लक्ष्मीकांत की मृत्यु के बाद प्यारेलाल ने भी संगीत देने का काम छोड़ दिया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09 /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के प्रिल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - किसी अतिरिक्त सूत्र की जरुरत नहीं है इस गीत को पहचानने के लिए, फिर भी बता दें कि लता मुकेश के स्वरों में है ये

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - इस मशहूर फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीत के ऒरकेस्ट्रेशन में उस साज़ का प्रॊमिनेण्ट इस्तेमाल हुआ है जिस साज़ में प्यारेलाल को महारथ हासिल है। साज बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने इस शृंखला के लिए अजय बढ़त बना ली है अब, बहुत बधाई....अमित जी और गुड्डू जी को भी...शरद जी कहाँ हैं इन दिनों

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में.. मादर-ए-वतन से दूर होने के ज़फ़र के दर्द को हबीब की आवाज़ ने कुछ यूँ उभारा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०१

पूरे एक महीने की छुट्टी के बाद मैं वापस आ गया हूँ महफ़िल-ए-ग़ज़ल की अगली कड़ी लेकर। यह छुट्टी वैसे तो एक हफ़्ते की हीं होनी थी, लेकिन कुछ ज्यादा हीं लंबी खींच गई। दर-असल मेरे साथ वही हुआ जो इन महाशय के साथ हुआ था जिन्होंने "कल करे सो आज कर" का नवीनीकरण किया है कुछ इस तरह से:

आज करे सो कल कर, कल करे सो परसो,
इतनी जल्दी क्या है भाई, जीना है अभी बरसों।

तो आप समझ गए ना? हर बुधवार को मैं यही सोचता था कि भाई पूरे सौ अंकों के बाद जाकर मुझे आराम करने का यह मौका नसीब हुआ है, तो इसे ज़ाया क्यों गंवाया जाए, चलो आज भी महफ़िल से नदारद हो लेता हूँ। यही सोचते-सोचते ४ हफ़्ते निकल गए। फिर जब इस बार बुधवार नजदीक आया तो विश्राम करने के विचार के साथ-साथ अपराध-बोध भी अपना सर उठाने लगा। अपराधबोध का मंतव्य था कि भाई तुमने तो सभी पाठकों से यह वादा किया था कि एक हफ़्ते में वापस आ जाओगे, फिर ये वादाखिलाफ़ी क्यों? अपराधबोध कम होता, अगर मेरे सामने सुजॉय जी का उदाहरण न होता। एक मैं हूँ जो सप्ताह में एक आलेख लिखता हूँ और अभी तक उन आलेखों की संख्या १०० तक हीं पहुँची है और एक ये हुज़ूर हैं जो हरदिन लिखते हैं और अभी तक ५०० कड़ियाँ लिख चुके हैं, फिर भी अगर इन्हें छुट्टी पर घर जाना होता है तो पहले से हीं उतने आलेख लिखकर सजीव जी को थमा जाते हैं, ताकि "ओल्ड इज गोल्ड" सटीक समय पर हर दिन आए, ताकि नियम की अवहेलना न हो पाए। ये तो कभी आराम नहीं करते, फिर मैं क्यों आराम के पीछे भाग रहा हूँ। चाचा नेहरू भी कह गए हैं कि आराम हराम है। इस अपराधबोध का आना था कि मैने विश्राम करने के प्रबलतम विचार को एक एंड़ी मारी और बढ निकला आज की कड़ी की ओर। तो चलिए आज से आपकी महफ़िल-ए-ग़ज़ल फिर से सजने वाली है.. हर बुधवार, बिना रूके...वैसे हीं मज़ेदार अंदाज़ में।

आज की महफ़िल में हम जो ग़ज़ल लेकर हाज़िर हैं, उस ग़ज़ल का ज़िक्र हमने आज से पूरे ९ महीने पहले "गजरा बना के ले आ... एक मखमली नज़्म के बहाने अफ़शां और हबीब की जुगलबंदी" शीर्षक से प्रकाशित आलेख में किया था। "गजरा बना के.." को जिस गुलुकार ने अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया था, वही गुलुकार, वही फ़नकार आज की ग़ज़ल में अपनी आवाज़ के जरिये मौजूद है। बस फ़र्क इतना है कि उस ग़ज़ल/नज़्म के ग़ज़लगो और आज के ग़ज़लगो दो मुक्तलिफ़ इंसान हैं। उस कड़ी में हमने कहा तो यह था कि हबीब साहब जल्द हीं ग़ालिब की एक ग़ज़ल के साथ हाज़िर हो रहे हैं.. लेकिन सच ये है कि हम जिस ग़ज़ल की बात कर रहे थे, वह ग़ालिब की नहीं है, बल्कि मुगलिया सल्तनत के अंतिम बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की है। हमने जल्दबाजी में ज़फ़र की ग़ज़ल ग़ालिब के हवाले कर दी थी.. हम उस गलती के लिए आपसे अभी माफ़ी माँगते हैं।

ये तो सभी जानते हैं कि १८५७ के गदर के वक़्त ज़फ़र ने अपने किले बागियों के लिए खोल दिए थे। इस गुस्ताखी की उन्हें यह सज़ा मिली की उनके दो बेटों और एक पोते को मौत के घाट उतार दिया गया.. बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया। अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। ८२ साल के उस बूढे पर उस वक़्त क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा लगाना भी नामुमकिन है। क्या ये कम था कि अंग्रेजों ने ज़फ़र को कैद करके दिल्ली से बाहर .. दिल्ली हीं नहीं उनकी सरज़मीं हिन्दुस्तान के बाहर बर्मा(आज का मयन्मार) भेज दिया.. कालापानी के तौर पर। ज़फ़र अपनी मौत के अंतिम दिन तक अपनी सरज़मों को वापस आने के लिए तड़पते रहे। उन्हें अपनी मौत का कोई गिला न था, उन्हें गिला..उन्हें अफसोस तो इस बात का था कि मरने के बाद जो मिट्टी उनके सीने पर डाली जायगी, वह मिट्टी पराई होगी। वे अपने कू-ए-यार में, अपने मादर-ए-वतन की गोद में दफ़न होना चाहते थे, लेकिन ऐसा न हुआ। बर्मा की गुमनाम गलियों में घुट-घुटकर मरने के बाद उन्हीं अजनबी पौधों और परिंदों के बीच सुपूर्द-ए-खाक होना उनके नसीब में था। ७ नवंबर १८६२ को उनकी मौत के बाद उन्हें वहीं रंगून (आज का यंगुन) में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफ़ना दिया गया। वह जगह बहादुर शाह ज़फ़र दरगाह के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। शायद ज़फ़र को अपनी मौत का पूर्वाभास हो चुका था, तभी तो इस ग़ज़ल के एक-एक हर्फ़ में उनका दर्द मुखर होकर हमारे सामने आता है:

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो _____ में कट गये दो इन्तज़ार में

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में


यह ग़ज़ल पढने वक़्त जितना असर करती है, उससे हज़ार गुणा असर तब होता है, जब इसे हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में सुना जाए। तो लीजिए पेश है हबीब साहब की यह पेशकश:


हाँ तो बात ज़फ़र की हो रही थी, तो आज भी हमारे हिन्दुस्तान में ऐसे कई सारे मुहिम चल रहे हैं, जिनके माध्यम से ज़फ़र की आखिरी मिट्टी, ज़फ़र के कब्र को हिन्दुस्तान लाए जाने के लिए सरकार पर दबाव डाला जा रहा है। हम भी यही दुआ करते हैं कि सरकार जगे और उसे इस बात का बोध हो कि स्वतंत्रता-सेनानियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। आज़ादी की लड़ाई में आगे रहने वाले धुरंधरों और रणबांकुरों को इस तरह से नज़र-अंदाज़ किया जाना सही नहीं।

ज़फ़र उस वक़्त के शायर हैं जब ग़ालिब, ज़ौक़ और मोमिन जैसे शायर अपनी काबिलियत से सबके बीच लोहा मनवा रहे थे। ऐसे में भी ज़फ़र ने अपनी खासी पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की। (और क्यों न करते, जब ये तीनों शायर इन्हीं के राज-दरबार में बैठकर अपनी शायरी सुनाया करते थे.. जब ज़ौक़ ज़फ़र के उस्ताद थे और ज़ौक़ की असमय मौत के बाद ग़ालिब ज़फ़र के साहबजादे के उस्ताद बने) ज़फ़र किस हद तक शेर कह जाते थे, यह जानने के लिए उनकी इस ग़ज़ल पर नज़र दौड़ाना जरूरी हो जाता है:

या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता

ख़ाकसारी के लिये गरचे बनाया था मुझे
काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ न बनाया होता

नशा-ए-इश्क़ का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने
क्यों ख़िरद्मन्द बनाया न बनाया होता

शोला-ए-हुस्न चमन् में न दिखाया उस ने
वरना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता

रोज़-ए-ममूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता


चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "अनमोल" और शेर कुछ यूँ था-

याद थे मुझको जो पैगाम-ए-जुबानी की तरह,
मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

रिश्तों के पुल
मिलाते रहे
स्वार्थ के तटों को
और
अनमोल भावना की
नदी
बहती रही
नीचे से होकर
अछूती सी !! (अवनींद्र जी)

आँसू आँखों में छिपे होते हैं गम दिखाये नहीं जाते
बड़े अनमोल होते हैं वो लोग जो भुलाये नहीं जाते. (शन्नो जी)

ग़ज़ल की महफ़िल का अनमोल तोहफा तुमने दिया
बधाई हो सौवां अंक जो तुमने पूरा किया (नीलम जी)

अनमोल शतक की दे रही बधाई ,
'विश्व 'ने खुशियों की शहनाई बजाई . (मंजु जी)

बेशक हो मुश्किल भरी वो डगर,
मगर था 'अनमोल' ग़ज़ल का सफर (अवध जी)

जब तक बिके ना थे कोई पूछता ना था,
तूने मुझे खरीद कर अनमोल कर दिया। (अनाम)

चूँकि पिछली महफ़िल में हमने शतक पूरा किया था, इसलिए हमारे सभी शुभचिंतकों और मित्रों से हमें शुभकामनाएँ प्राप्त हुईं। हम आप सभी का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। पिछली महफ़िल में सबसे पहले शन्नो जी का आना हुआ और आपने हमें हमारी भूल (शब्द गायब न करना) से अवगत कराया। शिकायत करने में काहे की मुश्किल.. आगे से ऐसे कभी भी किंकर्तव्यविमूढ न होईयेगा। समझीं ना? :) आपके बाद सजीव जी ने हमें बधाईयाँ दीं। सजीव जी, सब कुछ तो आपके कारण हीं संभव हो सका है। आपसे प्रोत्साहन पाकर हीं तो मैं महफ़िल-ए-ग़ज़ल की दूसरी पारी लेकर हाज़िर हो पाया हूँ। अवनींद्र जी, आपने महफ़िल की पहली नज़्म कही, लेकिन चूँकि शब्द गायब करने में मुझसे देर हो गई थी, इसलिए "शान-ए-महफ़िल" की पदवी मैं आपको दे नहीं पाऊँगा.. मुझे मुआफ़ कीजिएगा। नीलम जी, आपके बधाई-पत्र की अंतिम पंक्ति (अब क्यों कोई करे कोई शिकवा न गिला) मैं समझ नहीं पाया, ज़रा प्रकाश डालियेगा। :) सुजॉय जी, आप मुझे यूँ लज्जित न कीजिए। आप ५०० एपिसोड तक पहुँच चुके हैं और जिस तरह की आप जानकारियाँ देते हैं, वह अंतर्जाल पर कहीं नहीं है, इसलिए आपका यह कहना कि फिल्मी गानों के बारे में जानकारी लाना आसान होता है.. आपकी बड़प्पन का परिचय देता है। पूजा जी, आपने कुछ दिन विश्राम करने को कहा था और मैंने महिने भर विश्राम कर लिया। आप नाराज़ तो नहीं हैं ना? :) चलिए अब आप फिर से नियमित हो जाईये, क्योंकि मैं भी नियमित होने जा रहा हूँ। मंजु जी और अवध जी, आपके "अनमोल" शब्द मेरी सर-आँखों पर.. प्रतीक जी, क्षमा कीजिएगा मैंने आपकी आग्रह के बावजूद महफ़िल को महिने भर का विराम दे दिया, आगे से ऐसा न होगा। :) सुमित भाई, महफ़िल आ गई फिर से, अब आप भी आ जाईये..

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

रोज शाम आती थी, मगर ऐसी न थी.....जब शाम के रंग में हो एल पी के मधुर धुनों की मिठास, तो क्यों न बने हर शाम खास

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 508/2010/208

क्ष्मीकांत-प्यारेलाल के धुनों से सजी लघु शंखला 'एक प्यार का नग़मा है' में आज एक और आकर्षक गीत की बारी। लेकिन इस गीत का ज़िक्र करने से पहले आइए आज आपको एल.पी के बतौर स्वतंत्र संगीतकार शुरु शुरु के फ़िल्मों के बारे में बताया जाए। स्वतंत्र रूप से पहली बार 'तुमसे प्यार हो गया', 'पिया लोग क्या कहेंगे', और 'छैला बाबू' में संगीत देने का उन्हें मौका मिला था। 'तुमसे प्यार हो गया' और 'छैला बाबू' दोनों के लिए चार-चार गाने भी रेकॊर्ड हो गये पर 'तुमसे प्यार हो गया' के निर्माता ही भाग निकले और 'छैला बाबू' रुक गई, जो कुछ वर्षों बाद जाकर पूरी हुई। 'सिंदबाद' के लिए भी रेकॊर्डिंग् हुई पर फ़िल्म पूरी न हो सकी। 'तुमसे प्यार हो गया' के लिए उनकी पहली रेकॊर्डिंग् "कल रात एक सपना देखा" (लता, सुबीर सेन) तो आज तक विलुप्त ही है, पर 'पिया लोग क्या कहेंगे' के इसी मुखड़े के लता के गाये शीर्षक गीत की धुन उन्होंने आगे जाकर 'दोस्ती' के "चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे" में इस्तेमाल कर लिया। इसी बीच बाबूभाई मिस्त्री की 'पारसमणि' जैसी सी-ग्रेड फ़ैंटसी फ़िल्म मिली। युं तो 'पारसमणि' एक फ़ैण्टसी फ़िल्म थी और बैनर भी बड़ा बड़ा नहीं था, पर इस सी-ग्रेड फ़िल्म का भी हर गाना सुपरहिट करा कर लक्ष्मी-प्यारे ने उन तमाम संगीतकारों को सीधी चुनौती दे दी जो अपनी असफलता का कारण बड़े बैनर और बड़े स्टार्स की फ़िल्म में अवसर न मिलना बताते थे। 'पारसमणि' के बाद एल.पी ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक ऐसा सुरीला तूफ़ान उठाया फ़िल्म संगीत जगत में, जो आज तक नहीं रुक पाया है। आइए अब वापस आते हैं आज के गाने पर। आज आपको सुनवा रहे हैं मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और लता मंगेशकर का गाया फ़िल्म 'इम्तिहान' का गीत "रोज़ शाम आती थी मगर ऐसी ना थी, रोज़ रोज़ घटा छाती थी मगर ऐसी ना थी, ये आज मेरी ज़िंदगी में कौन आ गया"।

'इम्तिहान' साल १९७४ की फ़िल्म थी जिसे आज याद किया जाता है "रुक जाना नहीं तू कहीं हार के" गीत की वजह से। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे विनोद खन्ना और तनुजा, और इसकी कहानी भी और दूसरी फ़िल्मों से अलग हट कर थी। आज तो विविध विषयों पर फ़िल्मे बन रही हैं और लोग उन्हें सफल भी बना रहे हैं, लेकिन उस ज़माने मे इन "अलग हट के" फ़िल्मों का अंजाम बहुत ज़्यादा सुखद नहीं होता था व्यावसायिक रूप से। विनोद खन्ना शायद पहली बार इसमें नायक की भूमिका में नज़र आये थे। इससे पहले वो ज़्यादा खलनायक के चरित्रों मे ही नज़र आये थे। ख़ैर, इस फ़िल्म में लता जी का गाया "रोज़ शाम आती थी" गीत एक नया प्रयोग था। दोस्तों, ये सच है कि लक्ष्मी-प्यारे ने सब से ज़्यादा गीत लता जी से गवाये, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इतने सारे गानें होने के बावजूद भी हर गाना दूसरे से अलग कम्पोज़ किया। आप लता - एल.पी कम्बिनेशन के कोई भी दो गीत ले लीजिए, आपको कभी कोई समानता नज़र नहीं आयेगी। आज के प्रस्तुत गीत को एल.पी ने लता से बेहद ऊँची पट्टी पर गवाया और एक नई बेहद आकर्षक आधुनिक शैली में कम्पोज़ किया। ऒर्केस्ट्रा की बात करें तो फ़्रेंच हॊर्ण और ईरानियन संतूर का किस ख़ूबसूरती से ब्लेण्डिंग् की गयी है लता जी के उस ऊँची पट्टी वाले जगहों पर। फ़िल्मांकन की बात करें तो क्योंकि शाम का गीत है, इसलिए एक गुलाबी और नारंगी रंग के फ़िल्टर के इस्तेमाल से सूर्यास्त का रंग लाया गया है। उन दिनों इसी तरह से अलग रंगों के फ़िल्टर के माध्यम से शाम, रात और सुबह के रंग लाये जाते थे। और आख़िर में मजरूह साहब के लेखन की बात करें तो मुझे तो गीत का दूसरा अंतरा बहुत ही अच्छा लगता है कि "अरमानों का रंग है जहाँ पलकें उठाती हूँ मैं, हँस हँस के हैं देखती जो भी मूरत बनाती हूँ मैं"। हमें पूरी उम्मीद है कि यह गीत आपका भी फ़ेवरीट होगा, तो आप अपनी पसंद के साथ साथ मेरी पसंद भी शामिल कर लीजिए, क्योंकि यह गीत मेरा भी पसंदीदा गीत रहा है। आइए सुनते हैं...



क्या आप जानते हैं...
कि 'झूम बराबर झूम' फ़िल्म के गीत "बोल ना हल्के हल्के" के लिए पहले लता मंगेशकर को चुना गया था। लेकिन ऊँची पट्टी पर ना गा पाने की वजह से लता जी ने ही यह गीत गाने से मना कर दिया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०७ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के लंबे प्रिल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - एक अंतरे में शब्द है -"बसंती"

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - इस फिल्म का शीर्षक बिमल रॉय की एक मशहूर फिल्म के गीत की पहली पंक्ति से लिया गया है नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी अब १० अंकों पर आ चुके हैं, बहुत बधाई. अमित जी और बिट्टू जी भी सही जवाब लेकर हाज़िर हुए. पहली बार शंकर लाल जी ने सही जवाब दिया मगर जरा देर से, अंक तो नहीं मिलेंगें, पर हमारी शाबाशी जरूर मिलेगी आपको. अवध जी सही जानकारी दी आपने. रोमेंद्र जी आप शाम ६.३० भारतीय समयानुसार अगर आवाज़ पर आते है तो आप भी पहले जवाब दे पायेंगें, मेल का इन्तेज़ार मत करते रहा कीजिये. अरे वाह इंदु जी, चलिए अब एक और प्रतिभागी हमारा तैयार हो गया...अब शरद जी और श्याम जी के लिए मुकाबला तगड़ा होगा. हमारी कनाडा टीम इन दिनों नदारद है, कोई खबर तो दीजिए

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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