सोमवार, 22 मार्च 2010

एक था गुल और एक थी बुलबुल...एक मधुर प्रेम कहानी आनंद बक्षी की जुबानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 381/2010/81

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी सुननेवालों व पाठकों का हम फिर एक बार इस महफ़िल में हार्दिक स्वागत करते हैं। दोस्तों, इन दिनों आप जम कर आनंद ले रहे होंगे IPL Cricket matches के सीज़न का। अपने अपने शहर के टीम को सपोर्ट भी कर रहे होंगे। क्रिकेट खिलाड़ियो की बात करें तो उनमें से कुछ बल्लेबाज़ हैं, कुछ गेंदबाज़, और कुछ हैं ऐसे जिन्हे हम 'ऒल राउंडर' कहते हैं। यानी कि जो क्रिकेट के मैदान पर दोनों विधाओं में पारंगत है, गेंदबाज़ी मे भी और बल्लेबाज़ी में भी। कुछ इसी तरह से फ़िल्म संगीत के मैदान में भी कई खिलाड़ी ऐसे हुए हैं, जो अपने अपने क्षेत्र के 'ऒल-राउंडर' रहे हैं। ये वो खिलाड़ी हैं जो ज़रूरत के मुताबिक़, बदलते वक़्त के मुताबिक़, तथा व्यावसायिक्ता के साथ साथ अपने स्तर को गिराए बिना एक लम्बी पारी खेली हैं। ऐसे 'ऒलराउंडर' खिलाड़ियों में एक नाम आता है गीतकार आनंद बक्शी का। जी हाँ, आनंद बक्शी साहब, जिन्होने फ़िल्मी गीत लेखन में एक नई क्रांति ही ला दी थी। बक्शी साहब को फ़िल्मी गीतों का 'ऒल-राउंडर' कहना किसी भी तरह की अतिशयोक्ति नहीं है। ज़िंदगी की ज़ुबान का इस्तेमाल करते हुए उन्होने अपने गीतों को सरल, सुंदर और कर्णप्रिय बनाया। उनके गीतों की अपार सफलता और लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है। थोड़े बहुत हल्के फुल्के काव्यों का और अधिक से अधिक आम बोलचाल वाली भाषा का इस्तेमाल उनके गीतों की खासियत रही है। उनके लिखे लोकप्रिय गीतों की अगर हम फ़ेहरिस्त बनाने बैठे तो पता नहीं कितने महीने गुज़र जाएँगे। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अंतर्गत हम यहाँ एक छोटी सी कोशिश कर रहे हैं बक्शी साहब के लिखे १० बेहद सुंदर गीतों को आप के साथ बाँटने की। यूँ तो ये गानें इतने ज़्यादा लोकप्रिय हैं कि आप ने बहुत बहुत बार इन्हे सुने होंगे और आज भी बजते ही रहते हैं, लेकिन हम आशा करते हैं कि बक्शी साहब को समर्पित इस लघु शृंखला के अंतर्गत इन्हे फिर एक बार सुनने का कुछ और ही मज़ा आपको आएगा। तो प्रस्तुत है आज से लेकर अगले दस दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर लघु शृंखला 'मैं शायर तो नहीं'।

आनंद बक्शी का जन्म रावलपिण्डी में २१ जुलाई १९३० में हुआ था जो कि अब पाक़िस्तान में है। बचपन से ही बड़ा आदमी बनने का उनका सपना था। फ़िल्में देखने का उन्हे बहुत शौक था। अपने सपनों को साकार करने के लिए वे घर से भाग गए और नौसेना में भर्ती हो गए। कुछ ही दिनों में वहाँ सैनिक विद्रोह के कारण नौकरी से हाथ धोना पड़ा। देश विभाजन के बाद वे लखनऊ अपने परिवार के पास आ गए और टेलीफोन ओपरेटर की नौकरी में लग गए। वहाँ पे उनका मन नहीं लगा और वे सीधे बम्बई आ पहुँचे। पर वहाँ उनको किसी ने भाव नहीं दिया। कई दिनों तक संघर्ष करने के बाद उनकी मुलाक़ात हुई अभिनेता भगवान दादा से जिन्होने उन्हे अपनी १९५८ की फ़िल्म 'बड़ा आदमी' में पहली बार गीत लिखने का मौका दिलवा दिया। इस फ़िल्म में गीत लिख कर वो बड़े तो नहीं बने पर उस राह पर चल ज़रूर पड़े। १९६२ में फ़िल्म आई 'मेहंदी लगी मेरे हाथ'। इस फ़िल्म के गानें भी पसंद किए गए, लेकिन बहुत ज़्यादा लोगों को पता नहीं चल पाया कि ये गानें लिखे किसने थे। कुछ साल बाद १९६५ में उन्होने लिखे फ़िल्म 'जब जब फूल खिले' के गानें जिनकी लोकप्रियता ने उन्हे रातों रात शीर्ष के गीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। और इसके बाद आनंद बक्शी फिर कभी ज़िंदगी में पीछे मुड़ कर नहीं देखे। तो दोस्तों, ऐसे में बेहद ज़रूरी बन जाता है हमारे लिए भी कि बक्शी साहब पर केन्द्रित इस शृंखला का पहला गीत 'जब जब फूल खिले' फ़िल्म से बजाने की। इस फ़िल्म की अपार सफलता के पीछे इसके गीत संगीत का एक बेहद मह्त्वपूर्ण हाथ रहा है, इस बात को कोई झुठला नहीं सकता। चाहे "परदेसियों से ना अखियाँ मिलाना" हो या "ये समा, समा है ये प्यार का", या फिर "अफ़्फ़ु ख़ुदाया", "यहाँ मैं अजनबी हूँ", या फिर वह सदाबहार रफ़ी-सुमन डुएट "ना ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे"। और इस फ़िल्म में एक और गीत भी था जो इन सब से बिल्कुल अलग था। गीत क्या साहब, यह एक कहानी थी गुल और बुलबुल की जिसे बक्शी साहब ने लिखा और मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया। साथ में फ़िल्म की नायिका नंदा की भी आवाज़ शामिल थी संवाद के तौर पर। आज के लिए हमने इसी गीत को चुना है। इस अनोखे गीत का ज़िक्र इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है कि उस वक़्त बक्शी साहब नए नए आए थे और एक नए गीतकार की तरफ़ से इस तरह का बिल्कुल ही अलग क़िस्म का गीत वाक़ई आश्चर्य की बात थी। तो लीजिए दोस्तों, गुल और बुलबुल की कहानी का आप भी आनंद उठाइए। कल्यानजी-आनंदजी का संगीत है, गीत फ़िल्माया गया है शशि कपूर और नंदा पर।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने करीब ४५०० फ़िल्मी गीत लिखे, ४० बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए नामांकित हुए, और ४ बार उन्होने यह पुरस्कार जीता। इन सभी ४० गीतों की फ़ेहरिस्त आगे चलकर इस शृंखला में हम आपको देंगे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"रामा"-३ अंक.
2. इस फिल्म के लिए मुख्या अभिनेत्री और सह अभिनेत्री दोनों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिले, दोनों के नाम बताएं- २ अंक.
3. कौन हैं इस मधुर गीत के संगीतकार -२ अंक.
4. इस युगल गीत में लता जी के साथ किस गायक की आवाज़ है -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी भी ५० के आंकडे पर आ चुकी हैं, पर अभी भी शरद जी २० अंकों से आगे हैं. पाबला जी, स्वागत है आपका

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

तू गन्दी अच्छी लगती है....दिबाकर, स्नेह खनवलकर और कैलाश खेर का त्रिकोणीय समीकरण

ताज़ा सुर ताल १२/२०१०

सजीव - 'ताज़ा सुर ताल' में आज हम एक ऐसी फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं, जिसके शीर्षक को सुन कर शायद आप लोगों के दिल में इस फ़िल्म के बारे में ग़लत धारणा पैदा हो जाए। अगर फ़िल्म के शीर्षक से आप यह समझ बैठे कि यह एक सी-ग्रेड अश्लील फ़िल्म है, तो आपकी धारणा ग़लत होगी। जिस फ़िल्म की हम आज बात कर रहे हैं, वह है 'लव, सेक्स और धोखा', जिसे 'एल.एस.डी' भी कहा जा रहा है।

सुजॊय - सजीव, मुझे याद है जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उस वक़्त भी एक फ़िल्म आई थी 'एल.एस.डी', जिसका पूरा नाम था 'लव, सेक्स ऐण्ड ड्रग्स', लेकिन वह एक सी-ग्रेड फ़िल्म ही थी। लेकिन क्योंकि 'लव, सेक्स ऐण्ड धोखा' उस निर्देशक की फ़िल्म है जिन्होने 'खोसला का घोंसला' और 'ओए लकी लकी ओए' जैसी अवार्ड विनिंग् फ़िल्में बनाई हैं, तो ज़ाहिर सी बात है कि हमें इस फ़िल्म से बहुत कुछ उम्मीदें लगानी ही चाहिए।

सजीव - सच कहा, दिबाकर बनर्जी हैं इस फ़िल्म के निर्देशक। क्योंकि मुख्य धारा से हट कर यह एक ऒफ़बीट फ़िल्म है, तो फ़िल्म के कलाकार भी ऒफ़बीट हैं, जैसे कि अंशुमन झा, श्रुती, राज कुमार यादव, नेहा चौहान, आर्य देवदत्ता, हेरी टेंग्री और अमित सियाल। फ़िल्म में संगीत दिया है स्नेहा खनवलकर ने।

सुजॊय - सजीव, इसका मतलब महिला संगीतकरों में एक और नाम जुड़ गया है इस फ़िल्म से, जो एक बहुत ही अच्छी बात है। तो चलिए, शुरु करते हैं गीतों का सिलसिला, पहला गीत कैलाश खेर की आवाज़ में। जिस तरह से पिछले साल में "ईमोसनल अत्याचार" गीत आया था, क्या पता हो सकता है कि यह गीत इस साल वही कमाल कर दिखाए।

सजीव - यह तो वक़्त ही बताएगा, लेकिन हम इतना ज़रूर कह सकते हैं कि यह आम गीतों से अलग है। भले ही इस तरह के गीत हम गुनगुना नहीं सकते, लेकिन गीत के बोलों में सच्चाई है। इसे लिखा भी दिबाकर बनर्जी ने ही है। गीत की शुरुआत एक लड़की के चीख़ने से होती है, फिर गोलियों की आवाज़ें, और फिर गीत शुरु होता है तेज़ झंकार बीट्स के साथ। लड़की की पहले जान बचाना और फिर उसकी तसवीर उतार कर उन्हे बेचने का अपराध इस गीत के बोलों में ज़ाहिर होता है। "तस्वीर उतारूँगा, मेले में दिखाउँगा, जो देखेगा उसकी अखियाँ नचवाउँगा, हवस की तरकारी दाला गरम भुणक का छोंका..."।

सुजॉय- कुछ ऐसा जो कभी सुना नहीं आज तक हिंदी फ़िल्मी गीतों में, सुनिए

गीत: लव सेक्स और धोखा


सुजॊय - सजीव, अभी गीत से पहले आप बता रहे थे लड़की की तस्वीर उतार कर उसे बेचने की बात। तो जहाँ तक इस फ़िल्म की कहानी की बात है, यह फ़िल्म में दरअसल तीन कहानियाँ हैं। और तीनों कहानियों में जो कॊमॊन चीज़ें हैं, वो हैं लव, सेक्स और धोखा। एक और चीज़ जो इनमें कॊमॊन है, वह है कैमरा। जी हाँ, तीनों कहानियों मे किसी ना किसी तरीके से तस्वीर उतारने की घटना है। दूसरा गाना सुनने से पहले मैं इनमें से एक कहानी का पार्श्व बताना चाहूँगा। प्रभात एक जर्नलिस्ट है जो अपने करीयर को एक नई ऊँचाई तक ले जाना चाहता है। और इसके लिए वह एक स्टिंग् ऒपरेशन के ज़रिए सनसनी पैदा करने की सोचता है। वह पॊप स्टार लोकी लोकल पर स्टिंग् ऒपरेशन करता है जो उभरते मॊडेल्स को अपने विडियोज़ में काम देने के बदले उनसे शारीरिक संबंध स्थापित करता है। लेकिन इस स्टिंग् ऒपरेशन के दौरान प्रभात एक मुसीबत में फँस जाता है।

सजीव - अब है दूसरे गीत की बारी। इसे भी कैलाश खेर ने ही गाया है। यह गीत वार करता है आज के दौर में चलने वाले रीयल्टी टीवी शोज़ पर। जिस तरह से टी.आर.पी बढ़ाने के लिए अपने अपने रीयल्टी शोज़ में टीवी चैनल सनसनी के सामान जुटाने में लगे हैं, उसी तरफ़ इशारा है इस गीत का।

सुजॊय - सजीव, किसी को मैंने एक बार कहते हुए सुना था कि 'Reality TV Shows are more scripted than any other show', हो सकता है इसमें सच्चाई हो। ख़ैर, यह गीत "तैनु टीवी पे वेखिया" पंजाबी संगीत पर आधारित है, और कैलाश खेर ने "दुनिया ऊट पटांगा" और "ओए लकी लकी ओए" गीतों की तरह इसे भी लोकप्रिय रंग देने की पूरी कोशिश की है।

गीत: तैनु टीवी पे वेखिया


सजीव - सुजॊय, तुमने तीन में से पहली कहानी का ज़िक्र किया था। दूसरी कहानी जो है, उसमें एक जवान लड़का आदर्श जो जल्दी जल्दी पैसे कमा कर अमीर बनना चाहता है, चाहे इसके लिए उसे कोई भी राह इख़्तियार करनी पड़े। ऐसे में वह क्या करता है कि एक सेल्स गर्ल रश्मी के साथ एक झूठा प्रेम संबंध बनाता है। आदर्श का प्लान यह है कि वह रश्मी को बहकागा और एक कैमरे के ज़रिए दोनों के शारीरिक संबंध वाले दृश्यों को कैद कर उसे बाज़ार में बेच कर पैसे बनाएगा।

सुजॊय - यानी कि लव, सेक्स और धोखा?

सजीव - बिल्कुल! है तो आम कहानी, लेकिन देखना यह है कि दिबाकर इस आम कहानी को किस तरह से ख़ास बनाते हैं! ख़ैर, आगे बढ़ते हैं और अब सुनते हैं स्नेहा खनवलकर की ही आवाज़ में एक हिंग्लिश गीत "आइ काण्ट होल्ड इट एनी लॊंगर"। एक बेहद नए क़िस्म का गीत है जिसमें राजस्थानी लोक संगीत को अंग्रेज़ी शब्दों के साथ मिलाया गया है। चिड़ियों की अलग अलग ध्वनियों का भी ख़ूबसूरत इस्तेमाल सुनाई देता है इस गीत में। मानना पड़ेगा कि स्नेहा ने गायन और संगीत, दोनों ही में इस गीत में कमाल कर दिखाया है।

सुजॉय - सच है सजीव, इस तरह के प्रयोग के लिए संगीतकारा निश्चित ही बधाई की हक़दार हैं. मुझे ओए लकी का "तू राजा की राजदुलारी" गीत याद आ रहा है जिसको स्नेह ने बेहद मेहनत से संवारा था, और जो आज भी एक कल्ट सोंग की तरह सुना जाता है.

गीत: आइ काण्ट होल्ड इट एनी लॊंगर


सुजॊय - और अब तीसरी कहानी की बारी। राहुल एक फ़िल्म विद्यार्थी है जिसकी डिप्लोमा फ़िल्म एक तरह से गुरु दक्षिणा है उसके प्रेरना स्त्रोत आदित्य चोपड़ा की फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' को। राहुल को उसके फ़िल्म की नायिका श्रुति से प्यार हो जाता है। उनकी प्रेम कहानी भी उसी तरह से आगे बढ़ती है ठीक जिस तरह से डी.डी.एल.जे की कहानी आगे बढ़ी थी। फ़िल्मी अंदाज़ में राहुल और श्रुति मंदिर में जाकर शादी कर लेते हैं। श्रुति को यह विश्वास था कि एक बार शादी हो जाए तो उसके घरवाले उन्हे अपना लेंगे। लेकिन उसे क्या पता था कि एक उसके लिए एक भयानक धोखा इंतज़ार कर रहा है!

सजीव - इसी कहानी से संबंधित जो गीत है, वह है "मोहब्बत बॊलीवुड स्टाइल"। निहिरा जोशी और अमेय दाले की आवाज़ों में यह गीत है जिसमें वही चोपड़ा परिवार के फ़िल्म के संगीत की कुछ झलक मिलती है। यश राज फ़िल्म्स की सालों से चली आ रही रोमांस के सक्सेस फ़ॊर्मुला की तरफ़ गुदगुदाने वाले अंदाज़ से तीर फेंका गया है। यहाँ तक कि चरित्र का नाम भी राहुल रहा गया है जैसे कि अक्सर यश चोपड़ा की फ़िल्मों में हुआ करता है। कुल मिलाकर ठीक ठाक गीत है, वैसे कुछ बहुत ज़्यादा ख़ास बात भी नहीं है। कम से कम पिछले गीत वाली बात नहीं है, और ना ही यश चोपड़ा के फ़िल्मों के रोमांटिक गीतों के साथ इसकी कोई तुलना हो सकती है।

सुजॉय - हाँ पर मुझे जो बीच बीच में संवाद बोले गए हैं वो बहुत बढ़िया लगे, सुनते हैं...

गीत: मोहब्बत बॊलीवुड स्टाइल.


सुजॊय - तो सजीव, कुल मिलाकर इस फ़िल्म के बारे में जो राय बनती है, वह यही है कि यह फ़िल्म आज के युवा समाज की कुछ सच्चाइयों की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करवाना चाहती है, ख़ास कर मुंबई जैसे बड़े शहरों में जो हो रहा है। जल्दी जल्दी पैसे और शोहरत कमाने की होड़ में आज की युवा पीढ़ी अपराध की राह अख़तियार कर रहे हैं। यह फ़िल्म शायद फ़ैमिली ऒडिएन्स को थिएटरों में आकर्षित ना करें, लेकिन युवाओं को यह फ़िल्म पसंद आएगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

सजीव - चलिए अब सुना जाए आज का अंतिम गीत। कैलाश खेर की आवाज़ में एक और गीत "तू गंदी अच्छी लगती है"। गीत शब्दों से जितना बोल्ड है, उतना ही बोल्ड है कैलाश खेर की गायकी। फ़िल्म के सिचुएशन की वजह से शायद इस गीत में थोड़ी अश्लीलता की ज़रूरत थी। दोस्तों, हम नहीं कह रहे कि इस तरह के गानें हमें पसंद आने चाहिए या इनका स्वागत करना चाहिए, यह तो अपनी अपनी राय है, हमारा उद्देश्य यही है कि जिस तरह का संगीत आज बन रहा है, जिस तरह की फ़िल्में आ रही हैं, उनका ज़िक्र हम यहाँ पर करते हैं, आगे इन्हे ग्रहण करना है या एक बार सुन कर भुला देना है, यह आप पर निर्भर करता है।

सुजॊय - व्यक्तिगत पसंद की अगर बात करें तो मुझे स्नेहा की आवाज़ में "आइ काण्ट होल्ड इट" ही अच्छी लगी है, बाकी सारे सो-सो लगे। तो चलिए चलते चलते यह अंतिम गीत भी सुन लेते हैं।

सजीव - एक बात और दिबाकर ने इस फिल्म से बतौर गीतकार एक ताजगी भरे चलन की शुरूआत की है, बानगी देखिये "मैं सात जनम उपवासा हूँ और सात समुन्दर प्यासा हूँ, जी भर के तुझको पी लूँगा...." और "जो कहते हैं ये कुफ्र खता, काफ़िर है क्या उनको क्या पता..."....सुनकर देखिये..

गीत: तू गंदी अच्छी लगती है


"एल एस डी" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
जहाँ सदियाँ के संगीत में सब कुछ घिसा पिटा था, एल एस डी उसके ठीक विपरीत एक दम तारो ताज़ा संगीत श्रोताओं को पेश करता है. इंडस्ट्री की इकलौती महिला संगीतकारा स्नेह के लिए जम कर तालियाँ बजनी चाहिए, चूँकि फिल्म की विषय वस्तु काफी बोल्ड है, संगीत भी इससे अछूता नहीं रह सकता था. पारंपरिक श्रोताओं को ये सब काफी अब्सर्ड लग सकता है, पर फिर कैलाश खेर की उन्दा गायिकी और दिबाकर के बोल्ड शब्दों के नाम एक एक तारा और स्नेह के लिए २ तारों को मिलकर ४ तारों की रेटिंग है आवाज़ के टीम की एल एस डी के संगीत एल्बम को. वैसे अल्बम में आपको कैलाश के दो बोनस गीत भी सुनने को मिलेंगें....

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ३४- "कित गए हो खेवनहार", "दोस्त बन के आए हो दोस्त बन के ही रहना" तथा 'एल.एस.डी' के गीत "आइ काण्ट होल्ड इट" में क्या समानता है?

TST ट्रिविया # ३५- दिबाकर बनर्जी ने १९९८ के एक टीवी शो में बतौर 'शो पैकेजर' काम किया था। बताइए उस शो का नाम।

TST ट्रिविया # ३६- ऊपर हमने "तू राजा की" गीत का जिक्र किया था, कौन हैं इस गीत के गायक


TST ट्रिविया में अब तक -
अरे भाई कोई तो सीमा जी की चुनौती स्वीकार करें, खैर सीमा जी को एक बार फिर से बधाई

रविवार, 21 मार्च 2010

इतनी शक्ति हमें देना दाता....एक प्रार्थना जो हर दिल को सकून देती है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 380/2010/80

'१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में ये सुमधुर गानें इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी में प्रस्तुत है एक प्रार्थना गीत। १९८६ में एक फ़िल्म आई थी 'अंकुष' और इस फ़िल्म के लिए एक ऐसा प्रार्थना गीत रचा गया कि जिसे सुन कर लगता है कि किसी स्कूल का ऐंथेम है। "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो ना, हम चले नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो ना"। फ़िल्म 'गुड्डी' में "हम को मन की शक्ति देना" गीत की तरह इस गीत ने भी अपना अमिट छाप छोड़ा है। फ़िल्म तो थी ही असाधारण, लेकिन आज इसफ़िल्म के ज़िक्र से सब से पहले इस गीत की ही याद आती है। सुष्मा श्रेष्ठ और पुष्पा पगधरे की आवाज़ों में यह गीत है जिसे लिखा है अभिलाश ने और स्वरबद्ध किया है कुलदीप सिंह ने। जी हाँ, कल और आज मिलाकर हमने लगातार दो गीत सुनवाए कुलदीप सिंह के संगीत में। कल के गीत की तरह आज का यह गीत भी कुलदीप सिंह के गिने चुने फ़िल्मी गीतों में एक बेहद ख़ास मुकाम रखता है। 'अंकुष' का निर्माण एन. चन्द्रा ने किया था और उन्होने ही फ़िल्म को निर्देशित भी किया था। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नाना पाटेकर, रबिया अमीन, अर्जुन चक्रबर्ती, मदन जैन, और निशा पालसीकर प्रमुख। यह एक ऒफ़बीट फ़िल्म थी और जिसकी कहानी कुछ युवाओं की कहानी थी जो बेमक़सद दिन भर गलियों, सड़कों पर घूमा करते हैं, एक दूसरे से मार पीट करते हैं, लोगों को तंग करते हैं। उनकी ज़िदगी में दो औरतों का पदर्पण होता है , एक वृद्ध महिला हैं और उनकी युवती बेटी अनीता जो एक स्कूल टीचर है। अनीता को उन गुंडे लड़कों का चाल चलन बिल्कुल पसंद नहीं, लेकिन बाद वह धीरे धीरे महसूस करती है कि ये युवक दरसल इस करप्ट समाज के सताए हुए हैं और सही दिशा मिले तो ये ज़िंदगी के सही मार्ग पर चल सकते हैं। बहुए ही अच्छी फ़िल्म है और सभी को यह फ़िल्म देखनी चाहिए। और इस पूरी कहानी का निचोड़ मौजूद है इस प्रार्थना गीत में। क्या ख़ूब कहा गया है इसमें कि "हम ना सोचें हमे क्या मिला है, हम यह सोचें किया क्या है अर्पण, फूल ख़ुशियों की बाटें सभी को, सब का जीवन ही बन जाए मधुवन"। वैसे इस गीत के दो वर्ज़न है, पुरुष वर्ज़न को अशोक खोसला, मुरलीधर, घनश्याम वास्वानी, शेखर शंकर और उनके साथियों ने गाया था। लेकिन आज हम आपको इसका फ़ीमेल वर्ज़न सुनवा रहे हैं।

हम शुक्रगुज़ार हैं विविध भारती के कि जिसने अपने समय के चर्चित और कमचर्चित कलाकारों को आमंत्रित किया, उनसे मुलाक़तें की, और एक ऐसे धरोहर का निर्माण किया कि जिससे हम सभी लाभांवित हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। संगीतकार कुलदीप सिंह को विविध भारती ने आमंत्रित किया था। २९ जून २००५ को 'इनसे मिलिए' कार्यक्रम में प्रसारित इस मुलाक़ात में कुलदीप जी ने बताया कि वो फ़िल्म जगत में कैसे आए, और आज के इस गीत का भी उल्लेख किया था। आइए जानें उन्ही के शब्दों में। "मैं थिएटर प्लेज़ के म्युज़िक कॊम्पोज़ किया करता था, वहाँ रमण कुमार साहब मुझे सब से बड़ा म्युज़िक डिरेक्टर मानते थे। तो उन्होने जब अपनी फ़िल्म 'साथ साथ' प्लैन की तो बिना किसी दोराय के उन्होने मुझे चुन लिया और इस तरह से मैं फ़िल्म लाइन में आ गया।" और अब फ़िल्म 'अंकुष' के बारे में कुलदीप जी बताते हैं - "चन्द्रा साहब आए मेरे पास और कहने लगे कि हम सब एक टीम बना कर काम कर रहे हैं, सारे नए लोग हैं, लो बजट की एक फ़िल्म बना रहे हैं, आप साथ देंगे क्या? मेरे लिए ख़ुशकिस्मती थी और मैं राज़ी हो गया।" और दोस्तों, इस तरह से इतना ख़ूबसूरत गीत हम सब की नज़र किया कुलदीप सिंह ने। इस गीत को एक बार सुन कर दिल नहीं भरता। एक अजीब सी शांति मिलती है इस गीत को सुनते हुए। आज की तनाव भरी ज़िंदगी में, दफ़्तर से घर लौटने के बाद अगर इस गीत को सुनें तो यक़ीनन पूरे दिन भर की थकान दूर हो जाती है। दिन भर अगर हमारा मन यहाँ वहाँ की बातों में भटक जाता है तो यह गीत फिर से एक बार हमें जीवन का सही मार्ग दिखा जाता है। बड़ी शक्ति है इस गीत में। '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला की अंतिम कड़ी में यह गीत सुन कर आपको भी ज़रूर अच्छा लग रहा होगा। अब यह शृंखला समाप्त करने की हमें दीजिए इजाज़त, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के बारे में अपनी राय, सुझाव और फ़रमाइशें हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। धन्यवाद!



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका पुष्पा पगधरे ने ओ. पी. नय्यर के संगीत में फ़िल्म 'बिन माँ के बच्चे' में गीत गाया था- "अपनी भी एक दिन ऐसी मोटर कार होगी" और "जो रात को जल्दी सोये और सुबह को जल्दी जागे"।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. रफ़ी साहब की मधुर आवाज़ में है ये गीत, गीत बताएं-३ अंक.
2. जन्म रावलपिण्डी में २१ जुलाई १९३० को जन्मे गीतकार को समर्पित है ये श्रृखला, कौन हैं ये गीतकार- २ अंक.
3. एक प्रेम कहानी है इस गीत में बयां, कौन हैं सगीतकार -२ अंक.
4. शशि कपूर नायक हैं फिल्म के, नायिका बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
एक बार फिर सभी को बहुत बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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