बुधवार, 23 सितंबर 2009

दूर जाए रे राह मेरी आज तेरी राह से....खेमचंद प्रकाश के लिए गाया लता ने ये बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 211

२८ सितंबर १९२९। मध्य प्रदेश के इंदौर में जन्म हुआ था एक बच्ची का। कहा जाता है कि गंगा नदी शिव जी की जटा से इस धरती पर उतरी थी, पर सुर की गंगा तो स्वर्ग से सीधे इस बच्ची के गले में उतर गई और तब से लेकर आज तक हम सब को अपनी उस आवाज़ के बारिश से भीगो रही है जिस आवाज़ की तारीफ़ में कुछ कहना सिवाय वक़्त के बरबादी के और कुछ भी नहीं है। दोस्तों, कितने ख़ुशनसीब हैं वो लोग जिनका जन्म इस बच्ची के जन्म के बाद हुआ। अफ़सोस तो उन लोगों के लिए होता है जो इस सुर गंगा में नहाए बिना ही इस धरती से चले गए। ये बच्ची आगे चलकर बनी ना केवल इस देश की आवाज़, बल्कि युं भी कह सकते हैं कि ये आवाज़ है पिछली सदी की आवाज़, इस सदी की आवाज़, और आगे आनेवाली तमाम सदियों की आवाज़। फ़िल्म संगीत में हम और आप जैसे संगीत प्रेमियों की अपनी अपनी पसंद नापसंद होती है, मगर हर किसी के पसंद की राहें जिस एक लाजवाब मंज़िल पर जा कर मिल जाती हैं, उस मंज़िल का नाम है सुरों की मलिका, कोकिल कंठी, मेलडी क्वीन, सुर साम्राज्ञी, भारत रत्न, लता मंगेशकर। आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु हो रहा है लता जी पर केन्द्रित लघु शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है'। लता जी के गाए गीतों में से दस लाजवाब गीतों को चुनना अकल्पनीय बात है। इसीलिए हम इस शृंखला के लिए वह राह इख़्तियार नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम वह राह चुन रहे हैं जिसमें हैं लता जी के गाए कुछ भूले बिसरे और बेहद दुर्लभ नग़में, जो शायद ही आज आप को कहीं मिल सके, या कहीं और आप इन्हे सुन सके। और हमारी इसी योजना को साकार करने के लिए सामने आए नागपुर के अजय देशपाण्डे जी, जिन्होने लता जी के गाए दुर्लभतम गीतों में से १० गानें चुन कर हमें भेजे, जिनमें से ५ गीत हैं ख़ुश रंग और ५ गीत हैं कुछ ग़मज़दा क़िस्म के। हम तह-ए-दिल से उनका शुक्रिया अदा करते हैं क्योंकि उनके इस सहयोग के बिना इस शृंखला की हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

लता मंगेशकर के गाए भूले बिसरे और दुर्लभ गीतों की बात करें तो लता जी के संगीत सफ़र की शुरुआती सालों में, यानी कि ४० के दशक में उन्होने कुछ ऐसे फ़िल्मों में गानें गाए थे जो बहुत ज़्यादा चर्चित नहीं हुए। उस ज़माने में पंजाबी शैली में गाने वाली तमाम वज़नदार आवाज़ों वाली गायिकाओं के गाए गीतों के बीच लता की धागे से भी पतली आवाज़ कहीं दब कर रह गई। अपने पिता की अकाल मृत्यु की वजह से १२ साल की लता ने अपने परिवार का ज़िम्मा अपने कंधों पर लिया और इस फ़िल्मी दुनिया में पहली बार क़दम रखा। साल था १९४२ और फ़िल्म थी मास्टर विनायक की मराठी फ़िल्म 'पहली मंगलागौर', जिसमें उन्होने बाल कलाकार का एक चरित्र निभाया और इसी फ़िल्म में उनका पहला गीत भी रिकार्ड हुआ। इस मराठी गीत के बोल थे "सावन आला तरु तरु ला बांगू हिंदोला"। उसके बाद लता ने कुछ और फ़िल्मों में अभिनय किया और कुछ गानें भी गाए। किसी हिंदी फ़िल्म में उनका गाया पहला गीत था सन् १९४६ की फ़िल्म 'सुभद्रा' का, जिसमें उन्होने शांता आप्टे के साथ मिलकर गाया था "मैं खिली खिली फुलवारी", जिसके संगीतकार थे वसंत देसाई साहब और जिस फ़िल्म में लता ने अभिनय भी किया था। प्लेबैक की अगर बात करें तो किसी अभिनेत्री के लिए लता का गाया हुआ पहला गीत था १९४७ की फ़िल्म 'आपकी सेवा में' का "पा लागूँ कर जोरी रे, श्याम मोसे न खेलो होरी"। इसी साल, यानी कि १९४७ की आख़िर में एक गुमनाम फ़िल्म आयी थी 'आशा'। फ़िल्म कब आयी और कब गई पता ही नहीं चला। शायद देश विभाजन की अफ़रा-तफ़री में लोगों ने इस फ़िल्म की तरफ़ ध्यान नहीं दिया होगा! और इस फ़िल्म में लता का गाया गीत भी गुमनामी के अंधेरे में खो गया। आज लता जी पर केन्द्रित इस शृंखला की शुरुआत हम इसी फ़िल्म 'आशा' के एक गीत से कर रहे हैं। मेघानी निर्देशित इस फ़िल्म के नायक थे रामायण तिवारी। फ़िल्म के संगीतकार थे खेमचंद प्रकाश, जिन्होने लता को दिया था सही अर्थ में उनका पहला सुपरहिट गीत "आयेगा आनेवाला", फ़िल्म 'महल' में। तो लीजिए दोस्तों, फ़िल्म 'आशा' का गीत प्रस्तुत है, जिसके बोल हैं "दूर जाए रे राह मेरी आज तेरी राह से"। लेकिन हम यही कहेंगे कि हमारी राहों में लता जी की आवाज़ युगों युगों तक एक विशाल वट वृक्ष की तरह शीतल छाँव प्रदान करती रहेंगी, अपनी आवाज़ की अमृत गंगा से करोड़ों प्यासों की प्यास बुझाती रहेंगी... सदियों तक।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ३ अंकों की बढ़त पाने के लिए बूझिये लता का ये दुर्लभ गीत.
२. गीतकार हैं नजीम पानीपती.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"आसरा".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी शानदार वापसी है, बधाई....३ अंकों के सतह खाता खुला है आपका फिर एक बार. दिलीप जी आपने जिन दो गीतों का जिक्र किया है वो भी आपको जल्दी सुनवायेंगें. पूर्वी जी और पराग जी यदि शरद जी और स्वप्न जी इस स्तिथि से भी आप लोगों से आगे निकल जाते हैं तो ये वाकई शर्म की बात होगी, इसलिए कमर कस लीजिये....नाक मत काटने दीजियेगा :) अर्चना जी हर रोज नज़र आया करें....हम हाजरी रजिस्टर रखते हैं यहाँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

माई हार्ट इस बीटिंग कीप्स् ऑन रीपिटिंग....भारतीय संवेदनाओं से सजा एक खूबसूरत अंग्रेजी गीत...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 210

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का रंग ज़रा अलग है दोस्तों, क्योंकि आज हम आप के लिए लेकर आए हैं एक अंग्रेज़ी गीत। घबराइए नहीं दोस्तों, यह कोई विदेशी पॉप अल्बम का गीत नहीं है, बल्कि यह गीत है सन् १९७५ की फ़िल्म 'जूली' का "My heart is beating"| प्रीति सागर का गाया यह गीत हिंदी फ़िल्म संगीत का शयद एकमात्र ऐसा गीत है जो पूरा का पूरा अंग्रेज़ी भाषा में लिखा गया है। १८ मार्च को प्रदर्शित हुई इस फ़िल्म का निर्माण किया था बी. नागी रेड्डी ने और निर्देशक थे के. एस. सेतूमाधवन। लक्ष्मी और विक्रम थे हीरो हीरोइन, लेकिन वरिष्ठ अभिनेत्री नादिरा ने इस फ़िल्म में नायिका की माँ के किरदार में एक बेहद सशक्त भूमिका अदा की थी जिसके लिए उन्हे फ़िल्म-फ़ेयर के सर्वशेष्ठ सह-अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि सन् १९५५ की फ़िल्म 'देवदास' के लिए जब वैजयंतीमाला ने फ़िल्म-फ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार यह कह कर लेने से इंकार कर दिया था कि वो उस फ़िल्म में सह अभिनेत्री नहीं बल्कि मुख्य अभिनेत्री हैं, तब इस पुरस्कार के लिए नादिरा का नाम निर्धारित किया गया था फ़िल्म 'श्री ४२०' के तहत। लेकिन नादिरा ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया यह कह कर कि वो मेरिट पर पुरस्कार लेना ज़्यादा पसंद करेंगी ना कि किसी के ठुकराए हुए पुरस्कार को। और देखिए, उसके ठीक २० साल बाद, १९७५ में उन्हे फ़िल्म 'जूली' के लिए यह पुरस्कार मिला। श्रीदेवी का इसी फ़िल्म से पदार्पण हुआ था हिंदी फ़िल्म जगत में बतौर बाल कलाकार। 'जूली' का संगीत बेहद मक़बूल हुआ, संगीतकार राजेश रोशन को उस साल इस फ़िल्म के लिए फ़िल्म-फ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार दिया गया था। फ़िल्म की कहानी एक ऐंग्लो-इंडियन परिवार पर आधारित होने की वजह से इसमें एक अंगेज़ी गीत की गुंजाइश बन गई। युं तो फ़िल्म के बाक़ी गीत आनंद बक्शी साहब ने लिखे, लेकिन इस गीत को लिखा था हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने। आप को पता है न ये कौन साहब हैं? जी हाँ, फ़िल्म 'बावर्ची' में वयो वृद्ध पिता जी की भूमिका अदा करने वाले शख्स ही हरिन्द्रनाथ जी हैं जिन्होने बहुत सारी फ़िल्मों में अविस्मरणीय किरदार निभाए हैं। तो उन्ही का लिखा हुआ यह गीत है और प्रीति सागर ने भी क्या ख़ूब गाया है। 'जूली' फ़िल्म के इसी गीत से रातों रात प्रीति ने हलचल मचा दी थीं फ़िल्म संगीत जगत में। उस साल सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार दिया गया था सुलक्षणा पंडित को फ़िल्म 'संकल्प' में उनके गाए गीत "तू ही सागर है" के लिए। लेकिन प्रीति सागर के इस गीत की चरम लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्हे उसी साल एक विशेष फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आगे चलकर सन् १९७७ की फ़िल्म 'मंथन' के मशहूर गीत "मेरो गाम काठा पारे" के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार दिया गया।

"My heart is beating" भले ही अंग्रेज़ी गीत है, लेकिन राजेश रोशन ने मेलडी का भरपूर ध्यान रखा है जो यहाँ के श्रोताओं को अपील कर सके। गीटार, फ़्ल्युट और सैक्सोफ़ोन का बहुत सुंदर प्रयोग उन्होने इस गीत में किया है। दोस्तो, इस गीत को सुनने का मज़ा आप को तभी आएगा जब आप इस गीत को सुनते हुए ख़ुद भी गुनगुना सके। इसीलिए मैं नीचे इस गीत के बोल लिख रहा हूँ रोमन में। अब आप इस गीत को सुनते हुए ख़ुद भी गाइए और झूम जाइए।

My heart is beating, keeps on repeating, I am waiting for you,
My love encloses, a plot of roses,
And when shall be then, our next meeting,
'Cos love you know, That time is fleeting, time is fleeting, time is fleeting.

Oh, when I look at you,
The blue of heaven seems to be deeper blue,
And I can swear that, God Himself, seems to be looking through,
Zu-zu-zu-zu, I'll never part from you,
And when shall be then, our next meeting,
'Cos love you know, That time is fleeting, time is fleeting, time is fleeting.

Spring is the season,
That rolls the reason of lovers who are truly true,
Young birds are mating, while I am waiting, waiting for you,
Darling you haunt me, say do you want me?
And if it so, when are we meeting,
'Cos love you know, That time is fleeting, time is fleeting, time is fleeting.
My heart is beating...




और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी स्वर सम्राज्ञी लता के कुछ दुर्लभ गीतों पर हमारी विशेष शृंखला, इस पहेली का सही जवाब देने पर आपको मिलेगा 1 बोनस अंक..यानी विजेता को 2 की जगह 3 अंक मिलेंगें, पहचानिये लता का ये गीत.
२. इस गीत के संगीतकार वो हैं जिन्होंने लता को उनका पहला हिट गीत "आएगा आने वाला" दिया था.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में इस शब्द का दो बार इस्तेमाल हुआ है -"राह"

पिछली पहेली का परिणाम -
क्या बात है लगता है हमारे पुराने योधा लौट रहे हैं फॉर्म में, दिलीप जी, एक सही गीत बधाई, आपके अंक हुए ४....सभी श्रोता तैयार रहें २११ से २२० तक हम ओल्ड इस गोल्ड में तलाशेंगें लता जी के कुछ दुर्लभ गीतों को, अगली दस पहेलियों के सही जवाब आपको दिलवाएंगें २ की जगह ३ अंक....यानी हर सही जवाब आपको देगा एक अतिरिक्त अंक. इसे प्रतिभागी हमारा दिवाली बोनस मानें....:), और हाँ कल की पहेली से हमारे पहले दो विजेता शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी भी प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं....आपके अंक फिर एक बार शून्य से शुरू होंगें....तो चलिए शुभकामनाएँ सभी को. उम्मीद है मुकाबला रोचक होने वाला है.
खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं....."बख्शी" साहब और "अनवर" की अनोखी जुगलबंदी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४७

मूमन तीन या चार कड़ियों से हमारी प्रश्न-पहेली का हाल एक-सा है। तीन प्रतिभागी (नाम तो सभी जानते हैं) अपने जवाबों के साथ इस पहेली का हिस्सा बनते हैं, उनमें से हर बार "सीमा" जी प्रथम आती हैं और बाकी दो स्थानों के लिए शामिख जी और शरद जी में होड़ लगी होती है। भाईयों बस दूसरे या तीसरे स्थान के लिए हीं होड़ क्यों है, पहले पर भी तो नज़र गड़ाईये। इस तरह तो बड़े हीं आराम से सीमा जी न जाने कितने मतों (यहाँ अंकों) के साथ विजयी हो जाएँगी और आपको बस दूसरे स्थान से हीं संतोष करना होगा। अभी भी ४ कड़ियाँ बाकी हैं (आज को जोड़कर),इसलिए पूरी ताकत लगा दीजिए। इस उम्मीद के साथ कि आज की पहेली में काँटे की टक्कर देखने को मिलेगी, हम पिछली कड़ी के अंकों का खुलासा करते हैं: सीमा जी: ४ अंक, शामिख जी: २ अंक और शरद जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की, तो कमर कस लीजिए। ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) एक शायर जिसने अपने एक मित्र के लिए कहा था "आज तेरी एक नज़्म पढी"। जवाब में उस मित्र ने भी उस शायर से अपना पहचान जन्मों का बताया और कहा "कहीं पहले मिले हैं हम"। शायर के साथ-साथ उसके मित्र का भी नाम बताएँ।
२) एक गायिका जिसके साथ ८ जुलाई १९९० को कुछ ऐसा हुआ कि उसने गायकी से तौबा कर ली। उस गायिका का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि हमने उसकी जो गज़ल सुनवाई थी(साथ में एक और गायक थे), उसे किसने लिखा था?


आज हम जिस गज़ल को लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं, उस गज़ल के गायक को पहचानने में कई बार लोग गलती कर जाते हैं। ज्यादातर लोगों का यह मानना है कि इस गज़ल को मोहम्मद रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ से सजाया है और लोगों का यह मानना इसलिए भी जायज है क्योंकि एक तो आई०एम०डी०बी० पर उन्हीं का नाम दर्ज है और फिर इस गज़ल के गायक की आवाज़ मोहम्म्द रफ़ी साहब से हुबहू नहीं भी तो कमोबेश तो जरूर मिलती है। वैसे बता दें कि यह गज़ल जिस फ़िल्म (हाँ यह गैर-फ़िल्मी रचना नहीं है, लेकिन चूँकि यह गज़ल इतनी खुबसूरत है कि हमें इसे अपनी महफ़िल में शामिल करने का फ़ैसला करना पड़ा) से ली गई है वह रीलिज़ हुई थी १९८४ में और रफ़ी साहब १९८० में सुपूर्द-ए-खाक हो गए थे, इसलिए इस गज़ल के साथ उनका नाम जोड़ना इस तरह भी बेमानी साबित होता है। तो चलिए, हम इतना तो जान गए कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं गाया तो फिर कौन है इसका असली गायक? आप लोगों ने फिल्म "नसीब" का "ज़िंदगी इम्तिहान लेती है" या फिर "अर्पण" का "मोहब्बत अब तिज़ारत बन गई है" तो ज़रूर हीं सुना होगा...तो इस गज़ल को भी उन्होंने हीं गाया है जिन्होने उन गीतों में अपनी आवाज़ की जान डाली थी यानि कि अनवर (पूरा नाम: अनवर हुसैन)। "मेरे ख्यालों की रहगुजर से" - इस गज़ल को लिखा है हिन्दी फिल्मी गीतों के बेताज़ बादशाह "आनंद बख्शी" ने तो संगीत से सजाया है उस दौर की जानी मानी संगीतकार जोड़ी "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" ने। एल०-पी० के बारे में "ओल्ड इज गोल्ड" पर तो बातें होती हीं रहती हैं, इसलिए उनके बारे में हम यहाँ कुछ भी नया नहीं कह पाएँगे। बक्शी साहब के बारे में हम पिछली दो कड़ियों में बहुत कुछ कह चुके हैं। हमें मालूम है कि उतना पर्याप्त नहीं है,लेकिन चूँकि अनवर हमारे लिए नए हैं, इसलिए आज हम इन्हें मौका दे रहे हैं। अनवर का जन्म १९४९ में मुंबई में हुआ था। उनके पिता जी संगीत निर्देशक "गुलाम हैदर" के सहायक हुआ करते थे। अनवर बहुत सारे कंसर्ट्स में गाया करते थे। ऐसे हीं एक कंसर्ट में जनाब "कमल राजस्थानी" ने उन्हें सुना और उन्हें फिल्म "मेरे ग़रीब नवाज़" के लिए "कसमें हम अपनी जान की" गाने का अवसर दिया। कहते हैं कि इस गाने को सुनकर रफ़ी साहब ने कहा था कि "मेरे बाद मेरी जगह लेने वाला आ गया है"। अनवर ने इसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता, हीर-राँझा, विधाता, प्रेम-रोग, चमेली की शादी जैसी फ़िल्मों के लिए गाने गाए। यह सच है कि अनवर के नाम पर बहुत सारे सफ़ल गाने दर्ज हैं लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि रफ़ी साहब की बात सच न हो सकी।

कहा जाता है कि जनता हवलदार और अर्पण के गीतों से मिली अपार लोकप्रियता ने उन्हें न केवल घमंडी बना दिया था, बल्कि वे नशे के आदी भी हो गए थे, इसलिए म्यूजिक डायरेक्टरों ने उनसे किनारा करना शुरू कर दिया। हालांकि अनवर इन आरोपों को सिरे से नकारते हैं। इस बारे में वे कहते हैं(सौजन्य: जागरण): न तो कामयाबी ने मुझे मगरूर बनाया, न ही मैं नशे का आदी हुआ! इसे मेरी बदकिस्मती कह सकते हैं कि तमाम सुरीले गीत गाने के बावजूद प्लेबैक में मेरा करियर बहुत लंबा नहीं खिंच सका! जहां तक मेरे घमंडी और शराबी होने की बात है, तो इसके लिए मैं एक अखबार नवीस को जिम्मेदार ठहराता हूँ। हुआ ये कि एक बार एक मित्र ने हमारा परिचय एक फिल्म पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार से कराया। उसके काफी समय बाद सॅलून में उस पत्रकार से मेरी मुलाकात हुई, तो उन्हें मैं नहीं पहचान सका। बस, इसी बात का उन्हें बुरा लग गया और उन्होंने अपनी पत्रिका में मेरे बारे में अनाप-शनाप लिखना शुरू कर दिया। चूंकि उस दौर में उस पत्रिका का काफी नाम था, इसलिए उस लेख के प्रकाशन के बाद लोगों के बीच मेरी खराब इमेज बन गई। सच बताऊं, तो काफी हद तक उस पत्रकार महोदय ने भी मेरा काफी नुकसान किया। मेरे कैरियर में उतार-चढ़ाव के लिए इन अफवाहों के साथ म्यूजिक इंडस्ट्री में आया बदलाव भी एक हद तक जिम्मेदार है। महेश भट्ट की फिल्म आशिकी ने फिल्म म्यूजिक को एक अलग दिशा दी, लेकिन उसके बाद कॉपी वर्जन गाने वाले गायकों को इंडस्ट्री सिर पर बिठाने लगी और इसीलिए मौलिक गायक हाशिये पर चले गए। ऐसे में मुझे भी काम मिलने में दिक्कत हो रही थी। अच्छे गीत नहीं मिल रहे थे, जबकि विदेशों में शो के मेरे पास कई ऑफर थे। कुछ अलग करने के इरादे से ही मैं कैलीफोर्निया (अमेरिका) चला गया और वहां शो करने लगा। वहां के लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं वहीं का हो गया। मैं व्यवसाय के कारण भले ही अमेरिका में रहता हूं, लेकिन दिल हमेशा अपने देश में ही रहता है। ऐसे में जब यहां के लोग कुछ अलग और नए की फरमाइश करते हैं, तो मन मारकर रह जाता हूं। म्यूजिक कंसर्ट और शो में ही काफी बिजी रहने के कारण मेरी रुचि अब प्लेबैक में नहीं रही। हालांकि अच्छे ऑफर मिलने पर मैं प्लेबैक से इंकार नहीं करूँगा, लेकिन खुद इसके लिए पहल मैं कतई नहीं करने वाला। पहले भी काम मांगने किसी के पास नहीं गया था और आज भी मैं उस पर कायम हूं। हां, यदि पहले की तरह अच्छे गीत मिलें और म्यूजिक डायरेक्टर मेरे साथ काम करना चाहें, तो उन्हें निराश नहीं करूंगा। तो इस तरह हम वाकिफ़ हुए उन घटनाओं से जिस कारण अनवर को फिल्मों में गायकी से मुँह मोड़ना पड़ा। चलिए अब हम आगे बढते हैं आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं। उससे पहले "आनंद बख्शी" का लिखा एक बड़ा हीं खुबसूरत शेर पेश-ए-खिदमत है:

ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है,
तू जो चाहे तो दिन निकलता है तू जो चाहे तो रात होती है।


और यह रही आज़ की गज़ल:

मेरे ख़यालों की रहगुज़र से वो देखिए वो गुज़र रहे हैं,
मेरी निगाहों के आसमाँ से ज़मीन-ए-दिल पर उतर रहे हैं।

ये कैसे मुमकिन है हमनशीनो कि दिल को दिल की ख़बर न पहुंचे,
उन्हें भी हम याद आते होंगे कि जिन को हम याद कर रहे हैं।

तुम्हारे ही दम क़दम से थी जिन की मौत और ज़िंदगी अबारत,
बिछड़ के तुम से वो नामुराद अब न जी रहे हैं न मर रहे हैं।

इसी मोहब्बत की रोज़-ओ-शब हम सुनाया करते थे दास्तानें,
इसी मोहब्बत का नाम लेते हुए भी हम आज डर रहे हैं।

चले हैं थोड़े ही दूर तक बस वो साथ मेरे 'सलीम' फिर भी,
ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं।


इस गज़ल के "मकते" में तखल्लुस के रूप में "सलीम" को पढकर कई लोग इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि इस गज़ल को किसी "सलींम" नाम के शायर ने लिखा है। लेकिन सच ये है कि "ये इश्क़ नहीं आसान" फिल्म में "ऋषि कपूर" का नाम "सलींम अहमद सलीम" था। अब चूँकि नायक शायर की भूमिका में था, इसलिए उसकी कही गई गज़ल में उसके नाम को "तखल्लुस" के रूप में रखा गया है। यह बात अच्छी तो लगती है, लेकिन हमारे अनुसार ऐसा और कहीं नहीं हुआ। यह तो "बख्शी" साहब का बड़प्पन है कि उन्होंने ऐसा करना स्वीकार किया। क्या कहते हैं आप?



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

वो मेरा ___ है मैं उसकी परछाई हूँ,
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन....


आपके विकल्प हैं -
a) अक्स, b) सरमाया, c) हमसाया, d) आईना

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "इम्तिहाँ" और शेर कुछ यूं था -

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही,
इम्तिहाँ और भी बाकी हो तो ये भी न सही..

जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर को सबसे पहले सही पकड़ा सीमा जी ने। सीमा जी ने ग़ालिब के शेरों से महफ़िल को खुशगवार बना दिया, लगता है कि आप कई दिनों से ग़ालिब का हीं इंतज़ार कर रहीं थीं। ये रहे आपके पेश किए शेर:

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में यारब
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना (ग़ालिब )

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यों हो (ग़ालिब )

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं (मोहम्मद इक़बाल) यह तो बड़ा हीं मशहूर शेर है...शुक्रिया कि आपने इसे यहाँ रखा।

सीमा जी के बाद महफ़िल में इंट्री हुई शामिख जी की। आपने भी कुछ लुभावने शेर पेश किए। ये रही बानगी:

थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ
दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी (श्रद्धा जी..मतलब कि हमारी दीदी)

इम्तिहाँ से गुज़र के क्या देखा
इक नया इम्तिहान बाक़ी है (राजेश रेड्डी)

यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

इनके बाद महफ़िल में एक तरतीब में हाज़िर हुए शरद जी, शन्नो जी और मंजु जी। आप तीनों के नाम हम एक साथ इसलिए लिखते हैं क्योंकि जब भी स्वरचित शेरों की बात आती है तो आपका हीं नाम आता है। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर(क्रम से):

किसी राह चलती को छेडो न यारो
अभी इस के आगे जहाँ और भी हैं
ये जूतों की बारिश तो है पहली मन्ज़िल
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं । (क्या बात है!! )

कितने ही इम्तहान ले चुकी है जिन्दगी
खुदा जाने और भी कितने बाकी हैं.

जीवन इम्तहाँ का है नाम,
कोई होता फ़ेल तो कोई पास।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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