Saturday, August 8, 2009

समाँ है सुहाना सुहाना नशे में जहाँ है....जहाँ किशोर की आवाज़ गूंजे वहां ऐसा क्यों न हो

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 165

पिछ्ले तीन दिनों से आप किशोर दा की आवाज़ में सुन रहे हैं जीवन के कुछ ज़रूरी और थोड़े संजीदे किस्म के विषयों पर आधारित गानें। आज माहौल को थोड़ा सा हल्का बनाते हैं और आज चुनते हैं ज़िंदगी का एक ऐसा रूप जिसमें है मस्ती, रोमांस और नशा। ऐसे गीतों में भी किशोर दा की आवाज़ ने वो अदाकारी दिखायी है कि ये गानें हर प्रेमी के दिल की आवाज़ बन कर रह गये हैं। आनंद बक्शी का लिखा और कल्याणजी-आनंदजी का स्वरबद्ध किया एक ऐसा ही गीत आज पेश है फ़िल्म 'घर घर की कहानी' से। जी हाँ, "समा है सुहाना, नशे में जहाँ है, किसी को किसी की ख़बर ही कहाँ है, हर दिल में देखो मोहब्बत जवाँ है"। कभी जवाँ दिलों की धड़कन बन कर गूँजा करता था यह नग़मा। इसमें कोई शक़ नहीं कि यह गीत समा को सुहाना बना देता है, इसकी मंद मंद रीदम से मन नशे में डूबता सा चला जाता है, और हर दिल में मोहब्बत की लौ जगा देती है। १९७० की फ़िल्म 'घर घर की कहानी' के मुख्य कलाकार थे राकेश रोशन और भारती। यह एक लो बजट फ़िल्म थी जिसकी बाकी सभी चीज़ों को लोग क्रमश: भूलने लगे हैं सिवाय एक चीज़ के, और वह है फ़िल्म का प्रस्तुत गीत। यह दक्षिण के फ़िल्मकारों की फ़िल्म थी, निर्माता थे नागा रेड्डी और निर्देशक थे टी. प्रकाश राव। यूं तो, जैसा कि हमने कहा कि फ़िल्म के नायक थे राकेश रोशन, लेकिन प्रस्तुत गीत फ़िल्माया गया है जलाल आग़ा पर। यह एक पिकनिक में गाया गया गीत है, जिस पर कालेज के छात्र छात्राओं को नृत्य करते हुए दिखाया गया है।

आज कल्याणजी-आनंदजी और किशोर कुमार की एक साथ बात चली है तो यहाँ पर मैं आप को विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम से आनंदजी की यादों के कुछ उजाले पेश कर रहा हूँ, जिनमें उन्होने किशोर दा के बारे में कई बातें कहे थे-

प्र: अच्छा आनंदजी, किशोर कुमार ने कोई विधिवत तालीम नहीं ली थी, इसके बावजूद भी कुछ लोग जन्मगत प्रतिभाशाली होते हैं, जैसे उपरवाले ने उनको सब कुछ ऐसे ही दे दिया है। उनकी गायकी की कौन सी बात आप को सब से ज़्यादा अपील करती थी?

देखिये, मैने बतौर संगीतकार कुछ ४०-५० साल काम किया है, लेकिन इतना कह सकता हूँ कि 'it should be a matured voice', और यह कुद्रतन होता है। और यहाँ पर क्या है कि कितना भी अच्छा गाते हों आप, लेकिन 'voice quality' अगर माइक पे अच्छी नहीं है तो क्या फ़ायदा! फ़िल्मी गीतों में ज़्यादा मुड़कियाँ लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हमारे यहाँ कुछ गायक हैं जो समझते हैं कि दो मुड़कियाँ ले लूँ तो मेरा गाना चलेगा, लेकिन फिर क्या होता है कि फिर हर वक़्त वो वैसा ही लगते हैं। सिर्फ़ गाना ही होगा, 'एक्टिंग' नहीं। लेकिन एक भोला भाला सीधा सादा आदमी खड़े खड़े ही गाना गा रहा है तो उसी तरह का गाना होना चाहिए। आप को मुड़कियाँ लेने की ज़रूरत नहीं है।

प्र: किशोर कुमार एक हरफ़नमौला, हर फ़न में माहिर एक कलाकार। एक खिलंदरपन था उनमें और बचपना भी। लेकिन जब वो सीरियस गाना गाते थे तो रुला देते थे। और जब वो हास्य का गाना गाते थे तो हँसी के फ़व्वारे छूटने लगते थे।

नहीं नहीं, जैसे आप स्विच बदलते हैं, वो वैसी ही थे। किसी को सीखाने से ये सब आयेगी नहीं। ये अंदर से ही आता है। उनकी 'voice quality' बहुत अच्छी थी। 'ultimate judgement' तो आप को ही लेना है, कि 'मैं सुर में गाऊँ कि नहीं', ये मुझे ही मालूम है। ये जो मैने 'सरगम' की कैसेट निकाली है उसमें यही कहा गया है कि आप अपने बच्चों में अभी से आदत डालेंगे।

प्र: आनंदजी, किशोर दा को जो समय आप देते थे उसमें वो आ जाते थे?

हम लोग उनको दोपहर का 'टाइम' ही देते थे। वो कहते थे कि 'आप के गाने में मुझे कोई प्रौब्लेम नहीं होती'. "ख‍इके पान बनारस वाला" वो दोपहर को गा कर चले गये थे, हम को याद ही नहीं था, क्योंकि पिक्चर के चार गानें बन गये थे, 'रिकार्ड' भी बन कर आ गयी थी, बाद में यह गाना डाला गया 'सिचुयशन' बनाकर।


तो दोस्तों, ये थी कुछ बातें आनंदजी के शब्दों में किशोर दा के बारे में। आगे चलकर समय समय पर इस साक्षात्कार से कई और अंश हम आप तक ज़रूर पहुँचायेंगे। तो आइए अब समा को ज़रा सुहाना बनाया जाये किशोर दा के गाये आज के प्रस्तुत गीत को सुनकर।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल सुनेगें दर्द में डूबी किशोर दा की सदा.
2. कल के गीत का थीम है - "दर्द, पीडा, उपेक्षा आदि".
3. एक अंतरा शुरू होता है इन शब्दों से -"तुझे क्या..".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बनी है एक और नयी प्रतिभागी....बधाई २ अंकों के लिए. रोहित जी ज़रा से पीछे रह गए. दिशा जी और प्राग जी दोनों नादारादा रहे कल. लगता नहीं कि २०० अंक पूरे होने से पहले हमें तीसरे विजेता मिल पायेंगें :(

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

भीष्म साहनी के जन्मदिन पर विशेष "चीफ़ की दावत"

सुनो कहानी: भीष्म साहनी की "चीफ़ की दावत"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ।

पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की कहानी झाँकी का पॉडकास्ट सुना था।

आज आठ अगस्त को प्रसिद्ध लेखक, नाट्यकर्मी और अभिनेता श्री भीष्म साहनी का जन्मदिन है. इस अवसर पर आवाज़ की और से प्रस्तुत है उनकी एक कहानी। मैं तब से उनका प्रशंसक हूँ जब पहली बार स्कूल में उनकी कहानी "अहम् ब्रह्मास्मि" पढी थी। मेरी इच्छा आज सुनो कहानी में वही कहानी पढने की थी परन्तु यहाँ उपलब्ध न होने के कारण आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं उनकी एक और प्रसिद्ध कहानी "चीफ की दावत" जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। आशा है आपको पसंद आयेगी।
कहानी का कुल प्रसारण समय 20 मिनट 9 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




भीष्म साहनी (1915-2003)



हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी
पद्म भूषण भीष्म साहनी का जन्म आठ अगस्त 1915 को रावलपिंडी में हुआ था।


"नहीं, मैं नहीं चाहता की उस बुढ़िया का आना-जाना यहाँ फिर से शुरू हो। पहले ही बड़ी मुश्किल से बन्द किया था। माँ से कहें कि जल्दी खाना खा के शाम को ही अपनी कोठरी में चली जाएँ। मेहमान कहीं आठ बजे आएँगे। इससे पहले
ही अपने काम से निबट लें।"
("चीफ़ की दावत" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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#Thirty third Story, Dawat: Bhisham Sahni/Hindi Audio Book/2009/27. Voice: Anurag Sharma

Friday, August 7, 2009

रुक जाना नहीं तू कहीं हार के...चिर प्रेरणा का स्त्रोत रहा है, दादा का गाया ये नायाब गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 164

ल हमने बात की थी सपनों की। दोस्तों, सपने तभी सच होते हैं जब उनको सच करने के लिए हम निरंतर प्रयास भी करें। लेकिन सफलता हमेशा हाथ लगे ऐसा जरूरी नहीं है. कई पहाड़ों, जंगलों, खाइयों से गुज़रने के बाद ही नदी का मिलन सागर से होता है। कहने का आशय यह है कि एक बार की असफलता से इंसान को घबरा कर अपनी कोशिशें बंद नहीं कर देनी चाहिए। काँटों पर चलकर ही बहारों के साये नसीब होते हैं। जी हाँ, 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़' के अंतर्गत आज हमारा विषय है 'प्रेरणा', जो दे रहे हैं किशोर कुमार किसी राह चलते राही को। यह राही ज़िंदगी का राही है, यानी कि हर एक आम आदमी, जो ज़िंदगी की राह पर निरंतर चलता चला जाता है। किशोर कुमार ने बहुत सारे इस तरह के राही और सफ़र से संबंधित जीवन दर्शन के गीत गाये हैं, उदाहरण के तौर पर फ़िल्म 'तपस्या' का गीत "जो राह चुनी तूने उसी राह पे राही चलते जाना रे", फ़िल्म 'नमकीन' का गीत "राह पे रहते हैं, यादों पे बसर करते हैं, ख़ुश रहो अहल-ए-वतन, हो हम तो सफ़र करते हैं", फ़िल्म 'आप की कसम' का गीत "ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम, वो फिर नहीं आते", फ़िल्म 'सफ़र' का गीत "ज़िंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं", फ़िल्म 'काला पत्थर' का गीत "एक रास्ता है ज़िंदगी जो थम गये तो कुछ नहीं", फ़िल्म ख़ुद्दार' का गीत "ऊँचे नीचे रास्ते और मंज़िल तेरी दूर, राह में राही रुक न जाना होकर के मजबूर", फ़िल्म 'दोस्त' का गीत "गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है, चलना ही ज़िंदगी है, चलती ही जा रही है", इत्यादि। लेकिन किशोर दा के गाये इन तमाम गीतों में हम ने जिस गीत को आज चुना है वह है फ़िल्म 'इम्तिहान' का - "रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पे चल के मिलेंगे साये बहार के"। मजरूह सुल्तानपुरी के दार्शनिक बोलों को संगीत से सँवारा है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।

'इम्तिहान' सन् १९७४ की फ़िल्म थी। बी. ए. चंडीरमणी के इस फ़िल्म को मदन सिन्हा ने निर्देशित किया था तथा इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे विनोद खन्ना और तनुजा। प्रस्तुत गीत फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है जो फ़िल्म में टुकड़ों में कई बार सुनाई देता है। ग्रामोफोन रिकार्ड पर इस गीत की कुल अवधि है लगभग ७ मिनट। किसी किसी रिकार्ड और कैसेट्स पर केवल ३ मिनट में ही गीत को समाप्त कर दिया गया है। लेकिन हम आप के लाये हैं पूरे ७ मिनट वाला वर्ज़न। इन दोनों वर्ज़नों का अंतर आप को बताना चाहेंगे। ३ मिनट वाला वर्ज़न शुरु होता है सैक्सोफ़ोन के पीस से, उसके बाद कोरल हमिंग से शुरु होता है गीत और केवल एक ही अंतरे के साथ गीत समाप्त हो जाता है। जब कि ७ मिनट वाले वर्ज़न में कुल तीन अंतरे हैं। तीसरा अंतरा लोगों ने बहुत कम ही सुना है, इसलिए इस अंतरे के बोल हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं-

"नैन आँसू जो लिए हैं, ये राहों के दीये हैं,
लोगों को उनका सब कुछ देके,
तू तो चला था सपने ही लेके,
कोई नहीं तो तेरे अपने हैं सपने ये प्यार के,
ओ राही ओ राही ओ राही ओ राही"

गीटार का बड़ा ही सुंदर इस्तेमाल पूरे गीत में सुनने को मिलता है। दोस्तों, यह एक संजीदा गीत है, लेकिन इस संजीदे गीत को सुनने से पहले हम आप के दिल में थोड़ी सी गुदगुदी डालना चाहते हैं, तो क्यों न प्यारेलाल जी की कुछ बातें हो जाये अपने किशोर दा के बारे में - "किशोर दा बहुत ही मस्त आदमी थे। हम लोग उनके घर जाते थे, उनका 'फ़र्स्ट क्लास' बंगला था। बहुत बड़ा सा हौल था जहाँ पे हम बैठते थे। बहुत अच्छे ढंग से सजाया हुआ था। बस बीच में एक पीलर था जिस पर केवल सीमेंट लगा हुआ था। हम में से किसी को समझ नहीं आता था कि ऐसा क्यों है कि पूरा हौल इतनी अच्छी तरह से सजाया हुआ है सिवाय उस पीलर के। एक बार लक्ष्मी जी ने उनसे पूछा कि 'यह बताइये कि यह बीच वाला पीलर आप क्यों नहीं ठीक करवाते?' किशोर दा ने जवाब दिया 'इसीलिए ठीक नहीं करवाता कि आप यह बात मुझसे पूछें'।" तो दोस्तों, ऐसे थे हमारे किशोर दा। अब आनंद उठाइए इस गीत का और अपने आप से यह प्रण भी करें कि जीवन में चाहे कितनी भी परेशानी और तकलीफ़ों का सामना क्यों न करना पड़े, आप हिम्मत नहीं हारेंगे, और यही एक इंसान का कर्तव्य भी है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल होगी ओल्ड इस गोल्ड पर किशोर दा के साथ मस्ती भरी पार्टी.
2. कल के गीत का थीम है - "मिलना जुलना, नशीले समां में झूमना".
3. मुखड़े की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"खबर".

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है रोहित राजपूत जी, पराग जी और दिशा जी को जबरदस्त टक्कर देने वाले हैं. ४ अंक हुए आपके. अब आप सुमित जी से आगे हैं. मनु जी के hnm का मतलब तो अब शरद जी और स्वप्न जी समझ ही गए होंगें, वैसे बड़ा ही दिलचस्प abbreviation था ये तो. पराग जी कहते हैं जब जागो तभी सवेरा, तो जब भी आप उठें तब भी देख लेंगें तो बात बन सकती हैं :) सुमित जी और मंजू जी हमें उम्मीद है कि आज के गीत ने आपको भी एक नयी प्रेरणा दी होगी.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई..... महफ़िल-ए-बेइख्तियार और "गुलज़ार"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३६

दिशा जी की नाराज़गी को दूर करने के लिए लीजिए हम लेकर हाज़िर हैं उनकी पसंद की पहली गज़ल। इस गज़ल की खासियत यह है कि जहाँ एक तरह इसे आवाज़ दिया है गज़लों के उस्ताद "गज़लजीत" जगजीत सिंह जी ने तो वहीं इसे लिखा है कोमल भावनाओं को अपने कोमल लफ़्जों में लपेटने वाले शायर "गुलज़ार" ने। जगजीत सिंह जी की गज़लों और नज़्मों को लेकर न जाने कितनी बार हम इस महफ़िल में हाज़िर हो चुके हैं और यकीन है कि इसी तरह आगे भी उनकी आवाज़ से हमारी यह बज़्म रौशन होती रहेगी। अब चूँकि जगजीत सिंह जी हमारी इस महफ़िल के नियमित फ़नकार हैं इसलिए हर बार उनका परिचय देना गैर-ज़रूरी मालूम होता है। वैसे भी जगजीत सिंह और गुलज़ार ऐसे दो शख्स हैं जिनकी ज़िंदगी के पन्ने अकेले हीं खुलने चाहिए, उस दौरान किसी और की आमद बने बनाए माहौल को बिगाड़ सकती है। इसलिए हमने यह फ़ैसला किया है कि आज की महफ़िल को "गुलज़ार" की शायरी की पुरकशिश अदाओं के हवाले करते हैं। जगजीत सिंह जी तो हमारे साथ हीं हैं, उनकी बातें अगली बार कभी कर लेंगे। "गुलज़ार" की बात अगर शुरू करनी हो तो इस काम के लिए अमृता प्रीतम से अच्छा कौन हो सकता है। अमृता प्रीतम कहती हैं: गुलज़ार एक बहुत प्यारे शायर हैं- जो अक्षरों के अंतराल में बसी हुई ख़ामोशी की अज़मत को जानते हैं, उनकी एक नज़्म सामने रखती हूँ-

रात भर सर्द हवा चलती रही...
...रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने

इन अक्षरों से गुजरते हुए- एक जलते और बुझते हुए रिश्ते का कंपन हमारी रगों में उतरने लगता है, इतना कि आँखें उस कागज़ की ओर देखने लगती हैं जो इन अक्षरों के आगे खाली हैं और लगता है- एक कंपन है, जो उस खाली कागज़ पर बिछा हुआ है। गुलज़ार ने उस रिश्ते के शक्ति-कण भी पहचाने हैं, जो कुछ एक बरसों में लिपटा हुआ है और उस रिश्ते के शक्ति-कण भी झेले हैं, जो जाने कितनी सदियों की छाती में बसा है...कह सकती हूँ कि आज के हालात पर गुलज़ार ने जो लिखा है, हालात के दर्द को अपने सीने में पनाह देते हुए, और अपने खून के कतरे उसके बदन में उतारते हुए-वह उस शायरी की दस्तावेज है, जो बहुत सूक्ष्म तरंगों से बुनी जाती है। ताज्जुब नहीं होता, जब अपने खाकी बदन को लिए, उफ़क़ से भी परे, इन सूक्ष्म तरंगों में उतर जाने वाला गुलज़ार कहता है-

वह जो शायर था चुप-सा रहता था,
बहकी-बहकी-सी बातें करता था....

फ़ना के मुकाम का दीदार जिसने पाया हो, उसके लिए बहुत मुश्किल है उन तल्ख घटनाओं को पकड़ पाना, जिनमें किसी रिश्ते के धागे बिखर-बिखर जाते हैं। गुलज़ार ने सूक्ष्म तरंगों का रहस्य पाया है, इसलिए मानना मुश्किल है कि ये धागे जुड़ नहीं सकते। इस अवस्था में लिखी हुई गुलज़ार की एक बहुत प्यारी नज़्म है, जिसमें वह कबीर जैसे जुलाहे को पुकारता है-

मैने तो इक बार बुना था एक हीं रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे..

लगता है- गुलज़ार और कबीर ने एक साथ कई नज़्मों में प्रवेश किया है- और ख़ाकी बदन को पानी का बुलबुला मानते हुए- यह रहस्य पाया है कि वक्त की हथेली पर बहता यह वह बुलबुला है, जिसे कभी न तो समंदर निगल सका, न कोई इतिहास तोड़ पाया!


गुलज़ार ने अपने जिस मित्र "मंसूरा अहमद" के लिए ये पंक्तियाँ लिखीं थी:

आज तेरी एक नज़्म पढी थी,
पढते-पढते लफ़्ज़ों के कुछ रंग लबों पर छूट गए...
....सारा दिन पेशानी पर,
अफ़शाँ के ज़र्रे झिलमिल-झिलमिल करते रहे।

उन्होंने गुलज़ार का परिचय कुछ यूँ दिया है:

कहीं पहले मिले हैं हम
धनक के सात रंगों से बने पुल पर मिले होंगे
जहाँ परियाँ तुम्हारे सुर के कोमल तेवरों पर रक़्स
करती थीं
परिन्दे और नीला आसमां
झुक झुक के उनको देखते थे
कभी ऐसा भी होता है हमारी ज़िंदगी में
कि सब सुर हार जाते हैं
फ़्रक़त एक चीख़ बचती है
तुम ऐसे में बशारत बन के आते हो
और अपनी लय के जादू से
हमारी टूटती साँसों से इक नग़मा बनाते हो
कि जैसे रात की बंजर स्याही से सहर फूटे
तुम्हारे लफ़्ज़ छू कर तो हमारे ज़ख़्म लौ देने लगे हैं...!


अब चलिए जनाब विनोद खेतान से रूबरु हो लेते हैं जो गुलज़ार साहब के बारे में ये विचार रखते हैं: ज़िन्दगी के अनगिन आयामों की तरह उनकी कविता में एक ही उपादान, एक ही बिम्ब कहीं उदासी का प्रतीक होता है और कहीं उल्लास का। गुलज़ार की कविता बिम्बों की इन तहों को खोलती है। कभी भिखारिन रात चाँद कटोरा लिये आती है और कभी शाम को चाँद का चिराग़ जलता है; कभी चाँद की तरह टपकी ज़िन्दगी होती है और कभी रातों में चाँदनी उगाई जाती है। कभी फुटपाथ से चाँद रात-भर रोटी नजर आता है और कभी ख़ाली कासे में रात चाँद की कौड़ी डाल जाती है। शायद चाँद को भी नहीं पता होगा कि ज़मीन पर एक गुलज़ार नाम का शख़्स है, जो उसे इतनी तरह से देखता है। कभी डोरियों से बाँध-बाँध के चाँद तोड़ता है और कभी चौक से चाँद पर किसी का नाम लिखता है, कभी उसे गोरा-चिट्टा-सा चाँद का पलंग नज़र आता है जहाँ कोई मुग्ध होकर सो सकता है और कभी चाँद से कूदकर डूबने की कोशिश करता है। गुलज़ार के गीतों में ये अद्भुत प्रयोग बार-बार दीखते हैं और हर बार आकर्षित करते हैं। कभी आँखों से खुलते हैं सबेरों के उफ़ुक़ और कभी आँखों से बन्द होती है सीप की रात; और यदि नींद नहीं आती तो फिर होता है आँखोंमें करवट लेना। कभी उनकी ख़ामोशी का हासिल एक लम्बी ख़ामोशी होता है और कभी दिन में शाम के अंदाज होते हैं या फिर जब कोई हँसता नहीं तो मौसम फीके लगते हैं। जब गुलज़ार की कविता में आँखें चाँद की ओर दिल से मुख़ातिब होती हैं तो लगता है इस शायर का ज़मीन से कोई वास्ता नहीं। पर यथार्थ की ज़मीन पर गुलज़ार का वक्त रुकता नहीं कहीं टिककर (क्योंकि) इसकी आदत भी आदमी-सी है, या फिर घिसते-घिसटते फट जाते हैं जूते जैसे लोग बिचारे। शायर ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को मुक़म्मल देखना चाहता है और आगाह करता है कि वक़्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते; या फिर वक़्त की विडंबना पर हँसता है कि वो उम्र कम कर रहा था मेरी, मैं साल अपने बढ़ा रहा था। कभी वह ख़्वाबों की दुनिया में सोए रहना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि जाग जाएगा ख़्वाब तो मर जाएगा और कभी वह बिल्कुल चौकन्ना हो जाता है क्योंकि उसे पता है कि समय बराबर कर देता है समय के हाथ में आरी है, वक्त से पंजा मत लेना वक्त का पंजा भारी है। पर फिर भी उम्मीद इतनी कि उसने तिनके उठाए हुए हैं परों पर।

गुलज़ार साहब के बारे में कहने को और भी कई सारी बाते हैं, लेकिन आज बस इतना हीं। अब चलिए हम "मरासिम" से आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं। जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ के बीच गुलज़ार जब "तुम्हारे ग़म की..." लेकर आते हैं तो मानो वक्त भी बगले झांकने लगता है। यकीन न हो तो खुद हीं देख लीजिए:

दिन कुछ ऐसे ग़ुज़ारता है कोई
जैसे एहसाँ उतारता है कोई

आईना देख कर तसल्ली हुई
हमको इस घर मे जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

तुम्हारे ग़म की डली उठाकर
जबां पर रख ली देखो मैने,
ये कतरा-कतरा पिघल रही है,
मैं कतरा-कतरा हीं जी रहा हूँ।

देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

___ लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...


आपके विकल्प हैं -
a) सब्र, b) जब्त, c) दर्द, d) शेखी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ग़म" और शेर कुछ यूं था -

अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं,
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी।

इस शब्द के साथ सबसे पहला जवाब आया शरद जी का। शरद जी ने दो शेर भी पेश किए:

आप तो जब अपने ही ग़म देखते है
किसलिए फ़िर मुझमें हमदम देखते हैं (स्वरचित)

दिल गया तुमने लिया हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें । (दाग़ देहलवी)

शरद जी के बाद कुलदीप जी हाज़िर हुए और उन्होंने तो जैसे शेरों की बाढ हीं ला दी। एक के बाद १७-१८ टिप्पणियाँ करना इतना आसान भी नहीं है। मुझे लगता है कि कुलदीप जी शामिख साहब को पीछे करने पर तुले हैं और यह देखिए आज शामिख साहब हमारी महफ़िल में आए हीं नहीं। कुलदीप जी ने घोषणा हीं कर दी कि चूँकि "ग़म" उनका प्रिय शब्द है, इसलिए आज उन्हें कोई नहीं रोक सकता :) अब उनके सारे शेरों को तो पेश नहीं किया जा सकता। इसलिए उन शेरों का यहाँ ज़िक्र किए देता हूँ जिनमें ग़म शब्द आता है:

अब तो हटा दो मेरे सर से गमो की चादर को
आज हर दर्द मुझपे इतना निगेहबान सा क्यूँ है

नीचे पेश हैं खुमार साहब के शेर, जिन्हें कुलदीप जी ने कई सारी गज़लों के माध्यम से हमारे बीच रखा:

हाले गम उन को सुनते जाइये
शर्त ये है के मुस्कुराते जाईये

हाले-गम कह कह के गम बढा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे

कभी जो मैं ने मसर्रत का एहतमाम किया
बड़े तपाक से गम ने मुझे सलाम किया

सुकून ही सुकून है खुशी ही खुशी है
तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है

कुलदीप जी के बाद मंजु जी का हमारी महफ़िल में आना हुआ। यह रहा उनका स्वरचित शेर:

उनका आना है ऐसा जैसे हो हसीन रात ,
उनका जाना है ऐसे जैसे गम की हो बरसात

अदा जी भी अपने आप को एक पूरी गज़ल पेश करने से रोक नहीं पाईं। यह रहा वह शेर जिसमें ’ग़म’ शब्द की आमद है:

गम है या ख़ुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मनु जी ने अपना वह शेर पेश किया जिसे कुछ दिनों पहले ’हिन्द-युग्म’ पर पोस्ट किया गया था:

मिला जो दर्द तेरा और लाजवाब हुई
मेरी तड़प थी जो खींचकर गम-ए-शराब हुई

रचना जी की प्रस्तुति भी काबिल-ए-तारीफ़ रही। यह रहा उनका शेर:

मेरी सोच का कोई किनारा न होता
ग़म न होता तो कोई हमारा न होता

शरद जी की बात से एक हद तक मैं भी इत्तेफ़ाक रखता हूँ। हमारी पहेली का नियम यह है कि जो शब्द सही हो उसे लेकर या तो अपना कोई शेर डालें या फिर किसी जानीमानी हस्ती का, लेकिन बस शेर हीं। पूरी गज़ल डालने से मज़ा चला जाता है। लेकिन अगर पूरी गज़ल डालने का आपने मन बना हीं लिया है तो इस बात का यकीन कर लें कि उस गज़ल में वह शब्द ज़रूर आता है, रवानी में इस कदर भी न बह जाएँ कि किसी शायर की सारी गज़लें डालने लगें।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, August 6, 2009

छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में....सपनों को पंख देती किशोर कुमार की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 163

प्रोफ़. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने कहा है कि "Dream is not something that we see in sleep; Dream is something that does not allow us to sleep"| इस एक लाइन में उन्होने कितनी बड़ी बात कही हैं। सच ही तो है, सपने तभी सच होते हैं जब उसको पूरा करने के लिए हम प्रयास भी करें। केवल स्वप्न देखने से ही वह पूरा नहीं हो जाता। ख़ैर, आप भी सोच रहे होंगे कि मैं किस बात को लेकर बैठ गया। दरअसल इन दिनों आप सुन रहे हैं किशोर कुमार के गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़', जिसके तहत हम किशोर दा की आवाज़ के ज़रिये ज़िंदगी के दस अलग अलग पहलुओं पर रोशनी डाल रहे हैं, और आजका पहलू है 'सपना'। जी हाँ, वही सपना जो हर इंसान देखता है, कोई सोते हुए देखता है तो कोई जागते हुए। किसी को ज़िंदगी में बड़ा नाम कमाने का सपना होता है, तो किसी को अर्थ कमाने का। आप यूं भी कह सकते हैं कि यह दुनिया सपनों की ही दुनिया है। आज किशोर दा की आवाज़ के ज़रिये हम जो सपना देखने जा रहे हैं वह मेरे ख़याल से हर आम आदमी का सपना है। हर आदमी अपने परिवार को सुखी देखना चाहता है, वह चाहता है अपने परिवार के लिए एक सुंदर सा घर बनायें, छोटी सी प्यारी सी एक दुनिया बसायें, जिसमें हों केवल ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ, मिलन ही मिलन। जी हाँ, आज ज़िक्र है फ़िल्म 'नौकरी' के गीत का, "छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में, आशा दीवानी मन में बंसुरी बजाए, हम ही हम चमकेंगे तारों के इस गाँव में, आँखों की रोशनी हरदम ये समझाये"।

'दो बीघा ज़मीन' के बाद बिमल राय और सलिल चौधरी का साथ एक बार फिर जमा १९५४ की दो फ़िल्मों में। एक थी 'बिराज बहू' और दूसरी 'नौकरी'। जहाँ 'दो बीघा ज़मीन' की कहानी ग्रामीण समस्या पर आधारित थी, 'नौकरी' का आधार था शहरों में बेरोज़गारी की समस्या। बिमल राय प्रोडक्शन्स के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के नायक थे किशोर कुमार, और उनके साथ थे शीला, निरुपा राय एवं बलराज साहनी। दुर्भाग्यवश 'नौकरी' वह कमाल नहीं कर सकी जो कमाल 'दो बीघा ज़मीन' ने दिखाया था। लेकिन सलिल चौधरी के स्वरबद्ध कम से कम एक गीत को श्रोताओं ने कालजयी करार दिया। और वह गीत है आज का प्रस्तुत गीत। गीतकार शैलेन्द्र के सीधे सरल शब्दों की एक और मिसाल यह गीत बड़े ही प्यारे शब्दों में एक आम आदमी के सपनों की बात करता है। पहले अंतरे में भाई अपनी छोटी बहन के लिए चांदी की कुर्सी और बेटा अपनी माँ के लिए सोने के सिंहासन का सपना देखता है, तो दूसरे अंतरे में भाई अपनी बहन की शादी करवाने का सपना देखता है। तथा तीसरे अंतरे में माँ के अपने बेटे का घर बसाने के सपने का ज़िक्र हुआ है। कुल मिलाकर यह गीत एक आम आदमी और एक आम घर परिवार के सपनों का संगम है। गीत के अंत में आप को एक लड़की की आवाज़ भी सुनाई देगी, क्या आप जानते हैं यह किसकी आवाज़ है? यह आवाज़ है लता और आशा की बहन उषा मंगेशकर की। जी हाँ, उनका गाया यह पहला पहला गीत था। इसी साल उन्होने 'चांदनी चौक' व 'सुबह का तारा' में भी गानें गाये और इस तरह से अपनी बड़ी दो बहनों की तरह वो भी फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में अपने पाँव बढ़ा ही दिये। दोस्तों, आज का यह गीत सुनने से पहले आप को यह बता दें कि इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जिसे हेमन्त कुमार ने गाया है, और इस गीत की धुन पर सलिल दा ने एक ग़ैर फ़िल्मी बंगला गीत भी रचा है जिसे उन्ही की बेटी अंतरा चौधरी ने गाया था जिसके बोल हैं "एक जे छिलो राजा होबुचंद्र ताहार नाम..."। हेमन्त दा और अंतरा चौधरी के गाये इन गीतों को आप फिर कभी सुन लीजियेगा दोस्तों, फिलहाल किशोर दा के गाये गीत की बारी। और हाँ, एक और बात, सपने देखिये लेकिन सोती आँखों से नहीं, बल्कि जागती हुई आँखों से। बड़े बड़े सपने देखिये, उन्हे पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत कीजिये। यकीन मानिए, एक दिन आप को अपनी मेहनत का सिला ज़रूर मिलेगा, और आप भी कहेंगे कि "सच हुए सपने तेरे, झूम ले ओ मन मेरे" !



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. दादा के गाये इस गीत के क्या कहने, शायद ही कोई ऐसा होगा जो इसे सुनकर प्रेरणा से न भर जाए.
2. कल के गीत का थीम है - "प्रेरणा".
3. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"नैन".

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
चलिए पराग जी नींद से जागे, और सही जवाब देकर दिशा जी से २ अंकों की बढ़त ले ली..१२ अंकों के लिए बधाई जनाब. मनु जी आपकी कशमकश कब दूर होगी...स्वप्न जी और दिलीप जी आपका भी आभार, शरद जी नहीं दिखे कल :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गाइए लता का गीत और बनिए आवाज़ का नया सुर-तारा - नया आग़ाज़

कैरिऑकि ट्रैक पर अपना हुनर दिखाने का सुनहर मौका

हममें से ऐसे बहुत होंगे जिनको बचपन से ही गाने का शौक रहा होगा। घूमते वक़्त- नहाते वक़्त या कहीं यात्रा करते वक़्त अपने सुकूँ के क्षणों में फिल्मी गीतों की पंक्तियाँ हम सभी की ज़ुबान पर ज़रूर तैरी होंगी। बहुत से लोगों ने अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में संगीत के साथ यानी कैरिऑके ट्रैक पर अपनी गायक-कला का लोहा भी ज़रुर मनवाया होगा। हम ऐसे ही गायकों को इससे भी आगे एक और मंच दे रहे हैं। हिन्द-युग्म आज से एक नई प्रतियोगिता 'आवाज़ सुर-तारा' का आग़ाज़ कर रहा है, जिसके माध्यम से शौकिया तौर पर गाने वालों को भी एक मंच मिलेगा। यह आयोजन प्रतिमाह किया जायेगा और नग़द इनाम भी दिया जायेगा। इस आयोजन में हम किसी चर्चित हिन्दी फिल्मी गीत के कैरिऑकि (Kara-oke) ट्रैक पर गायकों से गाने को कहेंगे, सबसे बढ़िया प्रविष्टि को माह का 'आवाज़ सुर-तारा' घोषित किया जायेगा और रु 1000 का नग़द इनाम दिया जायेगा। गौरतलब है कि आवाज़ के इसी मंच पर मई माह से प्रत्येक माह महान कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध करने की प्रतियोगिता 'गीतकास्ट' का आयोजन किया जा रहा है।

'आवाज़ सुर-तारा' प्रतियोगिता में हमें अधिकाधिक इनपुट आवाज़ की दैनिक पाठिका स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' की ओर से मिल रहा है। हमारे स्थाई श्रोताओं को मालूम है कि हिन्द-युग्म अक्टूबर 2007 से इंटरनेट के माध्यम से गीतों को कम्पोज करने की प्रतियोगिता करता आ रहा है। विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली 2008 में हिन्द-युग्म अपना पहला एल्बम भी ज़ारी कर चुका है। 2008 का संगीतबद्ध सत्र बहुत सफल रहा, जिसमें हिन्द-युग्म ने 4 जुलाई 2008 से 31 दिसम्बर 2008 तक प्रत्येक शुक्रवार को एक संगीतबद्ध गीत का विश्वव्यापी उद्‍घाटन किया।

हिन्द-युग्म के पास गायकों-संगीतकारों-गीतकारों की अच्छी फ़ौज़ है, लेकिन हम इसमें लगातार बढोत्तरी के आकांक्षी हैं, इसलिए हम इस प्रतियोगिता के माध्यम से भी नये गायकों की अपनी खोज ज़ारी रखना चाहते हैं, ताकि संगीतबद्ध गीतों के आने वाले सत्रों के लिए हम इनका इस्तेमाल कर सकें और किसी भी तरह के गीत को गाने के लिए हमारे पास गायकों का आभाव न हो।

दुनिया में हर जगह शुरूआत को महिलाओं से करने की परम्परा है, इसलिए हम भी पहले महीने में स्त्री-स्वर के गीत से इस प्रतियोगिता की शुरूआत कर रहे हैं। और स्त्री-स्वरों में लता मंगेशकर की आवाज़ श्रेष्ठ हैं।

प्रतियोगिता में भाग लेने के नियम और शर्तें-

1) प्रतियोगिता के दो चरण होंगे।
2) पहले चरण में अपनी पसंद की लता के किसी कैरिऑकि ट्रैक पर या हमारे द्वारा दिये गये तीन कैरिऑके ट्रैकों में से किसी भी एक पर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके हमें भेजने होगी।
3) पहले चरण (राउंड) से हम उन गायकों को चुनेंगे जिनमें संभावनाएँ अधिक होंगी।
4) चयनित प्रतिभागियों को दूसरे राउंड में गाने के लिए 1 या 2 ट्रैक दिये जायेंगे, जिसमें से किसी एक पर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके हमें भेजना होगा। दूसरे चरण में हमारे द्वारा दिये गये कैरिऑकि ट्रैक पर ही आपको गाना होगा।
5) पहले चरण के लिए रिकॉर्डिंग को mp3 (128kbps) फॉर्म में हमें podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल द्वारा भेजना होगा।
6) कैरिऑके ट्रैक क्या होते हैं और उनपर रिकॉर्डिंग कैसे करते हैं- जानने के लिए क्लिक करें
7) इस प्रतियोगिता में हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में भाग ले चुके गायक-गायिका भाग नहीं ले सकेंगे।
8) जजमेंट-टीम में बॉलीवुड-फेम के कुछ गायक भी शामिल हैं।

यदि आपके पास कोई ट्रैक नहीं है तो हम लता मंगेशकर द्वारा गाये गये तीन फिल्मी गीतों के कैरिऑकि ट्रैक दे रहे हैं, जिसमें से किसी एक पर आपको अपनी आवाज़ डब करके 31 अक्टूबर 2009 तक भेजनी है। कैरिऑके ट्रैक को बजाने, रिकॉर्ड तथा मिक्स करने का काम कनाडा निवासियों संतोष शैल, हरदीप बक्षी और अमर ने किया है।

1॰ परदेस जा के परदेसिया (फिल्म- अर्पण)


2॰ शीशा हो या दिल हो (फिल्म- आशा)


3॰ वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गई (फिल्म- संजोग)


आपको जो ट्रैक पसंद आये, उसे निम्नलिखित लिंकों से डाउनलोड कर लें, साथ ही साथ आप गीत के बोलों को रोमन(हिन्दी) या देवनागरी(हिन्दी) में देखना चाहें तो उसे भी डाउनलोड कर लें।

Pardes Ja ke PardesiaSheesha Ho Ya
Wo Bhooli DastanGeet ke Bol (Lyrics)


इस अंक की प्रायोजक- स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'

Wednesday, August 5, 2009

एक हजारों में मेरी बहना है...रक्षा बंधन पर शायद हर भाई यही कहता होगा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 162

"कभी भ‍इया ये बहना न पास होगी, कहीं परदेस बैठी उदास होगी, मिलने की आस होगी, जाने कौन बिछड़ जाये कब भाई बहना, राखी बंधवा ले मेरे वीर"। रक्षाबंधन के पवित्र पर्व के उपलक्ष्य पर हिंद युग्म की तरफ़ से हम आप सभी को दे रहे हैं हार्दिक शुभकामनायें। भाई बहन के पवित्र रिश्ते की डोर को और ज़्यादा मज़बूत करता है यह त्यौहार। राखी उस धागे का नाम है जिस धागे में बसा हुआ है भाई बहन का अटूट स्नेह, भाई का अपनी बहन को हर विपदा से बचाने का प्रण, और बहन का भाई के लिए मंगलकामना। इस त्यौहार को हमारे फ़िल्मकारों ने भी ख़ूब उतारा है सेल्युलायड के परदे पर। गानें भी एक से बढ़कर एक बनें हैं इस पर्व पर। क्योंकि इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चल रहा है किशोर कुमार के गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़', जिसके तहत हम जीवन के अलग अलग पहलुओं को किशोर दा की आवाज़ के ज़रिये महसूस कर रहे हैं, तो आज महसूस कीजिए भाई बहन के नाज़ुक-ओ-तरीन रिश्ते को किशोर दा के एक बहुत ही मशहूर गीत के माध्यम से। यह एक ऐसा सदाबहार गीत है भाई बहन के रिश्ते पर, जिस पर वक्त की धुल ज़रा भी नहीं चढ़ पायी है, ठीक वैसे ही जैसे कि भाई बहन के रिश्ते पर कभी कोई आँच नहीं आ सकती। 'हरे रामा हरे कृष्णा' फ़िल्म के इस गीत को आप ने कई कई बार सुना होगा, लेकिन आज इस ख़ास मौके पर इस गीत का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। हमें पूरी उम्मीद है कि आज इस गीत का आप दूसरे दिनों के मुक़ाबले ज़्यादा आनंद उठा पायेंगे।

फ़िल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' सन् १९७१ की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे देव आनंद, ज़ीनत अमान और मुमताज़। दोस्तों, यह फ़िल्म उन गिने चुने फ़िल्मों में से है जिनकी कहानी नायक और नायिका के बजाये भाई और बहन के चरित्रों पर केन्द्रित है। भाई बहन के रिश्ते पर कामयाब व्यावसायिक फ़िल्म बनाना आसान काम नहीं है। इसमें फ़िल्मकार के पैसे दाव पर लग जाते हैं। लेकिन देव आनंद ने साहस किया और उनके उसी साहस का नतीजा है कि दर्शकों को इतनी अच्छी भावुक फ़िल्म देखने को मिली। इस फ़िल्म को देख कर किसी की आँखें नम न हुई हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। माँ बाप के अलग हो जाने की वजह से बचपन में एक दूसरे से बिछड़ गये भाई और बहन। भाई तो ज़िंदगी की सही राह पर चला लेकिन बहन भिड़ गयी हिप्पियों के दल में और डुबो दिया अपने को नशे और ख़ानाबदोशी की ज़िंदगी में। नेपाल की गलियों में भटकता हुआ भाई अपनी बहन को ढ़ूंढ ही निकालता है, लेकिन शुरु में बहन बचपन में बिछड़े भाई को पहचान नहीं पाती है। तब भाई वह गीत गाता है जो बचपन में वह उसके लिए गाया करता था (लता मंगेशकर और राहुल देव बर्मन की आवाज़ों में बचपन वाला गीत है)। भाई किस तरह से ग़लत राह पर चल पड़ने वाली बहन को सही दिशा दिखाने की कोशिश करता है, इस गीत के एक एक शब्द में उसी का वर्णन मिलता है। गीत को सुनते हुए बहन भाई को पहचान लेती है, गीत के इन दृश्यों को आप शायद ही सूखी आँखों से देखे होंगे। बहन अपने भाई को अपना परिचय देना तो चाहती है, लेकिन वो इतनी आगे निकल चुकी होती है कि वापस ज़िंदगी में लौटना उसके लिए नामुमकिन हो जाता है। इसलिए वो अपना परिचय छुपाती है और अंत में ख़ुदकुशी कर लेती है। प्रस्तुत गीत फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है। आनंद बक्शी, राहुल देव बर्मन और किशोर कुमार की तिकड़ी ने एक ऐसा दिल को छू लेनेवाला गीत तैयार किया है कि चाहे कितनी भी बार गीत को सुने, हर बार आँखें भर ही आती हैं। देव आनंद साहब ने ख़ुद इस फ़िल्म की कहानी लिखी और फ़िल्म को निर्देशित भी किया। इस फ़िल्म के लिए देव साहब की जितनी तारीफ़ की जाये कम ही होगी। इसके बाद शायद ही इस तरह की कोई फ़िल्म दोबारा बनी हो! इस फ़िल्म को बहुत ज़्यादा पुरस्कार तो नहीं मिला सिवाय आशा भोंसले के ("दम मारो दम" गीत के लिए फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार), लेकिन असली पुरस्कार है दर्शकों का प्यार जो इस फ़िल्म को भरपूर मिला, और साथ ही इस फ़िल्म के गीत संगीत को भी। तो लीजिए, रक्षाबंधन के इस विशेष अवसर पर सुनिये किशोर दा की आवाज़ में एक भाई के दिल की पुकार। आप सभी को एक बार फिर से रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. किशोर दा के गाये बहतरीन गीतों में से एक.
2. कल के गीत का थीम है - "सपने".
3. मुखड़े की तीसरी पंक्ति में शब्द है -"गाँव".

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित राजपूत जी रूप में हमें मिले एक नए प्रतिभागी...२ अंकों के लिए बधाई रोहित जी, पराग जी अपना ख्याल रखियेगा, सभी श्रोताओं को एक बार फिर इस पावन पर्व की ढेरों शुभकामनायें...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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