Wednesday, April 29, 2009

असली गीता दत्त की खोज में...

जब मैं गीता दत्त के गाने सुनता हूँ तब दुविधा में पड़ जाता हूँ. "मैं तो गिरिधर के घर जाऊं" गानेवाली वो ही गायिका हैं क्या जिसने कहा था "ओह बाबू ओह लाला". जो एक छोटे बालक की आवाज़ में फल तथा सब्जी बेच रही थी "फल की बहार हैं केले अनार हैं" वो ही एक विरहन के बोल सुना रही थी "आओगे ना साजन आओगे ना"! शास्त्रीय संगीत की मधुर लय और तानपर "बाट चलत नयी चुनरी रंग डारी" की शिकायत हो रही थी और तभी जनम जन्मांतर का साथ निभाने वाला गीत "ना यह चाँद होगा ना तारे रहेंगे मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेंगे" गाया जा रहा था.

"कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ" में सचमुच किसी दूर कोने से एक बिरहन की वाणी सुनाई आ रही थी और साथ ही "चंदा चांदनी में जब चमके क्या हो, आ मिले जो कोई छम से पूछते हो क्या हमसे?" यह सवाल किया जा रहा था. रेलगाडी की धक् धक् पर चलती हुई रेहाना गीता की आवाज़ पर थिरक कर गा रही थी" धक् धक् करती चली हम सब से कहती चली जीवन की रेल रे मुहब्बत का नाम हैं दिलों का मेल रे". अपने आप से सवाल किया जा रहा था "ए दिल मुझे बता दे तू किस पे आ गया हैं?" और सखी को छेड़ने की नटखट अदा थी "अँखियाँ भूल गयी हैं सोना". सोलह साल की लड़की का बांकपन था "चन्दा खेले आँख मिचौली बदली से नदी किनारे, दुल्हन खेले फागन होली" और "तोरा मनवा क्यों घबराएँ रे" में एक अनुभव की पुकार थी. "मेरा सुन्दर सपना बीत गया" गानेवाली "मेरा नाम चिन चिन चू" के जलवे बिखर रही थी. उसी वक्त "कल रात पिया ने बात कहीं कुछ ऐसी, मतवाला भंवरा कहे कली से जैसी" के मदहोश बोल सुनाये जा रहे थे.

युगल गीतों की बात की जाए तो एक तरफ "कल साजना मिलना यहाँ, हैं तमाम काम धाम रे आज ना आज ना" की स्वाभाविक शिकायत की जा रही थी वहीँ दूसरी ओर "तुमसे ही मेरी ज़िन्दगी मेरी बहार तुम" के स्वर गूँज रहे थे. "अरमां भरे दिल की लगन तेरे लिए हैं" के सुरीले स्वरों के साथ "ख्यालों में किसीके इसी तरहे आया नहीं करते" की तकारार हो रही थी. "रात हैं अरमान भरी और क्या सुहानी रात हैं, आज बिछडे दिल मिले हैं तेरा मेरा साथ हैं" के रोमांचक ख्यालों के साथ साथ राधा और कृष्ण के रंग में डूबा हुआ "आन मिलो आन मिलो श्याम सांवरे ब्रिज में अकेली राधे खोयी खोयी फिरे" की व्याकुल पुकार भी थी.

"मेरा दिल जो मेरा होता पलकों पे पकड़ लेती" के आधुनिक और काव्यात्मक खयालों के साथ साथ "धरती से दूर गोरे बादलों के पार आजा आजा बसाले नया संसार" की सुन्दर कविकल्पना भी थी. "मिया मेरा बड़ा बेईमान मेरी निकली रे किस्मत खोटी" की नोक-झोंक के साथ "मुझको तुम जो मिले ये जहां मिल गया" की खुशियाँ भी शामिल थी. "मोसे चंचल जवानी संभाली नहीं जाए" के लगभग कामुक भावों के साथ साथ "मेरे मुन्ने रे सीधी राह पे चलना जुग जुग तक फूलना फलना" का आशीर्वाद भी था.

नायक को कह रही थी "राजा मोहे ले चल तू दिल्ली की सैर को" और फिर कोई नटखट साजन "लखनो चलो अब रानी बम्बई का बिगडा पानी" की शिकायत करा रहा था. सखियों के साथ "चलो पनिया भरन को पतली कमरिया पे छलके गगरिया हो" गाकर नदी किनारे जाने की बातें और शादी में बिदाई के समय "बाबुल का मोरे आँगन बिछडा छूटी रे मोरी सखियाँ" की व्याकुलता थी. नायक के साथ सीटी बजाना सीखते सीखते "सुन सुन सुन जालिमा" गाया जा रहा था और गाँव की लोकधुन पर "नदिया किनारे मोरा डेरा मशाल जले सारी रतिया" गुनगुनाया जा रहा था.

"गायें गायें हम नए तराने गायें" के आधुनिक स्वरों के साथ "जमुना के तीर कान्हा आओ रो रो पुकारे राधा मीठी मीठी बंसिया बजाओ" की पुकार भी थी. हौले हौले ..हाय डोले.. के बोलों में बंगाल का जादू था और उड़ पुड जानिया में पंजाब की मिटटी की खुशबू थी. प्यार की प्यास के हिंदी गाने (उत्तर में हैं खडा हिमालय) में "आमार शोनार बांगला देश" की मधुर तान छेड़ रही थी और बंगाली फिल्म में "तेरे लिए आया हैं लेके कोई दिल" के हिंदी बोल सुना रही थी. "तालियों ना ताले" के सुरों पर गरबा का रास रचाया जा रहा था और मराठी में "गणपति बाप्पा मोरया, पुढल्या वर्षी लौकर या" गाकर गणेश भगवान् की आरती कर रही थी. माला सिन्हा की बनाई हुई नेपाली फिल्म में गाने गाये और फिर "जान लेके हथेली पे चल बैं जमाने से ना डरबएं राम" भोजपुरी में गा रही थी.

ममता गा रही थी "नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना" और एक नर्तिका की आवाज़ थी "माने ना माने ना माने ना , तेरे बिन मोरा जिया ना माने". "गुनगुन गुनगुन गुंजन करता भंवरा तुम कौन संदेसा लाये" की पार्वती थी और "एक नया तराना एक नया फ़साना एक नयी कहानी हूँ मैं, एक रंग रंगीली एक छैल छबीली मदमस्त जवानी हूँ मैं" की क्लब डांसर भी थी. मोरनी बनकर कह रही थी "आजा छाये कारे बदरा" और "आज नहीं तो कल बिखरेंगे ये बादल ओह रात के भूले हुए मुसाफिर सुबह हुई घर चल अब घर चल रे" गाकर हौसला बढा रही थी.

पाश्चात्य धुन पर थिरकता हुआ गीत "मुझे हुज़ूर तुमसे प्यार हैं तुम्हीं पे ज़िन्दगी निसार हैं" और हिंदुस्थानी संगीत का असर था "मेरे नैनों में प्रीत मेरे होंठों पे गीत मेरे सपनों में तुम ही समाये". ऐसे कई अलग अलग प्रकार के भावों के गीत गाती थी कि सुननेवाला दंग रह जाएँ. "कभी अकड़ कर बात न करना हमसे अरे मवाली " गानेवाली गायिका उसी संगीतकार के साथ मिल कर "जय जगदीश हरे" को अजरामर कर देती थी. रफी साहब के साथ तो ऐसे रसीले और सुरीले गीत गाये हैं कि उनका कोई जवाब नहीं. "अच्छा जी माफ़ कर दो, थोडा इन्साफ कर दो" गाया था फिल्म मुसाफिरखाना के लिए और उन्हीं के साथ "चुपके से मिले प्यासे प्यासे" जैसा तरल और स्वप्नील गीत भी गाया. बालक के जन्मदिन के शुभ अवसरपर एक बढिया सा गीत गाया था "पोम पोम पोम बाजा बोले ढोलक धिन धिन धिन, घडी घडी यह खुशियाँ आये बार बार यह दिन".

गीता को हमसे दूर जाकर पैंतीस से भी ज्यादा साल गुज़र चुके हैं. वैसे तो १९५० के मध्य से ही कुछ न कुछ कारणवश वो फ़िल्मी दुनिया से धीरे धीरे अलग हो रही थी. आज की तारीख में कल का बना हुआ गाना पसंद न करने वाले लोग भला ऐसे गानों को क्यूँ याद रखे और सुने जो शायद उनके जन्म लेने से भी पहले बने थे. सीधी सी बात यह हैं कि उन गीतों में अपनापन हैं, एक मिठास हैं और एक शख्सियत हैं जिसने हरेक गाने को अपने अंदाज़ में गाया. नायिका, सहनायिका, खलनायिका, नर्तकी या रस्ते की बंजारिन, हर किसी के लिए अलग रंग और ढंग के गाने गाये. "नाचे घोड़ा नाचे घोड़ा, किम्मत इसकी बीस हज़ार मैं बेच रही हूँ बीच बाज़ार" आज से साठ साल पहले बना हैं और फिर भी तरोताजा हैं. "आज की काली घटा" सुनते हैं तो लगता है सचमुच बाहर बादल छा गए हैं.

मुग्ध कन्या भानुमती पर फिल्माया गए गाने "कबूतर आजा आजा रे" और "झनन झनन झनवा मोरे बिछुआ झनन बाजे रे" ऐसी मिठास से बने हैं कि बार बार सुनने को दिल चाहता हैं. जाल के लिए साहिर साहब की रचना "जोर लगाके हैय्या पैर जमाके हैय्या" आज भी याद किया जाता है जब कोई कठिन काम करने के लिए लोग मिल जाते हैं. "सुन सुन मद्रासी छोरी के तेरे लिए दिल जलता" का जवाब दिया "चल हट रे पंजाबी छोरे के तू मेरा क्या लगता?". अलग किस्म के गाने , अलग कलाकार, अलग संगीतकार, अलग सहयोगी गायक, और अलग उन गानों के लेखक; मगर गीता दत्त का अपना ही अंदाज़ था. किसी ने कहा कि उनकी आवाज़ में शहद की मिठास और मधुमक्खी की चुभन का मिश्रण था. कोई कह गया कि ठंडी हवा में काली घटा समाई हुई थी. कोई कहता हैं गीता गले से नहीं दिल से गाती थी!

बीस से भी कम उम्र में मीराबाई के और कबीर के भजन जिस भाव और लगन से गाये उसी लगन से "दिल की उमंगें हैं जवाँ" जैसा फड़कता हुआ और मस्ती भरा गाना भी गाया. (इसी गाने में उन्हों ने कुछ शब्द भी कहें जो सुनाने लायक हैं). एक तरफ "जवानियाँ निगोडी यह सताएं, घूँघट मोरा उड़ उड़ जाएँ" और उसी फिल्म में गाया" अब कौन सुनेगा हाय रे दुखे दिल की कहानी". ऐसे कितने ही गाने हैं जो पहली बार सुनने के बावजूद भी लगता हैं कि कितना दिलकश गाना हैं, वाह वाह! "बूझो बूझो ए दिल वालों कौन सा तारा चाँद को प्यारा" बिलकुल संगीतकार पंकज मलिकके अंदाज़ में गाया था फिल्म ज़लज़ला में!

भले गाना पूरा अकेले गाती हो या फिर कुछ थोड़े से शब्द, एक अपनी झलक जरूर छोड़ देती थी. "पिकनिक में टिक टिक करती झूमें मस्तों की टोली" ऐसा युगल गीत हैं जिसमें मन्ना डे साहब और साथी कलाकार ज्यादा तर गाते हैं , और गीता दत्त सिर्फ एक या दो पंक्तियाँ गाती हैं. इस गाने को सुनिए और उनकी आवाज़ की मिठास और हरकत देखिये. ऐसा ही गाना हैं रफी साहब के साथ "ए दिल हैं मुश्किल जीना यहाँ" जिसमे गीता दत्त सिर्फ आखिरी की कुछ पंक्तियाँ गाती हैं. "दादा गिरी नहीं चलने की यहाँ.." जिस अंदाज़ में गाया हैं वो अपने आप में गाने को चार चाँद लगा देता हैं. ऐसा ही एक उदाहरण हैं एक लोरी का जिसे गीता ने गया हैं पारुल घोष जी के साथ. बोल हैं " आ जा री निंदिया आ", गाने की सिर्फ पहली दो पंक्तियाँ गीता के मधुर आवाज़ मैं हैं और बाकी का पूरा गाना पारुल जी ने गाया हैं.

बात हो चाहे अपने से ज्यादा अनुभवी गायकों के साथ गाने की (जैसे की मुकेश, शमशाद बेग़म और जोहराजान अम्बलावाली) या फिर नए गायकोंके साथ गाने की (आशा भोंसले, मुबारक बेग़म, सुमन कल्याणपुर, महेंद्र कपूर या अभिनेत्री नूतन)! न किसी पर हावी होने की कोशिश न किसीसे प्रभावित होकर अपनी छवि खोना. अभिनेता सुन्दर, भारत भूषण, प्राण, नूतन, दादामुनि अशोक कुमार जी और हरफन मौला किशोर कुमार के साथ भी गाने गाये!

चालीस के दशक के विख्यात गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ तो इतने ख़ूबसूरत गाने गाये हैं मगर दुर्भाग्य से उनमें से बहुत कम गाने आजकल उपलब्ध हैं. ग़ज़ल सम्राट तलत महमूद के साथ प्रेमगीत और छेड़-छड़ भरे मधुर गीत गायें. इन दोनों के साथ संगीतकार बुलो सी रानी द्वारा संगीतबद्ध किया हुआ "यह प्यार की बातें यह आज की रातें दिलदार याद रखना" बड़ा ही मस्ती भरा गीत हैं, जो फिल्म बगदाद के लिए बनाया गया था. इसी तरह गीता ने तलत महमूद के साथ कई सुरीले गीत गायें जो आज लगभग अज्ञात हैं.

जब वो गाती थी "आग लगाना क्या मुश्किल हैं" तो सचमुच लगता हैं कि गीता की आवाज़ उस नर्तकी के लिए ही बनी थी. गाँव की गोरी के लिए गाया हुआ गाना "जवाब नहीं गोरे मुखडे पे तिल काले का" (रफी साहब के साथ) बिलकुल उसी अंदाज़ में हैं. उन्ही चित्रगुप्त के संगीत दिग्दर्शन में उषा मंगेशकर के साथ गाया "लिख पढ़ पढ़ लिख के अच्छा सा राजा बेटा बन". और फिर उसी फिल्म में हेलन के लिए गाया "बीस बरस तक लाख संभाला, चला गया पर जानेवाला, दिल हो गया चोरी हाय..."!

सन १९४९ में संगीतकार ज्ञान दत्त का संगीतबद्ध किया एक फडकता हुआ गीत "जिया का दिया पिया टीम टीम होवे" शमशाद बेग़म जी के साथ इस अंदाज़ में गाया हैं कि बस! उसी फिल्म में एक तिकोन गीत था "उमंगों के दिन बीते जाए" जो आज भी जवान हैं. वैसे तो गीता दत्त ने फिल्मों के लिए गीत गाना शुरू किया सन 1946 में, मगर एक ही साल में फिल्म दो भाई के गीतों से लोग उसे पहचानने लग गए. अगले पांच साल तक गीता दत्त, शमशाद बेग़म और लता मंगेशकर सर्वाधिक लोकप्रिय गायिकाएं रही. अपने जीवन में सौ से भी ज्यादा संगीतकारों के लिए गीता दत्त ने लगभग सत्रह सौ गाने गाये.

अपनी आवाज़ के जादू से हमारी जिंदगियों में एक ताज़गी और आनंद का अनुभव कराने के लिए संगीत प्रेमी गीता दत्त को हमेशा याद रखेंगे.

प्रस्तुति - पराग संकला
(पराग गीता जी के बहुत बड़े भक्त हैं, उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर एक वेबसाइट भी बनाई है जो गीता जी की अमर आवाज़ को समर्पित है...गीता दत्त के जीवन से जुडी तमाम जानकारियाँ आप उनकी साईट पर पा सकते हैं, पता है -
गीता दत्त. कॉम




उपर पराग जी ने जिन गीतों का जिक्र किया है उनमें से अधिकतर गीतों को बहुत से श्रोताओं ने शायद कभी नहीं सुना होगा, तो लीजिये इनमें से कुछ बेहद अनसुने से दुर्लभ गीत आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं...गीता जी के और भी गीत हम समय समय पर आपको सुनवाते रहेंगें, ये वादा है...आज सुनिए ये चुनिन्दा नग्में -

बुलबुल मेरे चमन के...


आओगे न सजन आओगे न...


आज की काली घटा...


चलो पनिया भरन को...


एक रात की ये प्रीत...


और अंत में सुनिए ये लाजवाब गीत - उत्तर में खडा हिमालय....

Tuesday, April 28, 2009

जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी...रफी साहब पूछ रहे हैं गीता दत्त से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 64

पुराने ज़माने की फ़िल्मों में नायक-नायिका की जोड़ी के अलावा एक जोड़ी और भी साथ साथ फ़िल्म में चलती थी, और यह जोड़ी हुआ करती थी दो हास्य-कलाकारों की। जॉनी वाकर एक बेहद मशहूर हास्य अभिनेता हुआ करते थे उन दिनो और हर फ़िल्म में निभाया हुआ उनका चरित्र यादगार बन कर रह जाता था। उन पर बहुत सारे गाने भी फ़िल्माये गये हैं जिनमें से ज़्यादातर रफ़ी साहब ने गाये हैं। जॉनी वाकर के बेटे नासिर ख़ान ने एक बार कहा भी था कि उनके पिता के हाव भाव की नक़ल गायिकी में रफ़ी साहब के सिवाय और दूसरा कोई नहीं कर पाता था। कुछ उदहारण देखिये रफ़ी साहब और जॉनी भाई की जोड़ी के गानों की "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये", "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ", "ऑल लाइन किलियर", "जंगल में मोर नाचा किसी ने ना देखा", "ये दुनिया गोल है", और "मेरा यार बना है दुल्हा" इत्यादि। ऐसी ही एक और फ़िल्म आयी थी 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' जिसमें जॉनी वाकर और कुमकुम पर एक बहुत ही मशहूर युगल-गीत फ़िल्माया गया था और जिसमें रफ़ी साहब के साथ गीत दत्त ने आवाज़ मिलाई थीं। कुछ मज़ेदार सवालों और उनके शरारती जवाबों को मिलाकर मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत को बड़े ही मज़ेदार अंदाज़ में लिखा था। और ओ. पी. नय्यर साहब ने भी वैसा ही संगीत दिया जैसा कि इस गीत की ज़रूरत थी। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पेश है "जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी अभी यहीं था किधर गया जी"। फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह गीत 'रोमांटिक कॉमेडी' की एक अद्‍भुत मिसाल है।

जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही पता चलता है 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' सन् १९५५ की फ़िल्म थी जो बेहद कामयाब रही। १९५४ में फ़िल्म 'आर-पार' की अपार कामयाबी के बाद अगले ही साल गुरु दत्त ने अपने ही बैनर तले 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' बनाई और ख़ुद नायक बने और मधुबाला बनीं नायिका। इस हास्य फ़िल्म के ज़रिए गुरु दत्त देश में चल रही सामाजिक और राजनैतिक अवस्था को परदे पर लाना चाहते थे और कुछ हद तक कामयाब भी रहे। गीत-संगीत के लिए भी वही टीम बरक़रार रही जो 'आर-पार' में थी, यानी कि नय्यर और मजरूह साहब, और गायकों की सूची में शमशाद बेग़म, गीता दत्त और महम्मद. रफ़ी। प्रस्तुत गीत ओ. पी नय्यर के संगीत में गुरु दत्त साहब का सब से पसंदीदा गीत रहा है, यह बात ख़ुद नय्यर साहब ने एक बार विविध भारती के 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में कही थी। उन्होने उसी कार्यक्रम में यह भी कहा था कि गुरु दत्त साहब ने एक बार कहा था कि "O.P. Nayyar translates lyrics into music". यह एक संगीतकार के लिए बहुत बड़ी तारीफ़ थी। तो लीजिए गुरु दत्त, नय्यर और मजरूह साहब, रफ़ी साहब और गीता दत्त, तथा जॉनी वाकर और कुमकुम को याद करते हुए आज का यह गुदगुदानेवाला गीत सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ओपी नय्यर, शम्मी कपूर और मोहम्मद रफी की तिकडी.
२. मजरूह साहब के दिलकश बोल.
३. मुखड़े में शब्द है - "मस्त मस्त"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी, सुमित जी और सलिल जी, एकदम सही जवाब.....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


आलसी सावन बदरी उडाये...भूपेन दा के स्वरों में

बात एक एल्बम की # 04

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


बतौर संगीतकार अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' (1974) साईन में उन्होंने लता से 'नैनों में दर्पण है' गवाया. इस गाने के बारे में भूपेन दा बताते है "एक दिन जब मैं रास्ते से गुजर रहा था तब एक पहाड़ी लडके को गाय चराते हुए इस धुन को गाते सुना इस गाने से मै इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उसी समय इस गाने की टियून को लिख लिया. हालांकि मैंने उसकी हू -बहू नक़ल नही किया मगर उसका प्लाट वही रखा ताकि उसकी आत्मा जिन्दा रहे.

और एक लम्बे अंतराल के बाद हिंदी में आई उनकी फिल्म "रुदाली" में एक बार फिर लता ने स्वर दिया उस अमर गीत को. 'दिल हूँ हूँ करे..." इस फिल्म में आशा ने अपनी आवाज़ से एक सजाया था बोल थे ...."समय धीरे चलो...". १९९२ में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वापस आते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ. "मैं और मेरा साया" में मूल असामी बोलों को हिंदी में तर्जुमा किया गुलज़ार साहब ने. गुलज़ार साहब ने इन सुंदर गीतों को हिंदी भाषी श्रोताओं को पेश कर बहुत उपकार किया है. इस एल्बम से गुजरना यानी भूपेन दा के मधुर स्वरों और शब्दों के असीम आकाश में विचरना. सच में एक अनूठा अनुभव है ये. आज इस अंतिम कड़ी में सुनिए ये तीन गीत -

ये किसकी सदा है ....


आलसी सावन बदरी उडाये....


और अंत में ये शीर्षक गीत - मैं और मेरा साया....


एल्बम "मैं और मेरा साया" के अन्य गीत यहाँ सुनें -

डोला रे डोला...
एक कली दो पत्तियां...
उस दिन की बात है रमैया...
हाँ आवारा हूँ...
कितने ही सागर....

भूपेन दा हिंदी फिल्म "एक पल" के सभी गीतों को सुनने के लिए यहाँ जाएँ -
दुर्लभ गीत फिल्म "एक पल" के

साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Monday, April 27, 2009

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दे....रोशन के संगीत में लता की आवाज़ पुरअसर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 63

फ़िल्म 'अनोखी रात' का मशहूर गीत "ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में" संगीतकार रोशन के संगीत से सजा आख़री गीत था। रोशन १६ नवंबर १९६७ को इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिये छोड़ गए, लेकिन पीछे छोड़ गए अपनी दिलकश धुनों का एक अनमोल ख़ज़ाना। फ़िल्म 'बहू बेग़म' भी उनके संगीत सफ़र के आख़री फ़िल्मों में से एक है। यह फ़िल्म भी १९६७ को ही प्रदर्शित हुई थी। एम. सादिक़ निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, मीना कुमारी और प्रदीप कुमार। यह फ़िल्म एक 'पिरियड ड्रामा' है जिसमें पुरुष प्रधान समाज का चित्रण किया गया है, और उन दिनो नारी को किस तरह से दबाया - कुचलाया जाता था उसका भी आभास मिलता है इस फ़िल्म में। मीना कुमारी की सशक्त अभिनय ने इस फ़िल्म को उतना ही यादगार बना दिया है जितना कि इस फ़िल्म के गीत-संगीत ने। आज इसी फ़िल्म का गीत सज रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। लता मंगेशकर की आवाज़ में "दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें, तुमको ना हो ख्याल तो हम क्या जवाब दें" फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने की एक ऐसी मोती है जिसकी चमक आज ४० सालों के बाद भी वैसी की वैसी बरकरार है।

"पूछे कोई कि दर्द-ए-वफ़ा कौन दे गया, रातों को जागने की सज़ा कौन दे गया, कहने से हो मलाल तो हम क्या जवाब दें" - साहिर लुधियानवीं के ऐसे ही सीधे सादे लेकिन बड़े ही ख़ूबसूरत और सशक्त तरीके से पिरोये हुए शब्दों का इस्तेमाल इस ग़ज़ल की खासियत है। और लताजी की मधुर आवाज़ और रोशन के पुर-असर धुन को पा कर तो जैसे यह ग़ज़ल जीवंत हो उठी है। भले लताजी ने ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लें बहुत कम गायीं हैं, उनकी शानदार और असरदार फ़िल्मी ग़ज़लों को सुनकर यह कमी भी पूरी हो जाती है। रात के सन्नाठे में कभी इस ग़ज़ल को सुनियेगा दोस्तों, एक अलग ही समां बंध जाता है, एक अलग ही संसार रचती है यह ग़ज़ल। यह ग़ज़ल है तो ३ मिनट की ही, लेकिन एक बार सुनने पर इसका असर ३ हफ़्ते तक रहता है। फ़िल्म में नायिका के दिल की दुविधा, समाज का डर, दिल की बेचैनी, शर्म-ओ-हया, सभी कुछ समा गया है इस छोटी सी ग़ज़ल में। समात फ़रमाइए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. जॉनी वाकर पर फिल्माया गया ओ पी नय्यर का रोमांटिक कॉमेडी गीत.
२. रफी और गीता दत्त की आवाजें.
३. गाने में कुछ खो गया है जिसे ढूँढने की कोशिश की जा रही है.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी सही जवाब है, नीलम जी भी पहचान गयी और मनु जी भी.भारत पंड्या जी ने फिल्म का नाम गलत बताया पर गाना एक दम सही है भाई..नीलम जी नाराज़ मत होईये...अभी तो महफिल सजी है आपकी पसंद का गाना भी ज़रूर सुनाया जायेगा....फिलहाल ये बताएं कि आज का गाना कैसा लगा. और हाँ जाईयेगा नहीं....आपके बिना तो महफिल का रंग ही बेरंग हो जायेगा :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


चाहा था एक शख़्स को .....महफ़िल-ए-तलबगार में आशा ताई की गुहार

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०८

कुछ कड़ियाँ पहले मैने मन्ना डे साहब का वास्तविक नाम देकर लोगों को संशय में डाल दिया था। पूरा का पूरा एक पैराग्राफ़ इसीपर था कि दिए गए नाम से फ़नकार को पहचानें। आज सोच रहा हूँ कि वैसा कुछ फिर से करूँ। अहा... आप तो खुश हो गए होंगे कि मैने तो इस आलेख का शीर्षक हीं "आशा ताई की गुहार" दिया है तो चाहे कोई भी नाम क्यों न दूँ फ़नकार तो आशा ताई हीं हैं। लेकिन पहेली अगर इतनी आसान हो तो पहेली काहे की। तो भाई पहेली यह है कि आज के फ़नकार एक संगीतकार हैं और उनका वास्तविक नाम है "मोहम्मद ज़हुर हासमी"। अब पहचानिए कि मैं किस संगीतकार के बारे में बात कर रहा हूँ। आपकी सहूलियत के लिए दो हिंट देता हूँ- क) इस आलेख के शीर्षक को सही से पढें। हम जिस गज़ल की आज बात कर रहे हैं..उसका नाम इस शीर्षक में है और उस गज़ल के एलबम के नाम में इन संगीतकार का नाम भी है। ख) १९७६ में बनी एक फ़िल्म में दो नायक और एक नायिका ऎसे त्रिकोण में उलझे कि एक बार मुकेश को तो एक बार लता जी को कहना पड़ा -"...दिल में ख़्याल आता है"। यह ख़्याल किसी और का नहीं..इन्हीं का था। चलिए एक अतिरिक्त हिंट भी देता हूँ.... दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए...इस गाने को आशा ताई ने गाया था..और इसके संगीतकार यही महानुभाव थे। अब आप लोग अपने दिमागी नसों पर जोर दें और हमारे आज के फ़नकार को पहचानें और उनका एहतराम करें।

मुझे मालूम है कि सारे हिंट आसान थे, इसलिए "ख़य्याम" साहब को पहचानने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई होगी। "ख़य्याम" साहब ने हिंदी फ़िल्मी-संगीत को एक से बढकर एक नग्में दिए हैं। वहीं अगर गैर-फ़िल्मी गानों या गज़लों की बात करें तो इस क्षेत्र में भी ख़य्याम साहब का खासा नाम है। जहाँ एक ओर इन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब, दाग़ दहलवी, वली साहब, अली सरदार ज़ाफ़री, मज़रूह सुल्तानपुरी, साहिर लु्धियानवी, कैफ़ी आज़मी जैसे पुराने और मंझे हुए गीतकारों और गज़लकारों के लिए संगीत दिया है, वहीं निदा फ़ाज़ली, नख़्स लायलपुरी, अहमद वासी जैसे नए गज़लगो की गज़लों को भी अपने सुरों से सजाया है। इस तरह ख़य्याम किसी एक दौर के फ़नकार नहीं कहे जा सकते है,उनका संगीत तो सदाबहार है। अब हम आज की गज़ल की ओर बढते हैं। महफ़िल-ए-गज़ल की दूसरी कड़ी में हमने इसी एलबम के एक गज़ल को सुनाया था-"लोग मुझे पागल कहते हैं"। मुझे उम्मीद है कि आप अभी तक उस गज़ल में आशा ताई की मखमली आवाज़ को नहीं भूले होंगे। उस गज़ल में जैसा सुरूर था, मैं दावा करता हूँ कि आपको आज की गज़ल में भी वैसा हीं सुरूर सुनाई देगा....वैसा हीं दर्द महसूस होगा। यह तो सबको पता होगा कि ख़य्याम साहब और आशा ताई ने बहुत सारे फ़िल्मी गानों में साथ काम किया है। इसी साथ का असर था कि "इन आँखों की मस्ती के","ये क्या जगह है दोस्तों" जैसे गानें बनकर तैयार हुए। इस जोड़ी की एक गज़लों की एलबम भी आई थी, जिसका नाम था "आशा और ख़य्याम"। आज की गज़ल "चाहा था एक शख़्स को" इसी मकबूल एलबम से है।

"आँखों को इंतज़ार का देके हुनर चला गया"- यह हुनर भी एक "कमाल" है, यह कभी एक कशिश है तो कभी एक खलिश है। प्यार में डूबी निगाहें इस इंतज़ार का अनुभव नहीं करना चाहतीं, वहीं जिन निगाहों को प्यार नसीब नहीं, उनके लिए यह इंतज़ार भी दुर्लभ होता है और वे इस मज़े के लिए तरसती हैं। तो फिर यह इंतज़ार है ना कमाल की चीज? कभी इस इंतज़ार का सही मतलब जानना हो तो उनसे पूछिये जिनका प्यार अब उनका नहीं रहा। उन लोगों ने इस इंतज़ार के तीन रूप देखे हैं- पहला: जब प्यार नहीं था तब इंतज़ार की चाह, दूसरा: जब प्यार उनकी पनाहों में था तब अनचाहे इंतज़ार का लुत्फ़ और तीसरा: अब जब प्यार उनका नहीं रहा तब इंतज़ार का दर्द। मेरे अनुसार अगर तीसरे इंतज़ार को छोड़ दें तो बाकी दो का अपना हीं एक मज़ा है। लेकिन तीसरा इंतज़ार इन दोनों पर कई गुणा भारी पड़ता है। अगर मालूम हो कि आप जिसकी राह देख रहे हों वह नहीं आने वाला लेकिन फिर भी आप उसकी राह तकने पर मजबूर हों तो इस पीड़ा को क्या नाम देंगे...किस्मत के सिवा.....!!!

आज की गज़ल की ओर बढने से पहले मैं अपना कुछ सुनाना चाहता हूँ। मुलाहजा फरमाईयेगा:

वो दूर गया अपनों की तरह,
फिर गैर हुआ सपनों की तरह।


यह तो हुआ मेरा शेर, अब हम आशा ताई की तरसती आँखों के जरिये प्रेम की अनबूझ कहानी का रसास्वादन करते हैं। आप खुद देखिये कि "कमाल" साहब ने अपने शब्दों से क्या कमाल किया है:

आँखों को इंतज़ार का देके हुनर चला गया,
चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया।

दिन की वो महफ़िलें गईं रातों के रतजगे गए,
कोई समेट कर मेरे शाम-औ-सहर चला गया।

झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़्याल-ए-यार भी,
हरसू बिखर बिखर गई खुशबू, जिधर चला गया।

उसके हीं दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है,
देके वो अपनी याद के शम्स-औ-क़मर चला गया।

कूँचा-ब-कूँचा दर-ब-दर कब से भटक रहा है दिल,
हमको भु्लाके राह वो अपनी डगर चला गया।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग किया हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर,
भेजा वही कागज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नहीं...

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का शब्द था -"रंगत". शब्द कुछ मुश्किल था शायद...खैर शन्नो जी ने कोशिश की -

चमन में खुशबू तो है फूलों की पर वीराना है
बदल जाती है इनकी रंगत उनके यहाँ आने से....

वो कौन है शन्नो जी ये भी बताईये...अरे अरे मनु जी को भी कुछ याद आ गया है सुनिए -

ये खुली खुली सी जुल्फें, ये उडी उडी सी रंगत,
तेरी सुब्हा कह रही है, तेरी रात का फ़साना...

वैसे शन्नो जी अब महफ़िल की शान बनती जा रही हैं...धीरे धीरे शे'रों में भी वज़न आ जायेगा :), शैलेश जी, सलिल जी और राज जी आप सब ने भी महफिल में खूब रंग जमाया...आभार.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Sunday, April 26, 2009

चंदा मामा मेरे द्वार आना...बच्चों के साथ बच्ची बनी आशा की आवाज़ में ये स्नेह निमंत्रण

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 62

साधारणत: हिन्दी फ़िल्मों के विषय नायक और नायिका को केन्द्र में रख कर ही चुने जाते हैं। लेकिन नायक-नायिका की प्रेम-कहानी के बिना भी सफ़ल फ़िल्में बनाई जा सकती है ये हमारे फ़िल्मकारों ने समय समय पर साबित किया है। ऐसी ही एक फ़िल्म है 'लाजवंती' जिसमें एक माँ और उसकी छोटी सी बच्ची के रिश्ते को बड़ी संवेदनशीलता से दर्शाया गया है। दोस्तों, मैने यह फ़िल्म बहुत साल पहले दूरदर्शन पर देखी था और जितना मुझे याद आ रहा है, इस फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की है कि ग़लतफ़हमी का शिकार पति (बलराज साहनी) अपनी पत्नी (नरगिस) को घर से निकाल देता है और इस तरह से माँ अपनी बेटी (बेबी नाज़) से भी अलग हो जाती है। थोड़े दिनो के बाद पति-पत्नी की ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है और वो घर भी वापस आ जाती है लेकिन बेटी के दिल में तब तक अपनी माँ के लिए इतना ज़हर भर चुका होता है कि यही फ़िल्म का मुख्य मुद्दा बन जाता है। अंततः जब बेटी को सच्चाई का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि तब तक नरगिस आत्महत्या के लिए निकल पड़ती है। नरगिस खाई में छलांग लगाने ही वाली है कि पीछे से उसकी बेटी उसे "माँ" कहकर पुकारती है और इस तरह से माँ-बेटी के पुनर्मिलन के साथ फ़िल्म का सुखांत होता है।

१९५८ की फ़िल्म 'लाजवंती' में सचिन देव बर्मन का संगीत था और इस फ़िल्म के ज़्यादातर गीतों को आशा भोंसले ने गाया था । "कोई आया धड़कन कहती है", "कुछ दिन पहले एक ताल में कमलकुंज के अंदर रहता था एक हंस का जोड़ा" और "गा मेरे मन गा, यूहीं बिताये जा दिन ज़िन्दगी के" जैसे गीत बेहद मशहूर हैं। सन १९५७ में लता मंगेशकर और सचिन देव बर्मन के बीच कुछ ग़लतफ़हमी हो गई थी जिसकी वजह से दोनों ने एक दूसरे के साथ काम करना बंद कर दिया था। इस ग़लतफ़हमी की पूरी कहानी हम किसी और दिन आपको तफ़सील से बताएँगे। तो इस ग़लतफ़हमी की वजह से दादा बर्मन लताजी के बजाये आशाजी से गाने गवा रहे थे। 'लाजवंती' इसी दौरान बनी फ़िल्म थी और शायद यही वजह रही होगी कि दादा ने इस फ़िल्म का एक भी गाना लताजी से नहीं गवाया। आज इस फ़िल्म से हम आपको सुनवा रहे हैं आशा भोंसले और साथियों का गाया एक बच्चोंवाला गाना और गाने के बोल हैं "चंदामामा मेरे द्वार आना"। यह लीजिये, यह तो तुकबंदी भी हो गई। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत में परदे पर बेबी नाज़ और दूसरे बच्चों को स्कूल के किसी जलसे में स्टेज पर गाते और नृत्य करते हुए दिखाया गया है। तो सुनिये यह गीत और याद कीजिये अपने स्कूल के दिनो को और अपने स्कूल के वार्षिक जलसों को...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. साहिर के बोल और रोशन का संगीत.
२. लता की जादूई आवाज़.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द से - "दुनिया"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
जहाँ पिछली बार ढेरों विजेता थे इस बार एक भी नहीं...गीत मुश्किल था, इस कारण सभी को माफ़ी दी जाती है....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


इस इतवार की कॉफी ऑनलाइन कवि सभा के साथ

Dr Shyam Sakha Shyam
डॉ श्याम सखा 'श्याम'
सभी कविता प्रेमियों को अप्रैल माह के अंतिम रविवार का नमस्कार। जो आवाज़ के पुराने श्रोता हैं, उन्हें तो समझ में आ ही गया होगा कि हमने आखिरी रविवार क्यों कहा। जी हाँ, हम लेकर हाज़िर है पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का ताज़ा अंक। इस बार कार्यक्रम की स्थाई संचालिका डॉ॰ मृदुल कीर्ति अनुपस्थित थीं। इसलिए इसबार संचालन का दायित्य डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' निभा रहे हैं। हिन्द युग्म के वार्षिकोत्सव में हमने श्याम जी के संचालन कौशल को देखा था,आज जब हमने उनसे संचालन हेतु कहा तो उन्होंने बताया कि वे व्यस्त हैं, और आज ही उनकी मेरिज एनिवर्सिरी भी है। पर हमारे कहने पर वे तैयार हो गये। उन्होंने अति व्यस्त कार्यक्र्म में यह संचालन किया हम उनके आभारी हैं।
डॉ० श्याम अपना-अपनी धर्मपत्नि व बच्चों के जन्मदिन था वैवाहिक वर्षगाँठ जैसे अवसरों पर अपने अस्पताल में मरीजो का मुफ़्त इलाज कर मनाते हैं। यह अलग बात है कि वे यह बात मरीजों को बताते नहीं कि वह आज जाँच-x-ray,test,ultrasound आदि मुफ़्त क्यों कर रहे हैं।

यद्यपि डॉ॰ मृदुल कीर्ति की अनुपस्थिति की सूचना हमें एक सप्ताह पहले मिल गई थी। उसके बाद हमने इसका संचालन युवा पत्रकार तरूश्री शर्मा को सौंप दिया था। परंतु अचानक उनके बीमार हो जाने से यह आपातकालीन स्थिति बनी, जिसके कारण हमें एक डॉक्टर की शरण में जाना पड़ा।

अब आप सुनें और बतायें कि हम अपने प्रयास में कितने सफल हुए हैं-
नीचे के प्लेयर से सुनें:

प्रतिभागी कवि- विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र', आचार्य संजीव 'सलिल', शारदा अरोरा, डॉ॰ अनिल चड्डा, एस कुमार शर्मा, हरिहर झा, रश्मि प्रभा, योगेन्द्र समदर्शी और कमलप्रीत सिंह।

यह भाग डाउनलोड करें।


यह कवि सम्मेलन तकनीक के माध्यम से अलग-अलग स्थानों पर बैठे कवियों को एक वर्चुअल मंच पर एक साथ बिठाने की कोशिश है। यदि आप हमारे आने वाले पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में भाग लेना चाहते हैं
1॰ अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com


पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के अगले अंक का प्रसारण 31 मई 2009 को किया जायेगा और इसमें भाग लेने के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की अन्तिम तिथि है 24 मई 2009

हम सभी कवियों से यह अनुरोध करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 10. Month: April 2009.
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