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Monday, March 22, 2010

तू गन्दी अच्छी लगती है....दिबाकर, स्नेह खनवलकर और कैलाश खेर का त्रिकोणीय समीकरण

ताज़ा सुर ताल १२/२०१०

सजीव - 'ताज़ा सुर ताल' में आज हम एक ऐसी फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं, जिसके शीर्षक को सुन कर शायद आप लोगों के दिल में इस फ़िल्म के बारे में ग़लत धारणा पैदा हो जाए। अगर फ़िल्म के शीर्षक से आप यह समझ बैठे कि यह एक सी-ग्रेड अश्लील फ़िल्म है, तो आपकी धारणा ग़लत होगी। जिस फ़िल्म की हम आज बात कर रहे हैं, वह है 'लव, सेक्स और धोखा', जिसे 'एल.एस.डी' भी कहा जा रहा है।

सुजॊय - सजीव, मुझे याद है जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उस वक़्त भी एक फ़िल्म आई थी 'एल.एस.डी', जिसका पूरा नाम था 'लव, सेक्स ऐण्ड ड्रग्स', लेकिन वह एक सी-ग्रेड फ़िल्म ही थी। लेकिन क्योंकि 'लव, सेक्स ऐण्ड धोखा' उस निर्देशक की फ़िल्म है जिन्होने 'खोसला का घोंसला' और 'ओए लकी लकी ओए' जैसी अवार्ड विनिंग् फ़िल्में बनाई हैं, तो ज़ाहिर सी बात है कि हमें इस फ़िल्म से बहुत कुछ उम्मीदें लगानी ही चाहिए।

सजीव - सच कहा, दिबाकर बनर्जी हैं इस फ़िल्म के निर्देशक। क्योंकि मुख्य धारा से हट कर यह एक ऒफ़बीट फ़िल्म है, तो फ़िल्म के कलाकार भी ऒफ़बीट हैं, जैसे कि अंशुमन झा, श्रुती, राज कुमार यादव, नेहा चौहान, आर्य देवदत्ता, हेरी टेंग्री और अमित सियाल। फ़िल्म में संगीत दिया है स्नेहा खनवलकर ने।

सुजॊय - सजीव, इसका मतलब महिला संगीतकरों में एक और नाम जुड़ गया है इस फ़िल्म से, जो एक बहुत ही अच्छी बात है। तो चलिए, शुरु करते हैं गीतों का सिलसिला, पहला गीत कैलाश खेर की आवाज़ में। जिस तरह से पिछले साल में "ईमोसनल अत्याचार" गीत आया था, क्या पता हो सकता है कि यह गीत इस साल वही कमाल कर दिखाए।

सजीव - यह तो वक़्त ही बताएगा, लेकिन हम इतना ज़रूर कह सकते हैं कि यह आम गीतों से अलग है। भले ही इस तरह के गीत हम गुनगुना नहीं सकते, लेकिन गीत के बोलों में सच्चाई है। इसे लिखा भी दिबाकर बनर्जी ने ही है। गीत की शुरुआत एक लड़की के चीख़ने से होती है, फिर गोलियों की आवाज़ें, और फिर गीत शुरु होता है तेज़ झंकार बीट्स के साथ। लड़की की पहले जान बचाना और फिर उसकी तसवीर उतार कर उन्हे बेचने का अपराध इस गीत के बोलों में ज़ाहिर होता है। "तस्वीर उतारूँगा, मेले में दिखाउँगा, जो देखेगा उसकी अखियाँ नचवाउँगा, हवस की तरकारी दाला गरम भुणक का छोंका..."।

सुजॉय- कुछ ऐसा जो कभी सुना नहीं आज तक हिंदी फ़िल्मी गीतों में, सुनिए

गीत: लव सेक्स और धोखा


सुजॊय - सजीव, अभी गीत से पहले आप बता रहे थे लड़की की तस्वीर उतार कर उसे बेचने की बात। तो जहाँ तक इस फ़िल्म की कहानी की बात है, यह फ़िल्म में दरअसल तीन कहानियाँ हैं। और तीनों कहानियों में जो कॊमॊन चीज़ें हैं, वो हैं लव, सेक्स और धोखा। एक और चीज़ जो इनमें कॊमॊन है, वह है कैमरा। जी हाँ, तीनों कहानियों मे किसी ना किसी तरीके से तस्वीर उतारने की घटना है। दूसरा गाना सुनने से पहले मैं इनमें से एक कहानी का पार्श्व बताना चाहूँगा। प्रभात एक जर्नलिस्ट है जो अपने करीयर को एक नई ऊँचाई तक ले जाना चाहता है। और इसके लिए वह एक स्टिंग् ऒपरेशन के ज़रिए सनसनी पैदा करने की सोचता है। वह पॊप स्टार लोकी लोकल पर स्टिंग् ऒपरेशन करता है जो उभरते मॊडेल्स को अपने विडियोज़ में काम देने के बदले उनसे शारीरिक संबंध स्थापित करता है। लेकिन इस स्टिंग् ऒपरेशन के दौरान प्रभात एक मुसीबत में फँस जाता है।

सजीव - अब है दूसरे गीत की बारी। इसे भी कैलाश खेर ने ही गाया है। यह गीत वार करता है आज के दौर में चलने वाले रीयल्टी टीवी शोज़ पर। जिस तरह से टी.आर.पी बढ़ाने के लिए अपने अपने रीयल्टी शोज़ में टीवी चैनल सनसनी के सामान जुटाने में लगे हैं, उसी तरफ़ इशारा है इस गीत का।

सुजॊय - सजीव, किसी को मैंने एक बार कहते हुए सुना था कि 'Reality TV Shows are more scripted than any other show', हो सकता है इसमें सच्चाई हो। ख़ैर, यह गीत "तैनु टीवी पे वेखिया" पंजाबी संगीत पर आधारित है, और कैलाश खेर ने "दुनिया ऊट पटांगा" और "ओए लकी लकी ओए" गीतों की तरह इसे भी लोकप्रिय रंग देने की पूरी कोशिश की है।

गीत: तैनु टीवी पे वेखिया


सजीव - सुजॊय, तुमने तीन में से पहली कहानी का ज़िक्र किया था। दूसरी कहानी जो है, उसमें एक जवान लड़का आदर्श जो जल्दी जल्दी पैसे कमा कर अमीर बनना चाहता है, चाहे इसके लिए उसे कोई भी राह इख़्तियार करनी पड़े। ऐसे में वह क्या करता है कि एक सेल्स गर्ल रश्मी के साथ एक झूठा प्रेम संबंध बनाता है। आदर्श का प्लान यह है कि वह रश्मी को बहकागा और एक कैमरे के ज़रिए दोनों के शारीरिक संबंध वाले दृश्यों को कैद कर उसे बाज़ार में बेच कर पैसे बनाएगा।

सुजॊय - यानी कि लव, सेक्स और धोखा?

सजीव - बिल्कुल! है तो आम कहानी, लेकिन देखना यह है कि दिबाकर इस आम कहानी को किस तरह से ख़ास बनाते हैं! ख़ैर, आगे बढ़ते हैं और अब सुनते हैं स्नेहा खनवलकर की ही आवाज़ में एक हिंग्लिश गीत "आइ काण्ट होल्ड इट एनी लॊंगर"। एक बेहद नए क़िस्म का गीत है जिसमें राजस्थानी लोक संगीत को अंग्रेज़ी शब्दों के साथ मिलाया गया है। चिड़ियों की अलग अलग ध्वनियों का भी ख़ूबसूरत इस्तेमाल सुनाई देता है इस गीत में। मानना पड़ेगा कि स्नेहा ने गायन और संगीत, दोनों ही में इस गीत में कमाल कर दिखाया है।

सुजॉय - सच है सजीव, इस तरह के प्रयोग के लिए संगीतकारा निश्चित ही बधाई की हक़दार हैं. मुझे ओए लकी का "तू राजा की राजदुलारी" गीत याद आ रहा है जिसको स्नेह ने बेहद मेहनत से संवारा था, और जो आज भी एक कल्ट सोंग की तरह सुना जाता है.

गीत: आइ काण्ट होल्ड इट एनी लॊंगर


सुजॊय - और अब तीसरी कहानी की बारी। राहुल एक फ़िल्म विद्यार्थी है जिसकी डिप्लोमा फ़िल्म एक तरह से गुरु दक्षिणा है उसके प्रेरना स्त्रोत आदित्य चोपड़ा की फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' को। राहुल को उसके फ़िल्म की नायिका श्रुति से प्यार हो जाता है। उनकी प्रेम कहानी भी उसी तरह से आगे बढ़ती है ठीक जिस तरह से डी.डी.एल.जे की कहानी आगे बढ़ी थी। फ़िल्मी अंदाज़ में राहुल और श्रुति मंदिर में जाकर शादी कर लेते हैं। श्रुति को यह विश्वास था कि एक बार शादी हो जाए तो उसके घरवाले उन्हे अपना लेंगे। लेकिन उसे क्या पता था कि एक उसके लिए एक भयानक धोखा इंतज़ार कर रहा है!

सजीव - इसी कहानी से संबंधित जो गीत है, वह है "मोहब्बत बॊलीवुड स्टाइल"। निहिरा जोशी और अमेय दाले की आवाज़ों में यह गीत है जिसमें वही चोपड़ा परिवार के फ़िल्म के संगीत की कुछ झलक मिलती है। यश राज फ़िल्म्स की सालों से चली आ रही रोमांस के सक्सेस फ़ॊर्मुला की तरफ़ गुदगुदाने वाले अंदाज़ से तीर फेंका गया है। यहाँ तक कि चरित्र का नाम भी राहुल रहा गया है जैसे कि अक्सर यश चोपड़ा की फ़िल्मों में हुआ करता है। कुल मिलाकर ठीक ठाक गीत है, वैसे कुछ बहुत ज़्यादा ख़ास बात भी नहीं है। कम से कम पिछले गीत वाली बात नहीं है, और ना ही यश चोपड़ा के फ़िल्मों के रोमांटिक गीतों के साथ इसकी कोई तुलना हो सकती है।

सुजॉय - हाँ पर मुझे जो बीच बीच में संवाद बोले गए हैं वो बहुत बढ़िया लगे, सुनते हैं...

गीत: मोहब्बत बॊलीवुड स्टाइल.


सुजॊय - तो सजीव, कुल मिलाकर इस फ़िल्म के बारे में जो राय बनती है, वह यही है कि यह फ़िल्म आज के युवा समाज की कुछ सच्चाइयों की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करवाना चाहती है, ख़ास कर मुंबई जैसे बड़े शहरों में जो हो रहा है। जल्दी जल्दी पैसे और शोहरत कमाने की होड़ में आज की युवा पीढ़ी अपराध की राह अख़तियार कर रहे हैं। यह फ़िल्म शायद फ़ैमिली ऒडिएन्स को थिएटरों में आकर्षित ना करें, लेकिन युवाओं को यह फ़िल्म पसंद आएगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

सजीव - चलिए अब सुना जाए आज का अंतिम गीत। कैलाश खेर की आवाज़ में एक और गीत "तू गंदी अच्छी लगती है"। गीत शब्दों से जितना बोल्ड है, उतना ही बोल्ड है कैलाश खेर की गायकी। फ़िल्म के सिचुएशन की वजह से शायद इस गीत में थोड़ी अश्लीलता की ज़रूरत थी। दोस्तों, हम नहीं कह रहे कि इस तरह के गानें हमें पसंद आने चाहिए या इनका स्वागत करना चाहिए, यह तो अपनी अपनी राय है, हमारा उद्देश्य यही है कि जिस तरह का संगीत आज बन रहा है, जिस तरह की फ़िल्में आ रही हैं, उनका ज़िक्र हम यहाँ पर करते हैं, आगे इन्हे ग्रहण करना है या एक बार सुन कर भुला देना है, यह आप पर निर्भर करता है।

सुजॊय - व्यक्तिगत पसंद की अगर बात करें तो मुझे स्नेहा की आवाज़ में "आइ काण्ट होल्ड इट" ही अच्छी लगी है, बाकी सारे सो-सो लगे। तो चलिए चलते चलते यह अंतिम गीत भी सुन लेते हैं।

सजीव - एक बात और दिबाकर ने इस फिल्म से बतौर गीतकार एक ताजगी भरे चलन की शुरूआत की है, बानगी देखिये "मैं सात जनम उपवासा हूँ और सात समुन्दर प्यासा हूँ, जी भर के तुझको पी लूँगा...." और "जो कहते हैं ये कुफ्र खता, काफ़िर है क्या उनको क्या पता..."....सुनकर देखिये..

गीत: तू गंदी अच्छी लगती है


"एल एस डी" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
जहाँ सदियाँ के संगीत में सब कुछ घिसा पिटा था, एल एस डी उसके ठीक विपरीत एक दम तारो ताज़ा संगीत श्रोताओं को पेश करता है. इंडस्ट्री की इकलौती महिला संगीतकारा स्नेह के लिए जम कर तालियाँ बजनी चाहिए, चूँकि फिल्म की विषय वस्तु काफी बोल्ड है, संगीत भी इससे अछूता नहीं रह सकता था. पारंपरिक श्रोताओं को ये सब काफी अब्सर्ड लग सकता है, पर फिर कैलाश खेर की उन्दा गायिकी और दिबाकर के बोल्ड शब्दों के नाम एक एक तारा और स्नेह के लिए २ तारों को मिलकर ४ तारों की रेटिंग है आवाज़ के टीम की एल एस डी के संगीत एल्बम को. वैसे अल्बम में आपको कैलाश के दो बोनस गीत भी सुनने को मिलेंगें....

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ३४- "कित गए हो खेवनहार", "दोस्त बन के आए हो दोस्त बन के ही रहना" तथा 'एल.एस.डी' के गीत "आइ काण्ट होल्ड इट" में क्या समानता है?

TST ट्रिविया # ३५- दिबाकर बनर्जी ने १९९८ के एक टीवी शो में बतौर 'शो पैकेजर' काम किया था। बताइए उस शो का नाम।

TST ट्रिविया # ३६- ऊपर हमने "तू राजा की" गीत का जिक्र किया था, कौन हैं इस गीत के गायक


TST ट्रिविया में अब तक -
अरे भाई कोई तो सीमा जी की चुनौती स्वीकार करें, खैर सीमा जी को एक बार फिर से बधाई

Monday, March 8, 2010

एम एम क्रीम लौटे हैं एक बार फिर अपने अलग अंदाज़ के संगीत के साथ "लाहौर" में

ताज़ा सुर ताल १०/२०१०

सजीव - सभी को वेरी गुड मॊरनिंग् और 'ताज़ा सुर ताल' के एक और अंक में हम सभी का स्वागत करते हैं। सुजॊय, पिछले दो हफ़्तों में हमने ग़ैर फ़िल्म संगीत का रुख़ किया था, आज हम वापस आ रहे हैं एक आनेवाली फ़िल्म के गीतों और उनसे जुड़ी कुछ बातों को लेकर।

सुजॊय - सजीव, इससे पहले कि आप आज की फ़िल्म का नाम बताएँ, जैसे कि इस साल के दो महीने गुज़र चुके हैं, तो 'माइ नेम इज़ ख़ान' के अलावा किसी भी फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस पर कोई जादू नहीं चला पायी है। आलम ऐसा है कि जनवरी के महीने में रिलीज़ होने बाद 'चांस पे डांस' सिनेमाघरों से उतरकर इतनी जल्दी ही टीवी के पर्दे पर आ रही है। देखना है कि 'अतिथि तुम कब जाओगे' और 'रोड मूवी' क्या कमाल दिखाती है इस हफ़्ते! वैसे इन फ़िल्मों के संगीत में ज़्यादा कुछ नया नहीं है, शायद इसीलिए 'टी. एस. टी' में इन्हे जगह न मिली हो!

सजीव - बिल्कुल! तो चलो अब बात करें आज की फ़िल्म 'लाहौर' की। यह एक ऐसी फ़िल्म है जो हमारे यहाँ तो अगले हफ़्ते रिलीज़ होगी, लेकिन पिछले साल इस फ़िल्म को इटली के 'सालेण्टो इंटरनैशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल' में कई पुरस्कार मिले। संजय पूरन सिंह चौहान की यह फ़िल्म है, और जैसा कि नाम से ही लोग अंदाज़ा लगा लेंगे कि इस फ़िल्म का भारत - पाक़िस्तान के रिश्ते से ज़रूर कोई रिश्ता होगा। यह सच है कि यह फ़िल्म भारत पाकिस्तान के बीच भाइचारा को बढ़ाने की तरफ़ एक प्रयास है, लेकिन इसे व्यक्त किया गया है किक्-बॊक्सिंग् खेल के माध्यम से जो इन दो देशों के बीच खेली जाती है।

सुजॊय - यह वाक़ई हैरानी में डाल देनेवाली बात है कि क्रिकेट और हॊकी जैसे लोकप्रिय खेलों के रहते हुए किक्-बॊक्सिंग् को क्यों चुना गया है!

सजीव - तभी तो यह फ़िल्म अलग है। और एक और वजह से यह फ़िल्म अलग है, और वह यह कि इसमें संगीत दिया है एम. एम. क्रीम और पीयूष मिश्रा ने।

सुजॊय - एम. एम. क्रीम ने बहुत कम काम हिंदी में किया है, लेकिन जितनी भी फ़िल्मों में उन्होने काम किया है, उन सभी के गानें बेहद सुरीले और कामयाब रहे हैं। अब देखना है कि इस फ़िल्म के गीतों को जनता कैसे ग्रहण करती है। एम. एम. क्रीम और 'लाहौर' की बातों को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत "अब ये काफ़िला"।

गीत - अब ये काफ़िला...ab ye kaafila (lahaur)


सजीव - इस गीत में आवाज़ें थीं के.के, कार्तिक और ख़ुद एम. एम. क्रीम की। गीत को शुरु करते हैं क्रीम साहब "ज़मीन छोड़ भर आसमाँ बाहों में, परवाज़ कर नई दिशाओं में" बोलों के साथ। फिर उसके बाद मुखड़ा शुरु करते हैं कार्तिक "अब ये काफ़िला फ़लक पे जाएगा, सफ़र मंज़िल का ये जो तय जाएगा, सुनहरे हर्फ़ में वो लिखा जाएगा". और उसके बाद के.के और कार्तिक अंग्रेज़ी शब्द "listen carefully move your feet" बात में और ज़्यादा दम डाल देती है। कुल मिलाकर यह एक दार्शनिक गीत है, जिसमें ज़िंदगी के सफ़र को बिना रुके लगातार चलते रहने की सलाह दी गई है।

सुजॊय - वैसे तो इस तरह के उपदेशात्मक गानें बहुत सारे बनें हैं, लेकिन इस गीत का अंदाज़-ए-बयाँ, इसका संगीत संयोजन और ऐटिट्युड बिल्कुल नया है, और मेरा ख़याल है कि आज की पीढ़ी यह गीत हाथों हाथ ग्रहण करेंगे। गीतकार का इस गीत में उतना ही योगदान है जितना क्रीम साहब का है।

सजीव - अच्छा, हम इस गीत से पहले बात कर रहे थे कि इस फ़िल्म में किक्-बॊक्सिंग् का सहारा क्यों लिया गया है। इस फ़िल्म में सौरभ शुक्ला ने अभिनय किया है, जो कि ख़ुद एक बड़े निर्देशक भी हैं। तो उन्होने कहा है कि "चौहान किसी भी खेल को चुन सकता था। लेकिन क्योंकि उनका व्यक्तिगत झुकाव किक्-बॊक्सिंग् की तरफ़ है और उन्हे इस खेल की बारिकियों का पता है, शायद इसी वजह से उन्होने इस खेल को चुना अपनी फ़िल्म के लिए। वो कोई ऐसा खेल नहीं चुनना चाहते थे जिसमें उनकी जानकारी १००% नहीं हो। अगर वो वैसा करते तो शायद फ़िल्म के साथ न्याय नहीं कर पाते।"

सुजॊय - यह बहुत अच्छी बात आप ने बताई, एक अच्छे फ़नकार और एक प्रोफ़ेशनल फ़िल्मकार की यही निशानी होती है कि वो जो कुछ भी करे पूरे परफ़ेक्शन के साथ करे। देखते हैं कि उनकी इस मेहनत और लगन का जनता क्या मोल चुकाती है!

सजीव - ख़ैर, वह तो बाद की बात है, चलो अब सुनते हैं दूसरा गीत दलेर मेहंदी की आवाज़ में। यह भी पहले गीत की तरह सफ़र और मुसाफ़िर के ज़रिए ज़िंदगी के फ़लसफ़े का बयाँ करती है।

गीत - मुसाफ़िर है मुसाफ़िर...musafir (lahaur)


सुजॊय - इस गीत की खासियत मुझे यही लगी कि यह आमतौर पर दलेर मेहंदी का जौनर नहीं है। जिस तरह से उनके गाए गीतों से मस्ती, ख़ुशी और एक थिरकन छलकती है, यह गीत उसके बिल्कुल विपरीत है। केवल एक बार सुन कर शायद यह गीत आप के दिल पर छाप ना छोड़े, लेकिन गीत के बोलों को ध्यान से सुनने पर इसकी अहमियत का पता चलता है।

सजीव - और अब बारी है 'लाहौर' की टीम से आपका परिचय करवाने की। निर्माता विवेक खटकर की यह फ़िल्म है। कहानी व निर्देशन संजय पूरन सिंह चौहान की है। गीतकार और संगीतकार के अलावा पीयूष मिश्रा का इस फ़ि्ल्म के लेखन में भी योगदान है। फ़िल्म के मुख्य कलाकर हैं आनाहद, नफ़ीसा अली, सब्यसाची चक्रवर्ती, केली दोरजी, निर्मल पाण्डेय, मुकेश ऋषी, जीवा, प्रमोद मुथु, श्रद्धा निगम, फ़ारुख़ शेख़, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह और आशीष विद्यार्थी। एम. एम. क्रीम और पीयूष मिश्रा के संगीतकार होने की बात तो हम कर ही चुके हैं, पार्श्व संगीत वेइन शार्प का है।

सुजॊय - अच्छा, अब हम अगला गीत सुनेंगे, जो कि एक थिरकता हुआ नग़मा है शंकर महादेवन और शिल्पा रव की आवाज़ों में, "रंग दे रंग दे"। सजीव, यह गीत ऐसा एक गीत है कि जिसकी कल्पना हम दलेर मेहंदी की आवाज़ में कर सकते हैं। लेकिन एम. एम. क्रीम का निर्णय देखिए कि उन्होने पहला वाला ग़मज़दा गीत दलेर साहब से गवाया और इस गीत में उनकी आवाज़ नहीं ली।

सजीव - यही तो महान संगीतकार का लक्षण है कि प्रचलित लीग से हट के कुछ कर दिखाया जाए। लेकिन इस "रंग दे" गीत में नया कुछ सुनने में नहीं मिला।

सुजॊय - हाँ, और ऒर्केस्ट्रेशन में ही नहीं, गीत के बोलों और गायकी में भी 'रंग दे बसंती' के उस शीर्षक गीत की ही झलक मिलती है। इस गीत को लिखा है जुनैद वसी ने। मेरे ख़याल से तो यह एक बहुत ही ऐवरेज गीत है।

सजीव - चलो, गीत सुनवाते हैं अपने श्रोताओं को और उन्ही पर भी छोड़ते हैं इस गीत की रेटिंग्!

गीत - रंग दे रंग दे...rang de (lahaur)


सुजॊय - अब अगला गीत जो हम सुनेंगे उसे एम. एम. क्रीम ने अपनी एकल आवाज़ दी है। तो क्यों ना यहाँ पर क्रीम साहब की थोड़ी चर्चा की जाए!

सजीव - ज़रूर! मैं तो उनकी बात यहीं से शुरु करूँगा कि जब १९९४-९५ में महेश भट्ट की फ़िल्म 'क्रिमिनल' से उनका पदार्पण हुआ तो युं लगा कि मानो संगीत की दुनिया में एक ताज़ा हवा का झोंका आ गया हो। "तुम मिले दिल खिले" गीत की अपार सफलता के बाद फ़िल्म 'ज़ख़्म' के गीत "गली में आज चांद निकला" ने भी कमाल किया।

सुजॊय - "गली में आज चांद निकला" तो मेरे कॊलर ट्युन में एक लम्बे समय तक बजता रहा है, मेरा बहुत ही पसंदीदा गीतों में से एक है। अच्छा, एम. एम. क्रीम साहब का पूरा नाम शायद बहुत लोगों को मालूम ना हो, उनका असली और पूरा नाम है मरगथा मणि किरवानी। उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। वे कर्नाटक और चेन्नई में भी रह चुके हैं। उनके पिता शिव दत्त दक्षिण के जाने माने लेखक, चित्रकार और फ़िल्मकार रह चुके हैं। क्रीम साहब को बचपन से ही संगीत का शौक था। उन्होने कर्नाटकी और भारतीय शास्त्रीय संगीत में बाक़ायदा तालीम प्राप्त की।

सजीव - वैसे मूलत: वो एक वायलिन वादक हैं जिसका प्रमाण हमें मिलता है उनके संगीतबद्ध किए तमाम गीतों में। फ़िल्म 'सुर' में कम से कम दो ऐसे गीत हैं जो इस बात का प्रमाण है। ये गानें हैं "आ भी जा ऐ सुबह आ भी जा" और "कभी शम ढले तो मेरे दिल में आ जाना"। उन्होने दक्षिण के फ़िल्मी गीतों में कई सालों तक वायलिन वादक के रूप में काम किया और वे जाने माने संगीतकार चक्रवर्ती के सहायक भी रह चुके हैं।

सुजॊय - १९९० में रामोजी रा की फ़िल्म 'मारासो मरुथा' में क्रीम साहब ने पहली बार एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में काम किया। तब से लेकर आज तक उन्होने हिंदी और दक्षिण की सभी भाषाओं के गीतों को स्वरबद्ध किया है। फ़िल्म 'अन्ना मैया' के लिए उन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। दक्षिण के सफल संगीतकार होने के बावजूद उन्हे हिंदी से बेहद लगाव है। उनके पसंदीदा संगीतकार हैं राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, मदन मोहन और शंकर जयकिशन। उनकी वेस्टर्ण क्लासिकल म्युज़िक में गहरी दिलचस्पी रही है जो उनके गीतों में साज झलकता है।

सजीव - एम. एम. क्रीम की पहली हिंदी थी राम गोपाल वर्मा की 'द्रोही', जिसमें उन्होने दो गानें कॊम्पोज़ किए, बाक़ि गानें राहुल देव बर्मन के थे। उनकी पहली स्वतंत्र हिंदी फ़िल्म थी 'क्रिमिनल'। हालाँकि उन्होने बहुत कम हिंदी फ़िल्मों में संगीत दिया है, पर उनका हर एक गीत हिट साबित हुआ। 'क्रिमिनल' और 'ज़ख़्म' के अलावा 'सुर', 'इस रात की सुबह नहीं', 'जिस्म', 'साया', 'रोग', 'पहेली' जैसी फ़िल्मों में उनका उत्कृष्ट संगीत हमें सुनने को मिला। तो चलिए अब उन्ही के संगीत और उन्ही की आवाज़ में सुनते हैं फ़िल्म 'लाहौर' का चौथा गीत "साँवरे"।

सुजॊय - इस गीत में दर्द है और एम. एम. क्रीम ने क्या ख़ूब दर्दीले अंदाज़ में इसे गाया है और इसमें जान डाल दी है। कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है जिससे कि शब्दों की गहराई और भी बढ़ गई है। आइए सुना जाए।

गीत - साँवरे...saanvare (lahaur)


सजीव - इससे पहले कि हम आज का अंतिम गीत सुनें, आपको 'लाहौर' फ़िल्म की भूमिका बताना चाहेंगे। 'नैशनल इंडीयन किक्‍-बॊक्सिंग्' के लिए खिलाड़ियों की चुनाव प्रक्रिया चल रही है। एक मंत्री हैं जो चाहते हैं कि उनके फ़ेवरीट प्लेयर को चुना जाए, जब कि कोच चाहते हैं कि सब से योग्य खिलाड़ी को यह मौका मिले। दूसरी तरफ़, दो प्रतिभागी ऐसे हैं जिनमें से एक तो अपने बलबूते और योग्यता के आधार पर आगे बढ़ना चाहता है, जब कि दूसरे का अपने कनेक्शन्स् पर पूरा भरोसा है। ऐसे में अचानक क्वालालमपुर में भारत और पाक़िस्तान के बीच एक प्रतियोगिता की घोषणा हो जाती है। एक तरफ़ से धीरेन्द्र सिंह, जिन्हे मैन ऒफ़ स्टील कहा जाता है और जिन्हे इस खेल में अपने आप पर पूरा विश्वास है। उधर पाक़िस्तान की तरफ़ से हैं नूर मोहम्मद, जिन्हे इस तरह से तैयार किया गया है कि उन्हे लगता है कि विजय हर क़ीमत पर मिलनी चाहिए। लेकिन ज़िंदगी ने इन दोनों के लिए कुछ और ही सोच रखा है। एक के फ़ाउल प्ले की वजह से दूसरे की मृत्यु हो जाती है जब कि पूरी दुनिया चुपचाप इसका नज़ारा देखती है। क़िस्मत फिर एक बार इन दो देशों के दो खिलाड़ियों को आमने सामने लाती है। इनमें से एक खिलाड़ी वही है जिसकी वजह से पिछली बार दूसरे की मौत हुई थी। और दूसरा खिलाड़ी अपने देश की खोयी हुई इज़्ज़त को वापस हासिल करने के लिए जी जान लगाने को तैयार है। इस तरह से शुरु होती है प्रतिस्पर्धा की कहानी। और यही है 'लाहौर' फ़िल्म की मूल कहानी।

सुजॊय - और अब आज के अंतिम गीत की बारी। राहत फ़तेह अली ख़ान और शिल्पा राव की आवाज़ में "ओ रे बंदे"। सूफ़ी अंदाज़ की यह क़व्वाली है और इसके संगीतकार हैं पीयूष मिश्रा, जिन्होने इस फ़िल्म में केवल इसी गीत को कॊम्पोज़ किया है।

सजीव - पीयूष जो वैसे तो गीतकार के रूप में ही जाने जाते हैं, लेकिन हाल के कुछ सालों में वो संगीत भी दे रहे हैं, जैसे कि फ़िल्म 'गुलाल' में दिया था। रवीन्द्र जैन और प्रेम धवन की तरह पीयूष मिश्रा भी धीरे धीरे गीतकार और संगीतकार, दोनों ही विधाओं में महारथ हासिल कर लेंगे, ऐसा उनके गीतों को सुन कर लगता है।

सुजॊय - और इस बार इस गीत में राहत फ़तेह अली ख़ान ने ऊँचे नोट्स नहीं लगाए हैं, बल्कि बहुत ही कोमल अंदाज़ में इसे गाया है। इस गीत के बारे में ज़्यादा कुछ ना कह कर आइए सीधे इसे सुन लिया जाए।

गीत - ओ रे बंदे...o re bande (lahaur)


"लाहौर" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२
अब ये काफिला और मुसाफिर अल्बम के बेहतरीन गीत है, अन्य गीतों में वो प्रभाव नहीं है. एम् एम् क्रीम बहुत दिनों बाद लौटे हैं, पर हम सब जानते हैं कि वो किस स्तर के संगीतकार हैं, जाहिर है उनसे उम्मीदें भी अधिक रहती हैं, बहरहाल यदि फिल्म सफल रहती है तो संगीत भी सराहा जायेगा अन्यथा एक्स फेक्टर के अभाव में गिने चुने संगीत प्रेमियों तक ही सीमित रह जायेगा लाहौर का ये संगीत.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २८- मुल्क राज आनंद और संजय पूरन सिंह चौहान को आप किस समानता से जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # २९ पीयूष मिश्रा को सूरज बरजात्या की एक मशहूर फ़िल्म में बतौर नायक कास्ट करने के बारे में सोचा गया था। बाद में यह फ़िल्म सलमान ख़ान के पास चली गई और एक ब्लॊकबस्टर साबित हुई। बताइए वह फ़िल्म कौन सी थी?

TST ट्रिविया # ३० एम. एम. क्रीम की बहन भी एक संगातकारा हैं, उनका नाम बताइए।


TST ट्रिविया में अब तक -
निर्मला कपिला जी तो अक्सर महफ़िल में आती रहती हैं, विवेक रस्तोगी और एम् वर्मा जी पहली बार पधारे, उनका स्वागत. सीमा जी हर बार की तरफ जवाबों के साथ तत्पर मिली, बधाई

Monday, March 1, 2010

"अमन की आशा" है संगीत का माधुर्य, होली पर झूमिए इन सूफी धुनों पर

ताज़ा सुर ताल ०९/२०१०

सुजॊय - सभी पाठकों को होली पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ और सजीव, आप को भी!
सजीव - मेरी तरफ़ से भी 'आवाज़' के सभी रसिकों को होली की शुभकामनाएँ और सुजॊय, तुम्हे भी।
सुजॊय - होली का त्योहार रंगों का त्योहार है, ख़ुशियों का त्योहार है, भाइचारे का त्योहार है। गिले शिकवे भूलकर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं, चारों तरफ़ ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है।
सजीव - सुजॊय, तुमने भाइचारे की बात की, तो मैं समझता हूँ कि यह भाइचारा केवल अपने सगे संबंधियों और आस-पड़ोस तक ही सीमित ना रख कर, अगर हम इसे एक अंतर्राष्ट्रीय रूप दें, तो यह पूरी की पूरी पृथ्वी ही स्वर्ग का रूप ले सकती है।
सुजॊय - जी बिल्कुल! आज कल जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय उग्रवाद बढ़ता जा रहा है, विनाश और दहशत के बादल इस पूरी धरा पर मंदला रहे हैं। ऐसे में अगर कोई संस्था अगर अमन और शांति का दूत बन कर, और सीमाओं को लांघ कर दो देशों को और ज़्यादा क़रीब लाने का प्रयास करें, तो हमें खुले दिल से उसकी स्वागत करनी चाहिए।
सजीव - हाँ, और ऐसी ही दो संस्थाओं ने मिल कर अभी हाल में एक परियोजना बनाई है भारत और पाक़िस्तान के रिश्तों को मज़बूत करने की। ये संस्थाएँ हैं भारत का सब से बड़ा मीडिया ग्रूप 'टाइम्स ग्रूप', पाक़िस्तान का मीडिया जायण्ट 'जंग ग्रूप', तथा 'जीओ टीवी ग्रूप', और इस परियोजना का शीर्षक है 'अमन की आशा'। ये मीडिया जायण्ट्स मिल कर दोनों देशों के बीच राजनैतिक और सांस्कृतिक संबंधों में सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ तक सांस्कृतिक पक्ष का सवाल है, तो इन दोनों देशों के जानेमाने कलाकारों के गीतों का एक संकलन हाल ही में जारी किया गया है।
सुजॊय - डबल सी डी पैक वाले 'अमन की आशा' ऐल्बम में ऐसे ऐसे कालजयी कलाकारों की रचनाएँ शामिल किए गए हैं कि कौन सा गीत किससे बेहतर है बताना मुश्किल है। इनमें से कुछ फ़िल्मी रचनाएँ हैं तो कुछ ग़ैर-फ़िल्मी, लेकिन हर एक गीत एक अनमोल नगीने की तरह है जो इस ऐल्बम में जड़े हैं। और क्यों ना हो जब लता मंगेशकर, गुलज़ार, भुपेन्द्र सिंह, शंकर महादेवन, हरीहरण, रूप कुमार राठोड़, नूरजहाँ, गु़लाम अली, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, अबीदा परवीन, मेहदी हसन, राहत फ़तेह अली ख़ान, वडाली ब्रदर्स जैसे अज़ीम फ़नकारों के गाए गानें इसमें शामिल हों। इनमें से कुछ गानें नए हैं तो कुछ कालजयी रचनाएँ हैं। और कुछ पारम्परिक गानें तो आप ने हर दौर में अलग अलग गायकों की आवाज़ों में सुनते आए हैं।
सजीव - इस ऐल्बम में कुल २० गानें हैं, जिनमें से हम ५ ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं को आज के इस 'ताज़ा सुर ताल' की कड़ी में शामिल कर रहे हैं। बाक़ी गीत आप समय समय पर 'आवाज़' के अन्य स्तंभों में सुन पाएँगे। तो सुजॊय, चलो बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाने से पहले एक गीत हो जाए अबीदा परवीन का गाया हुआ!

गीत - मैं नारा-ए-मस्ताना


सजीव- वाह ये तो कोई जादू था सुजॉय, मैं तो अभी तक झूम रहा हूँ...
सुजॊय -बिलकुल ठीक, अबीदा परवीन का जन्म १९५४ में हुआ था पाकिस्तान के सिंध के लरकाना के अली गोहराबाद मोहल्ले में। संगीत की तालीम उन्होने शुरुआती समय में अपने पिता उस्ताद ग़ुलाम हैदर से ही प्राप्त किया। बाद में शाम चौरसिया घराने के उस्ताद सलामत अली ख़ान से उन्हे संगीत की शिक्षा मिली। अपने पिता के संगीत विद्यालय में जाते हुए अबीदा परवीन में संगीत के जड़ मज़बूत होते चले गए। उनका प्रोफ़ेशनल करीयर रेडियो पाक़िस्तान के हैदराबाद केन्द्र से शुरु हुआ था सन् १९७३ में। उनका पहला हिट गीत एक सिंधी गीत था "तूहींजे ज़ुल्फ़न जय बंद कमंद विधा"। सूफ़ियाना संगीत में अबीदा जी का एक अलग ही मुक़ाम है। मूलत: वो ग़ज़लें गाती हैं, लेकिन उर्दू प्रेम गीत और ख़ास तौर पर काफ़ी पर उनका जैसे अधिकार सा बना हुआ है। वो उर्दू, सिंधी, सेरैकी, पंजाबी और पारसी में गाती हैं।
सजीव - व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो अबीदा परवीन ने रेडियो पाक़िस्तान के सीनियर प्रोड्युसर ग़ुलाम हुसैन शेख़ से शादी की, जिनका अबीदा जी के शुरुआती करीयर में एक गायिका के रूप में उभरने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। पुरस्कारों की बात करें तो अबीदा परवीन को १९८२ में 'प्राइड ऒफ़ परफ़ॊर्मैंस' का 'प्रेसिडेण्ट ऒफ़ पाक़िस्तान अवार्ड' मिला था। अभी कुछ वर्ष पहले २००५ में उन्हे 'सितारा-ए-इमतियाज़' के सम्मान से नवाज़ा गया था।
सुजॊय - वैसे तो अबीदा जी के असंख्य ऐल्बम बनें हैं, उनमें से कुछ के नाम हैं आपकी अबीदा, अरे लोगों तुम्हारा क्या, बेस्ट ऒफ़ अबीदा परवीन (१९९७), बाबा बुल्ले शाह, अबीदा परवीन सिंग्स् सॊंग्स् ऒफ़ दि मिस्टिक्स, अरीफ़ाना क़लाम, फ़ैज़ बाइ अबीदा, ग़ालिब बाइ अबीदा परवीन, ग़ज़ल का सफ़र, हर तरन्नुम, हीर बाइ अबीदा, हो जमालो, इश्क़ मस्ताना, जहान-ए-ख़ुसरो, कबीर बाइ अबीदा, काफ़ियाँ बुल्ले शाह, काफ़ियाँ ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद ख़ज़ाना, कुछ इस अदा से आज, लट्ठे दी चादर, मेरे दिल से, मेरी पसंद, रक़्स-ए-बिस्मिल, सरहदें, तेरा इश्क़ नचया, दि वेरी बेस्ट ऒफ़ अबीदा, यादगार ग़ज़लें, आदि। इन नामों से ही आप अंदाज़ा ल्गा सकते हैं कि अबीदा परवीन किन शैलियों में महारथ रखती हैं।
सजीव - अबीदा परवीन के बारे में अच्छी बातें हमने जान ली, और अब 'अमन की आशा' में आगे बढ़ते हुए दूसरा गीत रूप कुमार राठोड़ और देवकी पंडित की आवाज़ों में, यह एक आध्यात्मिक गीत है, दैवीय सुर गूंजते हैं इस भक्ति रचना में जिसके बोल हैं "अल्लाहू"। 'अमन की आशा' सूफ़ी संगीत को एक और ही मुक़ाम तक ले जाती है।

गीत - अल्लाहू


सजीव - अगला गीत है वडाली ब्रदर्स का गाया "याद पिया की आए"। ये दोनों भाई जब किसी महफ़िल में गाते हैं तो एक ऐसा समा बंध जाता है कि महफ़िल के ख़त्म होने तक श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हे सुनते हैं, और महफ़िल के समापन के बाद भी जिसका असर लम्बे समय तक बरक़रार रहता है। सुजॊय, इन दो भाइयों के बारे में कुछ बताना चाहोगे?
सुजॊय - ज़रूर! पूरनचंद वडाली और प्यारेलाल वडाली भी सूफ़ी गायक व संगीतज्ञ हैं जिनका ताल्लुख़ पंजाब के अमृतसर के गुरु की वडाली से है। वडाली ब्रदर्स सूफ़ी संतों के उपदेशों व विचारों को गीत-संगीत के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने वाले कलाकारो की पाँचवी पीढ़ी के सदस्य हैं। ये दो भाई एक ग़रीब परिवार से ताल्लुख़ रखते थे। बड़े भाई पूरनचंद २५ वर्ष के लम्बे समय तक कुश्ती के अखाड़े से जुड़े हुए थे। छोटा भाई प्यारेलाल अपने घर की अर्थिक स्थिति को थोड़ा बेहतर बनाने के लिए गाँव के रासलीला में श्री कृष्ण की भूमिक निभाया करते थे। भगवान के आशीर्वाद से दोनों भाइयों ने मिलकर आज जो मुक़ाम हासिल किया है, वह उल्लेखनीय है।
सजीव - जहाँ तक मैम्ने सुना है इनके पिता ठाकुर दास ने पूरनचंद को ज़बरदस्ती संगीत में धकेला जब कि उनकी दिलचस्पी अखाड़े में थी। ख़ैर, पूरनचंद ने पंडित दुर्गादास और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान से तालीम ली, जब कि प्यारेलाल को पूरनचंद ने ही संगीत सीखाया। आज भी प्यारेलाल अपने बड़े भाई को ही अपना गुरु और्व सर्वस्व मानते हैं। अपने गाँव के बाहर इन दो भाइयों ने अपना पहला पब्लिक परफ़ॊर्मैंस जलंधर के हरबल्लभ मंदिर में दिया था।
सुजॊय - पता है वडाली ब्रदर्स दरसल जलंधर में आयोजित हरबल्लभ संगीत सम्मेलन में भाग लेने के लिए ही गए थे, लेकिन उनके वेश-भूषा को देख कर उन्हे वहाँ गाने का मौका नहीं दिया गया। निराश होकर इन्होने तय किया कि वो हरबल्लभ मंदिर के बाहर ही अपना संगीत प्रस्तुत करेंगे। और इन्होने ऐसा ही किया। संयोगवश उस वक़्त वहाँ आकाशवाणी जलंधर के संगीत विभाग के एक सदस्य मौजूद थे जिनको उनकी गायकी अच्छी लगी और आकाशवाणी जलंधर में उनकी पहली रिकार्डिंग् हुई।
सजीव - वडाली ब्रदर्स के बारे में अभी और भी बहुत सी बातें हैं बताने को, लेकिन वो हम फिर किसी दिन बताएँगे। यहाँ पर बस यह बताते हुए कि वडाली ब्रदर्स काफ़ी, गुरबाणी, ग़ज़ल और भजन शैलियों में महारथ रखते है, आपको सुनवा रहे है 'अमन की आशा' ऐल्बम में उनका गाया "याद पिया की आए"।
सुजॊय - सजीव, "याद पिया की आए" उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब ने ठुमरी के अंदाज़ में गाया था। लेकिन वडाली ब्रदर्स के गाए इस वर्ज़न में तो उन्होने इसका नज़रिया ही बिल्कुल बदल के रख दिया है। चलिए सुनते हैं इस रूहानी रचना को।

गीत - याद पिया की आए


सजीव - "याद पिया की आए" की तरह एक और पारम्परिक रचना है "दमादम मस्त कलंदर, अली दम दम दे अंदर", जिसे हर दौर में अलग अलग फ़नकारों ने गाए हैं, जैसे कि नूरजहाँ, अबीदा परवीन, रूना लैला, नुसरत फ़तेह अली ख़ान और भी बहुत सारे। 'अमन की आशा' में इस क़व्वाली का जो संस्करण शामिल किया गया है उसे गाया है रफ़ाक़त अली ख़ान ने।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान पाक़िस्तान के अग्रणी गायक हैं जिनका ताल्लुख़ शाम चौरसी घराने से है। गायन के साथ साथ कई साज़ बजाने में वो माहिर हैं और अपने गीतों में पाश्चात्य साज़ों का भी वो ख़ूब इस्तेमाल करते हैं। तबला, ढोलक, हारमोनियम, इलेक्ट्रिक ड्रम और सीन्थेसाइज़र वो ख़ूब बजा लेते हैं। रफ़ाक़त साहब का जन्म लाहौर में हुअ था। संगीत उन्हे विरासत में ही मिली, पिता उस्ताद नज़ाक़त अली ख़ान, चाचा उस्ताद सलामत अली ख़ान, स्व: उस्ताद नौरत फ़तेह अली ख़ान और जवाहर वत्तल जानेमाने गायक हुए हैं।
सजीव - हाल की उनके दो ऐल्बम 'अल्लाह तेरा शुक्रिया' और 'मान' काफ़ी चर्चित रहे। रफ़ाक़त साहब के पसंदीदा फ़नकारों में लता मंगेशकर, किशोर कुमार, हरीहरन और शंकर महादेवन शामिल हैं।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान के बारे में एक और दिलचस्प बात यह कि वो जिम्नास्टिक्स में यूनिवर्सिटी व नैशनल चैम्पियन रह चुके हैं। तो आइए सुनते हैं यह मशहूर पारम्परिक उर्दू सूफ़ी क़लाम।

गीत - दमादम मस्त कलंदर


सजीव - और अब इस ऐल्बम का शीर्षक गीत पेश है शंकर महादेवन और राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ों में। गुलज़ार साहब के लिखे इस गीत को 'अमन की आशा' मिशन का ऐंथेम माना जा रहा है।
सुजॊय - "नज़र में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते, ये सुर बुलाते हैं जब तुम इधर नहीं आते"। २ मिनट का यह गीत दरअसल एक ऐंथेम की तरह ही है, सीधे सादे बोल लेकिन गहरा भाव छुपा हुआ है, शांति का प्रस्ताव भी है, अमन की आशा भी है। शंकर और राहत साहब के अपने अपने अनोखे अंदाज़ से इसमें एक जो कॊण्ट्रस्ट पैदा हुआ है, वही इसकी खासियत है।
सजीव - इस गीत को सुनने से पहले हम बस यही कहेंगे अपने पाठकों व श्रोताओं को कि यह ऐल्बम एक मास्टर पीस ऐल्बम है और अच्छे संगीत के क़द्रदान इसे ज़रूर ख़रीदें। यह उपलब्ध है टाइम्स म्युज़िक पर।
सुजॊय - सभी को एक बार फिर से होली की ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए हम अमन और शांति की आशा करते हैं।

नज़र में रहते हो (अमन की आशा)


"अमन की आशा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग *****
भाई अब जहाँ ऐसे ऐसे फनकार होंगें उस अल्बम की समीक्षा कोई क्या करे, अल्बम का हर गीत अपने आप में बेमिसाल है, खासकर आबिदा के कुछ जबरदस्त सूफी गीतों को इसमें स्थान दिया गया है. संगीत प्रेमियों के लिए अति आवश्यक है ये अल्बम, हर हाल में खरीदें सुनें.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २६- अभी हाल में वडाली ब्रदर्स ज़ी टीवी के किस कार्यक्रम में अतिथि बन कर पधारे थे?
TST ट्रिविया # २७ आबिदा की किस अल्बम पर पीटर मार्श ने टिपण्णी की थी कि वो शौपिंग लिस्ट भी गाकर श्रोताओं को रुलाने की कुव्वत रखती है ?
TST ट्रिविया # २८ अभी हाल ही में देविका पंडित की कौन सी अलबम बाजार में आई है


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी ने जबरदस्त वापसी की है सभी सवालों का सही जवाब देकर, बधाई

Monday, February 15, 2010

उन सगीत प्रेमियों के लिए जिन्हें आज का संगीत शोर शराबा लगता है उनके लिए है "रोड टू संगम" का संगीत

ताज़ा सुर ताल ०७/ 2010

सुजॊय - सजीव, बहुत ही अफ़सोस की यह बात है कि आजकल कला को लेकर भी हमरे देश में राजनीति और साम्प्रदायिक मनमुटाव हो रही है। मेरा इशारा मुंबई में 'माइ नेम इज़ ख़ान' के प्रदर्शन के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध की तरफ़ है। क्या आपको नहीं लगता कि फ़िल्म निर्माण एक कला है और किसी भी कला को इस तरफ़ की चीज़ों से दूर रखी जानी चाहिए?

सजीव - बिल्कुल! अगर किसी को किसी के ख़िलाफ़ जाना हो तो न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है, ना कि उसके फ़िल्म के प्रदर्शन को रोक कर अपनी शक्ति का परिचय देनी चाहिए। ख़ैर, यह सब तो चलता ही रहेगा। अच्छा सुजॊय, हम अफ़सोस की बात कर रहे हैं तो एक अफ़सोस यह भी रहा है कि बहुत सी फ़िल्में हैं जो बेहद उत्कृष्ट होते हुए भी आम जनता तक सही रूप से नहीं पहुँच पाती है, क्योंकि फ़िल्म के निर्माता के पास उतना आर्थिक ज़ोर नहीं होता है कि अपनी फ़िल्म का ढोल पीट पीट कर प्रचार करें। कई फ़िल्में तो किसी थिएटर पर भी नहीं लगती, बल्कि सिर्फ़ फ़िल्म महोत्सवों में ही दिखाई जाती है। ऐसे में फ़िल्म लोगों तक नहीं पहुँचती है और उनका संगीत भी गुमनामी के अंधेरे में खो जाता है।

सुजॊय - ठीक कहा आपने और यह आज की बात नहीं है, यह परंपरा हमारे देश में सालों से चली आ रही है। एक कलाकार के लिए ज़ाहिर है कि यह दुख की बात होती है कि जब उसकी कला का सही सही मूल्यांकन ना हो, उसकी प्रतिभा का सही मूल्यांकन ना हो। लेकिन जैसा कि आज हम यह चलन देखते हैं कि वह चीज़ जो ज़्यादा चलती है बाज़ार में, या लोकप्रियता में, वही उसकी श्रेष्ठता का आधार बन जाती है।

सजीव - हालाँकि सब का अपना अपना नज़रिया होता है चीज़ों को देखने का, उनकी मूल्यांकन करने का, उनकी कसौटी का; लेकिन एक चीज़ ज़रूर है कि लोगों का प्यार, अच्छे फ़िल्म और अच्छे संगीत के जो क़द्रदान हैं, उनके प्यार से बढ़कर पुरस्कार कुछ हो नहीं सकता। 'ताज़ा सुर ताल' एक ऐसा ही मंच है कि जिसमें हम लोकप्रिय फ़िल्मों के साथ साथ ऐसी फ़िल्मों और कलाकारों को भी बराबर की जगह देते हैं जिनका काम उत्कृष्ट तो रहा लेकिन व्यावसायिक्ता की दृष्टि से जिन्होने बहुत ऊँचा मुक़ाम नहीं बनाया। हाल में एक ऐसी ही फ़िल्म आई थी 'रोड टू संगम'। आप में से बहुत से लोगों ने इस फ़िल्म के बारे में सुना भी नहीं होगा, जब कि इस फ़िल्म ने विदेशों में कई कई पुरस्कार जीता है। आज इसी फ़िल्म और इसके गीत संगीत की बातें।

सुजॊय - सजीव, इससे पहले कि इस फ़िल्म की बातें शुरु की जाएँ, आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुन लेते हैं।

गीत - अवल अल्लाह...awwal allah (road to sangam)


सजीव - कैलाश खेर और साथियों की आवाज़ों में यह सुफ़ियाना नग़मा आपने सुना। चार चार संगीतकारों ने इस गीत की धुन बनाई। ये हैं संदेश शांडिल्य, विजय मिश्र, नितिन कुमार हरिया और प्रेम हरिया। कैलाश ने इसमें वही अंदाज़ का परिचय दिया जिस अंदाज़ के लिए वो जाने जाते हैं।

सुजॊय - हाँ, वही उनकी ऊँची आवाज़ और सुफ़ी रंग में रंगा हुआ। "अवल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपजया, कौन भले कौन मंदे", कबीरदास के ये बोल, जो गुरु ग्रंथ साहिब में भी पाया जाता है, बहुत ही अच्छे बोल हैं इस पूरे गीत में, और इस ऐल्बम का मेरा तो यही सब से फ़ेवरीट गीत है। वैसे इस गीत का क्रेडिट फ़िल्म के औपचरिक गीतकार सुधीर नेमा को ही दिया गया है।

सजीव - अब दूसरा गीत सुना जाए "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाने रे"।

सुजॊय - सजीव, क्या यह फ़िल्म गांधी जी से संबंधित है? इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि गांधी जी के इस मनपसंद भजन को शामिल किया गया है।

सजीव - बिल्कुल सही अनुमान लगाया है तुमने। इस फ़िल्म की भूमिका मैं बताउँगा, लेकिन पहले यह भजन सुन लिया जाए। एक अलग ही शैली में इसे कॊम्पोज़ किया है संगीतकार नितिन कुमार हरिया और प्रेम हरिया ने। गाया है कीर्ति सगठिया ने। इस भजन को आम तौर पर जिस रफ़्तार में गाई जाती है, उससे काफ़ी तेज़ गति में गाया गया है। इस भजन के मूल शब्दों के साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं की गई है और इसका जो एक पारम्परिक फ़ील है, उसे बरकरार रखा गया है। अनावश्यक साज़ों और बीट्स से फ़्युज़न नहीं किया गया है बल्कि जो भी साज़ या रीदम का इस्तेमाल हुआ है, उससे इस भजन का जो एक नया स्वरूप जन्मा है, वह सुनने में अच्छा लगता है। सुनते हैं।

सुजॊय - सजीव, हो सकता है कि आज की पीढ़ी को इस भजन के शब्दों का अर्थ पता ना हो, इसलिए कम से कम इस गुजराती भजन के मुखड़े का अनुवाद मैं यहाँ करना चाहूँगा। "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाने रे", यानी कि वही सच्चा वैष्णव उसी को कहते हैं जो दूसरों के दुख तक़लीफ़ों को महसूस कर सकता है। "पर दुक्खे उपकार करे तोये, मन अभिमान ना आणे रे" यानी जो अपने सारे मान अभिमान को त्याग कर दुखी लोगों की सहायता करे।

गीत - वैष्णव जन तो तेने कहिए...vaishanav jan to (road to sangam)


सजीव - जैसा कि मैंने वादा किया था कि इस फ़िल्म के बारे में बताउँगा, तो इस फ़िल्म की कहानी का पार्श्व महात्मा गांधी से संबंध रखती है। कहानी शुरु होती है महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी से जिन्हे एक बक्सा मिलता है अपने दादा की अस्थियों का जो कि एक स्थानीय डाक घर में सालों से रखा हुआ था। तुषार निश्चय करता है कि उन अस्थियों को वो गंगा के पवित्र संगम पर प्रवाहित कर देगा। उधर हश्मतुल्लाह (परेश रावल) एक सीधा सादा धर्म भीरु मुसलमान है जो पेशे से एक मेकैनिक है और जो किसी भी किस्म का मशीन ठीक कर सकता है। उसका सम्मान स्थानीय धार्मिक गुटें भी करती हैं और उनके सब से ऊँचे पद के लिए वो एक मज़बूत दावेदार भी हैं। उनका मुख्य प्रतिद्वंदी हैं मोहम्मद अली कसूरी (ओम पुरी)। स्थानीय मौलवी मौलाना क़ुरेशी (पवन मल्होत्रा) भी उनके ख़िलाफ़ हैं। हश्मत के दोस्तों में हैं डॊ. बैनर्जी (जावेद शेख़)। एक दिन हश्मत के पास एक पुरानी वी-८ फ़ोर्ड गाड़ी रिपेयरिंग् के लिए आती है, यह जाने बग़ैर कि उस गाड़ी की कितनी ऐतिहासिक मूल्य है। दरसल किसी ज़माने में उसी गाड़ी में चलकर महात्मा गांधी के अस्थियों को संगम में प्रवाहित किया गया था। अब फिर एक बार उसी गाड़ी का इस्तेमाल होना था। लेकिन हश्मत के शहर में एक बम विस्फ़ोर्ट हो जाती है जिसकी वजह से बहुत से मुसलमान युवकों को पुलिस हिरासत में ले लेती है और उन पर अत्याचार चलाती है। इसके विरोध में वहाँ के मुसलमान लीडर्स, जिनमें शामिल हैं कसूरी और मौलाना क़ुरेशी, स्ट्राइक की घोषणा करते हैं जिसके तहत किसी को भी काम करने से मनाई है। हश्मत भी उनके साथ ही थे लेकिन जैसे ही उनको पता चला कि इस गाड़ी का इस्तेमाल गांधी जी के अस्थियों के विसर्जन की शोभा यात्रा में की जानी है, वो यह निर्णय लेता है कि वो स्ट्राइक में शमिल नहीं होगा और उस गाड़ी को रिपेयर करेगा। इससे उसे काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ता है, लेकिन आख़िरकार वो अपने मिशन में सफल हो जाता है।

सुजॊय - बहुत अच्छा प्लॊट है, और कलाकार भी तो एक से बढ़कर एक हैं, जो कलात्मक फ़िल्मों के मज़बूत स्तंभ भी माने जाते हैं। परेश रावल के वर्सेटिलिटी के बारे में तो हम सभी जानते हैं।

सजीव - और सुजॊय, यह फ़िल्म किसी भी तरह का उपदेश नहीं देता, गांधी जी के उसूलों की पाठ नहीं पढ़ाता, बल्कि यह सीधी सीधे पूछता है हम से कि क्या हम ऐसे भावों और विचारों से जगरूक हैं! नवोदित निर्देशक अमित राय की पहली फ़िल्म है और पहली फ़िल्म में उन्होने जो हुनर दिखाया है, ऐसा लगता है कि बहुत दूर तक जाएँगे वो अपने करीयर में। और इस फ़िल्म के निर्माता हैं अमित छेड़ा।

सुजॊय - चलिए अब एक और गीत की गुंजाइश यहाँ पर बनती है, तो सुनते हैं फ़िल्म का तीसरा गाना।

गीत - लब पे आती है दुआ...lab pe aati hai (road to sangam)


सुजॊय - हरीहरण की आवाज़ में यह नात आपने सुनी। सुधीर नेमा इकबाल के शब्दों में कुछ अपनी पंक्तियाँ पिरोई है जब कि हरिया भाइयों ने इसे सधार्नात नात से अलग ट्रीटमेंट देने की कोशिश की है। हम कह सकते हैं कि एक तरह की आशावादी रचना है।

सजीव - और साथ ही साथ देश भक्ति का एक अंग भी है इसमें। इस तरह के नर्मोनाज़ुक गीतों और ग़ज़लों के लिए हरीहरण हमेशा से ही जाने जाते हैं। फ़िल्मों के अलावा ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें बेशुमार उन्होने गाए हैं, और यह भी यक़ीनन उनके यादगार रचनाओं में शुमार पाएगी।

सुजॊय - अब आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं अगला गीत। गीत नहीं, दरअसल यह एक क़व्वाली है विजय मिश्र, ग़ुलाम क़ादिर ख़ान, ग़ुलाम मुर्तुज़ा ख़ान और साथियों की आवाज़ों में। ९ मिनट लम्बी यह क़व्वाली "हम सुबह के भूलों को पता घर का बता दे, ऐ शाह कलंदर हमें तू जीना सीखा दे" एक धार्मिक क़व्वली है, जिसे अगर आप पूरी तरह से ध्याम मग्न होकर सुनें तो एक अलग ही आध्यात्मिक दुनिया में पहुँच जाएँगे।

सजीव - साथ ही धर्म के नाम पर जो अशांति मची रहती है, उसए भी उजागर करते हुए सुधीर नेमा लिखते हैं कि "धर्म ख़तरे में है, उसको बचाने निकले हैं, मज़हबी लोग अब म़ज़हब जताने निकले हैं, लाल आँखें लिए ख़ंजर चलाने निकले हैं, नासमझ लोग अपना घर जलाने निकले हैं"। आइए सुनें।

गीत - हम सुबह के भूलों को पता घर का पता दे...ham subaha ke bhoolon ko (road to sangam)


सजीव - और अब आज का अंतिम गीत "रे मेरे मौला"। है तो इस्लामी रंग इस गीत में भी, लेकिन इसे कुछ मॊडर्ण लुक्स दिए गए हैं। पिछले चार गीतों में जिस तरह का पारंपरिक संगीत संयोजन सुनने को मिला था, उससे अलग रखते हुए इस गीत को थोड़ा सा वेस्टर्ण शैली में कॊम्पोज़ किया है नितिन और प्रेम हरिया ने। सुधीर नेमा के बोल इस गीत में भी सुंदर हैं, और गायक शदब फ़रीदी की आवाज़ भी ताज़े हवा के झोंके की तरह सुनाई देती है। पार्श्व में जो 'कोरल इफ़ेक्ट' डाला गया है, वह भी कुछ कुछ 'काउंटर मेलडी' की तरह प्रतीत होती है।

सुजॊय - तो कुल मिलाकर हम यही कह सकते हैं कि 'रोड टू संगम' का जो म्युज़िक है, उससे हमें दोस्ती करनी चाहिए और हो सके तो यह फ़िल्म भी देखनी चाहिए, क्यों?

सजीव - बिल्कुल देखनी चाहिए, और पता है इस फ़िल्म ने अभी हाल ही में लॊस ऐंजेलेस रील फ़िल्म फ़ेस्टिवल में तीन तीन पुरस्कार जीते हैं, बेस्ट फ़ॊरेन फ़िल्म, बेस्ट फ़ॊरेन फ़िल्म (ऒरिजिनल स्कोर) और बेस्ट फ़ॊरेन फ़िल्म (प्रोडक्शन डिज़ाइन) के कैटेगरीज़ में। एक और मज़ेदार बात बताऊँ इस फ़िल्म के बारे में? यह पहली भारतीय फ़िल्म है जिसके साथ भारतीय डाक विभाग जुड़ी हुई है। मार्केटिंग् और विज्ञापन क्षेत्र में डाक विभाग ने इस फ़िल्म की मदद की है। तभी इस फ़िल्म के पोस्टर में पोस्टकार्ड के उपर फ़िल्म का नाम लिखा गया है और तमाम पब्लिसिटी के माध्यमों में इसी का प्रयोग हो रहा है।

सुजॊय - तो चलिए सुनते हम आज का यह अंतिम गीत, और पाठकों व श्रोताओं से आग्रह करते हैं कि इस फ़िल्म के गीतों के बारे में अपनी राय यहाँ टिप्पणी में ज़रूर लिखें!

गीत - रे मेरे मौला...re mere maula (road to sangam)


"रोड टू संगम" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
संगीत में बहुत अधिक विविधता न होते हुए भी शोर शराबे के बीच एक सकून भरी सदा है इस फिल्म का संगीत. "हम सुबह के भूलों को" एक मूल कव्वाली है जो यक़ीनन श्रोताओं को बहुत भाएगी. अन्य सभी पारंपरिक रचनाएं हैं, "लैब पे आती है दुआ" अपने वास्तविक रूप में इतनी सुन्दर है कि उसे किसी भी नए रूप में सुनना शायद कुछ लोगों को अटपटा लगे. कुल मिलाकार इस अल्बम को आप अपने कलेक्शन में स्थान दे सकते हैं.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १९- "वैष्णव जन तो तेने कहिये" भजन को किस संत कवि ने लिखा था और किस शताब्दी में?
TST ट्रिविया # २० लेज़ली लेविस के साथ मिलकर हरीहरण ने प्रसिद्ध ग्रूप 'कोलोनियल कज़िन्स' की शुरुआत की थी। बताइए वह साल कौन सा था?
TST ट्रिविया # २१ "अवल अल्लाह" गीत इससे पहले भी ८० के दशक की एक फ़िल्म में सुनाई दी थी। बताइए उस फ़िल्म का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
आखिरकार सीमा जी और तन्हा जी के आलावा भी कोई मैदान में उतरा. रोहित जी स्वागत और बधाई, आपके दोनों जवाब सही हैं, तन्हा जी आपका भी जवाब सही है...आपको भी बधाई

Tuesday, February 2, 2010

अमन का सन्देश भी है "खान" के सूफियाना संगीत में...

ताज़ा सुर ताल 05/ 2010

सजीव - सुजॊय, वेल्कम बैक! उम्मीद है छुट्टियों का तुमने भरपूर आनंद उठाया होगा!

सुजॊय - बिल्कुल! और सब से पहले तो मैं विश्व दीपक तन्हा जी का शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होने मेरी अनुपस्थिति में 'ताज़ा सुर ताल' की परंपरा को बरक़रार रखने में हमारा सहयोग किया।

सजीव - निस्सन्देह! अच्छा सुजॊय, आज फरवरी का दूसरा दिन है, यानी कि साल २०१० का एक महीना पूरा हो चुका है, लेकिन अब तक एक भी फ़िल्म इस साल की बॊक्स ऒफ़िस पर अपना सिक्का नहीं जमा पाया है। पिछले हफ़्ते 'वीर' रिलीज़ हुई थी, और इस शुक्रवार को 'रण' और 'इश्क़िया' एक साथ प्रदर्शित हुई हैं। 'वीर' ने अभी तक रफ़्तार नहीं पकड़ी है, देखते हैं 'रण' और 'इश्क़िया' का क्या हश्र होता है। 'चांस पे डांस', 'प्यार इम्पॊसिबल', और 'दुल्हा मिल गया' भी पिट चुकी है।

सुजॊय - मैंने सुना है कि 'इश्क़िया' के संवदों में बहुत ज़्यादा अश्लीलता है। विशाल भारद्वाज ने 'ओम्कारा' की तरह इस फ़िल्म के संवादों में भी काफ़ी गाली गलोच और अश्लील शब्द डाले हैं। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि फ़ैमिली ऒडियन्स को यह फ़िल्म थियटरों में खींच पाएगी। देखते हैं! और आपने ठीक ही कहा है कि इस साल अभी तक कोई फ़िल्म हिट नहीं हुई है। और '३ इडियट्स' अब भी सिनेमाघरों में हाउसफ़ुल चल रही है।

सजीव - लेकिन लगता है बहुत जल्द ही आमिर ख़ान को टक्कर देनेवाले हैं शाहरुख़ ख़ान, क्योंकि अगले हफ़्ते रिलीज़ हो रही है 'माइ नेम इज़ ख़ान', जिसका लोग बहुत दिनों से बड़े ही बेसबरी से इंतज़ार कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या 'माइ नेम...' '३ इडियट्स' को बॊक्स ऒफ़िस पर मात दे सकेगी या नहीं।

सुजॊय - जहाँ तक गीत संगीत का सवाल है, जहाँ एक तरफ़ अब भी "ऒल इज़ वेल" काउण्ट डाउन शोज़ में नंबर-१ पर चल रही है, वहीं यह भी देखना है कि 'माइ नेम...' का "सजदा" कामयाबी के कितने पायदान चढ़ता है। चलिए आज हम समीक्षा करें 'माइ नेम इस ख़ान' के गीत संगीत का।

सजीव - जब तुमने "सजदा" का ज़िक्र छेड़ ही दिया है तो चलो जल्दी से यह गीत सुन लेते हैं, उसके बाद इस फ़िल्म की बातों को आगे बढ़ाएँगे।

गीत - सजदा....sajda (MNIK)


सुजॊय - राहत फ़तेह अली ख़ान, शंकर महादेवन और रीचा शर्मा के गाए इस गीत को फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत माना जा रहा है। इस फ़िल्म के लगभग सभी गानें सुफ़ीयाना अंदाज़ के हैं।

सजीव - आजकल एक ट्रेंड सी जैसे चल पड़ी है सुफ़ी संगीत को फ़िल्मों में इस्तेमाल करने की। और क्योंकि यह फ़िल्म का पार्श्व अमेरीका में बसे एक मुस्लिम परिवार से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस तरह का संगीत इस फ़िल्म में सार्थक बन पड़ा है। कुछ कुछ क़व्वाली के अंदाज़ में यह गीत सुनने के बाद देर तक ज़हन में बसा रहता है। तबला और ढोलक के ठेकों का बहुत ही ख़ूबसूरत इस्तेमाल इस गीत में सुनने को मिलता है।

सुजॊय - और राहत फ़तेह अली ख़ान और रीचा शर्मा के सुफ़ीयाना अंदाज़ से तो श्रोता बहुत दिनों से ही परिचित हैं, इस गीत में भी इन दोनों ने अपना बेस्ट दिया है। और संगीतकार तिकड़ी शंकर अहसान लॊय ने फिर एक बार साबित किया कि उन्हे सिर्फ़ रॊक में नहीं बल्कि हर प्रकार के संगीत में महारथ हासिल है।

सजीव - तो कुल मिलाकर हम यह कहें कि हमें इस गीत का सजदा करना चाहिए?

सुजॊय - बेशक़!

सजीव - अच्छा, अब जो दूसरा गाना हम सुनेंगे उसे भी तीन गायकों ने गाया है। ये हैं अदनान सामी, शंकर महादेवन और श्रेया घोषाल, और गीत है "नूर-ए-ख़ुदा"। यह एक नर्मोनाजुक गीत है, जिसमें अदनान और शंकर की आवाज़ें ही ज़्यादा सुनाई देती है। श्रेया की एन्ट्री अंत के तरफ़ होती है, लेकिन उतनी ही मिठास के साथ।

सुजॊय - गीत के ऒर्केस्ट्रेशन में गीटार का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है। चलिए शोर्ताओं को भी इस गीत को सुनने का मौका देते हैं।

गीत - नूर-ए-ख़ुदा...NOOR-E-KHUDA (MNIK)


सजीव - आप सभी को मालूम ही होगा कि 'माइ नेम इज़ ख़ान' करण जोहर की फ़िल्म है, जिसमें शाहरुख़ ख़ान के अलावा काजोल, शीतल मेनन, जिम्मी शेरगिल, ज़रीना वहाब हैं, और ढेर सारे अमरीकी कलाकार भी आपको इस फ़िल्म में नज़र आएँगे। करण ने ही फ़िल्म का निर्देशन भी किया है। कहानी लिखी है शिवानी बथिजा ने। संवाद शिवानी के साथ साथ नीरंजन अय्यंगर ने लिखे हैं।

सुजॊय - अच्छा, नीरंजन अय्यंगर ने इस फ़िल्म के गानें भी लिखे हैं ना?

सजीव - हाँ, वैसे तो नीरंजन एक संवाद लेखक ही हैं, जिन्होने 'जिस्म', 'कल हो ना हो', 'पाप', 'रोग', 'कभी अल्विदा ना कहना', 'आइ सी यू', 'क्या लव स्टोरी है', 'फ़ैशन', 'वेक अप सिड' और 'कुरबान' जैसी फ़िल्मों में संवाद लिख चुके हैं।

सुजॊय - और कुछ फ़िल्मों में गानें भी लिखे हैं। अभी हाल ही में फ़िल्म 'क़ुर्बान' का हिट गीत "शुक्रान अल्लाह" भी तो उन्ही का लिखा हुया है।

सजीव - हाँ, और 'माइ नेम...' में तो सभी गानें उन्ही के लिखे हुए हैं। लगता है इस फ़िल्म से वो फ़िल्मी गीतकारों की मुख्य धारा में शामिल हो जाएँगे। जिस तरह से जावेद अख़्तर एक संवाद लेखक से गीतकार बन गए थे, हो सकता है कि नीरंजन भी वही रास्ता इख़्तियार करे।

सुजॊय - और उस राह पर नीरंजन ने मज़बूत क़दम रख ही दिया है 'माइ नेम...' के गीतों के ज़रिए।

सजीव - बिल्कुल! तो अब कौन सा गीत सुनवाओगे?

सुजॊय - तीसरा गाना है शफ़ाक़त अमानत अली का गाया हुआ, "तेरे नैना"। शंकर अहसान लॊय ने जिनसे 'कभी अल्विदा ना कहना' में सुपरहिट गीत "मितवा" गवाया था। इस गीत में भी वही सुफ़ीयाना अंदाज़ इस तिक़ई ने बरक़रार रखा है, लेकिन "मितवा" जैसा असर शायद नहीं कर सका है यह गीत। लेकिन अपने आप में गीत बहुत अच्छा है।

सजीव - गीत का मुख्य आकर्षण यह है कि गीत के बीचों बीच इस गीत में क़व्वाली का रंग आ जाता है। नीरंजन अय्यंगर के बोल स्तरीय हैं।

गीत - तेरे नैना...TERE NAINA (MNIK)


सुजॊय - 'माइ नेम इज़ ख़ान' में कुल ६ ऒरिजिनल गीत हैं, जिनमें से ५ गानें हम यहाँ पर आपको सुनवा रहे हैं। तीन गानें आप सुन चुके हैं, इससे पहले कि हम चौथा गाना बजाएँ, सजीव, क्या आप इस फ़िल्म की थोड़ी सी भूमिका अपने पाठकों को बताना चाहेंगे?

सजीव - ज़रूर! वैसे यह फ़िल्म इतनी चर्चा में है कि लगभग सभी को फ़िल्म के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी तो ज़रूर होगी, फिर भी हम बता रहे हैं। रिज़्वान ख़ान (शाहरुख़ ख़ान) मुंबई के बोरीवली का रहनेवाला एक मुस्लिम लड़का जो पीड़ित है Asperger syndrome नामक बिमारी से, जिसके चलते लोगों के साथ बातचीत करने में, यानी कि सोशियलाइज़ करने में उसे दिक्कत आती है। युवा रिज़्वान अमेरीका के सैन फ़्रान्सिस्को में एक हिंदु तलाक़शुदा महीला मंदिरा (काजोल) शादी करता है। ९/११ के आतंकी हमलों के बाद रिज़्वान को अमरीकी पुलिस अपने गिरफ़्त में ले लेती है और उसके विकलांगता को वो संदेह की नज़र से देखते हैं। रिज़्वान के गिरफ़्तारी के बाद उसकी मुलाक़ात राधा (शीतल मेनन) से होती है जो एक थेरपिस्ट हैं, जो उसकी मदद करती है। उसके बाद रिज़्वान अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा से मिलने की यात्रा शुरु करता है उसके नाम पर लगे धब्बे को मिटाने के लिए। फ़िल्म में ओबामा का किरदार निभाया है क्रिस्टोफ़र बी. डंकन ने।

सुजॊय - सजीव, अभी कुछ महीने पहले शाहरुख़ ख़ान को अमरीका के एयरपोर्ट में कई घंटों तक सिर्फ़ इसलिए रोका गया था क्योंकि उनकी पदवी ख़ान है, और एक ऐसी हवा पश्चिम में चल रही है कि जिसके चलते हर मुसलमान को शक़ की निगाह से देखा जा रहा है। तो हो ना हो इस फ़िल्म की प्रेरणा शाहरुख़ और करण को उसी हादसे से मिली होगी!

सजीव - हो सकता है! अच्छा बातें तो बहुत हो गई, अब एक और गीत की बारी। अगला गीत भी सूफ़ी अंदाज़ का, लेकिन अब की बार एक धार्मिक रचना, एक प्रार्थना, "अल्लाह ही रहम"। राशिद अली और साथियों की आवाज़ों में इस गीत को सुनते हुए आप आध्यात्मिक जगत में पहुँच जाएँगे। इस गीत के बारे में ज़्यादा कहने की आवश्यक्ता नहीं है, बस सुनिए और महसूस कीजिए एक पाक़ शक्ति को!

गीत - अल्लाह ही रहम...ALLAH HI RAHAM (MNIK)


सुजॊय - सजीव, शंकर अहसान लॊय ने इस फ़िल्म में कम से कम एक गीत तो रॊक शैली में ज़रूर बनाया है। इन सूफ़ी गीतों के बाद अब एक रॊक अंदाज़ का गाना जिसे शंकर महादेवन और सूरज जगन ने गाया है। "रंग दे" एक ऐसा गीत है जिसमें संदेश है अमन का, ख़ुशी का, जोश का।

सजीव - हाँ, एक रिफ़्रेशिंग् गीत जिसे हम कह सकते हैं। सुनते हैं यह गीत, लेकिन सुजॊय एक बात बताओ, तुमने अभी थोड़ी देर पहले कहा था कि इस फ़िल्म में ६ गानें हैं, छ्ठा गीत कौन सा है?

सुजॊय - नहीं, दरअसल छठा गीत एक इन्स्ट्रुमेन्टल पीस है जिसे 'स्ट्रिंग्स' बैण्ड ने बजाया है, और जिसका शीर्षक रखा गया है 'ख़ान थीम'।

सजीव - अच्छा, तो चलो अब अमन और शांति का संदेश हम भी फैलाएँ और सुनें आज के 'ताज़ा सुर ताल' का अंतिम गीत। श्रोताओ और पाठकों से हमारा सविनय निवेदन है कि इस फ़िल्म के गीत संगीत की समीक्षा यहाँ टिप्पणी पर ज़रूर करें। कौन सा गीत आपको सब से ज़्यादा अच्छा लगा, किस चीज़ की कमी लगी, आप के नज़र में इस फ़िल्म के संगीत की क्या जगह है आप के दिल में। ज़रूर बताएँ।

गीत - रंग दे...RANG DE (MNIK)


"माई नेम इस खान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
शंकर एहसान लॉय तिकड़ी से हमेशा ही अच्छे संगीत की उम्मीद की जाती है, और अमूमन ये निराश भी नहीं करते, और ये भी मानना पड़ेगा कि करण जौहर के पास संगीत की ऐसी श्रोतामई समझ है जो एक सफल फिल्मकार में होनी चाहिए. सजदा और तेरे नैना फिल्म के बहतरीन गीत हैं...नूरे खुदा फिल्म रीलिस होने के बाद बेहद मशहूर होने वाला है, और रंग दे जो फिल्म के थीम को सही तरह से सामने लाता है वो भी खूब गुनगुनाया जायेगा ऐसी उम्मीद है...कुल मिलाकर एल्बम एक अच्छी खरीदारी साबित होगी संगीत प्रेमियों के लिए...हाँ संगीत में "क्लासी" टच ज्यादा है, जिस कारण आम लोगों में ये गीत उतने कामियाब शायद नहीं होंगें पर ये कहना गलत नहीं होगा कि इस संगीतकार तिकड़ी इस साल एक बेहतर शुरूआत की है इस अल्बम से

अब पेश है आज के तीन सवाल-

TST ट्रिविया # १३ एक बेहद मशहूर गीत के अंतरे के बोल हैं "पल्कों पे झिलमिल तारे हैं, आना भरी बरसातों में"। इस गीत की 'माइ नेम इज़ ख़ान' के किसी गीत के साथ समानता बताइए।

TST ट्रिविया # १४ बतौर संगीतकार शंकर अहसान लॊय की पहली फ़िल्म जो थी वो फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई थी, लेकिन उसका संगीत ज़रूर रिलीज़ हुआ था। बताइए उस फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # १५ करण जोहर की किस फ़िल्म में अभिषेक बच्चन एक नर्स की भूमिका में नज़र आए थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछली पहेली में पहला सवाल अनुत्तरित रह गया था, रामू ने नाना पाटेकर से इंस्पेक्टर कुरैशी का किरदार करवाया था फिल्म भूत में, बहरहाल अन्य दो जवाब तो सीमा जी सही दिए हैं बधाई

Monday, January 25, 2010

रण में उलझे रामू संगीत के साथ समझौता कर गए....

ताज़ा सुर ताल 04/ 2010

ताज़ा सुर ताल के मंच पर मुझे देखकर आपको हैरानी ज़रूर हो रही होगी... हो भी क्यों न, जब मुझे हीं हैरानी हो रही है तो आपका हैरान होना तो लाजिमी है। बात दर-असल यह है कि सुजोय जी अभी कुछ दिनों तक कुछ ज्यादा हीं व्यस्त रहने वाले हैं.. कुछ व्यक्तिगत कारण हैं शायद... तो इसलिए सजीव जी ने यह काम मुझे सौंपा है.... अरे डरिये मत, मैं इस मंच पर बस इस हफ़्ते हीं नज़र आऊँगा, अगले हफ़्ते से सुजोय जी वापस कमान संभाल लेंगे। तो आज के इस अंक में मुझे झेलने के लिए कमर कस लीजिए...वैसे परसो तो मैं आने हीं वाला हूँ महफ़िल-ए-गज़ल की नई कड़ी के साथ, तब आप भाग नहीं पाईयेगा।

अब चूँकि सुजोय जी नहीं, इसलिए उनका वह अंदाज़ भी नहीं। आज की संगीत-समीक्षा एक सीधी-सादी समीक्षा होगी, बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी वाद-विवाद के... और न हीं अपने विचार रखने के लिए सजीव जी दूरभाष (टेलीफोन...शुद्ध हिन्दी में इसलिए लिखा क्योंकि पिछली कड़ी में एक मित्र ने आंग्ल भाषा से बचने की सलाह दी थी) के सहारे हाज़िर होंगे। तो खोलते हैं पिटारी और देखते हैं कि भानूमति की इस पिटारी में आज किस चलचित्र के गानों की किस्मत बंद है..

आज से लगभग पंद्रह साल पहले एक फिल्म आई थी "रंगीला".. निर्देशक थे श्री रामगोपाल वर्मा। उस फिल्म में संगीत था ए०आर०रहमान का। संगीत के मामले में वह फिल्म मील का एक पत्थर मानी जाती है। आज भी जब कहीं से "हाय रामा ये क्या हुआ" की स्वर-लहरियाँ बहती हुई आती हैं तो दिल मचलने को बेताब हो उठता है.... ऐसा जादू था उस फिल्म के गानों का। ऐसा नहीं था कि उस फिल्म में बस गाने हीं थे, बल्कि कहानी भी अव्वल दर्जे की थी। देखकर और सुनकर लगता था कि रामगोपाल वर्मा ने फिल्म के हर हिस्से पर बराबर काम किया है। फिल्म सफल हुई हीं हुई, गाने भी मक़बूल हुए। फिर लगा कि रामू आगे भी ऐसा कुछ कर दिखाएँगे... लेकिन न जाने रामू को क्या हो गया, कहानी पर काम करना तो उन्हें याद रहा लेकिन संगीत को वो धीरे-धीरे दर-किनार करते चले गए। इन पंद्रह सालों में मुझे बस "सत्या" हीं एक ऐसी फिल्म नज़र आ रही है, जिनके गानों में भी बराबर का दम था। "विशाल" के संगीत और "गुलज़ार" साहब के गीतों ने बहुत दिनों के बाद रामू के फिल्म के गानों से निम्न दर्जे का लेबल हटाया था। बाकी फिल्मों की अगर गिनती करें तो बस "दौड़", "मस्त" और "कंपनी" के गाने हीं सुनने लायक थे... और वे भी कुछ हीं। आजकल तो लगता है कि रामू ने कसम ले रखी है कि संगीत पर कम खर्च किया जाए और इसी कारण उन्होंने संगीत को पार्श्व-संगीत में तब्दील कर दिया है।

इन दिनों रामू एक अलग तरह का प्रयोग कर रहे हैं और वह प्रयोग है एक फिल्म में पाँच-पाँच, छह-छह संगीतकारों को मौका देने का। शायद इसके पीछे उनकी यह मंशा रहती होगी कि हर संगीतकार से उसका बढिया काम लिया जाए ताकि पूरी एलबम लोगों को पसंद आए। पर दिक्कत यह है कि ऐसा हो नहीं पाता। कोशिश तो यह होती है कि अलग-अलग मसाले मिलाकर एक बढिया रेशिपी तैयार की जाए लेकिन मसालों की सही मात्रा न मिलने से रेशिपी एक खिचड़ी मात्र बनके रह जाती है। अब आज की हीं फिल्म को ले लीजिए... फिल्म का नाम है "रण"। "अमिताभ बच्चान" अभिनीत इस फिल्म में नौ संगीतकारों ने संगीत दिया है.. वैसे इन नौ में से दो संगीतकार-जोड़ी हैं तो गिनती में बस सात हीं आएँगे। तो ये सारे संगीतकार हैं: धर्मेश भट्ट, संदीप पाटिल, जयेश गाँधी, बापी-टुटुल, संजीव कोहली, इमरान-विक्रम और अमर मोहिले। फिल्म में गीत लिखे हैं वायु, सरिम मोमिन, संदीप सिंह और प्रशांत पांडे ने। इस फिल्म के ज्यादातर गाने एंथम की तरह हैं यानि कि "गान" की तरह। तो चलिए एक-एक करके हम सारे गानों का मुआयना करते हैं।

"सिक्कों की भूख"/"वंदे मातरम" इस फिल्म का टाईटल ट्रेक है। गाने की शुरूआत विभिन्न चैनलों के मुख्य समाचारों(हेड लाईन्स) से होती है.. फिर यह गाना "रण है" में तब्दील हो जाता है। गाने में शुद्ध हिन्दी के शब्दों का बढिया इस्तेमाल हुआ है और यही इस गाने की यू०एस०पी० भी है। गीतकार के रूप में वायु सफल हुए हैं। इस गाने को संगीत से सजाया है धर्मराज भट्ट और संदीप पाटिल ने और आवाज़ें हैं वर्दन सिंह, अदिति पौल और शादाब फरीदी की। गाने का "वंदे मातरम" नाम बस इसलिए दिया जाना कि इसके इंटरल्युड में "वंदे मातरम" का आलाप लिया गया है, ज्यादा जमता नहीं। वैसे क्या आपको याद है कि रण का पहला प्रोमो "जन गण मन रण है" गाने के साथ रीलिज हुआ था। यह अलग बात है कि वह गाना विवाद में आने के कारण फिल्म से हटा लिया गया लेकिन मेरे अनुसार आज की स्थिति पर वही गाना ज्यादा सही बैठता है। आप अगर सुनना चाहें तो यहाँ जाएँ। आखिर हमें भी तो यह जानने का हक़ है कि आज के हालात में हमारा राष्ट्रगान सही मायने में क्या बनकर रह गया है। लेकिन नहीं...सरकार हमें यह भी अधिकार नहीं देना चाहती और इसीलिए हार मानकर रामू को "जन गण मन" की बजाय "वंदे मातरम" का रूपांतरण करना पड़ा। रामू तो अब यही कहेंगे कि "अधिकार हरेक हम खो बैठे, अब रूपांतरण भी रण है.."।



इस फिल्म का अगला गाना है "रिमोट को बाहर फेंक"। "जाईयेगा नहीं मेरा मतलब दूसरे चैनल पर" .. इस पंक्ति की इतनी बार पुनरावृत्ति होती है कि आप परेशान होकर अगले गाने की ओर बढ जाते हैं। यह गाना पूरी तरह से हेडलाईन्स से बनाया गया है... अगर आपको हेडलाईन्स में रूचि है तो आप सुन सकते हैं..मुझे नहीं.. इसलिए मैं आगे बढता हूँ। सुखविंदर की आवाज़ में बापी-टुटुल के संगीत से सजा और सरिम मोमिन का लिखा अगला गाना है "काँच के जैसे"। इस गाने में सुखविंदर की आवाज़ के रेंज का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। बोल अच्छे हैं लेकिन संगीत उतना जोरदार नहीं.. फिर भी यह गाना सुना जाने लायक तो जरूर है। वैसे उम्मीद की जा सकती है कि दृश्यों के साथ इस गाने का असर ज्यादा होगा.. क्योंकि इस गाने में नायक का दर्द उभरकर आता है और दर्द जताने में अमिताभ बच्चन का कोई सानी नहीं।



अगले गाने में संजीव कोहली ने "रण है" को एक अलग हीं रूप दिया है। शब्द आसान हो गए हैं और उनमें उर्दू का पुट डाला गया है। फिर भी "रण है" कहने का अंदाज लगभग वही है जो "सिक्कों की भूख" में था। यह गाना भी गीतकार "सरिम मोमिन" के नाम जाता है। संगीतकार के पास करने को इसमें कुछ खास नहीं है।



"गली-गली में शोर है" गाना मेरा पसंदीदा है, लेकिन यह गाना हर जगह सुना नहीं जा सकता। कारण? कारण है इस गाने में गालियों का इस्तेमाल। गालियों को इस तरह से "बीप" किया गया है कि आप आसानी से सही शब्द भांप लेंगे... शायद छुपाने की यह एक कला है... कहते हैं ना साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। सुनने वाला बड़े हीं आराम से गालियों को पकड़ सकता है। बस डर इस बात का है कि फिल्म रीलिज होने पर यह गाना रामू के लिए गले का घेघ न बन जाए, क्योंकि इस तरह का प्रयोग आज से पहले किसी ने नहीं किया.. किसी मेनस्ट्रीम फिल्म में खुलेआम गालियाँ सुनाना। वैसे अगर कोई मुझसे पूछे तो मुझे यह गाना बस इन गालियों के कारण हीं पसंद है। हो सकता है कि इस बात पर आप मुझसे खफ़ा हो जाएँ या फिर आप मुझे एक बुरा इंसान मानने लगें लेकिन सच तो सच है। इस गाने को लिखा है "संदीप सिंह" ने, संगीत से सजाया है "इमरान-विक्रम" ने और आवाज़ें हैं "जोजो" और "अर्ल डिसूजा" की। खैर गलियों वाला ये गाना तो हम नहीं सुना रहे, सुनिए "जाईयेगा नहीं..."



इस फिल्म के अगले दो गाने हैं "बेशर्म" और "मेरा भारत महान"। "बेशर्म" को सुनकर "कदम-कदम बढाए जा" की याद आती है। गाने के माध्यम से जनता को जगाने की कोशिश की जा रही है.. इन बासठ सालों में जनता के सीने पर जो घाव चस्पां हुए हैं, यह गाना उन घावों को कुरेदने का काम करता है ताकि लोगों को दर्द का एहसास हो... वे अब नहीं जगेंगे तो कब जगेंगे, तब जब घाव नासूर बन जाएगा। "बेशर्म ओ बेहया तू ज़िंदा लाश बन गया"- प्रशांत पांडे के शब्द कारगर हैं, बस धार थोड़ी और तेज होती तो क्या बात थी। संगीतकार ने ज्यादा मेहनत नहीं की है और इसीलिए गायक के पास करने को कुछ खास नहीं है। "मेरा भारत महान" एक व्यंग्य के लहजे में लिखा गया है। एक पूरानी कहावत है या शायद नाना पाटेकर का संवाद है कि "सौ में अस्सी/पंचानवे बेईमान, फिर भी मेरा देश महान", यह गाने बस इसी पंक्ति के इर्द-गिर्द बुना गया है। "कुणाल गांजावाला" बहुत दिनों के बाद सुनाई दिये हैं... सरिम मोमिन के शब्दों को अमर मोहिले ने संगीतबद्ध किया है। गाना एक बार सुना जा सकता है... पसंद आ जाए तो बार-बार सुनिए, लेकिन इसकी कम हीं संभावना है।



संगीतकारों ने मेहनत तो काफी की है, लेकिन उनकी तुलना में बाजी मारी है गीतकारों ने। एलबम सुनने के बाद आपको बस बोल हीं याद रहेंगे। वैसे बोल भी याद रह जाएँ तो गनीमत है क्योंकि एक या दो गानों को छोड़कर बाकी के बोलों में भी कुछ खास दम नहीं है।

समीक्षा - विश्व दीपक तनहा

रण के संगीत को आवाज़ रेटिंग **१/२
जैसा कि वी डी ने बताया कि रण के संगीत में कुछ खास ऐसा नहीं है जो सुनने वालों को भाये, चूँकि फिल्म एक तीव्र गति की हार्ड कोर फिल्म होनी चाहिए संगीत को पार्श्व की तरह ही इस्तेमाल किया जायेगा, फिल्म की थीम के साथ ये गीत न्याय करते होंगें, जिन्हें परदे पर सही देखा सुना जा सकता है, पर एक ऑडियो के रूप में इसे सुनना बहुत अच्छा अनुभव नहीं हो सकता...शब्दों में मामले में गीतकारों ने मेहनत की है, पर हर गीत में शब्द और उपदेश कुछ जरुरत से अधिक हो गए हैं...बहरहाल एल्बम को ढाई तारों से अधिक रेटिंग नहीं दी जा सकती

अब पेश है आज के तीन सवाल-

TST ट्रिविया # १०-एक फिल्म जिसमें मात्र ३ किरदार थे, रामू ने सुशांत सिंह को "इंस्पेक्टर कुरैशी" का किरदार पहनाया था, इसी नाम का एक और किरदार उसके बाद की एक फिल्म में रामू ने फिर रचा, कौन सी थी वो फिल्म और किसने निभाया था उस किरदार को.

TST ट्रिविया # ११-इन्टरनेट मूवी डाटाबेस में शीर्ष ५० क्राईम/एक्शन फिल्म सूची में रामू कि वो कौन सी फिल्म है जो भारतीय फिल्मों में सबसे अधिक रेंक लेकर विराजमान है.

TST ट्रिविया # १२-हॉलीवुड की फिल्म "प्रीडेटर" से प्रेरित रामू की वो कौन सी फिल्म है, जिसके प्रचार प्रसार ने फिल्म से अधिक ख्याति पायी


TST ट्रिविया में अब तक -
अभी भी हैं सीमा जी सबसे आगे....मुबारक हो..मोहतरमा...

Monday, January 11, 2010

जब साजिद वाजिद जोड़ी को मिला गुलज़ार साहब का साथ, तो रचा गया एपिक "वीर" का संगीत

ताज़ा सुर ताल ०२/ २०१०

सजीव - 'ताज़ा सुर ताल' की इस साल की दूसरी कड़ी में सभी का हम स्वागत करते हैं। पिछली बार 'दुल्हा मिल गया' की गीतों की चर्चा हुई थी और गानें भी हमने सुनें थे, आज बारी है एक महत्वपूर्ण फ़िल्म की, जिसकी चर्चा शुरु हुए साल बीत चुका है।

सुजॊय - चर्चा शुरु हुए साल बीत चुका है और अभी तक फ़िल्म बाहर नहीं आई, ऐसी तो मुझे बस एक ही फ़िल्म की याद आ रही है, सलमान ख़ान का 'वीर'।

सजीव - बिल्कुल सही पहचाना तुमने! आख़िर अब इस फ़िल्म के गानें रिलीज़ हो चुके हैं, और फ़िल्म के प्रोमोज़ भी आने शुरु हो गए हैं। आज फ़िल्म 'वीर' की बातें और 'वीर' का संगीत 'ताज़ा सुर ताल' पर।

सुजॊय - तो सजीव, जब 'वीर' की बात छिड़ ही गई है तो बात आगे बढ़ाने से पहले इस फ़िल्म का मशहूर गीत "सलाम आया" सुन लेते हैं और श्रोताओं को भी सुनवा देते हैं, उसके बाद इस गीत के बारे में चर्चा करेंगे और 'वीर' की बातों को आगे बढ़ाएँगे।

सजीव - ज़रूर! बस इतना बता दें कि इस फ़िल्म के संगीतकार हैं साजिद-वाजिद और गीतकार हमारे गुलज़ार साहब।

गीत - सलाम आया...Salaam aaya (veer)


सुजॊय - रूप कुमार राठोड़, श्रेया घोषाल और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में यह सुरीला गीत हमने सुना। बहुत दिनों के बाद ऐसा ख़ूबसूरत गीत आया है, क्यों?

सजीव - बिल्कुल! पीरियड फ़िल्मों की अगर बात करें तो 'जोधा अक़बर' के बाद यही पहला पीरियड फ़िल्म रिलीज़ होने जा रहा है। फ़िल्म 'वीर' के इस गीत को सुनते हुए फ़िल्म 'जोधा अक़बर' का "कहने को जश्न-ए-बहारा है" की याद आ जाती है जैसे!

सुजॊय - हाँ, अंदाज़ कुछ कुछ उसी तरह का है। एक चीज़ आपने ग़ौर की है आजकल, कि शुद्ध युगल गीत होते ही नहीं हैं इन दिनों। दो मुख्य गायक गायिका के साथ एक तीसरी आवाज़ को भी शामिल कर लिया जाता है कुछ चुनिंदा बोलों और आलापों को गाने के लिए। यह एक ट्रेंड सी जैसे चल पड़ी है।

सजीव - अगर ऐसा ही चलता रहा तो प्योर डुएट्स तो ख़त्म ही हो जाएँगे! ख़ैर, जब तक गाना अच्छा है, तब तक चाहे दो लोग गाएँ या तीन, बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। और बताओ इस गीत के बारे में और क्या ऒब्ज़र्वेशन है तुम्हारी?

सुजॊय - इसका जो संगीत संयोजन हुआ है, जिसे हम अरेन्जमेंट कहते हैं, वह भारतीय साज़ों के आधार पर किया गया है। अब ये ध्वनियाँ हो सकता है कि सीन्थेसाइज़र से निकले होंगे, लेकिन सितार और बाँसुरी की मीठी तानें बहुत दिनों के बाद किसी फ़िल्मी गीत में सुनने को मिला है।

सजीव - साथ ही कोरस का और स्ट्रिंग् इन्स्ट्रुमेंट्स जैसे कि वायलिन्स का भी सुंदर प्रयोग मिलता है। और अरे भई गीतकार का ज़िक्र तो हमने किया ही नहीं। गुलज़ार साहब के बोलों ने भी तो उतना ही कमाल किया है!

सुजॊय - कोई शक़ नहीं इसमें। और इससे एक और बात साबित हो जाती है कि अगर बोल अच्छे हों तो आज के दौर के संगीतकार भी मधुर संगीत दे सकते हैं। साजिद वाजिद अब तक चलताऊ किस्म के गानें ही बनाते आए हैं, लेकिन देखिए सुलज़ार के बोल पाकर कितना अच्छा गाना बना कर दिखाया है! अच्छा, अब दूसरा गाना कौन सा सुनवा रहे हैं?

सजीव - दूसरा गाना है सोनू निगम का गाया हुआ, मुखड़े के बोल हैं "मेहरबानियाँ"।

गीत - मेहरबानियाँ..meharbaaniyan (veer)


सजीव - यह गाना कैसा लगा?

सुजॊय - हाँ, एक अलग ही अंदाज़ का गाना है, लेकिन अगर इस पीरियड फ़िल्म के पार्श्व की बात करें तो मुझे ऐसा लगा कि गा्ने का रीदम और अंदाज़ थोड़ा ज़्यादा मॊडर्ण सा बन गया है। अगर किसी को यह न बताया जाए कि यह एक पीरियड फ़िल्म का गीत है, तो इसे सुन कर लगेगा कि कॊलेज के लड़कों पर फ़िल्माया गया है जो फ़िल्म की नायिका के साथ मस्ती कर रहे हैं।

सजीव - और एक बात नोटिस की है तुमने? गीत का जो शुरुआती संगीत है और शुरुआती रीदम है वह फ़िल्म 'दिल चाहता है' के सोनू निगम के ही गाए "तन्हाई" गीत के रीदम से बहुत मिलता जुलता है।

सुजॊय - वाक़ई! अब अगला गाना सुनने से पहले ज़रा इस फ़िल्म की बातें हो जाएँ?

सजीव - ज़रूर! 'वीर' फ़िल्म के निर्माता हैं विजय गलानी। निर्देशक हैं अनिल शर्मा। कहानी और स्क्रीनप्ले शैलेश वर्मा और सलमान ख़ान ने मिलकर लिखा है। सल्लु मियाँ के अलावा फ़िल्म में नायिका की भूमिका में है लिज़ा लज़रुस। साथ में हैं मिथुन चक्रबर्ती, जैकी श्रोफ़ और शाहरुख़ ख़ान भी हैं इस फ़िल्म में। किसी भी पीरियड फ़िल्म में सिनेमाटोग्राफ़ी का महत्वपूर्ण पक्ष होता है, तो इस फ़िल्म में यह विभाग सम्भाला है गोपाल शाह ने।

सुजॊय - चलिए, फ़िल्म के कास्ट और क्रू से तो आपने हमारा परिचय करा दिया, अब एक गीत सुनने की बारी है। बताइए अब कौन सा गाना सुना जाए?

सजीव - अब हम सुनेंगे मिली जुली आवाज़ों में "ताली मार दो हत्थी वीरा", जिसे गाया है सुखविंदर सिंह, राहत फ़तेह अली ख़ान, वाजिद और नोमान पिंटो ने।

गीत - ताली मार...taali maar (veer)


सुजॊय - इस गीत में भी नयापन है। साजिद-वाजिद का ख़ास ट्रेडमार्क इस गीत में सुनने को मिलता है। इस गीत के मुखड़े को अगर आप ने ग़ौर से सुना है तो आपको २००९ की उनकी फ़िल्म 'वांटेड' के गीत "लव मी बेबी लव मी" की याद आ जाएगी।

सजीव - सच कहा तुमने। इस गीत का संगीत संयोजन अच्छा हुआ है। तालियाँ बजाकर गीत का पूरा रिदम खड़ा किया गया है। पिछले गीत में हमें जिस पीरियड अंदाज़ की कमी लग रही थी, वह इस गीत में कुछ हद तक पूरा हुआ है।

सुजॊय - अच्छा सजीव, हम बार बार 'पीरियड पीरियड' कह रहे हैं, क्या आपको कुछ अंदाज़ा है कि किस पीरियड की यह फ़िल्म है। कहानी का मूल क्या है?

सजीव - जहाँ तक मैंने सुना है या पढ़ा है कहीं पे, यह उस समय की कहानी है जब अंग्रेज़ इस देश में अपना शासन चलाया करते थे। उनके 'डिवाइड ऐंड रूल' पॊलिसी की वजह से कई राजा महाराजा और नवाब झांसे में आ गए और अपना बहुमूल्य राजपाठ उन फ़िरंगियों के हाथों सौंप दिया। लेकिन एक जाती ऐसी भी थी जिन्होने मौत को ग़ुलामी से बेहतर माना। और यह जाती थी पिंडरी। पिंडरियों के रगों में वो ख़ून था जो अपने अंतिम साँसों तक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध करते थे। और पिंडरियों में सब से साहसी, सब से ज़्यादा शक्तिशाली पिंडरी का नाम था 'वीर'। वीर ने अंग्रेज़ों की ग़ुलामी स्वीकार नहीं की, जिसकी वजह से अंग्रेज़ों के अलावा माधवगढ़ के राजा से भी दुश्मनी मोल ली। दूसरी तरफ़ वीर प्रेम करता था उसी राजा की पुत्री यशोधरा से। वीर के पिता की बेइज़्ज़ती का बदला दाव पर था, उसका प्यार दाव पर लग चुका था, उसका अपना अस्तित्व भी दाव पर था। तलवारें टकराईं,एक के बाद एक शव गिरने लगे युद्ध भूमि पर। क्या होता है फ़िल्म के अंत में? यही देखना है हमें जैसे ही यह फ़िल्म रिलीज़ होती है।

सुजॊय - यानी की हिन्दुस्तानी "ग्लादियेटर" हैं सल्ल्लू मियां यहाँ. चलिए हमें और हमारे पाठकों को एक अंदाज़ा हो गया फ़िल्म के बारे में। अब देखना है कि जनता किस तरह से फ़िल्म को ग्रहण करती है। ख़ैर, अब आज के चौथे गीत की बारी। अब मैं आपको सुनवाउँगा राहत फ़तेह अली ख़ान और सुज़ेन डी'मेलो कई आवाज़ों में एक नर्मोनाज़ुक गीत, "सुरीली अखियों वाले"। "सलाम आया" गाने की तरह यह गीत भी बेहद कोमल और प्यार भरा है, जिसे सुन कर सही मायने में अच्छा लगता है। और राहत साहब का सुफ़ीयाना अंदाज़ गीत में अच्छा रंग ले आया है। इंटर्ल्युड म्युज़िक में कोरस का अच्छा इस्तेमाल हुआ है।

सजीव - और एक बार फिर गुलज़ार साहब के बोलों ने गीत को एक अलग मुकाम तक पहुँचाया है। लेकिन यह बताना मुश्किल है कि सुज़ेन डी'मेलो ने जिन अंग्रेज़ी बोलों को गाया है उन्हे भी गुलज़ार साहब ने ही लिखे हैं या फिर कोई और!

सुजॊय - गीत सुनने से पहले इस गीत से मिलता जुलता एक गीत का ज़िक्र मैं करना चाहूँगा। गीत है फ़िल्म 'लगान' का "ओ री छोरी मान भी ले बात मोरी"। इस गीत में जहाँ उदित और अल्का गीत को गाते है, वहीं दूसरी तरफ़ एक ब्रिटिश लड़की वसुंधरा दास की आवाज़ में अंग्रेज़ी के बोल गाती हैं। और 'वीर' के इस गीत में भी ऐसा ही लगता है कि कोई अंग्रेज़ लड़की ने सुज़ेन वाले पोर्शन गाए होंगे!

गीत - सुरीली आँखों वाले...surili akhiyon waale (veer)


सजीव - और अब माहौल को थोड़ा और बदलते हुए एक ठुमरी सुनते हैं "कान्हा बैरन हुई बांसुरी, कान्हा क्यो तेरे अधर लगी"।

सुजॊय - वाह, क्या बात है!

सजीव - बिल्कुल, और वह भी रेखा भारद्वाज की गाई हुई। 'ओम्कारा' और 'दिल्ली-६' के बाद रेखा भारद्वाज एक मशहूर गायिका के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी हैं। और इस ठुमरी को भी क्या ख़ूब अंजाम दिया है उन्होने! बेग़म अख़्तर की ठुमरी वाला अंदाज़ जैसे यकयक ज़हन में आ जाता है।

सुजॊय - इस ठुमरी में तबले से रिदम तैयार किया गया है जैसा कि होना ही चहिए था। और रेखा जी के साथ में आवाज़ मिलाई है तोशी साबरी, शरीब साबरी और शबाब साबरी ने। देखना यह है कि क्या यह गीत भी "ससुराल गेंदाफूल" की तरह लोकप्रिय होती है या नहीं!

सजीव - देखो जिस तरह से तुमने "मेहेरबानियाँ" गीत में "तन्हाई" और "ताली" गीत में "लव मी बेबी" गीत की झलक पाई थी, वैसे ही इस ठुमरी में भी मैं एक और गीत के सुर ढूंढ़ पाया हूँ।

सुजॊय - कौन सा?

सजीव - रेखा भारद्वाज जब दूसरी बार "कान्हा" गाती हैं, तब उसके साथ "मितवा, कहे धड़कनें तुझसे क्या" गीत के "मितवा" वाले अंश की धुन से मेल महसूस की जा सकती है।

गीत - कान्हा बैरन हुई बांसुरी...kaanha (veer)


सुजॊय - तो कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि इस फ़िल्म का संगीत अच्छा है, क्यों सजीव?

सजीव - हाँ, कम से कम साजिद वाजिद आज तक जिस तरह का संगीत देते आए हैं, उस लिहाज़ से तो यह उनका सब से बेहतरीन ऐल्बम माना जाना चाहिए इसे। जिस तरह से हिमेश भाई का 'तेरे नाम' फिर कभी नहीं बना पाया, वैसे ही हो सकता है कि 'वीर' के साथ भी साजिद वाजिद का नाम वैसे ही जुड़ जाए। यह तो वक़्त ही बताएगा।

वीर के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
रेखा भारद्वाज के गाये गीत के अलावा अन्य गीतों की बहुत अधिक शेल्फ वेल्यू नहीं नज़र आती, कुछ बार सुनने के बाद आप कुछ बोरियत महसूस करेंगें, पर जहाँ तक गीतों के स्तर का सवाल है, निराशा नहीं हाथ लगती. "सलाम आया","सुरीली अखियों वाले" (सुंदर बोल), और कान्हा जैसे गीतों के चलते ये अल्बम २०१० की हिट परेड में विशेष महत्त्व रखेगी. आवाज़ ने दिए ४ तारे.


अब पेश है आज के तीन सवाल.

TST ट्रिविया # ०४-"सलाम आया" और "रफ़्ता रफ़्ता देखो आँख मेरी लड़ी है" गीत में आप क्या समानता खोज सकते हैं?

TST ट्रिविया # ०५-साजिद-वाजिद की पहली ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम और पहली फ़िल्मी ऐल्बम का नाम बताइए।

TST ट्रिविया # ०६- संगीतकार साजिद-वाजिद ने गीतकार आनंद बक्शी साहब के साथ एक फ़िल्म में काम किया था। कौन सी थी वह फ़िल्म?


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी दो सही जवाबों के साथ ४ अंक अर्जित कर लिए.याद रहे आप लोग रेटिंग देकर भी १ अंक कम सकते हैं, इन नए गीतों पर आपकी राय हम जानना चाहते हैं.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, January 26, 2009

२७ गीतों ने पार किया समीक्षा के पहले चरण का विशाल समुन्दर

दोस्तों, दूसरे सत्र में प्रकाशित हमारे २७ गीतों ने आज अपनी समीक्षा के पहले चरण का पड़ाव पार कर लिया है. अर्थात् ५ समीक्षकों में से ३ ने अपने अंक दे दिए हैं. इस पहले चरण के बाद सभी गीतों की जो अब तक की स्थिति है उसका ब्यौरा आज हम यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं. समीक्षा का दूसरा और अन्तिम चरण अभी जारी है. जिसके बाद हम उदघोषणा करेंगें हमारे टॉप १० गीतों का और उनमें से एक होगा हमारा सरताज गीत. आज हम दिसम्बर के दिग्गज गीतों की, तीनों समीक्षकों की समीक्षाएं और अन्तिम अंक तालिका यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं पर उससे पहले नवम्बर के नम्बरदार गीतों की जो तीसरी समीक्षा छूट गई थी, पहले उस पर एक नज़र डाल लें.

तीसरे समीक्षक ने नवम्बर के नम्बरदार गीतों के बारे में कुछ यूँ राय रखी है -

गीत # १९. उड़ता परिंदा
गीत अच्‍छा लिखा गया है । संगीत बढिया है । पर गायकी कमज़ोर लगी । एक और बात । उच्‍चारण दोष सुधारना गायकों के लिए बहुत ज़रूरी है । दीवार को दिवार और ख़त को खत कहा है । जिससे रस-भंग हो जाता है ।
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १५/२०=७.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २१/३०.

गीत # २० - गीत-वो बुतख़ाना ये मयख़ाना

गीत, गायकी और संगीत सभी बढिया । कहीं कहीं गायकी कमज़ोर लगी ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-५, कुल - १९ /२०=९.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २१, माहिया -
गीत बहुत अधिक प्रभावित नही करता.
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-३, कुल - १३/२०=६.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - १८.५ /३०.

गीत # २२, - तू रूबरू
गीत के बोल बहुत बढिया हैं । धुन मिक्सिंग अच्‍छी लगी । कहीं कहीं उच्‍चारण की दिक्क़त यहां भी दिखी । पर कुल मिलाकर एक प्रभावी गीत । गायक में बहुत संभावनाएं हैं । बेहद युवा और आकर्षक स्‍वर ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १७/२०=८.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २४/३०.

चलिए अब बढ़ते हैं दिसम्बर के दिग्गज गीतों की तरफ़, टिपण्णी किसी एक समीक्षक की दे रहे हैं पर अंक तीनों के अलग अलग दिए जा रहे हैं-

गीत # २३, वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता

वन वर्ल्‍ड बहुत अच्‍छा लिखा और कंपोज़ किया गया है । बस एक ही कसर रह गयी है । कहीं कहीं क्‍लेरिटी/स्‍पष्‍टता का अभाव है । यही वजह है कि अगर इबारत ना देखें तो कई जगहों पर आते । काश कि इस गाने में स्‍पष्‍टता का ख्‍याल रखा गया होता तो ये एक बेहतर जनगीत का दरजा हासिल कर सकता था ।
पहले समीक्षक - १९/२०
दूसरे समीक्षक - १४.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १९/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २४, चाँद का आँगन

इस बार के गीत बोलों के मामले में बहुत आगे हैं। इस गीत के बोल कविता जैसे हैं। ऐसे बोलों को स्वरबद्ध करना बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन कुमार आदित्य ने जैसा संगीत दिया है, उसमें बेहतर संयोजन का आभाव होने बावज़ूद बार-बार सुनने का मन होता है। पूरे गीत में बेसिक धुन ही बजती रहती है, फिर भी संगीत को बार-बार सुनना कानों को नहीं थकाता। कुमार आदित्य की आवाज़ बहुत रूखी है, फिर भी इस गीत पर फब रही है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५/२०.
तीसरे समीक्षक - १८/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २५, जिस्म कमाने निकल गया है

इस ग़ज़ल के शे'र कमाल के हैं। नाज़िम नक़वी की जितनी तारीफ़ की जाय वह कम है। आदित्य विक्रम का संगीत बढ़िया है। राहत देता ह, लेकिन गायक वह जान नहीं डाल पाया है, वह ट्रीटमेंट नहीं दे पाया है, जिसकी आवश्यकता इस ग़ज़ल को थी। इस ग़ज़ल को सुनने में वह आनंद नहीं है, जो इसे पढ़ने में आता है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १४/२०.
कुल अंक - २४.५/३०.

गीत # २६, मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी

इस गीत का सबसे मज़बूत पक्ष इसका संगीत और उसका संयोजन है, लेकिन उस स्तर की गायकी नहीं है। हालाँकि गायिका ने इस गीत का संगीत भी दिया है, उस हिसाब के संगीत का मूड उन्हीं भली-भाँति पता था, शायद रियाज़ की कमी हो। गीतकार ने सम मात्राओं का ध्यान नहीं दिया है, तभी गायिका को 'कि ना रेत' को 'किनारेत' की तरह गाना पड़ा है।
पहले समीक्षक - १८/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - १६/२०.
कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २७, जो शजर

यह ग़ज़ल इस महीने की सबसे उम्दा प्रस्तुति है। दौर सैफ़ी के शे'रो का तो कोई जवाब ही नहीं। दिल को छू देने वाले शे'रों को जब रफीक़ शेख़ की आवाज़ मिली है तो ग़ज़ल मुकम्मल बन पड़ी है। इस पर क्या कहना, बस सुनते रहें...
पहले समीक्षक - १६/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - २०/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

तो लीजिये, अब जानिए कि पहले चरण के बाद किस किस पायदान पर हैं हमारे दूसरे सत्र के २७ नगीने गीत-

तेरा दीवाना हूँ - २७/३०.
वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता - २६.५/३०
जो शजर - २६.५/३०
चाँद का आंगन - २६.५/३०
मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी- २५.५/३०
हुस्न - २५.५/३०
खुशमिजाज़ मिटटी - २५/३०.
जीत के गीत - २४.५/३०.
सच बोलता है - २४.५/३०.
जिस्म कमाने निकल गया है - २४.५/३०
संगीत दिलों का उत्सव है - २४/३०.
आवारा दिल - २४/३०.
ओ साहिबा - २४/३०
ऐसा नही - २४/३०.
तू रूबरू - २४/३०
सूरज चाँद और सितारे - २२.५/३०.
चले जाना - २१.५/३०.
तेरे चहरे पे - २१/३०.
उड़ता परिंदा - २१/३०
डरना झुकना - २०.५/३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५/३०.
बढे चलो - २०/३०.
ओ मुनिया - १९.५/३०.
मैं नदी - १९/३०.
माहिया - १८.५/३०
राहतें सारी - १८/३०.
मेरे सरकार - १६.५/३०.


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