Saturday, April 11, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01 (रवीन्द्र जैन)


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01
 

मन की आँखें हज़ार होती हैं...!’
रवीन्द्र जैन




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। आज से हम इसी शीर्षक से एक नई शृंखला शुरू कर रहे हैं जिसमें हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किए हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है गीतकार, संगीतकार, कवि और गायक रवीन्द्र जैन को।


28 फ़रवरी 1944 के दिन पंडित इन्द्रमणि ज्ञान प्रसाद जी के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार में ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। पर जल्द ही यह पता चला कि उस बच्चे की आँखें बन्द हैं। डॉ. मोहनलाल ने जन्म के अगले दिन एक ऑपरेशन किया, उन्होंने उस बच्चे की आँखें खोली। पर जाँच करने के बाद उन्होंने ज्ञान प्रसाद जी को यह कठोर सत्य बता ही दिया कि भले आँखों की रोशनी धीरे धीरे आ सकती है, पर पढ़ना मुनासिब नहीं रहेगा क्योंकि ऐसा करने पर नुकसान होगा। परिवार में जैसे अन्धेरा छा गया। इस नवजात शिशु का नाम रखा गया रवीन्द्र। उनके पिता ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए यह निर्णय लिया था कि अपने पुत्र के जीवन का लक्ष्य संगीत ही होगा और संगीत में ही उसकी पहचान बनेगी। और यही हुआ। अपनी इस कमी को रवीन्द्र जैन ने भी कभी अपने उपर हावी नहीं होने दिया और अपनी लगन और बुद्धि के सहारे वो ना केवल एक गायक-संगीतकार बने बल्कि काव्य और साहित्य के भी विद्‍वान बने। 80 के व्यावसायिक दशक में भी उन्होंने अर्थपूर्ण गीत लिखे और कभी पैसे के पीछे भाग कर सस्ते गीत नहीं लिखे। रवीन्द्र जैन का नाम सुनते ही दिल श्रद्धा से भर जाता है, उन्हें प्रणाम करने को जी चाहता है।

रवीन्द्र जैन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें कभी भी अपने नेत्रहीनता पर अफ़सोस नहीं हुआ। उन्हीं के शब्दों में, "मैं जानता हूँ कि दुनिया में हर आदमी किसी ना किसी पहलू से विकलांग है, चाहे वो शरीर से हो, मानसिक रूप से हो या कोई अभाव जीवन में हो। विकलांगता का मतलब यह नहीं कि शारीरिक असुविधा है, कहीं ना कहीं लोग मोहताज हैं, अपाहिज हैं, और उसी पर विजय पाना है। उससे निराश होने की ज़रूरत नहीं है। disability can be your ability also, उससे आपकी क्षमता दुगुनी हो जाती है।"

और यही संदेश उन्होंने एक बार अंध-विद्यालय के छात्रों को भी दिया। उन्हें एक बार एक ब्लाइन्ड स्कूल में मुख्य अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया गया। जब उन्हें बच्चों को संबोधित करने को कहा गया, तो उन्होंने संदेश के रूप में यह कविता पढ़ी...

तन की आँखें तो दो ही होती हैं
मन की आँखें हज़ार होती हैं
तन की आँखें तो सो ही जाती हैं
मन की आँखें कभी ना सोती हैं।

चाँद सूरज के हैं जो मोहताज
भीख ना माँगो उन उजालों से,
बन्द आँखों से तुम वो काम करो
आँख खुल जाए आँख वालों की।

हैं अन्धेरे बहुत सितारे बनो
दूसरों के लिए किनारे बनो,
है ज़माने में बेसहारे बहुत
तुम सहारे ना लो, सहारे बनो।

’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ रवीन्द्र जैन जी को दिल से करती है सलाम!




खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Sunday, April 5, 2015

टप्पा गीतों का लालित्य : SWARGOSHTHI – 213 : TAPPA



स्वरगोष्ठी – 213 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 11 : टप्पा

ऊँटों के काफिले के सौदागरों से उपजी टप्पा गायकी 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हमने भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत किया है, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली पिछली तीन कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘ठुमरी’ शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपको ठुमरी के साथ-साथ विकसित हुई गीत शैली, टप्पा पर चर्चा करेंगे और उसका रसास्वादन भी करा रहे हैं। आज हम इस गोष्ठी में विख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर और उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया टप्पा प्रस्तुत कर रहे हैं। 


पंजाब की धरती पर विकसित संगीत शैली ‘टप्पा’ भी एक श्रृंगाररस प्रधान गायकी है। इस शैली में खयाल और ठुमरी, दोनों की विशेषताएँ उपस्थित रहती है। टप्पा गायन के लिए खयाल और ठुमरी, दोनों शैलियों का प्रशिक्षण और अभ्यास आवश्यक है। इसका विकास चूँकि पंजाब और सिन्ध के पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ है, अतः अधिकतर टप्पा पंजाबी भाषा में मिलता है। सिन्ध क्षेत्र में ‘टप्पे’ नामक एक लोकगीत शैली का प्रचलन रहा है। यह लोकगीत आज भी पंजाब में सुनने में आता है। रागदारी संगीत के अन्तर्गत गाया जाने वाला टप्पा, ‘टप्पे’ लोकगीत से काफी भिन्न होता है। कुछ विद्वानों के मतानुसार पंजाब के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में ऊँटों पर अपना व्यापारिक सामान ढोने वाले सौदागरों द्वारा जो लोकगीत गाया जाता था, उनमें रागों का रंग भर कर टप्पा गायन शैली का विकास हुआ। इसे विकसित करने का श्रेय शोरी मियाँ को दिया जाता है। शोरी मियाँ का वास्तविक नाम गुलाम नबी था और ये सुप्रसिद्ध खयाल गायक गुलाम रसूल के पुत्र थे। शोरी मियाँ अठारहवीं शताब्दी में लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समकालीन थे। उनका कण्ठ खयाल गायकी के अनुकूल नहीं थी, इसीलिए उन्होने अपने गले के अनुकूल टप्पा गायकी को विकसित किया। काफी समय तक पंजाब प्रान्त में रहने के कारण पंजाबी भाषा और उस क्षेत्र के लोक संगीत का उन्हें ज्ञान हो गया था। शोरी मियाँ के पंजाबी भाषा में रचे अनेक टप्पा गीत आज भी गाये जाते हैं। शोरी मियाँ के पंजाब से लखनऊ आने के बाद टप्पा गायन का प्रचार-प्रसार लखनऊ संगीत जगत में भी हुआ। आगे चल कर पूरे उत्तर भारत में टप्पा गाया जाने लगा। पंजाब और लखनऊ के अलावा बनारस और ग्वालियर के प्रमुख खयाल गायकों ने टप्पा को अपना लिया।

अब हम प्रस्तुत करते हैं, ग्वालियर परम्परा में टप्पा गायन का एक उदाहरण, देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, उनके मधुर स्वर में सुनिए, राग भैरवी और अद्धा त्रिताल में निबद्ध एक पारम्परिक टप्पा।


टप्पा राग भैरवी : ‘लाल वाला जोबन मियाँ...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




शोरी मियाँ के प्रमुख शिष्य मियाँ गम्मू और ताराचन्द्र थे। इन्होने भी टप्पा गायकी का भरपूर प्रचार किया। मियाँ गम्मू के पुत्र शादी खाँ भी टप्पा गायन में दक्ष थे और तत्कालीन काशी नरेश के दरबारी गवैये थे। लखनऊ, बनारस और ग्वालियर के ख्याल गायन पर भी टप्पा का प्रभाव पड़ा। नवाब वाजिद अली खाँ के समय में तो टप्पा अंग से खयाल गाना, गायक की एक विशेष योग्यता मानी जाती थी। टप्पा अंग से खयाल गायकी को लोकप्रियता मिलने के कारण एक नई गायन शैली का चलन हुआ, जिसे ‘ठप्प खयाल’ कहा जाने लगा। टप्पा की प्रकृति चंचल, लच्छेदार ताने, मुर्की, खटका आदि के प्रयोग के कारण खयाल और ठुमरी की गम्भीरता से दूर है। टप्पा गायन में शुरू से ही छोटी-छोटी दानेदार तानों से सजाया जाता है। स्वरों में किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती। बोल आलाप का प्रयोग नहीं किया जाता। खयाल की तरह टप्पा गायन के घराने नहीं होते, किन्तु विभिन्न स्थानों पर विकसित टप्पा गायकी की प्रस्तुतियों में थोड़ा अन्तर मिलता है। ग्वालियर में प्रचलित टप्पा गायकी में खयाल का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है। इसी प्रकार बनारस में गेय टप्पा पर ठुमरी का प्रभाव परिलक्षित होता है। टप्पा का साहित्य श्रृंगाररस प्रधान होता है और ठुमरी की तरह अधिकतर खमाज, भैरवी, काफी, झिंझोटी, तिलंग, पीलू, बरवा आदि रागों में गायी जाती है। इसी प्रकार अधिकतर टप्पा पंजाबी, अद्धा त्रिताल, सितारखानी जैसे सोलह मात्रा के तालों में निबद्ध मिलता है। अब हम आपको रामपुर सहसवान घराने के सुविख्यात गायक उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। आप इस टप्पा गायकी का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : आ जा गले लग जा...’ : उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 213वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक घरानेदार गायक की आवाज़ में खयाल गायन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक स्वर पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 11 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और पहली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 211वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायिका विदुषी रसूलन बाई के स्वरों में प्रस्तुत की गई ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्नों के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचन्दी। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

इसके अलावा ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली क्रमांक 201 से 210, अर्थात दस अंकों की पहली श्रृंखला में उपरोक्त तीनों प्रतिभागियों- जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने सभी प्रश्नों के सही उत्तर देकर 20-20 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से एक बार पुनः बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे टप्पा शैली पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू कर रहे है। इस श्रृंखला में हम उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित दस प्रकार के थाट पर चर्चा करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। पिछले दिनों हमारी एक नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘I would like more students be exposed to this kind of Quizes. It's a good exercise to review the subject and hope you can spread this message to all music lovers. I am doing it only for the fun and enjoy it too. I appreciate very much what you are doing in service to classical music and hope there will be some more ways to add to your website for this purpose’.
विजया जी के प्रति हम आभार प्रदर्शित करते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, April 4, 2015

पलट, तेरा ध्यान किधर है


एक गीत सौ कहानियाँ - 56
 

पलट, तेरा ध्यान किधर है...’




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 56वीं कड़ी में आज जानिये 1943 की फ़िल्म 'संजोग' के गीत "पलट तेरा ध्यान किधर है..." के बारे में, जिसे चार्ली ने गाया था। 


'पलट तेरा ध्यान किधर है!' इस जुमले को देख कर हमारे नौजवान पाठक शायद यह समझ रहे होंगे कि आज हम डेविड धवन की हाल की फ़िल्म 'मैं तेरा हीरो' के अरिजीत सिंह के गाये गीत "पलट, तेरा ध्यान किधर है, ये तेरा हीरो इधर है" की चर्चा करने जा रहे हैं; पर हमारे उम्रदराज पाठक ज़रूर समझ गये होंगे कि गुज़रे ज़माने के किस हास्य अभिनेता-गायक की चर्चा आज हो रही है। भारतीय सिनेमा के प्रथम सुपरस्टार अगर कुन्दनलाल सहगल थे तो प्रथम स्टार कॉमेडियन माना गया है चार्ली को। नूर मोहम्मद के नाम से उन्होंने जन्म तो लिया पर चार्ली चैपलिन के दीवाने थे और इसलिए अभिनेता बनने के बाद अपने नाम के साथ चार्ली जोड़ लिया और बन गये नूर मोहम्मद 'चार्ली'। और मज़े की बात यह है कि आगे चलकर उनका नाम केवल "चार्ली" बन कर रह गया। 30 और 40 के दशकों में चार्ली ने ख़ूब नाम कमाया और कई बार तो फ़िल्म के नायक से ज़्यादा उनकी फ़ीस हुआ करती थी। और कई फ़िल्में उन्हीं को ध्यान में रख कर बनायी गई। हास्य अभिनेता होते हुए भी वो कई फ़िल्मों के नायक बने और कई गीत भी गाये। ऐसा ही एक गीत था "पलट, तेरा ध्यान किधर है भाई...", जिसे अरशद गुजराती ने लिखा था और नौशाद साहब ने स्वरबद्ध किया था 1943 की फ़िल्म 'संजोग' के लिए, जो नौशाद की शुरुआती फ़िल्मों में से एक थी। इस गीत को सुन कर आश्चर्य होता है कि हमेशा शास्त्रीय संगीत को आधार बना कर गीत रचने वाले नौशाद साहब ने ही इस गीत की रचना की थी। वरिष्ठ ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता ने 'विविध भारती' को दिये एक साक्षात्कार में कहा था - "एक मैं आपको दिलचस्प बात बताता हूँ। नौशाद साहब के बारे में कहा जाता है कि वो क्लासिकल म्युज़िक दिया करते थे, जो बिल्कुल सही बात है। मगर नौशाद साहब ने आपके स्टेशन पर जो कार्यक्रम किया था, फ़िल्म 'शारदा' (1942) के बाद वो सीधे 'बैजु बावरा' (1952-53) पर आ गये थे, उन्होंने बीच का पोर्शन बिल्कुल गोल कर दिया था। अब मैं आप से कहना चाहूंगा कि उस बीच के पोर्शन में उन्होंने ऐसे गाने बनाये जो बहुत सस्ते थे। एक मेरे पास है, जो आप चाहें तो लेकर श्रोताओं को सुना सकते हैं। एक चार्ली होता था कॉमेडियन, तो उन्होंने चार्ली से यह गाना गवाया था, "अरे पलट तेरा ध्यान किधर है भाई...", और यह फ़िल्म शायद 'संजोग' थी।" नौशाद के शुरुआती दौर के सस्ते गीतों की बात करें तो कुछ और गीत जो याद आते हैं, वो हैं "हाँ हाँ तू मेरा चेला..." (प्रेम नगर, 1940), "सासूजी सासूजी मेरे सैयाँ बुलाये रे..." (माला, 1941), "माइ डियर आइ लव यू..." (जीवन, 1944), "बूढ़ा-बूढ़ा पुरानी-पुरानी ढीली-ढीली कमर की कमानी..." (ऐलान, 1947) आदि।

'पलट तेरा ध्यान किधर है', यह जुमला काफ़ी पुराना है और इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई थी यह बताना मुश्किल है। किसी का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रयोग होने वाला यह जुमला फ़िल्मी गीतों में भी कई बार थोड़े फेर-बदल के साथ सुनाई देता रहा है। चार्ली के गाये फ़िल्म 'संजोग' के इस गीत के अलावा 1957 की फ़िल्म 'नाग पद्मिनी' में गीतकार प्रेम धवन का लिखा और सन्मुख बाबू का स्वरबद्ध किया सुधा मल्होत्रा और एस. बलबीर का गाया गीत "पलट के ज़रा देख तेरा ध्यान किधर है..." की तरफ़ लोगों का ध्यान नहीं गया क्योंकि यह फ़िल्म कम बजट की फ़िल्म थी और चली भी नहीं। उसके बाद 1960 की हास्य फ़िल्म 'बेवकूफ़' में आशा भोसले का गाया एक हास्य गीत था "देख इधर देख तेरा ध्यान कहाँ है..."। मजरूह के लिखे और सचिन देव बर्मन के संगीत से सजे इस गीत की ख़ास बात यह है कि यह गीत आइ. एस. जोहर पर फ़िल्माया गया है जो एक विधवा औरत के रूप में सज कर यह गीत गा रहे हैं तथा मुकरी और उल्हास उनको रिझाने की कोशिशें कर रहे हैं। इस गीत में दो पुरुष स्वर सुनाई देते हैं पर ये आवाज़ें किनकी हैं इसमें थोड़ा संशय है। एक आवाज़ तो मन्ना डे की लगती है पर दूसरी आवाज़ का पता नहीं चल पाया। आशा भोसले ने इस फिल्म के कई गीत गाये हैं। 'बेवकूफ़' के बाद 1970 की फ़िल्म 'आन मिलो सजना' का वह गीत तो सभी को याद ही होगा, "पलट मेरी जान, तेरे कुर्बान, ओ तेरा ध्यान किधर है...", जिसमें आशा पारेख राजेश खन्ना को छेड़ रही हैं। इस जुमले के तमाम गीतों में शायद यही गीत सबसे ज़्यादा लोकप्रिय रहा है। साल 1979 में आशा भोसने ने फ़िल्म 'सरकारी मेहमान' में फिर एक बार गाया "ऐ सरकारी मेहमान, पलट किधर है तेरा ध्यान..."। इसे रवीन्द्र जैन ने लिखा व स्वरबद्ध किया था। इस फ़िल्म के अन्य दो गीतों ("बम्बई शाम के बाद" और "पर्चा मोहब्बत का") की तरह यह गीत उतना लोकप्रिय नहीं हुआ था।

1981 की अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्म 'कालिया' में किशोर कुमार का गाया गीत था "जहाँ तेरी ये नज़र है, मेरी जाँ मुझे ख़बर है, देख इधर यार, ध्यान किधर है़..."। और फिर हाल में आया हुआ अरिजीत सिंह का गाया, कौसर मुनीर का लिखा और साजिद-वाजिद का स्वरबद्ध डान्स नंबर "पलट, तेरा ध्यान किधर है, यह तेरा हीरो इधर है...", जिसकी ताल पर आज सारे रेडियो चैनल्स झूम रहे हैं। डेविड धवन ने इस गीत के बारे में बताया कि इस जुमले को साजिद-वाजिद ने उन्हें जैसे ही गा कर सुनाया तो उन्होंने फ़ौरन कह दिया कि यह मेरा गाना है, यह मुझे चाहिये इस फ़िल्म में। कॉलेज कैम्पस में नायक अपनी नायिका को मनाने के लिए यह गीत गा रहा है। वरुण धवन पर फ़िल्माया यह गीत चल पड़ा और चार्ट-बस्टर सिद्ध हुआ। वैसे इस गीत को ग़ौर से सुनने पर अहसास होता है कि इसकी धुन कुछ-कुछ "जहाँ तेरी ये नज़र है मेरी जाँ मुझे ख़बर है" से मिलती है, और कई जगहों पर तो डेविड धवन की ही पुरानी फ़िल्म 'हीरो नंबर वन' के गीत "मैने पैदल से जा रहा था, उन्हें साइकिल से आ रही थी" से काफ़ी मेल खाता है। तो इस तरह से "पलट तेरा ध्यान किधर है" फ़िल्मी गीतों में दशकों से आता-जाता रहा है और शायद आगे भी इसका चलन जारी रहे, देखते हैं। लीजिए, अब आप 1943 में बनी फिल्म 'संजोग' में चार्ली का गाया वह गीत सुनिए।

फिल्म - संजोग : 'पलट तेरा ध्यान किधर है...' : नूर मोहम्मद 'चार्ली' : संगीत - नौशाद



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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