Saturday, April 5, 2014

आइये आज सम्मानित करें 'सिने पहेली' प्रतियोगिता के विजेताओं को...

'सिने पहेली 'पुरस्कार वितरण सभा


'सिने पहेली' के सभी चाहनेवालों को सुजॉय चटर्जी का एक बार फिर से प्यार भरा नमस्कार। जैसा कि आप जानते हैं कि 'सिने पहेली' के महामुकाबले के अनुसार श्री प्रकाश गोविन्द और श्री विजय कुमार व्यास इस प्रतियोगिता के संयुक्त महाविजेता बने हैं, और साथ ही श्री पंकज मुकेश, श्री चन्द्रकान्त दीक्षित और श्रीमती क्षिति तिवारी सांत्वना पुरस्कार के हक़दार बने हैं। आज के इस विशेषांक के माध्यम से आइये इन सभी विजेताओं को इनके द्वारा अर्जित पुरस्कारों से सम्मानित करें। यह है 'सिने पहेली' प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण अंक।



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से महाविजेता को मिलता है 5000 रुपये का नकद इनाम। क्योंकि प्रकाश जी और विजय जी संयुक्त महाविजेता बने हैं, अत: यह राशि आप दोनों में समान रूप से विभाजित की जाती है। 

श्री प्रकाश गोविन्द को 2500 रुपये की पुरस्कार राशि बहुत बहुत मुबारक़ हो! आपके बैंक खाते पर यह राशि ट्रान्सफ़र कर दी गई है।














रेडियो प्लेबैक इंडिया : प्रकाश जी, इस पुरस्कार को स्वीकार करते हुए आप अपने बारे में और 'सिने पहेली' के साथ आपके सफ़र के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

प्रकाश गोविन्द : जी ज़रूर कहना चाहूँगा। जहाँ तक अपनी बात है, 1992 में 'स्वतंत्र भारत' समाचार पत्र से बतौर संवाद सूत्र के रूप में शुरुआत, तत्पश्चात 'अमर उजाला' समाचार पत्र में संवाददाता, उसके बाद 'राष्ट्रीय सहारा दैनिक' से जुड़ा, आखिर में 'समाचार भारती' में उप-सम्पादक के रूप में कार्य किया। साथ ही जमकर स्वतंत्र लेखन भी। कई फीचर एजेंसियों के लिए नियमित लेखन। देश की अधिकाँश पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुईं। कुछ वर्षों से ब्लॉग लेखन में भी सक्रिय रहा हूँ। वर्तमान में स्वयं का व्यवसाय एवं साथ ही एक NGO चला रहा हूँ। रूचियों में शामिल हैं अध्ययन, क्विज़, शतरंज, पेंटिंग, पर्यटन, गायन, और क्लासिक सिनेमा। 

'सिने पहेली' के साथ मेरा जुड़ाव बहुत ही अच्छा रहा। 100 सप्ताह कोई छोटा समय नहीं होता, बल्कि बहुत ही लम्बा समय था। मैं अपने आप को भाग्यशाली समझता हूँ कि शुरु से लेकर अन्त तक मैं इससे जुड़ा रह सका। 'सिने पहेली' सुलझाते हुए बहुत मज़ा आया। It was full of fun and  excitement. और पूरे सीरीज़ में आपने पहेलियों के स्तर को कायम रखा। हालाँकि मैं एक सिनेमा-प्रेमी हूँ और इससे जुड़ी बहुत सी बातों का ज्ञान है मुझे, पर 'सिने पहेली' में पूछे गये सभी सवालों के जवाब मुझे मालूम नहीं थे। सवालों के जवाब ढूंढने के लिए मुझे सिनेमा और संगीत की कुछ किताबें भी खरीदनी पड़ी (जो इस इनाम राशि से ज़्यादा हैं)। पर मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है क्योंकि इन किताबों के माध्यम से बहुत सी नई जानकारियाँ मिलीं। सुजॉय जी ने बहुत मेहनत की है, और हर एपिसोड में कुछ नया कर दिखाया है। Hats off to him!"

रेडियो प्लेबैक इंडिया : बहुत बहुत धन्यवाद प्रकाश जी, और एक बार फिर से आपको बधाई!

और अब हम आमन्त्रित करते हैं दूसरे सह-महाविजेता विजय कुमार व्यास जी को। विजय जी, आप यह पुरस्कार स्वीकार करें! आपके बैंक खाते पर यह राशि ट्रान्सफ़र कर दी गई है।














रेडियो प्लेबैक इंडिया : आप से भी हम जानना चाहेंगे आपके बारे में और 'सिने पहेली' के बारे में आपकी प्रतिक्रिया भी जानना चाहते हैं।

विजय कुमार व्यास : पहेलियॉं खेलने में रूचि और उत्‍साह बचपन से ही रहा। स्‍कूल-कॉलेज के दिनों में खूब क्विज खेले परन्‍तु पत्र पत्रिकाओं में किस तरह भाग लिया जाता है, उस समय पता नहीं था। 1995 से पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों की पहेलियॉं खेलनी प्रारम्‍भ की। 'राष्‍ट्रदूत साप्‍ताहिक' पत्रिका में जब प्रथम पुरस्‍कार 25 रूपये हुआ करता था, तब मैंने अपनी पहली प्रतियोगिता जीती जो कि एक चित्र शीर्षक प्रतियोगिता थी। उसके बाद अब तक विभिन्‍न पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, टीवी क्विज, ऑनलाईन क्विज व अन्‍य मिलाकर लगभग 175 से अधिक बार प्रतियोगिताऍं जीत चुका हूँ एवं कुछ पत्रिकाओं में लघु आर्टिकल भी छपें हैं। मेरे परिवार के सभी लोग फिल्‍मों में रूचि रखतें हैं क्‍योंकि दादाजी फिल्‍म एवं गीत-संगीत प्रेमी थे। वे रेडियो में गाने सुन सुनकर लिखा करते थे। पिताजी भी 'बिनाका गीतमाला' का रजिस्‍टर बनाकर रखते थे। हालांकि अब मेरे दादाजी व पिताजी इस दुनिया में नहीं परन्‍तु मेरे संयुक्‍त परिवार में मेरे तीन चाचाजी एवं मेरे परिवार सहित हम कुल 21 सदस्‍य हैं।

बहरहाल, स्‍वयं के बारे में यही बताना चाहूँगा कि कॉलेज टॉप के साथ मास्‍टर ऑफ कॉमर्स की डिग्री प्राप्‍त करने के बाद मेरा चयन राजस्‍थान लोक सेवा आयोग के माध्‍यम से 18 वर्ष पूर्व राजकीय सेवा में हुआ। हालांकि कम्‍प्‍यूटर में मैंने कोई डिग्री हासिल नहीं की परन्‍तु मैंने इसे 1996 से ही अपना लिया और घर पर ही कम्‍प्‍यूटर सीखा। राजकीय सेवा के साथ-साथ पुस्‍तकें पढने, पहेलियॉं खेलने एवं कम्‍प्‍यूटर उपयोग मेरी दैनिक दिनचर्या में शामिल है। फिलहाल लगभग सभी विषयों की पुस्‍तकें घर पर लाता हूँ जिनमें मुख्‍यत: सिने ब्लिट्ज, स्‍टारडस्‍ट, फिल्‍म फेयर, यैस ओशो, कल्‍याण, क्रिकेट सम्राट, बालहंस, छोटूमोटू, अहा जिन्‍दगी, सुमन सौरभ, सरस सलिल, हंस, बिन्दिया, गृहशोभा इत्‍यादि है। अब तक लगभग सभी पत्रिकाओं की क्विज खेली और कईं बार विजेता रहा। इसके अतिरिक्‍त दैनिक भास्‍कर, राजस्‍थान पत्रिका, दैनिक नवज्‍योति, हिन्‍दुस्‍तान, द टाईम्‍स ऑफ इण्डिया एवं राष्‍ट्रदूत समाचार पत्रों के कईं क्विज/कॉन्‍टेस्‍ट में प्रथम स्‍थान प्राप्‍त किया। ऑनलाईन प्रतियोगिताओं में दैनिक भास्‍कर की WHO SAID IT, सबसे बडा मैच फिक्‍सर, Know & Go Contest तथा फोटो कॉन्‍टेस्‍ट जीता एवं सिम्‍पली जयपुर पत्रिका में भी फोटो कॉन्‍टेस्‍ट एवं मासिक पत्रिका 'फुल टेंशन' में भी कईं बार विजेता रहा।

रेडियोप्‍लेबैक के साथ यह ऑनलाईन सिने पहेली खेलना एक अद्भुत संस्‍मरण बन गया है। फेसबुक के माध्‍यम से इस लिंक पर पहुँचा और पहेली खेलना प्रारम्‍भ किया तो मात्र अपना फिल्‍मी ज्ञान जॉंचनें के लिए। प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेंट के बीच से हिस्‍सा लेने के बावजूद सिने पहेली के नियम देखकर लगा कि यदि मेहनत की जाए तो इसमें आगे की पायदान पर पहुँचा जा सकता है। फिर क्‍या, प्रति सप्‍ताह अवकाश के दिन पहेली को परिजनों के साथ बैठकर हल करता। कभी किसी प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं मिलता तो अपने फिल्‍म प्रेमी मित्रों से मदद लेता। इस सफर में बहुत से नए दोस्‍त बने।  ऑनलाईन नहीं बल्कि ऑफलाईन अर्थात अपने बीकानेर के ही, क्‍योंकि पहेलियों के उत्‍तर के लिए कई बार खूब घूमना पडता और इसी दौरान हर सप्‍ताह पता चलता रहा कि बीकानेर जैसे छोटे शहर में बहुत सारे फिल्‍म प्रेमी मौजूद है जिन्‍हें बहुत सी बातें बिना किसी इन्‍टरनेट या ऑंकडों के मुँह जुबानी याद है। पिछले कुछ महीनों से तो जो भी मिलता, वह पूछता '''कैसी चल रही है पहेली, कहॉं तक पहुँचे'' आदि।

हॉं, एक बात और कि सिने पहेली का प्रारम्‍भ से जॉंच किया तो पता चला कि लगभग सभी प्रतियोगियों ने सिने पहेली प्रारम्‍भ करने के बाद कोई ना कोई ऐपिसोड मिस किया है परन्‍तु मैंने जिस सैगमेन्‍ट से खेलना प्रारम्‍भ किया, उसके बाद बिना किसी ऐपिसोड मिस किये लगातार फाईनल तक अनवरत खेला। यहॉं तक कि मेरे साथ संयुक्‍त विजेता रहे प्रकाश जी ने भी एक पूरा सेगमेण्‍ट नहीं खेला। हालांकि प्रकाश जी ने जब खेलना छोडा तो पहेली का मजा कम होने लगा था परन्‍तु अप्रेल, 2013 से वे वापस आए और तब मेरे लिये यह एक चैलेन्‍ज जैसा हो गया। इस पहेली में मेरे द्वारा भाग नहीं लेने तक प्रकाश जी तीन सेगमेण्‍ट में प्रथम स्‍थान प्राप्‍त कर चुके थे परन्‍तु मेरे आने के बाद मैंनें 7 में से 5 सेगमेण्‍ट में प्रथम स्‍थान प्राप्‍त किया और यह मेरे लिए बहुत बडी उपलब्धि रही क्‍योंकि प्रकाश जी जैसे धुरन्‍धर खिलाडी की चुनौती को मैंनें सहर्ष स्‍वीकार करते हुए अपना शत प्रतिशत देने की कोशिश की और आप सभी की शुभकामनाओं से इस ऑनलाईन पहेली में उनके साथ संयुक्‍त विजेता बना।

सुजॉय जी के बारे में तो क्‍या कहना। जब भी पहेली आती और सबके सामने रखता तो सर्वप्रथम यही बात आती कि वाह ! पहेली बनाने वाले ने कितना दिमाग लगाया है और क्‍या क्‍या आईडिया, कहॉं कहॉं से लाते हैं। वाकई, सुजॉय जी की सभी पहेलियॉं रचनात्‍मक और दिलचस्‍प रही। आपके लिए तो बस यही कहूँगा कि सेगमेंट/महामुकाबला जीतने में बहुत पसीना आया । बडे ही रोचक प्रश्‍न बनाते हैं आप।  मेरे हिसाब से प्रतियोगियों को जितनी मेहनत प्रश्‍न के हल के लिए करनी पडी उससे कहीं अधिक मेहनत आपको प्रश्‍न बनाने में करनी पडी होगी।

इसके अतिरिक्‍त रेडियोप्‍लेबैक के सभी संचालकों का हार्दिक आभार जिन्‍होनें समय समय पर सभी प्रतियोगियों की काफी हौसलाअफजाई की और 100 सप्‍ताह से भी अधिक समय तक सफल आयोजन करने के साथ साथ प्रतियोगियों में समन्‍वय बनाकर इसे अविस्‍मरणीय बना दिया । पहेली के अन्‍य सभी साथी प्रतियोगियों का भी बहुत बहुत धन्‍यवाद जिनके कारण पहेली में रोचकता बनी रही, विशेषकर पंकज जी, क्षिति जी एवं चन्‍द्रकान्‍त जी का आभार और सांत्‍वना पुरस्‍कार जीतने पर बधाई । प्रकाश जी को संयुक्‍त विजेता बनने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऍं। आशा है शीघ्र ही किसी मोड पर फिर मुलाकात होगी।

रेडियो प्लेबैक इंडिया : विजय जी, बहुत बहुत धन्यवाद आपका इन विचारों के लिए और एक बार फिर से आपको बधाई!

और अब श्री पंकज मुकेश, श्री चन्द्रकान्त दीक्षित और श्रीमती क्षिति तिवारी को हम प्रदान करना चाहेंगे पुरस्कार स्वरूप यह पुस्तक- 


यह पुरस्कार आपके डाक के पते पर भेज दिया जायेगा। अप्रैल माह के अन्त तक आपको यह पुस्तक प्राप्त होगी।

तो यह था 'सिने पहेली' प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण समारोह। आशा है आप सब को अच्छा लगा होगा। विजेताओं को एक बार फिर से बधाई देते हुए यह अंक यहीं समाप्त करते हैं, नमस्कार।


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Friday, April 4, 2014

संगीत में उफान और शब्दों में कुछ उबलते सवाल

ताज़ा सुर ताल -2014 - 13

दोस्तों देश भर में चुनावी माहौल गरम है. हर नेता अपने लोकलुभावन नारों से मतदाताओं के दिल जीतने की जुगत में लगा है. गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, मुद्दे सभी वही पुराने हैं, बहुत कुछ बदला पर सोचो तो कुछ भी नहीं बदला, इतने विशाल और समृद्ध देश की संपत्ति पर आज भी बस चंद पूंजीपति फन जमाये बैठे हैं. समाज आज भी भेद भाव, छूत छात जैसी बीमारियों में कैद है. बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा से खिलवाड़ है तो न्याय और सच्चाई की आवाज़ भी कहीं राख तले दबी सुनाई देती है. कितने गर्व से हम गाते आये हैं सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा... मगर वो सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान आज है कहाँ ? यही वो खौलता सा सवाल है जो गीतकार इरशद कामिल ने फिल्म कांची  के गीत में उठाया है. आज ताज़ा सुर ताल में है इसी गीत की बारी. एकदम नए कलाकारों को लेकर आये हैं दिग्गज निर्माता निर्देशक सुभाष घई. घई साहब अपनी फिल्मों में संगीत पक्ष पर ख़ास पकड़ रखते हैं, लम्बे समय तक उनके चेहेते रहे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आनंद बक्शी. बख्शी साहब के साथ तो उनका काफी लम्बा साथ रहा, और उन्होंने रहमान से भी उनके लिखे गीतों को स्वरबद्ध करवाया. कांची  में उन्होंने लम्बे समय से नदारद इस्माईल दरबार को मौका दिया है. साथ ही चार गीत सलीम सुलेमान ने भी दिए हैं और सबसे दिलचस्प बात तो ये है की एक गीत खुद घई साहब ने भी स्वरबद्ध किया है एल्बम के लिए. प्रस्तुत गीत को सलीम सुलेमान ने रचा है और आवाजें हैं सुखविंदर, मोहित चौहान और राज पंडित की. तो चलिए मिलकर ढूंढते हैं अपने 'सारे जहाँ से अच्छे' हिंदुस्तान को. 


बात देश की समस्याओं पर हो रही है तो जिक्र आता है एक ऐसी समस्या का जो केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर के देशों के लिए चिंता का कारण है. पानी यानी जल के भरपूर स्रोत्र हमें कुदरत ने दिए हैं, पर इंसानों ने इन सोत्रों का जरुरत से अधिक दोहन कर इन अनमोल खजानों की थाली में छेद कर दिया है. अब समय चेतने का है. पानी के गहराते संकट की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए फिल्मकार भी अपने अपने तरीकों से जुड़े हुए हैं. कुछ समय पहले आई जलपरी  आपने अवश्य देखी होगी. इसी कड़ी में जल्दी ही आपके सामने होगी गिरीश मलिक की फिल्म जल. फिल्म का संगीत रचा है सोनू निगम ने, सोनू ने बतौर संगीतकार अभी कुछ दिनों पहले ही सिंह साहब दा ग्रेट  से अपने सफ़र की शुरुआत की थी, पर जल  के लिए उन्होंने साथ थामा है मशहूर तबला वादक बिक्रम घोष का. फिल्म की एल्बम में अधिकतर वाध्य रचनाएं हैं जो बेहद अनूठी है. पर आज हम आपके लिए लाये हैं शुभा मुदगल का गाया शीर्षक गीत, जिसे लिखा भी है सोनू निगम ने संजीव तिवारी के साथ मिलकर. शास्त्रीय सरंचना में बुने ऐसे गीत इन दिनों फिल्मों में बेहद कम ही सुनने को मिलते हैं. पर जाहिर है रेडियो प्लेबैक पर आप ऐसे अनमोल नगीनों को अवश्य ही सुन पायेगें. लीजिये सुनिए ये सुन्दर सुरीला नगमा.. 
     

Tuesday, April 1, 2014

सड़क जाम - पुरुषोत्तम पाण्डे की कहानी, अनुराग शर्मा की ज़ुबानी

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में शंकर पुणतांबेकर की कथा "आम आदमी" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं पुरुषोत्तम पाण्डे की कहानी सड़क जाम जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

पुरुषोत्तम पाण्डेय की कथा लातों का देव आप पहले सुन चुके हैं। कहानी "सड़क जाम" का गद्य पुरुषोत्तम पाण्डेय के ब्लॉग जाले ब्लॉग पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 55 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

मेरी कहानियों का स्रोत आस-पास समाज में घटित घटनाओं तथा कहीं सुनी-पढ़ी बातें ही होती है। किसी व्यक्ति विशेष को चित्रित नहीं करता हूँ। अगर किसी घटना या चरित्र का कहीं साम्य लगता है तो ये एक संयोग ही होगा। ~ पुरुषोत्तम पाण्डेय

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"जीवनसिंह का मानना था कि सत्तासुख भोगने के लिए सत्तानशीं पार्टी के साथ जुड़ा रहना फायदेमंद होता है"
 (डॉ. पुरुषोत्तम पाण्डे की कहानी "सड़क जाम" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
 यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
सड़क जाम MP3

#Fourth Story, Sadak Jam: Purushottam Pandey/Hindi Audio Book/2014/4. Voice: Anurag Sharma

Sunday, March 30, 2014

चैत्र मास में चैती गीतों का लालित्



स्वरगोष्ठी – 161 में आज

लोक संगीत का रस-रंग जब उपशास्त्रीय मंच पर बिखरा


‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा, पिया घर लइहें...’




रेडियो प्लेबैक इण्डिया के मंच पर साप्ताहिक स्तम्भ स्वरगोष्ठी के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज हम आपसे संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा करेंगे जो मूलतः ऋतु प्रधान लोक संगीत की शैली है, किन्तु अपनी सांगीतिक गुणबत्ता के कारण इस शैली को उपशास्त्रीय मंचों पर भी अपार लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत के रूप में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र मास से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में चैती गीतों का गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। आज के अंक से हम आपसे चैती गीतों के विभिन्न प्रयोगों पर चर्चा आरम्भ करेंगे। उत्तर भारत में इस गीत के प्रकारों को चैती, चैता और घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है। आज के अंक में हम सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप और फिर फिल्मों में इसके प्रयोग के कुछ उदाहरण सुनेंगे।
  


चैती गीतों का मूल स्रोत लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में रामजन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत् के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। कभी-कभी गायकों को दो दलों में बाँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी इन गीतों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘चैता दंगल' कहा जाता है। आइए, सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप पर एक दृष्टिपात करते है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी एक चर्चित चैती से हम आज की इस संगीत सभा का शुभारम्भ करते हैं। यह श्रृंगार रस प्रधान चैती है जिसमें नायिका परदेश गए नायक के वापस घर लौटने की प्रतीक्षा करती है। इस चैती की भाव-भूमि तो लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है।


चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : विदुषी गिरिजा देवी




यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर की दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।" चैती गीतों के लोक-रंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा। आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने उपशास्त्रीय मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात फिल्म अभिनेता गोविन्दा गायिका निर्मला देवी आहूजा के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी।


चैती गीत : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइल रामा...’ : गायिका निर्मला देवी




चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती की धुन और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती का गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो कई गीतों में किया गया है, किन्तु धुन के साथ-साथ ऋतु के अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनीचुनी फिल्मी गीतों में मिलता है। 1963 में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के बहुचर्चित उपन्यास ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर थे, जिन्होंने फिल्म के गीतों को पूर्वी भारत की लोकधुनों में निबद्ध किया था। लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप गीतों की रचना की थी। इन्हीं गीतों में एक चैती गीत भी था, जिसे मुकेश के स्वर में रिकार्ड किया गया था। गीत के बोल हैं- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा…’। फिल्म के परदे पर यह चैती गीत अभिनेता राजकुमार ने अभिनीत किया है। इस गीत में आपको चैती गीतों के समस्त लक्षण परिलक्षित होंगे। इस गीत में राग तिलक कामोद का आधार और दीपचन्दी ताल का स्पन्दन भी मिलेगा। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में भी हम चैती गीतों पर चर्चा जारी रखेंगे।


चैती गीत : ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा...’ : फिल्म - गोदान : गायक - मुकेश  : संगीत - पण्डित रविशंकर : गीतकार - अनजान




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 161वें अंक की संगीत पहेली में हम आपको देश के पूर्वाञ्चल में प्रचलित लोक संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस प्रसिद्ध लोक गायिका को पहचानिए और हमें उनका नाम लिख भेजिए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल / तालों का प्रयोग किया गया है? ताल / तालों का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 163वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 159वीं संगीत पहेली में हमने आपको ठुमरी अंग में प्रस्तुत फिल्म 'सरदारी बेगम' के होली गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। अगले अंक में हम चैती गीतों के कुछ और उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। साथ ही चैती गीतों के साहित्य पर भी हम आपसे चर्चा करेंगे। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, March 29, 2014

अभिनेत्री नन्दा को श्रद्धांजलि आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में...


एक गीत सौ कहानियाँ - 26
 

‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम...’



"मुझे अभी-अभी पता चला कि अभिनेत्री नन्दा, जिसे हम बेबी नन्दा कहते थे, वो अब हमारे बीच नहीं रही। यह सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। बेबी नन्दा जब 4-5 साल की थी, तब उसने 'मन्दिर' फ़िल्म में मेरे छोटे भाई की भूमिका निभायी थी। मैं नन्दा के पिताजी मास्टर विनायक जी की कम्पनी में बतौर बाल कलाकार 1943 से काम करती थी। मेरी और नन्दा और उसकी बड़ी बहन मीना के साथ बड़ी दोस्ती थी। नन्दा की पहली फ़िल्म 'तूफ़ान और दीया' से मैंने नन्दा के लिए प्लेबैक शुरु किया। बहुत अच्छी इंसान थी। भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दे।" --- लता मंगेशकर


भिनेत्री नन्दा अब इस दुनिया में नहीं रहीं। लता जी के उपर्युक्त शब्दों से पता चलता है कि कितना अन्तरंग रिश्ता रहा होगा दोनों में। आज नन्दा जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए लता जी के गाये और नन्दा जी पर फ़िल्माये फ़िल्म 'हम दोनो' के भजन "अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" से बेहतर कोई रचना नहीं होगी। गाँधीवादी विचारधारा लिये राग गौड़ सारंग आधारित इस भजन को सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पारम्परिक रचना होगी। पर नहीं, यह एक फ़िल्मी गीत है जिसे साहिर लुधियानवी ने लिखा है और जयदेव ने स्वरबद्ध किया है। फ़िल्मी भजनों की श्रेणी में शायद सर्वोपरि है यह भजन। यह केवल भजन ही नहीं, बल्कि साप्रदायिक एकता और अहिंसा का संदेश भी है। ख़ास बात यह है कि स्वतंत्र संगीतकार के रूप में यह जयदेव की पहली भक्ति रचना थी। जयदेव के ही शब्दों में, "बतौर स्वतन्त्र संगीतकार, मेरी पहली फ़िल्में थीं 'जोरु का भाई', 'किनारे-किनारे' और 'नवकेतन' की एक फ़िल्म, जो सारे के सारे नाकामयाब रहे। फिर मुझे मिला 'हम दोनो"। तो पहली ही भजन में इस तरह की सफलता यकायक देखने को नहीं मिलती। इस भजन की गायिका, स्वयं लता जी कहती हैं, "इस भजन को अगर सुबह और रात के वक़्त सुना जाये तो एक अजीब सी सुकून मिलता है" (जयमाला, विविध भारती)। लता जी को यह भजन इतना पसन्द है कि नूरजहाँ जब कई वर्ष बाद भारत आयीं थीं और उनके स्वागत में -'Mortal Men, Immortal Melodies' नामक शो आयोजित किया गया था, उस शो में लता जी ने इसे शामिल किया था। रूपक ताल में स्वरबद्ध यह भजन सुनने में कितना सीधा-सरल लगता है, ध्यान से सुनने पर अहसास होता है कि जयदेव ने कितनी मेहनत की होगी इस पर। गीत निचले स्वर से शुरू होकर क्रमश: ऊपर के स्वरों तक पहुंचता चला जाता है। एक तरफ़ लता की आवाज़ और दूसरी तरफ़ कोरस की आवाज़, इन दो आवाज़ों के साथ जयदेव ने क्या ख़ूब प्रयोग किया हैं। दो आवाज़ों को एक बार मिला दिया और फिर किस सुन्दरता से दोनों को अलग कर दिया, इन सब छोटी-छोटी बातों से भी इस भजन में निखार आया है।

केवल लता जी ही नहीं, इस भजन के कद्रदानों की संख्या बहुत बड़ी है। फ़िल्म-संगीत के पहले दौर के कलाकारों से लेकर आज के दौर के कलाकारों में इस भजन के चाहनेवाले शामिल हैं। तिमिर बरन और उमा देवी ने अपने अपने 'जयमाला' कार्यक्रमों में इस भजन को चुना था। कलात्मक फ़िल्मों के जाने-माने संगीतकार अजीत वर्मन ने इस भजन के बारे में अपने 'जयमाला' में फ़ौजी भाइयों से कहा है, "मेरे भाई, अभी जो गाना मैं सुनाने जा रहा हूँ, सच्ची, जब मैं अकेला, अकेला तो मैं हो ही नहीं सकता क्योंकि मेरा दिल मेरे साथ रहता है, my heart is my inspiration, हाँ तो यह गाना जयदेव का "अल्लाह तेरो नाम" इतना अच्छा भजन बहुत कम बना है। इतना सिम्पल वो ही बना सकता है जो बहुत लम्बी राह चला हो।" अनूप जलोटा द्वारा प्रस्तुत 'हिट सुपरहिट फ़ेवरिट फ़ाइव' कार्यक्रम में अपने मनपसन्द पाँच गीतों में सर्वप्रथम उन्होंने इसी भजन को चुना और कहा, "मुझे बहुत पसन्द है लता जी का गाया "अल्लाह तेरो नाम"। यह कहूँगा कि इसकी ख़ूबी है कि कितनी सरल कम्पोज़िशन और कितनी पावरफ़ुल कम्पोज़िशन है जिसे जयदेव जी ने बनायी है, लता जी ने गाया तो अच्छा ही है, लेकिन आपको एक छोटा सा उदाहरण दे दूँ इस गाने के बारे में, कि इससे ज़्यादा सरल क्या हो सकती है कम्पोज़िशन की कि इसका स्थायी और अन्तरा एक ही धुन पर है। सिर्फ़ "स" को "म" कर दिया।" इस भजन के कद्रदानों में कविता कृष्णमूर्ती, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, स्वानन्द किरकिरे और सोनू निगम भी शामिल हैं।

जयदेव और लता
फ़िल्म 'हम दोनों' में लता के गाये दो भजन हैं - एक तो "अल्लाह तेरो नाम" और दूसरा भजन है राग धानी आधारित "प्रभु तेरो नाम, जो ध्याये फल पाये"। कुछ लोगों के अनुसार "अल्लाह तेरो नाम" "प्रभु तेरो नाम" का ही एक दूसरा संस्करण है, पर सच्चाई यह है कि ये दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग, और स्वतंत्र रचनाएँ हैं। दोनों भजन नन्दा पर फ़िल्माया गया है। फिल्म के इन गीतों से एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। सचिनदेव बर्मन से कुछ मतभेद के कारण उन दिनों लता मंगेशकर ने उनकी फिल्मों में गाने से मना कर दिया था। बर्मन दादा के सहायक रह चुके जयदेव ने इस प्रसंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पहले तो लता जी ने जयदेव के संगीत निर्देशन में गाने से मना कर दिया, परन्तु जब उन्हें यह बताया गया कि यदि ‘हम दोनों’ के गीत लता नहीं गाएँगी तो फिल्म से जयदेव को ही हटा दिया जाएगा, यह जान कर लता जी गाने के लिए तैयार हो गईं। उन्हें यह भी बताया गया कि भक्तिरस में पगे इन गीतों के लिए जयदेव ने अलौकिक धुनें बनाई है। अब इसे लता जी की उदारता मानी जाए या व्यावसायिक कुशलता, उन्होने इन गीतों को अपने स्वरों में ढाल कर कालजयी बना दिया। "अल्लाह तेरो नाम" भजन में दो अन्तरे हैं। फ़िल्म के पर्दे पर और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर, दोनों में दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं। पर एक बात ध्यान देने योग्य हैं कि जब जयदेव जी ने विविध भारती पर अपनी 'जयमाला' प्रस्तुत की थी, उसमें इस भजन को सुनवाते हुए कहा था, "फ़ौजी भाइयों, जो सेवा आप हमारी कर रहे हैं, इस देश की रक्षा कर रहे हैं, हम सब आप लोगों के शुक्रगुज़ार हैं, आप जहाँ भी हों, पहाड़ों में, सहराओं में, समन्दरों में, भगवान आप को ख़ुश रखें, आप के परिवारों को ख़ुशहाल रखें। इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान। सबको मिले सुख-शान्ति, यही है ईश्वर से मेरी प्रार्थना"। अगर आप इन शब्दों पर ग़ौर करें तो साफ़-साफ़ इस भजन का तीसरी अन्तरा हमारे सामने आ जाता है - "इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान, सबको सन्मति दे भगवान"। तो क्या यह तीसरा अन्तरा भी साहिर साहब ने लिखा था जिसे गीत में जगह नहीं मिली? या फिर ये शब्द जयदेव जी के ही थे इस कार्यक्रम के लिए? क्या पता!

साहिर
इस दौर के सुप्रसिद्ध गीतकार स्वानन्द किरकिरे ने हाल में इस भजन की सुन्दर स्मीक्षा की है, जिसका हिन्दी में अनुवाद कुछ इस तरह का है - "पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो अहसास होता है कि बहुत सालों तक मैंने सही मायने में इस भजन के शब्दों पर ग़ौर नहीं किया था। अपनी उम्र के तीसरे दशक में पाँव रखने के बाद मैं इस भजन के बोलों की ओर आकर्षित हुआ और समझ आया कि ये बोल क्या संदेश दे रहे हैं। मैंने आविष्कार किया कि "अल्लाह तेरो नाम" महज़ एक भजन नहीं है, यह युद्ध के ख़िलाफ़ एक दरख्वास्त है। कुछ तो बात है इस गीत में कि यह मेरे साथ रहा है इतने सालों से। इसे मैं गीत नहीं समझता, यह तो एक प्रार्थना है, श्लोक है, अमृत वाणी है, और मेरे अनुसार यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है। इस गीत के साथ मेरी जो सबसे पुरानी स्मृतियाँ हैं, वो ये कि इसे हमारे स्कूल में स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर गाया जाता था। और मेरी यह धारणा थी कि मैं इसे जानता हूँ, समझता हूँ। पर उस वक़्त मैं ग़लत था। बोलों की अगर बात करें तो मुझे नहीं लगता कि साहिर साहब से बेहतर कोई इसे लिख पाते, जिनकी शायरी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। यह उनका ही कमाल है कि एक साधारण प्रार्थना गीत में उन्होंने ऐसी सोच, ऐसे उच्च विचार भरे हैं कि यह एक यूनिवर्सल प्रेयर बन गया है। अगर पहला अन्तरा हीरा है तो दूसरे अन्तरे में तो साहिर साहब ने काव्य के गहराई की हर सीमा पार कर दी है। "ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले, बलवानों को दे दो ज्ञान" हमें एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। इसमें मीटर है, मेलडी है, अर्थ है, गहराई है। युद्ध में विश्वास रखने वालों और बिना कुछ जाने एक दूसरे को मारने वालों के लिए यह गीत जैसे एक व्यंग है, वार है। इस गीत का एक और आकर्षण है साज़ों का अरेन्जमेण्ट और कम्पोज़िशन। कमचर्चित संगीतकार जयदेव ने इस गीत में कई रागों को इस तरह से छिड़का है कि एक आकर्षण करने वाली ख़ुशबू सी आती है जब जब इसे सुनते हैं। इसे हर बार सुनते हुए मेरी आँखें भर आती हैं। लता जी ने यह गीत गाया है। सोनू निगम एक और गायक हैं जो इसे बहुत ख़ूबसूरती से गाते हैं। मैं जब भी उनसे मिलता हूँ, अपने दोस्तों के साथ बैठ जाता हूँ उनसे यह गीत सुनने के लिए। यह गीत एक बेहतरीन उदाहरण है एक सशक्त और सर्वव्यापी प्रार्थना का जो मुझे अपने जज़्बातों और देशभक्ति भावना को जगाने में मदद करती है। इस भजन के सुर मेरे विवेक में और मुझमें समाया हुआ है, हमेशा हमेशा।"

इसी गीत के माध्यम से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से स्वर्गीय अभिनेत्री नन्दा को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे!

फिल्म - हम दोनों : अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम...' : लता मंगेशकर : संगीत - जयदेव : गीतकार - साहिर लुधियानवी 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज और आलेख - सुजॉय चटर्जी व कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Friday, March 28, 2014

यो यो और मीका भी बने मस्त कलंदर के दीवाने

ताज़ा सुर ताल 2014-11

दोस्तों नए गीतों की दुनिया में एक बार फिर से स्वागत है आप सबका। आज सबसे पहले बात हनी सिंह, जी हाँ वही 'यो यो' वाले।  यूं तो भारतीय श्रोताओं के लिए रैप गायन शैली को बहुत पहले ही बाबा सेहगल सरीखे गायक परोस चुके हैं, पर जो कामियाबी यो यो ने हासिल की उसका कोई सानी नहीं।  हनी सिंह ने बहुत से नए पंजाबी गायकों को हिट गीत दिए गाने के लिए और उनपर अपने रैप का जो तड़का लगाया उसे सुन युवा श्रोता झूम उठे।  उनके रैप के शब्द भी ऐसे जैसे इस दौर के युवाओं की बात हो रही हो बिना अलग लाग लपेट।  सबसे अच्छी खासियत उनकी ये रही कि समय के साथ साथ वो अपने संगीत में भी नए प्रयोग लाते रहे।  लुंगी डांस  के लिए रजनीकान्त का अंदाज़ चुरा लिया तो कभी गुलज़ार साहब के क्लास्सिक तेरे बिना ज़िन्दगी से  को रैप के सांचे में ढाल लिया।  उनका ताज़ा प्रयोग रहा हिंदी फ़िल्मी संगीत के आज के सबसे हिट गायक मिका सिंह के साथ जुगलबंदी करना। मिका और यो यो साथ आये हैं एक सूफियाना गीत के साथ. वैसे इस गीत दमा दम मस्त कलंदर का भी इतिहास पुराना है।  मूल रूप से अमीर खुसरो के रचे  इस इबादत को बाबा बुल्लेशाह ने अपने ख़ास अंदाज़ से संवारा। पीर शाहबाज़ कलंदर को समर्पित इस कव्वाली को नुसरत साहब, नूर जहाँ, आबिदा परवीन से लेकर रुना लैला तक ने अपने अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में गाकर लोकप्रियता के चरम तक पहुंचाया। यहाँ तक कि रॉक  बैंड जूनून और आज के दौर के शंकर महादेवन और रेखा भारद्वाज भी इस कव्वाली की रूहानियत से बच नहीं पाये। मिका और हनी सिंह के गाये इस ताज़ा संस्करण में भी दोनों कलाकारों ने अपना सबसे बहतरीन काम किया है।  संगीत संयोजन भी उच्च स्तर  का है।  लीजिये आप भी सुनिये और झूमिए झूलेलाल का नाम लेकर 



गीतकार कौसर मुनीर का लिखा सय्यारा  गीत यक़ीनन आज भी श्रोताओं को उतना ही लुभाता है।  बहुत दिनों के बाद उनका लिखा एक नया गीत सामने आया है।  कौसर के शब्दों में एक ख़ास किस्म की ताज़गी मिलती है हर बार।  प्रस्तुत गीत को स्वरबद्ध किया है जीत गांगुली ने जो आशिकी  के बाद इन दिनों दिन बा दिन अपने  काम को निखारते जा रहे हैं। अरिजीत सिंह की आवाज़ का वही जादू भरा असर है इस रोमांटिक गीत में जो है फ़िल्म यंगिस्तान  से. सुनिये और दीजिये इज़ाज़त, मिलते हैं अगले सप्ताह।  
  

Thursday, March 27, 2014

साहिर और रोशन की अनूठी जुगलबंदी से बनी ये नायाब कव्वाली





खरा सोना गीत - निगाहें मिलाने को जी चाहता है 
प्रस्तोता - रचिता टंडन 
स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी 
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 

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