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Saturday, April 25, 2015

बातों बातों में - 07 : INTERVIEW OF LYRICIST AMIT KHANNA

बातों बातों में - 07

गीतकार अमित खन्ना से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"मैं अकेला अपनी धुन में मगन..." 




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज अप्रैल 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार अमित खन्ना से की गई हमारी टेलीफ़ोनिक बातचीत के सम्पादित अंश। यह साक्षात्कार साल 2011 में किया गया था। 





अमित जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर। और बहुत बहुत शुक्रिया हमारे मंच पर पधारने के लिये, हमें अपना मूल्यवान समय देने के लिए। 


नमस्कार और धन्यवाद जो मुझे आपने याद किया!


सच पूछिये अमित जी तो मैं थोड़ा सा संशय में था कि आप मुझे कॉल करेंगे या नहीं, आपको याद रहेगा या नहीं। पर आपने बिल्कुल आपके द्वारा दिए गए समय पर कॉल कर मुझे चौंका ज़रूर दिया है। और एक बार फिर मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।

मैं कभी कुछ भूलता नहीं।



मैं अपने पाठकों को यह बताना चाहूँगा कि मेरी अमित जी से फ़ेसबूक पर मुलाकात होने पर जब मैंने उनसे साक्षात्कार के लिए आग्रह किया तो वो न केवल बिना कुछ पूछे राज़ी हो गये, बल्कि यह कहा कि वो ख़ुद मुझे टेलीफ़ोन करेंगे। यह बात है 3 जून 2011 की और साक्षात्कार का समय ठीक हुआ 11 जून दिन के 12:30 बजे। इस दौरान मेरी उनसे कोई बात नहीं हुई, न ही किसी तरह का कोई सम्पर्क हुआ। इसलिये मुझे लगा कि शायद अमित जी भूल जायेंगे और कहाँ इतने व्यस्त इन्सान को याद रहेगा मुझे फ़ोन करना। लेकिन 11 जून ठीक 12:30 बजे उन्होंने वादे के मुताबिक़ मुझे कॉल कर मुझे चौंका दिया। इतने व्यस्त होते हुए भी उन्होंने समय निकाला, इसके लिए हम उन्हें जितना भी धन्यवाद दें कम है। एक बार फिर यह सिद्ध हुआ कि फलदार पेड़ हमेशा झुके हुए होते हैं। सच कहूँ कि उनका फ़ोन आते ही अमित जी का लिखा वह गीत मुझे याद आ गया कि "आप कहें और हम न आयें, ऐसे तो हालात नहीं"। एकदम से मुझे ऐसा लगा कि जैसे यह गीत उन्हीं पर लागू हो गया हो। ख़ैर, बातचीत का सिलसिला शुरू करते हैं। अमित जी, आपकी पैदाइश कहाँ की है? अपने माता-पिता और पारिवारिक पृष्ठभूमि  के बारे में कुछ बताइये। क्या कला, संस्कृति या फ़िल्म लाइन से आप से पहले आपके परिवार का कोई सदस्य जुड़ा हुआ था?

मेरा ताल्लुक दिल्ली से है। मेहरोली रोड पर हमारा घर है। मेरा स्कूल था सेण्ट. कोलम्बस और कॉलेज था सेण्ट. स्टीवेन्स। हमारे घर में कला-संस्कृति से किसी का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था। हमारे घर में सब इंजीनियर थे, और नाना के तरफ़ सारे डॉक्टर थे।



तो फिर आप पर भी दबाव डाला गया होगा इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए?

जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं थी, मुझे पूरी छूट थी कि जो मैं करना चाहूँ, जो मैं बनना चाहूँ, वह बनूँ। मेरा रुझान लिखने की तरफ़ था, इसलिए किसी ने मुझे मजबूर नहीं किया।



यह बहुत अच्छी बात है, और आजकल के माता-पिता जो अपने बच्चों पर इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए दबाव डालते हैं, और कई बार इसके विपरीत परिणाम भी उन्हें भुगतने पड़ते हैं, उनके लिए यह कहना ज़रूरी है कि बच्चा जो बनना चाहे, उसकी रुझान जिस फ़ील्ड में है, उसे उसी तरफ़ प्रोत्साहित करना चाहिए।

सही बात है!



अच्छा अमित जी, बाल्यकाल में या स्कूल-कॉलेज के दिनों में आप किस तरह के सपने देखा करते थे अपने करीयर को लेकर? वो दिन किस तरह के हुआ करते थे? अपने बचपन और कॉलेज के ज़माने के बारे में कुछ बताइए।

मैं जब 14-15 साल का था, तब मैंने अपना पहला नाटक लिखा था। फिर कविताएँ लिखने लगा, और तीनों भाषाओं में - हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी। फिर उसके बाद थियेटर से भी जुड़ा जहाँ पर मुझे वी. बी. कारन्त, बी. एम. शाह, ओम शिवपुरी, सुधा शिवपुरी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। वो सब NSD (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) से ताल्लुक रखते थे।



आपने भी NSD (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) में कोर्स किया था?

नहीं, मैंने कोई कोर्स नहीं किया।



आपने फिर किस विषय में पढ़ाई की?

मैंने इंगलिश लिटरेचर में एम.ए. किया है।



इंगलिश में एम.ए. कर हिन्दी के गीतकार बने। आपने अपना यह करीयर किस तरह से शुरू किया?


कॉलेज में रहते समय मैं 'टेम्पस' नामक लातिन पत्रिका का सम्पादक था, 1969 से 1971 के दौरान। दिल्ली यूनिवर्सिटी में 'डीबेट ऐण्ड ड्रामाटिक सोसायटी' का सचिव भी था। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी फ़िल्म सम्बन्धी लेख लिखता था। कॉलेज में रहते ही मेरी मुलाक़ात हुई देव (आनंद) साहब से, जो उन दिनों दिल्ली में अपने 'नवकेतन' का एक डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ़िस खोलना चाहते थे। तो मुझे उन्होंने कहा कि तुम भी कभी कभी चक्कर मार लिया करो। इस तरह से मैं उनसे जुड़ा और उस वक़्त फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' बन रही थी। मुझे उस फ़िल्म के स्क्रिप्ट में काम करने का उन्होंने मौका दिया और मुझे उस सिलसिले में वो नेपाल भी लेकर गए। मुझे कोई स्ट्रगल नहीं करना पड़ा। यश जोहर नवकेतन छोड़ गये थे और मैं आ गया।


अच्छा, फिर उसके बाद आपने उनकी किन किन फ़िल्मों में काम किया?

'नवकेतन' में मेरा रोल था 'एग्ज़ेक्युटिव प्रोड्यूसर' का। 1971 में देव साहब से जुड़ने के बाद 'हीरा-पन्ना' (1973), 'शरीफ़ बदमाश' (1973), 'इश्क़ इश्क़ इश्क़' (1974), 'देस परदेस' (1978), 'लूटमार' (1980), इन फ़िल्मों में मैं 'एग्ज़ेक्यूटिव प्रोड्यूसर' था। 'जानेमन' (1976) और 'बुलेट' (1976) में मैं बिज़नेस एग्ज़ेक्यूटिव और प्रोडक्शन कन्ट्रोलर था।



एग्ज़ेक्यूटिव प्रोड्यूसर से प्रोड्युसर आप कब बनें?

फ़िल्म 'मन-पसंद' से। 1980 की यह फ़िल्म थी, इसके गीत भी मैंने ही लिखे थे। फ़िल्म के डिरेक्टर थे बासु चटर्जी और म्यूज़िक डिरेक्टर थे राजेश रोशन।





वाह! इस फ़िल्म के गीत तो बहुत ही कर्णप्रिय हैं। "होठों पे गीत जागे, मन कहीं दूर भागे", "चारु चंद्र की चंचल चितवन", "मैं अकेला अपनी धुन में मगन", एक से एक लाजवाब गीत। अच्छा राजेश रोशन के साथ आपने बहुत काम किया है, उनसे मुलाक़ात कैसे हुई थी?

राजेश रोशन के परिवार को मैं जानता था, राकेश रोशन से पहले मिल चुका था, इस तरह से उनके साथ जान-पहचान थी।



एक राजेश रोशन, और दूसरे संगीतकार जिनके साथ आपने अच्छी पारी खेली, वो थे बप्पी लाहिड़ी साहब। उनसे कैसे मिले?

इन दोनों के साथ मैंने कुछ 20-22 फ़िल्मों में काम किये होंगे। मेरा पहला गीत जो है 'चलते चलते' का शीर्षक गीत, वह मैंने बप्पी लाहिड़ी के लिए लिखा था। उन दिनों वो नये नये आये थे और हमारे ऑफ़िस में आया करते थे। मैं उनको प्रोड्यूसर भीष्म कोहली के पास लेकर गया था। तो वहाँ पर उनसे कहा गया कि फ़िल्म के टाइटल सॉंग के लिये कोई धुन तैयार करके बतायें। केवल 15 मिनट के अंदर धुन भी बनी और मैंने बोल भी लिखे।



वाह! केवल 15 मिनट में यह कालजयी गीत आपने लिख दिया, यह तो सच में आश्चर्य की बात है!

देखिये, मेरा गीत लिखने का तरीका बड़ा स्पॉन्टेनीयस हुआ करता था। मैं वहीं ऑफ़िस में ही लिखता था, घर में लाकर लिखने की आदत नहीं थी। फ़िल्म में गीत लिखना एक प्रोफ़ेशनल काम है; जो लोग ऐसा कहते हैं कि उन्हें घर पर बैठे या प्रकृति में बैठ कर लिखने की आदत है तो यह सही बात नहीं है। फ़िल्मी गीत लिखना कोई काविता या शायरी लिखना नहीं है। आज लोग कहते हैं कि आज धुन पहले बनती है, बोल बाद में लिखे जाते हैं, लेकिन मैं यह कहना चाहूँगा कि उस ज़माने में भी धुन पहले बनती थी, बोल बाद में लिखे जाते थे, 'प्यासा' में भी ऐसा ही हुआ था, 'देवदास' में भी ऐसा ही हुआ था।



किशोर कुमार के गाये 'चलते चलते' फ़िल्म का शीर्षक गीत "कभी अलविदा ना कहना" तो जैसे एक ऐन्थेम सॉंग् बन गया है। आज भी यह गीत उतना ही लोकप्रिय है जितना उस ज़माने में था, और अब भी हम इस गीत को सुनते हैं तो एक सिहरन सी होती है तन-मन में। "हम लौट आयेंगे, तुम यूँही बुलाते रहना" सुन कर तो आँखें भर जाती हैं।  और अब तो एक फ़िल्म भी बन गई है 'कभी अलविदा ना कहना' के शीर्षक से। अच्छा अमित जी, 'चलते चलते' फ़िल्म का ही एक और गीत था लता जी का गाया "दूर दूर तुम रहे, पुकारते हम रहे..."। इसके बारे में भी कुछ बताइए?

जी हाँ, इस गीत के लिए उन्हें अवार्ड भी मिला था। इस गीत की धुन बी. जे. थॉमस के मशहूर गीत "raindrops keep falling on my head" की धुन से इन्स्पायर्ड थी।



अच्छा, 'चलते चलते' के बाद फिर आपकी कौन सी फ़िल्में आईं?

उसके बाद मैंने बहुत से ग़ैर-फ़िल्मी गीत लिखे, 80 के दशक में, करीब 100-150 गानें लिखे होंगे। फ़िल्मी गीतों की बात करें तो 'रामसे ब्रदर्स' की 4-5 हॉरर फ़िल्मों में गीत लिखे, जिनमें अजीत सिंह के संगीत में 'पुराना मन्दिर' भी शामिल है।



सुजॉय - 'पुराना मन्दिर' का आशा जी का गाया "वो बीते दिन याद हैं" गीत तो ख़ूब मकबूल हुआ था। अच्छा अमित जी, यह बताइए कि जब आप कोई गीत लिखते हैं तो आप की रणनीति क्या होती है, किन बातों का ध्यान रखते हैं, कैसे लिखते हैं?

देखिए मैं बहुत spontaneously लिखता हूँ। मैं दफ़्तर या संगीतकार के वहाँ बैठ कर ही लिखता था। घर पे बिल्कुल नहीं लिखता था। फ़िल्म में गीत लिखना कोई कविता लिखना नहीं है कि किसी पहाड़ पे जा कर या तालाब के किनारे बैठ कर लिखने की ज़रूरत है, जो ऐसा कहते हैं वो झूठ कहते हैं। फ़िल्मों में गीत लिखना एक बहुत ही कमर्शियल काम है, धुन पहले बनती है और आपको उस हिसाब से सिचुएशन के हिसाब से बोल लिखने पड़ते हैं। हाँ कुछ गीतकार हैं जिन्होंने नए नए लफ़्ज़ों का इस्तमाल किया, जैसे कि राजा मेहन्दी अली ख़ाँ साहब, मजरूह साहब, साहिर साहब। इनके गीतों में आपको उपमाएँ मिलेंगी, अन्य अलंकार मिलेंगे।



अच्छा अलंकारों की बात चल रही है तो फ़िल्म 'मन-पसन्द' में आपने अनुप्रास अलंकार का एक बड़ा ख़ूबसूरत प्रयोग किया था, उसके बारे में बताइए।

'मन-पसन्द' मैंने ही प्रोड्यूस की थी। फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसा आया कि जिसमे छन्दों की ज़रूरत थी। देव आनन्द टिना मुनीम को गाना सिखा रहे हैं। तो मैंने उसमें जयदेव की कविता से यह लाइन लेकर गीत पूरा लिखा।



बहुत सुन्दर!

मैं यह समझता हूँ कि जो एक गीतकार लिखता है उस पर उसके जीवन और तमाम अनुभवों का असर पड़ता है। उसके गीतों में वो ही सब चीज़ें झलकती हैं। सबकॉनशियस माइण्ड में वही सबकुछ चलता रहता है गीतकार के।



'मनपसन्द' के सभी गीत इतने सुन्दर हैं कि कौन सा गीत किससे बेहतर है बताना मुश्किल है। "सुमन सुधा रजनीगंधा" भी लाजवाब गीत है। अच्छा, अमित जी, राजेश रोशन और बप्पी लाहिड़ी के अलावा और किन किन संगीतकारों के साथ आपने काम किया है?

लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ फ़िल्म 'भैरवी' में काम किया, एक और फ़िल्म थी उनके साथ जो बनी नहीं। भूपेन हज़ारिका के साथ NFDC की एक फ़िल्म 'कस्तूरी' में गीत लिखा। दान सिंह के साथ भी काम किया है। जगजीत सिंह के साथ भी काम किया है, दूरदर्शन का एक सीरियल था, जलाल आग़ा साहब का, उसमें। अनु मलिक की 2-3 फ़िल्मों में गीत लिखे, रघुनाथ सेठ के साथ 1-2 फ़िल्मों में। इस तरह से कई संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला।



अमित जी, कई नए कलाकार आप ही के लिखे गीत गा कर फ़िल्म-जगत में उतरे थे, उनके बारे में बताइए।

अलका याग्निक ने अपना पहला गीत 'हमारी बहू अलका' में गाया था जिसे मैंने लिखा था। उदित नारायण ने भी अपना पहला गीत रफ़ी साहब के साथ 'उन्नीस बीस' फ़िल्म में गाया था जो मेरा लिखा हुआ था। शरण प्रभाकर, सलमा आग़ा ने मेरे ग़ैर फ़िल्मी गीत गाए। पिनाज़ मसानी का पहला फ़िल्मी गीत मेरा ही लिखा हुआ था। शंकर महादेवन ने पहली बार एक टीवी सीरियल में गाया था मेरे लिए। सुनीता राव भी टीवी सीरियल से आई हैं। फिर शारंग देव, जो पंडित जसराज के बेटे हैं, उनके साथ मैंने 2-3 फ़िल्मों में काम किया।



जी हाँ, फ़िल्म 'शेष' में आप प्रोड्यूसर, डिरेक्टर, गीतकार, कहानीकार, पटकथा, संवाद-लेखक सभी कुछ थे और संगीत दिया था शारंग देव ने।

फिर इलैयाराजा के लिए भी गीत लिखे। गायकों में किशोर कुमार ने सबसे ज़्यादा मेरे गीत गाये, रफ़ी साहब नें कुछ 8-10 गीत गाये होंगे। लता जी, आशा जी, मन्ना डे साहब, और मुकेश जी ने भी मेरे दो गीत गाये हैं, दोनों डुएट्स थे, एक बप्पी लाहिड़ी के लिए, एक राजेश रोशन के लिए। इनके अलावा अमित कुमार, शैलेन्द्र सिंह, कविता कृष्णमूर्ति, अलका, अनुराधा, उषा उथुप ने मेरे गीत गाये हैं। भीमसेन जोशी जी के बेटे के साथ मैंने एक ऐल्बम किया है। नॉन-फ़िल्म में नाज़िया हसन और बिद्दू ने मेरे कई गीत गाए हैं। मंगेशकर परिवार के सभी कलाकारों ने मेरे ग़ैर-फ़िल्मी गीत गाए हैं। मीना मंगेशकर का भी एक ऐल्बम था मेरे लिखे हुए गीतों का। मीना जी ने उसमें संगीत भी दिया था, वर्षा ने गीत गाया था।



अमित जी, ये तो थीं बातें आपके फ़िल्मी गीतकार की, अब मैं जानना चाहूँगा 'प्लस चैनल' के बारे में।

'प्लस चैनल' हमने 1990 में शुरु की थी पार्टनर्शिप में, जिसने मनोरंजन उद्योग में क्रान्ति ला दी। उस समय ऐसी कोई संस्था नहीं थी टीवी प्रोग्रामिंग की। महेश भट्ट भी 'प्लस चैनल' में शामिल थे। हमनें कुछ 10 फ़ीचर फ़िल्मों और 3000 घंटों से उपर टीवी प्रोग्रामिंग और 1000 म्युज़िक ऐल्बम्स बनाए। 'बिज़नेस न्यूज़', 'ई-न्यूज़' हमने शुरु की थी। पहला म्युज़िक विडियो हमने ही बनाया, नाज़िया हसन को लेकर।



'प्लस चैनल' तो काफ़ी कामयाब रहा, पर आपने इसे बन्द क्यों कर दिया?

रिलायन्स में आने के बाद बन्द कर दिया।



क्या आपने गीत लिखना भी छोड़ दिया है?

जी हाँ, अब बस मैं नए लोगों को सिखाता हूँ, मेन्टरिंग का काम करता हूँ। रिलायन्स एन्टरटेन्मेण्ट का चेयरमैन हूँ, सलाहकार हूँ, बच्चों को सिखाता हूँ।



अच्छा अमित जी, चलते चलते अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए।

मैं अकेला हूँ, मैंने शादी नहीं की।



अच्छा अच्छा। फिर तो 'मनपसन्द' का गीत "मैं अकेला अपनी धुन में मगन, ज़िन्दगी का मज़ा लिए जा रहा था" गीत आपकी ज़िन्दगी से भी कहीं न कहीं मिलता-जुलता रहा होगा। ख़ैर, अमित जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका, इतनी व्यस्तता के बावजूद आपने हमें समय दिया, फिर कभी सम्भव हुआ तो आपसे दुबारा विस्तार से बातचीत होगी। बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

धन्यवाद!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Tuesday, January 6, 2009

लक्ष्य छोटे हों या बड़े, पूरे होने चाहिए- शैलेश भारतवासी

डैलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो चैनल 'रेडियो सलाम नमस्ते' को दिये गये अपने साक्षात्कार में हिन्द-युग्म के संस्थापक-नियंत्रक शैलेश भारतवासी ने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह चाहे छोटे लक्ष्य बनायें या बड़े लक्ष्य बनाये, उसे पूरा करे। शैलेश रेडियो सलाम नमस्ते के हिन्दी कविता को समर्पित साप्ताहिक कार्यक्रम 'कवितांजलि' के २१ दिसम्बर के कार्यक्रम में टेलीफोनिक इंटरव्यू दे रहे थे। हमें वह रिकॉर्डिंग प्राप्त हो गई है। आप भी सुनें, शैलेश की बातें और उसके बाद रेडियो सलाम नमस्ते के श्रोताओं की बातें।




आदित्य प्रकाश
यह कार्यक्रम डैलास, अमेरिका में ही वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत हिन्दी सेवी आदित्य प्रकाश सिंह द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। आदित्य प्रकाश की आवाज़ सुनकर हर एक हिन्दी प्रेमी को हिन्दी के लिए कुछ कर गुजरने की ऊर्जा मिलती है। आदित्य प्रकाश सिंह अपने खर्चे से दुनिया भर के हिन्दी कर्मियों को अपने कवितांजलि कार्यक्रम से जोड़ते हैं। यहाँ तक कि स्टूडियो तक आने-जाने का खर्च भी ये ही उठाते हैं। मूल रूप से भारत में बिहार के रहनेवाले आदित्य प्रकाश कविताओं के शौक़ीन तो हैं ही, खुद एक कवि भी हैं। कभी इनके बारे में हम आवाज़ पर विस्तार से बातें करेंगे।

Monday, September 8, 2008

वह कभी पीछे मुडकर नहीं देखती, इसीलिए वह आशा है

सजय पटेल ने दो बरस पहले ख्यात गायिका आशा भोंसले से उनके जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले बात की थी.उसी गुफ़्तगू की ज़ुगाली आज आवाज़ पर....

संघर्ष हर एक के जीवन में हमेशा ही रहता है, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर देखना नहीं सीखा और शायद इसीलिए वह सिर्फ़ नाम की आशा नहीं, ज़िंदगी का वो फ़लसफ़ा हैं जिसमें "निराशा' शब्द के लिए कोई जगह नहीं। वह वैसा फूल भी नहीं हैं जिसे कल मुरझाना है, वह ऐसी ख़ुशबू हैं जिसकी महक में उल्लास है, ख़ुशी है, ज़ज़्बा है।ये सारे शब्द उस आवाज़ के लिये यहाँ झरे हैं, जो साठ बरसों से मादकता, मदहोशी और मुस्कान का मीठा सिलसिला पेश करती आई हैं, आशा भोंसले।

दो बरस पहले टेलीफ़ोन पर उनसे जब चर्चा हुई थी तब आशाजी ने कहा- जीवन ताल और लय में होना ज़रूरी है। सुर उतरा तो चढ़ जाएगा, लेकिन ताल बिगड़ी तो समझिए संगीत का समॉं ही बिगड़ गया। मनुष्य के लिए "चाल-ढाल और गाने वालों के लिए ताल' बहुत ज़रूरी है। मैंने न जाने कितने संगीतकारों के साथ काम किया तो उसे अपना एक विनम्र कर्तव्य माना। कभी काम करके थकान नहीं महसूस की मैंने। मानकर चली कि संगीत का काम भी एक इबादत है, उसे तो करना ही है।

बातचीत में ज़ेहन में उनके सैकड़ों गीत उभरे लेकिन मैंने उनसे दो ख़ास प्रोजेक्ट की चर्चा की। एक उस्ताद अली अकबर ख़ॉं के साथ किए शास्त्रीय संगीत के एलबम की और दूसरे ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली द्वारा रचे गए ग़ज़लों के एलबम की। आशाजी ने बताया कि उस्ताद अली अकबर ख़ॉं साहब अपने एलबम के लिए क्लासिकल मौसिक़ी के कई बड़े नाम आज़मा चुके थे। लेकिन बात इसलिए नहीं बन रही थी कि वो जो चाहते वह बनता नहीं। गाने वाला अपना रंग उसमें उड़ेल देता। मैं ठहरी "प्लेबैक सिंगर' सो जैसा उन्होंने बताया, मैंने गाया। उनका सबसे बढ़िया कॉम्प्लीमेंट मेरे लिए यह था कि आशाबाई आपने बाबा के संगीत को पुनर्जीवित कर दिया। न जाने कौन-कौन से कैसे-कैसे क्लिष्टतम राग और बंदिशें थीं उसमें। लेकिन बस पन्द्रह दिन ख़ॉं साहब के साथ बैठी और रिकॉर्ड कर दिया। ग़ुलाम अली साहब के साथ भी पहले गाने में घबरा रही थी, पर मेरी बेटी वर्षा ने कहा - आप कीजिए। रात को एक कम्पोज़िशन गाकर सोई और सुबह दिमाग़ में धुन मुकम्मिल हो गई। बस बाकी तो आप संगीतप्रेमी जानते ही हैं कि वह एलबम लोगों को कितना पसंद आया।

जन्मदिन बिताने की तैयारी क्या है, पूछने पर उन्होंने कहा - अब जन्मदिन या जीवन की सारी ख़ुशियॉं मैं अपने नाती-पोतों में तलाशती हूँ। यह पूछने पर कि क्या यह कहना बेहतर होगा कि भारत में पॉप की साम्राज्ञी आप हैं, तो आशाजी ने ठहाके के साथ कहा कि मैंने अण्णा (संगीतकार सी.रामचंद्र) के साथ "इना मीना डीका' गाया था। वहॉं से पॉप को एक नई पहचान मिली। अब "रंग रंग रंगीला' तक सारा सिलसिला पॉप और मस्ती का ही तो है। उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में कहा- लोगों के जीवन में जैसे "पाप' है वैसे ही मेरे जीवन में "पॉप' है।आशा जी बोले जा रहीं थीं और मेरे दिलों-दिमाग़ में सुरों का समंदर उमड़ता आ रहा था. यक़ीन जाने लें मुझ जैसे कानसेन के लिये इस सुरगंध से बतियाना लगभग एक क़िस्म से हिप्नॉटाइज़ हो जाने जैसा था.



आशा जी ने बताया कि लता मंगेशकर की छोटी बहन होना हमेशा से फ़ख़्र का विषय रहा है और हमने हमेशा एक व्यावसायिक अनुशासन को क़ायम रखा है. वे (दीदी)हमेशा एक महान गुलूकारा रहीं है और न जाने कितने गायक-गायिकाओं ने उनसे प्रेरणा ली है तो मेरे लिये तो वे बड़ी बहन और एक प्यारी सखी रहीं हैं.आशाजी ठीक कहतीं हैं.और बुरा न मानें जब भी कोई इन दो स्वर-महारानियों में तुलता करता है तो मुझे बेहद अफ़सोस होता है. देखा जाए तो दोनों एक तरह एक ध्वनि-मुद्रिका दो साइड हैं.बताइये कैसे करें तुलना. एक तरफ़ कोई गीत अधिक अच्छा है , दूसरी तरफ़ कोई दूसरा अच्छा.

आशा भोंसले गायकी में विविधता का दूसरा नाम है. ज़रा ग़ौर फ़रमाइये इस छोटी सी फ़ेहरिस्त पर : अब के बरस भेज भैया को बाबुल,रंग,रंग,रंगीला,दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये,दम मारो दम,आगे भी जाने न तू,पीछे भी जाने तू, जो भी है बस वही एक पल है,चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया,सुन सुन दीदी तेरे लिये एक रिश्ता आया है;कितनी विविधता है इन गीतों के मूड में और यहीं आकर आशाजी अपवाद हो जातीं है.वे वैरायटी का सरमाया हैं.

आशा भोंसले अपनी निजी ज़िन्दगी में बहुत टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़रीं हैं,लेकिन अपने नाम की तरह उन्होंने अपने आप को साबित किया है.समय की अदला-बदली चलती रहेगी,तहज़ीब छुपा-छाई खेलती रहेगी,ज़ुबान के तेवर बदलेंगें लेकिन आशा भोंसले हर दौर में प्रासंगिक होंगी.इस सर्वकालिक महान गायिका को ज़िन्दगी की पिचहत्तरवीं पायदान पर हम सब संगीतपेमियों का प्रेमल सलाम !

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(चित्र में आशा जी एक कंसर्ट में गाती हुईं, संगीत दे रहे हैं, मरहूम संगीतकार और पति आर डी बर्मन साहब)
चित्र साभार - हमाराफोटोस

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