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Sunday, May 21, 2017

राग कल्याण : SWARGOSHTHI – 318 : RAG KALYAN




स्वरगोष्ठी – 318 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 4 : राग कल्याण में गजल

राग कल्याण अथवा यमन में उस्ताद राशिद खाँ से खयाल और सुधा मल्होत्रा से गजल सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हमने 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाबर’ की एक गजल चुना है, जिसे रोशन ने राग कल्याण अथवा यमन के स्वरों में पिरोया है। यह गीत सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही इसी राग में निबद्ध एक खयाल सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



सुधा मल्होत्रा
ता मंगेशकर, अनेक संगीतकारों के साथ-साथ रोशन की भी प्रिय गायिका रही हैं। इसी प्रकार रोशन भी लता मंगेशकर के प्रिय संगीतकार थे। इस श्रृंखला की शुरुआती तीन कड़ियों में हमने आपको छठे दशक के आरम्भिक दौर की रोशन के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर के तीन गीत लगातार सुनवाए हैं। लता मंगेशकर की पारखी संगीत दृष्टि ने बहुत पहले ही रोशन की प्रतिभा को पहचान लिया था। रोशन को लता मंगेशकर का साथ हमेशा मिलता रहा। रोशन की शुरुआती दौर की कई फिल्में व्यावसायिक दृष्टि से असफल हो जाने के बावजूद जब लता मंगेशकर ने स्वयं अपनी निर्माण संस्था की फिल्म ‘भैरवी’ की घोषणा की तो उस फिल्म के संगीत निर्देशक रोशन ही थे। रोशन के लिए यह एक ऐसा सम्मान था, जिसको पाने के लिए उस समय के कई सफल संगीतकार लालायित थे। लता मंगेशकर द्वारा संगीतकारों के एक बड़े समूह में से किसे चुना जाएगा, इस अटकल का निदान करते हुए रोशन का चुना जाना वास्तव में यह सिद्ध करता है कि उनको रोशन की संगीत प्रतिभा पर कितना भरोसा था। 50 के दशक में रोशन ने लता मंगेशकर के स्वर में अनेक लोकप्रिय गीत स्वरबद्ध किये। इस दशक में रोशन ने पाश्चात्य संगीत, लोक संगीत और राग आधारित गीतों के साथ-साथ कव्वाली स्वरबद्ध करनी भी शुरू कर दी थी। आगे चल कर उन्हें कव्वालियों का विशेषज्ञ माना गया था। 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘अजी बस शुक्रिया’ में लता मंगेशकर के गाये गीतों के माध्यम से रोशन ने रचनात्मकता के साथ-साथ लोकप्रियता के शिखर को स्पर्श कर लिया था। इस फिल्म में रोशन का स्वरबद्ध किया गीत –“सारी सारी रात तेरी याद सताए...” लोकप्रियता के मानक स्थापित करता है। दशक के अन्त तक आते-आते सफलता रोशन के कदम चूमने लगी थी। 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाबर’ में एक से बढ़ कर एक राग आधारित गीत शामिल थे। आज के अंक में हमने इसी फिल्म का एक गीत चुना है। फिल्म ‘बाबर’ में ही रोशन ने मोहम्मद रफी, मन्ना डे, सुधा मल्होत्रा, आशा भोसले और साथियों की आवाज़ में एक कव्वाली –“हसीनों के जलवे परेशान रहते...” स्वरबद्ध कर अपनी क्षमता का परिचय भी दिया था। इसी फिल्म में राग शिवरंजनी पर आधारित मोहम्मद रफी की आवाज़ में गीत –“तुम एक बार मुहब्बत का इम्तिहान तो लो...” अपनी सरल धुन के कारण खूब लोकप्रिय हुआ था। फिल्म ‘बाबर’ में ही गायिका सुधा मलहोत्रा के स्वर में राग खमाज पर आधारित गीत –“पयाम-ए-इश्क़ मुहब्बत हमें पसन्द नहीं...” और राग यमन का स्पर्श करते गीत –“सलाम-ए-हसरत कबूल कर लो...” शामिल था। सुधा मल्होत्रा ने यह दोनों गीत अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से गाया है। इसी फिल्म में रोशन का साथ गीतकार साहिर लुधियानवी से हुआ थ। आगे चल कर इस जोड़ी ने अनेक लोकप्रिय गीतों को जन्म दिया था। अब आप साहिर लुधियानवी का लिखा, राग यमन के स्वरो को आधार बना कर रोशन का स्वरबद्ध किया और सुधा मल्होत्रा का गाया फिल्म ‘बाबर’ का गीत सुनिए।

राग कल्याण अथवा यमन : “सलाम-ए-हसरत कबूल कर लो...” : सुधा मल्होत्रा : फिल्म – बाबर



उस्ताद राशिद खाँ
राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का ही आश्रय राग है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग कल्याण अथवा यमन का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला, अर्थात रात्रि के पहले प्रहर का पूर्वार्द्ध काल होता है। इस राग का प्राचीन नाम कल्याण ही मिलता है। मुगल काल में राग का नाम यमन प्रचलित हुआ। वर्तमान में इसका दोनों नाम, कल्याण और यमन, प्रचलित है। यह दोनों नाम एक ही राग के सूचक हैं, किन्तु जब हम ‘यमन कल्याण’ कहते हैं तो यह एक अन्य राग का सूचक हो जाता है। राग यमन कल्याण, राग कल्याण अथवा यमन से भिन्न है। इसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है, जबकि यमन में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। राग कल्याण अथवा यमन के चलन में अधिकतर मन्द्र सप्तक के निषाद से आरम्भ होता है और जब तीव्र मध्यम से तार सप्तक की ओर बढ़ते हैं तब पंचम स्वर को छोड़ देते हैं। राग कल्याण के कुछ प्रचलित प्रकार हैं; पूरिया कल्याण, शुद्ध कल्याण, जैत कल्याण आदि। राग कल्याण गंभीर प्रकृति का राग है। इसमे ध्रुपद, खयाल तराना तथा वाद्य संगीत पर मसीतखानी और रजाखानी गतें प्रस्तुत की जाती हैं। राग की यथार्थ प्रकृति और स्वरूप का उदाहरण देने के लिए अब हम आपको इस राग की एक श्रृंगारपरक् बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के विश्वविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ हैं। आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कल्याण अथवा यमन : ‘ऐसो सुगढ़ सुगढ़वा बालमा...’ : उस्ताद राशिद खान




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 318वें अंक की पहेली में आज हम आपको संगीतकार रोशन द्वारा स्वरबद्ध सातवें दशक के आरम्भिक दौर की एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 27 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 320वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 316वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ के एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – भीमपलासी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित रोशन के एक गीत और राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, June 30, 2013

विदुषी मीता पण्डित से सुनिए राम-सिया की होली



स्वरगोष्ठी – 126 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 6

राग काफी पर आधारित गीत- ‘कासे कहूँ मन की बात...’

  
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ की इस छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जो आधी शताब्दी से भी अधिक अवधि बीत जाने के बावजूद सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। ये गीत सदाबहार तो हैं, परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का उद्देश्य ही यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम कुछ भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपको राग काफी पर आधारित एक मधुर फिल्मी गीत सुनवाएँगे और इस गीत के संगीतकार एन. दत्ता का स्मरण करेंगे। इसके साथ ही सुप्रसिद्ध युवा गायिका विदुषी मीता पण्डित से इसी राग में निबद्ध रस से भरी एक होरी भी सुनेगे।


एन. दत्ता
1959 में बी.आर. चोपड़ा की सफलतम फिल्म ‘धूल का फूल’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के गीत अपनी सरलता और मधुरता के बल पर बेहद लोकप्रिय हुए थे। एन. दत्ता अर्थात दत्ता नाईक इस फिल्म के संगीतकार थे। फिल्म जगत के यशस्वी गीतकार साहिर लुधियानवी के अर्थपूर्ण शब्दों को मधुर धुनों में पिरोने वाले संगीतकारों में रोशन, खय्याम और रवि के साथ एन. दत्ता का नाम लिया जाना आवश्यक है। फिल्मों में पदार्पण से पहले एन. दत्ता ने मुम्बई के देवधर संगीत विद्यालय से संगीत की विधिवत शिक्षा भी ग्रहण की थी। इसके उपरान्त कुछ समय तक फिल्म संगीत का व्यावहारिक प्रशिक्षण पाने के उद्देश्य से संगीतकार गुलाम हैदर और सचिनदेव बर्मन के सहायक के रूप में भी कार्य किया था। स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर उन्हें 1955 में प्रदर्शित दो फिल्मों, ‘मिलाप’ और ‘मैरीन ड्राइव’ में मिला। यह एन. दत्ता का सौभाग्य था कि आरम्भ में ही उन्हें बड़े बैनर की अर्थात राज खोसला की ‘मिलाप’ और जी.पी. सिप्पी की ‘मैरीन ड्राइव’ जैसी फिल्में मिली। इसके अलावा आरम्भ से ही उन्हें सुविख्यात शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी का साथ मिला। आगे चल कर साहिर और दत्ता की जोड़ी ने फिल्म संगीत के भण्डार को अनेक मधुर गीतों से समृद्ध किया।

सुधा मल्होत्रा
आरम्भिक दो फिल्मों के बाद एन. दत्ता ने 1956 में ‘चन्द्रकान्ता’, 1957 में ‘मोहिनी’, 1958 में ‘मिस्टर एक्स’ जैसी फिल्मों को विविधतापूर्ण संगीत से सँवारा। इस दौर में फिल्में बेशक बहुत सफल न रहीं, किन्तु दत्ता के संगीत का जादू खूब चला। वर्ष 1958 में दत्ता को बी.आर. चोपड़ा ने अपनी फिल्म ‘साधना’ के संगीत निर्देशन का प्रस्ताव दिया। यह फिल्म खूब चली और दत्ता का संगीत भी। इस फिल्म के कई गीतों में उन्होने रागों का स्पर्श भी किया था। फिल्म ‘साधना’ के स्तरीय संगीत से प्रभावित होकर बी.आर. चोपड़ा ने अपनी अगली फिल्म ‘धूल का फूल’ के संगीत का दायित्व भी दत्ता को सौंपा। इस फिल्म का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था। लोकप्रियता की दृष्टि से इस फिल्म के कई गीत सफल थे किन्तु राग के आधार की दृष्टि से इस फिल्म का ही नहीं, बल्कि अपने दौर का सर्वाधिक सफल गीत था- ‘कासे कहूँ मन की बात...’। इस गीत को दत्ता ने राग काफी के स्वरों का स्पष्ट आधार दिया था। गीत में सितार का अनूठा प्रयोग किया गया है। आरम्भ में राग काफी के स्वरों में छोटा सा आलाप और सरगम तथा अन्त में द्रुत तीनताल में मोहक गत के रूप में सितार का प्रयोग गीत का मुख्य आकर्षण है। यह गीत नृत्य पर फिल्माया गया है। नृत्यांगना हैं नाज़ और परदे पर सितार वादिका की भूमिका में अभिनेत्री पूर्णिमा हैं। दत्ता ने इस गीत में ठुमरी अंग का स्पर्श किया है। साहिर लुधियानवी की पारम्परिक ठुमरी जैसी शब्दावली, राग काफी के स्वरों की चाशनी में पगी इसकी धुन और गायिका सुधा मल्होत्रा की उदात्त आवाज़ इस गीत को कालजयी बना देता है। आइए, पहले हम सब इस गीत को सुनते हैं।


राग - काफी : फिल्म - धूल का फूल : ‘कासे कहूँ मन की बात...’ : संगीत – एन. दत्ता



मीता पण्डित
आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है। आइए अब हम आपका साक्षात्कार राग काफी के एक अलग रंग से कराते हैं। विदुषी मीता पण्डित ग्वालियर परम्परा की जानी-मानी युवा गायिका हैं। उन्होने राग काफी के स्वरों में एक होरी प्रस्तुत की है। राधा-कृष्ण की होली तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, किन्तु मीता जी ने अपनी इस प्रस्तुति में राम और सीता की होली के दृश्य उपस्थित किया है। आप राग काफी की इस होरी का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 


राग काफी होरी : ‘राम सिया फाग मचावत...’ : विदुषी मीता पण्डित




आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 126वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक बन्दिश का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत रचना के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – इस संगीत रचना के ताल का नाम भी बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 128वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 124वें अंक की पहेली में हमने आपको उस्ताद सुल्तान खाँ की बजाई सारंगी पर आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कल्याण अथवा यमन और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य सारंगी। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के आगामी अंक में हम एक और लोकप्रिय राग पर आधारित एक सदाबहार फिल्मी गीत, इसके विस्मृत संगीतकार और इसी राग में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में इस श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
 

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