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Saturday, September 13, 2014

अनजान की पुण्यतिथि पर बेटे समीर की बाल्य-स्मृति



स्मृतियों के स्वर - 09




अनजान की पुण्यतिथि पर बेटे समीर की बाल्य-स्मृति





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज 13 सितंबर है। आज ही के दिन गीतकार अंजान इस दुनिया को छोड़ गये थे। उनके बेटे और इस दौर के गीतकार समीर की स्मृति में कैसे थे पिता अंजान, आइये आज के इस अंक में हम जाने...




सूत्र: सरगम के सितारे - अंजान की कहानी समीर की ज़ुबानी (विविध भारती)


समीर
"बात यह है कि जब मैं पैदा हुआ, वो (अनजान) तब बम्बई आ गये थे। इसलिए बचपन में मेरी और उनकी बहुत ज़्यादा मुलाक़ातें नहीं हो पायी। मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई जब मैं 8 या 9 साल का था। वह रिश्ता जो डेवलप होता है, अजीब तरह से पनपता है, अजीब तरह से बड़ा होता है। पहली बार जब मैंने उनको देखा तो मुझे अच्छा लगा कि मैंने अच्छे आदमी को देखा और जब मैं उनके पास गया तो मुझे अच्छी तरह याद है कि उन्होंने मुझे गोद में लिया और मेरे सर पे हाथ रखा और दुआ दी मुझे, और कहा कि क्या करते हो? तो मैं शर्माके भाग गया, मैं यह भी नहीं कहा कि मैं पढ़ता हूँ। मुझे कुछ अजीब सा लगा, गाँव के बच्चे हुआ करते थे कि कोई सवाल करे तो शर्माके भाग जाते थे। उसके बाद जो दूसरी मुलाक़ात हुई उनसे वह भी तकरीबन 8 या 9 साल के बाद हुई। मुझे लगता है कि बचपन से और जवानी की दहलीज़ तक मेरी उनसे मुलाक़ात मुश्किल से 2 या 3 बार ही हुई। अब आप समझ सकते हो कि पिता और पुत्र का जो यह रिश्ता था और दोनो के दर्मियाँ जो एक रिश्ता होना चाहिये, वह कितना अजनबीयत लिए हुए था और कितना डिस्टैन्स लिए हुए था।

यह मैं जानता था कि पापा गीतकार हैं, मगर गीतकार किसे कहते हैं यह मुझे पता नहीं था। हमारे यहाँ, मुझे याद है कि हमारे दादाजी को जब लोग पूछते थे कि आपका बेटा क्या करता है, तो वो कहते थे कि फ़िल्म में गाने लिखता है। हमारे गाँव में यह पापुलर कहावत थी कि नचनिया पगनिया। वो कहते थे कि एक गीतकार को नचनिया पगनिया कहने का मतलब समझ में नहीं आया। बड़े गिरे स्तर का काम करना जिसे कहते हैं, ऐसा लोग मानते थे। पहले फ़िल्मों में काम करने को लोग अच्छा नहीं समझते थे, उनको लगता था कि कहीं जाकर गाने लिखते हैं मेरे पिताजी। और जब मैं बड़ा हुआ और समझने लगा और जब मेरी पहली बार मैंने उनका गाना सुना, मुझे याद है वह गाना, एक तो 'गोदान' के गाने, उसके बाद जो 'गोलकोन्डा के क़ैदी' जो फ़िल्म उन्होंने की थी, उसका गाना, फिर 'लम्बे हाथ' का वह गाना जो, पूरी तरह से अगर मैं कहूँ जो मुझे याद है, वह गाना था "प्यार की राह दिखा दुनिया को, रोके जो नफ़रत की आंधी"। यह गाना मुझे पूरी-पूरी तरह से याद आती है और यह गाना कई बार मैंने बचपन में सुना। मगर यह तमाम गाने कभी आते थे, सालों गुज़र जाये मगर सुनाई नहीं पड़ते थे। और बाक़ी गीतकारों के बहुत सारे गाने आते-जाते रहते थे। तो मुझे ऐसा लगा कि पापा कैसे गाने लिखते हैं कि एक बार सुना तो फिर कई साल तक सुनाई नहीं पड़ते। फिर वह फ़िल्म आयी जिसका मैं कहूँ कि गाना मैंने बहुत बार सुना, तब जाके लगा कि सही मायने में पिताजी एक गीतकार हैं और उन्होंने एक अच्छी फ़िल्म लिखी है। और उस फ़िल्म का नाम था 'बंधन' और गाना था "बिना बदरा के बिजुरिया कैसी चमकी"। और उसके बाद मुझे जहाँ तक याद है, धीरे धीरे उनके बाद जो फ़िल्में आयीं, 'अपने रंग हज़ार', 'डॉन', 'मुक़द्दर का सिकन्दर', ऐसी फ़िल्में।

अंजान
बताना ज़रूरी है कि कितना गर्व का बोध होता था मुझे अपने पिता के बारे में सबको बताते हुए। एक अजीब सी कहानी सुनाऊँगा, एक बहुत मज़ेदार कहानी है कि एक बार स्कूल में मुझसे किसी ने पूछा कि तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं? मैंने बोला कि वो गीतकार हैं। पहले तो उसको गीतकार का मतलब ही नहीं समझ में आया। तो बोला कि यह क्या काम होता है? मैंने बोला कि गाने लिखते हैं। तो बोले 'अच्छा अच्छा, कवि हैं'। यह गीतकार क्या होता है, यह मुझे भी नहीं मालूम था। तो एक बात मैंने ध्यान में रख ली कि जब भी बोलूँगा तो यह कि मेरे पिताजी कवि हैं, गीतकार कहूँ तो कोई समझता ही नहीं कि गीतकार क्या होता है। गर्व की बात करते हो तुम तो मैं यह कहूँगा कि जब मैं लोगों से जाके कहता था कि पिताजी गीतकार अंजान हैं तो हँसने लगते थे, कि यह आदमी पागल है, तुम्हारे पिताजी और गीतकार अंजान? हो ही नहीं सकता। क्यों कि हम लोग एक बहुत ही मध्यम श्रेणी के परिवार में रहते थे, ग़रीबी का एक दौर देखा था, और पापा का नाम बहुत बड़ा हो गया था। तो पापा ने कहा कि तुम अपनी बात तो छोड़ो, मैं, जब मीडिया नहीं था, एक्सप्लॉएटेशन नहीं थी, पापा जब जाके कहते थे कि मैं गीतकार अंजान हूँ, बहुत लोगों को संदेह होता था कि यह आदमी कोई और है। आदमी का नाम जो है, उसकी शख़्सियत से बड़ा हो जाता है। जैसे कि अभी मीडिया है, हमको एक्सपोज़र मिलता है, पहचानते हैं, वरना अगर मैं किसी से कहूँ, रास्ते में चलते हुए किसी से कहूँ कि मैं गीतकार समीर हूँ, तो लोगों को लगता है कि यह समीर नहीं हो सकता, क्योंकि उनको समीर नाम से बहुत सारी चीज़ें जुड़ी नज़र आती हैं - मरसीडीस होनी चाहिये, दो-चार लोग आगे-पीछे होने चाहिये, बॉडी-गार्ड होने चाहिए - तब जाकर उनको लगता है कि यह कोई सक्सेसफ़ुल आदमी है, पापुलर है। फिर ऐसा एक दौर आया कि मैंणे उनका नाम ही बताना बन्द कर दिया। भाई यह तो बड़ी अजीब सी बात होती है कि मैं कहता हूँ कि मैं अंजान का बेटा हूँ और सामने वाला उसको यकीन करने के लिए तैयार नहीं है तो बहतर है कि मैं बताऊँ ही नहीं कि मैं गीतकार अंजान का बेटा हूँ। और हर बड़े बाप के बेटे के साथ ऐसी ही स्थिति होती है, बशर्ते यह कि आप बचपन से लेके, जैसा कि मैंने कहा, जवानी तक हमारा उनका सान्निध्य नहीं रहा, हम एक दूसरे के पास नहीं रहे, वो किसी और दुनिया में जीते थे, मैं किसी और दुनिया में जीता था, तो इस दुराव के कारण, दूरी की वजह से हर चीज़ में एक फ़र्क सा होता गया। और इस दूरी की वजह से एक हीनता भी आती थी अन्दर, एक अजीब दौर से हम गुज़रते रहे। फिर भी, ये चीज़ें चलती रहीं, और मैं कहूँ कि इसी वजह से मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ, क्योंकि अगर मुझे वो प्लैटफ़ार्म उस वक़्त मिल गया होता जहाँ पापा थे, बड़ी गाड़ियाँ, बड़ा फ़्लैट, पैसा, सब कुछ अगर मिल गया होता, तो शायद आज मैं गीतकार समीर नहीं बन पाया होता। वह दर्द था कहीं ना कहीं, वह जो हीनता की भावना थी, वह जो दूरी थी, वह जो मिलने की प्यास थी, उन तमाम चीज़ों ने मुझे, तमाम बातों ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया।"


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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Tuesday, August 10, 2010

सलीम-सुलेमान की आशाएँ ढल गई हैं धीमी गति के प्रेरक गीतों में.. साथ हैं प्रीतम और शिराज़ भी

ताज़ा सुर ताल ३०/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को हमारा प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, इसे इत्तेफ़ाक़ ही कहिए या कुछ और, हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में कुछ नायक ऐसे हुए हैं जिनकी फ़िल्मों के गानें हमेशा ही सुपरहिट हुआ करते हैं। जैसे कि राजेश खन्ना की शायद ही कोई फ़िल्म ऐसी होगी जिसके गानें चले ना हों। नए दौर में सलमान ख़ान ऐसे नायक बनें जिनकी फ़िल्मों के गानें बेहद लोकप्रिय होते आए हैं और आज भी होते हैं। ऐसे ही एक और अभिनेता हैं जॊन एब्राहम जिनकी फ़िल्मों का संगीत भी चलता आया है, फिर चाहे फ़िल्म चले या ना चले।

विश्व दीपक - 'जिस्म', 'साया', 'धूम', 'सलाम-ए-इश्क़', 'काल', 'गरम मसाला', 'दोस्ताना', 'गोल', 'न्यू यार्क', 'पाप', 'टैक्सी नंबर ९ २ ११', ये सारी जॉन की फ़िल्में संगीत के लिहाज़ से सफल ही मानी जाएंगी। आज हम जॉन की नई फ़िल्म 'आशाएँ' के गानें लेकर उपस्थित हुए हैं, और इन गीतों को सुनने के बाद हमें और आपको मिलकर यह निर्णय लेना है कि क्या जॉन की पिछली सारी फ़िल्मों के संगीत की तरह इस फ़िल्म के संगीत पर भी 'हिट सुपरहिट' की मोहर लगाई जा सकती है या नहीं।

सुजॊय - सब से पहले तो फ़िल्म के शीर्षक की बात करेंगे। परसेप्ट पिक्चर कंपनी के बैनर तले बनी इस फ़िल्म को लिखा व निर्देशित किया है नागेश कुकुनूर ने। अब आप समझ गए होंगे कि हमने फ़िल्म के शीर्षक का ज़िक्र क्यों किया। जी हाँ, नागेश की मशहूर फ़िल्म 'इक़बाल' के मशहूर गीत "आशाएँ खिले दिल की" से इस फ़िल्म का शीर्षक प्रेरित है।

विश्व दीपक - जॉन एब्राहम के अलावा इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं नवोदित अभिनेत्री सोनल सहगल (जो हिमेश भाई के साथ उनकी फ़िल्म रेडियो में भी दिखी थीं), गिरिश कारनाड, फ़रीदा जलाल, आश्विन चितले, अनिता नायर प्रमुख। श्रेयस तलपडे का भी एक गेस्ट अपीयरेन्स है फ़िल्म में। पॉण्डिचेरी और हैदराबाद के लोकेशन्स पर फ़िल्माये गये इस फ़िल्म के लिए जॉन को १६ किलो का वज़न कम करना पड़ा है ऐसा सुनने में आया है। ये तो थे फ़िल्म से जुड़े कुछ तथ्य, आइए अब गीतों का सिलसिला शुरु किया जाए। फ़िल्म में कुल ८ गीत हैं और ५ रीमिक्स ट्रैक्स।

सुजॊय - 'स्ट्राइकर' और 'राजनीति' की तरह 'आशाएँ' में भी एकाधिक संगीतकार हैं, मुख्य संगीतकार हैं सलीम-सुलेमान, जिन्होंने फ़िल्म का पार्श्व संगीत भी तय्यार किया है। और जो दूसरे संगीतकार हैं, वो हैं प्रीतम (२ गीत) और शिराज़ उप्पल (१ गीत)। गीतकार हैं मीर अली हुसैन, समीर, कुमार और शक़ील सोहैल। तो आइए सुनते हैं पहला गीत नीरज श्रीधर की आवाज़ में। नीरज का नाम देख कर आप समझ ही गए होंगे कि इसके संगीतकार हैं प्रीतम। इस गीत को समीर ने लिखा है।

गीत - मेरा जीना है क्या


विश्व दीपक - नीरज श्रीधर और प्रीतम की जोड़ी जिस तरह के गानें हमें देती आई है आज तक (हरे राम हरे राम, प्रेम की नैय्या, तुम मिले, वगेरह), उससे कुछ अलग हट के है यह गीत। गीत शुरु होता है नर्मोनाज़ुक अंदाज़ में, लेकिन बाद में रॉक शैली आ जाती है। नीरज की आवाज़ अच्छी बैठी है इस गीत में लेकिन यह गीत तो के.के वाला गीत है बिल्कुल। आजकल इस गीत को ख़ूब टीवी पर दिखाया जा रहा है फ़िल्म के प्रोमो में। और नीरज और उस प्रोमो में प्रीतम भी नज़र आ रहे हैं रॉक सिंगर्स की तरह।

सुजॊय - मुझे यह गीत अच्छा ही लगा, लेकिन मेरा भी ख़याल है कि के.के की आवाज़ में गीत और ज़्यादा खुल कर सामने आता। ख़ैर, नीरज ने भी अच्छा निभाया है। आगे बढ़ते हैं दूसरे गीत की तरफ़, और अब की बार गीतकार कुमार के बोल, प्रीतम का ही संगीत, और इसे गाया है शान और तुलसी कुमार ने। एक सुरीले मेलोडियस युगल गीत की उम्मीद हम ज़रूर रख सकते हैं, क्यों? आइए ख़ुद सुनते हैं और फिर निर्णय लेते हैं।

गीत - दिलकश दिलदार दुनिया


सुजॊय - अनुप्रास अलंकार!!! लेकिन जिस तरह के मेलोडियस नर्मोनाज़ुक रोमांटिक युगल गीत की कल्पना मैंने की थी, वैसा नहीं पाया। मैंने तो सोचा था कि "तेरी ओर" और "ख़ुदा जाने" जैसा कुछ सुनने को मिलेगा। लेकिन इस गीत का अंदाज़ कुछ अलग सा है। शान की आवाज़ भी कुछ बदली हुई-सी लगी। तुल्सी कुमार की आवाज़ में तो मुझे कभी कोई ख़ास बात नज़र नहीं आई। ग़लत अर्थ ना निकालें तो मैं यही कहूँगा कि तुलसी कुमार जैसी आवाज़ और गायकी तो हर रियल्टी शो में सुनने को मिल जाती है। इस आवाज़ में ख़ास बात क्या है कोई मुझे समझाए ज़रा!

विश्व दीपक - इस गीत के बारे में इतना ही कहूँगा कि कम्पोजिशन अच्छा है, बीट बेस्ड सॉंग है, ठीक ठाक गीत है। लेकिन प्रीतम से हम कुछ और बेहतर उम्मीद रखते हैं, ख़ास कर रोमांटिक नर्मोनाज़ुक गीतों में। चलिए अब बढ़ते हैं तीसरे गीत की ओर। प्रीतम के बाद अब है शिराज़ उप्पल की बारी। उन्होंने ना केवल इस गीत को स्वरबद्ध किया है, बल्कि शक़ील सोहैल के लिखे इस गीत को ख़ुद गाया भी है। सुनते हैं "रब्बा"।

गीत - रब्बा


विश्व दीपक - गायक-संगीतकार शिराज़ उप्पल पाक़िस्तान से ताल्लुक़ रखते हैं। गाना तो अच्छा ही बना है, धुन भी अच्छी है, गाया भी ठीक-ठाक है, लेकिन पता नहीं क्यों इस गीत ने कोई आस असर नहीं छोड़ा। बस यही कह सकता हूँ कि "रब्बा ये क्या हुआ"।

सुजॊय - यह शायद इसलिए भी हो सकता है कि शिराज़ की आवाज़ में ऊँचे नोट्स वाले गीत ज़्यादा अच्छे लगते हैं। नीचे सुर के गीतों में उनकी आवाज़ खुल के बाहर नहीं आती। इस गीत के बारे में यही कहूँगा कि शक़ील सोहैल ने अच्छा कलम चलाया है।

विश्व दीपक - अच्छा, हमने तीन गीत सुनें, अब से अगले पाँच गीतों में संगीत सलीम सुलेमान का है और गीतकार हैं मीर अली हुसैन। सुनते हैं इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी की पहली रचना ज़ुबीन की आवाज़ में।

गीत - अब मुझको जीना


सुजॊय - यह आशावादी और प्रेरणादायक गीत था। ज़ुबीन आसाम से ताल्लुक़ रखते हैं और वहाँ पर ख़ूब लोकप्रिय हैं। हिंदी में प्रीतम ने उनसे फ़िल्म 'गैंगस्टर' में "या अली रहम अली" गवाया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस गीत को भी उन्होंने पूरे जोश के साथ गाया है। ज़ोरदार ऑरकेस्ट्रेशन और क़दमों को थिरकाने वाला गीत है। पिछले तीन गीत भी अच्छे थे लेकिन कुछ ना कुछ कमी लग रही थी उनमें। इस गीत को सुन कर एक ताज़गी जैसी आ गई, बहुत ही खुल कर यह गीत आया है और सही में गीत अच्छा है।

विश्व दीपक - इस गीत की शुरुआत में कुछ कुछ 'Summer of 69' जैसा लगा, फिर गीत ने तेज़ गति पकड़ ली और अपनी अलग राह पकड़ कर अपने मुक़ाम तक पहुँच गई। ज़ुबीन गर्ग की आवाज़ में एक अलग कशिश है और भीड़ से अलग सुनाई देती है। उनसे और भी ज़्यादा गानें संगीतकार गवा सकते हैं। 'आशाएँ' फ़िल्म का पाँचवा गीत है शफ़ाक़त अमानत अली की आवाज़ में, "शुक्रिया ज़िंदगी"। आइए गीत सुनते हैं, फिर बात करते हैं।

गीत - शुक्रिया ज़िंदगी


सुजॊय - ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करता हुआ यह गीत सुन कर हम सलीम सुलेमान, मीर अली हुसैन और शफ़ाक़त अमानत अली का शुक्रिया अदा ही कर सकते हैं। "छन के आई तो क्या चांदनी तो मिली" जैसे अन्योक्ति अलंकार में सजकर यह गीत ज़िंदगी के प्रति आशावादी होने की प्रेरणा देती है। मुझे तो यह गीत सुनते हुए फ़िल्म 'सदमा' का वो मशहूर याद गया कि "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले, हमने भी तेरे हर एक ग़म को गले से लगाया है, है न"।

विश्व दीपक - बेहद ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं मीर अली हुसैन ने। मुझे तो लग रहा है कि अच्छे गीतकारों और अच्छे बोल वाले गीतों का ज़माना वापस आ गया है। पिछले कुछ समय से निम्न स्तर के बोल वाले गानें बहुत ही कम हो गए हैं। क्या फ़िल्म संगीत एक बार फिर से करवट ले रहा है?

सुजॊय - काश ऐसा हो जाए, और फ़िल्म संगीत का एक और सुनहरा दौर आ जाए तो मज़ा आ जाए! शफ़ाक़त अमानत अली के बाद अब बारी है श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज़ की। "पल में मिला जहाँ" श्रेया की मधुर आवाज़ में ढलकर बेहद सुरीला सुनाई देता है, आइए सुनते हैं।

गीत - पल में मिला जहां (श्रेया)


विश्व दीपक - श्रेया की नर्म आवाज़ में बिना किसी साज़ के जैसे ही "पल में मिला जहां" शुरु होता है, गीतकार किस ख़ूबसूरती से हर पंक्ति की शुरुआत "पल में" से करके "पल में" पर ही ख़त्म करते हैं, गीत को सुन कर महसूस किया जा सकता है।

पल में मिला जहां, है धुआँ पल में,
पल में यक़ीन था, अब गुमां पल में,
पल में उम्मीद थी, अरमां पल में,
पल में बहार थी, अब ख़िज़ाँ पल में।

सुजॊय - गीत में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, जिस वजह से श्रेया को काफ़ी मेहनत करनी पड़ी होगी क्योंकि पूरा दायित्व उनकी गायकी पर आ गया है। गीत तो निस्संदेह उत्कृष्ठ है, लेकिन देखना यह है कि आज के जेनरेशन के कितने लोगों को इस गीत को पूरा सुनने का धैर्य रहेगा। इसी गीत का एक पुरुष संस्करण भी है शंकर महादेवन की आवाज़ में, आइए लगे हाथ इसे भी सुन लिया जाए।

गीत - पल में मिला जहां (शंकर)


विश्व दीपक - इन दोनों संस्करणों को सुन कर कह पाना मुश्किल है कि कौन सा बेहतर है। शंकर ने ज़्यादा ज़ोर डाल कर गाया है। शंकर एक ऐसे गायक और संगीतकार हैं जिन्हे हर संगीतकार पसंद करते हैं, उनकी गायकी के साथ साथ उनके मीठे स्वभाव के कारण भी। तभी तो दूसरे संगीतकार उनसे समय समय पर गवाते रहते हैं। हाल ही में फ़िल्म 'राजनीति' में "धन धन धरती रे" उन्होंने गाया था।

सुजॊय - और आठवें और अंतिम गीत की बारी जिसे गाया है मोहित चौहान ने। एक और धीमी गति वाला गीत जिसमें है रोमांस, लेकिन गभीरता के साथ। "चला आया प्यार" में परक्युशन का सुंदर इस्तेमाल हुआ है।

विश्व दीपक - तबले का भी सुंदर इस्तेमाल सुनाई देता है। आम तौर पर फ़्युज़न गीतों में गीत देसी होता है, सुर देसी होते हैं और बीट्स विदेशी होते हैं; लेकिन इस गीत में गायकी और गीत की धुन आधुनिक है, लेकिन जो रीदम है उसे तबले की थापों पर शास्त्रीय अंदाज़ में तय्यार किया गया है जिससे एक नवीनता आई है गाने में। सुना जाए...

गीत - चला आया प्यार


इन आठ गीतों को सुन कर हमारी तरफ़ से तो थम्प्स अप है। हाँ, गानें ज़रा धीमी लय के और गहरे शब्दों वाले हैं। आख़िर नागेश कुकुनूर की फ़िल्म है, उसमें कुछ गहरी बातें तो होंगी। अभी हाल ही में इस फ़िल्म की टीम (जॉन, सोनल सहगल और नागेश कुकुनूर) इण्डियन आइडल में गेस्ट बन कर आए थे अपनी इस फ़िल्म को प्रोमोट करने के लिए। उसमें इन लोगों ने कहा कि यह फ़िल्म लीक से हट कर है और कम बजट की फ़िल्म है। लेकिन यह लोगों के दिलों को ज़रूर छूएगी। फ़िल्म के गीतों ने तो हमारे दिल को छुआ है, देखना है कि फ़िल्म किस तरह का कमाल दिखाती है। हमारी तरफ़ से इस फिल्म को लाखों दुआएँ!

ढर्रे के अनुसार हमें यह भी तो बताना होगा कि अगली बार हम किस फिल्म की समीक्षा लेकर हाज़िर होने वाले हैं। तो दोस्तों, अभी हमारे सामने दो फिल्में हैं - "वी और फ़ैमिली" और "दबंग"। अब कौन सी फिल्म किस्मत वाली साबित होगी, यह तो वक़्त हीं बताएगा। हाँ, अगर आप इन दोनों में से किसी एक को खासा-पसंद करते हैं तो टिप्पणी में इसका ज़िक्र जरूर कर दें। हम आपकी राय का पूरा ख्याल रखेंगे। वैसे अंतिम निर्णय तो हमारा है काहे कि हम तो ठहरे दबंग :)

आवाज़ रेटिंग्स: आशाएँ: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८८- ये गुलशन कुमार की सुपुत्री हैं और इस कारण भी संगीत की दुनिया में इनका नाम है। पिछले दिनों आई फिल्म "वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई" में भी इन्होंने एक गाना गाया था। २००९ में रीलिज हुई इनके डेब्यु एलबम का नाम बताईये।

TST ट्रिविया # ८९- नागेश कुकुनूर की उस फ़िल्म का नाम बताएँ जिसमें दोस्ती को समर्पित एक गाना था। वह गाना किसने गाया था?

TST ट्रिविया # ९०- "फ़ना" के गीत "चाँद सिफ़ारिश" की प्रोग्रामिंग किस संगीतकार (संगीतकार बंधुओं) ने की थी? इसी (इन्हीं) की सलाह पर इस गाने में "शुभान-अल्लाह" डाला गया था।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "चरके बोदन चिरबी चकर" का इस्तेमाल हुआ है जो किशोर कुमार ने फ़िल्म 'पड़ोसन' के मशहूर गीत "एक चतुर नार" में किया था।
२. शैल हाडा।
३. "एक तीखी तीखी सी उफ़ करारी से लड़की" (लागा चुनरी में दाग)।

Tuesday, June 22, 2010

बहुत कुछ खत्म होके भी हिमेश भाई और संगीत के दरम्यां कुछ तो बाकी है.. और इसका सबूत है "मिलेंगे मिलेंगे"

ताज़ा सुर ताल २३/२०१०

सुजॊय - सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत है 'ताज़ा सुर ताल' के एक और ताज़े अंक में। इस शुक्रवार वह फ़िल्म आख़िर रिलीज़ हो ही गई जिसकी लोग बड़ी बेसबरी से इंतज़ार कर रहे थे। 'रावण'। अभी दो दिन पहले एक न्यूज़ चैनल पर इस फ़िल्म से संबंधित 'ब्रेकिंग्‍ न्यूज़' का शीर्षक था "मिया पर बीवी हावी"। ग़लत नहीं कहा था उस न्यूज़ चैनल ने। हालाँकि अभिषेक ने अच्छा काम किया है, लेकिन ऐश की अदाकारी की तारीफ़ करनी ही पड़ेगी। देखते हैं फ़िल्म कैसा व्यापार करता है इस पूरे हफ़्ते में।

विश्व दीपक - मैने रावण देखी और मुझे तो बेहद पसंद आई। मैने ना सिर्फ़ इस फिल्म का हिन्दी संस्करण देखा बल्कि इसका तमिल संस्करण (रावणन) भी देखा.. और दुगना आनंद हासिल किया । चलिए 'रावण' से आगे बढ़ते हैं। आज हम इस स्तंभ में जिस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं, वह कई दृष्टि से अनोखा है। पहली बात तो यह कि इस फ़िल्म की मेकिंग बहुत पहले से ही शुरु हो गई थी जब शाहीद और करीना का ब्रेक-अप नहीं हुआ था। तभी तो यह जोड़ी नज़र आएगी इस फ़िल्म में। शायद यही बात फ़िल्म की सफलता का कारण बन जाए, किसे पता! दूसरी बात यह कि इसमें हिमेश रेशम्मिया का संगीत है, लेकिन वैसा संगीत नहीं जैसा कि वो आजकल की फ़िल्मों में दे रहे हैं। मेरा ख़याल है कि इस फ़िल्म के गानें भी बहुत पहले से ही बन चुके होंगे, जिस समय हिमेश अपनी आवाज़ के मुकाबले सोनू निगम, शान, अलका याज्ञ्निक, श्रेया घोषाल जैसे गायकों को ज़्यादा मौका दिया करते थे। इसलिए जिन श्रोताओं को हिमेश की आवाज़ से ऐलर्जी है, वो शायद इस बार इस फ़िल्म के गानें सुनने में दिलचस्पी लें।

सुजॊय - सही कहा आपने। दरसल मुझे जितना पता है, 'मिलेंगे मिलेंगे' आज से पाँच साल पहले प्लान की गई थी, और उस समय हिमेश का स्टाइल कुछ और ही हुआ करता था। इस फ़िल्म के गीतों में सुनने वालों को उस पुराने हिमेश और आज के हिमेश का संगम सुनाई देगा। 'मिलेंगे मिलेंगे' के निर्देशक हैं सतीश कौशिक, जिनके साथ हिमेश ने अपनी सब से बेहतरीन फ़िल्म 'तेरे नाम' में संगीत दिया था। इसके अलावा 'वादा' और 'रन' फ़िल्म में भी ये दोनों साथ में आए थे। और कहने की ज़रूरत नहीं कि इन दो फ़िल्मों के गानें भी चले थे भले ही फ़िल्में फ़्लॊप हुईं थीं। आज इस फ़िल्म के गीतों को सुनते हुए हमें अहसास हो जाएगा कि क्या हिमेश फिर से एक बार पिछले दशक के अपने मेलोडियस गीतों की तरह इस फ़िल्म में भी वैसा ही कुछ संगीत दे पाएँ हैं! 'तेरे नाम', 'दिल मांगे मोर', 'चुरा लिया है तुमने' आदि फ़िल्मों का ज़माना क्या वापस आ पाएगा इस फ़िल्म के ज़रिए?

विश्व दीपक - अब बातों को देते हैं विराम और सुनते हैं फ़िल्म का पहला गीत हिमेश की आवाज़ में। फ़िल्म के गानें लिखे हैं गीतकार समीर ने। और आपको बता दें कि इस गीत के ज़रिए ही फ़िल्म का प्रोमो इन दिनों दिखाया जा रहा है टेलीविज़न पर।

गीत: कुछ तो बाक़ी है


सुजॊय - "कुछ तो बाक़ी है"। विश्व दीपक जी, इस गीत को सुन कर हिमेश की आवाज़ और गायन शैली के बारे में कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि कुछ नयी बात कहने की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं है। लेकिन संगीत और संगीत संयोजन अच्छा है और इतना तो ज़रूर कह सकते हैं कि हिमेश के संगीत में अभी बहुत कुछ बाक़ी है। आपका क्या ख़याल है?

विश्व दीपक - यह गीत यक़ीनन एक ऐसा गीत है जो एक मूड बना देता है और दोबारा सुनने के लिए उकसा देता है। समीर की लेखन शैली और स्टाइल साफ़ झलकता है इस गीत में। और जहाँ तक ऒर्केस्ट्रेशन का सवाल है, इसमें तबला, हारमोनियम और सारंगी जैसे साज़ों की ध्वनियों का सुंदर प्रयोग किया गया है। और सब से बड़ी बात यह कि इस गीत के जो बोल हैं वो फ़िल्म के किरदारों पर ही नहीं बल्कि शाहीद-करीना की निजी ज़िंदगी को भी छू जाते हैं। "सब ख़त्म होके भी तेरे मेरे दरमीयाँ कुछ तो बाक़ी है" - अब इस तरह के बोल जान बूझ कर डाले गऎ है या फिर एक महज़ इत्तेफ़ाक़ है, यह तो हम नहीं जानते हैं, लेकिन जो भी है मज़ेदार बन पड़ा है। मीडिया को भी भरपूर ख़ुराक मिलने वाला है इस फ़िल्म के रिलीज़ पर।

सुजॊय - आगे बढ़ते हैं और दूसरा जो गीत है उसे गाया है अलका याज्ञ्निक और जयेश गांधी ने। यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है "मिलेंगे मिलेंगे", और इसी का एक और वर्ज़न भी है जिसे हम आगे चलकर सुनेंगे।

गीत: मिलेंगे मिलेंगे (अलका/जयेश)


सुजॊय - बहुत दिनों के बाद अलका की आवाज़ सुन कर अच्छा लगा। एक बात जो मैंने नोटिस की इस गीत को सुनते हुए कि इस गीत का जो ऒरकेस्ट्रेशन है, वह हिमेश के पहले के गीतों में कई कई बार हो चुका है। मुझे पता नहीं वह कौन-सा साज़ है, लेकिन इस गीत में आपको उस साज़ की धुन सुनाई देगी जिसका हिमेश ने "चुरा लिया है तुमने" गीत में भी प्रोमिनेण्ट तरीके से किया था। पार्श्व में कोरस का इस्तेमाल भी हिमेश ने अपने उसी पुराने शैली में किया है। गीत ठीक ठाक है, लेकिन कोई नई बात नज़र नहीं आई।

विश्व दीपक - और अब सोनू निगम और अलका याज्ञ्निक की युगल आवाज़ें। सुजॊय, क्या आप बता सकते हैं कि इससे पहले आपने सोनू और अलका की युगल आवाज़ें किस फ़िल्म में आख़िरी बार सुना था?

सुजॊय - मेरा ख़याल है पिछले ही साल फ़िल्म 'लाइफ़ पार्टनर' में "कल नौ बजे तुम चांद देखना" जो गीत है, उसी में ये दोनों साथ में आए थे।

विश्व दीपक - और उस गीत की तरह यह गीत भी नर्मोनाज़ुक है और इस जोड़ी ने पूरा न्याय किया है। वैसे इसे पूरी तरह से युगल कहना ग़लत होगा। भले ही फ़िल्म के सी.डी पर सोनू और अलका के नाम दिए गए हैं, लेकिन इसमें सुज़ेन डी'मेलो ने अंग्रेज़ी के बोल गाए हैं जिनकी इस गीत में कोई ज़रूरत नहीं थी।

गीत: तुम चैन हो


सुजॊय - बिलकुल सही कहा था आपने कि उन अंग्रेज़ी के शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं थी। ज़रा याद कीजिए फ़िल्म 'लगान' के उस गीत को, "ओ री छोरी", जिसमें वसुंधरा दास ने अंग्रेज़ी की पंक्तियाँ गाईं थीं। इसका ज़िक्र मैं यहाँ इसलिए कर रहा हूँ यह बताने के लिए कि उस गीत में वह न्यायसंगत था, लेकिन इस गीत में उसकी ज़रूरत शायद ही थी। ख़ैर, सोनू निगम ने फिर एक बार अपने बेहतरीन अंदाज़ में गायन प्रस्तुत किया है, और हिमेश के अनुसार वो हैं ही आज के नंबर वन गायक। एक बार करण जोहर के 'कॊफ़ी विथ करण' में जब करण ने कई गायकों को १ से १० के स्केल में रेट करने को कहा था, तब हिमेश ने उदित नारयण को ७ और सोनू निगम को १० की रेटिंग्‍ दी थी। अलका के खाते में आए थे ८ की रेटिंग। ख़ैर, ये तो हिमेश की व्यक्तिगत राय थी।

विश्व दीपक - अगला गीत है "इश्क़ की गली है मखमली"। राहत फ़तेह अली ख़ान और जयेश गांधी की आवाज़ें। राहत साहब गाने की शुरुआत करते हैं और फिर उसके बाद जयेश गीत को आगे बढ़ाते हैं। राहत साहब अपने अंदाज़ के ऊँचे सुर में "इश्क़ की गली है मखमली रब्बा" गाते हैं, जब कि जयेश भी अपने ही अंदाज़ में "मेरे दिल को तुमसे कितनी मोहब्बत" गाते हैं। उनकी आवाज़ भी मौलिक आवाज़ है और किसी और से नहीं मिलती।

सुजॊय - इससे पहले राहत फ़तेह अली ने हिमेश रेशम्मिया की धुन पर फ़िल्म 'नमस्ते लंदन' का मशहूर गीत "मैं जहाँ रहूँ" गाया था। लेकिन उस गीत में जो बात थी, वह असर 'मिलेंगे मिलेंगे' के इस गीत में नहीं आ पाया है। चलिए सुनते हैं।

गीत: इश्क़ की गली है मखमली


विश्व दीपक - अगला जो गीत है वह थोड़ा सा अलग हट के है इसलिए क्योंकि आजकल इस तरह के गानें बनने लगभग बंद ही हो गए हैं। ९० के दशक और २००० के दशक के शुरुआती सालों तक इस तरह के "चूड़ी-कंगन" वाले गानें बहुत बनें हैं, लेकिन आज के फ़िल्मों के विषयवस्तु इस तरह के होते हैं कि इस तरह के गीतों के लिए कोई जगह या सिचुएशन ही नहीं पैदा हो पाती। यह है अलका यज्ञ्निक और साथियों की आवाज़ों में "ये हरे कांच की चूड़ियाँ, पहनी तेरे नाम की, राधा हो गई श्याम की"। वैसे बोल तो साधारण हैं लेकिन धुन ऐसी कैची है कि सुनते हुए अच्छा लगता है।

सुजॊय - और गाने के अंत में "मिलेंगे मिलेंगे" वाले गीत की धुन पर कोरस "मिलेंगे मिलेंगे" गा उठते हैं। और विश्व दीपक जी, इस गाने से याद आया कि ६० के दशक में एक फ़िल्म आई थी 'हरे काँच की चूड़ियाँ', जिसमें आशा भोसले का गाया शीर्षक गीत था "बज उठेंगे हरे काँच की चूड़ियाँ"। शैलेन्द्र जी ने उस गीत में मुखड़े और अंतरे में अंतर ना रखते हुए बड़े ही ख़ूबसूरत तरीक़े से लिखा था "धानी चुनरी पहन, सज के बन के दुल्हन, जाउँगी उनके घर, जिन से लागी लगन, आयेंगे जब सजन, जीतने मेरा मन, कुछ न बोलूँगी मैं, मुख न खोलूँगी मैं, बज उठेंगी हरे कांच की चूड़ियाँ, ये कहेंगी हरे कांच की चूड़ियाँ"।

विश्व दीपक - बिलकुल मुझे भी याद है यह गीत और इसे हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर भी तो सुनवाया था। ख़ैर, अलका और सखियों की आवाज़ों में आइए यह गीत सुना जाए और हमारे श्रोताओं को सुनवाया जाए।

गीत: ये हरे काँच की चूड़ियाँ


सुजॊय - और अब हम आ पहुँचे हैं इस फ़िल्म के अंतिम गीत पर। जैसा कि उपर हमने बताया था कि अलका याज्ञ्निक और जयेश गांधी के गाए फ़िल्म के शीर्षक गीत "मिलेंगे मिलेंगे" का एक और वर्ज़न है, तो अब बारी है उसी दूसरे वर्ज़न को सुनने की जिसे ख़ुद हिमेश भाई और श्रेया घोषाल ने गाया है। यक़ीन मानिए, अलका-जयेश वाले वर्ज़न से यह वला वर्ज़न मुझे ज़्यादा अपील किया। और "मिलेंगे मिलेंगे" वाले जगह की ट्युन ऐसी है कि एक हौंटिंग वातावरण जैसा बन जाता है, और इसमें शक़ नहीं कि पूरे फ़िल्म में इसी ट्युन का बार बार इस्तेमाल होता रहेगा।

विश्व दीपक - और इस गीत में शाहीद कपूर भी कुछ लाइनें कहते हैं। सिंथेसाइज़र्स का ख़ूबसूरत इस्तेमाल हुआ है। और फिर से उसी "चुरा लिया है तुमने" वाले साज़ का इस्तेमाल ऒरकेस्ट्रेशन में सुनाई देता है। हिमेश और श्रेया की आवाज़ें एक साथ अच्छी लगती है। फ़िल्म 'रेडियो' का "जानेमन" गीत भी इन दोनों ने ख़ूब गाया था।

गीत: मिलेंगे मिलेंगे (हिमेश/श्रेया)


"मिलेंगे मिलेंगे" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२

सुजॊय - इन सभी गीतों को सुन कर मैं यह कह सकता हूँ कि भले ही इन गीतों में बहुत ख़ास कोई बात नहीं है, लेकिन गानें मेलोडियस हैं, सुन कर अच्छा लगा। हालाँकि इन गीतों में वो बात नहीं है कि जो फ़िल्म को हिट करा दे, लेकिन अगर फ़िल्म दूसरे पक्षों की वजह से हिट हो जाती है तो ये गानें भी ख़ूब चलेंगे, जैसा कि हमेशा से होता आया है। बस हिमेश भाई को शुभकामनाएँ देते हुए यही कहूँगा कि हिमेश भाई, अभी भी आप में बहुत कुछ बाक़ी है, बेस्ट ऒफ़ लक!

विश्व दीपक - फिर भी इतना तो कहना होगा कि हिमेश भाई का पुराना प्रयास उनके नए प्रयासों से कई कदम आगे है। अपने हीं आप में टाईप-कास्ट हो चुके हिमेश भाई से हम यही अपील करते हैं कि कभी-कभार वो अपने खोल से बाहर निकला करें और "तेरे नाम" जैसे गाने तैयार किया करें। इसी उम्मीद के साथ हम चलते हैं। हाँ, चलते चलते 'ताज़ा सुर ताल' के श्रोताओं व पाठकों से हम यही कहेंगे कि अगले हफ़्ते फिर एक बार आप से इस स्तंभ में यकीनन मिलेंगे मिलेंगे।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६७- "मिलेंगे मिलेंगे" शीर्षक गीत में शाहीद कपूर ने कुछ लाइनें कही हैं। क्या आप कोई और गीत बता सकते हैं जिसमें शाहीद कपूर की आवाज़ शामिल है?

TST ट्रिविया # ६८- 'मिलेंगे मिलेंगे' बोनी कपूर की फ़िल्म है। बोनी कपूर की वह और कौन सी फ़िल्म है जिसमें हिमेश रेशम्मिया ने संगीत दिया है?

TST ट्रिविया # ६९- यह एक सोनू निगम - अलका याज्ञ्निक डुएट है। हिमेश रेशम्मिया का म्युज़िक है। शाहीद कपूर ही नायक हैं। गीत का मुखड़ा उन चार शब्दों से ख़त्म होता है जिन चार शब्दों से अलका याज्ञ्निक का गाया हुआ वह गीत शुरु होता है जो एक मशहूर हॊरर फ़िल्म का है और जिसमे नायिका बनी थीं बिपाशा बासु। बताइए हम किन दो गीतों की बात कर रहे हैं।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. नरेश शर्मा
२. 'चश्म-ए-बद्दूर'
३. पलाश सेन

सीमा जी, आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें। "इंडलि" जी, हमें आपके प्रस्ताव पर विचार करने के लिए कुछ वक्त चाहिए। विधु जी, गाने पसंद करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

Tuesday, June 8, 2010

रब्बा लक़ बरसा.... अपनी फ़िल्म "कजरारे" के लिए इसी किस्मत की माँग कर रहे हैं हिमेश भाई

ताज़ा सुर ताल २१/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़े अंक के साथ हम हाज़िर हैं। विश्व दीपक जी, इस शुक्रवार को 'राजनीति' प्रदर्शित हो चुकी हैं, और फ़िल्म की ओपनिंग अच्छी रही है ऐसा सुनने में आया है, हालाँकि मैंने यह फ़िल्म अभी तक देखी नहीं है। 'काइट्स' को आशानुरूप सफलता ना मिलने के बाद अब देखना है कि 'राजनीति' को दर्शक किस तरह से ग्रहण करते हैं। ख़ैर, यह बताइए आज हम किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं।

विश्व दीपक - आज हम सुनेंगे आने वाली फ़िल्म 'कजरारे' के गानें।

सुजॊय - यानी कि हिमेश इज़ बैक!

विश्व दीपक - बिल्कुल! पिछले साल 'रेडियो - लव ऑन एयर' के बाद इस साल का उनका यह पहला क़दम है। 'रेडियो' के गानें भले ही पसंद किए गए हों, लेकिन फ़िल्म को कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली थी। देखते हैं कि क्या हिमेश फिर एक बार कमर कस कर मैदान में उतरे हैं!

सुजॊय - 'कजरारे' को पूजा भट्ट ने निर्देशित किया है, जिसके निर्माता हैं भूषण कुमार और जॉनी बक्शी। फ़िल्म के नायक हैं, जी हाँ, हिमेश रेशम्मिया, और उनके साथ हैं मोना लायज़ा, अमृता सिंह, नताशा सिन्हा, गौरव चनाना और गुल्शन ग्रोवर। संगीत हिमेश भाई का है और गानें लिखे हैं हिमेश के पसंदीदा गीतकार समीर ने। तो विश्व दीपक जी, शुरु करते हैं गीतों का सिलसिला। पहला गीत हिमेश रेशम्मिया और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में। इस गीत को आप एक टिपिकल हिमेश नंबर कह सकते हैं। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल हुआ है। हिमेश भाई के चाहनेवालों को ख़ूब रास आएगा यह गीत।

गीत: कजरा कजरा कजरारे


विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने की शुरुआत मुझे पसंद आई। जिस तरह से "सुनिधि चौहान" ने "कजरा कजरा कजरारे" गाया है, वह दिल के किसी कोने में एक नटखटपन जगा देता है और साथ हीं सुनिधि के साथ गाने को बाध्य भी करता है। मुझे आगे भी सुनिधि का यही रूप देखने की इच्छा थी, लेकिन हिमेश ने अंतरा में सुनिधि को बस "चियर लिडर" बना कर रख दिया है और गाने की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली है। हिमेश की आवाज़ इस तरह के गानों में फबती है, लेकिन शब्दों का सही उच्चारण न कर पाना और अनचाही जगहों पर हद से ज्यादा जोर देना गाने के लिए हानिकारक साबित होते हैं। हिमेश "उच्चारण" संभाल लें तो कुछ बात बने। खैर अब हम दूसरे गाने की ओर बढते हैं।

सुजॊय - अब दूसरा गीत भी उसी हिमेश अंदाज़ का गाना है। उनकी एकल आवाज़ में सुनिए "रब्बा लक बरसा"। इस गीत में महेश भट्ट साहब ने वायस ओवर किया है। गाना बुरा नहीं है, लेकिन फिर एक बार वही बात कहना चाहूँगा कि अगर आप हिमेश फ़ैन हैं तो आपको यह गीत ज़रूर पसंद आएगा।

विश्व दीपक - जी आप सही कह रहे हैं। एक हिमेश फ़ैन हीं किसी शब्द का बारंबार इस्तेमाल बरदाश्त कर सकता है। आप मेरा इशारा समझ गए होंगे। हिमेश/समीर ने "लक लक लक लक" इतनी बार गाने में डाला है... कि "शक लक बूम बूम" की याद आने लगती है और दिमाग से यह उतर जाता है कि इस "लक़" का कुछ अर्थ भी होता है। एक तो यह बात मुझे समझ नहीं आई कि जब पूरा गाना हिन्दी/उर्दू में है तो एक अंग्रेजी का शब्द डालने की क्या जरूरत थी। मिश्र के पिरामिडों के बीच घूमते हुए कोई "लक लक" बरसा कैसे गा सकता है। खैर इसका जवाब तो "समीर" हीं दे सकते हैं। हाँ इतना कहूँगा कि इस गाने में संगीत मनोरम है, इसलिए खामियों के बावजूद सुनने को दिल करता है। विश्वास न हो तो आप भी सुनिए।

गीत: रब्बा लक़ बरसा


सुजॊय - अब इस एल्बम का तीसरा गीत और मेरे हिसाब से शायद यह इस फ़िल्म का सब से अच्छा गीत है। हिमेश रेशम्मिया के साथ इस गीत में आवाज़ है हर्षदीप कौर की। एक ठहराव भरा गीत है "आफ़रीन", जिसमें पारम्परिक साज़ों का इस्तेमाल किया गया है। ख़ास कर ढोलक का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है गीत में। भले ही हर्षदीप की आवाज़ मौजूद हो गीत के आख़िर में, इसे एक हिमेश रेशम्मिया नंबर भी कहा जा सकता है।

विश्व दीपक - जी यह शांत-सा, सीधा-सादा गाना है और इसलिए दिल को छू जाता है। इस गाने के संगीत को सुनकर "तेरे नाम" के गानों की याद आ जाती है। हर्षदीप ने हिमेश का अच्छा साथ दिया है। हिमेश कहीं-कहीं अपने "नेजल" से अलग हटने की कोशिश करते नज़र आते हैं ,लेकिन "तोसे" में उनकी पोल खुल जाती है। अगर हिमेश ऐसी गलतियाँ न करें तो गीतकार भी खुश होगा कि उसके शब्दों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि यह गाना एल्बम के बाकी गानों से बढिया है। तो लीजिए पेश है यह गाना।

गीत: आफ़रीन


सुजॊय - फ़िल्म का चौथा गीत भी एक युगल गीत है, इस बार हिमेश का साथ दे रहीं हैं श्रेया घोषाल। गीत के बोल हैं "तुझे देख के अरमान जागे"। आपको याद होगा अभी हाल ही में फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' में एक गीत आया था "वाल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा"। तो भई हम तो यहाँ पर यही कहेंगे कि वाल्युम कम कर नहीं तो पूरा मोहल्ला जग जाएगा। जी हाँ, "तुझे देख के अरमान जागे" के शुरु में हिमेश साहब कुछ ऐसी ऊँची आवाज़ लगाते हैं कि जिस तरह से उनके "झलक दिखला जा" गीत को सुन कर गुजरात के किसी गाँव में भूतों का उपद्रव शुरु हो गया था, अब की बार तो शायद मुर्दे कब्र खोद कर बाहर ही निकल पड़ें! ख़ैर, मज़ाक को अलग रखते हुए यह बता दूँ कि आगे चलकर हिमेश ने इस गीत को नर्म अंदाज़ में गाया है और श्रेया के आवाज़ की मिठास के तो कहने ही क्या। वो जिस गीत को भी गाती हैं, उसमें मिश्री और शहद घोल देती हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्यों न लगे हाथों पांचवाँ गीत भी सुन लिया जाए| क्योंकि यह गीत भी हिमेश रेशम्मिया और श्रेया घोषाल की आवाजों में हीं है, और अब की बार बोल हैं "तेरीयाँ मेरीयाँ"। दोस्तों, जिस गीत में "ँ" का इस्तेमाल हो और अगर उस गाने में आवाज़ हिमेश रेशम्मिया की हो, तो फिर तो वही सोने पे सुहागा वाली बात होगी ना! नहीं समझे? अरे भई, मैं हिमेश रेशम्मिया के नैज़ल अंदाज़ की बात कर रहा हूँ। इस गीत में उन्हे भरपूर मौका मिला है अपनी उस मनपसंद शैली में गाने का, जिस शैली के लिए वो जाने भी जाते हैं और जिस शैली की वजह से वो एकाधिक बार विवादों से भी घिर चुके हैं। जहाँ तक इस गीत का सवाल है, संतूर की ध्वनियों का सुमधुर इस्तेमाल हुआ है। वैसे यह मैं नहीं बता सकता कि क्या असल में संतूर का प्रयोग हुआ है या उसकी ध्वनियों को सीन्थेसाइज़र के ज़रिये पैदा किया गया है। जो भी है, सुरीला गीत है, लेकिन श्रेया को हिस्सा कम मिला है इस गानें में।

गीत: तुझे देख के अरमान जागे


गीत: तेरीयां मेरीयां


सुजॊय - विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगता है कि हिमेश रेशम्मिया जब भी कोई फ़िल्म करते हैं, तो अपने आप को ही सब से ज़्यादा सामने रखते हैं। बाके सब कुछ और बाकी सब लोग जैसे पार्श्व में चले जाते हैं। यह अच्छी बात नहीं है। अब आप उनकी कोई भी फ़िल्म ले लीजिए। वो ख़ुद इतने ज़्यादा प्रोमिनेन्स में रहते हैं कि वो फ़िल्म कम और हिमेश रेशम्मिया का प्राइवेट ऐल्बम ज़्यादा लगने लगता है। दूसरी फ़िल्मों की तो बात ही छोड़िए, 'कर्ज़', जो कि एक पुनर्जन्म की कहानी पर बनी कामयाब फ़िल्म का रीमेक है, उसका भी यही हाल हुआ है। ख़ैर, शायद यही उनका ऐटिट्युड है। आइए अब इस फ़िल्म का अगला गीत सुनते हैं "वो लम्हा फिर से जीना है"। हिमेश और हर्षदीप कौर की आवाज़ें, फिर से वही हिमेश अंदाज़। एक वक़्त था जब हिमेश के इस तरह के गानें ख़ूब चला करते थे, देखना है कि क्या बदलते दौर के साथ साथ लोगों का टेस्ट भी बदला है या फिर इस गीत को लोग ग्रहण करते हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने के साथ हीं क्यों न हम फ़िल्म का अंतिम गाना भी सुन लें| हिमेश और सुनिधि की आवाज़ें, और एक बार फिर से हिमेश का नैज़ल अंदाज़। ढोलक के तालों पर आधारित इस लोक शैली वाले गीत को सुन कर आपको अच्छा लगेगा। जैसा कि अभी अभी आपने कहा कि आजकल हिमेश जिस फ़िल्म में काम करते हैं, बस वो ही छाए रहते हैं, तो इस फ़िल्म में भी वही बात है। हर गीत में उनकी आवाज़, हर गाना वही हिमेश छाप। अपना स्टाइल होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन अगर विविधता के लिए थोड़ा सा अलग हट के किया जाए तो उसमें बुराई क्या है? ख़ैर, मैं अपना वक्तव्य यही कहते हुए समाप्त करूँगा कि 'कजरारे' पूर्णत: हिमेश रेशम्मिया की फ़िल्म होगी।

गीत: वो लम्हा फिर से जीना है


गीत: सानु गुज़रा ज़माना याद आ गया


"कजरारे" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***

सुजॊय - हिमेश के चाहने वालों को पसंद आएँगे फ़िल्म के गानें, और जिन्हे हिमेश भाई का गीत-संगीत अभी तक पसंद नहीं आया है, उन्हें इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, मैं तो ये कहूँगा की उन्हें इस एल्बम से दूर ही रहना चाहिए|

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मुझे यह लगता है कि हमें इस एल्बम को सिरे से नहीं नकार देना चाहिए, क्योंकि संगीत बढ़िया है और कुछ गाने जैसे कि "रब्बा लक़ बरसा", "कजरारे" और "आफरीन" खूबसूरत बन पड़े हैं| हाँ इतना है कि अगर हिमेश ने अपने अलावा दूसरों को भी मौक़ा दिया होता तो शायद इस एल्बम का रंग ही कुछ और होता| लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हिमेश भाई और पूजा भट्ट को जो पसंद हो, हमें तो वही सुनना है| मैं बस यही उम्मीद करता हूँ कि आगे चलकर कभी हमें "नमस्ते लन्दन" जैसे गाने सुनने को मिलेंगे... तब तक के लिए "मिलेंगे मिलेंगे" :)

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६१- "शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम", इस गीत के साथ हिमेश रेशम्मिया का क्या ताल्लुख़ है?

TST ट्रिविया # ६२- "आपको कैसा लगेगा अगर मैं आपको नए ज़माने का एक गीत सुनाऊँ जिसमें ना कोई ख़त, ना इंतेज़ार, ना झिझक, ना कोई दर्द, बस फ़ैसला है, जिसमें हीरो हीरोइन को सीधे सीधे पूछ लेता है कि मुझसे शादी करोगी?" दोस्तॊम, ये अल्फ़ाज़ थे हिमेश रेशम्मिया के जो उन्होने विविध भारती पर जयमाला पेश करते हुए कहे थे। तो बताइए कि उनका इशारा किस गाने की तरफ़ था?

TST ट्रिविया # ६३- गीतकार समीर के साथ जोड़ी बनाने से पहले हिमेश रेशम्मिया की जोड़ी एक और गीतकार के साथ ख़ूब जमी थी जब उनके चुनरिया वाले गानें एक के बाद एक आ रहे थे और छा रहे थे। बताइए उस गीतकार का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. पेण्टाग्राम
२. सोना महापात्रा
३. "give me some sunshine, give me some rain, give me another chance, I wanna grow up once again".

आलोक, आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए, इसलिए आपको पुरे अंक मिलते हैं| सीमा जी, इस बार आप पीछे रह गईं| खैर कोई बात नहीं, अगली बार......

Tuesday, May 18, 2010

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं.. लोक, शास्त्रीय और पाश्चात्य-संगीत की मोहक जुगलबंदी का नाम है "राजनीति"

ताज़ा सुर ताल १९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों, 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़ी कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। आज जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा हम करने जा रहे हैं वह है प्रकाश झा की अपकमिंग् फ़िल्म 'राजनीति'। १० बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित प्रकाश झा ने हमेशा ही अपने फ़िल्मों में समाज और राजनीति के असली चेहरों से हमारा बावस्ता करवाया है। और 'राजनीति' भी शायद उसी जौनर की फ़िल्म है।

सुजॊय - हाँ, और सुनने में आया है कि 'राजनीति' की कहानी जो है वह सीधे 'महाभारत' से प्रेरित है। दर-असल यह एक ऐसी औरत के सफर की कहानी है जो भ्रष्टाचार से लड़ती हुईं देश की प्रधान मंत्री बन जाती हैं। कैटरीना कैफ़ ने ही यह किरदार निभाया है और ऐसा कहा जा रहा है कि यह चरित्र सोनिया गांधी से काफ़ी मिलता-जुलता है, वैसे कैटरीना का यह कहना है कि उन्होंने प्रियंका गाँधी के हावभाव को अपनाया है। ख़ैर, फ़िल्म की कहानी पर न जाते हुए आइए अब सीधे फ़िल्म के संगीत पक्ष पर आ जाते हैं।

विश्व दीपक - लेकिन उससे पहले कम से कम हम इतना ज़रूर बता दें कि 'राजनीति' में कैटरीना कैफ़ के अलावा जिन मुख्य कलाकारों ने काम किए हैं वो हैं अजय देवगन, नाना पाटेकर, रणबीर कपूर, नसीरुद्दिन शाह, अर्जुन रामपाल, मनोज बाजपयी, सारा थॊम्पसन, दर्शन जरीवाला, श्रुति सेठ. निखिला तिरखा, चेतन पण्डित, विनय आप्टे, किरण कर्मकार, दया शंकर पाण्डेय, जहांगीर ख़ान, और रवि खेमू।

सुजॊय - वाक़ई बहुत बड़ी स्टार कास्ट है। विश्व दीपक जी, अभी हाल ही में एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी 'स्ट्राइकर', आपको याद होगा। फ़िल्म कब आयी कब गयी पता ही नहीं चला, लेकिन उस फ़िल्म के संगीत में कुछ बात थी। और सब से बड़ी बात यह थी कि उसमें ६ अलग अलग संगीतकार थे और ६ अलग अलग गीतकार। 'स्ट्राइकर' फ़िल्म की हमने जिस अंक में चर्चा की थी, हमने कहा था शायद यह पहली फ़िल्म है इतने सारे संगीतकार गीतकार वाले। अब देखिए, 'राजनीति' में भी वही बात है।

विश्व दीपक - हाँ, लगता है कुछ फ़िल्मकार अब इस राह पर भी चलने वाले हैं। अच्छी बात है कि एक ही एल्बम के अंदर लोगों को और ज़्यादा विविधता मिलेगी। अगर एक ही फ़िल्म में प्रीतम, शान्तनु मोइत्रा, आदेश श्रीवास्तव, और वेन शार्प जैसे बिल्कुल अलग अलग शैली के संगीतकार हों, तो लोगों को उसमें दिलचस्पी तो होगी ही।

सुजॊय - तो चलिए, 'राजनीति' का पहला गाना सुनते हैं मोहित चौहान और अंतरा मित्रा की आवाज़ों में। गीत इरशाद कामिल का है और धुन प्रीतम की।

गीत: भीगी सी भागी सी


सुजॊय - प्रीतम और इरशाद कामिल की जोड़ी ने हमेशा हिट गीत हमें दिए हैं। इस गीत को सुन कर भी लगता है कि यह लम्बी रेस का घोड़ा बनेगा। एक बार सुन कर शायद उतना असर ना कर पाए, लेकिन दो तीन बार सुनने के बाद गीत दिल में उतरने लगती है। मेलडी के साथ साथ एक यूथ अपील है इस गीत में।

विश्व दीपक - जी हाँ, आप सही कह रहे हैं और जिस तरह से गीत को रचा गया है, वह भी काफ़ी अलग तरीके का है। अमूमन मोहित चौहान हीं अपने आलाप के साथ गीत की शुरूआत करते हैं, लेकिन इस गाने में पहली दो पंक्तियाँ अंतरा मित्रा की हैं, जो अपनी मीठी-सी आवाज़ के जरिये मोहित की पहाड़ी आवाज़ के लिए रास्ता तैयार करती हैं। और जहाँ तक मोहित की बात है तो ये किसी से छुपा नहीं है कि मोहित इरशाद-प्रीतम के पसंदीदा गायक हैं और वे कभी निराश भी नहीं करते। इस गाने में इरशाद का भी कमाल दिख पड़ता है। "संदेशा", "अंदेशा", "गुलाबी", "शराबी" जैसे एक-दूसरे से मिलते शब्द कानों को बड़े हीं प्यारे लगते हैं।

सुजॊय - चलिए इस गीत के बाद अब जो गीत हम सुनेंगे वह शायद फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है। तभी तो फ़िल्म के प्रोमोज़ में इसी गीत का सहारा लिया जा रहा है। "मोरा पिया मोसे बोलत नाही, द्वार जिया के खोलत नाही"। शास्त्रीय और पाश्चात्य संगीत का सुंदर फ़्युज़न सुनने को मिलता है इस गीत में, जिसे आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया है और गाया भी ख़ुद ही है। पार्श्व में उनका साथ दिया है शशि ने तो अंग्रेज़ी के शब्दों को अपनी मोहक आवाज़ से सजाया है रोज़ाली निकॊलसन ने। इस गीत को लिखा है समीर ने। बहुत दिनों के बाद समीर और आदेश श्रीवस्तव का बनाया गीत सुनने को मिल रहा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इन्होने ९० के दशक के अंदाज़ में नहीं, बल्कि समय के साथ चलते हुए इसी दौर के टेस्ट के मुताबिक़ इस गीत को ढाला है।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, वैसे शायद आपको यह याद हो कि कुछ सालों पहले पाकिस्तानी ग्रुप फ़्युज़न का एक गीत आया था "मोरा सैंया मोसे बोले ना"। यह गीत बाद में "नागेश कुकुनूर" की फिल्म "हैदराबाद ब्लूज़-२" में भी सुनने को मिला था और हाल-फिलहाल में इसे "अमन की आशा" में शामिल किया गया है। मेरे हिसाब से "समीर"/"आदेश श्रीवास्तव" इस गाने की पहली पंक्ति से प्रेरित हुए हैं और उन्होंने उस पंक्ति में आवश्यक परिवर्त्तन करके इस गाने को एक अलग हीं रूप दे दिया है। या ये भी हो सकता है कि यह पंक्ति किसी पुराने सूफ़ी कवि की हो, जहाँ से दोनों गानों के गीतकार प्रभावित हुए हों। मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं,इसलिए कुछ कह नहीं सकता। वैसे जो भी हो, समीर ने इस गाने को बहुत हीं खूबसूरत लिखा है और उसी खूबसूरती से आदेश ने धुन भी तैयार की है। आदेश श्रीवास्तव हर बार हीं अपने संगीत से हम सबको चौंकाते रहे हैं, लेकिन इस बार तो अपनी आवाज़ के बदौलत इन्होंने हम सबको स्तब्ध हीं कर दिया है। इनकी आवाज़ में घुले जादू को जानने के लिए पेश-ए-खिदमत है आप सबके सामने यह गीत:

गीत: मोरा पिया


सुजॊय - इसी गीत का एक रीमिक्स वर्ज़न भी है, लेकिन ख़ास बात यह कि सीधे सीधे ऒरिजिनल गीत का ही रीमिक्स नहीं कर दिया गया है, बल्कि कविता सेठ की आवाज़ में इस गीत को गवाकर दीप और डी.जे. चैण्ट्स के द्वारा रीमिक्स करवाया गया है। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि आदेश श्रीवास्तव वाला वर्जन बेहतर है। आइए सुनते हैं कविता सेठ की आवाज़ में यह गीत:

गीत: मोरा पिया मोसे बोलत नाही (ट्रान्स मिक्स)


विश्व दीपक - प्रीतम-इरशाद कामिल और आदेश-समीर के बाद अब बारी है शांतनु-स्वानंद की। शांतनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की जोड़ी भी एक कमाल की जोड़ी है, जिनका स्कोर १००% रहा है। भले इनकी फ़िल्में बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाब रही हो या असफल, इनके गीत-संगीत के साथ हमेशा ही 'ऒल इज़ वेल' रहा है। '३ इडियट्स' की अपार लोकप्रियता के बाद अब 'राजनीति' में ये दोनों वापस आए हैं और केवल एक गीत इन्होने इस फ़िल्म को दिया है। यह एक डांस नंबर है "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन"।

सुजॊय - प्रणब बिस्वास, हंसिका अय्यर और स्वानंद किरकिरे की आवाज़ों में यह गीत एक मस्ती भरा गीत है। 'लागा चुनरी में दाग' फ़िल्म के "हम तो ऐसे हैं भ‍इया" की थोड़ी बहुत याद आ ही जाती है इस गीत को सुनते हुए। स्वानंद किरकिरे क्रमश: एक ऐसे गीतकार की हैसियत रखने लगे हैं जिनकी लेखन शैली में एक मौलिकता नज़र आती है। भीड़ से अलग सुनाई देते हैं उनके लिखे हुए गीत। और भीड़ से अलग है शांतनु का संगीत भी। "मोरा पिया" में अगर शास्त्रीय संगीत के साथ पाश्चात्य का फ़्युज़न हुआ है, तो इस गीत में हमारे लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत का संगम है। कुल मिलाकर एक कर्णप्रिय गीत है पिछले गीत की तरह ही। सुनते हैं बारिश को समर्पित यह गीत और इस चिलचिलाती गर्मी में थोड़ी सी राहत की सांस लेते हैं इस गीत को सुनते हुए।

गीत: इश्क़ बरसे


सुजॊय - और अब गुलज़ार के कलम की जादूगरी। "धन धन धरती रे" गीत समर्पित है इस धरती को। वेन शार्प के संगीत से सजे इस गीत के दो रूप हैं। पहले वर्ज़न में आवाज़ है शंकर महादेवन की और दूसरी में सोनू निगम की। सोनू वाले वर्ज़न का शीर्षक रखा गया है "कॊल ऒफ़ दि सॊयल"। एक देश भक्ति की भावना जागृत होती है इस गीत को सुनते हुए। पार्श्व में बज रहे सैन्य रीदम के इस्तेमाल से यह भावना और भी ज़्यादा बढ़ जाती है। मुखड़े से पहले जो शुरुआती बोल हैं "बूढ़ा आसमाँ, धरती देखे रे, धन है धरती रे, धन धन धरती रे", इसकी धुन "वंदे मातरम" की धुन पर आधारित है। और इसे सुनते हुए आपको दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले "बजे सरगम हर तरफ़ से गूंजे बन कर देश राग" गीत की याद आ ही जाएगी।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही पकड़ा है आपने। वैसे इस गीत के बारे में कुछ कहने से पहले मैं वेन शार्प से सबको परिचित करवाना चाहूँगा। वेन शार्प एक अमेरिकन संगीतकार हैं, जिन्होंने इससे पहले प्रकाश झा के हीं "गंगाजल" और "अपहरण" में संगीत दिया है। साथ हीं साथ पिछले दिनों आई फिल्म "लाहौर" में भी इन्हीं का संगीत था। ये एकलौते अमेरिकन संगीतकार हैं जिन्हें फिल्मफ़ेयर से नवाजा गया है। अब तो ये प्रकाश झा के फेवरेट बन चुके हैं। चूँकि ये हिन्दी नहीं समझते, इसलिए इनका संगीत पूरी तरह से निर्देशक की सोच और गीतकार के शब्दों में छुपी भावना पर निर्भर करता है। इनका मानना है कि हिन्दी फिल्म-संगीत की तरफ़ इनका रूझान "ए आर रहमान" की "ताल" को सुनने के बाद हुआ। चलिए अब इस गाने की भी बात कर लेते हैं। तो इस गाने में "वंदे मातरम" को एक नया रूप देने की कोशिश की गई है। धरती को पूजने की बजाय गुलज़ार साहब ने धरती की कठिनाईयों की तरफ़ हम सबका ध्यान आकर्षित किया है और इसके लिए उन्होंने बड़े हीं सीधे और सुलझे हुए शब्द इस्तेमाल किए हैं, जैसे कि "सूखा पड़ता है तो ये धरती फटती है।" अंतिम पंक्तियों में आप "सुजलां सुफलां मलयज शीतलां, शस्य श्यामलां मातरम" को महसूस कर सकते हैं। अब ज्यादा देर न करते हुए हम आपको दोनों हीं वर्जन्स सुनवाते हैं। आप खुद हीं निर्णय लें कि आपको किसकी गायकी ने ज्यादा प्रभावित किया:

गीत: धन धन धरती (शंकर महादेवन)


गीत: धन धन धरती रिप्राईज (सोनू निगम)


"राजनीति" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
तो दोस्तों, अब आपकी बारी है, कहिए 'राजनीति' के गानें कैसे लगे आपको? क्या कुछ ख़ास बात लगी इन गीतों में? क्या आपको लगता है कि चार अलग अलग तरह के गीतकार-संगीतकार जोड़ियों से फ़िल्म के गीत संगीत पक्ष को फ़ायदा पहुँचा है? प्रकाश झा के दूसरे फ़िल्मों के गीत संगीत की तुलना में इस फ़िल्म को आप क्या मुक़ाम देंगे? ज़रूर लिख कर बताइएगा टिप्पणी में।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५५- हाल ही में ख़बर छपी थी कि रणबीर कपूर लता जी से मिलने वाले हैं किसी ख़ास मक़सद के लिए। बता सकते हैं क्या है वह ख़ास मक़सद?

TST ट्रिविया # ५६- गीतकार समीर एक इंटरविउ में बता रहे हैं - "मैने अपना गीत जब अमित जी (अमिताभ बच्चन) को सुनाया, तो वो टेबल पर खाना खा रहे थे। वो गाने लगे और रोने भी लगे, उनको अपनी बेटी श्वेता याद आ गईं।" दोस्तों, जिस गीत के संदर्भ में समीर ने ये शब्द कहे, उस गीत को आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया था। अंदाज़ा लगा सकते हैं कौन सा गीत है यह?

TST ट्रिविया # ५७- प्रकाश झा ने 'राजनीति' में गुलज़ार साहब से एक गीत लिखवाया है। क्या आप १९८४ की वह मशहूर फ़िल्म याद कर सकते हैं जिसमें गुलज़ार साहब ने प्रकाश झा के साथ पहली बार काम किया था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रशान्त तामांग।
२. प्रकाश मेहरा, जिन्होने लिखा था "जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों"।
३. फ़िल्म 'अपना सपना मनी मनी' में "देखा जो तुझे यार, दिल में बजी गिटार"।

सीमा जी, आपके दोनों जवाब सही हैं। तीसरे सवाल का जवाब तो आपने जान हीं लिया। दिमाग पर थोड़ा और जोड़ देतीं तो इस सवाल का जवाब भी आपके पास होता। खैर कोई नहीं.. इस बार की प्रतियोगिता में हिस्सा लीजिए।

Tuesday, March 16, 2010

कुछ नया नहीं है "सदियाँ" के संगीत में, अदनान सामी और समीर ने किया निराश

ताज़ा सुर ताल ११/२०१०

सजीव - सुजॊय, तुम्हे याद होगा, २००५ में एक फ़िल्म आई थी 'लकी', जिसमें सलमान ख़ान थे। याद है ना उस फ़िल्म का संगीत?

सुजॊय - बिल्कुल याद है, उसमें अदनान सामी का संगीत था और उसके गानें ख़ूब चले थे। लेकिन आज अचानक उस फ़िल्म का ज़िक्र क्यों?

सजीव - क्योंकि आज हम 'ताज़ा सुर ताल' में जिस फ़िल्म के गीतों की चर्चा करने जा रहे हैं, उस फ़िल्म का संगीत ही ना केवल अदनान सामी ने तैयार किया है, बल्कि गीतों के रीदम और धुनें भी काफ़ी हद तक 'लकी' के गीतों से मिलती जुलती है। आज 'ताज़ा सुर ताल' में ज़िक्र आने वाली फ़िल्म 'सदियाँ' के संगीत की।

सुजॊय - यह बात तो सही है कि अदनान सामी का रीदम उनके गीतों की पहचान है। जैसे हम गीत सुन कर बता सकते हैं कि गीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का है या कल्याणजी आनंदजी का या फिर राहुल देव बर्मन का, ठीक वैसे ही अदनान साहब का जो बेसिक रीदम है, वह झट से पहचाना जा सकता है। हम किस रीदम की तरफ़ इशारा कर रहे हैं, हमारे श्रोता इस फ़िल्म के गीतों को सुनते हुए ज़रूर महसूस कर लेंगे।

सजीव - इससे पहले कि गीतों का सिलसिला शुरु करें, मैं यह बता दूँ कि 'सदियाँ' राज कनवर की फ़िल्म है और उन्होने ही इसे निर्देशित भी किया है। फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ अदा की हैं लव सिन्हा, फ़रेना वज़ीर, रेखा, ऋषी कपूर, शबाना आज़मी और हेमा मालिनी ने।

सुजॊय - तो चलिए शुरु करते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत। शान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "जादू नशा अहसास क्या"। समीर की गीत रचना है और धुन वही, अदनान सामी स्टाइल वाली। और रीदम भी वही जाना पहचाना सा। गीत ठीक ठाक बना है, कोई ख़ास बात वैसे नज़र नहीं आती। सुनते हैं। गीत सुन कर बताइएगा कि क्या आपको "सुन ज़रा सोनिये सुन ज़रा" गीत की याद आई कि नहीं।

गीत - "जादू नशा अहसास क्या"


सजीव - दूसरा गाना है मिका की आवाज़ में, "मनमौजी मतवाला"। इस गीत में भी कोई नवीनता नहीं है। वही पंजाबी पॊप भंगड़ा वाली रीदम। गीत की शुरुआत "दिल बोले हड़िप्पा" गीत की तरह लगती है।

सुजॊय - इस गीत को सुन कर फ़िल्मी गीत कम और पंजाबी पॊप ऐल्बम ज़्यादा लगता है। बेहद साधारण गीत है, और इसे भी समीर साहब ने ही लिखा है। वैसे इस गीत को थोड़ा सा और जुनूनी और स्पिरिचुयल अंदाज़ में अगर बनाया जाता और कैलाश खेर शैली में गवाया जाता, तो शायद कुछ और ही रंग निखर कर आता। सुनते हैं।

गीत - "मनमौजी मतवाला"


सजीव - तीसरा गीत बिल्कुल पहले गीत की ही तरह है, और इसे श्रेया घोषाल ने राजा हसन के साथ मिल कर गाया है, "सरग़ोशियों के क्या सिलसिले हैं"। अच्छा सुजॊय, बता सकते हो ये राजा हसन कौन है?

सुजॊय - हाँ, अगर मैं ग़लत नहीं तो वही राजा हसन जिन्होने ज़ी सा रे गा मा पा में एक जाने माने प्रतिभागी थे और उसके बाद भी कई रीयल्टी शोज़ में नज़र आए थे।

सजीव - ठीक पहचाना। इस गीत का रीदम भी वही अदनान रीदम है। समीर ने इस गीत में अच्छे बोल दिए हैं। शुरुआती बोल कुछ ऐसे हैं कि "अहसास ख़्वाहिशों का सांसों में मर ना जाए, सदियाँ गुज़र गई हैं लम्हा गुज़र ना जाए"। इस ग़ज़लनुमा गीत को सुनते हुए अच्छा लगता है।

सुजॊय - मैंने यह गीत सुना है और मेरा रवैय्या भी इस गीत के लिए सकारात्मक ही है। आइए सुनते हैं।

गीत - "सरग़ोशियों के क्या सिलसिले हैं"


सुजॊय - चौथे गीत में अदनान सामी की ही आवाज़ है और उनके साथ हैं सुनिधि चौहान। इस बार गीतकार समीर नहीं बल्कि अमजद इस्लाम अमजद हैं। "तारों भरी है ये रात सजन"।

सजीव - यह गीत भी अदनान सामी के एक पहले के गीत से इन्स्पायर्ड है।

सुजॊय - कौन सा?

सजीव - इस गीत को पहले सुनो और फिर तुम ही बताओ कि किस गीत से इसकी धुन मिलती जुलती लगती है। अदनान सामी का ऒर्केस्ट्रेशन ९० के दशक की तरह है। स्ट्रिंग्स और तमाम देशी और विदेशी साज़ों की ध्वनियों का प्रयोग सुनने को मिलता है, भले ही उन्हे सीन्थेसाइज़र पर बनाया गया हो। सुनिधि ने इस गीत को पतली और नर्म आवाज़ में गाया है। सुनिधि एक बेहद वर्सेटाइल गायिका हैं और किसी भी तरह का गीत बख़ूबी निभा लेती हैं। इस गीत में भी उसी प्रतिभा का परिचय उन्होने दिया है।

गीत - "तारों भरी है ये रात सजन"


सजीव - पता चला कुछ?

सुजॊय - हाँ, "तारों भरी है ये रात सजन" वाला हिस्सा सुन कर फ़िल्म 'सलाम-ए-इश्क़' का "दिल क्या करे" गीत के मुखड़े की याद आती है।

सजीव - बस, मैं यही सुनना चाहता था। 'सदियाँ' में कुल ८ गानें हैं, जिनमें से ५ गानें हम यहाँ पर सुन रहे हैं आज। आज का अंतिम गाना इस फ़िल्म का शीर्षक गीत है और इस गीत को सुनवाए बिना इस फ़िल्म के गीतों की चर्चा पूरी नहीं हो सकती। इसे गाया है रेखा भारद्वाज ने। "वक़्त ने जो बीज बोया"। धुन और बोल, दोनों के लिहाज़ से यह गीत इस फ़िल्म का सब से अच्छा गीत है। रेखा जी इन दिनों एक के बाद एक गीत गा रही हैं, और हर एक गीत को लोग हाथों हाथ ले रहे हैं।

सुजॊय - निस्संदेह इस गीत की वजह से इस ऐल्बम का स्तर काफ़ी उपर आ गया है। कुल मिलाकर 'सदियाँ' का संगीत सुरीला है और उम्मीद है जनता इसे स्वीकार करेगी। तो चलिए सुनते हैं यह अंतिम गीत।

गीत - "वक़्त ने जो बीज बोया"


"सदियाँ" के संगीत को आवाज़ रेटिंग **
यहाँ सब कुछ चिरपरिचित है. बड़े बड़े गायक गायिकाओं के नाम हैं गीत में दर्ज पर उस स्तर के नहीं हैं गीत सरंचना. शब्द भी समीर के कुछ नया नहीं देते. नदीम श्रवण और आनंद मिलिंद दौर की याद ताज़ा हो आती है. राज कन्वर संगीत में अपने टेस्ट के मामले में आज के दौर की ताल शायद नहीं भांप पाए हैं. फिल्म का संगीत "लेट डाउन" है.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ३१- अदनान सामी का गाया वह कौन सा गीत है जिसका भाव फ़िल्म 'जाँबाज़' के "हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार ज़िंदगी में" गीत से मिलता जुलता है?

TST ट्रिविया # ३२ "फिर वह फ़िल्म आई जिसका मैं कहूँ कि गाना मैंने बहुत बार सुना, तब जाके लगा कि सही मयने में पिताजी एक गीतकार हैं और उन्होने एक अच्छी फ़िल्म लिखी है। और वह गाना था 'बिना बदरा के बिजुरिया कैसे चमकी'।" बताइए ये शब्द किसने कहे थे।

TST ट्रिविया # ३३ शान और श्रेया घोषाल ने साथ में सन् २००२ की एक फ़िल्म में एक युगलगीत गाया था "दिल है दीवाना"। बताइए फ़िल्म का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी बहुत आगे बढ़ चुकी हैं, इस साल भी उनकी जीत अब तक तो सुनिचित ही लग रही है, बधाई

Monday, September 7, 2009

फुल टू एटीटियुड, दे दे तू ज़रा....अपनी नयी आवाज़ में हिमेश बजा रहे हैं मन का रेडियो

ताजा सुर ताल (20)

ताजा सुर ताल में आज हिमेश लौटे हैं नयी आवाज़ में नए गीत के साथ

सुजॉय - सजीव, एक गायक संगीतकार ऐसे हैं आज के दौर में जिनके बारे में इतना कहा जा सकता है कि चाहे लाख विवादों से वो घिरे रहे हों, लेकिन उनके गीत संगीत हमेशा कामयाब रहे हैं। कभी उनकी टोपी पहनने की अदा को लेकर लोगों ने मज़ाक बनाया, तो कभी उनके नैसल गायिकी पर लोगों ने समालोचना की। उनके संगीत को सुन कर गुजरात के किसी गाँव में भूतों के सक्रीय हो जाने की भी ख़बर फैली थी। और एक बार तो इन्होने ख़ुद ही आफ़त मोल ली थी एक बड़े संगीतकार के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी कर के।

सजीव- मैं तुम्हारा इशारा समझ गया, तुम हिमेश रेशमिया की ही बात कर रहे हो ना?

सुजॉय- बिल्कुल! कहते हैं ना कि 'any publicity is good publicity', तो इन सब कारणों से हिमेश को फ़ायदा ही हुआ। वैसे भी हिमेश जानते हैं कि इस पीढ़ी के जवाँ दिलों पर किस तरह से असर किया जा सकता है। तभी तो उनकी फ़िल्में चले या ना चले, उनका संगीत ज़रूर हिट हो जाता है। शायद ही उनका कोई ऐसा फ़िल्म हो जिसके गानें कामयाब न रहे हों!

सजीव- बिल्कुल ठीक कहा तुमने। बहुत दिनों के बाद हिमेश लौटे हैं अपनी नई फ़िल्म 'रेडियो- लव ऑन एयर' के साथ, जिसमें वो एक बार फिर से नायक भी हैं, गायक भी, और संगीतकार तो हैं ही। तो इसका मतलब आज तुम हमारे श्रोताओं को इसी फ़िल्म का गीत सुनवाने जा रहे हो?

सुजॉय- जी हाँ। इस फ़िल्म में हिमेश ने एक रेडियो जॉकी की भूमिका निभाई है। क्या आप कुछ और ऐसी फ़िल्मों के नाम गिना सकते हैं जिनमें नायक या नायिका रेडियो जॉकी के रोल निभाए हैं?

सजीव- प्रीति ज़िंटा ने 'सलाम नमस्ते' में और विद्या बालन ने 'लगे रहो मुन्ना भाई' में।

सुजॉय- बिल्कुल। एक और फ़िल्म आई थी अभी दो तीन साल पहले, '99.9 FM' के शीर्षक से, जिसमें नायक एक RJ होता है। अब देखना यह है कि हिमेश भाई क्या नया हमें दिखाते हैं इस फ़िल्म में।

सजीव- हिमेश के करीयर पर अगर ग़ौर करें तो हम इसे तीन भागों में बाँट सकते हैं। पहला भाग वह है जब वो केवल संगीतकार हुआ करते थे। जैसे कि 'प्यार किया तो डरना क्या', 'जोड़ी नम्बर वन', 'क्या दिल ने कहा', 'हेलो ब्रदर', 'तेरे नाम', 'कहीं प्यार ना हो जाए', 'चोरी चोरी चुपके चुपके', 'कुरुक्षेत्र', 'दुल्हन हम ले जाएँगे', 'हमराज़', 'चुरा लिया है तुमने', 'दिल माँगे मोर', 'ऐतराज़', और भी न जाने कितनी ऐसी फ़िल्में हैं जिनका संगीत उस ज़माने में सुपर डुपर हिट हुआ था। फिर उसके बाद आया वह दौर जिसमें हिमेश ने संगीत देने के साथ साथ अपनी आवाज़ भी मिलाई और चारों तरफ़ गूँजने लगे "आशिक़ बनाया आपने" के स्वर।

सुजॉय- वाक़ई बेहद मशहूर हुआ था यह गीत, और सब से मज़ेदार बात यह कि इस पहले ही गीत के लिए हिमेश को उस साल का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार नही बल्कि सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड मिला था। इससे पहले फ़िल्म-फ़ेयर के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि किसी गायक-संगीतकार को गायन के लिए यह पुरस्कार दिया गया हो। इस फ़िल्म के बाद तो हिमेश ने कई फ़िल्मों में संगीत के साथ साथ गायन भी किया जैसे कि 'अक्सर', 'टॉम डिक ऐंड हैरी', '३६ चायना टाउन', 'हेरा फेरी' वगैरह वगैरह ।

सजीव- और तीसरा हिस्सा है वह हिस्सा जिसमें संगीतकार और गायक हिमेश रेशम्मिया बन गये एक नायक भी। 'आपका सुरूर', और 'कर्ज़' के बाद अब वो नज़र आएँगे 'रेडियो- लव ऑन एयर' में। रवि अगरवाल निर्मित इस फ़िल्म में हिमेश की नायिका बनीं हैं शेरनाज़ ट्रेज़रीवाला। और क्योंकि फ़िल्म रेडियो पर है, तो रेडियो मिर्ची बनें हैं इस फ़िल्म के मुख्य पार्टनर। रेडियो मिर्ची के जीतूराज हिमेश के पसंदीदा जॊकी हैं, और उन्ही का अंदाज़ इख़्तियार किया है हिमेश ने इस फ़िल्म में।

सुजॉय- सुनने में आया है कि इस फ़िल्म के लिए हिमेश ने कुछ औपरेशन करवाए हैं जिससे कि अब वो दो अलग अलग आवाज़ों में गा सकते हैं।

सजीव- सुना तो मैने भी है। और इस फ़िल्म के शीर्षक गीत "मन का रेडियो बजने दे ज़रा" में उनकी नई आवाज़ सुनाई देती है। कोई अगर बता न दे आपको तो शायद मुखड़ा सुन कर गेस न कर पाएँ कि इसे हिमेश ने गाया है। लेकिन जैसे ही अंतरे में ऊँचे सुर में वो गाते हैं तो वही पुराना हिमेश वापस आजाते हैं।

सुजॉय- हा हा हा ...वैसे तो गीत में बहुत ख़ास कुछ नहीं है, लेकिन बार बार सुनते सुनते गीत का रीदम जब ज़हन में उतर जाता है तो दिल थिरकने लगता है। इस गीत से बिल्कुल अलग हट के एक और रेडियो पर गीत इस फ़िल्म में हिमेश ने गाया है "ज़िंदगी जैसे एक रेडियो" जो पंजाबी भांगडा और पाश्चात्य संगीत का फ़्युज़न है, जिसमें ढोल के साथ साथ हिमेश ने भी खुल के अपनी आवाज़ मिलाई है।

सजीव- लेकिन सब से लाजवाब गीत इस फ़िल्म का मुझे जो लगता है वह है श्रेया घोषाल और हिमेश के युगल स्वरों में गाया हुआ "जानेमन"। इस साल अब तक जितने भी युगल गीत आए हैं उनमें यह टॉप टेन में ज़रूर आनी चाहिए।

सुजॉय - बिल्कुल, बहुत ही नर्मोनाज़ुक गीत। मेरे एक दोस्त का कहना है कि यह गीत 'कैंडल लाइट डिनर' के लिए सटीक है। एक और गीत है रेखा भारद्वाज के साथ, "पिया जैसे लड्डू मोतीचूर वाले", जिसमें हिमेश के शास्त्रीय संगीत पर अच्छी पकड़ के सबूत मिलते हैं।

सजीव- वैसे इस एल्बम को सुनकर लगता है की हिमेश अपनी उस पुरानी शैली में कुछ कुछ वापस आये हैं... जिसमें उन्होने कुछ बहुत ही मेलोडियस नाज़ुक-ओ-तरीन रोमांटिक गीत बनाए थे.

सुजॉय- हाँ मेरा भी यही ख्याल है. अब देखना यह है कि क्या इस फ़िल्म के गानें भी 'तेरे नाम' जैसा कमाल कर दिखाएगा! सजीव, आप क्या रेटिंग्‍ दे रहे हैं इस गीत को? मेरी तरफ़ से तो ४ अंक देता हूँ।

सजीव - मेरी तरफ से है ३.५...."तेरे नाम" जैसी कामियाब इस एल्बम को मिलेगी ये कहना ज़रा मुश्किल है. पर हाँ प्रस्तुत गीत के साथ साथ "जिंदगी जैसे एक रेडियो.." और "जानेमन" गीत जरूर हिट होंगें ये तय है....फिलहाल हम अपने श्रोताओं पर छोड़ते हैं की हिमेश की तथाकथित नयी आवाज़ में गीत "मन का रेडियो..." को वो कितने अंक देते हैं....

सुजॉय - गीत के बोल कुछ ऐसे हैं -

मन का रेडियो बजने दे ज़रा,
गम को भूल कर जी ले तू ज़रा,
स्टेशन कोई नया टियून कर ले ज़रा,
फुल टू एटीटियुड, दे दे तू ज़रा,
टूटा दिल, क्या हुआ,
हो गया जो हुआ....
भूले बिसरे गीत, गा के भूल जा,
बदल जो रिधम, उस पे झूल जा,
फुल टू एटीटियुड, दे दे तू ज़रा...
मन का रेडियो...

क्या होगा क्या नहीं होगा,
उपर वाले पे छोड़ दे,
आज इस पल में तू,
जिंदगी को जी ज़रा,
तुझको आकाश की वाणी का आसरा...
टुटा दिल...

क्या खोया क्या नहीं पाया,
उसपे रोना तू छोड़ दे,
बैंड जो बजे तेरा,
खुल के तू भी साथ गा,
दर्द ही बने दवा, फंडा है ये लाइफ का....
टुटा दिल....

मन का रेडियो....


और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3.75 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.हाल ही में प्रर्दशित फिल्म "मोहनदास" एक साहित्यिक कृति पर आधारित है, कौन हैं इस मूल उपन्यास के लेखक... बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया सीमा जी ने, हिमेश रेशमिया के करियर के विभिन्न आयामों से तो अब आप सब परिचित हो ही गए हैं, सीमा जी बधाई...मंजू जी, शमिख जी और विनोद जी रेटिंग देने के लिए शुक्रिया


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, November 13, 2008

क्या फिर लौटेगा "आशिकी" का दौर


वो १९७२ में मिले थे एक दूजे से। १९८१ में आई फ़िल्म "मैंने जीना सीख लिया" से इस संगीतकार जोड़ी ने कदम रखा फ़िल्म जगत में। "हिसाब खून का", "लश्कर", और "इलाका" जैसी फिल्मों में इनका काम किसी की भी नज़र में नहीं आया, फिर इन्हें मिला संगीत की दुनिया में नई मिसाल बनाने की योजनायें लेकर दिल्ली से मुंबई पहुंचे गुलशन कुमार का साथ। १९९० में आई महेश भट्ट निर्देशित फ़िल्म "आशिकी" ने संगीत की दुनिया को हिला कर रख दिया, और उभर कर आए - नदीम-श्रवण। एक ऐसा दौर जब फ़िल्म संगीत अश्लील शब्दों और भौंडे संगीत की गर्त में जा रहा था, एक साथ कई नए कलकारों ने आकर जैसे संगीत का सुनहरा दौर वापस लौटा दिया। शुरूआत हुई आनंद मिलिंद के संगीत से सजी फ़िल्म "क़यामत से क़यामत तक" से और इसी के साथ वापसी हुई रोमांस के सुनहरे दौर की भी। फ़िल्म "आशिकी" भी इसी कड़ी का एक हिस्सा थी, कमाल की बात यह थी कि इस फ़िल्म के सभी गीत एक से बढ़कर एक थे और बेहद मशहूर हुए। इसके बाद नदीम-श्रवण ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक सुपर हिट संगीत से सजी फिल्में -दिल है कि मानता नहीं, साजन, सड़क, फूल और कांटे, दीवाना....और सूची लम्बी होती चली गई। नदीम-श्रवण के साथ साथ गीतकार समीर, गायक कुमार सानू, अलका याग्निक, और साधना सरगम ने भी कमियाबी का स्वाद चखा। लगातार तीन सालों तक वो फ़िल्म फेयर सम्मान के सरताज रहे, १९९६ में "राजा हिन्दुस्तानी" और १९९७ में आई "परदेश" जैसी फिल्मों से उन्होंने अपना एक नया अंदाज़ दुनिया के सामने रखा.

गुलशन कुमार की निर्मम हत्या और नदीम पर लगे आरोपों ने संगीत के इस सुहावने सफर में एक ग्रहण का काम किया। लंबे समय तक इस जोड़ी ने फिल्मों से ख़ुद को दूर रखा, २००५ में लन्दन से फ़ोन कर नदीम ने श्रवण से कहा कि "मैं कुछ समय तक अपने परफ्यूम के काम पर ध्यान देना चाहता हूँ..." इसी के साथ लगा कि यह जोड़ी अब टूट गई। श्रवण की सुनें तो उन्होंने स्वीकार किया कि-"नदीम की इस बात से वो आहत ज़रूर हुए, शुरू में नहीं समझ पाये कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, पर अब सोचता हूँ कि यह अन्तराल हम दोनों के लिए ज़रूरी सा था"।

एक समय आया जब यह जोड़ी संगीत-प्रेमियों की नज़र से ओझल हो गई। लेकिन कलाकार काम किये बिने चैन नहीं पाता। श्रवण ने अकेले ही 'सिर्फ़ तुम' में संगीत दिया और बहुत हिट हुए। लेकिन संगीत प्रेमियों को संगीत को वह सुंगंध और ताजगी एकाकी संगीत में नहीं मिली। न्यायिक कारणों ने सिर्फ तुम के एल्बम पर संगीतकार का नाम तक नहीं लिखा गया।

इस जोड़ी ने 'राज़' से दुबारा वापसी की, या यूँ कहिए कि दमदार वापिसी की। वैसे धड़कन फिल्म के संगीत ने ही इस जोड़ी ने लौटने का संकेत दे ही दिया था, लेकिन इनकी संगीत का असली फ्लैवर राज़ में दिखा। इसके बाद कसूर का संगीत हिट हुआ। संगीत प्रेमियों के लिए अब ये खुशी की बात है कि अब ये जोड़ी एक बार फ़िर साथ में काम करेगी, और वो भी फूरे जोर-शोर के साथ। डेविड धवन की "डू नोट डिसटर्ब" और धर्मेश दर्शन की "बावरा" है उनकी आने वाली फिल्में। हो सकता है फ़िर कुछ ऐसे नगमें सुनने को मिलें जो बरसों तक यादों में बसे रहें।
आइए सुनते हैं इसी जोड़ी द्वारा संगीतबद्ध कुछ एवरग्रीन गीत


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