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Saturday, January 26, 2013

'सिने पहेली' में आज गणतंत्र दिवस विशेष

26 जनवरी, 2013
सिने-पहेली - 56  में आज 

सुलझाइये देशभक्ति गीतों की पहेलियाँ

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, जनवरी महीने का आख़िरी सप्ताह हम सभी भारतीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है। 23 जनवरी को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जनमदिवस, 26 जनवरी को प्रजातंत्र दिवस, और 30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का स्मृति दिवस जो शहीद दिवस के रूप में पालित होता है। रेडियो प्लेबैक इंडिया पर भी इसलिए यह सप्ताह देशभक्ति के रंग से सराबोर है। और आज की 'सिने पहेली' में भी हमने चढ़ाया है देशभक्ति का रंग। कितनी जानकारी रखते हैं आप फ़िल्मी देशभक्ति गीतों की, इसी की आज परीक्षा है आपकी। देखते हैं आप सुलझा पाते हैं या नहीं इन देशभक्ति गीतों की पहेलियों को!



आज की पहेली : वतन के तराने



ज 26 जनवरी 2013 है, आज समूचा राष्ट्र मना रहा है अपना 64-वाँ गणतंत्र दिवस है। गर्व और उल्लास भरे आपके इस दिन को और भी ख़ास बनाने के लिए हम लेकर आए हैं कुछ ऐसी पहेलियाँ जिनमें छुपी हुई हैं फ़िल्मी देशभक्ति गीत। नीचे दिए गए सवालों को ध्यान से पढ़िये, चित्रों पर ग़ौर कीजिए और पहचानिए इन गीतों को।

1. नीचे दिया हुआ चित्र इस गीत के फ़िल्म के पोस्टर का एक हिस्सा है। इस फ़िल्म में एक ऐसा देशभक्ति गीत है जिसमें पुरुष स्वर एक ऐसे गायक का है जिनके पिता एक महान पार्श्वगायक रहे हैं। इस गीत में जो महिला स्वर है उन्होंने टी-सीरीज़ म्युज़िक कंपनी के साथ अनुबंधित रह कर एक से एक लाजवाब गीत हमें दिए हैं 80 और 90 के दशकों में। क्या आप बता सकते हैं कि हम किस देशभक्ति गीत की तरफ़ इशारा कर रहे हैं और फ़िल्म का नाम क्या है? (1+1=2 अंक)




2. इन दो दृश्यों को देख कर बताइए कि यह कौन सा देशभक्ति गीत है और इस गीत में अभिनेत्री कौन हैं? (1+1=2 अंक)




3. नीचे दो दृश्य दिखाये गए हैं और दोनों में दिखाए गए चरित्र क्रैच की मदद से खड़े हैं। क्या आप इन दो गीतों को पहचान सकते हैं? (2+2=4 अंक)





4. नीचे एक बहुत ही मशहूर देशभक्ति गीत के दो दृश्य दिखाए गए हैं। बताइए इस गीत के गीतकार का नाम। (2 अंक)






जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 56" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 31 जनवरी शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली का हल

1. आशा भोसले के गाये इस गीत में "फ़िल्मी गीत" है तो उन्हीं के गाये एक अन्य गीत में "फ़िल्म का गाना" है। किन दो गीतों की तरफ़ हमारा इशारा है?

सही जवाब: फ़िल्म 'आन मिलो सजना' के गीत "पलट मेरी जान" के एक अंतरे में पंक्ति है "सोचा था ये मैंने मुझसे नैन वो लड़ायेगा, सीटी वो बजाके कोई फ़िल्मी गीत गायेगा", तथा 'लव स्टोरी' फ़िल्म के गीत "ये लड़का ज़रा सा दीवा लगता है" के एक अंतरे में पंक्ति है "किसी नई फ़िल्म का गाना लगता है"।

2. रफ़ी साहब के गाये किस गीत में "फ़िल्मों के सितारे" शब्द आते हैं? इस गीत में राज कपूर भी नज़र आते हैं।

सही जवाब: "जॉन जानी जनार्दन तररम पम पम पम पम"

3. आप ने कई जगहों पर नोटिस लगा हुआ देखा होगा कि यह आम रस्ता नहीं है। बताइये कि आनन्द बक्शी साहब ने किस गीत में इस चीज़ का इस्तमाल किया है?

सही जवाब: "देखो मैंने देखा है ये एक सपना" (लव स्टोरी) गीत में पंक्ति है "रस्ता नहीं यह आम लिखा है"।

4. कल (18 जनवरी) को जिस महान कलाकार की पुण्यतिथि थी, उनकी किसी फ़िल्म में गाई हुई एक ठुमरी को आगे चलकर एक अन्य फ़िल्म में भी शामिल की गई जिसे दो ग़ज़ल गायकों ने गाया। इन दोनों फ़िल्मों के नाम बताइये?

सही जवाब: 'स्ट्रीट सिंगर' व 'आविष्कार'

पिछली पहेली का परिणाम

लगता है इस बार 'सिने पहेली' में पूछे गए सवाल थोड़े से मुश्किल थे, जिस वजह से इस बार केवल 5 प्रतियोगियों ने ही भाग लिया। सबसे पहला जवाब भेजा लखनऊ के श्री चन्द्रकान्त दीक्षित ने, पर आप सभी सवालों के जवाब नहीं दे पाए, और न ही किसी अन्य प्रतियोगी ने 100% सही जवाब भेजे हैं। इसलिए इस सप्ताह कोई भी प्रतियोगी 'सरताज प्रतियोगी' नहीं बन पाए हैं। आइए अब नज़र डालते हैं इस सेगमेण्ट के अब तक के सम्मिलित स्कोरकार्ड पर।





नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?
1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। पाँचवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार। 

Thursday, January 26, 2012

छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम...

वन्देमातरम्गीत के रचनाकार 
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय 

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में बलिदानी क्रान्तिकारियों और आन्दोलनकारियों के हम सदैव ऋणी रहेंगे, परन्तु  इस दौर में कलम के सिपाहियों का योगदान भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम कुछ ऐसे कवियों और शायरों का स्मरण करने जा रहे हैं, जिनकी कलम ने तलवार का रूप धारण कर ब्रिटिश हुकूमत के छक्के छुड़ा दिये। इन गीतों के उग्र तेवर से भयभीत होकर तत्कालीन सरकार ने इन्हें प्रतिबन्धित तक कर दिया।




स्वरगोष्ठी – ५४ में आज – गणतन्त्र दिवस विशेषांक

स्वतन्त्रता संग्राम के प्रतिबन्धित गीतों पर एक चर्चा

आज गणतन्त्र दिवस के अवसर पर ‘स्वरगोष्ठी’ के इस विशेष अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके बीच उपस्थित हूँ। मित्रों, आज हम आपसे किसी फिल्म संगीत, राग, ताल या किसी वरिष्ठ कलासाधक पर चर्चा नहीं, बल्कि कुछ ऐसे दुर्लभ गीतों पर चर्चा करेंगे, जिन्हें भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान लिखे और गाये गए। इन गीतों के रचनाकारों ने कलम को तलवार बना कर गीतों से जनमानस को उद्वेलित कर दिया। आज की गोष्ठी में हम ऐसे ही कुछ गीतों पर चर्चा करेंगे।

वर्ष १९९७ में पूरे देश में स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती मनाई गई थी। इस विशेष अवसर के लिए राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगठन ‘संस्कार भारती’ ने मुझे स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान जब्तशुदा,प्रतिबन्धित गीतों पर शोध का दायित्व सौंपा था। लगभग एक वर्ष के दौरान मैंने ऐसे साढ़े तीन सौ कविताओं और गीतों का संग्रह किया था। इनमें से अधिकतर कविता के रूप में हैं। लगभग ७०-७५ रचनाएँ लोकगीत के रूप में और लगभग ५० गीत विधिवत छन्दबद्ध हैं। इस संकलन में एक ऐसा भी गीत है जिसकी रचना १८५७ में की गई थी। १८५७ के प्रथम क्रान्ति के सेनानियों में एक प्रमुख नाम अज़ीमुल्ला खाँ का है। ये अज़ीमुल्ला खाँ नाना साहब पेशवा के वकील थे। इस क्रान्ति की पूरी योजना इन्हीं की बनाई हुई थी। १८५७ क्रान्ति के दौरान अज़ीमुल्ला खाँ ने ‘पयाम-ए-आज़ादी’ नामक पत्र निकाला। इस पत्र में उन्हीं का रचा एक झण्डा गीत प्रकाशित हुआ था, जिसकी आरम्भिक पंक्तियाँ हैं- ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा...’। क्रान्तिकारी अखबार में यह गीत प्रकाशित होते ही स्वतन्त्रता सेनानियों को एक नया हथियार मिल गया और अंग्रेजों की नींद हराम हो गई। इस गीत में एक ओर जहाँ जनचेतना जगाने की शक्ति थी, वहीं अंग्रेजों को दी गई सीधी चुनौती भी। भयभीत होकर तत्कालीन हुकूमत ने गीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया। जिसके पास इस अखबार की प्रति मिलती या जो कोई भी इस गीत को गाते-गुनगुनाते पाया जाता उसे कठोर यातनाएँ दी जाती थी। आइए, आज हम आपको स्वतन्त्रता संग्राम का यही प्रतिबन्धित गीत सुनवाते हैं।

प्रतिबन्धित गीत : ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा...’ : रचना – क्रान्तिवीर अज़ीमुल्ला खाँ


उन्नीसवीं शताब्दी का एक और बेहद लोकप्रिय किन्तु प्रतिबन्धित गीत रहा है, ‘वन्देमातरम्’। इस कालजयी गीत की रचना १८७५ में सुप्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने की थी। १८८२ में जब उनके उपन्यास ‘आनन्दमठ’ का प्रकाशन हुआ, तब यह गीत उसमें शामिल किया गया था। यह उपन्यास अंग्रेज़ शासकों के शोषण और अकाल जैसे प्रकृतिक प्रकोप से मर रही जनता को जागृत करने के लिए अचानक उठ खड़े संन्यासी विद्रोह पर आधारित है।‘आनन्दमठ’ उपन्यास में यह गीत भवानन्द नामक संन्यासी ने गाया है। ‘वन्देमातरम्’ गीत के प्रकाशन के बाद बंगाल में आयोजित होने वाले स्वतन्त्रता आन्दोलनों में गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया कि तत्कालीन सरकार भयभीत हो उठी। १८९६ में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया, जिसे यदुनाथ भट्टाचार्य ने संगीतबद्ध किया था। १९०१ में कलकत्ता में ही हुए एक अन्य अधिवेशन में चरणदास ने और १९०५ के बनारस अधिवेशन में सरलादेवी चौधरानी ने यह गीत गाया। अब तक ‘वन्देमातरम्’गीत मात्र एक नारा नहीं बल्कि मंत्र बन चुका था। इसका उच्चारण करते हुए स्वतन्त्रता सेनानी लाठी, गोली सह लेते। इस मंत्र का उच्चारण करते हुए अनेक बलिदानी हँसते हुए फाँसी पर झूल गए। इस गीत की शक्ति से घबरा कर ब्रिटिश सरकार ने अन्ततः इसे प्रतिबन्धित कर दिया। प्रतिबन्ध लगते ही कवियों और गीतकारों ने गीत को जीवित रखने का एक दूसरा रास्ता अपनाया। इन्होने ‘वन्देमातरम्’ की प्रशस्ति में एक छन्द विशेष में गीत-रचना शुरू कर दिया। १९२९ में देहारादून के अभय प्रेस से ‘चिंगारी’ नामक गीत संग्रह प्रकाशित हुआ था, जिसमें विश्वनाथ शर्मा का गीत ‘कौम के खादिम की है जागीर वन्देमातरम...’ शामिल था। इससे पूर्व इसी छन्द में पण्डित कन्हैयालाल दीक्षित ‘इन्द्र’ ने ‘वन्देमातरम्’ पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के बाद गीत लिखा था- ‘छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्...’। इसके अलावा शोध के दौरान मुझे इसी छन्द में कुछ ऐसे गीत मिले थे, जिनके रचनाकारों के नाम अज्ञात रहे। आगे चल कर ये सभी गीत भी प्रतिबन्धित हुए। अब आप सुनिए, ‘वन्देमातरम्’ गीत की प्रशस्ति में रचे गएप्रतिबन्धित गीतों में से एक-एक अन्तरे को मिला कर प्रस्तुत यह गीत-

गीत - ‘छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्...’ : रचना - विश्वनाथ शर्मा,कन्हैयालाल दीक्षित एवं दो अज्ञात गीतकार


तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद बंकिम बाबू की यह कालजयी रचना क्रान्तिकारियों के साथ-साथ अहिंसक आन्दोलनकारियों का भी मंत्र बना हुआ था। इस मंत्र का प्रयोग विभिन्न आन्दोलनों के अलावा अन्य महत्त्वपूर्ण अवसरों पर भी किया जाता रहा। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस अखबार का प्रकाशन आरम्भ किया था, उसका नाम ‘वन्देमातरम्’ रखा गया। अंग्रेजों की गोली से घायल होकर दम तोड़ने वाली मातंगिनी हाज़रा ने मरते समय ‘वन्देमातरम्’ का ही उदघोष किया था। १९०७ में मैडम भीखाजी कामा ने स्टुट्गार्ट, जर्मनी में जो तिरंगा झण्डा फहराया,उसके मध्य में ‘वन्देमातरम्’ शब्द अंकित था। आर्य प्रिंटिंग प्रेस, लाहौर और भारतीय प्रेस,देहरादून से १९२९ में प्रकाशित पुस्तक ‘क्रान्ति गीतांजलि’ का पहला गीत ‘वन्देमातरम्’ था, जिसेब्रिटिश सरकार ने प्रतिबन्धित कर दिया था।

आज़ादी के बाद बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय रचित ‘वन्देमातरम्’ गीत के प्रारम्भिक दो अन्तरों को संविधान सभा ने राष्ट्रगान ‘जन गण मन...’ के समतुल्य मान्यता दी। २४जनवरी, १९५० को डॉ.राजेन्द्रप्रसाद ने संविधान सभा में निम्नलिखित प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था। The composition consisting of words and music known as ‘Jan Gana Mana…’ is the Natonal Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song ‘Vandemataram…’, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with ‘Jan Gana Mana…’ and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)
1907 में मैडम भीखाजी कामा द्वारा
स्टुट्गार्ट
, जर्मनी में फहराया गया झण्डा

हमारे संविधान ने आज हमें ‘वन्देमातरम्’ गीत गाने की आज़ादी दी है। विधानसभा और लोकसभा के सत्रों का आरम्भ ‘वन्देमातरम्’ गायन से ही होता है। आकाशवाणी केन्द्रों की पहली सभा का आरम्भ इसी गीत से होता है। १५अगस्त, १९४७ को देश के रेडियो केन्द्रो का आरम्भ सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में प्रस्तुत ‘वन्देमातरम्’ के स्वर में किये गए सजीव प्रसारण से हुआ था। पण्डित जी ने गीत के सभी अन्तरे राग ‘देस’ में निबद्ध कर प्रस्तुत किया था। लीजिये आप भी सुनिए ‘वन्देमातरम्’ गीत का यह दुर्लभ संस्करण- और इसी के साथ अब हम आज के इस विशेष अंक को यहीं विराम देते हैं।

‘वन्देमातरम...’ : स्वर – पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर : राग – देस


आपकी बात
‘स्वरगोष्ठी’ में संस्कार गीत श्रृंखला पर हमारे एक पाठक Shri Dockhem Singh ने अपने २२ दिसम्बर के सन्देश में लिखा है- Can you give live, if possible from Aladin langa, Noor mohamad langa sumer mohamad langa presentation. I used to hear in childhood on akashvani, jodhpur, now missing , thanks. श्री सिंह की फरमाइश का सम्मान करते हुए हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि स्वरगोष्ठी के भावी किसी अंक में राजस्थान के लंगा जाति की इस लोक संगीत शैली को अवश्य प्रस्तुत करेंगे।
इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सब के बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं। अगले रविवार को हमारी-आपकी सांगीतिक बैठक पुनः आयोजित होगी।

झरोखा अगले अंक का
१९६३ में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ का एक गीत है- ‘पुछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...’, जिसे मन्ना डे के स्वर में अपार लोकप्रियता मिली थी। यह गीत जिस राग पर आधारित है, अगले अंक में हम उसी राग पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही विख्यात वायलिन वादक पण्डित वी.जी. जोग के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी चर्चा करेंगे, जिनकी पुण्यतिथि ३१ जनवरी को है।


एक सवाल आपसे
यदि आप फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ के गीत- ‘पुछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...’,का राग पहचान कर हमें उसका नाम लिख भेजेंगे तो अगले अंक में हम आपको विजेता घोषित करेंगे। राग का नाम हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर लिख भेजें। 

कृष्णमोहन मिश्र 

Monday, January 26, 2009

आज १५ बार सर उठा कर गर्व से सुनें-गुनें - राष्ट्रीय गान

"उस स्वतंत्रता के होने का कोई महत्व नहीं है जिसमें गलतियाँ करने की छूट सम्मिलित ना हो"-महात्मा गाँधी.
आवाज़ के सभी श्रोताओं को गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें. आज हम आपके लिए लाये हैं एक ख़ास पेशकश. "जन गण मन" के १५ अलग अलग रूप. सबसे पहले सुनिए सामूहिक आवाजों में राष्ट्र वंदन -



31 राज्य, 1618 भाषाएँ, 6400 जातियाँ, 6 धर्म और 29 मुख्य त्योहार लेकिन फिर भी एक महान राष्ट्र।

पंडित हरी प्रसाद चौरसिया -


जन गण मन संस्कृत मिश्रित बंगाली में लिखा गया भारत का राष्ट्रीय गीत है। ये ब्रह्म समाज की एक प्रार्थना के पहले पाँच बन्द हैं जिनके रचियता नोबल पुरस्कार से सम्मानित रविन्द्रनाथ टैगोर हैं।

पंडित भीम सेन जोशी -


सबसे पहले इसे 27 दिसम्बर 1911 को नैशनल कांग्रेस के कलकत्ता सम्मेलन में गाया गया। 1935 में इस गीत को दून स्कूल ने अपने विद्यालय के गीत के रूप में अपनाया।

लता मंगेशकर -


24 जनवरी, 1950 को संविधान द्वारा इसे अधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया। ऐसा माना जाता है कि इसकी वर्तमान धुन को राम सिंह ठाकुर जी के एक गीत से लिया गया है लेकिन इस बारे में विवाद हैं। औपचारिक रूप से राष्ट्रीय गीत को गाने में 48-50 सैकेंड का समय लगता है लेकिन कभी-कभी इसे छोटा कर के सिर्फ इसकी प्रथम और अंतिम पंक्तियों को ही गाया जाता है जिसमें लगभग 20 सैकेंड का समय लगता है ।

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान, गुलाम मुर्तजा खान और गुलाम कादिर -


भारत ने अपने इतिहास के पिछले 1000 वर्षों में कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया।
भारत ने संख्याओं का आविष्कार किया। आर्यभट ने 'शून्य' का आविष्कार किया।

भूपेन हजारिका और सादिक खान -


संसार का पहला विश्वविद्यालय 700 ई.पूर्व तक्षशिला में बना था। जहाँ संपूर्ण विश्व से आए हुए 10,500 से ज़्यादा विद्यार्थी 60से ज़्यादा विषयों की शिक्षा ग्रहण करते थे। ई.पूर्व चौथी शताब्दी में बना नालंदा विश्विद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महान उपलब्धियों में से एक था।
फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए भारत की एक हज़ार साल पुरानी संस्कृत भाषा सबसे उपयुक्त है। आर्युवेद ही चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे पुरानी ज्ञात प्रणाली है।

पंडित जसराज -


कभी भारत की गिनती पृथ्वी के सबसे सपन्न साम्राज्यों में होती थी। पश्चिमी संचार माध्यम आधुनिक भारत को वहाँ फैले राजनीतिक भ्रष्टाचार की वजह से गरीबी से जकड़े हुए पिछड़े देश के रूप में दर्शाते हैं।
यंत्र द्वारा दिशा खोजने की कला का जन्म 5000 वर्ष पूर्व सिंधु नदी के क्षेत्र में हुआ था। असल में 'नेवीगेशन' शब्द संस्कृत के 'नवगति' शब्द से उत्पन्न हुआ है। π के मूल्य की गणना सबसे पहले बौधायन द्वारा की गई थी और उन्होंने ही 'प्रमेय' की अवधारणा को समझाया था। ब्रिटिश विद्वानों ने 1999 में अधिकारिक रूप से प्रकाशित किया कि बौधायन के कार्य यूरोपीय गणितज्ञों के उद्भव से बहुत पहले यानी कि छठीं शताब्दी के हैं।

एस पी बाला सुब्रमण्यम -


'बीजगणित' (Algebra),'त्रिकोणमिति'(Trignometry) और 'कैलकुलस' (Calculus) भारत से ही आए थे, 11वीं शताब्दी में श्रीधराचार्य द्वारा 'द्विघात समीकरण' (Quadratic equations ) का निर्माण किया गया। ग्रीक और रोमन के 106 अंकों के मुकाबले भारतीय 1053 अंकों का प्रयोग करते थे।
अमेरिका के Gemological संस्थान के अनुसार 1896तक सिर्फ भारत ही संपूर्ण विश्व के लिए 'हीरों' का एकमात्र स्रोत था। अमेरिका आधारित IEEE ने शिक्षाविदों में एक सदी से फैले संदेह को दूर करते हुए साबित किया है कि बेतार संचार के अग्रणी मारकोनी नहीं बल्कि प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस थे।

जगजीत सिंह -


सिंचाई के लिए जलाशय और बाँध का निर्माण सबसे पहले सौराष्ट्र में हुआ था। शतरंज का आविष्कार भारत में हुआ था। शुश्रुत को शल्य चिकित्सा के पितामह के रूप में जाना जाता है। 2600 वर्ष पहले उनके तथा समकालीन चिकित्सा विज्ञानियों द्वारा Rhinoplasty, सिज़ेरियन वर्ग, मोतियाबिन्द, टूटी हड्डियों और पेशाब की पत्थरियों से सबंधित शल्य क्रियाएँ की गईं। मूर्छित कर इलाज करने की कला का प्राचीन भारत में बखूबी प्रयोग किया जाता था।
जब दुनिया की कई संस्कृतियाँ सिर्फ घुमंतू जीवन व्यतीत करती थी, तब 5000 साल पहले भारतीयों ने सिंधु घाटी (सिंधु घाटी सभ्यता) में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की। मूल्य प्रणाली (Place Value System) तथा दशमलव प्रणाली (Decimal System) को 100 ई.पूर्व भारत में विकसित किया गया था।

बेगम परवीन सुल्ताना -


अल्बर्ट आइंस्टीन- "हम भारतीयों के बहुत ज़्यादा ऋणी हैं कि उन्होंने हमें गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी लाभप्रद वैज्ञानिक खोज मुमकिन नहीं हो पाती।"

डा. बाला मुरलीकृष्णा -


मार्क ट्वाईन- "मानव जाति का उद्भव भी भारत में हुआ, वाक् कला भी सबसे पहले यहीं पनपी, इतिहास का निर्माण भी यहीं से हुआ, दंतकथाएँ भी यहीं से जन्मी और महान परंपराएँ भी यहीं से प्रारंभ हुई।"

उस्ताद अमजद अली खान, अमन अली बंगेश और अयान अली बंगेश-


रोमेन रोलॉन्ड (एक फ्रांसीसी विद्वान)- अगर पृथ्वी के चेहरे पर कोई ऐसा स्थान मौजूद है जहाँ पर जीवित इनसानों के सभी सपनों (जब से उसने उन्हें देखना आरम्भ किया हैं) को उनका घर मिलता है तो वो इकलौती जगह भारत है।

हरिहरन -


हू शिह (अमेरिका में पूर्व चीनी राजदूत)- बिना एक भी सैनिक को सीमा पार भेजे भारत ने 20 शताब्दियों तक सांस्कृतिक तौर पर चीन पर अपना प्रभुत्व तथा कब्ज़ा जमाए रखा।

उस्ताद सुलतान खान -


फ्रेंकलिन पी. एडम्स- भारत की एक परिभाषा 'गणतंत्र' भी है।

पंडित शिव कुमार शर्मा और राहुल शर्मा -


सच्चा गणतंत्र- पुरुषों को उनके अधिकारों से अधिक और कुछ नहीं चाहिए, महिलाओं को उनके अधिकारों से कम कुछ भी नहीं चाहिए।

सभी वाद्यों का सामूहिक उद्घोष -


जय है...जय है...जय है....जय हिंद
.

अनुवाद द्वारा- राजीव तनेजा

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