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Thursday, September 11, 2008

जिन्होंने सजाये यहाँ मेले...कुछ यादें अमर संगीतकार सलिल दा की

आज आवाज़ पर, हमारे स्थायी श्रोता, और गजब के संगीत प्रेमी, इंदौर के दिलीप दिलीप कवठेकर लेकर आए हैं महान संगीतकार सलिल चौधरी के दो अदभुत गीतों से जुड़ी कुछ अनमोल यादें.

अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा..

सलिल चौधरी- इस क्रान्तिकारी और प्रयोगवादी संगीतकार को जब हम पुण्यतिथि पर याद करते हैं तो अनायास ही ये बोल जेहन में उभरते है, और साथ में कई यादें ताज़ा होती हैं. अपने विविध रंगों में रचे गानों के रूप में जो निशानी वो छोड गये हैं, उन्हें याद करने का और कराने का जो उपक्रम हम सुर-जगत के साथी कर लेते हैं, वह उनके प्रति हमारी छोटी सी श्रद्धांजली ही तो है.


गीतकार योगेश लिख गये है- जिन्होंने सजाये यहां मेले, सुख-दुख संग-संग झेले, वही चुन कर खामोशी, यूँ चले जाये अकेले कहां?

आनंद के इस गीत के आशय को सार्थक करते हुए यह प्रतिभाशाली गुलुकार महज चालीस साल की अपने संगीतयात्रा को सजाकर अकेले कहीं दूर निकल गया.

गीतकार योगेश की बात चल पड़ी है तो आयें, कुछ उनके संस्मरण सुनें, जो हमें शायद सलिलदा के और करीब ले जाये.

आनंद फ़िल्म में योगेश को पहले सिर्फ़ एक ही गीत दिया गया था, सलिलदा के आग्रह पर- कहीं दूर जब दिन ढल जाये. उसके बाद, एक दिन दादा ने एक बंगाली गीत की रिकॉर्ड योगेश के हाथ में रखी, और उसपर बोल लिखने को कहा. यह उस प्रसिद्ध गीत का मूल बंगाली संस्करण था - ना, जिया लागे ना.. योगेश के पास तो ग्रमोफ़ोन तक नहीं था. खैर, कुछ जुगाड़ कर उन्होंने यह मूल गीत सुना और बैठ गये बोल बिठाने.

उधर एक और ग़फ़लत हो गयी थी. फ़िल्म के निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने यह गीत गुलज़ार को भी लिखने दे दिया. उन्होंने लिखा - ना ,जिया लागे ना, और योगेश ने लिखा - ना, ना रो अखियां. संयोग से गुलज़ार का गीत रिकॉर्ड हो गया, योगेश का गीत रह ही गया.

एक दिन हृषिकेश दा ने उन्हें बुलाकर उनके हाथ में चेक रख दिया. योगेश ने अचंभित हो कहा- कहीं दूर के तो पैसे मिल गये है. ये फिर किसके लिये? 'ये ना, ना रो अंखियां के पैसे' हृषि दा बोले। "यदि गाना रिकॉर्ड होता तो पैसे ले लेता , मगर यूँ लेना अच्छा नहीं लगता." योगेश ने संकोचवश कहा. अब दादा तो मान नहीं रहे थे, तो सलिलदा ने एक उपाय सुझाया. हम लोग फ़िल्म के टाईटल गीत के लिये एक गाना और लिखवा लेते है योगेश से, तो कैसा रहेगा. योगेश मान गये, और तैयार हुई एक कालजयी, आसमान से भी उत्तुंग संगीत रचना-

ज़िंदगी , कैसी है पहेली हाये, कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये....

जब बाद में राजेश खन्ना ने यह गीत सुना तो उन्होंने हृषि दा को मनाया के यह गीत इतना अच्छा बन पड़ा है तो इसे टाईटल पर जाया ना करें, मगर उन पर पिक्चराईज़ करें. हृषि दा बोले, सिच्युएशन कहां है इस गीत के लिये. राजेश खन्ना ने हठ नहीं छोड़ा, कहा "पैदा कीजिये" . वैसे इस गाने को सिर्फ़ एक दिन में ही चित्रित कर लिया गया.

यहां सलिल दा ने कोरस का जो प्रयोग किया है, उसके बारे में भी आर.डी. बर्मन बोले थे - झकास... ऐसे प्रयोग शंकर जयकिशन ने भी कहीं किये थे. सलिलदा ने उससे भी आगे जा कर एक अलग शैली विकसित की, जिसकी बानगी मिलेगी इन गीतों में -

मेरे मन के दिये (परख), जाने वाले सिपाही से पूछो ( उसने कहा था), ए दिल कहां तेरी मंज़िल (माया), न जाने क्यूं होता है ये (छोटी सी बात), जागो मोहन प्यारे (जागते रहो)

तो यूँ हुआ उस बेहतरीन गीत का आगमन हमारे दिल में. आईये सुनते है:



इसी तरह रजनीगंधा फ़िल्म के प्रसिद्ध गीत 'रजनी गंधा फूल हमारे, यूँ ही महके जीवन में ' लिखने के बाद जब ध्वनिमुद्रित किया गया तो सुन कर फ़िल्म के निर्देशक बासु चटर्जी बोले, सलिल दा, इस गाने को थोड़ा १०-१५ सेकंड छोटा करो. सलील दा को समझ नहीं आया . उन्होंने कहा- तो शूटिंग थोड़ी ज्यादा कर लेना. तो बासु दा बोले - दादा, यह गाना तो पहले ही शूट हो चुका है. दरसल यह गाना बैकग्राऊंड में था!!!

पूरी रिकॉर्डिंग फिर से करने का निश्चय किया गया. मगर एक अंतरे में कुछ अलग बोल थे, जो गाने के सिचुयेशन से मेल नहीं खाते थे. योगेश ने लिखा था-

अपना उनको क्या दूं परिचय
पिछले जन्मों के नाते हैं,
हर बार बदल कर ये काया,
हम दोनो मिलने आते है..
धरती के इस आंगन में.....


फ़िल्म के रशेस देखकर सलिल दा को लगा की नायिका के मन के अंतर्द्वंद का, दो नायकों के बीच फ़ंसी हुई उसकी मनस्थिती का यहां वर्णन जम नहीं रहा है. उन्होंने योगेश से फ़िर लिखने को कहा, और बना यह अंतरा..

हर पल मेरी इन आंखों में
अब रहते है सपने उनके ,
मन कहता है कि मै रंगूँ
एक प्यार भरी बदली बन के,
बरसूं उनके आंगन में....

तो यह गीत भी सुनें, सुरों की सिम्फ़नी के बागा़नों से छन कर आती हुई खुशबू का लुत्फ़ उठाएं-



चलते चलते एक पहेली-
माया फ़िल्म का गीत - ऐ दिल! कहां तेरी मंज़िल, ना कोई दीपक है ,ना कोई तारा है, गु़म है ज़मीं, दूर आसमां.. गीत किसने गाया है?

हमें लगता है दिलीप जी का ये सवाल हमारे संगीत प्रेमियों के लिए बेहद आसान होगा, तो जल्दी से लिख भेजिए हमें, अपने जवाब टिप्पणियों के माध्यम से.

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर
चित्र "रजनीगंधा फूल तुम्हारे" गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान का है

Wednesday, August 27, 2008

मैं तो दीवाना...दीवाना...दीवाना...मुकेश, एक परिचय

इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।


मुकेश चंद्र माथुर का जन्म दिल्ली के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में जुलाई २२, १९२३ को हुआ। उन्हें अभिनय व गायन का बचपन से ही शौक था और वे के.एल. सहगल के प्रशंसक थे। मात्र दसवीं तक पढ़ने के बावजूद उन्हें लोक निर्माण कार्य में सहायक सर्वेक्षक विभाग में नौकरी मिल गई, जहाँ पर उन्होंने सात महीने तक काम किया। पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। दिल्ली में उन्होंने चुपके से कईं गैर-फिल्मी गानों की रिकार्डिंग करी। उसके बाद तो वे भाग कर मुम्बई में फिल्म-स्टार बनने के लिये जा पहुँचे। वे अपने रिश्तेदार व प्रसिद्ध कलाकार मोतीलाल के यहाँ ठहरने लगे।

मोतीलाल की मदद से वे फिल्मों में काम करने लगे। एक गायक के तौर पर उनका पहला गीत "निर्दोष" में "दिल ही बुझा हुआ..." रहा, उसके बाद उनका पहला युगल गीत फिल्म "उस पार" में गायिका कुसुम के साथ "ज़रा बोली री हो.." था। फिर उन्होंने फिल्म "मूर्ति" में "बदरिया बरस गई उस पार.." खुर्शीद के साथ गाया। उस समय तक उन्होंने सुनने वालों के मन में अपनी एक जगह बना ली थी। तब उनके जीवन में महत्त्व पूर्ण घटना घटी। साल था १९४५, जब अनिल बिस्वास ने उनसे फिल्म 'पहली नज़र' के लिये 'दिल जलता है तो जलने दे....' गाने के लिये कहा। ये वो गीत था जो मुकेश को पूरी तरह से लोगों की नजरों व प्रसिद्धि में ले आया। वे किंवदंति बन चुके थे और आने वाले कईं दशकों तक उनकी जादुई आवाज़ को पूरे देश ने ‘आग’, ‘अनोखी अदा’ और ‘मेला’ के गानों में सुना।


१९४९ में उन्होंने एक और मील का पत्थर पार किया। वो था उनका राज कपूर और शंकर-जयकिशन के साथ मिलन। राजकपूर उनसे और शंकर-जयकिशन से अपने आर.के. फिल्म्स के लिये गानों की फरमाईश करते रहते। उसके बाद तो 'आवारा' और 'श्री ४२०" जैसी फिल्मों में गाये गये 'आवारा हूँ..' व ' मेरा जूता है जापानी..' से उनकी आवाज़ ने देश ही नहीं विदेश में भी शोहरत पाई। रूस में तो "आवारा हूँ..." सड़कों पर सुनाई देने लगा था। राज कपूर जैसे चतुर निर्देशक व संगीत प्रेमी के साथ काम करने का मुकेश को फायदा मिला। राज कपूर फिल्मों में अच्छे गानों के पक्षधर रहे। शंकर जयकिशन की हर एक धुन को वे सुनते थे व उनके पास करने पर ही वो धुन रिकार्डिंग के लिये जाया करती थी। राज कपूर हर गाने की रिकार्डिंग के वक्त स्टूडियो में ही रहते थे व आर्केस्ट्रा की हौंसला अफजाई करते रहते। उनके संगीत के प्रति इसी समर्पण का असर आने वाली हर पीढी पर दिखा जो जब भी राज कपूर के गाने सुनती है तो हर बार नई ताज़गी सी मिलती है। ‘आह’, ‘आवारा’, ‘बरसात’, ‘श्री ४२०’, ‘अनाड़ी’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’ व अन्य कईं फिल्मों के गाने आज भी तरो-ताज़ा से लगते हैं। राज कपूर की सफलता के साथ मुकेश व शंकर जयकिशन की सफलता भी शामिल रही।

लेकिन उनका जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। 'आवारा' की सफलता के बाद मुकेश ने दोबारा अभिनय के क्षेत्र में अपने आपको आजमाने का प्रयास किया और अपने गायन के करियर को हाशिये पर धकेल दिया। सुरैया के साथ ‘माशूका’ (१९५३) व ऊषा किरोन के साथ ‘अनुराग’ (१९५६) बहुत बुरी तरह से पिटी। उन्होंने राज कपूर की फिल्म ‘आह’ (१९५३) में एक तांगे वाले की छोटी सी भूमिका निभाई। उसी फिल्म के एक गाने- ‘छोटी सी ज़िन्दगानी’ को उन्होंने गाया भी। कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मुकेश ने पार्श्व गायन में दोबारा हाथ आजमाने का निश्चय किया। परन्तु तब उन्हें न के बराबर ही काम मिल रहा था। स्थिति इतनी गम्भीर हो चुकी थी कि उनके दोनों बच्चे नितिन और रितु को स्कूल छोड़ना पड़ा।

आखिरकार उन्होंने ‘यहूदी’ (१९५८) के गाने 'ये मेरा दीवानापन है..' से जोरदार वापसी करी। उसी साल आई ‘मधुमति’, ‘परवरिश’ और ‘फिर सुबह होगी’ के गाने इतने जबर्दस्त थे कि मुकेश ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एस.डी बर्मन जिन्होंने तब तक मुकेश को अपने गानों में मौका नहीं दिया था, उनसे दो उत्कृष्ट गीत गवाये। वे गीत थे- फिल्म 'बम्बई का बाबू' (१९६०) से 'चल री सजनी...' और बन्दिनि (१९६३) से 'ऒ जाने वाले हो सके तो लौट के आना...'। उसके बाद तो मुकेश ६० और ७० के दशक में चमके रहे और उन्होंने 'हिमालय की गोद में'(१९६५) से 'मैं तो एक ख्वाब हूँ...', मेरा नाम जोकर से 'जीना यहाँ मरना यहाँ..' आनंद(१९७०) से 'मैंने तेरे लिये ही सात रंग के..' 'रोटी कपड़ा और मकान' से ' मैं न भूलूँगा..'जैसे असंख्य मधुर और दिल व आत्मा को छू जाने वाले गीत गाये। और उनके ‘कभी कभी’ (१९७६) के दो गानों 'मैं पल दो पल का शायर...' और 'कभी कभी मेरे दिल में..' को कौन भूल सकता है।

अन्य संगीत निर्देशक जिनके लिये मुकेश ने बेहतरीन गाने गाये, वे थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, सलिल चौधरी, ऊषा खन्ना, आर.डी.बर्मन वगैरह। फिल्म 'कभी कभी' में तो खय्याम के संगीत, साहिर लुधियानवी के गीत और मुकेश की आवाज़ ने तो जादू बिखेर दिया था।

१९७४ में मुकेश ने सलिल चौधरी द्वारा संगीतबद्ध, फिल्म रजनीगंधा में 'कईं बार यूँ भी देखा है...' गाया जिसके लिये उन्हें उस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 'सत्यम शिवम सुंदरम'(१९७८) का गीत 'चंचल शीतल, कोमल' उनका आखिरी रिकार्ड किया गया गाना था। २७ अगस्त १९७६ में अमरीका के डेट्रोएट में संगीत समारोह के दौरान आये दिल के दौरे से उनका देहांत हो गया। मुकेश आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी अमर आवाज़ हमेशा हमेशा संगीत प्रेमियों को अपना दीवाना बनाती रहेगी, आज उनकी पुण्यतिथि पर हम याद करें उस अमर फनकार को, उनके यादगार गीतों को सुनकर, आईये, चलते चलते सुनें एक बार वही गीत जिसके लिए उन्हें रास्ट्रीय पुरस्कार मिला, फ़िल्म 'रजनीगंधा' के इस गीत को लिखा है योगेश ने, और संगीत है सलील दा का, इन दोनों के बारे में हम आगे बात करेंगे, फिलहाल सुनें मुकेश को, जिन्होंने इस गीत को भावनाओं के चरम शिखर पर बिठा दिया है अपनी आवाज़ के जादू से.



जानकारी सोत्र - इन्टरनेट.
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"



इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।

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