Showing posts with label rag yaman. Show all posts
Showing posts with label rag yaman. Show all posts

Sunday, April 12, 2015

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT



स्वरगोष्ठी – 214 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट

राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम आपसे कल्याण थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग यमन और भूपाली में निबद्ध गीतों के उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे। 



भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था।

भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट क्रमानुसार हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, भैरवी, और तोड़ी। इन दस थाटों के क्रम में पहला थाट है कल्याण। कल्याण थाट के स्वर होते हैं- सा, रे,ग, म॑, प ध, नि, अर्थात इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र होता है और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। कल्याण थाट का आश्रय राग कल्याण अथवा यमन होता है। आश्रय राग का अर्थ होता है, ऐसा राग, जिसमें थाट में प्रयुक्त स्वर की उपस्थिति हो। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- भूपाली, हिंडोल, हमीर, केदार, कामोद, नन्द, मारू बिहाग, छायानट, गौड़ सारंग आदि। इस थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी छः स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। वादी स्वर गान्धार और संवादी निषाद होता है। इसका गायन-वादन समय गोधूली बेला अर्थात सूर्यास्त से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक होता है। राग कल्याण अथवा यमन के आरोह के स्वर हैं- सा रेग, म॑ प, ध, निसां  तथा अवरोह के स्वर सांनिध, पम॑ग, रेसा  होते हैं। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग यमन में निबद्ध एक खयाल, जिसे रामपुर सहसवान घराने के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’


राग यमन : ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’ : उस्ताद राशिद खाँ




राग यमन, कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। मध्यकालीन ग्रन्थों में इस राग का यमन नाम से उल्लेख मिलाता है। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में इसका नाम केवल कल्याण ही मिलता है। आधुनिक ग्रन्थों में यमन एक सम्पूर्ण जाति का राग है। कल्याण थाट के अन्य रागों में एक अन्य प्रमुख राग भूपाली है। यह औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। 

अब हम आपको राग भूपली के स्वरों में पिरोया एक मधुर फिल्मी गीत- ‘ज्योतिकलश छलके...’ सुनवाते हैं। यह गीत 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘भाभी की चूड़ियाँ’से है, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। इसके संगीतकार सुधीर फडके और गीतकार हैं पण्डित नरेन्द्र शर्मा। जाने-माने संगीत समीक्षक और ‘संगीत’ मासिक पत्रिका के परामर्शदाता डॉ. मुकेश गर्ग ने इस गीत पर एक सार्थक टिप्पणी की है, जिसे हम इस स्तम्भ में रेखांकित कर रहे हैं।

सुधीर फड़के और नरेन्द्र शर्मा की कालजयी कृति। कैसे अद्भुत कम्पोजर और गायक थे सुधीर फड़के! रचना के बीच में उनके बोल-आलाप बताते हैं कि शब्दों को वह सिर्फ़ धुन में नहीं बाँधते, शब्द की सीमा से परे जा कर उसके अर्थ का अपनी गायकी से विस्तार भी करते हैं। इसी गीत को जब लता मंगेशकर गाती हैं तो हमें दाँतों-तले उँगली दबानी पड़ती है। सुधीर जी तो इसके संगीत-निर्देशक थे। इसलिए अपनी गायकी के अनुसार उन्होंने उसे रचा और गाया भी। पर लता दूसरे की रचना को कण्ठ दे रही हैं। ऐसी स्थिति में उन्होंने सुधीर जी की रचना में सुरों के अन्दर जो बारीक़ कारीगरी की है वह समझने से ताल्लुक़ रखती है। सुरों की फेंक, ऊर्जा, कोमलता और सूक्ष्म नक़्क़ाशी के कलात्मक मेल का यह स्तर हमें सिर्फ़ लता मंगेशकर में देखने को मिलता है। अन्य सभी गायिकाएँ तो उन्हें बस छूने की कोशिश ही कर पाती हैं।

अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भूपाली : ‘ज्योतिकलश छलके...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – भाभी की चूड़ियाँ






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 214वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुराने, हिन्दी फिल्म के एक राग आधारित सदाबहार गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस सदाबहार गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – या गीत किस गायिका की आवाज़ में है?

3 – इस गीत के संगीतकार की पहचान कीजिए और हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 18 अप्रैल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 216वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 212वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर की आवाज़ में प्रस्तुत एक टप्पा का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल अद्धा त्रिताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- टप्पा शैली। इस बार पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से हमने नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की शुरुआत की है। इसके अन्तर्गत हम प्रत्येक अंक में भारतीय संगीत के प्रचलित दस थाट और उनके आश्रय रागों की चर्चा करेंगे। इसके थाट से जुड़े अन्य रागों पर आधारित फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। यदि आप भी भारतीय संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा का सदुपयोग करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। आज बस इतना ही, अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


Sunday, June 22, 2014

संगीतकार मदनमोहन के राग आधारित गीत




स्वरगोष्ठी – 173 में आज

व्यक्तित्व – 3 : फिल्म संगीतकार मदनमोहन

‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ...’ 
 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की तीसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, फिल्म संगीत-प्रेमियों के बीच “गजल-सम्राट” की उपाधि से विभूषित यशस्वी संगीतकार, मदनमोहन। उनके संगीतबद्ध गीत अत्यन्त परिष्कृत हुआ करते थे। आभिजात्य वर्ग के बीच उनके गीत बड़े शौक से सुने और सराहे जाते थे। वे गज़लों को संगीतबद्ध करने में सिद्ध थे। गज़लों के साथ ही अपने गीतों में रागों का प्रयोग भी निपुणता के साथ करते थे। विभिन्न रागों पर आधारित उनके अनेक गीत आज भी सदाबहार बने हुए हैं। उनके अधिकतर राग आधारित गीतों को लता मंगेशकर और मन्ना डे स्वर प्रदान किए हैं। आज के अंक में हम मदनमोहन के शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं के सन्दर्भ में उनकी विलक्षण प्रतिभा को रेखांकित करेंगे। यह भी सुखद संयोग है कि आज से तीसरे दिन अर्थात 25 जून को मदनमोहन का 91वाँ जन्मदिवस है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक की स्मृतियों को उन्हीं के स्वरबद्ध गीतों के माध्यम से स्वरांजलि अर्पित करता है। 
 



फिल्म संगीत के क्षेत्र में मदनमोहन का नाम एक ऐसे संगीतकार के रूप में लिया जाता है, जिनकी रचनाएँ सभ्रान्त और संगीत रसिकों के बीच चाव से सुनी जाती है। उनका संगीत जटिलताओं से मुक्त होते हुए भी हमेशा सतहीपन से भी दूर ही रहा। उनका जन्म 25 जून, 1924 को बगदाद में हुआ था। फिल्मी संस्कार उन्हें विरासत में मिला था। मदनमोहन के पिता रायबहादुर चुन्नीलाल, विख्यात फिल्म निर्माण संस्था ‘फिल्मिस्तान’ के संस्थापक थे। मुम्बई में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। बचपन से ही संगीत के प्रति लगाव होते हुए भी शिक्षा पूर्ण होने के बाद आश्चर्यजनक रूप से मदनमोहन ने सेना की नौकरी की। परन्तु लम्बे समय तक वे सेना की नौकरी में नहीं रहे और वहाँ से मुक्त होकर लखनऊ रेडियो के संगीत विभाग में नियुक्त हो गए। यहाँ रह कर जिस सांगीतिक परिवेश और संगीत की विभूतियों से उनका सम्पर्क हुआ, उसका प्रभाव उनकी रचनाओं पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। लखनऊ रेडियो केन्द्र पर कार्य करते हुए मदनमोहन का सम्पर्क विख्यात गायिका बेगम अख्तर और उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ से हुआ। आगे चलकर मदनमोहन के फिल्म संगीत पर इन विभूतियों का असर हुआ। फिल्मों में गजल गायकी का एक मानक स्थापित करने में मदनमोहन का योगदान प्रशंसनीय रहा है। निश्चित रूप से यह प्रेरणा उन्हें बेगम अख्तर से ही मिली थी। इसी प्रकार उनके अनेक गीतों में रागों की विविधता के दर्शन भी होते हैं। फिल्म संगीत को रागों के परिष्कृत और सरलीकृत रूप प्रदान करने की प्रेरणा उन्हें उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और लखनऊ के तत्कालीन समृद्ध सांगीतिक परिवेश से ही मिली थी। ‘स्वरगोष्ठी’ की इस कड़ी में हम मदनमोहन के संगीतबद्ध कुछ राग आधारित गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। सबसे पहले हम जिस गीत की चर्चा करेंगे वह 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ से लिया गया है। मदनमोहन ने इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विविध शास्त्रीय रागों पर आधारित करते हुए रचे थे। फिल्म के सभी गीत गुणबत्ता और लोकप्रियता की दृष्टि से अद्वितीय थे। इन्हीं गीतों में से हमने आपके लिए राग जैजैवन्ती के स्वरों से अलंकृत गीत- ‘बैरन हो गई रैना...’ चुना है। इस गीत में नायिका के विरह भाव का चित्रण किया गया है। रात्रि के दूसरे प्रहर में मध्यरात्रि के निकट गाया-बजाया जाने वाला राग जैजैवन्ती के स्वरों में प्रतीक्षा और विरह का भाव खूब मुखर होता है। ऐसे गीतों के लिए पुरुष पार्श्वगायकों में मन्ना डे, मदनमोहन की पहली पसन्द थे। तीनताल में निबद्ध इस गीत को मन्ना डे ने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से गाया है।


राग जैजैवन्ती : ‘बैरन हो गई रैन...’ : स्वर – मन्ना डे : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – देख कबीरा रोया

 



मदनमोहन के संगीत में लता मंगेशकर के स्वरों का योगदान हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है। पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में लता मंगेशकर पार्श्वगायन के क्षेत्र में अवसर पाने के लिए संघर्षरत थीं। उन्हीं दिनों मदनमोहन भी अपनी रेडियो की नौकरी छोड़ कर फिल्मों में प्रवेश का मार्ग खोज रहे थे। यूँतो उनके पिता रायबहादुर चुन्नीलाल तत्कालीन फिल्म जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे, किन्तु मदनमोहन अपनी प्रतिभा के बल पर ही फिल्म संगीत के क्षेत्र में अपना स्थान बनाना चाहते थे। उन्हीं दिनों संगीतकार गुलाम हैदर फिल्म ‘शहीद’ के लिए नई आवाज़ खोज रहे थे। उन्होने स्वर-परीक्षा के लिए मदनमोहन और लता मंगेशकर की आवाज़ों में एक युगल गीत रिकार्ड किया। एस. मुखर्जी ने इस रिकार्डिंग को सुन कर दोनों आवाज़ों को खारिज कर दिया। उन्हें क्या पता था कि आगे चल कर इनमें से एक आवाज़ विश्वविख्यात गायिका का और दूसरी आवाज़ उच्चकोटि के संगीतकार की है। आगे चल कर मदनमोहन और उनकी मुँहबोली बहन लता मंगेशकर की जोड़ी ने फिल्म संगीत जगत को अनेक मधुर गीतों से समृद्ध किया। 1950 में मदनमोहन के संगीत निर्देशन में बनी देवेन्द्र गोयल की फिल्म ‘आँखें’ का संगीत काफी लोकप्रिय हुआ, किन्तु इन गीतों में लता मंगेशकर की आवाज़ नहीं थी। फिल्म में मीना कपूर, शमशाद बेगम और मुकेश की आवाज़ें थी। फिल्म ‘शहीद’ के लिए की गई स्वर-परीक्षा के दौरान मदनमोहन ने लता मंगेशकर से वादा किया था कि अपनी पहली फिल्म में वे लता से गीत गवाएंगे, किन्तु अपनी पहली फिल्म ‘आंखे’ में वे अपना संकल्प पूरा न कर सके। परन्तु 1951 में बनी देवेंद्र गोयल की ही अगली फिल्म ‘अदा’ में मदनमोहन और लता मंगेशकर का साथ हुआ और यह साथ लम्बी अवधि तक जारी रहा। इस दौरान लता मंगेशकर ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में अनेक उत्कृष्ट गीत गाये। मदनमोहन के संगीत से सजा दूसरा गीत, जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह एक युगल गीत है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ में मदनमोहन का संगीत था। इस फिल्म के गीतों में भी उन्होने रागों का आधार लिया और आकर्षक संगीत रचनाओं का सृजन किया। फिल्म में राग ललित के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत- ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ था, जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। आइए, तीनताल मे निबद्ध यह गीत सुनते हैं। 


राग ललित : ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ : स्वर – मन्ना डे और लता मंगेशकर : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद





मदनमोहन को ‘गजलों का बादशाह’ कहा जाता है। नौशाद जैसे वरिष्ठ संगीतकार भी उनकी गज़लों के प्रशंसक रहे हैं। मदनमोहन के संगीतबद्ध अधिकतर गजलों में पुरुष कण्ठस्वर तलत महमूद के और नारी स्वर के लिए तो एकमात्र लता मंगेशकर ही थीं। पिछले दिनों हमारे साथी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने अपने ‘एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तम्भ में मदनमोहन के गज़लों की विशेषताओं को रेखांकित किया था। (पढ़ने और सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें) मदनमोहन के स्वरबद्ध गज़लों को अन्य पार्श्वगायकों ने भी गाया है, किन्तु तलत महमूद के स्वर में उनकी गज़लें कुछ अधिक मुखर हुई हैं। मदनमोहन के गीतकारों में राजेन्द्र कृष्ण और राजा मेंहदी अली खाँ के गीतों को जनसामान्य ने खूब सराहा। उनके संगीत में सितार का श्रेष्ठतम उपयोग हुआ। इसके लिए उस्ताद रईस खाँ ने उनके सर्वाधिक गीतों में सितार बजाया था। इसके अलावा कुछेक गीतों में बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा जैसे दिग्गज संगीतज्ञों का योगदान मिलता है। मदनमोहन द्वारा संगीतबद्ध पहली फिल्म ‘आँखें’ में पार्श्वगायक मुकेश ने सदाबहार गीत- ‘प्रीत लगाके मैंने ये फल पाया...’ गाया था। एक लम्बे अन्तराल के बाद मुकेश की वापिसी मदनमोहन के साथ फिल्म ‘दुनिया न माने’ में हुई। इसके बाद 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘संजोग’ में मुकेश ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में एक बेहद गम्भीर और असरदार गीत- ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ गाया। मदनमोहन ने यह गीत राग कल्याण अर्थात यमन के स्वरों में बाँधा था। फिल्मों में प्रायः राग आधारित गीतों को तैयार करने वाले संगीतकारों ने प्रायः मुकेश को प्राथमिकता देने में परहेज किया, किन्तु मदनमोहन ने मुकेश की गायकी से रागानुकूल तत्त्वों को किस प्रकार उभारा है, यह अनुभव आप गीत सुन कर स्वयं कर सकते हैं। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले राग यमन के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला अर्थात पाँचवें प्रहर का आरम्भिक समय होता है। गीत में उदासी का जो भाव है वह यमन के स्वरों में खूब उभरता है। मुकेश ने दादरा ताल में निबद्ध इस गीत को पूरी संवेदना के साथ गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ : स्वर – मुकेश : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – संजोग 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – यह संगीत रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 175वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 171वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनारकली’ से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हेमन्त कुमार। सुनवाए गए गीतांश में केवल हेमन्त कुमार की आवाज़ है, किन्तु पूरा गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर ने युगल रूप में गाया है। पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से जारी श्रृंखला के आज के अंक में हमने यशस्वी फिल्म संगीतकार मदनमोहन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की है। इसके साथ ही उनके राग आधारित कुछ गीतों की रंजकता का अनुभव भी किया। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

Sunday, June 23, 2013

चर्चा राग कल्याण अथवा यमन की

  
स्वरगोष्ठी – 125 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 5

‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ राग यमन के सच्चे स्वरों का गीत 

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ की यह पाँचवीं कड़ी है और इस कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज हमारी चर्चा का विषय होगा, राग यमन पर आधारित एक सदाबहार गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’। 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ के इस कालजयी गीत के संगीतकार दत्ताराम वाडेकर थे, जिनके बारे में वर्तमान पीढ़ी शायद परिचित हो। इसके साथ ही आज के अंक में हम राग यमन पर चर्चा करेंगे और आपको सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ का बजाया, राग यमन का भावपूर्ण आलाप भी सुनवाएँगे। 


दत्ताराम
संगीतकार दत्ताराम की पहचान एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में कम, परन्तु सुप्रसिद्ध संगीतकार शंकर-जयकिशन के सहायक के रूप में अधिक हुई। इसके अलावा लोक-तालवाद्य ढप बजाने में वे सिद्धहस्त थे। फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गीत ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम...’ में उनका बजाया ढप सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था। ढप के अलावा अन्य ताल-वाद्यों, तबला, ढोलक आदि के वादन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फिल्म ‘बेगुनाह’ के गीत ‘गोरी गोरी मैं पारियों की छोरी...’ और फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ के बाल गीत ‘चूँ चूँ करती आई चिड़िया...’ में उनका ढोलक वादन श्रोताओं को मचलने पर विवश करता है। दत्ताराम की संगीत-शिक्षा तबला वादन के क्षेत्र में ही हुई थी। पाँचवें दशक में वो मुम्बई आए और शंकर-जयकिशन के सहायक बन गए। उनकी पहली फिल्म ‘नगीना’ थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में दत्ताराम ने 1957 में प्रदर्शित राज कपूर की फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अपने मधुर सम्बन्धों के कारण राज कपूर ने फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत के लिए राज कपूर ने शंकर-जयकिशन के इस प्रतिभावान सहायक को चुना। यह फिल्म तो नहीं चली, किन्तु इसके गीत खूब लोकप्रिय हुए। ऊपर जिस बाल गीत की चर्चा हुई है, वह तो आज भी बच्चों का सर्वप्रिय गीत बना हुआ है।

मुकेश
दत्ताराम को संगीत निर्देशन का दूसरा अवसर 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ में मिला। राज कपूर इस फिल्म के नायक थे। फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने राज कपूर के आग्रह पर ही दत्ताराम को इस फिल्म के संगीत निर्देशक का दायित्व सौंपा था। इस फिल्म में दत्ताराम ने मुकेश, मन्ना डे और लता मंगेशकर की आवाज़ों में कई मधुर गीत रचे, किन्तु जो लोकप्रियता मुकेश के गाये गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ को मिली वह अपने आप में कीर्तिमान है। मुकेश को दर्द भरे गीतों का महान गायक माना जाता है। आज भी यह गीत दर्द भरे गीतों की सूची में सिरमौर है। इस गीत पर राग यमन की छाया है। फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में इस गीत की रिकार्डिंग से जुड़े एक रोचक तथ्य का उल्लेख किया है। हुआ यह कि जिस दिन इस गीत को रिकार्ड करना था, उस दिन साजिन्दों की हड़ताल थी। उस समय स्टुडियो में सारंगी वादक ज़हूर अहमद, गायक मुकेश और दत्ताराम स्वयं तबला के साथ उपस्थित थे। इन्हीं साधनों के साथ गीत की अनौपचारिक रिकार्डिंग की गई। यूँतो इसे गीत का पूर्वाभ्यास माना गया किन्तु इस रिकार्डिंग को राज कपूर समेत अन्य लोगों ने जब सुना तो सभी अभिभूत हो गए। आज भी यह गीत मुकेश के गाये गीतों में शीर्ष स्थान पर है। लीजिए, पहले आप इस बहुचर्चित गीत को सुनिए।


राग यमन : फिल्म परिवरिश : ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ : संगीत – दत्ताराम




फिल्म ‘परिवरिश’ के इस गीत राग यमन का स्पष्ट आधार है। राग यमन गोधूलि बेला अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर के आरम्भ के समय का राग है। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले सम्पूर्ण जाति का यह राग कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में राग का नाम कल्याण ही बताया गया है। 


उस्ताद सुल्तान खाँ
विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में भारत से यह राग पर्शिया पहुँचा, जहाँ इसे यमन नाम मिला। मुगलकाल से इसका यमन अथवा इमन नाम प्रचलित हुआ। दक्षिण भारतीय पद्यति में यह राग कल्याणी नाम से जाना जाता है। राग यमन अथवा कल्याण के आरोह में षडज और पंचम का प्रयोग बहुत प्रबल नहीं होता। निषाद स्वर प्रबल होने और ऋषभ स्वर शुद्ध होने से पुकार का भाव और करुण रस की सहज अभिव्यक्ति होती है। जैसा कि उल्लेख किया गया कि इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यदि तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाए तो यह राग बिलावल हो जाता है। अवरोह में यदि दोनों मध्यम का प्रयोग कर दिया जाए तो यह यमन कल्याण राग हो जाता है। यदि राग यमन के शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो राग वाचस्पति की अनुभूति कराता है। राग यमन की स्वर-रचना के कारण ही फिल्म ‘परिवरिश’ के गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ में करुण रस की गहरी अनुभूति होती है। राग यमन की अधिक स्पष्ट अनुभूति कराने का लिए अब हम आपको सारंगी पर इस राग का आलाप सुनवाते हैं। वादक हैं सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ। आप फिल्मी गीत के स्वरों को इस सार्थक आलाप में खोजने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : सारंगी पर आलाप : उस्ताद सुल्तान खाँ 




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 125वीं संगीत पहेली में हम आपको छठें दशक की एक फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 127वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 123वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'लड़की' के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के अगले अंक में हम आपको एक और भूले-बिसरे संगीतकार का परिचय देते हुए उनका संगीतबद्ध एक मोहक गीत लेकर उपस्थित होंगे। आप भी हमारी आगामी कड़ियों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, February 10, 2013

पाँचवें प्रहर के कुछ आकर्षक राग



स्वरगोष्ठी – 107 में आज
राग और प्रहर – 5

शाम के अन्धकार को प्रकाशित करते राग


‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का इस मंच पर हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछले रविवार को इस स्तम्भ का अगला अंक मैं अपनी पारिवारिक व्यस्तता के कारण प्रस्तुत नहीं कर सका था। आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, पाँचवें प्रहर के कुछ मधुर रागों में चुनी हुई रचनाएँ। तीन-तीन घण्टों की अवधि में विभाजित दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहरों के रूप में पहचाना जाता है। इनमें पाँचवाँ प्रहर अर्थात रात्रि का पहला प्रहर, सूर्यास्त के बाद से लेकर रात्रि लगभग नौ बजे तक की अवधि को माना जाता है। इस प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले राग गहराते अन्धकार में प्रकाश के विस्तार की अनुभूति कराते हैं। आज के अंक में हम ऐसे ही कुछ रागों पर आपसे चर्चा करेंगे।

पाँचवें प्रहर के रागों में आज हम सबसे पहले राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ विद्वान काफी थाट के अंतर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। अवरोह में दोनों मध्यम का और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। अब आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की कालजयी कृति ‘चित्रलेखा’ पर 1964 में इसी नाम से फिल्म का निर्माण हुआ था। फिल्म के संगीतकार रोशन थे। उन्होने फिल्म का एक गीत- ‘ए री जाने ना दूँगी...’ राग कामोद पर आधारित स्वरबद्ध किया था। सितारखानी ताल में निबद्ध यह गीत लता मंगेशकर के स्वरों में श्रृंगार रस की सार्थक अनुभूति कराता है। लीजिए, आप यह मोहक गीत सुनिए।


राग कामोद : फिल्म चित्रलेखा : ‘ए री जाने ना दूँगी...’ : लता मंगेशकर 



पाँचवें प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले रागों में एक सदाबहार राग है- ‘पूरिया धनाश्री’। यह राग पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वरों के इस राग में तीव्र मध्यम, कोमल ऋषभ और कोमल धैवत सहित शेष शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग पूरिया धनाश्री में लगने वाले स्वर राग श्री में भी प्रयोग किए जाते हैं, किन्तु इसका चलन भिन्न होता है। आपको राग पूरिया धनाश्री का आकर्षक उदाहरण सुनवाने के लिए आज हमने सरोद वाद्य चुना है। भरपूर गमक से युक्त इस वाद्य पर राग पूरिया धनाश्री में तीनताल की एक मोहक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ। यह रचना उनके पिता और गुरु उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ की है।


राग पूरिया धनाश्री : सरोद पर मध्य लय तीनताल की गत : उस्ताद अमजद अली खाँ



एक अत्यन्त प्रचलित राग है भूपाली, जिसे राग भूप भी कहा जाता है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम पाँचवें प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा कर रहे हैं। भूपाली इस प्रहर का एक प्रमुख राग है। यह राग कर्नाटक संगीत के राग मोहनम् के समतुल्य है। कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है। इसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। राग देशकार में भी इन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, किन्तु उत्तरांग प्रधान होने के कारण यह भूपाली से अलग हो जाता है। आज हम आपको राग भूपाली में सितार वादन सुनवाते हैं। जाने-माने सितारनवाज उस्ताद शाहिद परवेज़ राग भूपाली में सितार पर तीनताल की गत और झाला प्रस्तुत कर रहे हैं। तबला संगति वाराणसी के रामकुमार मिश्र ने की है।


राग भूपाली : सितार पर तीनताल की गत और झाला : उस्ताद शाहिद परवेज़ 



आज के इस अंक में हम पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के पहले प्रहर के कुछ रागों की चर्चा कर रहे हैं। आजकल संगीत की अधिकतर सभाओं के आयोजन का यही समय होता है। इसी कारण इस प्रहर के राग संगीत-प्रेमियों के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। ऐसा ही एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है, यमन। प्राचीन संगीत के ग्रन्थों में इस राग का नाम कल्याण कहा गया है। इसका यमन नाम मुगल शासनकाल में प्रचलित हुआ। कर्नाटक संगीत का राग कल्याणी इसके समतुल्य है। इसे कल्याण थाट का आश्रय राग माना गया है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के अवरोह में यदि दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाए तो यह राग यमन कल्याण कहलाता है। यदि आरोह-अवरोह में तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग का दिया जाए तो यह राग बिलावल तथा यदि शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो यह राग वाचस्पति की अनुभूति कराने लगता है। आज इस राग में हम आपको एक अत्यन्त आकर्षक तराना सुनवाते हैं, जिस प्रस्तुत कर रही हैं, विदुषी मालिनी राजुरकर। यह तराना द्रुत एकताल में निबद्ध है। आप यह तराना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : द्रुत एकताल का तराना : विदुषी मालिनी राजुरकर



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 107वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 109वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘हमदर्द’ से राग गौड़ सारंग पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गौड़ सारंग और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और मिनिसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के छठें प्रहर अर्थात रात्रि के दूसरे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

कृष्णमोहन मिश्र 


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ