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Sunday, April 16, 2017

चैत्र की चैती : SWARGOSHTHI – 313 : CHAITRA KI CHAITI




स्वरगोष्ठी – 313 में आज

फागुन के रंग – 5 : चैती गीतों का लालित्य

विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में सुनिए – “चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा, पिया घर लइहें...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखला “फागुन के रंग” की पाँचवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। पिछले दिनों हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया था। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। अब तो चैत्र, शुक्ल प्रतिपदा अर्थात भारतीय नववर्ष और नवरात्रि का पर्व भी हम माना चुके हैं। इस परिवेश में लोक और उप-शास्त्रीय शैली में चैती गीतों का गायन किया जाता है। पिछले अंक में हमने धमार गीतों में होली की चर्चा की थी। आज के अंक में हम चैती गीतों की चर्चा करेंगे। आज हम विदुषी गिरिजा देवी और विदुषी निर्मला देवी के स्वरों में उपशास्त्रीय चैती और पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में एक फिल्मी चैती प्रस्तुत कर रहे हैं।



ज हम आपसे संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा करेंगे जो मूलतः ऋतु प्रधान लोक संगीत की शैली है, किन्तु अपनी सांगीतिक गुणबत्ता के कारण इस शैली को उपशास्त्रीय मंचों पर भी अपार लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत के रूप में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र मास से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में चैती गीतों का गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। उत्तर भारत में इस गीत के प्रकारों को चैती, चैता और घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है।

गिरिजा देवी
चैती गीतों का मूल स्रोत लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में रामजन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत् के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। कभी-कभी गायकों को दो दलों में बाँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी इन गीतों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘चैता दंगल' कहा जाता है। आइए, सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप पर एक दृष्टिपात करते है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी एक चर्चित चैती से हम आज की इस संगीत सभा का शुभारम्भ करते हैं। यह श्रृंगार रस प्रधान चैती है जिसमें नायिका परदेश गए नायक के वापस घर लौटने की प्रतीक्षा करती है। इस चैती की भाव-भूमि तो लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है।

चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : विदुषी गिरिजा देवी और साथी



निर्मला  देवी
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि ‘लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है।‘ श्लोक का अर्थ है कि ‘इस चर-अचर की दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।‘ चैती गीतों के लोक-रंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा| आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने उपशास्त्रीय मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात फिल्म अभिनेता गोविन्दा, गायिका निर्मला देवी आहूजा के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी।

चैती गीत : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइल रामा...’ : गायिका निर्मला देवी



मुकेश
चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती की धुन और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती का गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो कई गीतों में किया गया है, किन्तु धुन के साथ-साथ ऋतु के अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनीचुनी फिल्मी गीतों में मिलता है। 1963 में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के बहुचर्चित उपन्यास ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर थे, जिन्होंने फिल्म के गीतों को पूर्वी भारत की लोकधुनों में निबद्ध किया था। लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप गीतों की रचना की थी। इन्हीं गीतों में एक चैती गीत भी था, जिसे मुकेश के स्वर में रिकार्ड किया गया था। गीत के बोल हैं- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा…’। इस गीत में आपको चैती गीतों के समस्त लक्षण परिलक्षित होंगे। इस गीत में राग तिलक कामोद का आधार और दीपचन्दी ताल का स्पन्दन भी मिलेगा। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे।

चैती गीत : ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा...’ : मुकेश : फिल्म – गोदान



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 313वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 22 अप्रैल, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 315वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 311वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको ध्रुपद गायक पण्डित आशीष सांकृत्यायन के स्वर में धमार गायकी का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – मिश्र खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – धमार (14 मात्रा) और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, शैली – धमार

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर देकर इस सप्ताह विजयी हुए हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ का यह समापन अंक था। इस अंक में हमने आपके लिए चैती गीतों का एक खूबसूरत गुलदस्ता प्रस्तुत किया। श्रृंखला में हमने आपसे बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा की। आगामी अंक में हम संगीत जगत की एक महान विदुषी श्रीमती किशोरी अमोनकर को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके उपरान्त आगामी 30 अप्रैल,2017 से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम फिल्म जगत के गुणी संगीतकार रोशन के राग आधारित गीतो पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, January 15, 2017

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 301 : MORNING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 301 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



 "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘राग और गाने-बजाने का समय’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात, संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में भी सुनवा रहे हैं।




पण्डित भीमसेन जोशी
भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- “कोई तारा नज़र नहीं आवे...”। यह बन्दिश हम सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह बन्दिश तीनताल में निबद्ध है।

राग बिलावल : “कोई तारा नज़र नहीं आवे...” : पण्डित भीमसेन जोशी



लता मंगेशकर और सलिल चौधरी
आज का दूसारा प्रातःकालीन राग भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन अथवा वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बाँग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बाँग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म - जागते रहो



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली क्रमांक 301 में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। 




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – मुख्य गायक-स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 जनवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 303सरे अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता



‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 299 में हमने आपसे संगीत पहेली का कोई भी प्रश्न नहीं पूछा था। अतः इस अंक की पहेली का कोई भी विजेता नहीं है। अगले अंक से पहेली का उत्तर और विजेताओं के नाम पूर्ववत प्रकाशित करेंगे।

अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ नई लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, August 16, 2015

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 232 : MORNING RAGA




स्वरगोष्ठी – 232 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती और उनकी सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।



भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- ‘रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’। यह बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं, पटियाला (कसूर) घराने की गायकी में सिद्ध पण्डित अजय चक्रवर्ती। इस प्रस्तुति में उनका साथ दे रही हैं, अजय जी की ही सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती।


राग बिलावल : रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’ : अजय चक्रवर्ती और कौशिकी चक्रवर्ती





आज का दूसारा प्रातःकालीन भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन-वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बांग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - जागते रहो : संगीत - सलिल चौधरी





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 232वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गायिका के स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 22 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर प्रस्तुत कजरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। तीसरी श्रृंखला के विजेताओं के प्राप्तांक हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Sunday, April 19, 2015

बिलावल थाट के राग : SWARGOSHTHI – 215 : BILAWAL THAAT




स्वरगोष्ठी – 215 में आज


दस थाट, दस राग और दस गीत – 2 : बिलावल थाट


'तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...' 





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे बिलावल थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग बिलावल में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे। साथ ही इस थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग बिहाग के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



भारतीय संगीत के रागों को उनमें लगने वाले स्वरों के अनुसार वर्गीकृत करने की प्रणाली को थाट कहा जाता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने कुल दस थाट के अन्तर्गत सभी रागों का वर्गीकरण किया था। उन्होने थाट के कुछ लक्षण बताए हैं। किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। थाट में ये सात स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। थाट को गाया-बजाया नहीं जा सकता। इसके स्वरों के अनुकूल किसी राग की रचना की जा सकती है, जिसे गाया बजाया जा सकता है। एक थाट से कई रागों की रचना हो सकती है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपको ‘कल्याण’ थाट का परिचय दिया था। आज का दूसरा थाट है- ‘बिलावल’। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि अर्थात सभी शुद्ध स्वर का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (भाग-1) के अनुसार ‘बिलावल’ थाट का आश्रय राग ‘बिलावल’ ही है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग हैं- अल्हैया बिलावल, बिहाग, देशकार, हेमकल्याण, दुर्गा, शंकरा, पहाड़ी, भिन्न षडज, हंसध्वनि, माँड़ आदि। राग ‘बिलावल’ में सभी सात शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गांधार होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल का प्रथम प्रहर होता है।

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ 
अब हम आपको राग ‘बिलावल’ पर आधारित एक खयाल रचना सुनवाते हैं। यह रचना एक ऐसे महान संगीतज्ञ की आवाज़ में है, जो उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। किराना घराने के इस महान कलासाधक को हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के नाम से जानते हैं। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत की सभाओं गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। आइए, खाँ साहब की आवाज़ में सुनिए राग बिलावल की एक दुर्लभ रिकार्डिंग।


राग बिलावल : ‘प्यारा नज़र नहीं आवे...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ




संगीतकार बसन्त देसाई 
राग बिलावल का उल्लेख ‘गुरुग्रन्थ साहब’ में भी मिलता है। सम्पूर्ण गुरुवाणी को 31 रागों में बाँधा गया है। इसके 16वें क्रम पर राग बिलावल में निबद्ध पद हैं। ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या 795 से लेकर 859 तक की रचनाएँ इसी राग में निबद्ध हैं। बिलावल थाट के अन्तर्गत आने वाले रागों में एक प्रमुख राग बिहाग भी है, जिसमे सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। बिहाग, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग बिहाग के आरोह के स्वर हैं- साग मप निसां और अवरोह के स्वर हैं- सां निधप मग रेसा। यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। अब हम आपको राग बिहाग में पिरोया एक आकर्षक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। भरत व्यास के लिखे गीत को संगीतकार बसन्त देसाई ने राग बिहाग के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। गीत के बोल हैं- ‘तेरे सुर और मेरे गीत, दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...’ जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बिहाग : ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गूँज उठी शहनाई : संगीत – बसन्त देसाई


संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 25 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 213वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ द्वारा प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे गए थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद राशिद खाँ। इस बार की पहेली में पहले और दूसरे प्रश्न के सही उत्तर देकर तीनों प्रतिभागियों ने पूरे दो-दो अंक अर्जित किये हैं। तीसरे प्रश्न के उत्तर में तीनों प्रतिभागी भ्रमित हुए। जबलपुर से क्षिति तिवारी ने इस प्रश्न कोई उत्तर नहीं दिया है। हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने गायक कलाकार को उस्ताद अमीर खाँ के रूप में पहचाना है। पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने एकदम सही उत्तर तो नहीं दिया है, किन्तु उस्ताद राशिद खाँ के साथ पण्डित राजन मिश्र के नाम का विकल्प भी दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे बिलावल थाट और राग पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



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