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Wednesday, February 9, 2011

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११०

बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले हीं भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा हीं जैसे किसी पाँचवे दर्ज़े के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण हीं मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन.. लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है.. अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है.. वही गोल-गोल अक्षर.. गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ... और लो बन गया "क".. ऐसे हीं प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की हीं कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..


("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी खास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की बलैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक खास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह खास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी हीं मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे हीं हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ।.... शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी..
(रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है..
(माँझी रे माँझी)

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े हीं खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी हीं और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से हीं इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए। (साभार: सजीव जी एवं सुजॉय जी)

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी हीं बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े,
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक हीं गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना हीं हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो खासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद हीं किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी हीं सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी हीं है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है.. तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, _______ कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो
ना आ आ..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आँगन" और मिसरे कुछ यूँ थे-

ओस धुले मुख पोछे सारे
आँगन लेप गई उजियारे

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

आँगन में चहकें गौरैयाँ छत पर बैठा काग
जाड़ों की धूप सलोनी उस पर तेरा ये राग. - शन्नो जी

जिस आँगन में सजन संग हुए फेरे ,
अपनों का सुहाना मंजर याद आए रे - मंजु जी

कोई हँसता है तो तुमसा लगता है
दिल धड़कता है तो तुमसा लगता है
किसी सुबह मेरे आंगन मैं ओस से भीगा
कोई जब फूल खिलता है तो तुमसा लगता है - अवनींद्र जी

बहुत याद आती है
आँगन में लेटी हुई ,
कहानी सुनाती हुई वो मेरी
अम्मा (दादी ) - नीलम जी

डॉक्टर साहब महफ़िल की शुरूआत आपकी टिप्पणी से हुई, मेरे लिए इससे बड़ी बात क्या होगी। आपने सही कहा कि पंचम के गुजरने के बाद अकेले पड़े गुलज़ार के लिए विशाल भारद्वाज राहत की साँस की तरह आए हैं। वैसे बीच-बीच में "भूपिंदर" भी ऑक्सीजन की झलक दिखाते रहते हैं। लेकिन गुलज़ार तो गुलज़ार हैं। इन्हें कहीं एक छोटी-सी चिनगी भी दिख गई तो ये उसे आग में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसलिए हमें फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम तो बस उन पढते और लिखते जाएँगे, बस आप ऐसे हीं हमारा हौसला-आफ़ज़ाई करते रहें। शन्नो जी, घर छोड़कर कहाँ जाएँगीं आप.. आखिरकार लौटकर तो यहीं आना है :) सुजॉय जी, लीजिए हमने आज आपकी फ़रमाईश पूरी कर दी.. आप भी क्या याद करेंगे! मंजु जी, अवनींद्र जी एवं नीलम जी, आपकी स्वरचित पंक्तियों ने महफ़िल के सूनेपन को समाप्त करने में हमारी सहायता की। इसके लिए हम आपके तह-ए-दिल से आभारी हैं। पूजा जी, दिलीप जी से हमारा परिचय कराने के लिए आपका धन्यवाद! लेकिन यह क्या.. शेर किधर हैं? अगली बार ध्यान रखिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, September 16, 2010

सुनिए एक ब्लॉगर, गीतकार, कवि और हिन्दीप्रेमी सजीव सारथी की Success Story (AIR FM Gold)

हिन्द-युग्म के आवाज़-मंच के कर्ता-धर्ता सजीव सारथी का अभी-अभी AIR FM Gold पर इंटरव्यू प्रसारित हुआ। AIR FM Gold समाचारों को केन्द्रित अपने कार्यक्रम 'आज सवेरे' में हर वृहस्पतिवार को 'सक्सेस स्टोरी' प्रसारित करता है, जिसमें किसी एक ऐसे व्यक्ति या समूह की चर्चा होती है, जिसने भीड़ से अलग कर दिखाया हो। 'आज सवेरे' कार्यक्रम AIR FM Gold पर हर सुबह 7‍ः30 बजे प्रसारित होता है, जो FM, SW, DTH और AIR की वेबसाइट के माध्यम से पूरी दुनिया मे सुना जाता है। आज सुनिए एक ब्लॉगर, गीतकार, कवि और हिन्दीप्रेमी सजीव सारथी की सक्सेस स्टोरी.



प्लेयर से न सुन पा रहे हों तो यहाँ से डाउनलोड कर लें।

Friday, May 1, 2009

जब अनुराग बोले रेडियो से

अनुराग शर्मा हिन्द-युग्म का बहुत जाना-पहचाना नाम है। कहानी-वाचन के लिए ये आवाज़ के श्रोताओं के दिलों में अपनी ख़ास जगह बना चुके हैं। ये एक अच्छे कवि और विचारक भी हैं। पिछले सप्ताह 19 अप्रैल 2009 को रेडियो सलाम नमस्ते पर अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति द्वारा प्रस्तुत हिन्दी कविता के विशेष कार्यक्रम ' कवितांजलि' में इनका साक्षात्कार प्रसारित हुआ। कार्यक्रम के उद्‍घोषक आदित्य प्रकाश ने इनसे संक्षिप्त बातचीत की। अब तक इस कार्यक्रम में आलोक शंकर, गौरव सोलंकी, विपुल शुक्ला, अनुपमा चौहान, निखिल आनंद गिरि, रंजना भाटिया, सुनीता शानू, मनीष वंदेमातरम् और शैलेश भारतवासी इत्यादि के काव्यपाठ और बातचीत प्रसारित हो चुके हैं।

आज सुनिए अनुराग शर्मा से बातचीत-

अनुराग शर्मा के साथ सजीव सारथी की बातचीत पढ़ने के लिए क्लिक करें।

Wednesday, February 11, 2009

मेरी प्यास हो न हो जग को...मैं प्यासा निर्झर हूँ...- कवि गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा जी की याद में

महान कवि और गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रही है सुपुत्री लावण्य शाह -

काव्य सँग्रह "प्यासा ~ निर्झर" की शीर्ष कविता मेँ कवि नरेँद्र कहते हैँ-

"मेरे सिवा और भी कुछ है,
जिस पर मैँ निर्भर हूँ
मेरी प्यास हो ना हो जग को,
मैँ,प्यासा निर्झर हूँ"


हमारे परिवार के "ज्योति -कलश" मेरे पापा और फिल्म "भाभी की चूडीयाँ " फिल्म के गीत मेँ,"ज्योति कलश छलके" शब्द भी उन्हीँ के लिखे हुए हैँ जिसे स्वर साम्राज्ञी लता दीदी ने भूपाली राग मेँ गा कर फिल्मोँ के सँगीत मेँ साहित्य का,सुवर्ण सा चमकता पृष्ठ जोड दिया !"यही हैँ मेरे लिये पापा"!

हमारे परिवार के सूर्य !
जिनसे हमेँ ज्ञान, भारतीय वाँग्मय, साहित्य,कला,संगीत,कविता तथा शिष्टाचार के साथ इन्सानियत का बोध पाठ भी सहजता से मिला- ये उन के व्यक्तित्त्व का सूर्य ही था जिसका प्रभामँडल "ज्योति कलश" की भाँति, उर्जा स्त्रोत बना हमेँ सीँचता रहा -


मेरे पापा उत्तर भारत, खुर्जा ,जिल्ला बुलँद शहर के जहाँगीरपुर गाँव के पटवारी घराने मेँ जन्मे थे.प्राँरभिक शिक्षा खुर्जा मेँ हुई -इलाहबाद विश्वविद्यालय से अँग्रेजी साहित्य मेँ M/A करनेके बाद, वे विविध प्रकार की साहित्यिक गतिविधियोँ से जुडे रहे
जैसा यहाँ सुप्रसिद्ध लेखक मेरे चाचा जी अमृत लाल नागर जी लिखते हैँ -"अपने छात्र जीवन मेँ ही कुछ पैसे कमाने के लिये नरेन्द्र जी कुछ दिनोँ तक "भारत" के सँपादीय विभाग मेँ काम करते थे. शायद "अभ्युदय" के सँपादीकय विभाग मेँ भी उन्होने काम किया था. M.A पास कर चुकने के बाद वह अकेले भारतीय काँग्रेस कमिटी के दफ्तर मेँ भी हिन्दी अधिकारी के रुप मेँ काम करने लगे. उस समय जनता राज मेँ राज्यपाल रह चुकनेवाले श्री सादिक अली(पढेँ यह आलेख सादिक अली जी द्वारा लिखा हुआ )और भारत के दूसरे या तीसरे सूचना मँत्री के रुप मेँ काम कर चुकनेवाले स्व. बालकृष्ण केसकर भी उनके साथ काम करते थे.एक बार मैँने उन दिनोँ का एक फोटोग्राफ भी बँधु के यहाँ देखा था. उसी समय कुछ दिनोँ के लिये वह कोँग्रेस के अध्यक्ष पँडित जवाहरलाल नेहरु के कार्यालय के सचिव भी रहे थे. इतने प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्होँने कभी, किसी से किसी प्रकार की मदद नहीं माँगी.फिल्मोँ मेँ उन्होँने सफल गीतकार के रुप मेँ अच्छी ख्याति अर्जित की. उससे भी अधिक ज्योतीषी के रुप मेँ भी उन्होँने वहाँ खूब प्रतिष्ठा पायी."

जैसा यहाँ नागर जी चाचा जी ने लिखा है, पापा कुछ वर्ष आनँद भवन मेँ अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिँदी विभाग से जुडे और वहीँ से २ साल के लिये,नज़रबंद किये गए -देवली जेल मेँ भूख हडताल से (१४ दिनो तक) ....जब बीमार हाल मेँ रिहा किए गए तब गाँव, मेरी दादीजी गँगादेवी से मिलने गये - ---जहाँ बँदनवारोँ को सजा कर देशभक्त कवि नरेन्द्र का हर्षोल्ल्लास सहित स्वागत किया गया - वहीँ से श्री भगवती चरण वर्मा जी ("चित्रलेखा" के प्रसिद्ध लेखक)के आग्रह से बम्बई आ बसे -वहीँ गुजराती कन्या सुशीला से पँतजी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणि ग्रहण सँस्कार संपन्न हुए. बारात मेँ हिँदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्व पूर्ण हस्तियाँ हाजिर थीँ --

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण : ~~~~
"खुर्जा कुरु जाँगल का ही बिगडा हुआ नाम है.उनके पिता पँडित पूरनलाल जी गौड जहाँगीरपुर ग्राम के पटवारी थे बडे कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, सात्विक विचारोँ के ब्राह्मण !अल्पायु मेँ ही उनका देहावसन हो गया था. उनके ताऊजी ने ही उनकी देखरेख की और पालन पोषण उनकी गँगा स्वरुपा माता स्व. गँगादेवी ने ही किया. आर्यसमाज और राष्ट्रीय आँदोलन के दिन थे, इसलिये नरेन्द्र जी पर बचपन से ही सामाजिक सुधारोँ का प्रभाव पडा, साथ ही राष्ट्रीय चेतना का भी विकास हुआ. नरेन्द्रजी अक्सर मौज मेँ आकर अपने बचपन मेँ याद किया हुआ एक आर्यसमाजी गीत भी गाया करते थे, मुझे जिसकी पँक्ति अब तक याद है -
- "वादवलिया ऋषियातेरे आवन की लोड"

लेकिन माताजी बडी सँस्कारवाली ब्राह्मणी थीँ उनका प्रभाव बँधु पर अधिक पडा. जहाँ तक याद पडता है उनके ताऊजी ने उन्हेँ गाँव मेँ अँग्रेजी पढाना शुरु किया था बाद मेँ वे खुर्जा के एक स्कूल मेँ भर्ती कराये गये. उनके हेडमास्टर स्वर्गीय जगदीशचँद्र माथुर के पिता श्री लक्ष्मीनारायण जी माथुर थे. लक्ष्मीनारायण जी को तेज छात्र बहुत प्रिय थे. स्कूल मे होनेवाली डिबेटोँ मेँ वे अक्सर भाग लिया करते थे. बोलने मेँ तेज ! इन वाद विवाद प्रतियोगिताओं मेँ वे अक्सर फर्स्ट या सेकँड आया करते थे.

जगदीशचँद्र जी माथुर नरेन्द्र जी से आयु मे चार या पाँच साल छोटे थे. बाद मेँ तत्कालीक सूचना मँत्री बालकृष्ण केसकर ने उन्हेँ आकाशवाणी के डायरेक्टर जनरल के पद पर नियुक्त किया. जगदीशचँद्र जी सुलेखक एवँ नाटककार भी थे तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे पढते समय भी उनका श्रद्धेय सुमित्रा नँदन पँत और नरेन्द्र जी से बहुत सँपर्क रहा. वह बँधुको सदा "नरेन्द्र भाई" ही कहा करते थे --अवकाश प्राप्त करने के बाद,एक बार,मेरी उनसे दिल्ली मेँ लँबी और आत्मीय बातेँ हुईँ थी उन्होँने ही मुझे बताया था कि उनके स्वर्गीय पिताजी ने ही उन्हेँ (बँधु को) सदा "नरेन्द्र भाई" कहकर ही सँबोधित करने का आदेश दिया था. नरेन्द्र जी इलाहाबाद मेँ रहते हुए ही कविवर बच्चन, शमशेर बहादुर सिँह, केदार नाथ अग्रवाल और श्री वीरेश्वर से जो बाद मेँ "माया" के सँपादक हुए ,उनका घनिष्ट मैत्री सँबध स्थापित हो गया था. ये सब लोग श्रद्धेय पँतजी के परम भक्त थे. और पँतजी का भी बँधु के प्रति एक अनोखा वात्सल्य भाव था, वह मैँने पँतजी के बम्बई आने और बँधु के साथ रहने पर अपनी आँखोँ से देखा था.

नरेन्द्र जी के खिलँदडेपन और हँसी - मजाक भरे स्वभाव के कारण दोनोँ मेँ खूब छेड छाड भी होती थी. किन्तु, यह सब होने के बावजूद दोनोँ ने एक दूसरे को अपने ढँग से खूब प्रभावित किया था. नरेन्द्र जी की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर, बँबईवालोँ ने एक स्मरणीय अभिनँदन समारोह का आयोजन किया था. तब तक सुपर स्टार चि. अमिताभ के पिता की हैसियत से आदरणीय बच्चन भाई भी बम्बई के निवासी हो चुके थे. उन्होँने एक बडा ही मार्मिक और स्नेह पूर्ण भाषण दिया था, जो नरेन्द्र के अभिनँदन ग्रँथ "ज्योति ~ कलश" मेँ छपा भी है.

उक्त अभिनँदन समारोह मेँ किसी विद्वान ने नरेन्द्र जी को प्रेमानुभूतियोँ का कवि कहा था !इस बात को स्वीकार करते हुए भी बच्चन भाई ने बडे खुले दिल से यह कहा था कि अपनी प्रेमाभिव्यक्तियोँ मेँ भी नरेन्द्र जी ने जिन गहराइयोँ को छुआ है और सहज ढँग से व्यक्त किया वैसा छायावाद का अन्य कोई कवि नहीँ कर पाया !(पूरा पढ़ें..)

भारत कोकिला श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी जी की एक फिल्म् "मीरा" हिन्दी मेँ डब कर रहा था और इस निमित्त से वह और उनके पति श्रीमान् सदाशिवम् जी बँबई ही रह रहे थे। बँधुवर नरेन्द्रजी ने उक्त फिल्म के कुछ तमिल गीतोँ को हिन्दी मे इस तरह रुपान्तरित कर दिया कि वे मेरी डबिँग मेँ जुड सकेँ। सदाशिवं जी और उनकी स्वनामधन्य पत्नी तथा तथा बेटी राधा हम लोगोँ के साथ व्यावसायिक नहीँ किन्तु पारिवारिक प्रेम व्यवहार करने लगे थे. सदाशिवं जी ने बँबई मेँ ही एक नयी शेवरलेट गाडी खरीदी थी.वह जोश मेँ आकर बोले,"इस गाडी मेँ पहले हमारा यह वर ही यात्रा करेगा !"

गाडी फूलोँ से खूब सजाई गई उसमेँ वर के साथ माननीय सुब्बुलक्ष्मी जी व प्रतिभा बैठीँ । समधी का कार्य श्रद्धेय सुमित्रनँदन पँत ने किया। बडी शानदार बारात थी !बँबई के सभी नामी फिल्मस्टार और नृत्य - सम्राट उदयशँकर जी उस वर यात्रा मेँ सम्मिलित हुए थे.बडी धूमधाम से विवाह हुआ.मेरी माता बंधु से बहुत प्रसन्न् थी और पँत जी को ,जो उन दिनोँ बँबई मेँ ही नरेन्द्र जी के साथ रहा करते थे, वह देवता के समान पूज्य मानती थी ।मुझसे बोली,"नरेन्द्र और बहु का स्वागत हमारे घर पर होगा !"

दक्षिण भारत कोकिला : सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दीलिप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाब्य्, सपत्नीक, अनिल बिश्वासजी, गुरु दत्तजी, चेतनानँदजी, देवानँदजी इत्यादी सभी इस विलक्षण विवाह मेँ सम्मिलित हुए थे और नई दुल्हन को कुमकुम के थाल पर पग धरवा कर गृह प्रवेश करवाया गया उस समय सुरैया जी तथा सुब्बुलक्ष्मी जी मे मँगल गीत गाये थे और जैसी बारात थी उसी प्रकार बम्बई के उपनगर खार मेँ, १९ वे रास्ते पर स्थित उनका आवास भी बस गया - न्यू योर्क भारतीय भवन के सँचालक श्रीमान डा.जयरामनजी के शब्दोँ मेँ कहूँ तो "हिँदी साहित्य का तीर्थ - स्थान" बम्बई जेसे महानगर मेँ एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया --

मेरी अम्मा स्व. श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा का एक सँस्मरण है ~~
जब मुझसे बडी बहन वासवी का जन्म हो गया था तब पापा जी और अम्मा सुशीला माटुँगा तैकलवाडी के घर पर रहते थे इसी २ कमरे वाले फ्लैट मेँ कवि श्रेष्ठ श्री सुमित्रा नँदन पँत जी भी पापा जी के साथ कुछ वर्ष रह चुके थे -एक दिन पापाजी और अम्मा बाज़ार से सौदा लिये किराये की घोडागाडी से घर लौट रहे थे -अम्मा ने बडे चाव से एक बहुत महँगा छाता भी खरीदा था -जो नन्ही वासवी (मेरी बडी बहन ) और साग सब्जी उतारने मेँ अम्मा वहीँ भूल गईँ -जैसे ही घोडागाडी ओझल हुई कि वह छाता याद आ गया !पापा जी बोले, "सुशीला, तुम वासवी को लेकर घर जाओ, वह दूर नहीँ गया होगा मैँ अभी तुम्हारा छाता लेकर आता हूँ !"

अम्मा ने बात मान ली और कुछ समय बाद पापा जी छाता लिये आ पहुँचे !कई बरसोँ बाद अम्मा को यह रहस्य जानने को मिला कि पापा जी दादर के उसी छातेवाले की दुकान से हुबहु वैसा ही एक और नया छाता खरीद कर ले आये थे ताकि अम्मा को दुख ना हो !इतने सँवेदनाशील और दूसरोँ की भावनाओँ का आदर करनेवाले,उन्हेँ समझनेवाले भावुक कवि ह्र्दय के इन्सान थे मेरे पापा जी !


आज याद करूँ तब ये क्षण भी स्मृति मेँ कौँध - कौँध जाते हैँ .
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(अ) हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बडे सो रहे थे,पडोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड कर किलकारियां भर रहे थे कि,अचानक पापाजी वहाँ आ पहुँचे ----
गरज कर कहा,
"अरे ! यह आम पूछे बिना क्योँ तोडे ?
जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो"
एक तो चोरी करते पकडे गए और उपर से माफी माँगनी पडी !!!
- पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए
-- यही उनकी शिक्षा थी --

( ब ) मेरी उम्र होगी कोई ८ या ९ साल की
- पापाजी ने, कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति "मेघदूत" से पढनेको कहा --
सँस्कृत कठिन थी परँतु, जहाँ कहीँ , मैँ लडखडाती,
वे मेरा उच्चारण शुध्ध कर देते --
आज, पूजा करते समय , हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ --

( क ) मेरी पुत्रा सिँदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती,
पापा , मेरे पास सहारा देते , मिल जाते
-- मुझसे कहते, " बेटा, मैँ हूँ , यहाँ " ,..................
आज मेरी बिटिया की प्रसूती के बाद,
यही वात्सल्य उँडेलते समय,
पापाजी की निस्छल, प्रेम मय वाणी और
स्पर्श का अनुभव हो जाता है ..
जीवन अत्तेत के गर्भ से उदित होकर,
भविष्य को सँजोता आगे बढ रहा है -


कुछ और यादेँ हैँ जिन्हेँ आप के साथ साझा कर रही हूँ -

*काव्यमय वाणी*
मैँ जब छोटी बच्ची थी तब,अम्मा व पापा जी का कहना है कि,अक्सर काव्यमय वाणी मेँ ही अपने विचार प्रकट किया करती थी !

अम्मा कभी कभी कहती कि,

"सुना था कि मयुर पक्षी के अँडे, रँगोँ के मोहताज नहीँ होते !
उसी तरह मेरे बच्चे पिता की काव्य सम्पत्ति की विरासत मेँ साथ लेकर आये हैँ !"

यह एक माँ का गर्व था जो छिपा न रह पाया होगा. या,उनकी ममता का अधिकार उन्हेँ मुखर कर गया था शायद !

कौन जाने ?

परँतु आज जो मेरी अम्मा ने मुझे बतलाया था

उसे आप के साथ बाँट रही हूँ -

तो सुनिये,
एक बार मैँ, मेरी बचपन की सहेली लता,बडी दीदी वासवी, - हम तीनोँ खेल रहे थे.वसँत ऋतु का आगमन हो चुका था
और होली के उत्सव की तैयारी बँबई शहर के गली मोहोल्लोँ मेँ ,जोर शोरोँ से चल रही थीँ -खेल खेल मेँ लता ने ,मुझ पर एक गिलास पानी फेँक कर मुझे भीगो दीया !मैँ भागे भागे अम्मा पापाजी के पास दौड कर पहुँची और अपनी गीली फ्रोक को शरीर से दूर खेँचते हुए बोली,

"पापाजी, अम्मा ! देखिये ना !
मुझे लताने ऐसे गीला कर दिया है
जैसे मछली पानी मेँ होती है !"

इतना सुनते ही,अम्मा ने मुझे वैसे,गीले कपडोँ समेत खीँचकर. प्यार से गले लगा लिया !

बच्चोँ की तोतली भाषा, सदैव बडोँ का मन मोह लेती है.

माता,पिता को अपने शिशुओँ के प्रति ऐसी उत्कट ममता रहती है कि, उन्हेँ हर छोटी सी बात ,विद्वत्तापूर्ण और अचरजभरी लगती है मानोँ सिर्फ उन्ही के सँतान इस तरह बोलते हैँ - चलते हैँ, दौडते हैँ -

पापा भी प्रेमवश, मुस्कुरा कर पूछने लगे,

"अच्छा तो बेटा,
मछली ऐसे ही गीली रहती है पानी मेँ?
तुम्हेँ ये पता है ?"

"हाँ पापा, एक्वेरीयम (मछलीघर)मेँ देखा था ना हमने !"
मेरा जवाब था --
हम बच्चे,सब से बडी वासवी, मैँ मँझली लावण्या, छोटी बाँधवी व भाई परितोष अम्मा पापा की सुखी, गृहस्थी के छोटे, छोटे स्तँभ थे !
उनकी प्रेम से सीँची फुलवारी के हम महकते हुए फूल थे!

आज जब ये याद कर रही हूँ तब प्रिय वासवी और वे दोनोँ ,हमारे साथ स -शरीर नहीँ हैँ !

उनकी अनमोल स्मृतियोँ की महक
फिर भी जीवन बगिया को महकाये हुए है.

हमारे अपने शिशु बडे हो गये हैँ -
- पुत्री सौ. सिँदुर का पुत्र नोआ ३ साल का हो गया है !
फुलवारी मेँ आज भी,फूल महक रहे हैँ !

यह मेरा परम सौभाग्य है और मैँ,लावण्या,सौभाग्यशाली हूँ
कि मैँ पुण्यशाली , सँत प्रकृति कवि ह्रदय के लहू से सिँचित,
उनके जीवन उपवन का एक फूल हूँ --

उन्हीँके आचरणसे मिली शिक्षा व सौरभ सँस्कार,
मनोबलको, हर अनुकूल या विपरित जीवन पडाव पर
मजबूत किये हुए,जी रही हूँ !

उनसे ही ईश्वर तत्व क्या है उसकी झाँकी हुई है -
- और,मेरी कविता ने प्रणाम किया है --

"जिस क्षणसे देखा उजियारा,
टूट गे रे तिमिर जाल !
तार तार अभिलाषा तूटी,
विस्मृत घन तिमिर अँधकार !
निर्गुण बने सगुण वे उस क्षण ,
शब्दोँ के बने सुगँधित हार !
सुमन ~ हार, अर्पित चरणोँ पर,
समर्पित, जीवन का तार ~ तार !!


(गीत रचना ~ लावण्या )

प्रथम कविता ~ सँग्रह, "फिर गा उठा प्रवासी" बडे ताऊजीकी बेटी श्रीमती गायत्री, शिवशँकर शर्मा " राकेश" जी के सौजन्यसे, तैयार है --
--"प्रवासी के गीत" पापाजी की सुप्रसिद्ध पुस्तक और खास उनके गीत "आज के बिछुडे न जाने कब मिलेँगे ?" जैसी अमर कृति से हिँदी साहित्य जगत से सँबँध रखनेवाले हर मनीषी को यह बत्ताते अपार हर्ष है कि,यह मेरा विनम्र प्रयास, मेरे सुप्रतिष्ठित कविर्मनीष पिताके प्रति मेरी निष्ठा के श्रद्धा सुमन स्वर स्वरुप हैँ --शायद मेरे लहू मेँ दौडते उन्ही के आशिष ,फिर हिलोर लेकर, माँ सरस्वती की पावन गँगाको, पुन:प्लावित कर रहे होँ क्या पता ?

डा. राही मासूम रज़ा सा'ब ने यह भावभीनी कविता लिखी है -

जिसे सुनिये चूँकि आज,रज़ा सा'ब भी हमारे बीच अब स- शरीर नहीँ रहे ! :-(

"वह पान भरी मुस्कान"

वह पान भरी मुस्कान न जाने कहाँ गई ?

जो दफ्तर मेँ ,इक लाल गदेली कुर्सी पर,
धोती बाँधे,इक सभ्य सिल्क के कुर्ते पर,
मर्यादा की बँडी पहने,आराम से बैठा करती थी,
वह पान भरी मुस्कान तो उठकर चली गई !
पर दफ्तर मेँ,वो लाल गदेली कुर्सी अब तक रक्खी है,

जिस पर हर दिन,अब कोई न कोई, आकर बैठ जाता है


खुद मैँ भी अक्सर बैठा हूँ

कुछ मुझ से बडे भी बैठे हैँ,
मुझसे छोटे भी बैठे हैँ,
पर मुझको ऐसा लगता है
वह कुरसी लगभग एक बरस से खाली है !


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अमीन सयानी द्वारा लिया गया पंडित जी का एक लंबा इंटरव्यू हमारे पास उपलब्ध है. आज उनकी पुण्य तिथि पर आईये हम सब भी लावण्या जी के साथ उन्हें याद करें इस इंटरव्यू को सुन -

भाग १.


भाग २.


भाग ३.


चित्र में - पँडित नरेन्द्र शर्मा, श्रीमती सुशीला शर्मा तथा २ बहनेँ वासवी (गोद मेँ है शौनक छोटा सा और पुत्र मौलिक) बाँधवी (बच्चे- कुँजम, दीपम ) लावण्या (बच्चे -सिँदुर व सोपान) और भाई परितोष घर के बारामदे में.

प्रस्तुति - लावण्या शाह




Tuesday, January 6, 2009

लक्ष्य छोटे हों या बड़े, पूरे होने चाहिए- शैलेश भारतवासी

डैलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो चैनल 'रेडियो सलाम नमस्ते' को दिये गये अपने साक्षात्कार में हिन्द-युग्म के संस्थापक-नियंत्रक शैलेश भारतवासी ने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह चाहे छोटे लक्ष्य बनायें या बड़े लक्ष्य बनाये, उसे पूरा करे। शैलेश रेडियो सलाम नमस्ते के हिन्दी कविता को समर्पित साप्ताहिक कार्यक्रम 'कवितांजलि' के २१ दिसम्बर के कार्यक्रम में टेलीफोनिक इंटरव्यू दे रहे थे। हमें वह रिकॉर्डिंग प्राप्त हो गई है। आप भी सुनें, शैलेश की बातें और उसके बाद रेडियो सलाम नमस्ते के श्रोताओं की बातें।




आदित्य प्रकाश
यह कार्यक्रम डैलास, अमेरिका में ही वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत हिन्दी सेवी आदित्य प्रकाश सिंह द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। आदित्य प्रकाश की आवाज़ सुनकर हर एक हिन्दी प्रेमी को हिन्दी के लिए कुछ कर गुजरने की ऊर्जा मिलती है। आदित्य प्रकाश सिंह अपने खर्चे से दुनिया भर के हिन्दी कर्मियों को अपने कवितांजलि कार्यक्रम से जोड़ते हैं। यहाँ तक कि स्टूडियो तक आने-जाने का खर्च भी ये ही उठाते हैं। मूल रूप से भारत में बिहार के रहनेवाले आदित्य प्रकाश कविताओं के शौक़ीन तो हैं ही, खुद एक कवि भी हैं। कभी इनके बारे में हम आवाज़ पर विस्तार से बातें करेंगे।

Thursday, November 6, 2008

मेरी आवाज़ ही पहचान है.... पार्श्व गायक भूपेंद्र

इनसे मिलिए (1)- भूपेन्द्र

आज से हम आवाज़ पर एक नई शृंखला शुरू कर रहे हैं. विविध भारती से प्रसारित हुए कुछ अनमोल साक्षात्कारों को हम यहाँ टेक्स्ट और ऑडियो फॉर्मेट में पुनर्प्रस्तुत कर रहे हैं. इस काम में हमारी सहायता कर रहे हैं सुजोय चट्टर्जी. पहली कड़ी के रूप में आज हम AIR विविध भारती की रेणू बंसल द्वारा लिया गया पार्श्व गायक भूपेंद्र का ये साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं. साथ में हैं भूपेंद्र के गाये कुछ बेहद यादगार गीत जो कार्यक्रम के दौरान सुनवाये गए.

कलाकार: भूपेंद्र (पार्श्व गायक)
साक्षात्कारकर्ता : रेणु बंसल (विविध भारती AIR)

रेणु बंसल : दोस्तों, पार्श्व गायन की दुनिया में यूँ तो बहुत सी आवाज़ें सुनाई देते हैं, लेकिन एक आवाज़ सबसे अलग सुनाई पड़ती है,यूँ लगता है जैसे बहुत अलसाई सी हो और मीठी खुमारी से भारी हो.जैसे जैसे वो आवाज़ तान लेती है, यूँ लगता है कोई दोशीजा अंगडाई ले रही हो. यह वो आवाज़ है जो कभी हमारा हाथ पकड़ के बचपन की गलियों में,कभी गाँवों की मेडों पर दूर किसी राह पर ले जाती है जहाँ यादों के साथ साथ ज़िंदगी के कितने ही रंगों के खूबसूरत अहसासों से होकर हम गुज़रते हैं.कभी इन्होने खुद ही कहा था...

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मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे (किनारा)
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रेणु बंसल : याद आया आपको? आज हम रु-ब-रु हो रहे हैं इनसे मिलिए 'प्रोग्राम' के तहत पार्श्व गायक भूपेंद्र से. भूपेंद्र-जी, आप का विविध भारती के 'स्टूडियो' में स्वागत है, नमस्कार!

भूपेंद : नमस्कार, बहुत बहुत शुक्रिया

रेणु बंसल : आप दिल्ली के रहनेवाले हैं, और दिल्ली से आप के कदम जब मुंबई की तरफ बढ़े तो वो फिल्मी दुनिया के लिए ही बढ़े थे क्या?

भूपेंद : मैं बॉम्बे तो फिल्मी दुनिया के लिए ही आया था, ज़ाती तौर पर मुझे बॉम्बे आने का कुछ शौक नहीं था. लेकिन मुझे कुछ अच्छे लोगों ने यहाँ आने के लिए कहा था और मुझे उन्होने 'प्रॉमिस' किया था कि 'हम अगर आप के लिए कोई गाना बनाएँगे तो आप आकर गाएँगे क्या?' तो मैने कहा कि 'मैं ज़रूर गाऊँगा'. तो ऐसे ही मदन साहब ने मुझे पूछा था दिल्ली में,मरहूम मदन मोहन साहब ने और चेतन आनंद साहब ने. उनकी फिल्म हक़ीक़त बन रही थी तो शायद उनको कोई नयी आवाज़ चाहिए थी.तो उनके कहने पर मैं 'फिल्म इंडस्ट्री' में गाने के लिए ही आया था.

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होके मजबूर मुझे उसने बुलाया होगा (हक़ीक़त)
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रेणु बंसल : लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि फिल्म हक़ीक़त में आप ने एक 'रोल' भी किया था और एक 'रोल' आप ने आखरी खत में भी किया था.

भूपेंद : (हँसते हुए) यह बहुत एक अजीब सी बात है की जिस चीज़ के बारे में नहीं सोचा था वो थी 'एक्टिंग'. कि मैं कभी फिल्मों में 'एक्टिंग' करूँ, यह बात मेरे दिमाग़ में कभी आती नहीं थी. तो मैं तो गाने के लिए आया था, पता नहीं चेतन साहब को मुझमें क्या नज़र आया, मेरा गाना जो मैने गाया था मेरे उपर ही 'पिक्चाराईस' करके और बहुत लोगों से तालियाँ बज़वाई थी कि,और यह भी, बड़ी बात मैं बोलना नहीं चाहता हूँ कि, यह भी 'अनाउन्स' किया था कि 'i am going to make another singing sahgal in the film industry'. तो तब मैं ज़रा कुछ और दिमाग़ का होता था,
मैने सोचा की ऐसी बात आदमी बोलते रहते हैं, 'एक्टिंग' मुझे पसंद नहीं थी,actually 'एक्टिंग' मुझे शुरू से ही कुछ लगाव नहीं था. आप ने अगर हक़ीक़त 'पिक्चर' देखी होगी तो आपने देखा होगा की मैं 'पिक्चर' में से 'सडेनली' गायब हो जाता हूँ,क्यूंकि उसके बाद मैं बॉम्बे से दिल्ली भाग आया, मैं उसके बाद बॉम्बे आया ही नहीं. मुझे ज़बरदस्ती 'एक्टिंग' करनी पड़ती अगर मैं आता तो. 'एक्टिंग' मुझे नहीं करनी थी. ऐसे मुझसे आखरी खत में भी गाना गवाकर मुझपर 'पिक्चारईस' कर ली.

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हुज़ूर इस कदर भी न (फ़िल्म मासूम)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, आपने जिन गानो का ज़िक्र किया, वो बेशक इतने सुरीले इतने मीठे हैं कि आज भी तन्हाई में 'होंट' करते हैं. पर्दे के पीछे जब आप चले गये, पार्श्व गायन जब आप ने अपना लिया, तो पार्श्व गायन में ग़ज़लों का दामन आप ने किस तरह थामा?

भूपेंद्र : अच्छा सवाल है क्यूंकि मुझे पहली बार किसी ने पूछा है, जब मैने फिल्मों में 'प्लेबॅक' शुरू किया था तो उस समय मेरे 'फवरेट प्लेबॅक सिंगर्स' थे, मोहमद रफ़ी साहब थे, तलत महमूद साहब थे, किशोर दादा थे, मन्ना डे साहब हैं,इनको
दिमाग़ में छोड्के मुझे और कुछ, दूसरा गाना जमता ही नहीं था. तो मेरे दिमाग़ में एक बात थी की यह लोग बहुत ही ज़बरदस्त 'सिंगर्स' हैं, दिमाग़ में क्या यह तो सही बात थी और बहुत ज़बरदस्त लोग थे और हैं भी, तो इनसे अच्छा मैं नहीं गा पाऊंगा यह मैं सोचता रहता था, कि 'This is one thing i will never able to do'. तो गाना भी मेरा चलता रहा, मैं थोड़ा 'गिटार' भी बजाता था उस वक़्त, 'स्पॅनिश गिटार', तो उसमें भी मैने 'फिल्म इंडस्ट्री' में काफ़ी नाम कमाया, तो मैं क्या हुआ कि मैं 'साइड बाइ साइड' में 'गिटार' भी बजाता था, कोई गाने के लिए बुलाता था तो वहाँ भी चला जाता था, तो ऐसा करते करते 'ऑलमोस्ट 15' साल गुज़र गये, तब मेरी मिताली से मुलाक़ात हुई, 'she was already singing on the stage', ग़ज़ल गाती थी, 1983-84 में 'we got married', शादी हो गयी. मैं 'स्टेज' के सख्त खिलाफ था, मुझे 'स्टेज' में गाने से बड़ी तकलीफ़ होती थी. यह उन दिनों की बात है जब मैं ग़ज़लें 'कंपोज़' करता था और अपने लिए या अपने दोस्तों के लिए ही करता था, खुद ही हम घर में बैठ्के गाते थे. लेकिन 83-84 में 'i was convinced', जैसे किशोर दादा मुझसे कहा करते थे की ''स्टेज' पे गाया कर', मेरी ठोडी पकड्कर कहा करते थे जैसे छोटे बच्चे को कहते हैं, ''स्टेज' पे गाया कर, गाएगा नहीं तो 'पॉपुलर' कैसे होगा!' तो उस वक़्त मैं समझता नहीं था उनकी बात. बाद में 'when i started singing ghazal on the stage', क्यूंकि फिल्मी गानो का मेरा 'स्टेज' पे इतना लंबा चौड़ा 'प्रोग्राम' नहीं हो सकता था, इसलिए मैं जो ग़ज़लें गाता था या 'कंपोज़' करता था, या जो भी 'रेकॉर्ड' हुए थे, 'i statred singing those ghazals on the stage and believe me I felt for it'. मुझे इतना अच्छा लगा कि 'इन्स्टेंट' जो एक 'रेकग्निशन' मिलती है 'ऑडियेन्स' से, और इतने दिनों से जो लोग कहते थे कि 'भूपेंद्र को 'स्टेज' पे ले आइए', मिताली से कहते थे, मेरे दोस्तों से कहते थे, तो 83-84-85 में मेरा जो झुकाव था वो फिल्मों से, गीतों से निकलकर ग़ज़लों में और 'स्टेज' की तरफ चला गया, और काफ़ी 'रेकॉर्ड्स' बनाए मैने, जो काफ़ी बिकते हैं, लोग याद करते हैं अभी भी.

रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, गायन की दुनिया में आपकी एक अलग पहचान है,इसके पीछे कौन सी प्रेरणा है?

भूपेंद्र : प्रेरणा तो शायद कुदरत ही है, मैं तो यह मानता हूँ कि भले मैने कम गाने गाए हैं 'फिल्म इंडस्ट्री' में, लेकिन जितने भी गाए हैं वो लोगों को बहुत पसंद हैं और बहुत 'पॉपुलर' हैं, और आज भी जब मैं और मिताली ग़ज़लों के 'प्रोग्राम' में जाते हैं, तो 'believe me' कि आज भी उन गानो की दो दो बार फरमाशें आती हैं. 'रीज़न' शायद यह हो सकता है की मेरी आवाज़ में शायद मेरा अपनापन है, मैने आवाज़ में किसी की 'कॉपी' नहीं की, मेरा अपना 'स्टाइल' है, मुझे कुदरत ने जो आवाज़ बख्शी है, जो 'रिवॉर्ड' मुझे दिया है, मैं उसी को आगे इस्तेमाल कर रहा हूँ, मैं इसमें कोई बनावट नहीं किया. मैं किसी और की आवाज़ को नहीं अपनाया, मेरी अपनी ही 'स्टाइल' है, मेरा अपना ही आवाज़ है, शायद इसलिए मैं थोड़ा सा अलग लगता हूँ.

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एक अकेला इस शहर में (घरौंदा)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, कुछ साल पहले बाज़ार में जैसे ग़ज़लों का एक 'बूम' सा आ गया था, अचानक बहुत सारे लोग बहुत सारी चीज़ें गा रहे थे और ग़ज़लें ही ग़ज़लें चारों तरफ से सुनाई देती थी. ग़ज़ल आजकल खामोश क्यूँ है?

भूपेंद्र : हमारे मुल्क में बहुत से 'चेंजस' आ रहे हैं, और वो 'चेंजस' हमारी जो 'कल्चर', जो सभ्यता है, उससे थोड़े से हटके हैं. तो 'रेकॉर्डिंग कंपनीज़' शायद यह सोचते हैं कि गजल्स के 'रेकॉर्ड्स' शायद नहीं बिके, और इसलिए वो ज़्यादा 'प्रमोट' करते हैं यह 'पोप म्यूज़िक अल्बम्स', और यही 'रीज़न' है कि फिल्मी ग़ज़लें या ऐसी फिल्में जिनमें कुछ 'ऑथेंटिक' ग़ज़लें हो सकते हैं वो आपको ज़्यादा नज़र नहीं आ रही है. यही कारण 'फिल्ममेकर्स' की तरफ से भी है, उनकी भी यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए थी की हमारी 'कल्चर' को ज़िंदा रखें. मैं यह सोचता हूँ की 'फिल्म डाइरेक्टर्स', 'एक्टर्स', 'म्यूज़िक डाइरेक्टर्स', 'आर्टिस्ट्स' लोग, इनके उपर भी एक ज़िम्मेदारी होती है, एक 'मोरल ऑब्लिगेशन' इनके उपर होती है, एक 'मोरल' ज़िम्मेदारी होती है, क्यूंकि अगर भगवान ने इनको 'आर्ट' दिया है तो इसको अच्छे 'साइड' में इस्तेमाल करें,उसको 'मिसयूज़' ना करे, 'आर्ट' के नाम पे कुछ ग़लत बात ना करे, जो कि लोगों को बहकाये, जो कि लोगों को ग़लत रास्ते पे डाले, जो कि आज लोग थोड़ा सा नाम और पैसा कमाने के लिए थोडी सी 'कॉंट्रोवर्सी क्रियेट' कर ली, और नाम कमा लिया, पैसे कमा लिए, किताब लिख डाली, तो यह बड़े सस्ते ढंग हैं अपने आप को 'पॉपुलर' करने के, तो अपने ही 'कल्चर' से हम बहुत दूर जा रहे हैं, जिसका मुझे सख्त अफ़सोस है और मैं उम्मीद करता हूँ कि बहुत जल्द लोगों को कुछ समझ आए कि अपनी 'कल्चर' को ज़िंदा रखने की कोशिश की जाए, यह उनके हाथ में यह ज़िम्मा है, बहुत बड़े बड़े 'फिल्म प्रोड्यूसर्स', बहुत बड़े बड़े 'म्यूज़िक डाइरेक्टर्स', 'फिल्म डाइरेक्टर्स', यह उनके हाथ में है के वो हिन्दुस्तान के 'कल्चर' को इससे ज़्यादा ना गिराएँ, और बच्चों को कुछ अच्छी बातें सीखाएँ, क्यूंकि यही बच्चे बड़े होकर क्या करेंगे? जो आज देख रहे हैं यह तो नहीं करेंगे, इससे सौ गुना ज़्यादा ही होगा ना! तो यह 'रीज़न' है कि फिल्मों में ग़ज़लें आजकल कम सुनाई डे रहे हैं, लेकिन सुननेवाले हैं, हम लोग 'प्रोग्राम्स' में जाते हैं तो सुननेवाले वो ही हैं

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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता (आहिस्ता आहिस्ता)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, हर चीज़ का एक दौर आता है, समय गतिशील है,आता है और निकल जाता है. हम उम्मीद करते हैं की संगीत का जो सुनहरा दौर जो देखा है लोगों ने, उम्मीद करते हैं कि वो फिर आये और आनेवाली पीढ़ी उस दौर को दोहराए.

भूपेंद्र : मैं आप के साथ प्रार्थना करूँगा कि जो आप सोच रही हैं काश ऐसा हो, काश कुछ लोगों को इतनी समझ आए कि इस बात पर गौर करे कि हमारी आनेवाली पीढियों को हिन्दुस्तानी ही रहने दे,क्यूंकि जो हम देंगे वोही 'कमिंग जेनरेशन' उसको 'ग्रास्प' करेगी. उनको कुछ अच्छी चीज़ देंगे तो वो कुछ अच्छी चीज़ सीखेंगे,और कुछ खराब चीज़ देंगे तो वो खराब ही सीखेंगे.

रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, आइए यहाँ से एक बार फिर मुड जाते हैं कविताओं और शायरी की तरफ. कविता लिखने का या शायरी पढने का एक तरीका होता है, एक नियम होता है, यानी कविता लिखने या शायरी लिखने में 'मीटर' का ध्यान रखा जाता है. और आप ने कई गीत ऐसे गाए हैं जिनमें 'मीटर' का ध्यान नहीं रहा,यानी ऐसे 'एक्सपेरिमेंट' कह सकते हैं जैसे फिल्म मौसम का एक गीत है, ऐसे 'एक्सपेरिमेंट' को आप क्या कहेंगे?

भूपेंद्र : उसको 'ब्लैक वर्स' कहते हैं, 'ब्लैक वर्स' यानी जिसका 'मीटर' नहीं होता है, जैसे आप मुझसे बात कर रही हैं, जैसे हम आपस में बात करते हैं, 'इट्स कॉल्ड ब्लॅक वर्स', 'आक्च्युयली ब्लैक वर्स' गयी नहीं जाती, उसको गाना मुश्किल होता है, उसको 'मीटर' पे ले जाना मुश्किल होता है, लेकिन फिर भी मैं आप से कहना चाहता हूँ कि मैने इसमें 'एक्सपेरिमेंट' किया था, मैने एक 'रेकॉर्ड' बनाया था, वो जो शायर था उसका नाम था, और उसमें जीतने भी 6
के 6 ग़ज़लें थी वो 'ब्लॅक वर्स' थी. तो मैं इस 'एक्सपेरिमेंट' को बहुत 'चॅलेंज' से लेता हूँ. यह काम ज़रा, 'you got to do something different, you know'. मौसम का जो गाना है, 'बिगिनिंग' का जो शेर है की "दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन", उसके बाद गुलज़ार साहब ने कितनी ही शायरी 'ब्लॅक वर्स टाइप' की लिखी
है, 'and i enjoy singing it always'.

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दिल ढूंढता है फ़िर वही फुर्सत के रात दिन (फ़िल्म-मौसम)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, हर वो गीत या हर वो ग़ज़ल जो आप की आवाज़ से सज़ा है, आप के बच्चे के समान है, यह पूछना तो गुस्ताखी होगी कि आप को अपना कौन सा बच्चा सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है.

भूपेंद्र : यह बात तो सही है कि जो भी 'कॉंपोज़िशन' करता हूँ, वो अपने बच्चे की तरह ही होती है, लेकिन फिर लोग जो हैं आगे वो बच्चों को अलग अलग कर देते हैं, किसी को कुछ पसंद आता है,किसी को कुछ पसंद आता है, तो मैं जितनी भी 'कॉंपोज़िशन' करता हूँ, जो मैं और मिताली बनाते हैं, उनमें कुछ ना कुछ सबके लिए रखते हैं, जो कि महफ़िल में, अभी संजीदा ग़ज़लें तो लोग नहीं सुनते, हालाँकि संजीदा ग़ज़लें गाना और संजीदा 'कॉंपोज़िशन' गाना मेरा 'सब्जेक्ट' है 'you know i love to sing it', लेकिन फिर कुछ 'रोमॅंटिक' ग़ज़लें, कुछ छेड-छाड़ के गीत, या कुछ शराब के गीत यह सब कुछ गाने पड़ते हैं, सो आप मुझे पूछे तो मैं जितनी भी 'कॉमपोज़िशन्स' करता हूँ, 'i love them i like them'.

रेणु बंसल : ज़िंदगी में ऐसी कोई ख्वाहिश जो अभी तक पूरी ना हुई हो?

भूपेंद्र : बस और अच्छा गा सकूँ, और लोगों की खिदमत कर सकूँ, और अच्छा गाता रहूँ!

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बीती न बितायी रैना (फ़िल्म-परिचय)
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प्रस्तुति - सुजोय चट्टर्जी

दो गीत जो हमें उपलब्ध नही हो पायें "रुत जवां जवां" फ़िल्म आखिरी ख़त का और "जिंदगी है कि बदलता मौसम" फ़िल्म एक नया रिश्ता का जिनके स्थान पर हमने आपको क्रमशा "हुज़ूर इस कदर" और "बीती न बिताई रैना" सुनवाये. मूल गीत यदि किसी श्रोता के पास उपलब्ध हों तो हमें भेजें. हमें इंतज़ार रहेगा.


Wednesday, November 5, 2008

एक मुलाकात कवयित्री, गायिका और चित्रकार सुनीता यादव से

हिंद युग्म ने जिस उद्देश्य से बाल-उद्यान मंच की शुरूआत की थी, वो था बच्चों को सीधे तौर पर इस हिन्दी इंटरनेटिया आयाम से जोड़ने की। आज हम अगर इस उद्देश्य में काफी हद तक सफल हो पाये हैं तो उसका एक बड़ा श्रेय जाता है हमारे सबसे सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ताओं में से एक सुनीता यादव को। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे द्वारा आदर्श शिक्षक पुरस्कार (२००४) और जॉर्ज फेर्नादिज़ पुरस्कार (२००६) से सम्मानित सुनीता ने और भी बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की है जैसे केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा आयोजित हिन्दी नव लेखक शिविरों में कविता पाठ, आकाशवाणी औरंगाबाद से भी कविताओं का प्रसारण, परिचर्चायों में भागीदारी, गायन में अनेक पुरस्कारों से पुरस्कृत, २००५ में कत्थक नृत्यांगना कु.पार्वती दत्ता द्वारा आयोजित विश्व नृत्य दिवस कार्यक्रम का संचालन आदि। अभी पिछले महीने की आकाशवाणी औरंगाबाद के हिन्दी कार्यक्रम में सुनीता यादव का काव्य-पाठ प्रसारित हुआ, जिसे सुनीता ने बहुत ही अलग ढंग से पेश किया। हमें इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग प्राप्त हुई है, आपको भी सुनवाते हैं-



उर्जा से भरपूर सुनीता यादव हैं - हमारी सप्ताह की फीचर्ड आर्टिस्ट, जिनसे हमने की एक खास मुलाकात। पेश है उसी बातचीत के कुछ अंश -


हिंद युग्म - लेखन, गायन, संगीत कला, चित्र कला, तैराकी, आपके तो इतने सारे रचनात्मक रूप हैं, कैसे समय निकाल पाती है सबके लिए ?

सुनीता यादव - जीवन के सभी क्षेत्रों में विचारों, भावनाओं तथा कर्मों की रचना से जुडी आदतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। छोटे-बड़े सभी कार्य एकाग्रता तथा व्यवस्थित रूप से किए जाने पर ही मनुष्य में निपुणता और सहज भाव से सब कुछ करने की क्षमता आती है। जिस तरह एक साइकिल चलानेवाला साइकिल चलाते-चलाते मित्रों से बातें कर सकता है, अपने चारों तरफ़ की सुरम्य दृश्यावली का आनंद उठा सकता है और बिना भय, उलझन या चिंता के अन्य वाहनों तथा पैदल चलनेवालों को बचाते हुए निकल जाता है :-) रुकने की जरूरत हो तो स्वत: ही ब्रेक लग जाते हैं ..

हिंद युग्म- ओडिसा, हैदराबाद,असम और अब औरंगाबाद इन सब मुक्तलिफ़ भाषा व संस्कारों वाले क्षेत्रों में रहने का अनुभव कैसा रहा और इस यायावरी ने आपकी रचनात्मकता को कितना समृद्ध किया ?

सुनीता यादव - ये मेरा सौभाग्य है कि भारत के विभिन्न राज्यों में रहने का आनंद मिला। इन प्रदेशों की भाषा, सामाजिक जीवन तथा संस्कृति से परिचित होने का सुअवसर मिला। मुसाफिरी व यायावरी ने मुझे बहुभाषी बना दिया। रही बात रचनात्मकता की मैं बहुत ही साधारण हूँ। जी हाँ मेरी उपलब्धियां सामान्य हैं, ये बड़ी बात है कि हिंद युग्म ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

हिंद युग्म - एक अध्यापिका होने का कितना फायदा मिलता है ?

सुनीता यादव - बहुत फायदा होता है ...मेरी बुद्धि बहुत सामान्य है. मुझे तो विद्यार्थियों से ही बहुत सारी बातें सीखने को मिलती है :-) मेरी इच्छा है कि जिस प्रकार पदार्थों को ऊर्जा में बदलने के लिए विशेष विधिओं की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मैं उनमें आत्म विश्वास, साहस व बौद्धिक जिज्ञासा भर दूँ ...ताकि वे जीवन में किसी भी क्षण में अपने आप को छोटा न समझें।

बाल-उद्यान के लिए कुछ आयोजन
  1. ऐ शहीदे मुल्को-बाल-कवि सम्मेलन

  2. स्मृति-लेखन तथा चित्रकला प्रदर्शनी

  3. कोचिंग संस्थान में स्मृति प्रतियोगिता

  4. अनाथालय में चित्रकला प्रतियोगिता


हिंद युग्म -हिंद युग्म परिवार में आपके लिए मशहूर है कि आप एक multi dimensional artist हैं, जो कला की हर विधा में निपुण हैं, कैसा रहा युग्म में अब तक का आपका सफर ?

सुनीता यादव - बहुत ही बढिया सफर रहा है। शुरू से विद्यालयीन स्तर पर इन गतिविधिओं से जुडी तो थी पर हिंद युग्म से जुड़ने के बाद यह समझ में आया कि अपने को उन्नत करनेवाले गुणों का विकास सम्भव है :-) प्रथम प्रयास की सफलता ही बाद के प्रयासों के लिए टॉनिक का कार्य करती है, है न ? चाहे जो भी हो हिंद-युग्म से जुड़ने के बाद उसकी रचनात्मक और कला क्षेत्र की सीमा विस्तृत हो जाती है। 'पहला सुर' महज एक प्रयास ही नहीं सारे भारत के संगीत प्रेमियों के लिए एक दिग्दर्शन भी है।

हिंद युग्म - इतना सब कुछ करने के बाद भी आप एक पत्नी हैं, माँ हैं. परिवार का सहयोग किस हद तक मिलता है, क्या कभी आपकी व्यस्तता को लेकर आपके पति या बिटिया ने असहजता जताई है ?

तेरे कितने रूप!
सुनीता यादव - पति और बेटी की तो बात बाद में आती है ...मैं पहले अपनी मम्मी जी की बात कह दूँ ? कोई अपनी बहू का साथ इतना नहीं देती होगी जितनी वे देती हैं। स्कूल की शिक्षिकाएँ हों, राष्ट्रभाषा के सदस्य हों या मेरे मित्र हों सभी के साथ उनका व्यवहार बहुत ही आत्मीय है। मेरे पति के बारे में क्या कहूँ सहृदय को धन्यवाद की आवश्यकता या प्रशंसा के शब्दों का प्रयोजन नहीं होता .. अंधेरे में फूलों का सुगंध भी प्रकाश का कार्य कर सकती है वे तो मुझे...शिला पर स्थिर बैठ कर जलधारा के वेग का सामना करते हुए बहते हुओं को बचाने की प्रेरणा देते हैं ... और मेरी बिटिया ने हिंद-युग्म के सारे गतिविधियों में मेरा साथ दिया...हम दोनों ही थे जब गरमी की छुट्टियों में भिन्न-भिन्न संस्थाओं में जाकर २५० विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगिताओं का आयोजन किए थे. मुझे इस बात का गर्व भी है कि वह self-made है...बाल दिवस के अवसर पर आप उसकी प्रतिभा से परिचित होंगे .

हिंद युग्म - आप युग्म पर बहुतों के लिए प्रेरणा हैं, आपकी प्रेरणा कौन है ?

सुनीता यादव - मेरे लिए मेरे प्रेरणा स्रोत रहे मेरे माता-पिता. महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा के मेरे गुरुजन। वे सारे प्रिय जन जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने में दिशा प्रदान की। पिताजी की कर्मठता मुझमें रच-बस जाए तो अपने-आप को धन्य समझूंगी। अपने जीवन में सबसे महीयसी महिला मैं श्रीमती अनीता सिद्धये को मानती हूँ जिनकी प्रेरणा ही मेरे एक मात्र संबल हैं। आतंरिक गुणों का विकास कैसे किया जाय ये कोई उनसे सीखे.

हिंद युग्म - बच्चों के लिए बाल-उद्यान के माध्यम से आपका योगदान अमूल्य रहा है, आने वाले बाल-दिवस के लिए क्या योजनायें हैं?

सुनीता यादव - बाल- दिवस आने तो दीजिए :-)

हिंद युग्म - बहुत से पुरस्कार और सम्मान आपने पाये....पर वो कौन सा सम्मान है जो सुनीता यादव को सबसे अधिक प्रिय है, या जिसे पाने की तमन्ना है ?

सुनीता यादव - महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा ने जिन पुरस्कारों से सम्मानित किया उसके लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ. सभी के कल्याणार्थ साधारण-सा कार्य भी कर सकूँ यही मेरा लक्ष्य है ..बाकी.. सेवा, प्रसिद्धि या प्रशंसा नहीं चाहती .

सुनीता जी आप इसी उर्जा और लगन से काम करती रहें और जीवन के हर मुकाम पर सफलता आपके कदम चूमें, हम सब की यही कामना है.


सुनीता यादव ने हिन्द-युग्म के पहले इंटरनेटीय एल्बम 'पहला सुर' के एक गीत 'तू है दिल के पास' को स्वरबद्ध भी किया था (साथ में गीत के बोल भी सुनीता ही ने लिखे थे और गाया भी इन्होंने ही था)। साथ-साथ यह गीत दुबारा सुन लें-

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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