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Sunday, April 10, 2011

कहाँ गया चितचोर....जब संगीत के खासे जानकार राज कपूर ने किया खुद अपने लिए पार्श्वगायन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 631/2010/331

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को हमारा नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में। पिछली शृंखला केन्द्रित थी हिंदी सिनेमा के प्रथम सिंगिंग् सुपरस्टार के.एल. सहगल साहब पर। सिंगिंग् स्टार्स की बात करें तो सहगल साहब के अलावा पंकज मल्लिक, के. सी. डे, कानन देवी, शांता आप्टे, नूरजहाँ, सुरैया जैसे नाम झट से ज़ुबान पर आ जाते हैं। प्लेबैक सिंगर्स के आगमन से धीरे धीरे सिंगिंग् स्टार्स का दौर समाप्त हो चला और एक से एक लाजवाब पार्श्वगायकों नें क़दम जमाया जिन्होंने फ़िल्म संगीत को नई बुलंदियों तक पहुँचाया। और स्टार्स केवल अभिनय तक ही सीमित रह गये। इस तरह से अभिनय और गायन, दोनों जगत को श्रेष्ठ फ़नकार मिले जिन्हें अपनी अपनी विधा में महारथ हासिल थी। वैसे समय समय पर हमारे फ़िल्म निर्माता-निर्देशक और संगीतकारों नें अभिनेताओं से गानें भी गवाये हैं, जो उनकी आवाज़ में बड़े ही निराले और अनोखे बन पड़े हैं। आइए आज से शुरु करें कुछ ऐसे ही अभिनेताओं द्वारा गाये फ़िल्मी गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'सितारों की सरगम'। शुरुआत करते हैं 'शोमैन ऒफ़ दि मिलेनियम' राज कपूर साहब से। वैसे तो हमनें राज साहब पर ७ अंकों की लघु शृंखला बहुत पहले ही प्रस्तुत की है, लेकिन उसमें राज साहब का गाया कोई गीत शामिल नहीं हुआ। आइए आज राज साहब की आवाज़ का भी आनंद लिया जाए। यह है १९४७ की फ़िल्म 'दिल की रानी' का गीत "ओ दुनिया के रहने वालों, बोलो कहाँ गया चितचोर"। गीतकार यशोदानंदन जोशी का लिखा यह गीत है, और इस फ़िल्म के संगीतकार थे सचिन देव बर्मन।

सन् १९४७ में राज कपूर ने बतौर नायक फ़िल्म जगत में क़दम रखा था किदार शर्मा की फ़िल्म 'नील कमल' में, जिसमें उनकी नायिका थीं मधुबाला। वैसे राज साहब नें फ़िल्मों में अपना करीयर एक चौथे ऐसिस्टैण्ट के रूप में शुरु किया था और पहली बार पर्दे पर नज़र आये थे १९३५ की फ़िल्म 'इनकिलाब' में। और राज कपूर - मधुबाला की जोड़ी इसी वर्ष, यानी १९४७ में दो और फ़िल्मों में नज़र आई, ये फ़िल्में थीं 'चित्तौड़ विजय' और 'दिल की रानी'। दोनों ही फ़िल्में मोहन सिन्हा निर्देशित फ़िल्में थीं और दोनों में ही संगीत बर्मन दादा का था। 'दिल की रानी' के प्रस्तुत गीत को सुनकर कोई भी अनुमान लगा सकता है राज कपूर के संगीत समझ की। शुरुआती दिनों में वो मुकेश के साथ संगीत सीखा करते थे, यानी कि दोनों गुरुभाई हुआ करते थे। इस संगीत शिक्षा से न केवल वो एक अच्छा गायक बनें, बल्कि संगीत निर्देशन की भी उनकी अच्छी समझ हो गई थी। और यही कारण था कि उनके सभी फ़िल्मों का संगीत सफल होता था। फ़िल्म चाहे चले न चले, उनका संगीत ज़रूर चलता था। गीतों की सिटिंग्स में वो संगीतकार और गायक के साथ मौजूद रहते थे और अपने सुझाव भी दिया करते थे। कहा जाता है कि फ़िल्म 'बॊबी' के गीत "अखियों को रहने दे अखियों के आसपास" की धुन उन्होंने ही सुझाई थी। अच्छा अब वापस आते हैं 'दिल की रानी' पर और आपको एक दिलचस्प तथ्य देना चाहेंगे कि जहाँ एक तरफ़ सचिन दा ने राज कपूर से यह गीत गवाया, इसी फ़िल्म में उन्होंने श्याम सुंदर से भी एक एकल गीत गवाया था जिसके बोल थे "आएँगे मेरे मन के बसैया"। तो आइए राज कपूर की संगीत प्रतिभा को सलाम करते हुए सुनें उनका गाया फ़िल्म 'दिल की रानी' का यह गीत। गीत को सुनते हुए आपको पहले दौर के गायकों की ज़रूर याद आ जायेगी। फ़र्क बस इतना है कि ऒर्केस्ट्रेशन कुछ उन्नत सुनाई देती है। लीजिए सुनिए...



क्या आप जानते हैं...
कि राज कपूर कई साज़ बजा लेते थे जिनमें शामिल थे हारमोनियम, ऐकॊर्डियोन, पियानो, तबला, बुलबुल-तरंग आदि।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक और बड़े फनकार का है पार्श्वगायन.

सवाल १ - किस अभिनेता ने पार्श्वगायन किया है इस युगल गीत में - १ अंक
सवाल २ - किस निर्देशक ने अपनी फ़िल्मी पारी की शुरुआत की इस फिल्म से - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अनजाना जी ने शानदार शुरुआत की है ३ अंकों से, अमित जी भी बस पीछे ही हैं, इस बार तो लगता है शरद जी मैदान में उतर पड़े हैं, इंदु जी पसंद अपनी अपनी है क्या कहें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, December 16, 2008

तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा...

ग्रेट शो मैन राज कपूर की जयंती पर विशेष


१४ दिसम्बर को हमने गीतकार शैलेन्द्र को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था. गौरतलब ये है कि फ़िल्म जगत में उनके "मेंटर" कहे जाने वाले राज कपूर साहब की जयंती भी इसी दिन पड़ती है. पृथ्वी राज कपूर के एक्टर निर्माता और निर्देशक बेटे रणबीर राज कपूर को फ़िल्म जगत में "ग्रेट शो मैन" के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दी फिल्मों के लिए उनका योगदान अमूल्य है. १९४८ में बतौर अदाकार शुरुआत करने वाले राज कपूर ने मात्र २४ साल की उम्र में मशहूर आर के स्टूडियो की स्थापना की और पहली फ़िल्म बनाई "आग" जिसमें अभिनय भी किया. फ़िल्म की नायिका थी अदाकारा नर्गिस. हालाँकि ये फ़िल्म असफल रही पर नायक के तौर पर उनके काम की तारीफ हुई. नर्गिस के साथ उनकी जोड़ी को प्रसिद्दि मिली १९४९ में आई महबूब खान की फ़िल्म "अंदाज़" से. निर्माता निर्देशक और अदाकार की तिहरी भूमिका में फ़िल्म "बरसात" को मिली जबरदस्त कमियाबी के बाद राज कपूर ने फ़िल्म जगत को एक से बढ़कर एक फिल्में दी और कमियाबी की अनोखी मिसालें कायम की. आईये आज उन्हें याद करें उनकी चंद फिल्मों का जिक्र कर.

शुरुआत करते हैं राज साहब की अमर कृति "आवारा" से. ये वो फ़िल्म है जिसने राज कपूर को देश विदेश में एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित किया. भारत में बेहद कामियाब हुई इस लाजवाब फ़िल्म को एशिया और रूस में भी जबरदस्त सराहना मिली. राज साहब की अपनी एक टीम हुआ करती थी जिन पर वो भरोसा करते थे. आर के स्टूडियो में बनी इस पहली फ़िल्म में भी सभी उनके चहेते साथी थे. अभिनेत्री नर्गिस थी जोडीदार तो संगीत का जिम्मा था शंकर जयकिशन शैलेन्द्र और हसरत की टीम पर, आवाजें थी मुकेश (राज कपूर) और लता (नर्गिस) की. इस फ़िल्म में ही पहली बार राज कपूर चैपलिन के भेष में दिखाई दिए थे. हालाँकि ये एक छोटा सा तोहफा था राज का अपने प्रिये अभिनेता के लिए (श्री ४२० में ये अधिक मुखर था),पर सिने प्रेमी इस लघु भूमिका को नही भूले. राज कपूर के प्रशंसकों को ये जानकर खुशी होगी ये परिधान आज भी आर के स्टूडियो ने जतन से सहेज कर रखा हुआ है. राज कपूर और नर्गिस कभी न बिछड़ने वाले प्रेमी युगल के रूप में परदे पर आए और छा गए. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना था. शीर्षक गीत 'आवारा हूँ' और 'दम भर जो उधर मुंह फेरे ..." के आलावा एक ९ मिनट का स्वप्न दृश्य गीत अपने बहतरीन सेट सज्जा के लिए आज भी जाना जाता है. घुमावदार सीढियों और उड़ते बादलों के बीच (स्वर्ग) में लय पर थिरकरी अप्सराएँ और सब से उपर की सीढ़ी पर खड़ी नायिका गा रही है "तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा ..." नायक काली टी शर्ट और पैंट पहने कहीं नर्क जैसी जगह में तड़प रहा है "ये नही ये नहीं जिन्दगी...." चारों तरफ़ आग है नाचते अस्थि पिंजर और शैतानी मुखौटों से मुक्त हो कर अंत में वह बादलों से निकलता है और ध्वनि होती है "ओम् नम शिवाय..." की. ब्रह्म विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है सीढियों की शुरुआत में नायिका नीचे उतरती है और नायक को ऊपर स्वर्ग की तरफ़ ले चलती है गाती हुई "घर आया मेरा परदेसी...". घुमावदार सीढ़ियों से नायिका के पीछे चलता नायक अंत में नटराज की मूर्ति के आगे पहंचता है. जहाँ से एक नई सड़क चलती है, यहीं खलनायक एक चाकू लिए प्रकट होता है. नायक नायिका का नाम पुकारता है पर जब तक नायिका उस तक पहुंचें नायक एक बार फ़िर गर्त में गिर कर ख़ाक हो जाता है. ये स्वप्न दृश्य एक "विसुअल ट्रीट" है अवश्य देखें -



१९६४ में आई "संगम" राज की पहली रंगीन फ़िल्म थी और पहली ऐसी फ़िल्म जो उन्होंने विदेश में शूट की. दरअसल इसी फ़िल्म ने विदेश में शूट करने का ट्रेंड शुरू किया था. बाद में तो लगभग हर फ़िल्म में एक गीत स्विट्जरलैंड में शूट करना लाजमी हो गया चाहे उसका कहानी से कुछ लेना देना हो या नही. साधारण सी प्रेम त्रिकोण कहानी में भी उनका निर्देशन फ़िल्म की जान था. हालाँकि फ़िल्म कुछ जरुरत से ज्यादी लम्बी थी पर राज साहब हमेशा ही बड़े कैनवास के फिल्मकार थे. राज की हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी धूम मचायी. "बोल राधा बोल", "बुड्डा मिल गया", "ये मेरा प्रेम पत्र" जैसे लाजवाब गीतों के अलावा एक गीत और था "दोस्त दोस्त न रहा...". जिस खूबसूरती से राज ने इस गीत को फिल्माया फ़िल्म का एक एक किरदार और उसके मन के भावों जिस तरीके परदे पर उभारा गया इस गीत में, वो हिन्दी फ़िल्म क्राफ्ट में राज की दक्षता का जीवंत उदाहरण है.

कुछ साल और आगे बढ़ते हैं. शानदार अभिनय से सजी "तीसरी कसम" और उनकी बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की नकामियाबी ने राज को बहुत बड़ा सदमा दिया. उन्होंने फैसला किया की अब वो अभिनय नही करेंगे. चुनांचे उन्होंने परदे पर उतरा अपने मंझले बेटे ऋषि कपूर को. ऋषि इससे पहले "मेरा नाम जोकर" राज के बचपन की भूमिका निभा चुके थे. साथ ही एक नई नायिका दी उन्होंने फ़िल्म जगत को डिम्पल कपाडिया के रूप में. दोनों ही कलाकार अपनी "टीनएज" अवस्था में थे जब ये फ़िल्म शुरू की. "बॉबी" को हम राज की पहली शो मैन सरीखी फ़िल्म मान सकते हैं जहाँ उन्होंने फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाए और फ़िल्म को एक "लार्जर देन लाइफ" प्रस्तुति दी. के ऐ अब्बास की लिखी इस प्रेम कहानी में राज ने सब कुछ दिया दर्शकों को. सुखद अंत दिया कहानी को ताकि खतरा कम रहे असफलता का. सुपर हिट संगीत और नए परिधानों में सजा धजा एक प्रेमी युगल जिसने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया दीवारों को तोड़ कर प्रेम करने के लिए. ऋषि कपूर अगले २० सालों तक कमोबेश इसी रोमांटिक इमेज में जीये. फ़िल्म का एक दृश्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है. युवा नायक नायिका से मिलने उसके घर जाता है. पकौडे बना रही नायिका जब दरवाज़ा खोलती है तो अनजाने में हाथ में लगा आटा अपने बालों में लगा बैठती है. कहते हैं कि जब राज पहली बार नर्गिस के घर गए थे तब कुछ ऐसा ही हुआ था. नायक का नायिका से पूछना "मुझसे दोस्ती करोगी" एक ऐसा संवाद था जिसने आने वाली पीढी के फिल्मकारों को एक लड़का और लड़की की दोस्ती और प्रेम जैसे विषय पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया. सूरज बड़जात्या की "मैंने प्यार किया" और करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" जैसी फिल्में इसका उदाहरण है. राज साहब की ८४ वीं जयंती पर उन्हें आवाज़ का सलाम.

Monday, December 8, 2008

निर्माता-निर्देशकों के लिए सफलता की गैरंटी था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत


बात होती है सदी के नायक की, नायिका की, पर अगर हम बात करें बीती सदी के सबसे सफलतम संगीतकार की, तो बिना शक जो नाम जेहन में आता है वो है - संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का. १९६३ में फ़िल्म "पारसमणी" से शुरू हुआ संगीत सफर बिना रुके चला अगले चार दशकों तक. बदलते समय के साथ ख़ुद को बदलकर हर पीढी के मिजाज़ को ध्यान में रख ये संगीत के महारथी चलते रहे अनथक और लिखते रहे निरंतर कमियाबी की नयी इबारतें. पल पल रंग बदलती, हर नए शुक्रवार नए रूप में ढलती फ़िल्म इंडस्ट्री में इतने लंबे समय तक चोटी पर अपनी जगह बनाये रखने की ये मिसाल लगभग असंभव सी ही प्रतीत होती है. और किस संगीतकार की झोली में आपको मिलेंगी इतनी विविधता. शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत, लोक गीतों में ढले ठेठ भारतीय गीत, पाश्चात्य संगीत में बसे गीत, भजन, मुजरा, डिस्को -जैसा मूड वैसा संगीत, और वो भी सरल, सुमधुर, "कैची" और "क्लास".परफेक्शन ऐसा कि कोई ढूंढें भी तो कोई कमी न मिले. आम आदमी की जुबान पर तो उनके गीत यूँ चढ़ जाते थे जैसे बस उन्हीं के मन की धुन हो कोई. मेलोडी ही उनके गीतों की आत्मा रही. सहज धुन में सरल सी बात और संयोजन (जो अमूमन प्यारेलाल जी का होता था) सौ प्रतिशत बेजोड़.

३७ सालों तक उनका नाम रजत पटल पर इस शान से आता था जैसे उनका संगीत ही फ़िल्म का तुरुप का इक्का हो, कभी कभी तो फ़िल्म के निर्माता नायक नायिका से बढ़कर इस बात का प्रचार करते थे कि फ़िल्म में संगीत एल पी का है. वो एक ऐसा नाम थे जो सफलता की गैरंटी का काम करते थे. तभी तो हर नए पुराने निर्माता निर्देशकों की वो पहली पसंद हुआ करते थे. शायद ही कोई ऐसा बड़ा बैनर हो फ़िल्म जगत में जिनके साथ उनका रिश्ता न जुडा हो. राजश्री फ़िल्म, राज खोंसला, राज कपूर, सुभाष घई, जे ओम् प्रकाश, मनमोहन देसाई, मोहन कुमार, मनोज कुमार आदि केवल कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनके साथ एल पी का बेहद लंबा और बेहद कामियाब रिश्ता रहा है. अब ज़रा इस सूची में शामिल निर्देशकों की फिल्मों पर एक नज़र डालते हैं -

राज खोंसला ने एस डी, ओ पी नय्यर और रवि के साथ काम करने के बाद फ़िल्म "अनीता" में पहले बार एल पी को आजमाया. सामाजिक विषयों पर फ़िल्म बनाने वाले राज ने "मेरा गाँव मेरा देश", "मैं तुलसी तेरे आंगन की", "दो रास्ते" और "दोस्ताना" जैसी फिल्में बनायीं जिनके लिए एल पी तुम बिन जीवन, सोना ले जा रे, हाय शरमाऊं, ये रेशमी जुल्फें, बिंदिया चमकेगी, दिल्लगी ने दी हवा, जैसे सरल और मिटटी से जुड़े गीत दिए. राज खोंसला ने एक बार एक सभा में कहा था कि यदि आपके पास एल पी है तो आपको और कुछ नही चाहिए. सदी के सबसे बड़े शो मैन कहे जाने वाले राज कपूर ने शंकर जयकिशन के साथ बहुत लंबा सफर तय किया. पर एक समय ऐसा भी आया जब राज साहब की महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की असफलता के बाद पहली बार राज साहब अपनी नई फ़िल्म "बॉबी" को लेकर शंकित थे. फ़िल्म नई पीढी को टारगेट कर बनाई जानी थी तो संगीत में भी उस समय का "फील" मिलना चाहिए था. राज साहब ने चुनाव किया एल पी का, जो उनका सबसे बढ़िया निर्णय साबित हुआ. फ़िल्म का एक एक गीत श्रोताओं के दिलो जहेन पर छा गया. ज़रा गौर फरमायें फ़िल्म इन गीतों में बसे मुक्तलिफ़ रंगों की. एक ही फ़िल्म में बुल्ले शाह का सूफी अंदाज़ "मैं नई बोलना", मस्ती भरा शोख "हम तुम एक कमरे में बंद हो", युवाओं की बोलचाल वाला "मुझे कुछ कहना है", गोवा के संगीत का जायका "गे गे गे साहिबा", पहली मोहब्बत का पहला सरूर "मै शायर तो नही" और टूटे दिल की दर्द भरी सदा "अखियों को रहने दे". क्या नही दिया उस फ़िल्म में एल पी ने. राज साहब के साथ फ़िर आई "सत्यम शिवम् सुन्दरम" और "प्रेम रोग" दोनों ही बेहद अलग कैनवस की फ़िल्म थी और देखिये वहां भी बाज़ी मार गए एल पी हर बार की तरह.

फ़िल्म "दोस्ती" से शुरू हुआ राजश्री फिल्म्स के साथ उनका सफर ८ सालों तक चला. कुछ लोग मानते हैं कि इस बैनर के साथ एल पी हमेशा अपना "सर्वश्रेष्ट" काम दिया. जे ओम् प्रकाश की रोमांटिक फिल्मों के लिए उन्होंने ऐसा समां बांधा कि आज भी संगीत प्रेमी उन फिल्मों में लता रफी के गाये दोगानों के असर से मुक्त नही हो पाये. मनोज कुमार की देशभक्ति और भावनाओं से ओत प्रेत फिल्मों (शोर, रोटी कपड़ा और मकान, और क्रांति) के लिए एल पी ने एक प्यार का नग्मा, पानी रे पानी, महंगाई मार गई, जिन्दगी की न टूटे लड़ी जैसे आम आदमी के मन को छूने वाले गीत दिए. तो वहीँ सुभाष घई की फिल्में जो बहुत बड़े स्तर पर निर्मित होती थी और जहाँ संगीत में मेलोडी की गुंजाईश बहुत होती थी वहां भी एल पी अपना भरपूर जलवा दिखाया. "हीरो", "मेरी ज़ंग", और "खलनायक" में उनका फॉर्म जबरदस्त रहा तो वहीँ "क़र्ज़" में घई को आर डी के फ्लेवर का संगीत चाहिए था और उन्हें शक था कि क्या एल पी एक पॉप सिंगर के जीवन पर आधारित इस विषय में जहाँ संगीत का सबसे अहम् रोल था, न्याय कर पायेंगें या नही. पर एल पी सारे कयासों को एक तरफ़ कर "ओम् शान्ति ओम्", "पैसा ये पैसा", जैसे थिरकते गीत दिए तो रफी साहब के गाये "दर्दे दिल" के साथ पहली बार उन्होंने ग़ज़ल को पाश्चात्य फॉर्म में ढाल कर दुनिया के सामने रखा. "एक हसीना थी..." (ख़ास तौर पर वो गीटार का पीस)को क्या कोई संगीत प्रेमी कभी भूल सकता है. इस मूल गीत को आज भी सुनें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. (किशोर दा को भी सलाम).

फार्मूला फिल्मों के शिल्पी मनमोहन देसाई की नाटकीय फिल्मों में भी एल पी का संगीत पूरे शबाब पर दिखा. तो मोहन कुमार की फिल्में तो कह सकते हैं कि उनके संगीत के बल पर ही आज तक याद की जाती हैं. इसके अलावा भी एल पी ने महेश भट्ट, रामानंद सागर, यश चोपडा, बी आर चोपडा, फिरोज खान, जे पी दत्ता, जैसे निर्देशकों के साथ भी लाजावाब काम किया. दक्षिण के निर्देशकों की भी वही पहली पसंद रहे हमेशा. एल वी प्रसाद से लेकर टी रामाराओ तक जिस किसी ने भी उनका साथ थामा वो उन्ही के होके रह गए...ऐसा कौन सा जादू था एल पी के संगीत में, ये हम आपको बताएँगे इस शृंखला की अगली कड़ी में. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इन यादगार नग्मों की बाँहों में.




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