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Thursday, April 6, 2017

मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहाँ से आज की महफ़िल में सुनेंगे आदमी की पहचान कैसे हो



महफ़िल ए कहकशाँ 21




नूरजहाँ 



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है मुज्ज़फर वारसी की लिखी नज़्म  मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहाँ  की आवाज़ में| 








मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी







Thursday, February 14, 2013

गायिका नूरजहाँ के गाये अनमोल गीत


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 35
कारवाँ सिने-संगीत का

‘आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ...’ : नूरजहाँ  

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत हम ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य और हिन्दी फिल्मों के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। सुजॉय चटर्जी ने अपनी इस पुस्तक में भारतीय सिनेमा में आवाज़ के आगमन से लेकर देश की आज़ादी तक के फिल्म-संगीत की यात्रा को रेखांकित किया है। आज के अंक में हम विभाजन से पूर्व अपनी गायकी से पूरे भारत में धाक जमाने वाली गायिका और अभिनेत्री नूरजहाँ का ज़िक्र करेंगे।

हाँ एक तरफ़ ए.आर. कारदार और महबूब ख़ान देश-विभाजन के बाद यहीं रह गए, वहीं बहुत से ऐसे कलाकार भी थे जिन्हें पाक़िस्तान चले जाना पड़ा। इनमें एक थीं नूरजहाँ। भारत छोड़ पाक़िस्तान जा बसने की उनकी मजबूरी के बारे में उन्होंने विविध भारती में बताया था- जब वो बरसों बाद भारत आई थीं स्टेज शोज़ के लिए– “आप को ये सब तो मालूम है, ये सबों को मालूम है कि कैसी नफ़सा-नफ़सी थी जब मैं यहाँ से गई। मेरे मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम सय्यद शौक़त हुसैन रिज़वी है। उस वक़्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वक़्त निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती?”

पाक़िस्तान स्थानान्तरित हो जाने से पहले नूरजहाँ के अभिनय व गायन से सजी दो फ़िल्में 1947 में प्रदर्शित हुईं– ‘जुगनू’ और ‘मिर्ज़ा साहिबाँ’। ‘जुगनू’ शौकत हुसैन रिज़वी की फ़िल्म थी ‘शौकत आर्ट प्रोडक्शन्स’ के बैनर तले निर्मित, जिसमें नूरजहाँ के नायक बने दिलीप कुमार। संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी ने मोहम्मद रफ़ी और नूरजहाँ से एक ऐसा डुएट इस फ़िल्म में गवाया जो इस जोड़ी का सबसे ज़्यादा मशहूर डुएट सिद्ध हुआ। गीत था “यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा मोहब्बत में भी धोखा है, कभी सुख है कभी दुख है अभी क्या था अभी क्या है, यूँ ही दुनिया बदलती है इसी का नाम दुनिया है...”। इस गीत की अवधि करीब 5 मिनट और 45 सेकण्ड्स की थी जो उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी लम्बी थी। कहते हैं कि इस गीत को शौक़त हुसैन ने ख़ुद ही लिखा था, पर ‘हमराज़ गीत कोश’ के अनुसार फ़िल्म के गीत एम.जी. अदीब और असगर सरहदी ने लिखे। फिल्म ‘जुगनू’ की चर्चा हम जारी रखेंगे, इससे पहले हम आपको नूरजहाँ और मुहम्मद रफी की आवाज़ में इस फिल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय यह गीत सुनवाते हैं।

फिल्म जुगनू : ‘यहाँ बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है...’ : नूरजहाँ और मुहम्मद रफी 


पाक़िस्तान जाते-जाते इस फ़िल्म में नूरजहाँ गा गईं “तुम भी भुला दो, मैं भी भुला दूँ, प्यार पुराने गुज़रे ज़माने...”। नूरजहाँ का गाया एक और गीत था “उमंगें दिल की मचलीं, मुस्कुराई ज़िन्दगी अपनी...” और इसी गीत का सैड वर्ज़न था “हमें तो शामे ग़म काटनी है ज़िन्दगी अपनी...”। मोहम्मद रफ़ी ने इस फ़िल्म में एक छोटी सी भूमिका निभाई थी; कोरस के साथ गाया हुआ उनका एक हास्य गीत था “वो अपनी याद दिलाने को एक इश्क़ की दुनिया छोड़ गए, जल्दी में लिप्स-स्टिक भूल गए रुमाल पुराना छोड़ गए...”। किराना घराने के शास्त्रीय गायिकाओं में एक मशहूर नाम था रोशनआरा बेगम का। उन्होंने ‘जुगनू’ का एक गीत गाया था “देश की पुरक़ैफ़ रंगी से फ़िज़ाओं में कहीं, नाचती गाती महकती सी हवाओं में कहीं...”। कहते हैं कि शौक़त हुसैन ने इस गीत के लिए उन्हें एक बड़ी रकम दी थी। इस गीत के बाद रोशनआरा बेगम भी पाक़िस्तान चली गईं। शमशाद बेगम का गाया फ़िल्म में एक गीत था “लूट जवानी फिर नहीं आनी, बीत गई तो एक कहानी...”। इसके बावजूद फिल्म ‘जुगनू’ नूरजहाँ के गाये गीतों के लिए सदा याद रखा जाएगा। लीजिए सुनिए नूरजहाँ का फिल्म ‘जुगनू’ में गाया एकल गीत।

फिल्म जुगनू : ‘तुम भी भुला दो, मैं भी भुला दूँ, प्यार पुराने...’ : नूरजहाँ


‘मिर्ज़ा साहिबाँ’ ‘मधुकर पिक्चर्स’ के बैनर तले निर्मित के. अमरनाथ निर्देशित फ़िल्म थी। इसमें नूरजहाँ के नायक बने त्रिलोक कपूर। फ़िल्म में संगीत देने के लिए पण्डित अमरनाथ को लिया गया था पर उनकी असामयिक मृत्यु के बाद फ़िल्म का संगीत उन्हीं के भाई व संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम ने पूरा किया। 1942 से लेकर 1947 तक के पाँच वर्ष का पण्डित अमरनाथ का संगीत सफ़र इस फ़िल्म से समाप्त हुआ। अज़ीज़ कश्मीरी और क़मर जलालाबादी के लिखे गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था अज़ीज़ का लिखा और नूरजहाँ व जी.एम. दुर्रानी का गाया “हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाए, दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाए...”। इस जोड़ी का एक दर्दीला युगल गीत था “तुम आँखों से दूर हो, हुई नींद आँखों से दूर...”। आइए, यहाँ कुछ विराम लेकर नूरजहाँ और दुर्रानी के युगल स्वर में फिल्म का एक मशहूर गीत सुनते हैं।

फिल्म मिर्ज़ा साहिबाँ : ‘हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाए...’ : नूरजहाँ व जी.एम. दुर्रानी 


आगे नूरजहाँ के एकल स्वर में फ़िल्म के दो मशहूर गीत थे “आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ, जो दिल पे गुज़रती है वो आँखों से बताएँ...” और “क्या यही तेरा प्यार था, मुझको तो इन्तज़ार था”। फ़िल्म में ज़ोहराबाई, नूरजहाँ, शमशाद बेगम और साथियों ने दो गीत गाये, एक था मशहूर गीत “हाय रे, उड़-उड़ जाये, मोरा रेशमी दुपटवा” और दूसरा गीत था “रुत रंगीली आई, चाँदनी छाई, चाँद मेरे आजा”। ज़ोहराबाई की एकल आवाज़ में पंजाबी रिदम पर गीत था “सामने गली में मेरा घर है, पता मेरा भूल न जाना” जो चरित्र अभिनेत्री कुक्कू पर फ़िल्माया गया था। कुक्कू ने अपना अभिनय सफ़र 1946 में ‘अरब का सितारा’ और ‘सर्कस किंग’ जैसी फ़िल्मों से शुरु किया था, पर ‘मिर्ज़ा साहिबाँ’ के इस गीत में उनका नृत्य लोगों को इतना भाया कि वो मशहूर हो गईं और उसके बाद उन्होंने बहुत सारी फ़िल्मों में अभिनय व नृत्य किया। और अब इस आलेख को विराम देने से पहले, प्रस्तुत है फिल्म का वह एकल गीत, जिसे नूरजहाँ ने अपना स्वर दिया था।

फिल्म मिर्ज़ा साहिबाँ : ‘आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ...’ : नूरजहाँ



इसी गीत के साथ आज हम इस अंक को यहीं विराम देते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




Monday, December 20, 2010

हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये....और धीरे धीरे प्रेम में गुजारिशों का दौर शुरू हुआ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 552/2010/252

'एक मैं और एक तू' - फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों से चुने हुए युगल गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की शुरुआत कल हमने की थी 'अछूत कन्या' फ़िल्म के उस युगल गीत से जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला सुपरहिट युगल गीत रहा है। आज आइए इस शृंखला की दूसरी कड़ी में पाँव रखें ४० के दशक में। सन् १९४७ में देश के बंटवारे के बाद बहुत से कलाकार भारत से पाक़िस्तान चले गये, बहुत से कलाकार वहाँ से यहाँ आ गये, और बहुत से कलाकार अपने अपने जगहों पर कायम रहे। ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान यहीं रह जाने वालों में से थे। लेकिन नूरजहाँ जैसी गायिका अभिनेत्री को जाना पड़ा। लेकिन जाते जाते १९४७ में वो दो फ़िल्में हमें ऐसी दे गईं जिनकी यादें आज धुंधली ज़रूर हुई हैं, लेकिन आज भी इनका ज़िक्र छिड़ते ही हमें ऐसा करार मिलता है कि जैसे किसी बहुत ही प्यारे और दिलअज़ीज़ ने अपना हाथ हमारे सीने पर रख दिया हो! शायद आप समझ रहे होंगे कि आज हम आपको कौन सा गाना सुनवाने जा रहे हैं। जी हाँ, नूरजहाँ और जी. एम. दुर्रानी की युगल आवाज़ों में १९४७ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का "हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये, दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये"। एक फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का ज़िक्र तो हमने किया, दूसरी फ़िल्म थी 'जुगनु'। ये दोनों ही फ़िल्में बेहद मक़बूल हुईं थी। 'मधुकर पिक्चर्स' के बैनर तले निर्मित और के. अमरनाथ निर्देशित 'मिर्ज़ा साहिबाँ' फ़िल्म में नूरजहाँ के नायक बने थे त्रिलोक कपूर। संगीतकार पंडित अमरनाथ की यह अंतिम फ़िल्म थी। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद उन्हीं के संगीतकार भाइयों की जोड़ी हुस्नलाल और भगतराम ने इस फ़िल्म के गीतों को पूरा किया। अज़ीज़ कशमीरी और क़मर जलालाबादी ने इस फ़िल्म के गानें लिखे जो उस ज़माने में बेहद चर्चित हुए। ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत तो गली गली गूंजा करता था। इसी गायक-गायिका जोड़ी ने इस फ़िल्म में एक और युगल गीत भी गाया था, जिसके बोल थे "तुम आँखों से दूर हो, हुई नींद आँखों से दूर", हालाँकि यह एक ग़मज़दा डुएट था। नूरजहाँ के गाये एकल गीतों में शामिल थे "आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ, जो दिल पे गुज़रती है वह आँखों से बतायें" और "क्या यही तेरा प्यार था, मुझको तो इंतज़ार था"। ज़ोहराबाई ने अपनी पंजाबी अंदाज़ में "सामने गली में मेरा घर है, पता मेरा भूल ना जाना" गाया जो चरित्र अभिनेत्री कुक्कू पर फ़िल्माया गया था। नूरजहाँ, शम्शाद बेग़म और ज़ोहराबाई ने भी दो अनूठे गीत गाये थे, "हाये रे उड उड़ जाये मोरा रेशमी दुपट्टा" और "रुत रंगीली आई चांदनी छायी चांद मेरे आजा"।

दोस्तों, नूरजहाँ की बातें तो हमने बहुत की है पहले भी, हाल में भी, और आगे भी करेंगे, क्यों ना आज दुर्रानी साहब की बातें की जाए। हम क्या बातें करेंगे उनकी, लीजिए उन्हीं से सुनिए उनकी दास्तान जो उन्होंने कहे थे अमीन सायानी साहब के एक इंटरव्यु में। "उस वक़्त प्लेबैक सिस्टेम नहीं था। ऐक्टर को ख़ुद ही गाना पड़ता था। बात यह हुई कि जब मैंने अपने आप को फ़िल्म के पर्दे पर हीरो हीरोइन और लड़कियों के आगे पीछे दौड़ते भागते देखा तो मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। और दो एक फ़िल्मों में काम करने के बाद मैंने फ़िल्मों में काम करने से मना कर दिया, भई हम काम नहीं करेंगे। मतलब यह हुआ कि काम ठुकराने का मतलब भूखों मरना हुआ। अब अपने साथ भी यही मामला हुआ। ख़ैर, मरता क्या ना करता! घर वापस लौटकर जा नहीं सकते, क्योंकि घरवाले बहुत ही पुराने ख़यालात के थे, और फिर नाचाकी भी थी, वो सब इस तरह के काम करने वालों को कंजर कहा करते थे, यानी कि कंजर, 'अरे यार, फ़लाने आदमी का लड़का कंजर हो गया, फ़िल्म-लाइन में काम करता है'। ख़ैर साहब, हम ऐक्टर तो नहीं बन सके, पर गाना हमें बहुत भाया। और हम किसी भी सूरत हाथ पैर मारकर बम्बई रेडियो स्टेशन में ड्रामा आर्टिस्ट की हैसियत से नौकर हो गये"। फिर इसके बाद रेडियो से प्लेबैक सिंगर कैसे बने जी. एम. दुर्रानी साहब, यह कहानी हम फिर किसी रोज़ आपको बताएँगे, आइए फ़िल्हाल सुनते हैं दुर्रानी साहब के साथ नूरजहाँ का गाया फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का यह युगल गीत। आगामी २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि के अवसर पर यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की श्रद्धांजली भी है उनके नाम।



क्या आप जानते हैं...
कि जी. एम. दुर्रानी का पूरा नाम ग़ुलाम मुस्तफ़ा दुर्रानी था। १९३५ में ३० रुपय महीने पर सोहराब मोदी की कंपनी 'मिनर्वा' में उन्हें नौकरी मिल गई। उनका गाया हुआ पहला मशहूर गाना था "नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे" (नई कहानी, १९४३)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -संगीतकार हैं नाशाद.

सवाल १ - किस किस की आवाजें हैं गीत में - १ अंक
सवाल २ - अजीत और गीता बाली पर फिल्माए इस गीत के गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम जी, कुछ मुश्किल थी कल की पहेली, पर आपके क्या कहने.....शरद जी और अमित जी भी सही जवाब लाये, इंदु जी और दादी की हजारी सलामत

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, December 18, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२१), जब नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया पार्श्वगायिका शारदा ने

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज फिर एक बार बारी 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। और आज का ईमेल भी बहुत ही ख़ास है। दोस्तों, २३ दिसम्बर २००० को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर अपनी अनंत यात्रा पर निकल गईं और पीछे छोड़ गईं अपने गाये गीतों के अनमोल ख़ज़ाने को। आज पूरी दुनिया में नूरजहाँ जी के असंख्य चाहनेवाले हैं। और उनके इन तमाम चाहनेवालों में से एक उल्लेखनीय नाम पार्श्वगायिका शारदा का भी है। जी हाँ, वो ही शारदा जिन्होंने "तितली उड़ी", "दुनिया की सैर कर लो", "चले जाना ज़रा ठहरो", "वो परी कहाँ से लाऊँ", "जानेचमन शोला बदन", "जब भी ये दिल उदास होता है", "देखो मेरा दिल मचल गया" और ऐसे ही बहुत से कामयाब गीतों को गाकर ६० के दशक में फ़िल्म संगीत जगत पर छा गईं थीं। हमें जब उनकी किसी इंटरव्यु से पता चला कि उनकी मनपसंद गायिका नूरजहाँ रहीं हैं, हमने सोचा कि क्यों ना उनसे ईमेल के ज़रिए सम्पर्क स्थापित कर इस बारे में पूछा जाए। तो लीजिए आज 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में पढ़िए शारदा जी द्वारा नूरजहाँ जी के बारे में कही हुई बातें। २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि पर यह 'आवाज़' मंच की श्रद्धांजली है।

सुजॊय - शारदा जी, आशा है आप सकुशल हैं। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की बरसी है। हम 'हिंद-युग्म' के 'आवाज़' मंच की तरफ़ से उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने की कामना रखते हैं। हमें पता चला है कि नूरजहाँ जी आपकी मनपसंद गायिका रही हैं। इसलिए हम आपसे इस बारे में जानना चाहेंगे। आप हमें और हमारे पाठकों को बताएँ कि आपके दिल में उनके लिए किस तरह के विचार हैं, उनकी गायकी में क्या ख़ास बात आपको नज़र आती है जो उन्हें औरों से अलग करती है?

शारदा - नूरजहाँ जी को मैं एक बेहतरीन गायिका के रूप में याद करती हूँ। मैंने अपने जीवन में जो पहला हिंदी गीत सुना था, वह नूरजहाँ जी का ही गाया हुआ था और उस सुहाने याद को मैं अब तक महसूस करती हूँ और बार बार जीती हूँ। उसके बाद हर बार जब भी मैं उनके गाये हुए गीत सुनती हूँ, मैं यही पता लगाने की कोशिश करती हूँ कि बोल, संगीत और आवाज़ के अलावा वह कौन सी "एक्स्ट्रा" चीज़ वो गाने में डालती हैं कि जिससे उनका गाया हर गीत एक अद्‍भुत अनुभव बन कर रह जाता है, जो दिल को इतना छू जाता है। मेरी ओर से नूरजहाँ जी को भावभीनी श्रद्धांजली।

सुजॊय - उनके कौन से गानें आपको सब से ज़्यादा पसंद हैं?

शारदा - नूरजहाँ और रफ़ी साहब की, वह "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है" सुनने के लिए मरती थी, क्योंकि वहाँ ना रेडियो था, ना कुछ था सुनने के लिए, और हमारे गली के पीछे चाय की दुकान थी। तो उधर बजाते थे। एक दिन मैं खाना खा रही थी, तो खाना छोड़ कर उपर टेरेस पर भागी सुनने के लिए, और पूरा सुन कर ही नीचे आयी। माँ ने कहा कि क्या हो गया तुमको? मैं खाने के जूठे हाथ से ही खड़ी रही और पूरा सुनकर ही वापस आयी। नूरजहाँ जी से कभी मुलाक़ात नहीं हो पायी। फिर एक और गाना है "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे"। रेडियो पर जब गाना आता था तो भाग भाग कर लिखती थी, समझ में भी नहीं आता था तब, हिंदी भी बोलना नहीं आता था।

तो दोस्तों, शारदा जी के बताये इन दो गीतों में से दूसरा जो गीत है, "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे", आइए आज इस गीत के ज़रिए नूरजहाँ जी को हम अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करें। फ़िल्म 'अनमोल घड़ी', संगीत नौशाद साहब का, और गीतकार हैं तनवीर नक़वी।

गीत - आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे (अनमोल घड़ी)


तो ये था इस सप्ताह का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', जो रोशन हो रही थी पार्श्वगायिका शारदा के यादों के उजालों से। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर यह अंक उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप प्रस्तुत किया गया। अब आज बस इतना ही, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ हम पुन: उपस्थित होंगे, इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Saturday, September 18, 2010

ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने - जब १९५२ में लता ने जनमदिन की बधाई दी थी नूरजहाँ को

ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम आप तक हर हफ़्ते पहूँचाते हैं आप ही के ईमेल में लिखी हुई आप ही की यादें। और आज है इस सिलसिले की आठवीं कड़ी। दोस्तों, आज हम जिस ईमेल को शामिल करने जा रहे हैं, उसे हमें किसने भेजा है यह तो हम भी नहीं जानते। दरअसल ना तो उन्होंने अपना नाम लिखा है और ना ही उनके ईमेल आइ.डी से उनके नाम का पता चल पाया है। लेकिन ज़रूरी बात यह कि जिन्होंने भी यह ईमेल भेजा है, बड़ा ही कमाल का और दुर्लभ तोहफ़ा हमें दिया है जिसके लिए "धन्यवाद" शब्द भी फीका पड़ जाए। दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित कड़ियों में आप लता मंगेशकर पर केन्द्रित शृंखला का आनंद ले रहे हैं। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए इस शख़्स ने हमें यह ईमेल भेजा जिसमें 'स्क्रीन' पत्रिका के एक बहुत ही पुराने अंक से खोज कर लता जी का एक लेख है भेजा है जिसमें लता जी ने मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ जी को बड़े शिद्दत के साथ याद करते हुए उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी थीं। आज १८ सितंबर है और २१ सितंबर को नूरजहाँ जी का जन्मदिवस है। ऐसे में आज की कड़ी में इस लेख को शामिल कर पाना हम सब के लिए सौभाग्य की बात है। जिन्होंने भी हमें यह ईमेल भेजा है, उन्हें हम तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। लीजिए इस लेख को आप भी पढ़िए। 'टीयर्स ऒफ़ जॊय' के शीर्षक से यह लेख प्रकाशित हुई थी 'स्क्रीन' पत्रिका के २६ सितंबर १९५२ के अंक में, यानी कि आज से लगभग ६० साल पहले।

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TEARS OF JOY

(Screen, 26th Sept. 1952)

SEPTEMBER 21 was Noor Jehan's birthday and I, who consider myself her bosom friend and disciple, today pay tribute to her genius through the columns of 'Screen'.

They say, absence makes the heart grow fonder. I only know that our separation has given me great pain and even now, when I reminisce about the time we spent together, my mind rebels against the conditions that have erected a barrier between us.

Noor Jehan's innumerable fans console themselves by listening to her records and I also have to content myself with them. But when the desire to hear her in person grows too strong, I seek help of a telephone and we come together over a distance of hundreds of miles.

To see her again after years of separation, I undertook a journey to Jullunder (Jalandhar) not long ago and we met with cries of joy on the border line between India and Pakistan. I shall ever cherish those moments when tears coursed down her cheeks as she embraced me, tears that spoke of her affection for me.

People have wondered at our deep attachment, perhaps because they think we ought to share a professional rivalry. To them, I want to say that Noor jehan is like an elder sister to me (indeed I address her as 'didi'), that she is in a sense my "Guru" for I have always kept her enchanting voice as my ideal.

Even now as I pen these lines of homage to her, whom I deem my ideal, the greatest of them all, I find mere words inadequate. I pray to God that Noor jehan be blessed with happiness and prosperity and live to see many more birthdays.

Lata Mangeshkar.

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आज के इस ईमेल के बाद अब बारी आती है गीत सुनवाने की। कौन सा गाना सुनवाएँ आपको? लता जी से कुछ चाहनेवालों ने ट्विटर पर पूछा था कि उन्हें नूरजहाँ जी का गाया कौन सा गीत सब से ज़्यादा पसंद है। इसका उन्होंने यही जवाब दिया था कि उन्हें उनके सभी गानें बेहद पसंद है। साथ ही लता जी ने यह भी कहा था कि नूरजहाँ जी को लता जी का गाया जो गीत सब से ज़्यादा पसंद था, वह है फ़िल्म 'रज़िया सुल्तन' का "ऐ दिल-ए-नादान"। तो दोस्तों, क्योंकि आज लता जी और नूरजहाँ जी की एक साथ बात चली है, तो क्यों ना नूरजहाँ जी का पसंदीदा लता नंबर हो जाए! जाँनिसार अख़्तर का लिखा, ख़य्याम साहब का स्वरबद्ध किया हुआ गीत है। पिछले साल आइ.बी.एन-७ पर जावेद अख़्तर साहब ने जब लता जी को उनका सब से पसंदीदा गीत कौन सा है पूछा था, तब शुरु शुरु में तो लता जी यह कह कर सवाल को टाल दिया कि कोई एक गीत बताना मुश्किल है, लेकिन जावेद साहब के ज़ोर डालने पर उन्होंने इसी गीत का उल्लेख किया यह सोचे बग़ैर कि इसे जावेद साहब के पिताजी ने लिखा है। जावेद साहब ने कहा था, "लता जी, आप ने अपने हज़ारों गीतों में से एक गीत को चुना, और वह गीत मेरे वालिद साहब का लिखा हुआ है"। यह सुनते ही लता जी भी चौंक उठीं क्योंकि शायद उन्होंने जवाब देते हुए इस ओर ध्यान नहीं दिया था कि इसके गीतकार जाँनिसार साहब हैं।

और अब ख़य्याम साहब बता रहे हैं इसी गीत के बारे में विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में - "रज़िया सुल्तान आज से ७०० या ७५० बरस पुराना क़िस्सा है। और रज़िया सुल्तान और उनके वालिद, दि एम्पेरर, अल्तमश, ये लोग तुर्की से आए थे यहाँ हिंदुस्तान में। तो ये तारीख़ ने हमें बताया कि ये तुर्की से आए थे यहाँ, यूरोप से। वो किस रास्ते से आए, पहले मैंने यह मार्क किया। इराक़ है, इरान है, उसके बाद ये सेन्ट्रल एशिया, जो पहले रूस में थी, और उसके बाद ये आए दर-ए-ख़ाइबर के रास्ते। ज़ाहिर है उस ज़माने में ना हवाई जहाज़ था, मा मोटर गाड़ी थी, तो कारवाँ चलता था, या काफ़िले चलते थे। तो ५० माइल या ४० माइल चलते होंगे, उसके बाद पड़ाव डालते होंगे। तो रात को कुछ दिल बहलाने की बातें भी होती ही होंगी। तो वो किस साज़ और अंदाज़ गाने का, ये सब वहाँ से, और ये जो दर-ए-ख़ाइबर (ख़ाइबर पास) से होते हुए, यानी पेशावर से होते हुए, उस रास्ते से हमारे भारत में आए। भारत में आके, इन लोगों को भारत इतना अच्छा लगा कि इन्होंने अपना वतन बना लिया इसको। तो इन लोगों के जो जो साज़ होते हैं, कुछ टर्किश, कुछ अरबी, इरानी और हमारे भारत के साज़। तो उनका ब्लेण्डिंग् है ये। तो ब्लेण्डिंग्‍ ऐसी हुई, जो ऒर्केस्ट्रेशन ऐसी हुई, जो सुर ऐसे लगे इस धुन में भी। जैसे गाते हैं, तो वो अनोखापन इसमे, और लता जी की आवाज़, और फिर बहुत ज़हीन हैं लता जी, और तो क्या कहने, जो सुप्रीमो लफ़्ज़ है वह भी छोटा सा है उनके लिए। और ये जाँनिसार अख़्तर साहब का लिखा हुआ नग़मा है। और कमाल अमरोही साहब के क्या कहने जिन्होंने राइटिंग् की है। और मेकिंग् में कोई कॊम्प्रोमाइज़ नहीं की उन्होंने। जितनी किताबें उन्होंने पढ़ी, सब मुझे दी उन्होंने और उतनी ही स्टडी मैंने भी की। तब जाके यह बात आई।"

गीत - ऐ दिल-ए-नादान (रज़िया सुल्तान)


ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। हमें पूरी उम्मीद है कि आपको भाया होगा। आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह साप्ताहिक विशेषांक कैसा लग रहा है, इसे हम और भी बेहतर और दिलचस्प किस तरह से बना सकते हैं, इसके लिए आप अपने विचार और सुझाव हमें oig@hindyugm.com पर लिख सकते हैं। हमें आपके ईमेल का इंतेज़ार रहेगा। इस स्तंभ को युंही बरकरार रखने के लिए हमें सब से ज़्यादा सहयोग आप ही मिल सकता है। अपने जीवन के यादगार घटनाओं को हमारे साथ बाँटिए इस स्तंभ में। इसी उम्मीद के साथ कि आप दोस्तों के ईमेलों से हमारा मेल बॊक्स भर जाएगा, आज के लिए हम विदा लेते हैं, लता जी के गाए एक बेहद दुर्लभ गीत के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' आपकी सेवा में फिर हाज़िर होगा कल शाम भारतीय समयानुसार ६:३० बजे। नमस्कार!


प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

Sunday, August 29, 2010

आहें ना भरी शिकवे ना किए और ना ही ज़ुबाँ से काम लिया....इफ्तार की शामों में रंग भरती एक शानदार कव्वाली

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 471/2010/171

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों का फिर एक बार स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में। दोस्तों, माह-ए-रमज़ान चल रहा है। रमज़ान के इन पाक़ दिनों में इस्लाम धर्म के लोग रोज़ा रखते हैं, सूर्योदय से सूर्यास्त तक अन्न जल ग्रहण नहीं करते, और फिर शाम ढलने पर रोज़े की नमाज़ के बाद इफ़्तार आयोजित किया जाता हैं, जिसमें आस-पड़ोस, और रिश्तेदारों को दावत देकर सामूहिक भोजन कराया जाता है। तो दोस्तों, हमने सोचा कि इन इफ़्तार की शामों को थोड़ा सा और रंगीन किया जाए फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कुछ बेमिसाल क़व्वालियों की महफ़िल सजाकर। इसलिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आज से लेकर अगले दस अंकों में सुनिए ऐसी ही कुछ नायाब फ़िल्मी क़व्वालियों से सजी हमारी नई लघु शृंखला 'मजलिस-ए-क़व्वाली'। इन क़व्वालियों को सुनते हुए आप महसूस कर पाएँगे कि किस तरह से ४० के दशक से लेकर ८० के दशक तक फ़िल्मी क़व्वालियों का चलन बदलता रहा है। इस शृंखला में क़व्वालियों को सुनवाते हुए हम आपको क़व्वालियों के बारे में भी बताएँगे, किस तरह से इसकी शुरुआत हुई, किस किस तरह से ये गाया जाता है, वगैरह। बहरहाल आज जिस क़व्वाली को हमने चुना है उसे फ़िल्म जगत की पहली लोकप्रिय क़व्वाली होने का गौरव प्राप्त है। और यही नहीं यह पहली ऐसी क़व्वाली भी है जिसे केवल महिला गायिकाओं ने गाया है। १९४५ की फ़िल्म 'ज़ीनत' की यह क़व्वाली है "आहें ना भरी शिकवे ना किए और ना ही ज़ुबाँ से काम लिया", जिसे गाया था नूरजहाँ, ज़ोहराबाई, कल्याणीबाई और साथियों ने। इस फ़िल्म में दो संगीतकार थे - मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ान (ख़ान मस्ताना)। युं तो नूरजहाँ के गाए कई एकल गीत इस फ़िल्म में मशहूर हुए थे जैसे कि "आंधियाँ ग़म की युं चली", "बुलबुलो मत रो यहाँ" आदि, पर यह क़व्वाली सब से ज़्यादा चर्चित रही और इसने वह धूम मचाई कि इसके बाद फ़िल्मों में क़व्वालियों का चलन बढ़ा और इसी धुन को कम ज़्यादा बदलाव कर फ़िल्मी संगीतकार बार बार क़व्वालियाँ बनाते रहे। बस अफ़सोस की बात यह है कि 'ज़ीनत' के बाद हाफ़िज़ ख़ान को बहुत ज़्यादा सफलता और किसी फ़िल्म में ना मिल सका।

फ़िल्म 'ज़ीनत' की यह क़व्वाली फ़िल्मायी गयी थी शशिकला, श्यामा और शालिनी पर। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में जब शशिकला जी तशरीफ़ लाई थीं, उन्होंने इस क़व्वाली का ज़िक्र किया था, आइए उसी अंश को यहाँ आज पेश किया जाए!

कमल शर्मा: आप ने 'ज़ीनत' का ज़िक्र किया, १९४५ में यह फ़िल्म आई थी, इसमें एक मशहूर क़व्वाली जो है....

शशिकला: जी हाँ, आप कोई यक़ीन नहीं करेंगे, अगर वह पिक्चर आज भी लगे तो सिर्फ़ उस क़व्वाली को देखने और सुनने के लिए लोग वहाँ पे बैठते थे, थिएटर्स में। और उन दिनों जो है क़व्वाली आदमी लोग गाया करते थे, मगर सारी लेडीज़ लोगों ने गाया है, हम लोगों ने उसमें काम किया है।

कमल शर्मा: शशि जी, आप ने नूरजहाँ जी के साथ काम किया है। जैसा उनका अभिनय था, उससे भी ज़्यादा अच्छा वो गाती थीं। आप ने उनको कैसा पाया?

शशिकला: मैं बतायूँ आपको, उन दोनों को मैं भाई साहब और आपा जी कह कर ही बुलाती थी। भाई साहब और आपा जी, इसके सिवा बात नहीं होती थी।

कमल शर्मा: क्या बात है!

शशिकला: और ख़ूबसूरत तो थीं वो, और शौक़त भाई साहब भी उतने ही ख़ूबसूरत थे। मैं कराची गई थी और आपा जी को मिल नहीं सकी। शौक़त भाई साहब से मेरी मुलाक़ात हुई, बहुत रोये वो, बहुत रोये वो, क्योंकि उस वक़्त उनका सेपरेशन हो गया था। और जब कभी मैं वहाँ से गुज़रती हूँ जहाँ वो रहते थे, अपने भी वो दिन याद आ जाते हैं। अगर वो आज होतीं तो मेरी ज़िंदगी कुछ ना कुछ हो जाती। मगर उसके लिए अब मुझे अफ़सोस नहीं है। मदर टेरेसा के पास आने के बाद मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है।

कमल शर्मा: तो 'ज़ीनत' की वही क़व्वाली सुनी जाए!

शशिकला: ज़रूर, ज़रूर!

तो चलिए दोस्तों, 'मजलिस-ए-क़व्वाली' की पहली क़व्वाली कर रहे हैं आपकी नज़र...



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'चौदहवीं का चाँद' में रवि के संगीत से सजी क़व्वाली "शर्मा के युं फिर पर्दानशीं आँचल को सँवारा करते हैं" की धुन फ़िल्म 'ज़ीनत' के इसी क़व्वाली की धुन से प्रेरीत थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस कव्वाली की गायिका बताएं - ३ अंक.
२. ए आर कारदार की इस फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
३. धुन थी नौशाद साहब की, गीतकार बताएं - २ अंक.
४ मुखड़े में शब्द है "सुबह", कव्वाली के बोल बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतिभा जी, किशोर जी, नवीन जी और अवध जी को सही जवाबों की बधाई. प्रतिभा जी आपने आपने बारे आपने थोडा बहुत बताया, कुछ अधिक बताना चाहें तो oig@gmail.com पर जरूर लिखें. स्वप्निल जी आपने एकदम सही कहा, "कोई बात चले" में केवल दो ही त्रिवेनियाँ है. भूल सुधारने के लिए धन्यवाद.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, March 3, 2010

रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ.. नूरजहां की काँपती आवाज़ में मचल पड़ी ग़ालिब की ये गज़ल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७३

लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और,
तनहा गये क्यों अब रहो तनहा कोई दिन और।

ग़ालिब की ज़िंदगी बड़ी हीं तकलीफ़ में गुजरी और इस तकलीफ़ का कारण महज़ आर्थिक नहीं था। हाँ आर्थिक भी कई कारण थे, जिनका ज़िक्र हम आगे की कड़ियों में करेंगे। आज हम उस दु:ख की बात करने जा रहे हैं, जो किसी भी पिता की कमर तोड़ने के लिए काफ़ी होता है। ग़ालिब पर चिट्ठा(ब्लाग) चला रहे अनिल कान्त इस बारे में लिखते हैं:
ग़ालिब के सात बच्चे हुए पर कोई भी पंद्रह महीने से ज्यादा जीवित न रहा. पत्नी से भी वह हार्दिक सौख्य न मिला जो जीवन में मिलने वाली तमाम परेशानियों में एक बल प्रदान करे. इनकी पत्नी उमराव बेगम नवाब इलाहीबख्शखाँ 'मारुफ़’ की छोटी बेटी थीं. ग़ालिब की पत्नी की बड़ी बहन को दो बच्चे हुए जिनमें से एक ज़ैनुल आब्दीनखाँ को ग़ालिब ने गोद ले लिया था.

वह बहुत अच्छे कवि थे और 'आरिफ' उपनाम रखते थे. ग़ालिब उन्हें बहुत प्यार करते थे और उन्हें 'राहते-रूहे-नातवाँ' (दुर्बल आत्मा की शांति) कहते थे. दुर्भाग्य से वह भी भरी जवानी(३६ साल की उम्र) में मर गये. ग़ालिब के दिल पर ऐसी चोट लगी कि जिंदगी में उनका दल फिर कभी न उभरा. इस घटना से व्यथित होकर उन्होंने जो ग़ज़ल लिखी उसमें उनकी वेदना साफ़ दिखाई देती है. कुछ शेर :

आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ,
माना कि नहीं आज से अच्छा कोई दिन और।
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे,
क्या ख़ूब? क़यामत का है गोया कोई दिन और।
दिल पर पड़ती और पड़ चुकी कई सारी चोटों की वज़ह से ग़ालिब अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव के आते-आते अपनी मौत की दुआएँ करने लगे थे। हर साल अपनी मौत की तारीख निकाला करते थे और यह देखिए कि हर साल वह तारीख गलत साबित हो जाती थी। एक बार ऐसी हीं किसी तारीख का ज़िक्र जब उन्होंने अपने एक शागिर्द से किया तो शागिर्द के मुँह से बरबस हीं यह निकल पड़ा कि "इंशा अल्लाह, यह तारीख भी ग़लत साबित होगी।" लाख ग़मों में गर्त होने के बावजूद ग़ालिब अपने मजाकिया लहज़े से कहाँ बाज़ आने वाले थे। फिर ग़ालिब ने भी कह डाला कि "देखो साहब! तुम ऐसी फ़ाल मुँह से न निकालो। अगर यह तारीख ग़लत साबित हुई तो मैं सिर फोड़कर मर जाउँगा।" इसे कहते हैं मौत में ज़िंदगी के मज़े लेना या फिर मौत के मज़े लेना। अब जबकि मौत की हीं बात निकल पड़ी है तो क्यों न एक और वाकये का ज़िक्र कर दिया जाए। एक बार जब दिल्ली में महामारी पड़ी तो ग़ालिब के मित्र मीर मेहदी हसन ’मज़रूह’ ने उनका हाल जानने के लिए उन्हें खत लिखा। ग़ालिब ने महामारी की बात तो की लेकिन महामारी को महामारी मानने से इंकार करते हुए यह जवाब भेजा कि "भई, कैसी वबा? जब एक सत्तर बरस के बुड्ढे और सत्तर बरस की बुढ़िया को न मार सकी।" जवाब पढकर मज़रूह लाजवाब हो गए। यह थी ग़ालिब की अदा जो गमों को भी सकते में डाल देती थी कि भाई हमने किससे पंगा लिया है।

ग़ालिब ने अपने इस हालात पर कई सारे शेर कहे हैं। अपनी ज़िंदगी के अंतिम दिनों में ग़ालिब अपने एक शेर का यह मिसरा गुनगुनाया करते थे:
ऐ मर्गे-नागहाँ ! तुझे क्या इंतज़ार है ?

ग़ालिब के गमों की बातें तो हो गईं, अब क्यों न ग़ालिब की हाज़िर-जवाबी की बात कर ली जाए। ग़ालिब अव्वल दर्ज़े के हाज़िर-जवाब थे। मौके को परखना और संभालना उन्हें खूब आता था और संभालते वो भी कुछ इस तरह थे कि सामने वाले को इसकी भनक भी नहीं लगती थी। इस बारे में उस्ताद ज़ौक़ से जुड़ा एक किस्सा हम आपसे बाँटना चाहेंगे जिसे गुलज़ार साहब ने बड़ी हीं खूबसूरती से अपने सीरियल "मिर्ज़ा ग़ालिब" में पेश किया है। यह तो सबको पता है कि ग़ालिब और ज़ौक़ में एक अनबन-सी ठनी रहती थी। तो हुआ यूँ कि:

उस्ताद ज़ौक़ की पालकी मिर्ज़ा के पास गुज़री। उनके मुलाज़िम पालकी के पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। ग़ालिब ने पालकी देखकर तंज़ किया।

हुआ है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता।

ग़ालिब के पास खड़े दो-एक अशख़ास ने दाद दी। "वाह-वाह... मिर्ज़ा मुकर्रर- इरशाद फ़रायें।" पास खड़े लोगों ने मिसरा दोहराया।

उस्ताद ज़ौक़ जब अपनी हवेली पहुँचे तो वे ग़ालिब की फ़िकरेबाज़ी पर काफ़ी नाराज़ थे। उनके सारे शागिर्दों ने अपने-अपने अंदाज़ में नाराज़गी ज़ाहिर की। बातचीत के बाद यह निर्णय लिया गया कि इस वाकये का ज़िक्र बहादुरशाह ज़फ़र से की जाए और किसी भी तरह ग़ालिब को किले में बुलाया जाए। एक शागिर्द ने कहा - "आती जुमेरात मुशायरा है।" दूसरे ने कहा- "बुलवा लीजिए किले में। मट्टी पलीद करके भेजेंगे।" आखिरकार ग़ालिब को दावतनामा भेजा गया।

कि़ले के अंदर- मुशायरे की शाम थी। शायरों में ज़ौक़ के बग़ल में वली और ज़फ़र, ग़ालिब, मुफ़ती वग़ैरह बैठे थे। ज़फ़र ने मुशायरा शुरू होने से पहले हाज़रीन की तरफ़ देखकर कहा -
"हम मश्कुर हैं उन तमाम शोरा और उन सुख़नवर हज़रात के जो आज के मुशायरे में शरीक हो रहे हैं। लेकिन मुशायरे के इफ़तता होने से पहले हम एक बात वाज़य कर देना चाहते हैं कि कुछ शोरा हज़रात शायद हमारे उस्ताद शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ से नालां हैं और सरेराह उनपर जुमले कसते हैं, जो उनके अपने वक़ार को ज़ेब नहीं होता। हम चाहते हैं कि वह ऐसा न करें और आइंदा बाहमी आपसी आदाब-ओ इख़लाक़ की पाबंदी में रहें।"

ग़ालिब समझ गए कि बात किसकी हो रही है। ’यास’ ने सामने आकर ग़ालिब पर वार किया - "मिर्ज़ा नौशा ने सरेराह उस्ताद की शान में जुमला कसा और कहा।" सभी ग़ालिब की तरह देखने लगे। आज़रदा ने पूछा - "क्या कहा.... " ’यास’ ने वह मिसरा दुहरा दिया।

ज़फ़र ने सीधे ग़ालिब से मुख़ातिब होकर पूछा- "क्या यह सच है मिर्ज़ा नौशा?"
ग़ालिब ने इक़बाले जुर्म किया- "जी हुजूर, सच है| मेरी गज़ल के मक़ता का मिसरा-उला(पहली पंक्ति) है।" नाज़रीन चौकन्न हो गए।
आज़रदा ने पूछा- "मक़्ता इरशाद फ़रमायेंगे आप?"

ग़ालिब ने अबु ज़फ़र की तरफ़ देखा, एक लंबी साँस ली और शेर पूरा किया-

वगरना शहर में ’ग़ालिब’ की आबरू क्या है।

अब याद के चौंकने की बारी थी। आज़रदा ने बेअख्तियार दाद दी। ज़फ़र ने ज़ौक़ की तरफ़ देखा। ज़ौक़ ने बात आगे बढाई - "अगर मक़्ता इतना ख़ूबसूरत है तो पूरी गज़ल क्या होगी, सुनी जाए।"
ज़फ़र ने ग़ालिब से गुजारिश की - "मिर्ज़ा अगर ज़हमत न हो तो पूरी गज़ल सुनाएँ। आज के मुशायरे का आगाज इसी गज़ल से किया जाए।"
रावी ने एलान किया- "शमा महफ़िल असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब के सामने लाई जाती है।"

मिर्ज़ा ने जेब टटोली, काग़ज़ निकालकर उँगलियों में रखा और तरन्नुम से अपनी गज़ल पेश की-
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है।

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख से हीं न टपका तो फिर लहू क्या है।


मुशायरे में नई जान आ गई। चारों तरफ़ मिर्ज़ा ग़ालिब की वाह-वाह होने लगी} ख़ुद अबु जफ़र भी दाद देते रहे। ज़ौक़ भी इस शेर पर दाद दिये बगैर न रह सके।
मुफ़ती सदरूद्दीन ग़ालिब के पास हीं बैठे थे। उन्होंने झुककर ग़ालिब के सामने काग़ज़ पर लिखी गज़ल को देखा। काग़ज़ बिलकुल कोरा। उधर नाज़रीन वाह-वाह कर रहे थे। मुकर्रर-मुकर्रर... की आवाज़ें आ रहीं थीं।

यूँ हीं नहीं लोग ग़ालिब के अंदाज़-ए-बयाँ की कद्र करते हैं, मिसालें देते हैं। अगर आपको अब तक यकीन न आया हो तो इन दो शेरों पर जरा गौर कर लें:

मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती


ग़ालिब के बारे में आज बहुत कुछ कहा और बहुत कुछ सुना और अब महफ़िल-ए-गज़ल की रवायतों को मद्देनज़र रखते हुए ग़ालिब की गज़ल सुनने का वक़्त हो चला है। आज की गज़ल जिस फ़नकारा की आवाज़ में है, वो किसी भी नाम की मोहताज़ नहीं हैं। हम इनके ऊपर पहले भी एक कड़ी पेश की थी जिसमें हमने इन्हें तफ़शील से जाना था। जी हाँ, आपने सही पहचाना हम मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की बात कर रहे हैं। तो लीजिए पेश है नूरजहाँ की आवाज़ में यह गज़ल जिसे हमने उनके एलबम "ज़मीन" से लिया है:

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आये क्यूँ
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं ____ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफ़िल में जिन श्रोताओं ने हिस्सा लिया उन सब का आभार, आज हम समय की कमी के चलते सब के नाम के साथ चर्चा नहीं कर पा रहे हैं, माफ़ी चाहेंगें, पर अगली बार दुगनी बातचीत होगी ये वादा है

खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, February 16, 2010

आवाज़ दे कहाँ है...ओल्ड इस गोल्ड में पहली बार बातें गायक/अभिनेता सुरेन्द्र की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 347/2010/47

४० का दशक हमारे देश के इतिहास में राष्ट्रीय जागरण के दशक के रूप में याद किया जाता है। राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से इस दौर ने इस देश पर काफ़ी असरदार तरीके से प्रभाव डाला था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते ही फ़िल्म निर्माण पर लगी रोक को उठा लिया गया जिसके चलते फ़िल्म निर्माण कार्य ने एक बार फिर से रफ़्तार पकड़ ली और १९४६ के साल में कुल १५५ हिंदी फ़िल्मों का निर्माण किया गया। लेकिन सही मायने में जिन दो फ़िल्मों ने बॊक्स ऒफ़िस पर झंडे गाढ़े, वो थे 'अनमोल घड़ी' और 'शाहजहाँ'। एक में नूरजहाँ - सुरैय्या, तो दूसरे में के. एल. सहगल। लेकिन दोनों फ़िल्मों के संगीतकार नौशाद साहब। वैसे हमने इन दोनों ही फ़िल्मों के गानें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बजाए हैं, लेकिन जब इस साल का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी गीत को चुनने की बात आती है तो इन्ही दो फ़िल्मों के नाम ज़हन में आते हैं, और आने भी चाहिए। क्योंकि हमने 'शाहजहाँ' फ़िल्म के दो गीत सुनवाएँ हैं, तथा सहगल साहब और इस फ़िल्म से जुड़ी तमाम बातें भी बता चुके हैं, तो क्यों ना आज फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का एक दोगाना सुन लिया जाए, जिससे कि एक और ऐसे गायक का ज़िक्र छिड़ जाएगा जिनका अभी तक हम ने इस मंच पर कभी ज़िक्र नहीं किया है। हमारा इशारा है गायक और अभिनेता सुरेन्द्र की ओर, जिन्होने इस फ़िल्म में नूरजहाँ के साथ मिलकर एक बेहद मशहूर युगल गीत गाया था "आवाज़ दे कहाँ है, दुनिया मेरी जवाँ है, आबाद मेरे दिल की उम्मीद का जहाँ है"। 'नजमा', 'तक़दीर', और 'हुमायूं' जैसे कम ख्याति वाले फ़िल्मों के निर्माण के बाद महबूब ख़ान लेकर आए 'अनमोल घड़ी' और इसी फ़िल्म ने एक बार फिर से उन्हे पहली पंक्ति के फ़िल्मकारों के बीच ला खड़ा किया। यह फ़िल्म एक प्रेम-त्रिकोण थी नूरजहाँ, सुरैय्या और सुरेन्द्र के बीच। नौशाद का संगीत और तनवीर नक़वी के गीतों ने वो असर किया कि आज ६५ साल बाद भी ये गानें बिल्कुल ताज़े लगते हैं।

आइए आज कुछ सुरेन्द्रनाथ की बातें की जाए। सुरेन्द्रनाथ का जन्म ११ नवंबर १९१० को पंजाब के बटाला में हुआ था। फ़िल्मों की चाहत उन्हे बम्बई खींच लाई। उनकी फ़िल्मी यात्रा शुरु हुई १९३६ में फ़िल्म 'डेक्कन क्वीन' से जिसमें वे हीरो बनें और दो गानें भी गाए। उनका गाया पहला गीत था "बिरहा की आग लगी"। दरअसल उन दिनों सहगल साहब न्यु थिएटर्स की फ़िल्मों में काफ़ी धूम मचा रहे थे। ऐसे में सागर मूवीटोन के महबूब ख़ान ने सुरेन्द्र को खोज निकाला और सहगल साहब को टक्कर देने के लिए उन्हे इस बैनर की फ़िल्मों (डेक्कन क्वीन, मनमोहन) में लॊंच किया। सुरेन्द्र साहब के गानें तो बहुत मशहूर हुए लेकिन वे वो मकाम कभी हासिल नहीं कर पाए जो मकाम सहगल साहब ने हासिल किया था। ख़ैर, सुरेन्द्र की कुछ जानी मानी फ़िल्में हैं 'डेकन क्वीन', 'मनमोहन', 'भारतरी', 'अनमोल घड़ी', 'अनोखी अदा', 'ऐलान', 'मेरी कहानी', 'हरियाली और रास्ता', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'बैजु बावरा', 'सरस्वतीचन्द्र'। बतौर गायक उनकी अंतिम फ़िल्म थी 'गवैया'। आज का प्रस्तुत गीत राग पहाड़ी पर आधारित है और इसे प्रस्तुत करते हुए अपने 'जयमाला' कार्यक्रम में सुरेन्द्र ने कहा था - "इसी फ़िल्म में मेरा और नूरजहाँ का एक डुएट गीत है "आवाज़ दे कहाँ है"। इसके साथ कई भूली बिसरी यादें जुड़ी हुई हैं, कभी दोस्तों की शकलें आँखों के सामने आ जाते हैं तो कभी शबाब का वो रंगीन ज़माना। मैं उन दिनों को आवाज़ देता हूँ और आपको यह गीत सुनाता हूँ।"



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

दुनिया की कोई रीत हमें रास आती नहीं,
और क्या कहें जिंदगी भी हमें भाती नहीं,
नींद तो आँखों से रूठ गयी कब की,
ये जान कमबख्त क्यों जाती नहीं...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. कन्नड़ कोकिला के नाम से जानी जाने वाली इस गायिका का नाम बताएं- सही जवाब को मिलेंगें 3 अंक.
3. ये फिल्म ठीक १५ अगस्त १९४७ को प्रदर्शित हुई थी, नाम बताएं - २ अंक.
4. इस गीत के संगीतकार कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ने एक बार फिर सही जवाब देकर २ अंक कमाए, अवध जी कल भी आपकी मेल मिली, जिया सरहदी वाले सही जवाब के लिए आपके खाते में भी २ अंक जोड़ दिए गए हैं. रोहित जी आप फिर कहाँ गुम हो गए, और इंदु जी ?
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, February 15, 2010

दिया जलाकर आप बुझाया तेरे काम निराले...याद करें नूरजहाँ और उनकी सुरीली आवाज़ को इस गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 346/2010/46

न दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अंतर्गत हम आपको ४० के दशक के हर साल का एक सुपरहिट गीत सुनवा रहे हैं अपनी ख़ास लघु शृंखला 'प्योर गोल्ड' में। आज इसकी छठी कड़ी में बारी है साल १९४५ की। ८ सितंबर १९४५। द्वितीय विश्व युद्ध का समापन। जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा कर विश्व के मानचित्र से उनका अस्तित्व ही मिटा दिया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का रहस्यात्मक तरीक़े से ग़ायब हो जाना और संभवत: ताइपेइ के एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के चर्चे ही १९४५ के मुख्य विषय थे। भारत का स्वाधीनता संग्राम भी पूरे शबाब पर थी। फ़िल्म उद्योग भी इससे बेअसर नहीं रह पाई। कारखानों में बंदूक, बम, और हथियार का उत्पादन इतना ज़्यादा बढ़ चुका था कि जिससे बहुत ज़्यादा मात्रा में आर्थिक लाभ हो रहे थे। इस विशाल धन राशी को कई गुणा और बढ़ाने के उद्येश्य से इन्हे फ़िल्म निर्माण में लगाया जाने लगा। फ़िल्मस्टार्स के पारिश्रमिक कई गुणा बढ़ गए, जिसका एक हिस्सा आयकर से मुक्त भी किया जाने लगा। इस वजह से वो बड़ी हस्तियाँ जो कभी फ़िल्म स्टुडियोज़ के कर्मचारी हुआ करते थे, वो अब फ़्रीलांसिंग् पर उतर आए और धीरे धीरे फ़िल्मस्टार का अस्तित्व फ़िल्म कंपनी से बड़ी हो गई। फ़िल्म निर्माण की बड़ी कंपनियाँ जैसे कि कलकत्ता का 'न्यु थिएटर्स' और बम्बई का 'बॊम्बे टॊकीज़' धीरे धीरे कमज़ोर पड़ने लगे। आइए अब आपको १९४५ के उल्लेखनीय फ़िल्मी घटनाओं से थोड़ा सा अवगत करवाया जाए। अरुण कुमार जो बॊम्बे टॊकीज़ की फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्लेबैक करने के लिए जाने जाते थे, वो इस साल संगीतकार बन गए और दिलीप कुमार - स्वर्णलता अभिनीत फ़िल्म 'प्रतिमा' में संगीत दिया। इस फ़िल्म के बाद देवीका रानी ने बॊम्बे टॊकीज़ के अपने शेयर अमीय चक्रवर्ती को बेच डाले और एक रूसी चित्रकार से शादी कर फ़िल्म जगत को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। दूसरी तरफ़ एक और बड़ी बैनर 'रणजीत मूवीटोन' के मालिक चंदुलाल शाह के जुए और रेस की आदतों की वजह से इस कंपनी को भारी अर्थिक संकट ने घेर लिया और यह कंपनी भी दिन ब दिन नीचे उतरती चली गई। गायक मुकेश ने अपना पहला पार्श्व गीत "दिल जलता है तो जलने दे" फ़िल्म 'पहली नज़र' के लिए अनिल बिस्वास के संगीत में रिकार्ड करवाया। उधर निर्देशक चेतन आनंद ने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा झोपड़पट्टी के लोगों पर बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के ज़रिए। न्यु थिएटर्स में बिमल रॊय, जो एक सिनेमाटोग्राफ़र का काम करते थे, उन्होने अपना पहला फ़िल्म निर्देशित किया बंगला में (ओदेर पोथे), जिसका हिंदी में भी इसी साल 'हमराही' के नाम से निर्माण किया गया। १९४३ में जयंत देसाई ने सहगल और ख़ुरशीद को लेकर 'तानसेन' बनायीं थी, १९४५ में उन्होने सहगल के साथ सुरैय्या को लेकर बनाई 'तदबीर'। सन् ४५ में गायक जगमोहन मित्र को देबकी बोस की फ़िल्म 'मेघदूत' में कमल दासगुप्ता के संगीत में एक बेहद मशहूर गीत "ओ वर्षा के पहले बादल" गाने का मौका मिला, तो उधर ओ. पी. नय्यर साहब ने अपना पहला ग़ैर फ़िल्मी गीत "प्रीतम आन मिलो" सी. एच. आत्मा की आवाज़ में रिकार्ड किया जो बेहद मशहूर हुआ था।

१९४५ के साल को अगर गायिका और अभिनेत्री नूरजहाँ का अविभाजीत भारत में सब से कामयाब साल कहें तो ग़लत नहीं होगा। इस साल उनके गायन और अभिनय से सज कर तीन फ़िल्में प्रदर्शित हुईं जिन्होने बॊक्स ऒफ़िस इतिहास में नए झंडे गाढ़े। और इन फ़िल्मों का संगीत भी उतना ही धूम मचाने वाला। ये फ़िल्में थीं 'ज़ीनत', 'गाँव की गोरी', और 'बड़ी माँ'। फ़िल्म 'ज़ीनत' में नूरजहाँ का गाया "बुलबुलों मत रो" और "आंधियाँ ग़म की युं चली" तथा ज़ोहराबाई और कल्याणीबाई के साथ गाया हुआ उनकी क़व्वाली "आहें ना भरी शिकवे ना किए" बेहद मशहूर हुए थे। फ़िल्म 'गाँव की गोरी' के गीतों की लोकप्रियता के तो कहने ही क्या। "किस तरह भूलेगा दिल", "बैठी हूँ तेरी याद का लेकर के सहारा" और "ये कौन हँसा" जैसे गीत हर एक की ज़ुबान पर चढ़ गए थे। फ़िल्म 'बड़ी माँ' के गानें भी उतने ही असरदार थे। मास्टर विनायक, जो पहले प्रभात स्टुडियो से जुड़े हुए थे, ने 'बड़ी माँ' का निर्देशन किया था, और फ़िल्म के संगीतकार थे दत्ता कोरेगाँवकर, जिन्हे के. दत्ता के नाम से भी जाना जाता है। दोस्तों, यह वही कोरेगाँवकर साहब हैं जिन्होने लता मंगेशकर को उनका पहला एकल प्लेबैक्ड सॊंग् गाने का अवसर दिया था 'आपकी सेवा में' फ़िल्म में सन् '४७ में। वैसे 'बड़ी माँ' फ़िल्म में लता मंगेशकर और उनकी बहन आशा ने अभिनय किया था, और यह उनके अभिनय से सजी पहली हिंदी फ़िल्म थी। पार्श्वगायिका बनने से पहले इन दोनों बहनों ने अपने परिवार को चलाने के लिए कई फ़िल्मों में छोटे मोटे किरदार निभाए थे। फिर दोनों की क़िस्मत ने ऐसी करवट ली कि बाक़ी इतिहास है। ख़ैर, आज तो हम आपको सुनवा रहे हैं नूरजहाँ की आवाज़ में इस फ़िल्म का एक बड़ा ही लोकप्रिय गीत "दिया जलाकर आप बुझाया तेरे काम निराले, दिल तोड़ के जानेवाले"। गीत रचना ज़िया सरहदी की है। आइए सुनते हैं।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

झिलमिलाते तारों के बीच,
फलक पे चाँद को देखा हमने,
चांदनी छिटकी हुई थी दूर तक,
और रात खामोश थी...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
2. इस युगल गीत में उस ज़माने के एक मशहूर अभिनेता/गायक की आवाज़ थी, उनका नाम बताएं- सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. कौन थे इस मशहूर गीत के गीतकार- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
4. ये गीत किस राग पर आधारित है - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ३ अंक और जुड़े आपके खाते में, पर रोहित जी इस बार आप चूक गए. जवाब जिया सरहदी है...खैर आज के लिए शुभकामनाएं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, January 27, 2010

दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है.. मुज़फ़्फ़र वारसी के शब्दों के सहारे पूछ रही हैं मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६८

पिछली दो कड़ियों से न जाने क्यों वह बात बन नहीं पा रही थी, जिसकी दरकार थी। वैसे कारण तो हमें भी पता है और आपको भी। हम इसलिए नहीं बताना चाहते कि खुद की क्या टाँग खींची जाए और आप तो आप ठहरे.. भला आप किसी का दिल क्यों दुखाने लगे। चलिए हम हीं बताए देते हैं... कारण था आलस्य। जैसा कि हमने पिछली कड़ी में यह वादा किया था कि अगली बार चाहे कितनी भी ठंढ क्यों न हो, चाहे कुहरा कितना भी घना क्यों न हो, हम अपनी महफ़िल को पर्याप्त समय देंगे.. बस ४५ मिनट में हीं इति-श्री नहीं कर देंगे और यह तो सभी जानते हैं कि जो वादा न निभाए वो प्यादा कैसा... माफ़ कीजिएगा शहजादा कैसा तो हमें वादा निभाना हीं था, आखिर हम भी तो कहीं के शहजादे हैं.... हैं ना, कहीं और के नहीं तो आपके दिलों के.... मानते हैं ना आप? हमें लगता है कि बातें ज्यादा हो गईं, इसलिए अब काम पर लग जाना चाहिए। काम से याद आया, हमने इन बातों को शुरू करने से पहले कुछ कहा था.. हाँ, यह कहा था कि आप किसी का दिल नहीं दुखाना चाहेंगे। तो हमारी आज की महफ़िल का संदेश भी यही है.. और आज की नज़्म इसी संदेश को पुख्ता करती है। शायर के लफ़्ज़ों में कहें तो "दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है, किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।" आदमी और ज़िंदगी की सही परिभाषा इससे बढकर क्या हो सकती है! कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर शायर न होते तो इन बातों को हम तक पहुँचाता कौन। अब शायर की बात जो चल हीं निकली है तो लगे हाथों शायर से रूबरू भी हो लेते हैं। इस बेहतरीन नज़्म को लिखने वाले शायर का नाम है "मुज़फ़्फ़र वारसी"। अपनी पुस्तक "दर्द चमकता है- मुज़फ़्फ़र वारसी की गज़ले" के प्राक्कथन में सुरेश कुमार लिखते हैं: पाकिस्तानी शायरी में मुज़फ़्फ़र वारसी का नाम एक जगमगाते हुए नक्षत्र की तरह है। उन्होंने यद्यपि उर्दू शायरी की प्रायः सभी विधाओं में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी है। किन्तु उनकी लोकप्रियता एक ग़ज़लगों शायर के रूप में ही अधिक है।

मिरी जिंदगी किसी और की, मिरे नाम का कोई और है,
मिरा अक्स है सर-ए-आईना,पस-ए-आईना कोई और है।

जैसा दिलकश और लोकप्रिय शे’र कहने वाले मुज़फ़्फ़र वारसी ने साधारण बोलचाल के शब्दों को अपनी ग़ज़लों में प्रयोग करके उन्हें सोच-विचार की जो गहराइयाँ प्रदान की हैं, इसके लिए उन्हें विशेष रूप से उर्दू अदब में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मुज़फ़्फ़र वारसी पाकिस्तान के उन चन्द शायरों में से एक हैं, जिनकी ख्याति सरहदों को लाँघ कर तमाम उर्दू संसार में प्रेम और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए खुशबू की तरह बिखरी हुई है। भारत और पाकिस्तान के अनेक विख्यात ग़ज़ल गायकों ने उनकी ग़ज़लों को अपना स्वर देकर उन्हें हिन्दी और उर्दू काव्य-प्रेमियों के बीच प्रतिष्ठित किया है। भारत से प्रकाशित होने वाली प्रायः सभी उर्दू पत्रिकाओं में कई दशकों से उनकी शायरी प्रकाशित हो रही है और वे भारत में भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने कि पाकिस्तान में। ‘बर्फ़ की नाव’, ‘खुले दरीचे बन्द हवा’, ‘कमन्द’ मुज़फ़्फ़र वारसी की ग़ज़लों के प्रसिद्ध उर्दू संग्रह हैं। दर्द चमकता है देवनागरी में उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है।
मुज़फ़्फ़र वारसी एक ऐसे शख्सियत हैं जिनकी उपलब्धियों को बस एक पैराग्राफ़ में नहीं समेटा जा सकता। हमारी मजबूरी है कि हम इनके बारे में आज इससे ज्यादा नहीं लिख सकते, लेकिन वादा करते हैं कि अगली बार जब भी इनकी कोई गज़ल या कोई नज़्म हमारी महफ़िल में शामिल होगी, हम पूरी की पूरी महफ़िल इनके हवाले कर देंगे।

शायर के बाद अब हम इस्तेकबाल करते हैं आज की नज़्म को अपनी आवाज़ से सजाने वाली फ़नकारा का। इन फ़नकारा के बारे में यह कहना हीं काफ़ी होगा कि हर उदीयमान गायक की प्रेरणास्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने कैरियर का आगाज किया तो उनपर इनकी गायकी का प्रभाव था। जन्म से अल्ला वसई और प्यार से नूरजहां कही जाने वाली इन फ़नकारा का जन्म २१ सितंबर १९२६ को अविभाजित भारत भारत के कसूर(पंजाब का एक छोटा-सा शहर) नामक स्थान पर हुआ था। (सौजन्य: जागरण): नूरजहां का जन्म पेशेवर संगीतकार मदद अली और फतेह बीबी के परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की ११ संतानों में एक थीं। संगीतकारों के परिवार में जन्मीं नूरजहां का बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहां ने पांच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। उनकी बहन आइदान पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं। उन दिनों कलकत्ता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहां परफार्मिंग आर्टिस्टों, पटकथा लेखकों आदि की काफी मांग थी। इसी को ध्यान में रखकर नूरजहां का परिवार १९३० के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहां और उनकी बहन को वहां नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। उनकी गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार गुलाम हैदर ने उन्हें के डी मेहरा की पहली पंजाबी फिल्म शीला उर्फ पिंड दी कुड़ी में बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। १९३० के दशक के उत्तरा‌र्द्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए। गायकों की बढ़ती मांग को देखते हुए नूरजहां का परिवार १९३७ में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहां को गुल-ए-बकवाली फिल्म में भूमिका दी। इसके बाद उनकी यमला जट (१९४०), चौधरी फिल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने काफी लोकप्रिय हुए। वर्ष १९४२ में नूरजहां ने अपने नाम से बेबी शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फिल्म खानदान आई जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फिल्म के निर्देशक शौकत हुसैन रिजवी के साथ उन्होंने शादी की। वर्ष १९४३ में नूरजहां बंबई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वह अपने सभी समकालीनों से काफी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फिल्मों के आज भी दीवाने हैं। अनमोल घड़ी (१९४६) और जुगनू (१९४७) उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्म है। अनमोल घड़ी का संगीत नौशाद ने दिया था। उसके गीत आवाज दे कहां है, जवां है मोहब्बत, और मेरे बचपन के साथी जैसे गीत आज भी लोगों की जुबां पर हैं। नूरजहां विभाजन के बाद अपने पति के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं।

रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और उन्होंने शाहनूर स्टूडियो शुरू किया। शाहनूर प्रोडक्शन ने फिल्म चन्न वे (१९५०) का निर्माण किया जिसका निर्देशन नूरजहां ने किया। यह फिल्म बेहद सफल रही। इसमें तेरे मुखड़े पे काला तिल वे जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फिल्म दुपट्टा थी। इसके गीत चांदनी रातें...चांदनी रातें आज भी लोगों की जुबां पर हैं। जुगनू और चन्ना वे की ही तरह इसका भी संगीत फिरोज निजामी ने दिया था। नूरजहां की आखिरी फिल्म बतौर अभिनेत्री बाजी थी जो १९६३ में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में १४ फिल्में बनाईं जिसमें १० उर्दू फिल्में थीं। उन्होंने अपने से नौ साल छोटे एजाज दुर्रानी से दूसरी शादी की। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालांकि, उन्होंने गायन जारी रखा। पाकिस्तान में पा‌र्श्व गायक के तौर पर उनकी पहली फिल्म जान-ए-बहार (१९५८) थी। उन्होंने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फिल्मी कैरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में १० हजार गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान तमगा-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया गया था। दिल का दौरा पड़ने से नूरजहां का २३ दिसंबर २००० को निधन हो गया।
यह थी नूरजहां की संक्षिप्त जीवनी। वैसे क्या आपको पता है कि महज ४ सालों में हीं नूरजहां ने हिन्दी-फिल्मी संगीत के आसमान में अपनी स्थिति एक खुर्शीद-सी कर ली थी और इसी कारण इन्हें मल्लिका-ए-तरन्नुम कहा जाने लगा था और यकीन मानिए आज तक यह उपाधि उनसे कोई छीन नहीं पाया है। कहते हैं कि १९४७ में जब नूरजहां ने पाकिस्तान जाने का फैसला लिया था तो खुद युसूफ़ साहब यानि कि दिलीप कुमार ने इनसे हिन्दुस्तान में बने रहने का आग्रह किया था.. अलग बात है कि नूरजहां ने उनकी यह पेशकश यह कहकर ठुकरा दी थी कि "मैं जहां पैदा हुई हूं वहीं जाउंगी।" उनका निर्णय सही था या गलत यह तो वही जानें लेकिन शायद उनके इसी स्वाभिमान को कभी-कभार कुछ लोग उनका घमंड मान बैठते थे। उदाहरण के लिए: कथा-साहित्य के किंवदंती पुरुष सआदत हसन मंटो की नजर में वह मल्लिका-ए-तरन्नुम तो थीं, पर उन्हें वह बददिमाग और नखरेबाज मानते थे। ऐसा क्यों..अगर आप यह जानना चाहते हों तो नूरजहां के अगले गाने का इंतज़ार करें, तभी इस राज़ पर से परदा उठाया जाएगा। कहते हैं ना कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, इसलिए "थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए"।

इन बातों के बाद अब वक्त है आज की नज़्म का, जिसे हमने १९६८ में रीलिज हुई फिल्म अदालत से लिया है। नज़्म में संगीत है जनाब तस्सादक हुसैन का। बोल हैं....आप तो जानते हैं कि इस नज़्म में बोल किसके हैं। इस गीत में बड़े हीं तफ्शील से यह बताया गया है कि सही आदमी की पहचान कैसे की जाए। आपको भी जानना हो तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है आज की प्रस्तुति:

दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

किसी को तुझ से गिला तेरी बेरूखी का न हो,
जो हो चुका है तेरा तू अगर उसी का न हो,
फिर उसके वास्ते ये क़ायनात भी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

किसी के दिल की तू _____ है क़रार नहीं,
खिलाए फूल जो ज़ख्मों के वो बहार नहीं,
जो दूसरों के लिए ग़म हो वो खुशी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

ये क्या कि आग किसी की हो और कोई जले,
बने शरीक-ए-सफ़र जिसका उससे बचके चले,
जो फ़ासले न मिटा दे वो प्यार हीं क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सूरत" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

जो भी देखे उनकी सूरत
झुकी झुकी अंखियों से प्यार करे

नज़्म को सुनकर इस शब्द की सबसे पहले सही पहचान की सीमा जी ने। हमारी महफ़िल की शोभा बनना सीमा जी आपकी आदत हो चली है। बड़ी हीं भली आदत है..इसे कभी बिगड़ने मत दीजियेगा। ये रही आपकी पेशकश:

ऐ बादशाह्-ए-ख़बाँ-ए-जहाँ तेरी मोहिनी सुरत पे क़ुर्बाँ
की मैं ने जो तेरी जबीं पे नज़र मेरा चैन गया मेरी नींद गई (बहादुर शाह ज़फ़र)

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा
मेरी सुरत बावली बोली-
...मेरा कौन कसाला झेले? (माखनलाल चतुर्वेदी)

तुम्हारी सुरत पे आईना ठहरता नही
इस सुरत से जमाना गुजरता नही (अजय निदान)

शरद जी ने खुद के लिखे शेर के साथ महफ़िल में हाज़िरी लगाई। साथ-साथ आपने दूसरे शायरों के शेर भी कहे:

जब से मेघों से मुहब्बत हो गई है, सूर्य की धुंधली सी सूरत हो गई है,
झूमता है चन्द्र मुख को देख सागर, आदमी सी इसकी आदत हो गई है। (स्वरचित)

हालाते जिस्म सूरते जाँ और भी खराब, चारों तरफ़ खराब यहाँ और भी खराब,
सोचा था उनके देश में मंहगी है ज़िन्दगी, पर ज़िन्दगी का भाव वहाँ और भी खराब। (दुष्यन्त कुमार)

अजीब सूरते हालात होने वाली है, सुना है, अब के उसे मात होने वाली है,
मैं थक के गिरने ही वाला था उसके कदमों में, मेरी नफ़ी मेरा इसबात होने वाली है। (अमीर क़ज़लबाश)

अवध जी, आपने हबीब वली साहब की बेहतरीन गज़लों/नज़्मों का जो लेखाजोखा हमारे सामने रखा है, हम कोशिश करेंगे कि आने वाले दिनों में ये सारी हीं महफ़िल की रौनक बन जाएँ। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। ये रहे आपकी तरकश के तीर:

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती.
मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती. (मिर्ज़ा ग़ालिब)

या कोई जान बूझ कर अनजान बन गया
या फिर यही हुआ मेरी सूरत बदल गयी। (अदम)

आगे की महफ़िल को हर बार की तरह हीं शामिख जी ने अकेले संभाला। आपने कई सारे शेर पेश किए। हम उनमें से कुछ मोती चुनकर लाए हैं:

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग (क़तील शिफ़ाई)

कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से
टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को (गुलज़ार)

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती (निदा फ़ाज़ली)

वो प्यारी प्यारी सूरत, वो कामिनी सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना (इक़बाल)

मंजु जी , बड़ी देर कर दी आपने आने में। हमारी महफ़िल का पता भूल गई थीं क्या? कुछ और देर करतीं तो अगली महफ़िल में आपसे मिलना होता। यह रहा आपकी स्वरचित पंक्तियाँ:

जब -जब तुम मुझ से बिछुड़ते हो ,
तब -तब तेरी मोहिनी सूरत सूरज -चाँद -सी साथ निभाती है .

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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