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Tuesday, July 20, 2010

बाई दि वे, ऑन दे वे, "आयशा" से हीं कुछ सुनते-सुनाते चले जा रहे हैं जावेद साहब.. साथ में हैं अमित भी

ताज़ा सुर ताल २७/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! 'ताज़ा सुर ताल' में आज हम जिस फ़िल्म के गीतों को लेकर आए हैं, उसके बारे में तो हमने पिछली कड़ी में ही आपको बता दिया था, इसलिए बिना कोई भूमिका बाँधे आपको याद दिला दें कि आज की फ़िल्म है 'आयशा'।

सुजॊय - अमित त्रिवेदी के संगीत से सजे फ़िल्म 'उड़ान' के गानें पिछले हफ़्ते हमने सुने थे, और आज की फ़िल्म 'आयशा' में भी फिर एक बार उन्ही का संगीत है। शायद अब तक हम 'उड़ान' के गीतों को सुनते नहीं थके थे कि एक और ज़बरदस्त ऐल्बम के साथ अमित हाज़िर हैं। मैं कल जब 'आयशा' के गीतों को सुन रहा था विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगा कि 'देव-डी' और 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी 'आयशा' में अमित ने पैदा की है। इससे पहले कि वो ख़ुद को टाइप-कास्ट कर लेते और उनकी तरफ़ भी उंगलियाँ उठनी शुरु हो जाती, उससे पहले ही वे अपने स्टाइल में नयापन ले आए।

विश्व दीपक - 'आयशा' के गानें लिखे हैं जावेद अख़्तर साहब ने। पार्श्वगायक की हैसियत से में इस ऐल्बम में नाम शामिल हैं अमित त्रिवेदी, अनुष्का मनचन्दा, नोमान पिण्टो, निखिल डी'सूज़ा, रमण महादेवन, सम्राट कौशल, अनुषा मणि, ऐश किंग और तोची रैना की। दो एक नामों को छोड़ कर बाक़ी सभी नाम नए हैं। निखिल और नोमान की आवाज़ें हमने पिछले हफ़्ते की फ़िल्म 'उड़ान' में भी सुनी थी।

सुजॊय - अभी पिछले शनिवार की ही बात है, गायक अभिजीत 'ज़ी बांगला' के एक टॊक शो में पधारे थे। उसमें बातों बातों में जब आज के गीत संगीत की चर्चा छिड़ी, तो उन्होने कहा कि कुछ साल पहले तक लोग कुमार शानू, उदित नारायण, सोनू निगम, अभिजीत जैसी आवाज़ों को अलग अलग पहचानते थे, गीत सुन कर बोल देते थे कि किस संगीतकार की धुन है, लेकिन आज फ़िल्म संगीत ऐसा हो गया है कि गीत सुनने के बाद ना गायक के नाम का अनुमान लगाया जा सकता है और ना ही संगीतकार का। विश्व दीपक जी, आप बताइए, क्या आपको लगता है कि बहुत ज़्यादा फ़्रेश टैलेण्ट्स को अगर गायक के रूप में मौके दिए जाएँ तो फ़िल्मी गीतों की लोकप्रियता पर विपरीत असर पड़ेगा? मुझे कुछ कुछ ऐसा लगता है कि अत्यधिक नई आवाज़ें श्रोताओं को डिस्ट्रैक्ट करती है। किसी आवाज़ को लोगों के दिलों में बिठाने के लिए उससे कई गीत गवाने ज़रूरी हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं अभिजीत जी के बात से पूरी तरह सहमत नहीं। हाँ, इतना तो है कि हमें अपने स्थापित गायकों को मौका देते रहना चाहिए ताकि श्रोता भी उन स्थापित कलाकारों के नाम से खुद को जोड़ सकें। इससे गाने को भी लोकप्रियता हासिल होगी। लेकिन बस कुछ हीं कलाकारों के साथ काम करने से दूसरे प्रतिभावान गायकों की अनदेखी होने का खतरा है.. पुराने समय में इतनी सारी सुविधाएँ मौजूद नहीं थी इसलिए संगीतकारों के पास नए-नए लोग कम हीं आते थे.. पर अब "इंटरनेट बूम" के बाद अपनी आवाज़ को संगीतकार के पास पहुँचाने के हज़ार जरिये हैं और संगीतकार भी बस साज़ों के साथ प्रयोग करने तक हीं सीमित नहीं रहे, वे अब आवाज़ के साथ भी प्रयोग करना चाहते हैं। अब जब इतने सारे विकल्प उपलब्ध हैं तो वे एक हीं के साथ जुड़कर क्यों रहें? और फिर अगर किसी गायक में क्षमता है कि वो अपने आप को किसी संगीतकार के लिए "जरूरी" साबित कर दे तो संगीतकार भी दूसरे किसी विकल्प के बारे में नहीं सोचेगा। हर संगीतकार के पास ऐसे एक या दो गायक जरूर हीं होते है। आप "कैलाश खेर" , "सुखविंदर", "के के", "मोहित चौहान" या फिर "श्रेया घोषाल" को हीं देख लीजिए.. भले हीं हज़ार गायक हों, लेकिन इनकी आवाज़ अमूमन हर एलबम में सुनाई पड़ हीं जाती है। जहाँ तक "संगीत" सुनकर "संगीतकार" पहचानने की बात है तो अभी भी हर संगीतकार अपना एक स्पेशल टच जरूर हीं रखता है, जिसे सुनते हीं लोग संगीतकार का नाम जान लेते हैं। हाँ, कुछ गाने या फिर कुछ जौनर ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर संगीतकार के बारे में ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता, लेकिन मेरे हिसाब से यह अच्छी बात है। इससे साबित होता है कि हर संगीतकार आजकल आगे बढ रहा है, कोई भी एक जगह ठहरकर नहीं रहना चाहता। इसलिए सभी हर क्षेत्र में निपुण होने की कोशिश कर रहे हैं। यह "संगीत" के लिए अच्छी खबर है। नहीं तो पहले यह होता था कि अगर "ड्र्म्स" का इस्तेमाल सही हुआ है तो ये "एल-पी" हैं हैं। दूसरा कोई संगीतकार वैसा जादू तैयार कर हीं नहीं पाता था। आजकल टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो गई है कि ऐसी किसी कमी की संभावना हीं खत्म हो गई है।

सुजॊय - विश्व दीपक जी, इस बहस को विराम देते हैं और सुनते हैं फ़िल्म 'आयशा' का पहला गीत जिसे गाया है अमित त्रिवेदी और ऐश किंग ने।

गीत: सुनो आएशा


विश्व दीपक - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना। एक पेपी नंबर, लेकिन जिन साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, और ऒरकेस्ट्रेशन जिस तरह का किया गया है, अरेंजमेण्ट में एक नवीनता है। अमित का संगीत संयोजन किसी दूसरे संगीतकार से नहीं मिलता, यही उनकी ख़ासियत है। गाने का जो बेसिक रीदम पैटर्ण है, वो कुछ कुछ फ़िल्म 'दोस्ताना' के "जाने क्यों दिल चाहता है" गीत जैसा है, और कुछ कुछ "जब मिला तू" जैसा भी है। लेकिन ’आयशा' के इस गीत को इन गीतों से नर्म अंदाज़ में गाया गया है। ऐश किंग ने अमित का अच्छा साथ दिया है इस गीत में। आपको याद दिला दें कि ये वही ऐश किंग हैं जिन्होने पिछले साथ फ़िल्म 'दिल्ली-६' में "दिल गिरा दफ़्फ़तन" गाया था।

सुजॊय - आपने संगीत संयोजन का ज़िक्र किया, तो मैं इस बात पर प्रकाश डालना चाहूँगा कि इस गीत में सैक्सोफ़ोन का ख़ासा इस्तेमाल हुआ है, और इससे याद अया कि अभी हाल ही में जाने माने सैक्सोफ़ोनिस्ट मनोहारी सिंह, यानी कि मनोहारी दादा का देहावसान हो गया जो फ़िल्म इंडस्ट्री के मशहूर सैक्सोफ़ोनिस्ट और फ़्ल्युटिस्ट रहे हैं। तो इस गीत को हम अपनी तरफ़ से मनोहारी दादा के नाम डेडिकेट करते हुए उन्हे अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।

विश्व दीपक - यह बहुत अच्छी बात कही आपने। 'ताजा सुर ताल' के ज़रिए गुज़रे ज़माने के अज़ीम फ़नकारों को श्रद्धांजलि से बढ़कर और अच्छी बात क्या हो सकती है! चलिए इस थिरकते गीत से जो सुरीली शुरुआत हुई है इस ऐल्बम की, अब आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं फ़िल्म का दूसरा गीत तोची रैना की आवाज़ में।

गीत: गल मिठि मिठि (मीठी मीठी) बोल


सुजॊय - भई ऐसा कह सकते हैं कि 'आयशा' ऐल्बम में जो पंजाबी तड़का अमित त्रिवेदी ने लगाया है, उसी का स्वाद चख रहे थे हम। गीत के बोल भी पूरी तरह से पंजाबी हैं और पाश्चात्य रीदम और साज़ों के साथ फ़्युज़ किया गया है। बीट्स धीमी हैं और पंजाबी भंगड़े की तरह फ़ास्ट रीदम नहीं है। वैसे यह गीत आपको 'लव आजकल' के "आहुँ आहुँ" की याद दिला हीं जाता है। आपको याद दिला दें कि तोची रैना ने अमित त्रिवेदी के लिए "ओ परदेसी" गीत गाया था 'देव-डी' में जिसे ख़ूब सराहना मिली थी।

विश्व दीपक - युं तो आज के दौर में लगभग सभी फ़िल्मों में पंजाबी गीत होते ही हैं, लेकिन यह गीत लीक से हट के है। इस गीत में वो सब बातें मौजूद हैं जो इसे लोकप्रियता की पायदानों पे चढने में मदद करेंगे। देखते हैं जनता का क्या फ़ैसला होता है! और अब फ़िल्म का तीसरा गीत। यह है अमित त्रिवेदी और नोमान पिण्टो का गाया "शाम भी कोई जैसे है नदी"। जावेद साहब का शायराना अंदाज़ है इस गीत में, आइए सुनते हैं।

गीत: शाम भी कोई जैसे है नदी (बूम बूम बूम परा)


सुजॊय - यह गीत भी अपना छाप छोड़ हीं जाती है। अरेंजमेण्ट ऐसा है गाने का कि ऐसा लगता है जैसे कोई युवक हाथ में गीटार लिए आपके ही सामने बैठे गा रहा हो बिल्कुल लाइव! और यही बात आकर्षित करती है इस गीत की तरफ़। अमित और नोमान ने जिस नरमी और फ़ील के साथ गाने को गाया है, और धुन भी उतना ही मेलोडियस! एक कर्णप्रिय यूथ अपील इस गीत से छलकती है।

विश्व दीपक - हाँ, और यह तो बिल्कुल अमित त्रिवेदी टाइप का गाना है। इस गीत को रॉक शैली में भी बनाया जा सकता था, लेकिन उससे शायद फ़ील कम हो जाती। इस तरह के नरम बोलों के लिए इस तरह का म्युज़िक अरेंजमेण्ट बिलकुल सटीक है।

सुजॊय - अच्छा, हमने इस फ़िल्म के अभिनेताओं का ज़िक्र तो किया ही नहीं! फ़िल्म 'आयशा' में नायक हैं अभय देओल और नायिका हैं सोनम कपूर। यानी कि आयशा बनी हैं सोनम कपूर। सोनम भी फ़िल्म दर फ़िल्म अपने कैरियर की सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही हैं। 'दिल्ली-६' और ' आइ हेट लव स्टोरीज़' में उनके अभिनय को सराहा गया, और शायद 'आयशा' में भी वो सफल रहेंगी। अभय देओल अपना एक लो-प्रोफ़ाइल मेनटेन करते हैं लेकिन तीनों भाइयों की अगर बात करें तो मुझे तो सनी और बॊबी से ज़्यादा अभय की ऐकटिंग ज़्यादा जँचती है। ख़ैर, पसंद अपनी-अपनी ख़याल अपना-अपना। लीजिए सुनिए 'आएशा' का चौथा गाना।

गीत: बहके बहके नैन


विश्व दीपक - बहके बहके अंदाज़ में यह गीत गाया है अनुष्का मनचन्दा, सम्राट कौशल और रमण महादेवन ने। पूरी तरह से कारनिवल फ़ील लिए हुए है। हिंदी और अंग्रेज़ी के बोलों का संतुलित संगम है यह गीत। सम्राट और रमण ने जहाँ अंग्रेज़ी बोलों के साथ पूरा न्याय किया है, वहीं अनुष्का भी अपनी गायकी का लोहा मनवाने में कामयाब रही हैं। जिस तरह की अदायगी, जिस तरह का थ्रो इस गाने में चाहिए था, अनुष्का ने उसका पूरा पूरा ख़याल रखा। ऐकॊरडिओन की ध्वनियाँ इस गीत में सुनने को मिलती है, और जो हमें याद दिलाती है शंकर जयकिशन की।

सुजॊय - पूरी तरह से एक डांस नंबर है यह गीत और जैसा कि आपने कहा कि कारनिवल गीत, तो कुछ इसी तरह के कारनिवल गीतों की याद दिलाएँ आप सब को। फ़िल्म 'धूम' में "सलामी", 'धूम-२' में "टच मी डोण्ट टच मी सोणीया", 'हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड' में "प्यार की ये कहानी सुनों", ये सभी इसी जौनर में आते हैं।

विश्व दीपक - हाँ, और इन सब गीतों में करीबीयन, अरबी और कुछ कुछ गोवन (पोर्चुगीज़) संगीत की छाप नज़र आती है। और ऐसे गीतों में लैटिन नृत्य शैली का ख़ास तौर से प्रयोग होता है। इस गीत से एक मूड बन गया है, तो इस मूड को थोड़ा सा बदलते हुए एक बिल्कुल ही अलग किस्म का गीत सुनते हैं।

गीत: लहरें


सुजॊय - "खोयी खोयी सी हूँ मैं, क्यों ये दिल का हाल है, धुंधले सारे ख़्वाब हैं, उलझा हर ख़याल है, सारी कलियाँ मुरझा गईं, लोग उनके यादों में रह गए, सारे घरोंदे रेत के, लहरें आईं लहरों में मिल गए" - एक बेहतरीन गीत, शब्दों के लिहाज़ से, संगीत के लिहाज़ से और गायकी के लिहाज़ से भी। अनुषा मणि की मुख्य आवाज़ थी इस गीत में जिसे उन्होने एक हस्की फ़ील के साथ गाया। नोमान पिण्टो और निखिल डी'सूज़ा ने वोकल बैकिंग दी।

विश्व दीपक - हर तरह से यह गीत इस ऐल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत है, और हो सकता है कि अनुषा मणि पिछले साल "इकतारा" के कविता सेठ की तरह इस बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार हासिल कर लें। अब तक इस फ़िल्म के जितने भी गानें हमने सुनें, किसी भी गीत से हताशा नहीं हुई और हर एक गीत में कुछ ना कुछ अच्छी बात दिल को छू गई। तो अब जो इस फ़िल्म का एक अंतिम गीत बचा है, उसे भी सुनते चलें।

सुजॊय - ज़रूर!

गीत: बाइ दि वे


सुजॊय - जिस तरह से ऐल्बम की सुरीली शुरुआत हुई थी "सुनो आयशा" गीत के साथ, उतना ही धमाकेदार समापन हुआ अनुष्का मनचन्दा और नोमान पिण्टो के गाए इस फ़ास्ट डान्स नंबर से। इस रॉक पॊप सॊंग में अनुष्का जिस तरह से बोलती भी हैं, हमें फ़िल्म 'गजनी' में सुज़ेन डी'मेलो के गाए "ऐ बच्चु तू सुन ले" गीत की झलक दिखा जाती है।

"उड़ान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - कुल मुलाकर, इस ऐल्बम के बारे में मेरा तो यही ख़याल है कि 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी इस ऐल्बम में है और बहुत जल्द ही अमित त्रिवेदी पहले कतार के संगीतकारों में अपना स्थान पक्का कर लेंगे और उस राह पर वो बड़े पुख़्ता क़दमों से चल भी पड़े हैं। अनुष्का मनचन्दा को अगर इसी तरह से गाने के मौके मिलते रहें तो वो भी सुनिधि की तरह नाम कर सकती है ब-शर्ते कि वो अपनी वरसटायलिटी बनाए और इन तेज़ रफ़्तार रॉकक गीतों के बाहर भी दूसरे जौनर के गीतों को निभाने की कोशिश करे। अनुषा मणि के लिए शुभकामनाएँ कि आने वाले दिनों में वो अपनी क्षमता का और सबूत पेश करें। और अमित त्रिवेदी का संगीत जितना नवीन है, उनकी आवाज़ में भी वही ताज़गी है। और रही बात जावेद अख़्तर साहब, तो भई उनकी शान में और क्या कह सकते हैं, वो तो हैं ही नंबर वन!

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही कहा आपने। आयशा के गीतों के सुनने के बाद मुझे लग रहा है कि हमने पिछली दफ़ा जो "आयशा" के आने की घोषणा की थी तो हमारी वह उम्मीद पूरी तरह से सही हीं साबित हुई है। अमित के बारे में और क्या कहूँ, मैंने "उड़ान" के गीतों की समीक्षा के दौरान हीं अपना दिल खोल कर रख दिया था। हाँ, जावेद साहब की कही कुछ बातें आपसे जरूर बाँटना चाहूँगा। "आयशा" के "म्युजिक-रीलिज" के समय जावेद साहब ने हँसी-मज़ाक में हीं सही, लेकिन एक "गीतकार" की हालत जरूर बयान कर दी। उन्होने कहा कि आज का दिन मेरे लिए सबसे अच्छा दिन है, क्योंकि आज के बाद मुझे "रिया कपूर" (फिल्म की निर्माता और सोनम की छोटी बहन) के फोन नहीं आएँगे। आज के बाद कोई मुझसे यह नहीं कहेगा कि "मुखरा" बदल दीजिये या फिर "दूसरे अंतरा" की तीसरी पंक्ति "पुराने गानों" जैसी लग रही है, इसे हटाईये। जावेद साहब ने अपनी नानी/दादी का ज़िक्र करते हुए कहा कि वे मुझे डराने के लिए "भूत" का नाम लेती थीं और आजकल के निर्माता-निर्देशक मुझे डराने के लिए "यूथ" (युवा-पीढी) का नाम लेते हैं और कहते हैं कि यह "यूथ" की भाषा नहीं। आखिरकार जावेद साहब पूछ हीं बैठे कि भई यूथ की भाषा क्या है, उसकी कोई डिक्शनरी, उसका कोई ग्रामर तो होगा हीं। जिस किसी के पास वे किताबें हों, मुझे दे जाए, बड़ी हीं कृपा होगी। अगली फिल्म से मैं उस किताब को देखकर हीं गाने लिखूँगा। तो अगर यह हालत जावेद साहब की है, तो दूसरे गीतकारों के साथ क्या होता होगा। जब तक निर्माता, निर्देशक या दूसरा कोई और गीतकार के काम में दखल देना बंद नहीं करेगा, तब तक दिल को छूने वाले अच्छे गाने कहाँ से लिखे जाएँगें। जाते-जाते जावेद साहब ने गीतकार-संगीतकार के लिए बन रहे नए ऐक्ट की भी बात की, जिसमें गानों के राईट इन सबको भी हासिल होंगे। उन्होंने कहा कि जब गीतकार गाने का मालिक हो जाएगा तो फिर लोग उसे तुच्छ जीव समझने की भूल नहीं करेंगे। मुझे भी उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है। खैर, बात तो समीक्षा की हो रही थी और मैं न जाने कहाँ बह निकला। तो वापस आते हैं "आयशा" पे। मुझे पक्का यकीन है कि आप सबों को इसके सारे गाने पसंद आएँगे। इसी उम्मीद के साथ हम आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। अगली दफ़ा ऐसी हीं कोई फिल्म होगी.. शायद "पिपली लाईव" या "खट्टा-मीठा" या फिर कोई और हीं फिल्म। अभी कह नहीं सकता, जानने के लिए अगले "ताज़ा सुर ताल" का हिस्सा जरूर बनें।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७९- अमित त्रिवेदी के जोड़ीदार गीतकार रहे हैं अमिताभ भट्टाचार्य। इस फ़िल्म में जावेद अख़्तर का साथ अमित को मिला। तो बताइए कि इससे पहले जावेद साहब के लिखे किस गीत की धुन अमित त्रिवेदी ने बनाई थी?

TST ट्रिविया # ८०- हमने मनोहारी सिंह का ज़िक्र आज इस स्तंभ में किया। आपको बताना है कि मनोहारी दा ने सब से पहले किस हिंदी फ़िल्मी गीत में सैक्सोफ़ोन बजाया था?

TST ट्रिविया # ८१- गीतकार जावेद अख़्तर को आप फ़िल्म 'ठोकर' के मशहूर गीत "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ" से कैसे जोड़ सकते हैं? (इस नज़्म का ज़िक्र हमने महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर भी किया था)


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. कविता चौधरी।
२. 'यूं होता तो क्या होता'।
३. अमित त्रिवेदी (संगीतकार) और अमिताभ भट्टाचार्य (गीतकार) ने। (इस राज़ का पर्दाफ़ाश खुद अमित ने एक इंटरव्यु में किया था)।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!
तीसरा नहीं भी पता था तो तुक्का मार देतीं.. क्योंकि तुक्के में इन्हीं दोनों कलाकारों के नाम आने की ज्यादा संभावनाएँ हैं।.. खैर कोई बात नहीं.. इस बार के सवालों पर नज़र दौड़ाईये।

Tuesday, June 15, 2010

कहीं "मादनो" की मिठास से तो कहीं "मैं कौन हूँ" के मर्मभेदी सवालों से भरा है "मिथुन" के "लम्हा" का संगीत

ताज़ा सुर ताल २२/२०१०

विश्व दीपक - ’ताज़ा सुर ताल' में हम सभी का स्वागत करते हैं। तो सुजॊय जी, पिछले हफ़्ते कोई फ़िल्म देखी आपने?

सुजॊय - हाँ, 'राजनीति' देखी, लेकिन सच पूछिए तो निराशा ही हाथ लगी। कुछ लोगों को यह फ़िल्म पसंद आई, लेकिन मुझे तो फ़िल्म बहुत ही अवास्तविक लगी। सिर्फ़ बड़ी स्टारकास्ट के अलावा कुछ भी ख़ास बात नहीं थी। कहानी भी बेहद साधारण। ख़ैर, पसंद अपनी अपनी, ख़याल अपना अपना।

विश्व दीपक - पसंद की अगर बात है तो आज हम 'टी.एस.टी' में जिस फ़िल्म के गानें लेकर हाज़िर हुए हैं, मुझे ऐसा लगता है कि इस फ़िल्म के गानें लोगों को पसंद आने वाले हैं। आज ज़िक्र फ़िल्म 'लम्हा' के गीतों का।

सुजॊय - 'लम्हा' बण्टी वालिया व जसप्रीत सिंह वालिया की फ़िल्म है जिसमें मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं संजय दत्त, बिपाशा बासु, कुणाल कपूर, अनुपम खेर ने। निर्देशक हैं राहुल ढोलकिया। संगीत दिया है मिथुन ने, और यह फ़िल्म परदर्शित होने वाली है १६ जुलाई के दिन, यानी कि ठीक एक महीने बाद। जैसा समझ में आ रहा है कि कश्मीर के पार्श्व पर यह फ़िल्म आधारित है। इस फ़िल्म का म्युज़िक लौम्च किया गया है मुंबई के ओबेरॊय मॊल में।

विश्व दीपक - तो चलिए पहला गीत सुना जाए, और शायद यही गीत फ़िल्म का सब से पसंदीदा गीत बनने वाला है, "मादनो", यह गीत जिसे क्षितिज तारे और चिनमयी ने गाया है। बहुत ही ख़ूबसूरत गीत है, सुनते हैं। और हाँ, इस गीत की अवधि है ८ मिनट २६ सेकण्ड्स। वैसे आजकल गीतों की अवधि ५ मिनट से कम ही हो गई है, लेकिन इस फ़िल्म के अधिकतर गीत ६ मिनट से उपर की अवधि के हैं।

गीत: मादनो


सुजॊय - सच में, बेहद सुकूनदायक गीत था, जिसे दूसरे शब्दों में सॊफ़्ट रोमांटिक गीत कहते हैं। कम शब्दों में बस इतना ही कहेंगे कि ऐल्बम की एक अच्छी शुरुआत हुई है इस गीत से। मिथुन सच में एक रिफ़्रेशिंग अंदाज़ में वापस आए हैं। आपको यह भी बता दूँ कि "मादनो" एक कश्मीरी लफ़्ज़ है, जिसका अर्थ होता है "प्रिय"/"प्रेयसी"। इस शब्द को सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली थी महजूर के लिखे गाने "रोज़ रोज़ बोज़ में ज़ार मादनो" से , जिसे गाया था "ग़ुलाम हसन सोफ़ी" ने।

विश्व दीपक - क्योंकि मिथुन ने बहुत ज़्यादा काम नहीं किया है, इसलिए ज़ाहिर है कि लोगों को उनके बनाए गीतों की याद कम ही रहती है। तो जिन लोगों को मिथुन के गानें इस वक़्त याद नहीं आ रहे हैं, उनके लिए हम बता दे कि मिथुन की शुरुआत महेश भट्ट कैम्प में हुई थी फ़िल्म 'ज़हर' में जिसमें उन्होने "वो लम्हे, वो बातें कोई ना जाने" गीत आतिफ़ असलम से गवाया था। उसके बाद महेश भट्ट की ही एक और चर्चित फ़िल्म 'कलयुग' में भी उन्होने आतिफ़ की आवाज़ का इस्तेमाल किया था "अब तो आदत सी है मुझको जीने में" गीत में। इस तरह से 'बस एक पल' और 'अनवर' जैसी फ़िल्मों में भी उन्होने अतिथि संगीतकार की हैसीयत से एक आध गानें काम्पोज़ किए। इन फ़िल्मों ने भले हीं बहुत ज़्यादा व्यापार ना किया हो, लेकिन मिथुन का स्वरबद्ध हर एक गीत लोगों को पसंद आया, और मिथुन की प्रतिभा को हर किसी ने सराहा।

सुजॊय - और यकीनन 'लम्हा' का संगीत भी लोग खुले दिल से स्वीकार करेंगे। बहरहाल हम आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं इस फ़िल्म का दूसरा गीत जिसे गाया है अरुण दागा और मोहम्मद इरफ़ान ने। इस गीत की अवधि है ६ मिनट ५५ सेकण्ड्स।

गीत: सलाम ज़िंदगी


विश्व दीपक - पहले गीत से एक ख़ूबसूरत शुरुआत होने के बाद इस दूसरे गीत में भी एक नयापन है। बच्चों द्वारा गाए कश्मीरी बोलों को सुन कर एक तरफ़ फ़िल्म 'यहाँ' की याद आ जाती है तो कभी 'परिनीता' का "कस्तो मजा है" की भी झलक दिख जाती है।

सुजॊय - "जिस चीज़ को पाने की थी उम्मीद खो चुकी, उस चीज़ को पाकर बहुत दिल को ख़ुशी हुई, सलाम ज़िंदगी सलाम ज़िंदगी" - ये हैं गीत के बोल, और जैसा कि हम देख रहे है यह एक आशावादी गीत है और इस तरह के गानें बहुत बनें हैं, लेकिन इस गीत के अंदाज़ में नयापन है। पार्श्व में मोहम्मद इरफ़ान के शास्त्रीय अंदाज़ में गायन ने गीत को और ज़्यादा असरदार बनाया है। पहले गीत की तरफ़ हो सकता है कि यह गीत उतना अपील ना करे, लेकिन जो भी है, अच्छा गीत है।

विश्व दीपक - अब तीसरे गीत की बारी, और इस बार स्वर पलाश सेन का। बहुत दिनों से उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दी थी। इस गीत के साथ वो वापस लौट रहे हैं। अमिताभ वर्मा के ख़ूबसूरत बोलों को पलाश ने असरदार तरीके से ही निभाया है। संगीत में सॊफ़्ट रॊक का इस्तेमाल हुआ है। यह गीत है "मैं कौन हूँ" और इस गीत का म्युज़िक भी रिफ़्रेशिंग है। इसमें कोई शक़ नहीं कि मिथुन अपनी अलग पहचान बनाने की राह पर चल पड़े हैं। अवधि ७ मिनट ११ सेकण्ड्स।

गीत: मैं कौन हूँ


सुजॊय - आजकल गायक मिका को कई हिट गीत गाने के मौके मिल रहे हैं। या फिर युं कहिए कि मिका के गाए गानें हिट हो रहे हैं। भले ही कुछ लोग उन्हे पसंद ना करें और विवादों से भी घिरे रहे कुछ समय के लिए, लेकिन यह ध्यान देने योग्य बात है कि मिका के गाए गानें हिट हो जाते हैं। "दिल में बजी गिटार", "गणपत चल दारू ला", "मौजा ही मौजा", "इबन-ए-बतुता", और भी कई गानें हैं मिका के जो ख़ूब चले। फ़िल्म 'लम्हा' में भी मिथुन ने मिका से एक गीत गवाया है। दरसल यह पहले गीत "मादनो" का ही दूसरा वर्ज़न है, और मिका के साथ चिनमयी की आवाज़ भी शामिल है।

विश्व दीपक - ऐल्बम में इस गीत को "साजना" का शीर्षक दिया गया है। गीत को सुनने से पहले मिका का नाम देख कर मुझे लगा था कि कोई डान्स नंबर होगा, लेकिन काफ़ी आश्चर्य हुआ यह सुन कर कि मिका ने इस तरह का नर्मोनाज़ुक गीत गाया है। साधारणत: लोग मिका के जिस गायन शैली से वाक़ीफ़ हैं, उससे बिलकुल अलग हट के मिका लोगों को हैरत में डालने वाले हैं इस गीत के ज़रिए। यह तो भई वैसी ही बात है जैसी कि हाल ही में दलेर मेहन्दी ने फ़िल्म 'लाहौर' में "मुसाफ़िर" वाला गीत गाकर सब को चकित कर दिया था।

सुजॊय - इस पीढ़ी की अच्छी बात ही यह है कि वह प्रचलित धारा का रुख़ बदलने में विश्वास रखता है। पहले के ज़माने में जो गायक जिस तरह के गीत गाते थे, उनसे लगातार उसी तरह के गीत गवाए जाते थे। लेकिन आजकल कोशिश यही होती है हर कलाकार की कि कुछ नया किया जाए, नए प्रयोग किए जाएँ। चलिए यह गीत सुन लेते हैं। कुल ८ मिनट २५ सेकण्ड्स।

गीत: साजना


विश्व दीपक - अगला गीत क्षितिज तारे की आवाज़ मे है। कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है। के.के के अंदाज़ का गाना है। वैसे क्षितिज ने कमाल का गाया है, लेकिन इसे के.के. की आवाज़ में सुन कर भी उतना ही अच्छा लगता ऐसा मेरा ख़याल है।

सुजॊय - विश्व दीपक जी, शायद आपने ध्यान न दिया हो कि क्षितिज मिथुन के पसंदीदा गायक हैं। मिथुन ने इनसे इस फिल्म से पहले भी कई सारे गीत गवाए हैं। मुझे "अनवर" का "तोसे नैना लागे" अभी भी याद है। क्या खूब गाया था "क्षितिज" और "शिल्पा राव" ने। जहाँ तक आज के इस गीत की बात है तो यह गीत पार्श्व संगीत की तरह प्रतीत होता है। सिचुएशनल गीत है और फ़िल्म को देखते हुए ही इस गीत का महत्व पता चल सकता है। ऒरकेस्ट्रेशन से एम.एम. क्रीम की याद भी आ जाती है, क्योंकि ग्रूप वायलिन्स का इस्तेमाल हुआ है।

गीत: ज़मीन-ओ-आसमान


विश्व दीपक - और अंतिम गीत में मिथुन ने अपनी गायकी का भी लोहा मनवाया है। आजकल 'पाक़ी-पॊप' संगीत का भी चलन है, और इस गीत में उसी की झलक है। याद है ना आपको मिथुन का गाया फ़िल्म 'दि ट्रेन' का गीत "वो अजनबी देखे जो दूर से"?

सुजॊय - अच्छा इसी फ़िल्म 'दि ट्रेन' में एक और गीत है "मौसम" जिसे लिखा है आतिफ़ असलम ने। तो ज़्यादातर लोग समझते हैं कि इस गीत को आतिफ़ ने ही गाया है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि इसे स्वरबद्ध किया और गाया मिथुन ने है। मिथुन ने फ़िल्म 'अगर' में गाया था "के बिन तेरे जीना नहीं" जिसे भी लोगों ने पसंद किया था। तो लीजिए आज एक लम्बे समय के बाद सुनिए मिथुन की आवाज़ और उनके साथ हैं मोहम्मद इरफ़ान।

गीत: रहमत ज़रा


"लम्हा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

मिथुन से हमेशा हीं उम्मीदें रहती है, और इस बार मिथुन उम्मीद पर खड़े उतरे हैं। चूँकि फिल्म कश्मीर पर आधारित है, इसलिए मिथुन को कहानी से भी सहायता मिली... अपनी तरह का संगीत देने में। फिल्म चाहे सफल या हो असफल , लेकिन हम लोगों से यही दरख्वास्त करेंगे कि गानों को नज़र-अंदाज़ न करें। एक बार जरूर सुनें, हमें यकीन है कि एक बार सुनने के बाद आप खुद-बखुद इन गानों से खुद को जुड़ा महसूस करेंगे। इन्हीं बातों के साथ अगली समीक्षा तक के लिए हम आपसे अलविदा कहते हैं।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६४- संगीतकार व गायक मिथुन के पिता एक जाने माने बैकग्राउण्ड स्कोरर थे जिन्होने २०० से उपर फ़िल्मों का पार्श संगीत तय्यार किया है। बताइए उनका नाम।

TST ट्रिविया # ६५- २००८ में मिथुन ने एक ऐसी फ़िल्म में संगीत दिया था जिस शीर्षक से एक हास्य फ़िल्म बनी थी जिसमें फ़ारूख़ शेख़ नायक थे और जिसमें येसुदास और हेमन्ती शुक्ला का गाया एक लोकप्रिय युगल गीत था।

TST ट्रिविया # ६६- आप एक मेडिकल डॊकटर हैं, और एक उम्दा गायक भी हैं, एक अभिनेता भी हैं। आपका जन्म बनारस में हुआ और पले बढ़े दिल्ली में। "फ़िल्हाल" दोस्तों, आप यह बताएँ कि हम किस शख़्स की बात कर र्हे हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. हिमेश रेशम्मिया के पिता विपिन रेशम्मिया ने ख़य्याम साहब के ऒर्केस्ट्रा में काम करते हुए इस गीत की रिकार्डिंग में रीदम बॊक्स साज़ बजाया था।
२. 'दुल्हन हम ले जाएँगे' फ़िल्म का गीत "रात को आऊँगा मैं.... मुझसे शादी करोगी"।
३. सुधाकर शर्मा।

सीमा जी, इस बार आपने दो सवालों के जवाब दिए, जिनमें से एक हीं सही है। खैर.. इस बार के सवाल आपके सामने हैं।

Tuesday, June 8, 2010

रब्बा लक़ बरसा.... अपनी फ़िल्म "कजरारे" के लिए इसी किस्मत की माँग कर रहे हैं हिमेश भाई

ताज़ा सुर ताल २१/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़े अंक के साथ हम हाज़िर हैं। विश्व दीपक जी, इस शुक्रवार को 'राजनीति' प्रदर्शित हो चुकी हैं, और फ़िल्म की ओपनिंग अच्छी रही है ऐसा सुनने में आया है, हालाँकि मैंने यह फ़िल्म अभी तक देखी नहीं है। 'काइट्स' को आशानुरूप सफलता ना मिलने के बाद अब देखना है कि 'राजनीति' को दर्शक किस तरह से ग्रहण करते हैं। ख़ैर, यह बताइए आज हम किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं।

विश्व दीपक - आज हम सुनेंगे आने वाली फ़िल्म 'कजरारे' के गानें।

सुजॊय - यानी कि हिमेश इज़ बैक!

विश्व दीपक - बिल्कुल! पिछले साल 'रेडियो - लव ऑन एयर' के बाद इस साल का उनका यह पहला क़दम है। 'रेडियो' के गानें भले ही पसंद किए गए हों, लेकिन फ़िल्म को कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली थी। देखते हैं कि क्या हिमेश फिर एक बार कमर कस कर मैदान में उतरे हैं!

सुजॊय - 'कजरारे' को पूजा भट्ट ने निर्देशित किया है, जिसके निर्माता हैं भूषण कुमार और जॉनी बक्शी। फ़िल्म के नायक हैं, जी हाँ, हिमेश रेशम्मिया, और उनके साथ हैं मोना लायज़ा, अमृता सिंह, नताशा सिन्हा, गौरव चनाना और गुल्शन ग्रोवर। संगीत हिमेश भाई का है और गानें लिखे हैं हिमेश के पसंदीदा गीतकार समीर ने। तो विश्व दीपक जी, शुरु करते हैं गीतों का सिलसिला। पहला गीत हिमेश रेशम्मिया और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में। इस गीत को आप एक टिपिकल हिमेश नंबर कह सकते हैं। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल हुआ है। हिमेश भाई के चाहनेवालों को ख़ूब रास आएगा यह गीत।

गीत: कजरा कजरा कजरारे


विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने की शुरुआत मुझे पसंद आई। जिस तरह से "सुनिधि चौहान" ने "कजरा कजरा कजरारे" गाया है, वह दिल के किसी कोने में एक नटखटपन जगा देता है और साथ हीं सुनिधि के साथ गाने को बाध्य भी करता है। मुझे आगे भी सुनिधि का यही रूप देखने की इच्छा थी, लेकिन हिमेश ने अंतरा में सुनिधि को बस "चियर लिडर" बना कर रख दिया है और गाने की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली है। हिमेश की आवाज़ इस तरह के गानों में फबती है, लेकिन शब्दों का सही उच्चारण न कर पाना और अनचाही जगहों पर हद से ज्यादा जोर देना गाने के लिए हानिकारक साबित होते हैं। हिमेश "उच्चारण" संभाल लें तो कुछ बात बने। खैर अब हम दूसरे गाने की ओर बढते हैं।

सुजॊय - अब दूसरा गीत भी उसी हिमेश अंदाज़ का गाना है। उनकी एकल आवाज़ में सुनिए "रब्बा लक बरसा"। इस गीत में महेश भट्ट साहब ने वायस ओवर किया है। गाना बुरा नहीं है, लेकिन फिर एक बार वही बात कहना चाहूँगा कि अगर आप हिमेश फ़ैन हैं तो आपको यह गीत ज़रूर पसंद आएगा।

विश्व दीपक - जी आप सही कह रहे हैं। एक हिमेश फ़ैन हीं किसी शब्द का बारंबार इस्तेमाल बरदाश्त कर सकता है। आप मेरा इशारा समझ गए होंगे। हिमेश/समीर ने "लक लक लक लक" इतनी बार गाने में डाला है... कि "शक लक बूम बूम" की याद आने लगती है और दिमाग से यह उतर जाता है कि इस "लक़" का कुछ अर्थ भी होता है। एक तो यह बात मुझे समझ नहीं आई कि जब पूरा गाना हिन्दी/उर्दू में है तो एक अंग्रेजी का शब्द डालने की क्या जरूरत थी। मिश्र के पिरामिडों के बीच घूमते हुए कोई "लक लक" बरसा कैसे गा सकता है। खैर इसका जवाब तो "समीर" हीं दे सकते हैं। हाँ इतना कहूँगा कि इस गाने में संगीत मनोरम है, इसलिए खामियों के बावजूद सुनने को दिल करता है। विश्वास न हो तो आप भी सुनिए।

गीत: रब्बा लक़ बरसा


सुजॊय - अब इस एल्बम का तीसरा गीत और मेरे हिसाब से शायद यह इस फ़िल्म का सब से अच्छा गीत है। हिमेश रेशम्मिया के साथ इस गीत में आवाज़ है हर्षदीप कौर की। एक ठहराव भरा गीत है "आफ़रीन", जिसमें पारम्परिक साज़ों का इस्तेमाल किया गया है। ख़ास कर ढोलक का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है गीत में। भले ही हर्षदीप की आवाज़ मौजूद हो गीत के आख़िर में, इसे एक हिमेश रेशम्मिया नंबर भी कहा जा सकता है।

विश्व दीपक - जी यह शांत-सा, सीधा-सादा गाना है और इसलिए दिल को छू जाता है। इस गाने के संगीत को सुनकर "तेरे नाम" के गानों की याद आ जाती है। हर्षदीप ने हिमेश का अच्छा साथ दिया है। हिमेश कहीं-कहीं अपने "नेजल" से अलग हटने की कोशिश करते नज़र आते हैं ,लेकिन "तोसे" में उनकी पोल खुल जाती है। अगर हिमेश ऐसी गलतियाँ न करें तो गीतकार भी खुश होगा कि उसके शब्दों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि यह गाना एल्बम के बाकी गानों से बढिया है। तो लीजिए पेश है यह गाना।

गीत: आफ़रीन


सुजॊय - फ़िल्म का चौथा गीत भी एक युगल गीत है, इस बार हिमेश का साथ दे रहीं हैं श्रेया घोषाल। गीत के बोल हैं "तुझे देख के अरमान जागे"। आपको याद होगा अभी हाल ही में फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' में एक गीत आया था "वाल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा"। तो भई हम तो यहाँ पर यही कहेंगे कि वाल्युम कम कर नहीं तो पूरा मोहल्ला जग जाएगा। जी हाँ, "तुझे देख के अरमान जागे" के शुरु में हिमेश साहब कुछ ऐसी ऊँची आवाज़ लगाते हैं कि जिस तरह से उनके "झलक दिखला जा" गीत को सुन कर गुजरात के किसी गाँव में भूतों का उपद्रव शुरु हो गया था, अब की बार तो शायद मुर्दे कब्र खोद कर बाहर ही निकल पड़ें! ख़ैर, मज़ाक को अलग रखते हुए यह बता दूँ कि आगे चलकर हिमेश ने इस गीत को नर्म अंदाज़ में गाया है और श्रेया के आवाज़ की मिठास के तो कहने ही क्या। वो जिस गीत को भी गाती हैं, उसमें मिश्री और शहद घोल देती हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्यों न लगे हाथों पांचवाँ गीत भी सुन लिया जाए| क्योंकि यह गीत भी हिमेश रेशम्मिया और श्रेया घोषाल की आवाजों में हीं है, और अब की बार बोल हैं "तेरीयाँ मेरीयाँ"। दोस्तों, जिस गीत में "ँ" का इस्तेमाल हो और अगर उस गाने में आवाज़ हिमेश रेशम्मिया की हो, तो फिर तो वही सोने पे सुहागा वाली बात होगी ना! नहीं समझे? अरे भई, मैं हिमेश रेशम्मिया के नैज़ल अंदाज़ की बात कर रहा हूँ। इस गीत में उन्हे भरपूर मौका मिला है अपनी उस मनपसंद शैली में गाने का, जिस शैली के लिए वो जाने भी जाते हैं और जिस शैली की वजह से वो एकाधिक बार विवादों से भी घिर चुके हैं। जहाँ तक इस गीत का सवाल है, संतूर की ध्वनियों का सुमधुर इस्तेमाल हुआ है। वैसे यह मैं नहीं बता सकता कि क्या असल में संतूर का प्रयोग हुआ है या उसकी ध्वनियों को सीन्थेसाइज़र के ज़रिये पैदा किया गया है। जो भी है, सुरीला गीत है, लेकिन श्रेया को हिस्सा कम मिला है इस गानें में।

गीत: तुझे देख के अरमान जागे


गीत: तेरीयां मेरीयां


सुजॊय - विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगता है कि हिमेश रेशम्मिया जब भी कोई फ़िल्म करते हैं, तो अपने आप को ही सब से ज़्यादा सामने रखते हैं। बाके सब कुछ और बाकी सब लोग जैसे पार्श्व में चले जाते हैं। यह अच्छी बात नहीं है। अब आप उनकी कोई भी फ़िल्म ले लीजिए। वो ख़ुद इतने ज़्यादा प्रोमिनेन्स में रहते हैं कि वो फ़िल्म कम और हिमेश रेशम्मिया का प्राइवेट ऐल्बम ज़्यादा लगने लगता है। दूसरी फ़िल्मों की तो बात ही छोड़िए, 'कर्ज़', जो कि एक पुनर्जन्म की कहानी पर बनी कामयाब फ़िल्म का रीमेक है, उसका भी यही हाल हुआ है। ख़ैर, शायद यही उनका ऐटिट्युड है। आइए अब इस फ़िल्म का अगला गीत सुनते हैं "वो लम्हा फिर से जीना है"। हिमेश और हर्षदीप कौर की आवाज़ें, फिर से वही हिमेश अंदाज़। एक वक़्त था जब हिमेश के इस तरह के गानें ख़ूब चला करते थे, देखना है कि क्या बदलते दौर के साथ साथ लोगों का टेस्ट भी बदला है या फिर इस गीत को लोग ग्रहण करते हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने के साथ हीं क्यों न हम फ़िल्म का अंतिम गाना भी सुन लें| हिमेश और सुनिधि की आवाज़ें, और एक बार फिर से हिमेश का नैज़ल अंदाज़। ढोलक के तालों पर आधारित इस लोक शैली वाले गीत को सुन कर आपको अच्छा लगेगा। जैसा कि अभी अभी आपने कहा कि आजकल हिमेश जिस फ़िल्म में काम करते हैं, बस वो ही छाए रहते हैं, तो इस फ़िल्म में भी वही बात है। हर गीत में उनकी आवाज़, हर गाना वही हिमेश छाप। अपना स्टाइल होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन अगर विविधता के लिए थोड़ा सा अलग हट के किया जाए तो उसमें बुराई क्या है? ख़ैर, मैं अपना वक्तव्य यही कहते हुए समाप्त करूँगा कि 'कजरारे' पूर्णत: हिमेश रेशम्मिया की फ़िल्म होगी।

गीत: वो लम्हा फिर से जीना है


गीत: सानु गुज़रा ज़माना याद आ गया


"कजरारे" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***

सुजॊय - हिमेश के चाहने वालों को पसंद आएँगे फ़िल्म के गानें, और जिन्हे हिमेश भाई का गीत-संगीत अभी तक पसंद नहीं आया है, उन्हें इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, मैं तो ये कहूँगा की उन्हें इस एल्बम से दूर ही रहना चाहिए|

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मुझे यह लगता है कि हमें इस एल्बम को सिरे से नहीं नकार देना चाहिए, क्योंकि संगीत बढ़िया है और कुछ गाने जैसे कि "रब्बा लक़ बरसा", "कजरारे" और "आफरीन" खूबसूरत बन पड़े हैं| हाँ इतना है कि अगर हिमेश ने अपने अलावा दूसरों को भी मौक़ा दिया होता तो शायद इस एल्बम का रंग ही कुछ और होता| लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हिमेश भाई और पूजा भट्ट को जो पसंद हो, हमें तो वही सुनना है| मैं बस यही उम्मीद करता हूँ कि आगे चलकर कभी हमें "नमस्ते लन्दन" जैसे गाने सुनने को मिलेंगे... तब तक के लिए "मिलेंगे मिलेंगे" :)

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६१- "शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम", इस गीत के साथ हिमेश रेशम्मिया का क्या ताल्लुख़ है?

TST ट्रिविया # ६२- "आपको कैसा लगेगा अगर मैं आपको नए ज़माने का एक गीत सुनाऊँ जिसमें ना कोई ख़त, ना इंतेज़ार, ना झिझक, ना कोई दर्द, बस फ़ैसला है, जिसमें हीरो हीरोइन को सीधे सीधे पूछ लेता है कि मुझसे शादी करोगी?" दोस्तॊम, ये अल्फ़ाज़ थे हिमेश रेशम्मिया के जो उन्होने विविध भारती पर जयमाला पेश करते हुए कहे थे। तो बताइए कि उनका इशारा किस गाने की तरफ़ था?

TST ट्रिविया # ६३- गीतकार समीर के साथ जोड़ी बनाने से पहले हिमेश रेशम्मिया की जोड़ी एक और गीतकार के साथ ख़ूब जमी थी जब उनके चुनरिया वाले गानें एक के बाद एक आ रहे थे और छा रहे थे। बताइए उस गीतकार का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. पेण्टाग्राम
२. सोना महापात्रा
३. "give me some sunshine, give me some rain, give me another chance, I wanna grow up once again".

आलोक, आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए, इसलिए आपको पुरे अंक मिलते हैं| सीमा जी, इस बार आप पीछे रह गईं| खैर कोई बात नहीं, अगली बार......

Tuesday, May 11, 2010

प्रीतम लाए हैं बदमाश कम्पनी वाली अय्याशी तो शंकर एहसान लॊय के साथ है धन्नो की हाउसफुल महफ़िल

ताज़ा सुर ताल १८/२०१०

सुजॊय - विश्व दीपक जी, साल २०१० के चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वह एक गीत अभी तक नहीं आ सका है जिसे इस साल का 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' कहा जा सकता हो। मेरे हिसाब से तो इस साल का संगीत कुछ ठंडा ठंडा सा चल रहा है। आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं आपकी बात से एक हद तक सहमत हूँ। फिर भी मुझे न जाने क्यों "रावण" के "रांझा-रांझा" से ढेर सारी उम्मीदें हैं। अभी तक जितने भी गाने इस साल आए हैं, यह गाना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। आगे क्या होगा, यह कहा तो नहीं जा सकता, लेकिन बस चार महीने में 'सॊंग ऒफ़ दि ईयर' का निर्णय कर देना तो जल्दीबाजी हीं होगी। इसलिए धैर्य रखिए.... मुझे पूरा विश्वास है कि बाकी के आठ महीनों में कुछ न कुछ कमाल तो ज़रूर हीं होगा, नहीं तो रावण है हीं। खैर ये बताईये कि आज हम किस फिल्म या फिर किन फ़िल्मों के गानों की चर्चा करने जा रहे हैं।

सुजॊय - आज हमने इस स्तंभ के लिए दो ऐसी फ़िल्मों के तीन-तीन गीत चुने हैं जो फ़िल्में हाल ही में प्रदर्शित हो चुकी हैं। ये दो फ़िल्में हैं 'बदमाश कंपनी' और 'हाउसफ़ुल'। हमने जब रावण के संगीत की समीक्षा की थी, तब हीं इन दो फिल्मों का ज़िक्र आया था, लेकिन ’रहमान’ के नाम के कारण रावण को तवज्जो देनी पड़ी। आज दो हफ़्तों के बाद हमें फिर से इन पर नज़र दौराने का मौका मिला है। तो हम इस समीक्षा की शुरूआत 'बदमाश कंपनी' के गीतों से करते हैं। इस फिल्म के रिव्यूज तो कुछ अच्छे नहीं सुनाई दे रहे। कहानी में भी ज़्यादा दम नहीं है, वही चार दोस्तों की शॊर्ट-कट वाले रस्ते में चलकर अमीर बनने की कहानी।

विश्व दीपक - शाहिद कपूर, अनुश्का, वीर दास और मेयांग चैंग इस फ़िल्म के चार मुख्य किरदार हैं। ध्यान देने वाली बात है कि मेयांग चैंग, जो कि पिछले साल 'इंडियन आइडल' के अच्छे गायकों में से एक रहे हैं, इस फ़िल्म में उनकी आवाज़ में कोई भी गीत नहीं है। मुझे यह बात थोड़ी खली ज़रूर। लेकिन क्या कर सकते हैं। निर्णय तो संगीतकार और निर्देशक का हीं होता है। वैसे आपको बता दें कि फ़िल्म में संगीत प्रीतम का है और शाहिद कपूर के साथ उनके गानें ख़ूब कामयाब रहे हैं जैसे कि 'जब वी मेट', 'किस्मत कनेक्शन', 'दिल बोले हड़िप्पा' आदि।

सुजॊय - शाहिद कपूर को अगर इस दौर का जम्पिंग जैक जीतेन्द्र कहा जाए तो गलत न होगा। और प्रीतम के थिरकन भरे गानों को वो अपनी दमदार डान्स से सार्थक बनाते भी हैं। 'बदमाश कंपनी' में भी तेज़ रीदम के कई गीत हैं। जैसे कि पहला गीत जो हम सुनवाने जा रहे हैं "चस्का चस्का लगा है"। सुनते हैं कृष्णा और साथियों की आवाज़ में यह गीत। इस गीत के बारे में यही कह सकते हैं कि विशाल भारद्वाज ने 'कमीने' के "ढैन ट नैन" में जिस तरह के जीवन शैली जीने वाले युवाओं को दर्शाया है, "चस्का" में वही कोशिश सुनाई देती है लेकिन यह गीत ख़ास असर नहीं करती, और एक बहुत ही एवरेज गीत है मेरे ख़याल में।

विश्व दीपक - गीत के अरैंजमेण्ट में ज़्यादा ध्यान दिया गया है और तेज़ रीदम के बीच कृष्णा की आवाज़ बैकग्राउंड में जैसे सुनाई देती है और ड्रम बीट्स ही फ़ोरग्राउंड पर पूरे गीत में छाए हुए हैं। फ़िल्म की गीतकारा अन्विता दत्त गुप्तन ने कोशिश तो अच्छी की है गुलज़ार साहब की तरह वही "ढैन ट नैन" वाला अंदाज़ लाने की, लेकिन वो उसमें कितनी सफल हुईं हैं, यह आप ख़ुद ही गीत को सुन कर निर्णय लीजिए। वैसे अगर आप मुझसे पूछें तो मुझे "ताजी/भाजी करारी है, भून के उतारी है, किस्मत गरमा-गरम" जैसे प्रयोग बेहद पसंद आते हैं। और इस लिहाज से मुझे इस गाने के बोल जबरदस्त तो नहीं कहूँगा लेकिन हाँ अच्छे जरूर लगे। चलिए तो सुनते हैं "चस्का"।

गीत: चस्का चस्का


सुजॊय - जब फ़िल्म की कहानी ही ऐसी है कि चार युवा जो ग़लत राह इख़्तियार कर अमीर बनने की कोशिश में लगे हैं एक आलीशान ज़िंदगी पाने की चाहत में, तो ऐसे में अगर फ़िल्म के किसी गीत का मुखड़ा हो "सर चढ़ी है ये अय्याशी", तो इसमें गीतकार को दोष देना ग़लत होगा। जी हाँ, इस फ़िल्म के एल्बम का पहला गीत ही है "अय्याशी"। के. के और साथियों का गाया हुआ गीत है। के. के ने अपनी रॊक शैली वाले अंदाज़ में इस गीत को बखूबी निभाया है। पहले भी मैंने कहा था, आज दोहरा रहा हूँ कि के.के एक ऐसे गायक हैं जिनकी चर्चा बहुत कम होती है, लेकिन वो अपने हर गीत में अपना १००% देते हैं। आजकल वैसे उनकी आवाज़ में 'काइट्स' का गीत "ज़िंदगी दो पल की" गली गली गूँज रहा है।

विश्व दीपक - जहाँ तक "अय्याशी" का सवाल है, प्रीतम की टेक्नो ईलेक्ट्रॊनिक धुनें गीत के बोलों पर हावी होते सुनाई देती हैं। हिप हॊप और 'डेथ रॊक मेटल' का मिला जुला संगम है इस गीत का संगीत। इस गीत का भाव फ़िल्म के कहानी के साथ जाता है और प्रोमोज़ भी इसी गीत के ज़रिए किया गया है कई दिनों तक। बहुत ज़्यादा इम्प्रेसिव तो नहीं कहेंगे, लेकिन कहानी के हिसाब से ठीक ठाक है।

गीत: अय्याशी


विश्व दीपक - और अब सूफ़ी रंग। आज के दौर का यह चलन बन चुका है कि हर फ़िल्मकार अपनी फ़िल्म में कम से कम एक सूफ़ियाना अंदाज़ का गीत डालने की कोशिश कर रहा है। 'बदमाश कंपनी' में भी प्रीतम ने राहत फ़तेह अली ख़ान से एक ऐसा ही गीत गवाया है, लेकिन पाश्चात्य संगीत के साथ सूफ़ी का ऐसा फ़्युज़न किया है कि गीत कुछ अलग ही शक्ल में सामने आता है। "फ़कीरा" को हम एक 'सूफ़ी-रॊक' गीत कह सकते हैं।

सुजॊय - इससे पहले प्रीतम के संगीत में फ़िल्म 'दे दना दन' में "रिश्ते नाते हंस के तोड़ दूँ" गीत गाया था राहत साहब ने, जिसमें एक सुकून एक मिठास थी। लेकिन इस गीत पर इतना ज़्यादा रॊक का रंग चढ़ा दिया गया है कि गीत की आत्मा कहीं खो सी गई है। यह भी मेरे ख़याल से एक ऐवरेज गीत है और राहत साहब जैसे गायक के होते हुए भी गाना दिल को ज़्यादा छू नहीं पाया। आगे आप सुनिए और बताइए कि आपको इस गीत के बारे में क्या कहना है।

गीत: फ़कीरा


विश्व दीपक - और अब आज की दूसरी फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' के तीन गीतों की बारी। अक्षय कुमार, अर्जुन रामपाल, रितेश देशमुख, दीपिका पादुकोन, लारा दत्ता, जिया ख़ान, चंकी पाण्डेय जैसे मल्टी स्टार कास्ट वाली यह हास्य फ़िल्म लोगों को पसंद आ रही है ऐसा सुनने में आया है। फ़िल्म में संगीत शंकर अहसान लॊय का है।

सुजॊय - यह फ़िल्म भले ही अपनी कॊमेडी की वजह से लोगों को आकर्षित कर रही है, लेकिन गीत संगीत में उतना दम नहीं है। यह इसलिए भी हो सकता है क्योंकि इस फिल्म में ऐसे गानों की हीं ज़रूरत है जो लोगों को थिरकाएँ। लोग इन गानों को भविष्य में याद रखते हैं या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। आपको याद होगा कि "हे बेबी" में भी इस तिकड़ी ने ऐसे हीं गाने दिए थे। तो इन गानों में से पहला गीत जो हम सुनने जा रहे हैं वह है "ओ गर्ल, यू आर माइन"। तरुण सागर, अलीसा मेनडॊन्सा और लॊय ने इस गीत को गाया है। गाने का रीदम कैची है, शुरुआती संगीत में जो हारमोनिका सुनाई देता है, वह भी पहली बार सुनने वाले को आकर्षित करता है। आजकल यही गीत हर टीवी चैनल और रेडियो चैनल पर सुनाई दे रहा है। और चलिए यहाँ भी इस गीत को सुना जाए शुरु से लेकर आख़िर तक।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, गाना तो हम सुन हीं लेंगे लेकिन क्या आपने ध्यान दिया कि "तरूण सागर" का नाम बेहद अनजाना तो कुछ-कुछ जाना-पहचाना-सा है। दर-असल तरूण पिछली साल के "सारेगामापा" में एक प्रतिभागी थे, विजयी तो नहीं हुए, लेकिन शंकर महादेवन की नज़रों में आ गए और फिर देखिए किस्मत उन्हें कहाँ से कहाँ ले गई। पहली हीं फिल्म में शंकर के लिए गाना कोई छोटी बात नहीं है। "ओ गर्ल" के बाद हम जो गाना सुनेंगे, उसमें भी एक नई गायिका हैं "रीतु पाठक"। तरूण जहाँ सारेगामापा के प्रतिभागी थे तो रीतु "इंडियन आईडल" की। शंकर-एहसान-लॊय ने इन दोनों गलाकारों को एक बहुत हीं मज़बूत मंच दिया है। मैं तो यही दुआ करता हूँ कि ये दोनों संगीत की दुनिया में बहुत आगे जाएँ और ऐसे हीं एक से बढकर एक गाने गाते रहें। हाँ तो अब सुनते हैं वो गीत:

गीत: ओ गर्ल यू आर माइन


सुजॊय - आजकल फ़िल्मी गीतों में बोलों के लिहाज़ से भी उतने ही प्रयोग हो रहे हैं जितने की संगीत में हो रहे हैं। आज से दस साल पहले तक शायद हीं किसी ने यह सोचा होगा कि "पप्पु काण्ट डान्स साला" जैसे मुखड़े भी कभी आ सकते हैं तो फिर अगर 'हाउसफ़ुल' में गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य लिखते हैं कि "वॊल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा" तो इसमें बहुत ज़्यादा हैरान होनेवाली बात नहीं है।

विश्व दीपक - इस गीत को गाया है रीतु पाठक(जिनका ज़िक्र हमने पहले हीं कर दिया है), नीरज श्रीधर और अलीसा मेन्डोन्सा(लॊय की सुपुत्री) ने। पिछले गीत की तरह यह भी एक पेप्पी नंबर है। हल्के फुल्के गीत शैली में ये दोनों गानें ही कैची हैं। 'बदमाश कंपनी' के गानों ने पेप्पी होते हुए भी जो असर नहीं किया था, शायद 'हाउसफ़ुल' के गीत उस मापदंड पर कुछ हद तक खरे उतर जाएँ।

सुजॊय - मुझे भी ऐसा लगा कि ये दोनों गीतों ने अपनी रीदम के बल पे कुछ हद तक आज के युवाओं को वश में किया है। आइए यह गीत भी सुन लेते हैं।

गीत: वॊल्युम कम कर पप्पा जाग जाएगा


विश्व दीपक - ’हाउसफ़ुल' एल्बम का मुख्य आकर्षण है अमिताभ बच्चन की 'लावारिस' फ़िल्म के मशहूर गीत "अपनी तो जैसे तैसे" का रिमिक्स वर्ज़न। गीत का शीर्षक रखा गया है "आपका क्या होगा (धन्नो रिमिक्स)"। लगता है अब यह नया स्टाइल भी चल पड़ेगा कि हर फ़िल्म में किसी पुराने गीत का रिमिक्स डाल दिया जाएगा। आपका क्या ख़याल है सुजॊय?

सुजॊय - हो सकता है। पिछले कुछ समय से रिमिक्स गानें बनाने की होड़ कुछ ख़त्म सी हो गई थी, अब हो सकता है कि इसके बाद फिर से एक बार रिमिक्स बनाने का सिलसिला शुरु हो जाए। इस विवाद पर न जाते हुए आपको यह बता दें कि किशोर दा के इस ऒरिजनल गीत को आवाज़ दी है मिका ने और साथ में हैं सुनिधि चौहान और साजिद ख़ान।

विश्व दीपक - विवाद का आपने ज़िक्र किया तो मैं कम से कम इतना बता दूँ कि विवाद वैसे भी शुरु हो गया है इस गीत को लेकर, ऐसा कहा जा रहा है कि निर्माता ने ऒरिजिनल गीत के कॊपीराइट्स उचित तरीके से हासिल नहीं किए हैं।

सुजॊय - "अपनी तो जैसे तैसे" गीत को लिखा था अंजान साहब ने। और अब इस गीत का रिकिक्स्ड वर्ज़न को लिखा है उन्ही के सुपुत्र गीतकर समीर ने। एक तरह से अपने पिता को श्रद्धांजलि ही हुई उनकी तरफ़ से। आइए सुनते हैं यह गीत और आज के 'ताज़ा सुर ताल' की चर्चा यहीं संपन्न करते हैं।

गीत: आपका क्या होगा (धन्नो)


"बदमाश कंपनी" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बदमाश कंपनी से प्रीतम और अन्विता दत्त गुप्तन पहली बार एक साथ आए हैं। प्रीतम के साथ इरशाद कामिल की जो जोड़ी है, वह कमाल करती है और हमें इस फिल्म में उसी जोड़ी की कमी खल गई। वैसे कोई बात नही, अगली फिल्म "राजनीति" में यह जोड़ी वापस आ रही है।

"हाउसफुल" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२
इस फिल्म के हमने तीन हीं गाने चुने हैं लेकिन हम यहाँ पर एक और गाने का ज़िक्र करना चाहेंगे। गाने के बोल हैं "आई डोंट नो व्हाट टू डू".. बोल कुछ अजीब से लगते हैं, लेकिन इस गाने में सुनिधि चौहान और शब्बीर कुमार (हाँ आपने सही सुना, ८० के दशक के सुपरहिट शब्बीर कुमार की आवाज़ है इस गाने में) ने सेन्सुअस और छेड़-छाड़ वाले गानों को एक नया अर्थ दिया है। इस गाने के कारण हीं हम इस एलबम को एक्स्ट्रा आधी रेटिंग दे रहे हैं। हमें खेद है कि हम ये गाना आपको सुनवा नहीं पाए, लेकिन आप इसे किसी भी तरह से सुनिएगा ज़रूर।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५२- जिस साल मेयांग चैंग 'ईंडियन आइडल' में भाग लिया था, उस साल इंडियन आइडल का ख़िताब किसने जीता था?

TST ट्रिविया # ५३- गीतकार अंजान ने फ़िल्म 'लावारिस' के लिए लिखा था "अपनी तो जैसे तैसे"। बताइए कि इस फ़िल्म में उनके अलावा और किन गीतकार ने गीत लिखे थे।

TST ट्रिविया # ५४- आज के 'ताज़ा सुर ताल' में में रितेश देशमुख, प्रीतम और मिका का अलग अलग ज़िक्र आया है। क्या आप कोई ऐसा गीत बता सकते हैं जिसमें इन तीनों का योगदान रहा हो?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'फ़िल्मफ़ेयर आर.डी. बर्मन अवार्ड' तथा सर्वश्रेष्ठ पार्श्व संगीत (बेस्ट बैकग्राउंड म्युज़िक) - ये दोनों पुरस्कार फ़िल्म 'देव-डी' के लिए।
२. फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में "लुका छुपी बहुत हुई सामने आ जाना"।
३. फ़िल्म 'वेक अप सिड' और गायिका कविता सेठ।

सीमा जी, आपके तीनों जवाब सहीं हैं। बधाई स्वीकारें!

Thursday, July 23, 2009

एक दिल से दोस्ती थी ये हुज़ूर भी कमीने...विशाल भारद्वाज का इकरारनामा

ताजा सुर ताल (12)

त्मावलोकन यानी खुद के रूबरू होकर बीती जिंदगी का हिसाब किताब करना, हम सभी करते हैं ये कभी न कभी अपने जीवन में और जब हमारे फ़िल्मी किरदार भी किसी ऐसी अवस्था से दोचार होते हैं तो उनके ज़ज्बात बयां करते कुछ गीत भी बने हैं हमारी फिल्मों में, अक्सर नतीजा ये निकलता है कि कभी किस्मत को दगाबाज़ कहा जाता है तो कभी हालतों पर दोष मढ़ दिया जाता है कभी दूसरों को कटघरे में खडा किया जाता है तो कभी खुद को ही जिम्मेदार मान कर इमानदारी बरती जाती है. रेट्रोस्पेक्शन या कन्फेशन का ही एक ताजा उदाहरण है फिल्म "कमीने" का शीर्षक गीत. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ जिंदगी को तो बा-इज्ज़त बरी कर दिया है और दोष सारा बेचारे दिल पर डाल दिया गया है, देखिये इन शब्दों को -

क्या करें जिंदगी, इसको हम जो मिले,
इसकी जाँ खा गए रात दिन के गिले....
रात दिन गिले....
मेरी आरजू कामिनी, मेरे ख्वाब भी कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...


शुरू में ये इजहार सुनकर लगता है कि नहीं ये हमारी दास्तान नहीं हो सकती, पर जैसे जैसे गीत आगे बढता है सच आइना लिए सामने आ खडा हो जाता है और कहीं न कहीं हम सब इस "कमीनेपन" के फलसफे में खुद को घिरा हुआ पाते हैं -

कभी जिंदगी से माँगा,
पिंजरे में चाँद ला दो,
कभी लालटेन देकर,
कहा आसमान पे टांगों.
जीने के सब करीने,
थे हमेशा से कमीने,
कमीने...कमीने....
मेरी दास्ताँ कमीनी,
मेरे रास्ते कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...

शायद ही किसी हिंदी गीत में "कमीने" शब्द इस तरह से प्रयोग हुआ हो, शायद ही किसी ने कभी गीत जिंदगी का इतना बोल्ड अवलोकन किया हो. इस डार्क टेक्सचर के गीत में तीन बातें है जो गीत को सफल बनाते है. विशाल ने इस गीत के जो पार्श्व बीट्स का इस्तेमाल किया है वो एकदम परफेक्ट है गीत के मूड पर, अक्सर स्वावलोकन में जिंदगी बेक गिअर में भागती है, कई किरदार कई, किस्से और संगीत संयोजन शब्दों के साथ साथ एक अनूठा सफ़र तय करता है, दूसरा प्लस है विशाल की खुद अपनी ही आवाज़ जो एक दम तटस्थ रहती है भावों के हर उतार चढावों में भी इस आवाज़ में दर्द भी है और गीत के "पन्च" शब्द 'कमीने' को गरिमापूर्ण रूप से उभारने का माद्दा भी और तीसरा जाहिर है गुलज़ार साहब के बोल, जो दूसरे अंतरे तक आते आते अधिक व्यक्तिगत से हो जाते हैं -

जिसका भी चेहरा छीला,
अन्दर से और निकला,
मासूम सा कबूतर,
नाचा तो मोर निकला,
कभी हम कमीने निकले,
कभी दूसरे कमीने,
मेरी दोस्ती कमीनी,
मेरे यार भी कमीने...
एक दिल से दोस्ती थी,
ये हुज़ूर भी कमीने....

अब हमारा अवलोकन किस हद तक सही है ये तो आप गीत सुनकर ही बता पायेंगें.चलिए अब बिना देर किये सुन डालिए ताजा सुर ताल में फिल्म "कमीने" का ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. फिल्म "ओमकारा" में भी संगीतकार विशाल ने एक युगल गीत को आवाज़ दी थी, कौन सा था वो गीत, बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब था अध्ययन सुमन जो कि टेलीविजन ऐक्टर शेखर सुमन के बेटे हैं. दिशा जी ने एकदम सही जवाब दिया जी हाँ उन्होंने फिल्म राज़ (द मिस्ट्री) में भी काम किया था, और तभी से महेश भट्ट कैम्प के स्थायी सदस्य बन चुके हैं. तनहा जी ने फिल्म "हाले-ए- दिल" का भी जिक्र किया. त्रुटि सुधार के लिए आप दोनों का धन्येवाद. मंजू जी, मनीष जी, निर्मला जी, प्रज्ञा जी ने भी गीत को पसंद किया. मनु जी रेटिंग आपने लिख कर बतानी है जैसे 5 में से 3, २ या १ इस तरह.:) वर्ना हम कैसे जान पायेंगें कि आपकी रेटिंग क्या है.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, June 25, 2009

चेरापूंजी की बारिश में भीगा कैलाश खेर का मन....

ताजा सुर ताल (6)

सावन की आहट करीब सुनाई दे रही है, चिलचिलाती धुप और गर्मी के लम्बे महीनों के बाद कितना सुखद होता बारिश की पहली बूंदों में भीगना. अब मानसून को तो आदत है तड़पाने की जब आये तब आये, संगीत प्रेमियों के लिए कम से कम ये सुविधा है कि जब चाहें सुरों की रिमझिम फुहारों में नहा सकते हैं. नए सुर ताल में आज हम आपको ले चलेंगें पूर्वोत्तर भारत के उस छोटे से हिल स्टेशन पर जिसे वर्षा की राजधानी कहा जाता हैं, जहाँ मेघ खुल कर बरसते हैं, जहाँ हवाओं में हर पल घुली रहती है एक सौंधी महक और जहाँ फ़िज़ा भीगे भीगे ख़्वाबों को बारहों माह संवारती है. लेकिन उससे पहले जिक्र उस फनकार का जिसके सुरों के पंख लगा कर हम उस रमणीय स्थान तक पहुंचेंगें.

मेरठ में जन्में कैलाश खेर का बचपन दिल्ली की गलियों में बीता. उस्ताद नुसरत फतह अली खान की आवाज़ ने नन्हीं उमर में ही उन्हें अपना दीवाना बना दिया था. पिता भी लोक गीतों के गायक थे, तो बचपन में ही उन्हें शास्त्रीय संगीत की तालीम लेनी शुरू कर दी थी और शुरू हो गया था सफ़र इस नए संगीत सितारे का. दिल्ली में ही वो अपने घर वालों से अलग रहे काफी लम्बे अरसे तक और अपने हुनर को मांझते रहे, संवारते रहे और जब उन्हें लगा कि अब सूफियाना संगीत की गहराइयों में उतरने के लिए उनकी आवाज़ तैयार हो चुकी है, वो मुंबई चले आये. नदीम श्रवण के लिए "रब्बा इश्क न होवे" गाने की बाद उनकी जिंदगी बदलने आया वो गीत जिसे हिंदी फिल्मों के सदाबहार श्रेष्ठ १०० गीतों की श्रेणी में हमेशा स्थान मिलेगा. चूँकि इस गीत में वो बाकयदा परदे पर नज़र भी आये, तो लोगों ने इस गायक को और उसकी खनकती डूबती आवाज़ को बखूबी पहचान भी लिया और अपना भी लिया कुछ ऐसे कि फिर कैलाश खेर को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा. ये गीत था फिल्म "वैसा भी होता है" का "अल्लाह के बन्दे". नए गायकों को आजमाने के लिए जाने जाते हैं ए आर रहमान. पर कैलाश उन गिने चुने फनकारों में से हैं जिनके दीवाने खुद ए आर आर भी हैं. एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया कि "अल्लाह के बन्दे" गीत उनके सबसे पसंदीदा गीतों में से एक है. हालाँकि गायकी में जमने से पहले कैलाश ने अपना पारिवारिक व्यवसाय को चलने की कोशिश भी की थी, पर वहां वो बुरी तरह नाकाम रहे, तब अपने दोस्तों परेश और नरेश के कहने पर उन्होंने गायिकी में किस्मत आजमाने का मन बनाया था. परेश और नरेश आज उनके बैंड "कैलाशा" के हिस्सा हैं.

सफलता कभी भी उनके सर चढ़ कर नहीं बोली, वो मन से फकीर ही रहा. हिंदी के अलावा, सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में भी उन्हें भरपूर गाने का मौका मिला. दरअसल कैलाश बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. बतौर गीतकार और संगीतकार भी उन्हें खासी सफलता मिली है. २००८ में आई "दसविदानिया" में मुक्कमल फिल्म के संगीत को अपने दम पर कमियाबी दिलवाई. "मंगल पांडे" के "मंगल मंगल" और "कारपोरेट" के "ओ सिकंदर" गाने में भी वो परदे पर नज़र आये. अपनी आवाज़ को निभाते हुए. पहली एल्बम "आवारगी" (२००५) खासी मकबूल हुई, पर "कैलासा" (२००६) ने उन्हें घर घर पहुंचा दिया. अगली एल्बम जो २००७ में आई "झूमो रे" के गीत "सैयां" ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि उनके आलोचक भी हैरान रह गए. इस माह लगभग २ साल के अन्तराल के बाद कैलाश लौटे हैं अपनी नयी एल्बम "चन्दन में" के साथ. दो सालों में बहुत कुछ बदल गया. कैलाश आज एक ब्रांड है हिन्दुस्तानी सूफी संगीत में, और अब वो विवाहित भी हो चुके हैं तो जाहिर है जिंदगी के बदलते आयामों के साथ साथ संगीत का रंग भी बदलेगा. एल्बम में जितने भी नए गाने हैं उनमें सूफी अंदाज़ कुछ नर्म पड़ा है, लगता है जैसे अब कैलाश नुसरत साहब के प्रभाव से हटकर अपनी खुद की ज़मीन तलाश रहे हैं. इस नयी एल्बम से कैलाश अपने चाहने वालों को बिलकुल भी निराश नहीं करते हैं. एल्बम निश्चित सुनने लायक है और इस एल्बम से कम से कम ३ गीत हम इस शृंखला में आपको सुनवाने की कोशिश करेंगें, पर आज हम जिस गीत को लेकर आये हैं उसे सुनकर आपका भी मन भीग जायेगा और आप भी रिकॉर्ड वर्षा प्राप्त करने वाले पूर्वोत्तर में बसे "चेरापूंजी" नाम के उस खूबसूरत हिल स्टेशन में पहुँच जायेगें. गीत के बोल कमाल के हैं, और बीच बीच में बजती बांसुरी आपको कहीं और ही ले उड़ती है. तो पेश है कैलाश खेर की ताज़ा एल्बम "चन्दन में" से ये गीत -"भीग गया मेरा मन..." पर गीत सुनने से पहले ज़रा इन शब्दों पर गौर कीजिये. ७ मिनट लम्बे इस गीत में चेरापूंजी की सुन्दरता का बेहद सुंदर बखान है -

तीखी तीखी सी नुकीली सी बूँदें,
बहके बहके से बादल उनिन्दें.
गीत गाती हवा में,
गुनगुनाती घटा में,
भीग गया मेरा मन...

मस्तियों के घूँट पी,
शोखियों में तैर जा,
इश्क की गलियों में आ,
इन पलों में ठहर जा,
रब का है ये आइना,
शक्ल हाँ इसको दिखा.
जिंदगी घुड़दौड़ है,
दो घडी ले ले मज़ा,
चमके चमके ये झरनों के धारे,
तन पे मलमल सी पड़ती फुहारें,
पेड़ हैं मनचले से,
पत्ते हैं चुलबुले से,
भीग गया मेरा मन....

डगमगाती चांदनी,
हंस रही है जोश में,
और पतंगें गा रहे,
राग मालकॉस में,
बन के नाचे बेहया,
बेशरम पगली हवा,
जिंदगी मिल के गले,
हंस रही दे दे दुआ,
बरसे बरसे रे अम्बर का पानी,
जिसको पी पी के धरती दीवानी,
खिलखिलाने लगी है,
मुस्कुराने लगी है
भीग गया मेरा मन....



ये तो थी नए संगीत में हमारी पसंद. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा. यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को ५ में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. वो कौन सा गीत है जिसमें कैलाश खेर ने मकरंद देशपांडे के लिए गायन किया था, ए आर रहमान के संगीत निर्देशन में, क्या आप जानते हैं ?



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Wednesday, November 12, 2008

आधे सत्र के गीतों ने पार किया समीक्षा का पहला चरण

सितम्बर के सिकंदरों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा, और तीन महीनों में प्रकाशित १३ गीतों की पहले चरण की समीक्षा के बाद का स्कोरकार्ड

समीक्षक की व्यस्तता के चलते हम सितम्बर के गीतों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा को प्रस्तुत करने में कुछ विलंब हुआ. तो लीजिये पहले इस समीक्षा का ही अवलोकन कर लें.


खुशमिजाज़ मिटटी
बढ़िया गीत होते हुए पर भी पता नहीं क्या कमी है, गीत दिल को छू नहीं पाता। ठीक संगीत, गीत बढ़िया और गायकी भी ठीकठाक। गायक को अभिजीत की शैली अपनाने की बजाय खुद की शैली विकसित करनी चाहिये।
गीत: ३, संगीत 3, गायकी ३, प्रस्तुति ३, कुल १२/२०, पहले चरण में कुल अंक २५ / ३०.

राहतें सारी
एक बार सुन लेने लायक गीत, बोल सुंदर परन्तु संगीत ठीक है। वैसे संगीतकार की उम्र बहुत कम है उस हिसाब से बढ़िया कहा जायेगा, क्यों कि बड़े बड़े संगीतकार भी इस उम्र में इतने बढ़िया संगीत नहीं रच पाये हैं।
गीत ३.५, संगीत ३.५ गायकी ३ प्रस्तुति 3 कुल १३/२०, पहले चरण में कुल अंक १८ / ३०.

ओ मुनिया
बढ़िया गीत को संगीत और प्रस्तुति के जरिये कैसे बिगाड़ा जाता है उसका बेहद शानदार नमूना, एक पंक्ति भी सुनने लायक नहीं, जबरन एक दो लाइनें सुनी। हिन्द युग्म पर प्रकाशित गीतों में अब तक का सबसे सामान्य गीत। हिन्द युग्म को ऐसे गीतों से बचना चाहिये। सिर्फ वर्चूअल स्पेस भरने के लिये ऐसी रचनायें प्रकाशित करने का कोई फायदा नहीं।
गीत 5, संगीत ०, गायकी ०, प्रस्तुति ० कुल ५/२०, पहले चरण में कुल अंक १९.५ / ३०.

सच बोलता हैएक बार फिर सुन्दर गज़ल, गायकी और संगीत प्रस्तुति एकदम बढ़िया होते हुए भी गीत को एक बार सुन लेने के बाद सुनने का मन नहीं होता। कुछ चीजों में कमी दिखाई नहीं देती, उसको वर्णित नहीं किय़ा जा सकता कि इस गीत में यह कमी है पर वो कमी अखरती रहती है, मन में कसक सी रहती है। इस गीत को सुनने के बाद भी सिसा ही महसूस होता है।
गायक की आवाज में मो. रफी साहब की आवाज की झलक दिखती (सुनाई देती) है।
गीत ४, संगीत ४.५, गायकी ३, प्रस्तुति ४.५ कुल १६/२०, पहले चरण में कुल अंक २४.५ / ३०.

सितम्बर माह की समाप्ति के साथ ही हमारे वर्तमान सत्र का आधा सफर पूरा हो गया. हालाँकि बीते शुक्रवार तक हम १९ नए गीत प्रकाशित कर चुके हैं, पर सितम्बर तक प्रकाशित सभी १३ गीत अपनी पहले चरण की समीक्षा का समर पार चुके हैं. आईये देखते हैं इन १३ गीतों में कौन है अब तक सबसे आगे. अब तक का स्कोर कार्ड इस प्रकार है.

खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.

हम आपको याद दिला दें कि कुल अंक ५० में से दिए जायेंगे, यानी अन्तिम दो निर्णायकों के पास २० अंक हैं, अन्तिम चरण की रेंकिंग जनवरी में होगी, जिसके बाद ही अन्तिम फैसला होगा, सरताज गीत का और टॉप १० का भी, फिलहाल हम मिलेंगे आने वाले रविवार को, अक्टूबर के अजयवीर गीतों की पहली समीक्षा लेकर.

हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.


Sunday, August 10, 2008

समीक्षा के अखाडे में दूसरा दंगल

सरताज गीत बनने की जंग शुरू हो चुकी है, जुलाई के जादूगर गीत, जनता की अदालत में हाज़री बजाने के बाद, पहले चरण की समीक्षा की कठिन परीक्षा से गुजर रहे हैं, जैसा की हम बता चुके हैं कि पहले चरण में ३ समीक्षक होंगे और दूसरे और अन्तिम चरण में दो समीक्षक होंगे, समीक्षा का दूसरा चरण सत्र के समापन के बाद यानी जनवरी के महीने शुरू होगा, फिलहाल देखते हैं कि पहले चरण के, दूसरे समीक्षक ने जुलाई के जादूगरों को कितने कितने अंक दिए हैं. इस समीक्षा के अंकों में पहली समीक्षा के अंक जोड़ दिए गए हैं जिसके आधार पर, हमारे श्रोता देख पाएंगे कि कौन सा गीत है, अब तक सबसे आगे.

गीत समीक्षा

संगीत दिलों का उत्सव है ....

पहला गीत है “संगीत दिलों का उत्सव है…” सभी गीतों में सबसे श्रेष्‍ठ.. गीत संगीत और गायकी सब कुछ एकदम परफेकक्ट ... गीत संगीत और गायकी तीनों पक्षों में ताजगी लगती है। बीच बीच में आलाप बहुत प्रभावित करता है। इस गीत को 8 नंबर दे रहा हूँ।

संगीत दिलों का उत्सव है... को दूसरे निर्णायक द्वारा मिले 8/10 अंक, कुल अंक अब तक 14 /20

बढे चलो.

दूसरा गीत है “बढ़े चलो…”, आज के हिन्द का युवा...ठीक कह सकते हैं। बहुत दिल को छू नहीं पाया। आज के प्रचलन के हिसाब से ठीक है। गायकी अच्छी है पर संगीत तेज है और वाद्ययंत्रों की आवाज हावी हो जाने के कारण गीत में वो बात नहीं बन पाई जो गीत के बोलों के हिसाब से बन सकती थी। इस गीत को मैं 6 नंबर ही दे पा रहा हूँ.

बढे चलो, को दूसरे निर्णयक से अंक मिले 6 / 10, कुल अंक अब तक 13 /20.

आवारा दिल.

तीसरा गीत है, “आवारा दिल…”। बढ़िया गीत... इतनी कम उम्र में संगीतकार ने जो काम किया है उस हिसाब से उनका भविष्य उज्जवल है। गीत अच्छा संगीत बेहतर और गायकी बेहतरीन इस गीत को 7 नंबर दे रहा हूँ।

आवारा दिल, को दूसरे निर्णायक से मिले 7 / 10, कुल अंक अब तक 15 /20.


तेरे चेहरे पे ...

आखिरी गीत एक गज़ल है “तेरे चेहरे पे…”। छोटा सी ग़ज़ल, संगीत गीत और गायकी में ताजगी। बहुत बढ़िया संयोजन। इस गीत को भी 7 नंबर मिल रहे हैं

तेरे चेहरे पे..., को दूसरे निर्णायक ने मिले 7 /10, कुल अंक अब तक 13 /20

चलते चलते...

तो दोस्तों, दो समीक्षकों के निर्णय आ चुके हैं, अभी भी पहले चरण में "आवारा दिल" ने बढ़त कायम रखी है, "संगीत दिलों का उत्सव है..." तीसरे स्थान से उछल कर दूसरे पर आ गया है, और शीर्ष गीत को कड़ी चुनौती दे रहा है. अब तीसरे (पहले चरण के अन्तिम) समीक्षक के निर्णय के बाद ही स्थिति साफ़ हो पायेगी. तीसरे समीक्षक की पारखी समीक्षा लेकर हम उपस्थित होंगे अगले रविवार को. हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.

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