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Tuesday, April 12, 2011

बोल रे बोल रे मेरे प्यारे पपीहे बोल रे....गायन में भी खुद को आजमाया महान अभिनेत्री मीना कुमारी ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 633/2010/333

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के श्रोता-पाठकों को हमारा नमस्कार! 'सितारों की सरगम' शृंखला में ट्रैजेडी किंग् दिलीप कुमार के बाद आज बारी है ट्रैजेडी क्वीन के आवाज़ की। जी हाँ, मीना कुमारी, जिन्हें हिंदी सिनेमा का ट्रैजेडी क्वीन कहा जाता है। मीना कुमारी जितनी सशक्त अदाकारा थीं उतनी ही अच्छी शायरा भी थीं। उनकी शायरी का संकलन 'I write, I recite' के शीर्षक से जारी हुआ था, जिसको संगीतबद्ध किया था ख़य्याम साहब नें। विनोद मेहता नें मीना कुमारी की जीवनी लिखी जो प्रकाशित हुई थी सन् १९७२ में। इस किताब में मीना जी की शायराना अंदाज़ उन्होंने कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया था - "Her poetry is sad, joyless, pessimistic, morbid, but then what do you expect from a women of the temperament of Meena Kumari? Her verses were entirely in character with her life, or at least her comprehension of her life. My heroine was not an outstanding poet, nor a detached poet, nor a penetrating poet, nor a classical poet. She was a learning poet who translated her life into verse. The dominant strain in Meena Kumari's poetry is love, or rather the impossibility of finding love. And it would be true to say that my heroine looked, searched, wept and cried in its pursuit. In fact, she said, "love is my biggest weakness and greatest strength too. I am in love with love. I am craving for love. I have been craving for it since my childhood." We all know she was unsuccessful."

उपलब्ध जानकारी के अनुसार मीना कुमारी नें जिन गिनी-चुनी फ़िल्मों में अपना स्वर दिया, यानी गीत गाये, उनमें शामिल हैं 'पिया घर आजा', 'दुनिया एक सराय', 'बहन', 'अलादिन और जादूई चिराग़' और 'बिछड़े बलम'। १९४७ की फ़िल्म 'पिया घर आजा' में बुलो सी. रानी नें मीना जी पर फ़िल्माये सभी गीत उनसे गवा लिए, जैसे कि "अखियाँ तरस रही उन बिन", "देश पराये जानेवाले भूल न जाना प्रीत निभाना", "एक बार फिर कहो ज़रा आँखों का नूर हो", "मेरे सपनों की दुनिया बसाने वाले", "मिली आज पिया से अखियाँ", "न कोई दिलासा है न बाक़ी है बहाना", "नैन बसे हो राजा दिल में बसे हो" (करण दीवान के साथ), "नैन डोर बांध लियो चितचोर" (करण दीवान के साथ)। इन सभी गीतों को इंद्रचन्द्र कपूर नें लिखा। 'बहन' में अनिल बिस्वास नें मीना कुमारी से सरदार आह सीतापुरी का लिखा "तोरे कजरा लगाऊँ मोरी रानी" गवाया था, तो 'दुनिया के सराय' में हंसराज बहल नें उनसे कई गीत गवाये। एस. एन. त्रिपाठी का संगीत था 'अलादिन और जादूई चिराग़' में। लेकिन मीना कुमारी से सब से ज़्यादा गीत बुलो सी. रानी नें ही गवाये थे। 'पिया घर आजा' के सभी गीतों के अलावा 'बिछड़े बलम' में भी बुलो साहब नें उनसे गीत गवाये और इसी फ़िल्म का एक बहुत ही दुर्लभ गीत आज हम आपके लिए लेकर आये हैं। मीना कुमारी और ए. आर. ओझा की युगल आवाज़ों में यह है "बोल रे बोल रे मेरे प्यारे पपीहे बोल रे"। गीतकार इंद्र चंद्र, जो कुछ फ़िल्मों में आइ. सी. कपूर के नाम से भी जाने गये। इस गीत को सुनवाने से पहले एक और दुर्लभ जानकारी आपको देना चाहेंगे कि बुलो सी. रानी नें ही १९४८ की फ़िल्म 'अंजुमन' में अभिनेत्री नर्गिस से भी गीत गवाया था। नर्गिस और उमा देवी की युगल आवाज़ों में यह मुशायरा गीत था "हज़रात क्योंकि काफ़ी देर हो चुकी है"। हमनें काफ़ी कोशिशें की कि इस गीत को हम कहीं से ढूंढ कर नर्गिस जी पर भी एक अंक इस शृंखला में प्रस्तुत करें, लेकिन अफ़सोस कि फ़िल्म के ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड पर इसे नहीं उतारा गया था और इस फ़िल्म की प्रिण्ट भी कहीं से प्राप्त नहीं कर पाये। इसलिए इसी अंक में इस बात का ज़िक्र हमनें कर दिया। और अब सुनिए मीना कुमारी और ए. आर. ओझा की आवाज़ों में 'बिछड़े बलम' फ़िल्म का गीत। इस गीत को उपलब्ध करवाने में विशेष सहयोग दिया सेशाद्री बुक्कारायासमुद्रम नें। आइए सुनते हैं इस बेहद दुर्लभ गीत को।



क्या आप जानते हैं...
कि मीना कुमारी का असली नाम था महजबीन बानो और उनका जन्म १ अगस्त १९३२ को हुआ था अली बक्श और इक़बाल बेगम के घर।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 4/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद मशहूर गीत एक मशहूर अभिनेत्री का गाया.

सवाल १ - कौन है ये गायिका/नायिका - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - कितनी बार इस नायिका को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला है - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
जो हमने कहना था वो अनजाना जी ने कह दिया अमित जी से....इतने मुश्किल गीत को १ मं में पहचान गए आप लोग ताज्जुब है वाकई बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, May 11, 2009

मेरी नींदों में तुम...कहा शमशाद बेगम ने किशोर दा से इस दुर्लभ गीत में...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 77

दोस्तों, कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं जिन्हे परदे पर देखते ही जैसे गुदगुदी सी होने लगती है। और कुछ अभिनेत्रियाँ ऐसी हैं जिनका नाम दर्द और संजीदे चरित्रों का पर्याय है। अब अगर ऐसे एक हास्य अभिनेता के साथ ऐसी कोई संजीदे और दर्दीले चरित्र निभानेवाली अभिनेत्री की जोड़ी किसी फ़िल्म में बना दी जाए तो कैसा हो? जी हाँ, किशोर कुमार और मीना कुमारी की जोड़ी भी एक ऐसी ही जोड़ी रही है और ये दोनो साथ साथ नज़र आए थे १९५६ में के. अमरनाथ की फ़िल्म 'नया अंदाज़' में। १९५६ में संगीतकार ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी कुल ८ फ़िल्में आयीं - भागमभाग, सी. आई. डी, छूमंतर, ढाके की मलमल, हम सब चोर हैं, मिस्टर लम्बु, श्रीमती ४२०, और नया अंदाज़। हालाँकी नय्यर साहब और किशोर कुमार का साथ बहुत ज़्यादा नहीं रहा है, बावजूद इसके इन दोनो ने एक साथ कई यादगार फ़िल्में की हैं और तीन फ़िल्में तो इसी साल यानी कि १९५६ में ही आयी थी - भागमभाग, ढाके की मलमल, और नया अंदाज़। इससे पहले इन दोनो ने साथ साथ १९५२ की फ़िल्म 'छम छमा छम' और १९५५ में 'बाप रे बाप' में काम किया था। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में ओ. पी. नय्यर और किशोर कुमार के इसी अदभुत जोड़ी को सलाम करते हुए 'नया अंदाज़' फ़िल्म का एक युगल-गीत पेश है "मेरी नींदों में तुम मेरे ख़्वाबों में तुम, हो चुके हम तुम्हारी मोहब्बत में गुम"।

अभी अभी हमने इस बात का ज़िक्र किया था कि किस तरह से किशोर कुमार और मीना कुमारी एक दूसरे से बिल्कुल विपरित शैली के अभिनेता होते हुए भी इस फ़िल्म में साथ साथ नज़र आये। ठीक इसी तरह से इस गीत को गानेवाले कलाकारों की जोड़ी भी बड़ी अनोखी है। किशोर कुमार और शमशाद बेग़म, जी हाँ, इन दोनो ने साथ साथ इतने कम गाने गाये हैं कि इन दोनो को एक साथ गाते हुए सुनना भी एक अनोखा अनुभव है। विविध भारती के 'दास्तान-ए-नय्यर' कार्यक्रम में जब नय्यर साहब से यह पूछा गया कि "यह जो 'काम्बिनेशन' है किशोर कुमार और शमशाद बेग़म का, बिल्कुल 'इम्पासिबल' सा लगता है", तो उन्होने कहा, "सुनने में फिर कैसे 'पासिबल' लगता है! साहब, यही बस 'काम्पोसर' के पैंतरें हैं, और पंजाबी में कहते हैं कि "लल्लु करे क़व्वालियाँ रब सिद्धियाँ पाये", तो हम तो भगवान के लल्लु पैदा हुए हैं, उसने जो कराया करा दिया।" तो लीजिये सुनिए गीतकार जाँ निसार अख्तर का लिखा रूमानियत से भरपूर यह नरमोनाज़ुक दोगाना। गाने में 'पियानो' का बड़ा ही ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है नय्यर साहब ने। 'पियानो' से याद आया कि नय्यर साहब अपने गीतों की धुनें हमेशा 'पियानो' पर बैठकर ही बनाया करते थे।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. तलत - लता का एक नायाब युगल गीत.
२. संगीतकार हैं हंसराज बहल.
३. मुखड़े में शब्द युगल है - "सपने सुहाने".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
सुमित जी इस बार आप चूक गए, आपने जिस गीत का जिक्र किया वो तो अमित कुमार ने गाया है....एक बार फिर पराग जी ने बाज़ी मारी...बहुत बहुत बधाई...विजय तिवारी जी आपका भी महफिल में स्वागत है...गजेन्द्र जी, आप ई-चिट्ठी का इंतज़ार न कर भारतीय समयानुसार शाम 6 से 7 बजे के बीच सीधे आवाज़ पहुँच जाया करें, तब आप भी पहले विजेता हो सकते हैं...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Monday, April 27, 2009

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दे....रोशन के संगीत में लता की आवाज़ पुरअसर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 63

फ़िल्म 'अनोखी रात' का मशहूर गीत "ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में" संगीतकार रोशन के संगीत से सजा आख़री गीत था। रोशन १६ नवंबर १९६७ को इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिये छोड़ गए, लेकिन पीछे छोड़ गए अपनी दिलकश धुनों का एक अनमोल ख़ज़ाना। फ़िल्म 'बहू बेग़म' भी उनके संगीत सफ़र के आख़री फ़िल्मों में से एक है। यह फ़िल्म भी १९६७ को ही प्रदर्शित हुई थी। एम. सादिक़ निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, मीना कुमारी और प्रदीप कुमार। यह फ़िल्म एक 'पिरियड ड्रामा' है जिसमें पुरुष प्रधान समाज का चित्रण किया गया है, और उन दिनो नारी को किस तरह से दबाया - कुचलाया जाता था उसका भी आभास मिलता है इस फ़िल्म में। मीना कुमारी की सशक्त अभिनय ने इस फ़िल्म को उतना ही यादगार बना दिया है जितना कि इस फ़िल्म के गीत-संगीत ने। आज इसी फ़िल्म का गीत सज रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। लता मंगेशकर की आवाज़ में "दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें, तुमको ना हो ख्याल तो हम क्या जवाब दें" फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने की एक ऐसी मोती है जिसकी चमक आज ४० सालों के बाद भी वैसी की वैसी बरकरार है।

"पूछे कोई कि दर्द-ए-वफ़ा कौन दे गया, रातों को जागने की सज़ा कौन दे गया, कहने से हो मलाल तो हम क्या जवाब दें" - साहिर लुधियानवीं के ऐसे ही सीधे सादे लेकिन बड़े ही ख़ूबसूरत और सशक्त तरीके से पिरोये हुए शब्दों का इस्तेमाल इस ग़ज़ल की खासियत है। और लताजी की मधुर आवाज़ और रोशन के पुर-असर धुन को पा कर तो जैसे यह ग़ज़ल जीवंत हो उठी है। भले लताजी ने ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लें बहुत कम गायीं हैं, उनकी शानदार और असरदार फ़िल्मी ग़ज़लों को सुनकर यह कमी भी पूरी हो जाती है। रात के सन्नाठे में कभी इस ग़ज़ल को सुनियेगा दोस्तों, एक अलग ही समां बंध जाता है, एक अलग ही संसार रचती है यह ग़ज़ल। यह ग़ज़ल है तो ३ मिनट की ही, लेकिन एक बार सुनने पर इसका असर ३ हफ़्ते तक रहता है। फ़िल्म में नायिका के दिल की दुविधा, समाज का डर, दिल की बेचैनी, शर्म-ओ-हया, सभी कुछ समा गया है इस छोटी सी ग़ज़ल में। समात फ़रमाइए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. जॉनी वाकर पर फिल्माया गया ओ पी नय्यर का रोमांटिक कॉमेडी गीत.
२. रफी और गीता दत्त की आवाजें.
३. गाने में कुछ खो गया है जिसे ढूँढने की कोशिश की जा रही है.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी सही जवाब है, नीलम जी भी पहचान गयी और मनु जी भी.भारत पंड्या जी ने फिल्म का नाम गलत बताया पर गाना एक दम सही है भाई..नीलम जी नाराज़ मत होईये...अभी तो महफिल सजी है आपकी पसंद का गाना भी ज़रूर सुनाया जायेगा....फिलहाल ये बताएं कि आज का गाना कैसा लगा. और हाँ जाईयेगा नहीं....आपके बिना तो महफिल का रंग ही बेरंग हो जायेगा :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Tuesday, March 31, 2009

कहाँ हाथ से कुछ छूट गया याद नहीं - मीना कुमारी की याद में


मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' जगत में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी अस्पर्शनीय है ।वे जितनी उच्चकोटि की अदाकारा थीं उतनी ही उच्चकोटि की शायरा भी । अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद 'अल्लाह ताला' की वदीयत थी जैसे। तभी तो कहा उन्होंने -

कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको

पैदा होते ही अब्बा अली बख्श ने रुपये के तंगी और पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में छोड़ आए. अम्मी के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले आए ।परिवार हो या वैवाहिक जीवन मीना जो को तन्हाईयाँ हीं मिली

चाँद तन्हा है,आस्मां तन्हा
दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थात्थारता रहा धुआं तन्हां

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हां है और जां तन्हां

हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां

जलती -बुझती -सी रौशनी के परे
सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा

और जाते जाते सचमुच सरे जहाँ को तन्हां कर गयीं ।जब जिन्दा रहीं सरापा दिल की तरह जिन्दा रहीं ।दर्द चुनते रहीं संजोती रहीं और कहती रहीं -

टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली

वह कोई साधारण अभिनेत्री नहीं थी, उनके जीवन की त्रासदी, पीडा, और वो रहस्य जो उनकी शायरी में अक्सर झाँका करता था, वो उन सभी किरदारों में जो उन्होंने निभाया बाखूबी झलकता रहा. फिल्म "साहब बीबी और गुलाम" में छोटी बहु के किरदार को भला कौन भूल सकता है. "न जाओ सैया छुडाके बैयाँ..." गाती उस नायिका की छवि कभी जेहन से उतरती ही नहीं. १९६२ में मीना कुमारी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए तीन नामांकन मिले एक साथ. "साहब बीबी और गुलाम", मैं चुप रहूंगी" और "आरती". यानी कि मीना कुमारी का मुकाबला सिर्फ मीना कुमारी ही कर सकी. सुंदर चाँद सा नूरानी चेहरा और उस पर आवाज़ में ऐसा मादक दर्द, सचमुच एक दुर्लभ उपलब्धि का नाम था मीना कुमारी. इन्हें ट्रेजेडी क्वीन यानी दर्द की देवी जैसे खिताब दिए गए. पर यदि उनके सपूर्ण अभिनय संसार की पड़ताल करें तो इस तरह की "छवि बंदी" उनके सिनेमाई व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी ही होगी.

एक बार गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था :

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी

पढ़ कर मीना जी हंस पड़ी । कहने लगी -"जानते हो न, वे तागे क्या हैं ?उन्हें प्यार कहते हैं । मुझे तो प्यार से प्यार है । प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है । इतना प्यार कि कोई अपने तन से लिपट कर मर सके तो और क्या चाहिए?" महजबीं से मीना कुमारी बनने तक (निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ये नाम दिया), और मीना कुमारी से मंजू (ये नामकरण कमाल अमरोही ने उनसे निकाह के बाद किया ) तक उनका व्यक्तिगत जीवन भी हजारों रंग समेटे एक ग़ज़ल की मानिंद ही रहा. "बैजू बावरा","परिणीता", "एक ही रास्ता", 'शारदा". "मिस मेरी", "चार दिल चार राहें", "दिल अपना और प्रीत पराई", "आरती", "भाभी की चूडियाँ", "मैं चुप रहूंगी", "साहब बीबी और गुलाम", "दिल एक मंदिर", "चित्रलेखा", "काजल", "फूल और पत्थर", "मँझली दीदी", 'मेरे अपने", "पाकीजा" जैसी फिल्में उनकी "लम्बी दर्द भरी कविता" सरीखे जीवन का एक विस्तार भर है जिसका एक सिरा उनकी कविताओं पर आके रुकता है -

थका थका सा बदन,
आह! रूह बोझिल बोझिल,
कहाँ पे हाथ से,
कुछ छूट गया याद नहीं....

३१ मार्च १९७२ को उनका निधन हुआ. आज उनकी ३७ वीं पुण्यतिथि पर उन्हें 'आवाज़' का सलाम. सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में उन्हीं का कलाम. जिसे खय्याम साहब ने स्वरबद्ध किया है -

चाँद तन्हा...


मेरा माज़ी


ये नूर किसका है...


प्रस्तुति - उज्जवल कुमार

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