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Sunday, July 9, 2017

राग पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 325 : RAG PAHADI




स्वरगोष्ठी – 325 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 11 : राग पहाड़ी

रोशन की जन्मशती पर उनकी स्मृतियों को शताधिक नमन




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की ग्यारहवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस सप्ताह की 14 जुलाई 2017 को संगीतकार रोशन की जन्मशती पूर्ण हो तही है। यह श्रृंखला हमने इसीलिए रोशन की स्मृतियों को समर्पित की है। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवाया और इनके रागों पर चर्चा भी की। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो”। रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की समापन कड़ी में आज हमने 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दादी माँ’ से एक युगलगीत चुना है, जिसे रोशन ने राग पहाड़ी का आधार दिया है। यह गीत मन्ना डे और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में एक ठुमरी विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।




मन्ना  डे
महेन्द्र कपूर
स सप्ताह की 14 जुलाई को संगीतकार रोशन की जन्मशती पूर्ण हो रही है। जैसा कि उपरोक्त भूमिका में उल्लेख किया गया है कि रोशनलाल नागरथ का जन्म 17 जुलाई, 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में हुआ था। यह श्रृंखला हम उनकी जन्मशती की पूर्णता के उपलक्ष्य में प्रस्तुत कर रहे हैं। 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘नेकी और बदी’ रोशन की संगीतबद्ध पहली फिल्म थी। 1968 की फिल्म ‘अनोखी रात’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। इसी के साथ एक और फिल्म ‘अरमान भरा दिल’ तैयार तो थी, किन्तु प्रदर्शित नहीं हुई थी। रोशन ने फिल्म ‘अनोखी रात’ का संगीत तैयार तो कर दिया था, किन्तु फिल्म का एक गीत, -“महलों का राजा मिला, तुम्हारी बेटी राज करेगी...” रिकार्ड नहीं हो पाया था। इस गीत को उनकी पत्नी इरा रोशन ने उनके निधन के बाद स्वयं रिकार्ड कराया और फिल्म पूरी की। रोशन ने फिल्म ‘दूर नहीं मंज़िल’ का केवल एक गीत, -“लिये चल गड़िया ओ मेरे मितवा दूर नहीं मंज़िल...” रिकार्ड कराया था। उनके निधन के बाद शेष गीत शंकर जयकिशन ने रिकार्ड कराया था। 16 नवम्बर, 1967 को मुम्बई में हरि वालिया की फिल्म ‘लाट साहब’ की सफलता की दावत में रोशन को दिल का दौरा पड़ा और उनका असामयिक निधन हो गया। निधन से कुछ ही दिन पूर्व रोशन ने विविध भारती पर प्रसारित होने वाली विशेष जयमाला कार्यक्रम की रिकार्डिंग की थी, जिसका प्रसारण 2 दिसम्बर, 1967 को हुआ था। इस श्रृंखला की पिछली दस कड़ियों में हमने रोशन के राग आधारित गीतों की सूची से अलग-अलग रागों के गीत चुने है। आज के अंक में हमने रोशन के स्वरबद्ध किये फिल्म ‘दादी माँ’ का एक गीत चुना है, जिसमें राग पहाड़ी की झलक है। पार्श्वगायक मन्ना डे और महेन्द्र कपूर के स्वरों में प्रस्तुत इस युगलगीत के बोल हैं, -“उसको नहीं देखा हमने कभी पर इसकी ज़रूरत क्या होगी...” गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के इस गीत में माँ की ममता और महत्ता का प्रेरक चित्रण है। आइए, अब हम संगीतकार रोशन की जन्मशती पूर्णता के अवसर पर उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए उनका संगीतबद्ध किया राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत सुनते हैं।

राग पहाड़ी : “उसको नहीं देखा हमने कभी...” मन्ना डे और महेन्द्र कपूर : फिल्म – दादी माँ



परवीन सुल्ताना
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर में उपस्थित जो भी दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं। भारतीय संगीत के कई रागों का उद्गम लोक संगीत से हुआ है। इन्हीं में से एक है, राग पहाड़ी, जिसकी उत्पत्ति भारत के पर्वतीय अंचल में प्रचलित लोक संगीत से हुई है। यह राग बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग पहाड़ी में मध्यम और निषाद स्वर बहुत अल्प प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग की जाति का निर्धारण करने में इन स्वरों की गणना नहीं की जाती और इसीलिए इस राग को औड़व-औड़व जाति का मान लिया जाता है। राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका चलन चंचल है और इसे क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, गीत, ग़ज़ल आदि रचनाएँ खूब मिलती हैं। आम तौर पर गायक या वादक इस राग को निभाते समय रचना का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए विवादी स्वरों का उपयोग भी कर लेते हैं। मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली से बचाने के लिए राग पहाड़ी के अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। मन्द्र धैवत पर न्यास करने से राग पहाड़ी स्पष्ट होता है। इस राग के गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का पहला प्रहर माना जाता है। राग पहाड़ी के स्वरूप को स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए अब आप इसी राग में सुनिए, कण्ठ संगीत की एक आकर्षक रचना। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी बेगम परवीन सुलताना। आप राग पहाड़ी की यह ठुमरी अंग की रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक और इस श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पहाड़ी : ‘जा जा रे कगवा मोरा सन्देशवा पिया पास ले जा...’ : विदुषी परवीन सुलताना



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 325वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1942 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 15 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 327वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 323वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – पीलू, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – आशा भोसले

इस अंक की पहेली में हमारे सभी पाँच नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस ग्यारहवें और समापन अंक में हमने आपके लिए राग पहाड़ी पर आधारित फिल्म ‘दादी माँ’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। इस कड़ी के साथ ही हमारी इस श्रृंखला का समापन होता है। आगामी अंक से हम एक नई श्रृंखला का प्रारम्भ कर रहे हैं। हमारी आगामी श्रृंखला एक नए रंग-रूप के साथ प्रस्तुत होगी। आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 21, 2017

चित्रकथा - 3: महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


अंक - 3

महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


भारत की बात सुनाता हूँ...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

आगामी 26 जनवरी को राष्ट्र अपना 68-वाँ गणतन्त्र दिवस मनाने जा रहा है। इस शुभवसपर पर हम आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर फ़िल्मी देश-भक्ति के गीतों का चलन शुरु से ही रहा है। और एक आवाज़ जिनके बिना ये पर्व अधूरे से लगते हैं, वह आवाज़ है गायक महेन्द्र कपूर की। उनकी बुलन्द पर सुरीली आवाज़ पाकर जैसे देश-भक्ति की रचनाएँ जीवन्त हो उठती थीं। आइए आज के इस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए फ़िल्मी देश भक्ति गीतों की चर्चा करें।




मारे देश के देशभक्तों और वीर सपूतों ने अपने अपने तरीकों से इस मातृभूमि की सेवा की है। और
इस राह में हमारे फ़िल्मी गीतकार, संगीतकार और गायकों का योगदान सराहनीय रहा है। गायकों की बात करें तो महेन्द्र कपूर ने अपनी बेशकीमती आवाज़ के माध्यम से देशभक्ति का अलख जगाया है जिसका प्रमाण समय-समय पर उनकी आवाज़ में हमें मिला है। भले सुनहरे दौर के शीर्षस्थ गायकों में सहगल, रफ़ी, तलत, किशोर, मुकेश और मन्ना डे के साथ महेन्द्र कपूर का नाम नहीं लिया गया, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि देशभक्ति गीत गाने की कला में उनसे ज़्यादा पारदर्शी कोई नहीं। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में देशभक्ति रस के गीत इतने जीवन्त, इतने प्रभावशाली लगते हैं कि वतन-परस्ती का जस्बा और बुलन्द हो जाता है। महेन्द्र कपूर की इसी ख़ूबी का कई संगीतकारों ने बख़ूबी इस्तमाल किया है जब जब उन्हें देशभक्ति के गीतों की ज़रूरत पड़ी अपनी फ़िल्मों में। इस देश पर शहीद होने वाले, इस देश की सेवा करने वाले और देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित करने वाले वतन परस्तों के पैग़ाम को आवाज़ तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम करती आई है महेन्द्र कपूर की गाई हुई देशभक्ति की कालजयी रचनाएँ।

कुछ समय पहले जब मैंने महेन्द्र कपूर साहब के सुपुत्र रुहान (रोहन) कपूर से उनके पिता के बारे में
बातचीत की, तब उनसे मैंने यह सवाल किया था कि उन्हें कैसा लगता है जब 26 जनवरी और 15 अगस्त को पूरा देश उनके पिता के गाए देशभक्ति गीतों को सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है और कभी कभी आँखें नम हो जाती हैं, तब उन्हें कैसा लगता है? इसके जवाब में रुहान जी ने कहा, "उनकी आवाज़ को सुनना तो हमेशा ही एक थ्रिलिंग् एक्स्पीरिएन्स रहता है, लेकिन ये दो दिन मेरे लिये बचपन से ही बहुत ख़ास दिन रहे हैं। उनकी जोशिली और बुलंद आवाज़ उनकी मातृभूमि के लिये उनके दिल में अगाध प्रेम और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करते हैं। और उनकी इसी ख़ासियत ने उन्हें 'वॉयस ऑफ़ इण्डिया' का ख़िताब दिलवाया था। वो एक सच्चे देशभक्त थे और मुझे नहीं लगता कि उनमें जितनी देशभक्ति की भावना थी, वो किसी और लीडर में होगी। He was a human par excellence! अगर मैं यह कहूँ कि वो मेरे सब से निकट के दोस्त थे तो ग़लत न होगा। I was more a friend to him than anybody on planet earth। हम दुनिया भर में साथ साथ शोज़ करने जाया करते थे और मेरे ख़याल से हमने एक साथ हज़ारों की संख्या में शोज़ किये होंगे। वो बहुत ही मिलनसार और इमानदार इंसान थे, जिनकी झलक उनके सभी रिश्तों में साफ़ मिलती थी।"

शोज़ की बात चल पड़ी है तो महेन्द्र कपूर ने ’विविध भारती’ के ’जयमाला’ कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को संबोधित करते हुए एक बार कहा था, "हम सब इस देश के निवासी हैं, हम सभी को यह देश बहुत प्यारा है। हमें इस पर मान है और होना भी चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया में ऐसा देश और कहीं नहीं है। मैं जब भी बाहर यानी फ़ौरेन जाता हूँ, देश की यादें साथ लेकर जाता हूँ, और इस गाने से हर प्रोग्राम शुरु करता हूँ।" और यह गाना है फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ का, "है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ"। इस फ़िल्म के इस सर्वाधिक लोकप्रिय गीत के अलावा महेन्द्र कपूर की आवाज़ से सजे दो और देशभक्ति गीत थे, "दुल्हन चली बहन चली तीन रंग की चोली" (लता के साथ) और "पूर्वा सुहानी आई रे" (लता और मनहर के साथ)।

भले हमने पहले ’पूरब और पश्चिम’ की बात कर ली, पर महेन्द्र कपूर, मनोज कुमार और देशभक्ति गीत की तिकड़ी की यह पहली फ़िल्म नहीं थी। इस तिकड़ी की पहली फ़िल्म थी 1965 की ’शहीद’ जिसमें मनोज कुमार ने शहीद भगत सिंह की भूमिका अदा की थी। महेन्द्र कपूर, मुकेश और राजेन्द्र मेहता का गाया "मेरा रंग दे बसन्ती चोला माय रंग दे" अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। बाद में समय समय पर इस गीत के कई संस्करण बने पर ’शहीद’ फ़िल्म के इस गीत का स्थान हमेशा शीर्षस्थ रहा। इसके दो वर्ष बाद मनोज कुमार लेकर आए अपनी अगली फ़िल्म ’उपकार’। इस गीत में महेन्द्र कपूर के गाए "मेरे देश की धरती सोना उगले" ने तो इतिहास रच डाला। इस गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। और फिर आया 1970 जब ’पूरब और पश्चिम’ प्रदर्शित हुई।

70 के दशक में भी मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर की जोड़ी बरक़रार रही हालाँकि इस दशक में मनोज कुमार ने देशभक्ति की कोई फ़िल्म नहीं बनाई। 1970 की फ़िल्म ’होली आई रे’ में महेन्द्र कपूर का गाया
"चल चल रे राही चल रे" भले सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना हो, पर देश की उन्नति के लिए सही राह पर चलने का सीख ज़रूर देती है। इसी तरह से 1972 की फ़िल्म ’शोर’ में आंशिक रूप से देशभक्ति गीत "जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम" में मन्ना डे और श्यामा चित्तर के साथ महेन्द्र कपूर ने अपनी जोशिली आवाज़ मिलाई और इस गीत को एक सुमधुर अंजाम दिया। और फिर आया 1981 का साल और प्रादर्शित हुई ’क्रान्ति’। और एक बार फिर से मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर ने देशभक्ति गीतों की परम्परा को आगे बढ़ाया। महेन्द्र कपूर की एकल आवाज़ में "अब के बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे" ने सिद्ध किया कि 80 के दशक में भी उनसे बेहतर देशभक्ति गीत गाने वाला दूसरा कोई नहीं। इसी फ़िल्म में लता मंगेशकर, मन्ना डे, शैलेन्द्र सिंह और नितिन मुकेश के साथ "दिलवाले तेरा नाम क्या है, क्रान्ति क्रान्ति" गीत में महेन्द्र कपूर की आवाज़ की गूंज दिल को छू गई। ’क्रान्ति’ के बाद मनोज कुमार की देशभक्ति की फ़िल्में दर्शकों के दिलों को छू न सकी और फ़िल्में फ़्लॉप होती गईं। ऐसी ही एक फ़्लॉप फ़िल्म थी 1989 की ’क्लर्क’ जिसमें महेन्द्र कपूर के दो देशभक्ति गीत थे; पहला लता मंगेशकर के साथ "झूम झूम कर गाओ रे, आज पन्द्रह अगस्त है" तथा दूसरा गीत उनकी एकल आवाज़ में था "कदम कदम बढ़ाए जा, ख़ुशी के गीत गाएजा"। इस गीत को भी पहले कई कलाकारों ने गाया होगा, पर महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने इस गीत के जस्बे को आसमाँ तक पहुँचा दिया।

महेन्द्र कपूर ने केवल मनोज कुमार ही की फ़िल्मों में देशभक्ति गीत गाए हैं ऐसी बात नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महेन्द्र कपूर का गाया पहला फ़िल्मी देशभक्ति गीत आया था 1959 की फ़िल्म ’नवरंग’ में। कहना ज़रूरी है कि ’सोहनी महिवाल’ के बाद ’नवरंग’ ही वह फ़िल्म थी जिसमें महेन्द्र कपूर के गाए गीतों ने उन्हें पहली-पहली बड़ी सफलता दिलाई थी। भरत व्यास के लिखे देशभक्ति गीत "ना राजा रहेगा, ना रानी रहेगी, यह दुनिया है फ़ानी फ़ानी रहेगी, ना जब एक भी ज़िन्दगानी रहेगी, तो माटी सबकी कहानी कहेगी" को गा कर महेन्द्र कपूर ने पहली बार देशभक्ति गीत की उनकी अपार क्षमता का नमूना प्रस्तुत किया था। इस गीत में छत्रपति शिवाजी और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों का उल्लेख मिलता है। इस फ़िल्म के बाद 1963 की फ़िल्म ’कण कण में भगवान’ में महेन्द्र कपूर को देशभक्ति गीत गाने का मौका मिला। गीतकार एक बार फिर भरत व्यास। इनका लिखा और शिवराम कृष्ण का स्वरबद्ध किया यह गीत था "भारत भूमि महान है, तीर्थ इसके प्राण, चारों दिशा में चौमुख दीप से इसके चारों धाम है"। 

1965 में ’शहीद’ के अलावा एक और उल्लेखनीय फ़िल्म थी ’सिकन्दर-ए-आज़म’ जिसमें रफ़ी साहब का गाया "वो भारत देश है मेरा" सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति गीतों में शामिल होने वाला गीत था। इसी फ़िल्म में महेन्द्र कपूर ने भी एक सुन्दर देशभक्ति गीत गाया "ऐ माँ, तेरे बच्चे कई करोड़..."। अगर रफ़ी साहब के गीत में भारत का गुणगान हुआ है तो राजेन्द्र कृष्ण के लिखे महेन्द्र कपूर के इस गीत में देश के लिए मर मिटने का जोश जगाया गया है। संगीतकार हंसराज बहल का इस गीत के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ को चुनना उचित निर्णय था। हमारी महान संस्कृति ने हमारी इस धरती को दिए हैं अनगिनत ऐसी संताने जो इस देश पर मत मिट कर हमें भी इसी राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। अपनी शौर्य और पराक्रम की गाथा से हमें देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की पाठ पढ़ाते हैं। और ऐसी ही महामानवों की अमर गाथा को अपनी आवाज़ से और ओजस्वी बना दिया है महेन्द्र कपूर ने। 1972 में एक देशभक्ति फ़िल्म बनी थी ’भारत के शहीद’ के शीर्षक से। देशभक्ति गीतों के गुरु प्रेम धवन को गीतकार-संगीतकार के रूप में लिया गया। इस फ़िल्म में यूं तो कई देशभक्ति गीत थे, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ महेन्द्र कपूर का गाया "संभालो ऐ वतन वालों, वतन अपना संभालो"। इन्हीं की आवाज़ में इस फ़िल्म के दो और गीत थे "मोहनदास करमचन्द गांधी, परम पुजारी अहिंसा के" और "इधर सरहद पे बहता है लहू अपने जवानों का"। 1975 में युद्ध पर बनी फ़िल्म ’आक्रमण’ में आशा भोसले के साथ मिलकर महेन्द्र कपूर ने एक देशभक्ति क़व्वाली गाई जिसके बोल थे "पंजाबी गाएंगे, गुजराती गाएंगे, आज हम सब मिल कर क़व्वाली गाएंगे"। सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना होते हुए भी राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देता है यह गीत।

80 के दशक में महेन्द्र कपूर के कई देशभक्ति गीत सुनाई दिए। ’होली आई रे’, ’उपकार’ और ’पूरब और पश्चिम’ में कल्याणजी-आनन्दजी संगीतकार थे तो ’शोर’ और ’क्रान्ति’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। 80 के दशक में लक्ष्मी-प्यारे ने महेन्द्र कपूर से कई गीत गवाए। 1981 की ’क्रान्ति’ के बाद 1982 की फ़िल्म ’राजपूत’ में मनहर और हेमलता के साथ उनका गाया "सबने देश का नाम लिया, हमने दिल को थाम लिया" गीत था। 1985 की फ़िल्म ’सरफ़रोश’ में भी लक्ष्मी-प्यारे ने कपूर साहब से देशभक्ति गीत गवाए जिसके बोल थे "तन्दाना तन्दाना, याद रखना भूल ना जाना, वीर अमर शहीदों की यह क़ुरबानी, देश भक्त भगत सिंह की यह कहानी"। इस गीत में सुरेश वाडकर ने भी अपनी आवाज़ मिलाई। 1987 की फ़िल्म ’वतन के रखवाले’ में तो एल.पी. ने महेन्द्र कपूर से फ़िल्म का शीर्षक गीत ही गवा डाला, जिसके सुन्दर बोल थे "जिस धरती के अंग अंग पर रंग शहीदों ने डाले, उस धरती को दाग़ लगे ना देख वतन के रखवाले"। ये बोल थे मजरूह सुल्तानपुरी के।

एक और संगीतकार जिनके लिए महेन्द्र कपूर ने बहुत से गाए हैं, वो हैं रवि। फ़िल्म ’हमराज़’ में "ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो" को देशभक्ति गीत तो नहीं कहा जा सकता, पर सर उठा कर जीने की सलाह ज़रूर दी गई है। आगे चल कर 80 के दशक में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों में रवि साहब के संगीत निर्देशन में महेन्द्र कपूर ने बहुत से गीत गाए जिनमें कुछ देशभक्ति गीत भी थे। 1984 की फ़िल्म ’आज की आवाज़’ में शीर्षक गीत सहित दो देशभक्ति गीत थे। शीर्षक गीत "आज की आवाज़ जाग ऐ इंसान" और दूसरा गीत था "रो रो कर कहता है हिमालय और गंगा का पानी, आज़ादी पा कर भी हमने क़दर ना इसकी जानी, भारत तो है आज़ाद हम आज़ाद कब कहलाएंगे, कभी रामराज के दिन अब आयेंगे कि ना आयेंगे"। गीतकार हसन कमाल। 1987 की फ़िल्म ’आवाम’ में भी रवि का संगीत था जिसमें हसन कमाल ने "रघुपति राघव राजा राम" गीत को आगे बढ़ाते हुए लिखा है "ऐ जननी ऐ हिन्दुस्तान तेरा है हम पर अहसान, तेरी ज़मीं पर जनम लिया जब मैं बढ़ी तब अपनी शान, तन मन धन तुझपे कुरबान कोटी कोटी है तुझको प्रणाम, रघुपति राघव राजा राम"। इस गीत को महेन्द्र कपूर और आशा भोसले ने गाया था।

बी. आर. चोपड़ा ने 1983 में ’मज़दूर’ शीर्षक से एक फ़िल्म बनाई थी जिसके संगीत के लिए राहुल देव बर्मन को साइन करवा कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। और पंचम ने भी चोपड़ा साहब की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए महेन्द्र कपूर के लिए तैयार किया एक देशभक्ति गीत। एक बार फिर हसन कमाल के लिखे इस गीत ने धूम मचाई। गीत के बोल थे "हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे, एक बाग़ नहीं एक खेत नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे..."। मज़दूरों की आवाज़ बन कर महेन्द्र कपूर की आवाज़ ऐसी गूंजी कि फ़िल्म के फ़्लॉप होने के बावजूद यह गीत रेडियो पर सालों तक देशभक्ति गीतों के कार्यक्रम में बजता रहा। 1984 में एक कमचर्चित फ़िल्म आई थी ’आज के शोले’ जिसमें सत्यम और कमलकान्त का संगीत था। इस फ़िल्म के शुरुआती सीन में ही महेन्द्र कपूर का गाया एक देशभक्ति गीत था जिसके बोल हैं "वतन की आबरू पर जान देने वाले जागे हैं, हमारे देश के बच्चे ज़माने भर से आगे हैं, लेके सर हथेली पर ये नन्ही नन्ही जाने, आज चली है दुनिया से ये ज़ुल्म का नाम मिटाने"।

इस तरह से महेन्द्र कपूर ने हर दौर के गीतकारों और संगीतकारों के लिए देशभक्ति गीत गाए। सी. रामचन्द्र, शिवराम कृष्ण, हंसराज बहल, प्रेम धवन, कल्याणजी-आनन्दजी, रवि, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, उत्तम-जगदीश के संगीत में महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने भरत व्यास, प्रेम धवन, मजरूह, इन्दीवर, हसन कमाल, संतोष आनन्द जैसे गीतकारों की रचनाओं को अमर बना दिया। जब जब वतन की आन-बान और यशगाथा के वर्णन करने की बात आती थी किसी गीत में, तब तब महेन्द्र कपूर की आवाज़ जैसे और प्रखर हो उठती थी, और पूरे जोश के साथ निकल पड़ती थी उनकी ज़ुबान से।

आपकी बात

’चित्रकथा’ की पहली कड़ी को आप सभी ने सराहा, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। इस कड़ी की रेडरशिप 13 जनवरी तक 154 आयी है। हमारे एक पाठक श्री सुरजीत सिंह ने यह सुझाव दिया है कि क्यों ना इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में प्रकाशित की जाए! सुरजीत जी, आपका सुझाव बहुत ही अच्छा है, लेकिन फ़िलहाल समयाभाव के कारण हम ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। भविष्य में अवकाश मिलने पर हम इस बारे में विचार कर सकते हैं, पर इस वक़्त ऐसा संभव नहीं, इसके लिए हमें खेद है।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, June 4, 2016

"हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...", क्यों राज कपूर ने किया था महेन्द्र कपूर से गीत गवाने का वादा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 83
 

'हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 83-वीं कड़ी में आज जानिए 1964 की मशहूर फ़िल्म ’संगम’ के गीत "हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर, मुकेश और महेन्द्र कपूर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत शंकर जयकिशन का। 


बात 60 के दशक के शुरुआत की होगी, एक स्टेज शो के लिए राज कपूर ताशकन्द गए और अपने साथ महेन्द्र कपूर जी को भी ले गए। ताशकन्द उस समय USSR का हिस्सा हुआ करता था। और रूस में राज कपूर बहुत लोकप्रिय थे। राज कपूर का शो ज़बरदस्त हिट शो, इस शो में राज कपूर ने भी कुछ गाने गाए, उन गानों पर महेन्द्र कपूर ने हारमोनियम बजा कर राज कपूर का साथ दिया। इस शो के लिए महेन्द्र कपूर ने ख़ास तौर से हिन्दी गानों का रूसी भाषा में अनुवाद करके तैयार कर रखा था। जब उनके गाने की बारी आई तब उन्होंने फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत "नीले गगन के तले..." को रूसी भाषा में जो गाया तो लोग झूम उठे। और महेन्द्र कपूर का नाम लेकर "once more, once more" का शोर मचाने लगे। जनता का यह रेस्पॉन्स देख कर राज कपूर ने महेन्द्र कपूर से कहा कि "देखा, एक कपूर ही दूसरे कपूर को मात दे सकता है!" शायद इसलिए कहा होगा कि राज कपूर की परफ़ॉरमैन्स के बाद महेन्द्र कपूर को रूसी जनता से उनके गीत का जो रेसपॉन्स मिला वो राज कपूर उम्मीद नहीं कर रहे थे। ज़ाहिर है कि राज कपूर के रेसपॉन्स से महेन्द्र कपूर को रेसपॉन्स ज़्यादा मिला। राज कपूर महेन्द्र कपूर से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महेन्द्र से कहा कि मैं चाह कर भी मेरे गाने तुमसे नहीं गवा सकता क्योंकि तुम तो जानते ही हो कि मेरी आवाज़ मुकेश है, मेरे सारे गाने मुकेश ही गाते हैं। महेन्द्र जी बोले, "मुकेश जी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं, इसलिए मैं चाहता भी नहीं कि उनके गाने मैं गाऊँ"। इस पर राज साहब बोले कि लेकिन मैं एक वादा करता हूँ कि मेरी अगली फ़िल्म में जो दूसरा हीरो होगा, उसके लिए तुम ही गाना गाओगे। महेन्द्र कपूर ने मज़ाक में राज कपूर से कहा कि "राज जी, आप बहुत बड़े आदमी हैं, भारत लौट कर आपको यह वादा कहाँ याद रहेगा?" उस वक़्त राज कपूर सिगरेट पी रहे थे, सिगरेट की एक कश लेकर मुंह से निकाली सिगरेट और जलती हुई सिगरेट से अपने हाथ पे एक निशान दाग़ दिया और बोले, "तुम फ़िकर मत करो, यह जला निशान मुझे अपना वादा भूलने नहीं देगा।"

इस घटना के बाद जब राज कपूर और महेन्द्र कपूर हिन्दुस्तान लौट कर आए तो राज कपूर ने अपने वादे के अनुसार अगली ही फ़िल्म ’संगम’ में दूसरे नायक राजेन्द्र कुमार के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ में गाना रेकॉर्ड किया और ताशकन्द में किए अपने वादे को निभाया। गाना था "हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा, दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जाएगा..."। इस गीत के साथ महेन्द्र कपूर की कुछ यादें मुकेश की भी जुड़ी हुई हैं। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों में’ कार्यक्रम में इस बारे में महेन्द्र जी ने कहा था, "मुझे जब "नीले गगन के तले..." के लिए फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला, तो किसी भी दूसरे सिंगर ने मुझे फ़ोन करके बधाई नहीं दी। एक रात मेरा नौकर आकर मुझसे कहा कि बाहर मुकेश जी आए हैं, आप से मिलना चाहते हैं। मैं तो हैरान रह गया कि मुकेश जी आए हैं मेरे घर। मैं भागता हुआ बाहर गया तो बोले, आओ यार, मेरी पत्नी से कहा कि भौजी, लड्डू शड्डू बाँटों। फिर मुझसे कहा कि ऐसे ही काम करते रहो, बहुत अच्छा होगा तुम्हारा। उन्हें कोई कॉम्प्लेक्स नहीं था कि कौन छोटा है कौन बड़ा है। एक बार मेरे बेटे के स्कूल के प्रिन्सिपल ने मुझसे अनुरोध किया कि आप मुकेश जी से अनुरोध करें कि हमारे स्कूल के फ़ंक्शन में आएँ। मैंने कहा कि ठीक है मैं उनसे कहूँगा। उस समय हम ’संगम’ के गीत की रेकॉर्डिंग् पर मिल रहे थे। मैंने उनसे कहा कि ऐसा है, मेरे बेटे के स्कूल फ़ंक्शन में आप गाएँगे? उन्होंने कहा कि हाँ, गा दूँगा। तो मैंने उनसे पूछा कि आप पैसे कितने लेंगे? उन्होंने कहा कि वो 3000 लेते हैं। मुकेश जी ने यह भी कहा कि वो वहाँ पर ज़्यादा देर नहीं ठहरेंगे, गाना गा कर आ जाएँगे। तो मैंने स्कूल के प्रिन्सिपल से कह दिया कि मुकेश जी गाएँगे और गाना हो जाने के बाद उन्हें 3000 रुपये उसी वक़्त दे दिया जाए। तो मुकेश जी वहाँ गए, सात-आठ गाने गाए, लेकिन पैसे लिए बिना ही वापस चले गए। अगले दिन जब वो मुझसे मिले तो कहा कि कल बड़ा मज़ा आया स्कूल में बच्चों के साथ। मैंने पूछा कि मुकेश जी, आपने पैसे तो ले लिए थे ना? वो बोले, कैसे पैसे? मैंने कहा कि आप ने जो कहा था कि 3000 रुपये? बोले, मैंने कहा था कि मैं 3000 लेता हूँ, पर यह नहीं कहा था कि मैं 3000 लूँगा। महेन्द्र, एक बात बताओ, अगर कल नितिन उसके महेन्द्र अंकल से कहेगा कि चाचाजी, आप मेरे स्कूल में गाना गाओ तो क्या आप उसके लिए पैसे लोगे?" लीजिए अब अप फिल्म 'संगम' का वही गीत सुनिए। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, May 3, 2015

भैरव थाट के राग : SWARGOSHTHI – 217 : BHAIRAV THAAT



स्वरगोष्ठी – 217 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 4 : भैरव थाट

राग भैरव और जोगिया के स्वरों में शिव की आराधना


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे भैरव थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरव में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरव थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग जोगिया के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान में प्रचलित थाट पद्धति पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित है। भातखण्डे जी ने गम्भीर अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तत्कालीन प्रचलित राग-वर्गीकरण की जितनी भी पद्धतियाँ उत्तर भारतीय संगीत में प्रचार में आईं और उनके काल में अस्तित्व में थीं, उनके रागों के वर्गीकरण के नियम आज के रागों पर लागू नहीं हो सकता। गत कुछ शताब्दियों में सभी रागों में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन हुए हैं, अतः उनके पुराने और नए स्वरूपों में कोई समानता नहीं है। भातखण्डे जी ने तत्कालीन राग-रागिनी प्रणाली का परित्याग किया और इसके स्थान पर जनक मेल और जन्य प्रणाली को राग वर्गीकरण की अधिक उचित प्रणाली माना। उन्हें इस वर्गीकरण का आधार न केवल दक्षिण में, बल्कि उत्तर में ‘राग-तरंगिणी’, ‘राग-विबोध’, ‘हृदय-कौतुक’, और ‘हृदय-प्रकाश’ जैसे ग्रन्थों में मिला।

आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘भैरव’। इस थाट में प्रयोग किये जाने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म, प, ध॒(कोमल), नि । अर्थात ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। थाट ‘भैरव’ का आश्रय राग ‘भैरव’ ही है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग ‘भैरव’ में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। राग में आरोह के स्वर- सारे(कोमल)गम प(कोमल) निसां तथा अवरोह के स्वर- सांनि(कोमल) पमग रे(कोमल) सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग भैरव के स्वर समूह भक्तिरस का सृजन करने में समर्थ हैं। इस राग का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए अब हम आपको विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे के स्वरों में राग भैरव का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं।

डॉ. प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर सरगम विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिवशंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे




कमल बारोट 
महेन्द्र कपूर
‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- ‘अहीर भैरव’ ‘गौरी’ ‘नट भैरव’ ‘वैरागी’ ‘रामकली’, ‘गुणकली’, ‘कलिंगड़ा’, ‘जोगिया’, ‘विभास’ आदि। आज हम आपको राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा रे(कोमल) म प (कोमल) सां और अवरोह के स्वर हैं- सां नि (कोमल) प (कोमल) म रे(कोमल) सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। यह गीत वास्तव में शिव वन्दना है। अनेक विद्वानो का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर...’ : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पचास के दशक की फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 215वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- अद्धा त्रिताल या पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका प्रीति सागर। इस बार की पहेली में हमारे दो नए श्रोता / पाठकों ने भाग लिया है। दिल्ली की दिशा भटनागर ने दूसरे और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। किसी अज्ञात स्थान से प्रसीत मुखर्जी ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर दिया है। श्री मुखर्जी से अनुरोध है कि भविष्य में पहेली का उत्तर ई-मेल से ही दिया करें। उनका COMMENT में दिया गया उत्तर हमने शनिवार तक प्रकाशित होने से रोक दिया था। इसके साथ ही जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिया है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे भैरव थाट और और उसके रागों पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, September 20, 2014

"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" - क्यों नहीं माने साहिर इस गीत की अवधि को छोटा करने के सुझाव को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 41
 

तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 41वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'धूल का फूल' के सदाबहार युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." के बारे में। 

बी.आर.चोपड़ा व यश चोपड़ा

हिन्दी फ़िल्म जगत में कई मशहूर कैम्प रहे हैं, जैसे कि राज कपूर कैम्प, बी.आर. चोपड़ा कैम्प, ॠषीकेश मुखर्जी कैम्प आदि। कैम्प का अर्थ है उन कलाकारों का समूह जो हर फ़िल्म में स्थायी रहे। उदाहरणस्वरूप राज कपूर कैम्प में शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र-हसरत और मुकेश स्थायी सदस्य रहे हैं। वैसे ही बी. आर. चोपड़ा कैम्प में साहिर लुधियानवी, रवि और महेन्द्र कपूर ने लम्बी पारी खेली। बी. आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित दूसरी फ़िल्म 'नया दौर' में साहिर साहब ने गीत तो लिखे पर संगीतकार थे ओ. पी. नय्यर और गाने भी रफ़ी साहब ने गाये। उनकी अगली फ़िल्म 'साधना' में संगीतकार बने एन. दत्ता, गीतकार साहिर ही रहे। तीसरी फ़िल्म 'धूल का फूल' में साहिर और एन. दत्ता के साथ-साथ नवोदित गायक महेन्द्र कपूर की एन्ट्री हुई चोपड़ा कैम्प में। अगली फ़िल्म 'कानून' में कोई गीत नहीं था। और 1964 में फ़िल्म 'गुमराह' से बी. आर. चोपड़ा के स्थायी संगीतकार बने रवि। और इसी फ़िल्म से चोपड़ा कैम्प में रवि, साहिर लुधियानवी और महेन्द्र कपूर की तिकड़ी बनी जिसने एक लम्बे समय तक एक के बाद एक मशहूर नग़मे श्रोताओं को दिये। 'गुमराह', 'वक़्त', 'आदमी और इंसान', 'हमराज़', 'धुन्ध' आदि फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों से सभी अवगत हैं। आज ज़िक्र है 1959 की फ़िल्म 'धूल का फूल' के मशहूर युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." का। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह थी कि यह यश चोपड़ा निर्देशित पहली फ़िल्म थी और अभिनेत्री माला सिन्हा की शुरुआती कामयाब फ़िल्मों में से एक। इस गीत में नायक राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा स्टेज पर यह गीत गा रहे हैं, बल्कि यूँ कहें कि एक सुरीला मुकाबला हो रहा है, सवाल जवाब हो रहे हैं। इस गीत के निर्माण के साथ दो रोचक किस्से जुड़े हुए हैं।

बायें से - यश चोपड़ा, महेन्द्र कपूर, साहिर लुधियानवी, एन. दत्ता
पहला किस्सा है गायक महेन्द्र कपूर से जुड़ा हुआ। हुआ यूँ कि यश चोपड़ा को 'धूल का फूल' निर्देशित करने का मौका उनके बड़े भाई-साहब ने दिया। तो गीतों की रेकॉर्डिंग के लिए स्टुडियो बुक करने के लिए वो उस ज़माने के मशहूर रेकॉर्डिस्ट कौशिक साहब के पास पहुँचे। उसी दिन नवोदित गायक महेन्द्र कपूर ने उसी स्टुडियो में नौशाद के संगीत निर्देशन में 'सोहनी महिवाल' फ़िल्म का एक गीत रेकॉर्ड करवाया था जिसके बोल थे "चाँद छुपा और तारे डूबे..."। फ़िल्म के बाकी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में थे, बस यही गीत महेन्द्र कपूर से गवाया था नौशाद साहब ने क्योंकि महेन्द्र कपूर जिस प्रतियोगिता के विजेता बने थे उसके जज नौशाद साहब थे। पुरस्कारस्वरूप यह मौका उन्होंने दिया था महेन्द्र कपूर को। ख़ैर, तो यश चोपड़ा को कौशिक साहब ने महेन्द्र कपूर का उसी दिन रेकॉर्ड किया हुआ गीत बजा कर सुनवाया और साथ ही यश जी से पूछा कि बताइये ज़रा कि यह गायक कौन हैं? यश चोपड़ा ने कहा कि यह तो रफ़ी साहब की आवाज़ है, और किसकी? कौशिक साहब के यह कहने पर कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं बल्कि महेन्द्र कपूर ने गाया है, यश चोपड़ा को यकीन ही नहीं हुआ। पर कौशिक साहब ने जब गीत को बार बार बजाकर सुनवाया तो यश साहब को आवाज़ में थोड़ा फ़र्क महसूस हुआ और मान गये। घर वापस आकर यश चोपड़ा ने बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा को जब यह बात बतायी तो बड़े भाई साहब को भी उत्सुकता हुई इस आवाज़ को सुनने की। यश जी ने उनसे यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि 'धूल का फूल' में लता जी के साथ "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" की जो परिकल्पना बन रही है, उसमें वो महेन्द्र कपूर की आवाज़ लेना चाहते हैं। बी. आर. चोपड़ा मान गये और तब दोनों भाइयों ने मिल कर महेन्द्र कपूर के साथ सम्पर्क स्थापित किया उनके सिनेमाटोग्राफ़र के ज़रिये जिनकी पत्नी महेन्द्र कपूर की माँ की सहेली हुआ करती थीं। टेलीफ़ोन पर न्योता मिलने के बाद महेन्द्र कपूर बी. आर. फ़िल्म्स के दफ़्तर में गये जो उस समय कारदार स्टुडियो के पास हुआ करता था। यश चोपड़ा उन्हें फ़िल्म के संगीतकार दत्ता नाईक, यानी एन. दत्ता के पास ले गये। ख़ूब गाने की रिहर्सल हुई और इस तरह से महेन्द्र कपूर ने पहली बार लता मंगेशकर के साथ युगल गीत गाया। ऐसा सुनने में आया था कि लता जी के साथ गाना है यह जान कर जहाँ एक तरफ़ महेन्द्र कपूर की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, वहीं दूसरी ओर वो नर्वस भी बहुत हो गये थे लता जी को सामने देख कर। पर लता जी ने जब उन्हें साहस दिया और हौसला बढ़ाया, तब जा कर उन्हें थोड़ी शान्ति मिली। गीत की रेकॉर्डिंग के बाद लता जी ने उनकी तारीफ़ भी की थी। 'धूल का फूल' के सब गाने चल गये, और यहाँ का दस्तूर यही है कि अगर कोई फ़िल्म कामयाब होती है तो अगले फ़िल्म में वही टीम रिपीट की जाती है। और इस तरह से महेन्द्र कपूर को आगे भी बी. आर. फ़िल्म्स में गाने के मौके मिलते चले गये।

साहिर व यश चोपड़ा
और अब आते हैं इस गीत से जुड़े दूसरे किस्से पर। "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." गीत फ़ाइनल रिहर्सल हो कर रेकॉर्डिंग के लिए तैयार हो चुका था। तभी एन. दत्ता के सहायक ने उन्हें बताया कि इस गीत की अवधि ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी हो गई है। उस ज़माने में किसी फ़िल्मी गीत की अवधि 3 मिनट से 5 मिनट तक की होती थी, क़व्वाली या कोई ख़ास गीत हो तो ही 6 या 7 मिनट की हो सकती थी, पर ऐसा बहुत कम ही था। ऐसे में "तेरे प्यार का आसरा...", जो कि एक सामान्य रोमांटिक युगल गीत था, इसकी अवधि हो गई थी कुल 6 मिनट और लगभग 40 सेकण्ड। सहायक की बात सुन कर एन. दत्ता को भी लगने लगा कि वाकई यह गीत काफ़ी लम्बा हो गया है। लेकिन किसी की क्या मजाल जो यह बात साहिर लुधियानवी को जाकर कहे। साहिर साहब अपने लिखे किसी भी गीत के साथ कोई छेड़-छाड़, काँट-छाँट या फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। ऐसे में एन. दत्ता कैसे उन्हे कहें कि गीत के कुछ अन्तरे काटने पड़ेंगे? इसलिए उन्होंने यह बात जाकर यश चोपड़ा को बताई। यश चोपड़ा ने गीत को सुना और उन्हे भी गीत काफ़ी लम्बा लगा, और उन्होंने तय किया कि वो ख़ुद साहिर साहब से बात करेंगे। जब साहिर साहब को उन्होंने बताया कि गीत के कुल सात अन्तरों में से दो अन्तरे कम करने पड़ेंगे तो साहिर ने उन्हें समझाया कि देखिये, यह किसी आम सिचुएशन का युगल गीत नहीं है, यह एक प्रतियोगितामूलक गीत है। स्टेज पर नायक और नायिका के बीच में लड़ाई चल रही है, इसलिए इसका थोड़ा लम्बा होना स्वाभाविक है। गीत को छोटा कर देंगे तो यह प्रतियोगितामूलक गीत नहीं बल्कि इस सिचुएशन का एक महज़ औपचारिक गीत बन कर रह जायेगा। सिचुएशन का इम्पैक्ट ही ख़त्म हो जायेगा। साहिर साहब के समझाने पर भी यश जी जब किन्तु-परन्तु करने लगे तो साहिर साहब ने थोड़े कड़े शब्दों में उनसे कहा कि अगर वाक़ई उन्हे लगता है कि गीत लम्बा हो गया है तो यह गीत उन्हे वापस दे दिया जाये, और इसके बदले वो कोई दूसरा गीत लिख कर दे देंगे, पर यह गीत ऐसे ही जायेगा, किसी भी तरह की कोई कटौती नहीं होगी इसमें। अब यश जी घबरा गये क्योंकि उन्हें यह गीत बहुत पसन्द था। गीत हाथ से निकल जायेगा सोच कर उन्होंने बात को यहीं ख़त्म करने की सोची और साहिर साहब से कहा कि वो इसी गीत को रखेंगे बिना किसी काट-छाँट के। इस तरह से गीत रेकॉर्ड हुआ और बेहद लोकप्रिय भी हुआ। फ़िल्म के पोस्टर पर भी लिखा गया "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ"। लोग थिएटर से फ़िल्म देख कर निकलते वक़्त इसी गीत को गुनगुनाते हुए पाये गये। बस, इतनी सी है इस गीत की कहानी। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।

फिल्म - धूल का फूल : 'तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...' : लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर : संगीत - एन. दत्ता : गीत - साहिर लुधियानवी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें  cine.paheli@yahoo.com  के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 8, 2013

राग जोगिया में भक्तिरस


  

स्वरगोष्ठी – 145 में आज

रागों में भक्तिरस – 13 

‘हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की तेरहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे राग जोगिया में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का राग जोगिया पर आधारित एक शिव-स्तुति और इसके बाद विदुषी कला रामनाथ का वायलिन पर बजाया राग जोगिया प्रस्तुत करेंगे। अन्त में इसी राग पर आधारित कन्नड के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और सन्त पुरन्दर दास की भक्ति रचना नचिकेता शर्मा के स्वरों में आप सुनेगे।
  


महेन्द्र कपूर 
कमाल बारोट 
भारतीय संगीत में भक्तिरस की धारा का अजस्र प्रवाह वैदिककाल से ही होता आया है। ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी के बीच अनेक सन्त कवियों और संगीतकारों ने इस परम्परा को पुष्ट किया है। आज के इस अंक में हम आपको कन्नड के सुप्रसिद्ध सन्तकवि और संगीतकार सन्त पुरन्दर दास की एक भक्तिरचना सुनवाने के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी देंगे। परन्तु उससे पहले भारतीय संगीत के एक भक्तिरस प्रधान राग जोगिया की चर्चा करेंगे। भक्तिरस के वैराग्य भाव को उभारने में राग जोगिया एक आदर्श राग है। प्रथम प्रहर अर्थात सूर्योदय के समय गाया-बजाया जाने वाला यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कर्नाटक संगीत पद्यति का राग सावेरी, इस राग के समतुल्य होता है। राग जोगिया के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। आरोह में ऋषभ और धैवत कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। अवरोह के दो रूप प्रचलित है। अवरोह के पहले रूप में गान्धार और निषाद स्पष्ट होता है। यह रूप कर्नाटक पद्यति के राग सावेरी के निकट होता है। दूसरे रूप में कोमल गान्धार स्वर केवल अवरोह में प्रयोग होता है, वह भी मात्र कण रूप में। यह रूप राग गुणकली के निकट हो जाता है। अवरोह में सात स्वर का प्रयोग होता है। इस प्रकार यह राग औड़व-सम्पूर्ण जाति का है। राग जोगिया में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास अर्थात ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भैरव में ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार राग जोगिया में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का आन्दोलन नहीं होता, जबकि राग भैरव में ऐसा होता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है।

राग जोगिया पर आधारित एक बेहद आकर्षक शिव वन्दना का उपयोग फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में किया गया था। 1962 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने राग जोगिया के स्वरों का आधार लेकर यह वन्दना गीत स्वरबद्ध किया था। इसे पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर और गायिका कमल बारोट ने स्वर दिया है। पहले प्रस्तुत है, यही शिव-वन्दना।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर शम्भो...’ : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन : महेन्द्र कपूर और कमल बारोट



कला रामनाथ 
नचिकेता शर्मा 
राग जोगिया भक्तिरस के आध्यात्मिक और वैराग्य भाव की अनुभूति कराने में सक्षम है। राग के इस भाव की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको दो रचनाएँ सुनवाते हैं। पहले आप सुनेगे वायलिन पर राग जोगिया में निबद्ध एक भावपूर्ण रचना, जिसे प्रस्तुत कर रही हैं, विदुषी कला रामनाथ। आज की इस कड़ी के अन्त में आप कन्नड का एक भक्तिगीत भी सुनेगे जिसे युवा गायक नचिकेता शर्मा प्रस्तुत कर रहे हैं। राग जोगिया के स्वरों पिरोया यह भजन सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास की रचना है। कर्नाटक संगीत पद्यति के शीर्षस्थ संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास का जन्म कर्नाटक राज्य के शिवमोगा जनपद में स्थित क्षेमपुर नामक स्थान में एक सम्पन्न रत्न-व्यवसायी वरदप्पा नायक के घर 1484 ई. में हुआ था। बचपन में माता-पिता ने इनका नाम श्रीनिवास नायक रखा था। उन्होने कन्नड, संस्कृत भाषा और संगीत शास्त्र का गहन अध्ययन किया था। कर्नाटक संगीत पद्यति में उनकी असंख्य कृतियाँ और भगवान विट्ठल के प्रति समर्पित भजन भारतीय संगीत की अनमोल धरोहर हैं। इस अंक में गायक नचिकेता शर्मा के स्वरों में प्रस्तुत किये जा रहे कन्नड भाषा के इस भजन के गायन में तबला-संगति रवि गुटाला ने और हारमोनियम-संगति विवेक दातार ने की है। आप पहले वायलिन पर राग जोगिया फिर इसी राग में पिरोया सन्त पुरन्दर दास का भजन सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : वायलिन वादन : विदुषी कला रामनाथ




राग जोगिया : सन्त पुरन्दर दास रचित भक्तिपद : नचिकेता शर्मा




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हम आपको एक गीत का आरम्भिक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में ताल के मात्राओं की संख्या कितनी है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 147वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 143वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के गायन और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन की एक जुगलबन्दी रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे राग जोगिया में भक्तिरस के तत्त्व विषयक चर्चा की। अगले अंक में आप एक ऐसी भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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