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Saturday, November 28, 2015

बातों बातों में - 14 : गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके सुपुत्र ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत



बातों बातों में - 14

गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके बेटे ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत

जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं...



नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। इस बार हम आपके लिए लेकर आए हैं जाने-माने गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में उनके बेटे गालिब असद भोपाली से की गई लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। इनसे बातचीत की है कृष्णमोहन मिश्र ने। 



असद भोपाली
फिल्म-जगत में कुछ ऐसे भी सृजनशील रचनाकार हुए हैं, जिन्होने गुणबत्ता से कभी भी समझौता नहीं किया, चाहे फिल्म उन्हें किसी भी श्रेणी की मिली हो। फिल्म-जगत के एक ऐसे ही प्रतिभावान, स्वाभिमानी और संवेदनशील शायर-गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर “बातों बातों में” के इस अंक में हम चर्चा करेंगे। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविज़न धारावाहिक के पटकथा, संवाद और गीत लेखक ग़ालिब खाँ से हमारा सम्पर्क हुआ। मालूम हुआ कि अपने समय के चर्चित गीतकार असद भोपाली के आप सुपुत्र हैं। अपने स्वाभिमानी पिता से ही प्रेरणा पाकर ग़ालिब खाँ फिल्म और टेलीविज़न के क्षेत्र में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। हमने ग़ालिब साहब से अनुरोध किया कि वो अपने पिता असद भोपाली के बारे में हमारे साथ बातचीत करें। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने हमसे बातचीत की। प्रस्तुत है चार दशकों तक फिल्म-गीतकार के रूप में सक्रिय श्री असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र ग़ालिब खाँ से किये गये साक्षात्कार के सम्पादित अंश।

ग़ालिब असद भोपाली
कृष्णमोहन- ग़ालिब खाँ साहब, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के इस मंच पर हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।

ग़ालिब खाँ- धन्यवाद। आपने इस मंच पर मुझे अपने पिता जी के बारे में कुछ कहने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमी आपके पिता को असद भोपाली के नाम से जानते हैं। हम उनका वास्तविक नाम जानना चाहते हैं साथ ही यह भी जानना चाहेंगे कि आपके खानदान का सम्बन्ध भोपाल से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता असद उल्लाह खाँ का जन्म 10 जुलाई 1921 को भोपाल में हुआ था। उनके पिता यानि मेरे दादा मुंशी अहमद खाँ का भोपाल के आदरणीय व्यक्तियों में शुमार था। वे एक शिक्षक थे और बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाया करते थे। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी उनके शिष्यों में से एक थे। वो घर में ही बच्चों को पढ़ाया करते थे, इसीलिए मेरे पिताजी भी अरबी-फारसी के साथ साथ उर्दू में भी वो महारत हासिल कर पाए जो उनकी शायरी और गीतों में हमेशा झलकती रही। उनके पास शब्दों का खज़ाना था। एक ही अर्थ के बेहिसाब शब्द हुआ करते थे उनके पास। इसलिए उनके जाननेवाले संगीतकार उन्हें गीत लिखने की मशीन कहा करते थे।

कृष्णमोहन- फिल्म-जगत में आने से पहले एक शायर के रूप वो कितने लोकप्रिय थे?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता को शायरी का शौक़ किशोरावस्था से ही था। उस दौर में जब कवियों और शायरों ने आज़ादी की लड़ाई में अपनी कलम से योगदान किया था, उस दौर में उन्हें भी अपनी क्रान्तिकारी लेखनी के कारण जेल की हवा खानी पड़ी थी।

कृष्णमोहन- इसका अर्थ हुआ कि असद भोपाली साहब स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे।

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, आज़ादी की लड़ाई में हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें साहित्यकारों की भी भूमिका रही है। मेरे पिता ने एक बुद्धिजीवी के रूप में इस लड़ाई में अपना योगदान किया था। क्रान्तिकारी लेखनी के कारण अँग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। ये और बात है कि अँग्रेज़ जेलर भी उनकी 'गालिबी' का प्रशंसक हो गया था। (जी हाँ; वो अँग्रेज़ जेलर शायरी को 'गालिबी' कहा करता था)। जेल से छूटने के बाद मेरे पिता मुशायरों में हिस्सा लेते रहे।

कृष्णमोहन- स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी लेखनी से योगदान करने वाले शायर असद भोपाली साहब फिल्मी दुनिया में कैसे पहुंचे?

सुरैया
ग़ालिब खाँ- तब देश आज़ाद हो चुका था। उन दिनों हर छोटे-बड़े मुशायरे में उन्हें सम्मान से बुलाया जाता था। इसी शायरी ने उन्हें फिल्मनगरी मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँचा दिया। हुआ यूँ कि भोपाल टाकीज कि तरफ से एक मुशायरे का आयोजन किया गया था और शायरों की जबान में कहा जाए तो उन्होंने ये ‘मुशायरा लूट लिया’ था। नतीजा ये हुआ कि भोपाल टाकिज के मैनेजर मिस्बाह साहब ने उन्हें पाँच सौ रूपये दिये और फाजली ब्रदर्स का पता दिया, जिन्हें अपनी नयी फिल्म के गीतों के लिए एक माहिर शायर कि दरकार थी। वो सन 1949 में बम्बई आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। 'दुनिया' उनकी पहली फिल्म थी। संगीतकार थे सी. रामचन्द्र और मुख्य भूमिकाओं में करण दीवान, सुरैया, और याकूब जैसे महान कलाकार थे। इस फिल्म का गीत “अरमान लुटे दिल टूट गया...” लोकप्रिय भी हुआ था।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुनिया’ में आपके पिता असद भोपाली के लिखे इस पहले गीत को क्यों न हम श्रोताओं को सुनवाते चलें? 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, मेरे पिता के इस पहले फिल्मी गीत को श्रोताओं को ज़रूर सुनवाइए। 


फिल्म – दुनिया : “अरमान लुटे दिल टूट गया...” : गायिका - सुरैया 


 
कृष्णमोहन- बहुत दर्द भरा गीत है। अब आपसे हम यह जानना चाहेंगे कि फिल्म-जगत में स्थापित हो जाने के बाद असद साहब के शुरुआती दौर का सबसे लोकप्रिय गीत कौन सा है? 

ग़ालिब खाँ- शुरुआती दौर में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर और हुस्नलाल भगतराम जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम किया था। बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित सफलतम फिल्म 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा भी मनवा लिया। फिल्म का एक गीत -“किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता है, ऐ दुनिया वालों सच तो कहो क्या प्यार भी झूठा होता है...” आज भी लोगों को याद है। मुझे अपने पिता के लिखे गीतों में यह गीत बेहद पसंद है। कृष्णमोहन जी, क्या यह गीत हम श्रोताओं को सुनवा सकते हैं? 

कृष्णमोहन- अवश्य, मैं स्वयं आपसे यही कहना चाह रहा हूँ। तो “बातों बातों में” के प्रिय पाठकों-श्रोताओं, आप सुनिए हमारे आज के अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ की पसन्द का गीत, जिसे उनके पिता और सुप्रसिद्ध शायर-गीतकार असद भोपाली ने 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘अफसाना’ के लिए लिखा था। आप यह गीत सुनें। 


फिल्म – अफसाना : “किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली...” : गायक – मुकेश 




ग़ालिब खाँ- फिल्म ‘अफसाना’ के गीत से उन्हें लोकप्रियता तो मिली, परन्तु फिल्म की सफलता के सापेक्ष उन्हें काम नहीं मिला। उस समय के कलाकारों को काम से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, उन्होंने भी किया। 1963 में प्रदर्शित फिल्म 'पारसमणि' के गीत लिखने का उन्हें प्रस्ताव मिला। यह एक फेण्टेसी फिल्म थी। फिल्म की संगीत-रचना के लिए नये संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को अनुबन्धित किया गया था। मेरे पिता ने उस समय की जन-रुचि और फिल्म की थीम के मुताबिक इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। फिल्म ‘पारसमणि’ के गीत- "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." और "वो जब याद आये, बहुत याद आये..." ने लोकप्रियता के परचम लहरा दिये थे। ये गीत वर्षों बाद आज भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं। 

कृष्णमोहन- आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम इस फिल्म का एक गीत अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाते चलें। 

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, मेरे खयाल से हम अपने पाठकों को ‘पारसमणि’ का बेहद लोकप्रिय गीत– “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” सुनवाते हैं। 


फिल्म – पारसमणि : “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” : स्वर – लता मंगेशकर और कमल बरोट 



कृष्णमोहन- बहुत ही मधुर गीत आपने सुनवाया। ग़ालिब साहब; अब हम जानना चाहेंगे की आपके पिता असद भोपाली ने किन-किन संगीतकारों के साथ काम किया और किन संगीतकारों से उनके अत्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने संगीतकार सी. रामचन्द्र, हुस्नलाल-भगतराम, खैय्याम, हंसराज बहल, एन. दत्ता, नौशाद, ए.आर. कुरैशी (मशहूर तबलानवाज़ अल्लारक्खा), चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, सोनिक ओमी, राजकमल, लाला सत्तार, हेमन्त मुखर्जी, कल्याणजी-आनन्दजी जैसे दिग्गज संगीतकरों के साथ काम किया। परन्तु ‘पारसमणि’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ सफलतम गीत देने के बाद नए संगीतकारों के साथ काम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अन्त तक चलता रहा। नए संगीतकारों में गणेश और उषा खन्ना के साथ वो अधिक सहज थे। संगीतकार राम लक्ष्मण उनके अन्तिम संगीतकार साथियों में से हैं, जिनके पास आज भी उनके कई मुखड़े और गीत लिखे पड़े हैं। 

कृष्णमोहन- असद भोपाली जी ने हर श्रेणी की फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं, किन्तु उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जो उन्हें बहुत पहले ही मिलना चाहिए था। इस सम्बन्ध में आपका और आपके परिवार का क्या मत है? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने 1949 से 1990 तक लगभग चार सौ फिल्मों में दो हज़ार से ज्यादा गीत लिखे परन्तु फिल्म ‘दुनिया’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ के गीत "कबूतर जा जा जा..." तक उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे। इस अन्तिम फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड प्राप्त हुआ था। दरअसल इस स्थिति के लिए वो खुद भी उतने ही ज़िम्मेदार थे, जितनी ये फिल्म नगरी। कवियों और शायरों वाली स्वाभाविक अकड़ उन्हें काम माँगने से रोकती थी और जीवनयापन के लिए जो काम मिलता गया वो करना पड़ा। बस इतना ध्यान उन्होने अवश्य रखा था कि कभी अपनी शायरी का स्तर नहीं गिरने दिया। कम बजट की स्टंट फिल्मों में भी उन्होंने "हम तुमसे जुदा हो के, मर जायेंगे रो-रो के..." जैसे गीत लिखे। अपेक्षित सफलता न मिलने से या यूँ कहूँ कि उनकी असफलता ने उन्हें शराब का आदी बना दिया था और उनकी शराब ने पारिवारिक माहौल को कभी सुखद नहीं होने दिया। पर आज जब मैं उनकी स्थिति को अनुभव कर पता हूँ तो समझ में आता है कि जितना दुःख उनकी शराब ने हमें दिया उससे ज्यादा दुःख वो चुपचाप पी गए और हमें एहसास तक नहीं होने दिया। 

प्रसिद्ध शायर ग़ालिब के हमनाम (असद उल्लाह् खाँ) होने के साथ-साथ स्वभाव, संयोग और भाग्य भी उन्होंने कुछ वैसा ही पाया था। मेरे पिता के अन्तर्मन का दर्द उनके गीतों में झलकता है। दर्द भरे गीतों की लम्बी सूची में से फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का एक गीत मैं पाठकों को सुनवाना चाहता हूँ। 

कृष्णमोहन- दोस्तों, ग़ालिब खाँ के अनुरोध पर हम आपको 1957 की फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का यह गीत सुनवा रहे हैं। स्वर मोहम्मद रफी का और संगीत हंसराज बहल का है। 


फिल्म – मिस बॉम्बे : “ज़िंदगी भर ग़म जुदाई का..” : स्वर – मोहम्मद रफी


 
कृष्णमोहन- साहित्य क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के बारे में भी हमें बताएँ। क्या उनके गीत / ग़ज़ल के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं? 

ग़ालिब खाँ- इस मामले में भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी लिखी हजारों नज्में और गजले जिस डायरी में थी वो डायरी बारिश कि भेंट चढ़ गयी। उन दिनों हम नालासोपारा के जिस घर में रहा करते थे, वह पहाड़ी के तल पर था और वहाँ मामूली बारिश में भी बाढ़ कि स्थिति पैदा हो जाती थी और ऐसी ही एक बाढ़, असद भोपाली की सारी "गालिबी" को बहा ले गयी। तब उनकी प्रतिक्रिया, मुझे आज भी याद है। उन्होने कहा था- 'जो मैं बेच सकता था मैं बेच चुका था, और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी'। एक शायर के पूरे जीवन की त्रासदी इस एक वाक्य में निहित है। 

कृष्णमोहन- आप अपने बारे में भी हमारे पाठको को कुछ बताएँ। यह भी बताएँ कि अपने पिता का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता मिर्ज़ा ग़ालिब से कितने प्रभावित थे इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि उन्होने मेरा नाम ग़ालिब ही रखना पसन्द किया। वो अक्सर कहते थे कि वो असदउल्लाह खाँ "ग़ालिब" थे और ये 'ग़ालिब असदउल्लाह खाँ’ है। अब ये कुछ उस नाम का असर है और कुछ धमनियों में बहते खून का, कि मैंने भी आखिरकार कलम ही थाम ली। शायरी और गीत लेखन से शुरुआत की, फिर टेलीविज़न सीरियल के लेखन से जुड़ गया। ‘शक्तिमान’ जैसे धारावाहिक से शुरुआत की। फिर ‘मार्शल’, ‘पैंथर’, ‘सुराग’ जैसे जासूसी धारावाहिकों के साथ ‘युग’, ‘वक़्त की रफ़्तार’, ‘दीवार’ के साथ-साथ ‘माल है तो ताल है’, ‘जीना इसी का नाम है’, ‘अफलातून’ जैसे हास्य धारावाहिक भी लिखे। ‘हमदम’, ‘वजह’ जैसी फिल्मो का संवाद-लेखन किया। एक फिल्म ‘भिन्डी बाज़ार इंक’ की पटकथा-संवाद लिखने का सौभाग्य मिला, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। बस मेरी इतनी ही कोशिश है कि मैं अपने पिता के नाम का मान रख सकूँ और उनके अधूरे सपनों को पूरा कर पाऊँ। 

कृष्णमोहन- आपका बहुत-बहुत आभार, आप “बातों बातों में” के मंच पर आए और अपने पिता असद भोपाली की शायरी के विषय में हमारे पाठकों के साथ चर्चा की। अब चलते –चलते आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे पाठकों/श्रोताओं को सुनवा दें। 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, पाठको को मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाहता हूँ, जिसे जब भी मैं सुनता हूँ अपने पिता को अपने आसपास पाता हूँ। यह फिल्म ‘एक नारी दो रूप’का गीत है जिसे रफी साहब ने गाया है और संगीतकार हैं गणेश। चूँकि फिल्म चली नहीं इसलिए गीत भी अनसुना ही रह गया। आप इस गीत को सुने और मुझे इजाज़त दीजिए। 


फिल्म – एक नारी दो रूप : “दिल का सूना साज तराना ढूँढेगा...” : स्वर – मोहम्मद रफी 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



वार्ताकार : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 


Sunday, July 5, 2015

गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 226 : GAUD MALHAR


स्वरगोष्ठी – 226 में आज


रंग मल्हार के – 3 : राग गौड़ मल्हार


‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला के तीसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस तीसरी कड़ी में आज हम आपसे राग गौड़ मल्हार के बारे में चर्चा करेंगे। आज के अंक में सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में हम इस राग की एक मोहक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘गरजत बरसत भीजत आई लो…’। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया इस राग पर आधारित दो गीत भी सुनवाएँगे।



ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो अधिकतर इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे।

राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक पण्डित मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की उसी बन्दिश का चुनाव किया, जिसे अभी आपने विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में सुना है। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने स्थायी और अन्तरे के शब्दों में बदलाव किये थे। जबकि फिल्म ‘मल्हार’ में गीत के शब्द पारम्परिक बन्दिश के अनुकूल थे। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। लगभग एक दशक बाद फिल्म ‘बरसात की रात’ और उसका संगीत, दोनों व्यावसायिक दृष्ठि से बेहद सफल सिद्ध हुआ। आपको हम दोनों फिल्मों के गीत सुनवाते है। पहले आप लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का और फिर सुमन कल्याणपुर और कमल बरोट के युगल स्वरों में फिल्म ‘बरसात की रात’ का गीत सुनिए, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप इन गीतों को सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार




राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत सावन...’ : सुमन कल्याणपुर व कमल बरोट : फिल्म -बरसात की रात





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 226वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सुप्रसिद्ध गायक की आवाज़ में प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 11 जुलाई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 228वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 224 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद राशिद खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत राग मियाँ की मल्हार की एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद राशिद खाँ। 

 इस बार पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है। उन्हें एक अंक दिया जा रहा है। अन्य प्रतिभागियों में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। आज के अंक में आपने राग गौड़ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के आगामी अंकों में हम आपको मल्हार अंग के अन्य रागों को सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी पिछली श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, May 3, 2015

भैरव थाट के राग : SWARGOSHTHI – 217 : BHAIRAV THAAT



स्वरगोष्ठी – 217 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 4 : भैरव थाट

राग भैरव और जोगिया के स्वरों में शिव की आराधना


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे भैरव थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरव में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरव थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग जोगिया के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान में प्रचलित थाट पद्धति पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित है। भातखण्डे जी ने गम्भीर अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तत्कालीन प्रचलित राग-वर्गीकरण की जितनी भी पद्धतियाँ उत्तर भारतीय संगीत में प्रचार में आईं और उनके काल में अस्तित्व में थीं, उनके रागों के वर्गीकरण के नियम आज के रागों पर लागू नहीं हो सकता। गत कुछ शताब्दियों में सभी रागों में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन हुए हैं, अतः उनके पुराने और नए स्वरूपों में कोई समानता नहीं है। भातखण्डे जी ने तत्कालीन राग-रागिनी प्रणाली का परित्याग किया और इसके स्थान पर जनक मेल और जन्य प्रणाली को राग वर्गीकरण की अधिक उचित प्रणाली माना। उन्हें इस वर्गीकरण का आधार न केवल दक्षिण में, बल्कि उत्तर में ‘राग-तरंगिणी’, ‘राग-विबोध’, ‘हृदय-कौतुक’, और ‘हृदय-प्रकाश’ जैसे ग्रन्थों में मिला।

आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘भैरव’। इस थाट में प्रयोग किये जाने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म, प, ध॒(कोमल), नि । अर्थात ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। थाट ‘भैरव’ का आश्रय राग ‘भैरव’ ही है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग ‘भैरव’ में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। राग में आरोह के स्वर- सारे(कोमल)गम प(कोमल) निसां तथा अवरोह के स्वर- सांनि(कोमल) पमग रे(कोमल) सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग भैरव के स्वर समूह भक्तिरस का सृजन करने में समर्थ हैं। इस राग का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए अब हम आपको विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे के स्वरों में राग भैरव का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं।

डॉ. प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर सरगम विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिवशंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे




कमल बारोट 
महेन्द्र कपूर
‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- ‘अहीर भैरव’ ‘गौरी’ ‘नट भैरव’ ‘वैरागी’ ‘रामकली’, ‘गुणकली’, ‘कलिंगड़ा’, ‘जोगिया’, ‘विभास’ आदि। आज हम आपको राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा रे(कोमल) म प (कोमल) सां और अवरोह के स्वर हैं- सां नि (कोमल) प (कोमल) म रे(कोमल) सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। यह गीत वास्तव में शिव वन्दना है। अनेक विद्वानो का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर...’ : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पचास के दशक की फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 215वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- अद्धा त्रिताल या पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका प्रीति सागर। इस बार की पहेली में हमारे दो नए श्रोता / पाठकों ने भाग लिया है। दिल्ली की दिशा भटनागर ने दूसरे और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। किसी अज्ञात स्थान से प्रसीत मुखर्जी ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर दिया है। श्री मुखर्जी से अनुरोध है कि भविष्य में पहेली का उत्तर ई-मेल से ही दिया करें। उनका COMMENT में दिया गया उत्तर हमने शनिवार तक प्रकाशित होने से रोक दिया था। इसके साथ ही जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिया है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे भैरव थाट और और उसके रागों पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, July 20, 2014

‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : SWARGOSHTHI – 177 : Raag Gaud Malhar




स्वरगोष्ठी – 177 में आज


वर्षा ऋतु के राग और रंग – 3 : राग गौड़ मल्हार


'...सावन आइलों लाल चुनरिया देहों मंगाय...'  





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के एक और सुहाने, हरियाले और रिमझिम फुहारों से युक्त अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र उपस्थित हूँ। इस मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की दूसरी कड़ी में एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों हमने आपसे राग मेघ मल्हार और मियाँ की मल्हार पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम मल्हार अंग के ही एक और मनमोहक राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में इस राग की एक मोहक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया इस राग पर आधारित दो गीत भी सुनवाएँगे। 
 



ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। आज के अंक में हम आपको ऐसे ही भावों से युक्त कुछ मोहक रचनाएँ सुनवाएँगे। साथ ही राग गौड़ मल्हार के स्वरूप के बारे में संक्षिप्त जानकारी भी आपसे बाँटेंगे।

राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो कुछ इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे। राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर : द्रुत तीनताल





फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की उसी बन्दिश का चुनाव किया, जिसे अभी आपने विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में सुना है। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने स्थायी और अन्तरे के शब्दों में बदलाव किए थे। जबकि फिल्म ‘मल्हार’ में गीत के शब्द पारम्परिक बन्दिश के अनुकूल थे। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। लगभग एक दशक बाद रोशन ने फिल्म ‘बरसात की रात’ में उसी धुन को दोहराया। फिल्म और उसका संगीत, दोनों व्यावसायिक दृष्ठि से बेहद सफल सिद्ध हुआ। आपको हम दोनों फिल्मों के गीत सुनवाते है। पहले आप लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का और फिर सुमन कल्याणपुर और कमल बरोट के युगल स्वरों में फिल्म ‘बरसात की रात’ का गीत सुनवाते हैं, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप इन गीतों को सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग - गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार : संगीत – रोशन





राग - गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत सावन आयो रे...’ : सुमन कल्याणपुर और कमल बरोट : फिल्म – बरसात की रात : संगीत – रोशन






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 177वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक द्रुत खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1- खयाल के इस अंश को सुन कर गायक की आवाज़ को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

2 – यह संगीत रचना किस राग में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 179वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 175वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में राग मियाँ की मल्हार के खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका किशोरी अमोनकर और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ मल्हार। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम ऋतु के अनुकूल रागों अर्थात वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं। अगले अंक में एक और वर्षाकालीन राग पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।




प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 8, 2013

राग जोगिया में भक्तिरस


  

स्वरगोष्ठी – 145 में आज

रागों में भक्तिरस – 13 

‘हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की तेरहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे राग जोगिया में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का राग जोगिया पर आधारित एक शिव-स्तुति और इसके बाद विदुषी कला रामनाथ का वायलिन पर बजाया राग जोगिया प्रस्तुत करेंगे। अन्त में इसी राग पर आधारित कन्नड के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और सन्त पुरन्दर दास की भक्ति रचना नचिकेता शर्मा के स्वरों में आप सुनेगे।
  


महेन्द्र कपूर 
कमाल बारोट 
भारतीय संगीत में भक्तिरस की धारा का अजस्र प्रवाह वैदिककाल से ही होता आया है। ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी के बीच अनेक सन्त कवियों और संगीतकारों ने इस परम्परा को पुष्ट किया है। आज के इस अंक में हम आपको कन्नड के सुप्रसिद्ध सन्तकवि और संगीतकार सन्त पुरन्दर दास की एक भक्तिरचना सुनवाने के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी देंगे। परन्तु उससे पहले भारतीय संगीत के एक भक्तिरस प्रधान राग जोगिया की चर्चा करेंगे। भक्तिरस के वैराग्य भाव को उभारने में राग जोगिया एक आदर्श राग है। प्रथम प्रहर अर्थात सूर्योदय के समय गाया-बजाया जाने वाला यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कर्नाटक संगीत पद्यति का राग सावेरी, इस राग के समतुल्य होता है। राग जोगिया के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। आरोह में ऋषभ और धैवत कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। अवरोह के दो रूप प्रचलित है। अवरोह के पहले रूप में गान्धार और निषाद स्पष्ट होता है। यह रूप कर्नाटक पद्यति के राग सावेरी के निकट होता है। दूसरे रूप में कोमल गान्धार स्वर केवल अवरोह में प्रयोग होता है, वह भी मात्र कण रूप में। यह रूप राग गुणकली के निकट हो जाता है। अवरोह में सात स्वर का प्रयोग होता है। इस प्रकार यह राग औड़व-सम्पूर्ण जाति का है। राग जोगिया में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास अर्थात ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भैरव में ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार राग जोगिया में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का आन्दोलन नहीं होता, जबकि राग भैरव में ऐसा होता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है।

राग जोगिया पर आधारित एक बेहद आकर्षक शिव वन्दना का उपयोग फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में किया गया था। 1962 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने राग जोगिया के स्वरों का आधार लेकर यह वन्दना गीत स्वरबद्ध किया था। इसे पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर और गायिका कमल बारोट ने स्वर दिया है। पहले प्रस्तुत है, यही शिव-वन्दना।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर शम्भो...’ : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन : महेन्द्र कपूर और कमल बारोट



कला रामनाथ 
नचिकेता शर्मा 
राग जोगिया भक्तिरस के आध्यात्मिक और वैराग्य भाव की अनुभूति कराने में सक्षम है। राग के इस भाव की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको दो रचनाएँ सुनवाते हैं। पहले आप सुनेगे वायलिन पर राग जोगिया में निबद्ध एक भावपूर्ण रचना, जिसे प्रस्तुत कर रही हैं, विदुषी कला रामनाथ। आज की इस कड़ी के अन्त में आप कन्नड का एक भक्तिगीत भी सुनेगे जिसे युवा गायक नचिकेता शर्मा प्रस्तुत कर रहे हैं। राग जोगिया के स्वरों पिरोया यह भजन सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास की रचना है। कर्नाटक संगीत पद्यति के शीर्षस्थ संगीतज्ञ सन्त पुरन्दर दास का जन्म कर्नाटक राज्य के शिवमोगा जनपद में स्थित क्षेमपुर नामक स्थान में एक सम्पन्न रत्न-व्यवसायी वरदप्पा नायक के घर 1484 ई. में हुआ था। बचपन में माता-पिता ने इनका नाम श्रीनिवास नायक रखा था। उन्होने कन्नड, संस्कृत भाषा और संगीत शास्त्र का गहन अध्ययन किया था। कर्नाटक संगीत पद्यति में उनकी असंख्य कृतियाँ और भगवान विट्ठल के प्रति समर्पित भजन भारतीय संगीत की अनमोल धरोहर हैं। इस अंक में गायक नचिकेता शर्मा के स्वरों में प्रस्तुत किये जा रहे कन्नड भाषा के इस भजन के गायन में तबला-संगति रवि गुटाला ने और हारमोनियम-संगति विवेक दातार ने की है। आप पहले वायलिन पर राग जोगिया फिर इसी राग में पिरोया सन्त पुरन्दर दास का भजन सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : वायलिन वादन : विदुषी कला रामनाथ




राग जोगिया : सन्त पुरन्दर दास रचित भक्तिपद : नचिकेता शर्मा




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हम आपको एक गीत का आरम्भिक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में ताल के मात्राओं की संख्या कितनी है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 147वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 143वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के गायन और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन की एक जुगलबन्दी रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे राग जोगिया में भक्तिरस के तत्त्व विषयक चर्चा की। अगले अंक में आप एक ऐसी भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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