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Tuesday, March 24, 2009

अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 32

दोस्तों, क्या आप ने कभी सोचा है कि हिन्दी फिल्म संगीत के इस लोकप्रियता का कारण क्या है? क्यूँ यह इतना लोकप्रिय माध्यम है मनोरंजन का? मुझे ऐसा लगता है कि फिल्म संगीत आम लोगों का संगीत है, उनकी ज़ुबान है, उनके जीवन से ही जुडा हुआ है, उनके जीवन की ही कहानी का बयान करते हैं. ज़िंदगी का ऐसा कोई पहलू नहीं जिससे फिल्म संगीत वाक़िफ़ ना हो, ऐसा कोई जज़्बात या भाव नहीं जिससे फिल्म संगीत अंजान रह गया हो. और यही वजह है कि लोग फिल्म संगीत को सर-आँखों पर बिठाते हैं, उन्हे अपने सुख दुख का साथी मानते हैं. सिर्फ़ खुशी, दर्द, प्यार मोहब्बत, और जुदाई ही फिल्म संगीत का आधार नहीं है, बल्कि समय समय पर हमारे फिल्मकारों ने ऐसे ऐसे 'सिचुयेशन्स' अपने फिल्मों में पैदा किये हैं जिनपर गीतकारों ने भी अपनी पूरी लगन और ताक़त से जानदार और शानदार गीत लिखे हैं. किसी के ज़िंदगी में जब कोई उलझन आ जाती है, जब अपने ही पराए बन जाते हैं, तो बाहरवालों से भला क्या कहा जाए! तो दिल से शायद कुछ ऐसी ही पुकार निकलती है कि "अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं, अपनों ने जो दर्द दिए हैं कैसे मैं बतलाऊं".

1975 में बनी फिल्म "उलझन" को संजीव कुमार और सुलक्षणा पंडित की बेहतरीन अदाकारी के लिए याद किया जाता है. और याद किया जाता है इस फिल्म के शीर्षक गीत की वजह से भी. इस गीत के दो संस्करण हैं, एक लता मंगेशकर का गाया हुआ और दूसरा किशोर कुमार की आवाज़ में. इस फिल्म के संगीतकार थे कल्याणजी आनंदजी और गीतकार थे एम् जी हशमत. हशमत साहब ने फिल्म संगीत में बहुत लंबी पारी तो नहीं खेली लेकिन थोडे से समय में कुछ अच्छे गीत ज़रूर दे गए हैं. एम् जी हशमत के गीत उस छतरी की तरह है जिसके नीचे हर दुख दर्द समा जाते है. उनके शब्दों का चयन कुछ ऐसा होता था कि आम लोगों को उनके गीत अपनी ही आवाज़ जान पड्ती. यह तो भाग्य की बात है कि उन्हे गाने लिखने का ज़्यादा मौका नहीं मिला, उनके दिल का दर्द बयां हुआ उनकी कलम से निकले गीतों के ज़रिए, शायद कुछ इसी तरह से जैसा कि प्रस्तुत गीत में कहा गया है.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. टीम है भरत व्यास और बसंत देसाई की.
२. राजेंदर कुमार अभिनीत इस फिल्म का हर एक गीत इतना मधुर है कि हम क्या कहें.
३. इस दोगाने में "गीत" "मीत", "जीत" आदि काफिये इस्तेमाल हुए हैं.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
लग रहा था कि ये पारुल के लिए ज़रा मुश्किल होगा, पर क्या करें भाई जबरदस्त फॉर्म हैं आजकल....बधाई स्वीकारें... मनु जी और नीरज जी हजारी लगते रहिएगा. शन्नो जी इन गीतों की मिठास आपके जीवन में रस घोल रही है ये जानकार बहुत ख़ुशी हुई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Thursday, March 5, 2009

चन्दन सा बदन...चंचल चितवन...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 14

'ओल्ड इस गोल्ड' के सभी सुननेवालों और पाठकों का बहुत बहुत स्वागत है आज की इस कडी में. दोस्तों, अगर आप किसी भी दौर के फिल्मी गीतों पर गौर करें तो पाएँगे की जिस भाषा का प्रयोग फिल्मी गीतों में होता है वो या तो आम बोलचाल की भाषा होती है या फिर उसमें उर्दू की भरमार होती है. शुद्ध हिन्दी के शब्दों का प्रयोग इनकी तुलना में बहुत कम होता है. कुछ गीतकार ऐसे भी हुए हैं जिन्होने शुद्ध हिन्दी का बहुत सुंदर इस्तेमाल भी किया है. कुछ ऐसे गीतकारों के नाम हैं कवि प्रदीप, पंडित नरेन्द्र शर्मा, भारत व्यास, शैलेन्द्र, योगेश, अनजान, इन्दीवर आदि. आज हम शुद्ध हिन्दी की बात यहाँ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आज जो गीत हम आपको सुनवाने जा रहे हैं वो भी कुछ इसी तरह का है. श्रृंगार रस में ओत-प्रोत यह गीत है फिल्म "सरस्वती चन्द्र" का. अब शायद आपको गीत के बोल बताने की ज़रूरत नहीं है.

फिल्म "सरस्वती चन्द्र" आई थी सन 1968 में. उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह फिल्म हिन्दी की आखिरी 'ब्लॅक & वाइट' फिल्म थी. नूतन और मनीष अभिनीत यह फिल्म गुजराती उपन्यासकार गोवर्धंरम की विख्यात उपन्यास पर आधारित थी. इस फिल्म को बहुत सारे पुरस्कार मिले, और संगीतकार कल्याणजी आनांदजी को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया था. राग कल्याण पर आधारित मुकेश की आवाज़ में "चंदन सा बदन चंचल चितवन" हमें श्रृंगार रस के एक अलग ही दुनिया में ले जाता है. विविध भारती पर एक मुलाक़ात में आनंद जी ने कहा था की जब भी वो मुकेश के लिए कोई गीत बनाते थे तो जान-बूझकर उसमें "न" वाले शब्दों का ज़्यादा से ज़्यादा प्रयोग करने की कोशिश करते थे क्योंकि मुकेश की आवाज़ 'नेज़ल' होने की वजह से उनके गले से इन शब्दों का उच्चारण बहुत अच्छा निकलता था. इस गीत में भी "चंदन", "बदन", "चंचल", "चितवन" जैसे शब्द आनंद जी के इसी बात की पुष्टि करता है. इंदीवर साहब का लिखा हुया यह गीत श्रृंगार रस पर लिखे गये श्रेष्ठ फिल्मी गीतों में से एक है. "चंचल चितवन" और "सिंदूरी सूरज" जैसे अनुप्रास अलंकार भी इस गीत में दिखाई पड्ते हैं. तो लीजिए पेश है मुकेश की आवाज़ में सरस्वती चन्द्र फिल्म की यह सुमधुर रचना -



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का लाजावाब संगीत, इस फिल्म का एक एक गीत आज तक संगीतप्रेमियों के दिल को छूता है.
२. फिल्म के अन्य सभी गीत रफी साहब के सोलो थे एक यही गाना था लता की आवाज़ में.
३. मजरूह साहब ने दोनों अंतरों में बहुत खूबी से एक शब्द युग्म इस्तेमाल किया -"तुम्हारी हंसी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
तन्हा जी, उज्जवल जी, मनु जी और आचार्य सलिल जी ने सही जवाब दिए...बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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