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Sunday, October 16, 2016

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 288 : RAG BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 288 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 1 : सहगल ने गाया यह गीत

“जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से शुरू हो रही हमारी नई श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली के 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।


र से भाग कर नौशाद बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे। कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्राण्ट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इण्टरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इण्टरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

अब हम आपको नौशाद के फिल्मी सफर के पहले दशक का संगीतबद्ध किया एक महत्त्वपूर्ण गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत सिद्ध हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पीने के बाद रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वही गीत सुनवाते हैं जो राग भैरवी पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर के माध्यम से करुणा भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।

राग भैरवी : “जब दिल ही टूट गया...” : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – शाहजहाँ




अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां  तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा  होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगी। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर, सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध एक वंदना गीत। ऐसी मान्यता है कि इस गीत की रचना संगीत सम्राट तानसेन ने की थी। आप इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग भैरवी : "जय शारदा भवानी भारती..." : उस्ताद राशिद खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 288वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी हिन्दी फिल्म के लोकप्रिय गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक के उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 22 अक्तूबर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 286 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथियों द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत कजरी वादन का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल - दादरा औए कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक – उस्ताद बिसमिल्लाह खाँ औए साथी

इस बार की पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में से पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर आज से एक नई लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” आरम्भ किया है। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 

Saturday, June 18, 2016

"मधुकर श्याम हमारे चोर...", कैसे इस भजन ने सहगल और पृथ्वीराज कपूर के मनमुटाव को समाप्त किया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 84
 

'मधुकर श्याम हमारे चोर...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 84-वीं कड़ी में आज जानिए 1942 की मशहूर फ़िल्म ’भक्त सूरदास’ की प्रसिद्ध भजन "मधुकर श्याम हमारे चोर..." के बारे में जिसे कुन्दन लाल सहगल ने गाया था। मूल पारम्परिक रचना सूरदास की, फ़िल्मी संस्करण डी. एन. मधोक का, और संगीत ज्ञान दत्त का। 


 र्ष 1940-41 के दौरान द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया और कलकत्ता में जातीय दंगे शुरू हो गए। इस
Gramophone Record of "Madhukar Shyam..."
डावांडोल स्थिति में न्यू थिएटर्स धीरे धीरे बन्द होने लगा। ऐसे में इस थिएटर के सबसे सशक्त स्तंभ, कुन्दन लाल सहगल, इसे छोड़ बम्बई आ गए और वहाँ के ’रणजीत स्टुडियोज़’ में शामिल हो गए। ’रणजीत’ में सहगल साहब की पहली फ़िल्म थी ’भक्त सूरदास’ जो बनी थी 1942 में। फ़िल्म में गीत लिखे डी. एन. मधोक ने और संगीत दिया ज्ञान दत्त ने। सहगल की आवाज़ में फ़िल्म के सभी गीत और भजन बेहद सराहे गए और इस फ़िल्म के गाने सहगल साहब के करीअर के सर्वश्रेष्ठ गीतों में माने जाते रहे हैं। राग दरबारी आधारित “नैनहीन को राह दिखा प्रभु”, राग भटियार आधारित “निस दिन बरसत नैन हमारे” और राग भैरवी आधारित “मधुकर श्याम हमारे चोर” फ़िल्म की सर्वाधिक लोकप्रिय सहगल की गाई हुई रचनाएँ थीं। “मधुकर श्याम हमारे चोर” को सुनते हुए 60 के दशक के हिट गीत “अजहूं न आये साजना सावन बीता जाये” से समानता महसूस की जा सकती है। इस भजन की रेकॉर्डिंग् से जुड़ी एक मार्मिक उपाख्यान जुड़ा हुआ है। ’रणजीत’ के अन्य गीतकार किदार शर्मा ने अपनी आत्मकथा में इस भजन के रेकॉर्डिंग् के बारे में बताया है कि सहगल साहब को इसे HMV के स्टुडियो में रेकॉर्ड करना था। सारे म्युज़िशियन्स आ चुके थे, रिहर्सल हो चुकी थी। स्नेहल भाटकर उन कलाकारों में से एक थे। जब सहगल साहब ने स्टुडियो के अन्दर क़दम रखा तो वो लड़खड़ा रहे थे। सब ने सोचा कि रेकॉर्डिंग् का तो अब कोई सवाल ही नहीं है, ज्ञान दत्त घबरा गए। सहगल साहब नशे में धुत दिख रहे थे। लड़खड़ाते हुए सहगल साहब माइक्रोफ़ोन के सामने जा खड़े हुए और नज़दीक रखे एक कुर्सी पर एक पैर रख कर अपने आप को सहारा दिया और कहने लगे, "हाँ, मैं तैयार हूँ, मेरे लड़खड़ाने की तरफ़ ध्यान ना दें, यह मेरा मुर्ख शरीर साथ नहीं देता, पर मैं अपने शरीर से नहीं गाता, मैं अपनी आत्मा से गाता हूँ, इसलिए टेक पर्फ़ेक्ट होगा।" और वाक़ई टेक बिल्कुल ठीक रहा। सहगल ने अपनी आत्मा से ही गाया, यह इस भजन को सुनने पर पता चलता है। इसी फ़िल्म के अन्य गीत “नैनहीन को राह दिखा प्रभु” तो 14 बार में रेकॉर्ड हुआ और फिर भी सहगल साहब को संतुष्टि नहीं हुई। इस गीत की धुन इतनी मार्मिक थी कि रेकॉर्डिंग पूरी होने पर सहगल फूट-फूट कर रो पड़े। 



"मधुकर श्याम हमारे चोर..." भजन के साथ एक और घटना भी जुड़ी हुई है। बात तब की है जब कुन्दनलाल
Saigal & Prithviraj
सहगल और पृथ्वीराज कपूर अपने परिवार सहित माटुंगा बम्बई के एक ही इमारत में रहते थे। दोनों में दोस्ती भी गहरी थी। पर बकौल श्रीमती आशा सहगल, दोनों के बीच किसी बात पर अनबन हो गई। बात यहाँ तक बढ़ गई कि आपस में बोलचाल भी बन्द हो गई। अब इत्तेफ़ाकन सहगल शूटिंग् के निकले तो थोड़ी देर में सीढ़ियाँ चढ़ते, हाँफ़ते, वापस घर लौट आए, और पत्नी आशा से बोले कि मन्दिर से आती हुईं माँ, यानी पृथ्वीराज की माँ मिल गईं थीं, कह रही थीं "कुन्दन, बहुत दिन हो गए तूने कोई भजन नहीं सुनाया!"। बस इसलिए अपना हारमोनियम लेने आया हूँ। और अगले ही पल वो हारमोनियम गले से बाँधे वो सीढ़ियों से नीचे उतर गए और फिर देखते क्या हैं कि वो खड़े-खड़े ही पृथ्वीराज जी की माताजी को भजन सुना रहे हैं "मधुकर श्याम हमारे चोर..."। उनका गाना शुरू ही हुआ था कि वहाँ ना केवल पृथ्वीराज बल्कि और भी सुनने वालों की भीड़ जमा हो गई। भजन जब पूरा हुआ तो पृथ्वीराज ने लपक कर सहगल के गले से हारमोनियम उतारा और लिपट गए अपने भाई से, रोने लगे। कैसा भावुक दृश्य रहा होगा, इसका अन्दाज़ा लगाया जा सकता है! "मैल मलीन सब धोए दियो, लिपटाए गले से सखा को सखा ने"। लीजिए, अब आप वही भजन सुनिए। 


"मधुकर श्याम हमारे चोर..." : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म - भक्त सूरदास : संगीत - ज्ञानदत्त




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, November 8, 2015

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायकी : SWARGOSHTHI – 243 : USTAD ABDUL KARIM KHAN








स्वरगोष्ठी – 243 में आज

संगीत के शिखर पर – 4 : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

खाँ साहब सम्पूर्ण भारतीय संगीत के प्रतिनिधि संगीतज्ञ थे





रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की चौथी कड़ी में हम उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक और बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में अत्यन्त लोकप्रिय संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायकी पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम खाँ साहब का गाया राग बसन्त में दो खयाल और राग झिंझोटी तथा राग भैरवी की दो ठुमरियाँ प्रस्तुत करेंगे।


ज हम एक ऐसे संगीत-साधक के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे जिसने उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु बनाने का महान सफल किया था। किराना घराने के इस महान कलासाधक का नाम है, उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म उनके सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद रोशन आरा बेग़म का गायन लखनऊ रेडियो के माध्यम से अत्यन्त लोकप्रिय था। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत-सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। अब आप उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में राग बसन्त में निबद्ध दो खयाल सुनिए। विलम्बित एकताल के खयाल के बोल हैं- ‘अब मैंने देखे...’ तथा द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘फगुआ ब्रज देखन को चलो री...’


राग – बसन्त : खयाल – ‘अब मैंने देखे...’ और ‘फगुआ ब्रज देखन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ





खाँ साहब के स्वरों में जैसी मधुरता, जैसा विस्तार और जैसी शुद्धता थी वैसी अन्य किसी गायक को नसीब नहीं हुई। वे विलम्बित खयाल में लयकारी और बोल तान की अपेक्षा आलाप पर अधिक ध्यान रखते थे। उनके गायन में वीणा की मींड़, सारंगी के कण और गमक का मधुर स्पर्श होता था। रचना के स्थायी और एक अन्तरे में ही खयाल गायन के सभी गुणो का प्रदर्शन कर देते थे। अपने गायन की प्रस्तुति के समय वे अपने तानपूरे में पंचम के स्थान पर निषाद स्वर में मिला कर गायन करते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उत्कृष्ट खयाल गायकी के साथ ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत-गायन में भी दक्ष थे। वर्ष 1925-26 में उनकी गायी राग झिंझोटी की ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी। लगभग दस वर्षों के बाद 1936 में पी.सी. (प्रथमेश चन्द्र) बरुआ के निर्देशन में शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास, ‘देवदास’ पर इसी नाम से एक फिल्म का निर्माण हुआ था। फिल्म के संगीत निर्देशक तिमिर वरन ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी इसी ठुमरी को फिल्म में शामिल किया था, जिसे कुन्दनलाल सहगल ने स्वर दिया था। सहगल के स्वरों में इस ठुमरी को सुन कर खाँ साहब बड़े प्रसन्न हुए थे और उन्हें बधाई भी दी थी। आइए, आज हम आपको खाँ साहब के स्वरों में वही लोकप्रिय ठुमरी सुनवाते हैं।


ठुमरी राग झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ




उस्ताद अब्दुल करीम खाँ जैसे संगीतज्ञ सदियों में जन्म लेते हैं। अनेक प्राचीन संगीतज्ञों के बारे कहा जाता है कि उनके संगीत से पशु-पक्षी खिंचे चले आते थे। खाँ साहब के साथ भी ऐसी ही एक सत्य घटना जुड़ी हुई है। उनका एक कुत्ता था, जो अपने स्वामी, खाँ साहब के स्वरों से इतना सुपरिचित हो गया था कि उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आवाज़ सुन कर खिंचा चला आता था। इस तथ्य से प्रभावित होकर लन्दन की ग्रामोफोन कम्पनी ने अपना नामकरण और प्रतीक चिह्न, अपने स्वामी के स्वरों के प्रेमी उस कुत्ते को ही बनाया। यह माना जाता है कि हिज मास्टर्स वायस (HMV) के ग्रामोफोन रिकार्ड पर चित्रित कुत्ता उस्ताद अब्दुल करीम खाँ का ही है। आइए, अब चलते-चलते उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में प्रस्तुत है, अत्यन्त लोकप्रिय, भैरवी की ठुमरी। आप यह रसपूर्ण ठुमरी सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी राग भैरवी : ‘जमुना के तीर...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।


1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 14 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 241वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गजल गायक जगजीत सिंह की आवाज़ में द्रुत खयाल की एक रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – दरबारी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – जगजीत सिंह

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



पिछली श्रृंखला के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की चौथी श्रृंखला (पहेली क्रमांक 231 से 241 तक) के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना के अनुसार निम्नलिखित प्रतिभागियों ने पहले तीन स्थानो पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने 20-20 अंक अर्जित कर श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। दूसरे स्थान पर 16 अंक के साथ हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी हैं और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने 10 अंक अर्जित कर तीसरा स्थान प्राप्त किया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे खयाल, ठुमरी, दादरा और नाट्य संगीत गायकी के शिखर पर प्रतिष्ठित उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 





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