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Thursday, February 25, 2010

'काव्यनाद' और 'सुनो कहानी' की बम्पर सफलता



हिन्द-युग्म ने 19वें विश्व पुस्तक मेले (जो 30 जनवरी से 7 फरवरी 2010 के दरम्यान प्रगति मैदान, नई दिल्ली में आयोजित हुआ) में बहुत-सी गतिविधियों के अलावा दो नायाब उत्पादों का भी प्रदर्शन और विक्रय किया। वे थे प्रेमचंद की 15 कहानियों का ऑडियो एल्बम ‘सुनो कहानी’ और जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिनिधि कविताओं के संगीतबद्ध स्वरूप का एल्बम ‘काव्यनाद’। ये दोनों एल्बम विश्व पुस्तक मेला में सर्वाधिक बिकने वाले उत्पादों में से थे। दोनों एल्बमों की 500 से भी अधिक प्रतियों को साहित्य प्रेमियों ने खरीदा। इस एल्बम के ज़ारी किये जाने से पहले हिन्द-युग्म के संचालकों को भी इसकी इस लोकप्रियता और सफलता का अंदाज़ा नहीं था। 1 फरवरी 2010 को प्रगति मैदान के सभागार में इन दोनों एल्बमों के विमोचन का भव्य समारोह भी आयोजित किया गया जिसमें वरिष्ठ कवि अशोक बाजपेयी, प्रसिद्ध कथाकार विभूति नारायण राय और संगीत-विशेषज्ञ डॉ॰ मुकेश गर्ग ने भाग लिया। ‘काव्यनाद’ और ‘सुनो कहानी’ कहानी की इस सफलता के बाद ऑल इंडिया रेडियो के समाचार-प्रभाग के रितेश पाठक ने जब हिन्द-युग्म के प्रमुख संचालक शैलेश भारतवासी से प्रतिक्रिया माँगी तो शैलेश ने कहा-
लोग साहित्य के साथ हुए इन नये प्रयोगों को सराह रहे हैं। हमारे स्टॉल पर कई सारे ऐसे आगंतुक भी पधार रहे हैं जिन्होंने इन एल्बमों के बारे में अखबारों या वेबसाइटों पर पढ़ा और बिना ज्यादा पड़ताल के ही अपने और अपने मित्रों-सम्बंधियों के लिए ये एल्बम खरीद कर ले जा रहे हैं। हमारी पूरी टीम मेले के रेस्पॉन्स से बहुत खुश है।

इसके बाद हिन्द-युग्म से बहुत से स्कूलों-कॉलेजों ने ईमेल के द्वारा इन एल्बमों के सम्बंध में जानकारी माँगी है। कई विद्यालयों के प्राचार्यों ने यहाँ तक कहा कि ये अभिनव प्रयोग विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए बहुत उपयोगी हैं और इन्हें हर विद्यार्थी और अभिभावक तक पहुँचाया जाना चाहिए। हिन्द-युग्म का मानना है कि साहित्य का तकनीक के साथ सकारात्मक ताल-मेल भी हो सकता है, बस हमारी दृष्टि साफ हो कि हमें साहित्य और भाषा को किस ओर लेकर जाना है।

कई ऐसे साहित्यप्रेमी भी मेले में हिन्द-युग्म के स्टॉल पर आये जिन्होंने पहले खरीदकर इन्हें सुना और फोन द्वारा या स्टॉल पर दुबारा आकर इनकी भूरी-भूरी प्रसंशा की। बहुत से लोगों ने नागार्जुन, धूमिल, मुक्तिबोध इत्यादि कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध करने की सलाह दी। कइयों ने कहाँ कि ‘काव्यनाद’ जैसा प्रयोग ही किसी एक कवि की 10 या 10 से अधिक कविताओं को लेकर किये जाने की ज़रूरत है। वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी स्टॉल पर पधारे और कहा कि ऐसे कथाकारों की कहानियों को कथाकारों की ही आवाज़ में संरक्षित करने की ज़रूरत है जो बहुत वरिष्ठ हैं और जिनकी कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं। हिन्द-युग्म ने पाठकों, श्रोताओं और साहित्यकारों को इस दिशा में नित नये प्रयोग करते रहने का विश्वास दिलाया।

हिन्द-युग्म ने अपनी कार्ययोजना में यह भी जोड़ा है कि इन एल्बमों को दुनिया भर के उन स्कूलों में ज़रूर से ज़रूर पहुँचाना है जहाँ हिन्दी प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक या प्राच्य भाषा के तौर पर पढ़ाई जाती है। दक्षिण भारत से आये एक हिन्दी के अध्यापक ने प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम को गैरहिन्दी भाषियों के लिए हिन्दी भाषा सीखने और समझने का एक उपकरण भी माना।

हिन्द-युग्म के ये एल्बम होली के बाद भारत के सभी हिन्दी प्रदेशों के प्रमुख म्यूजिक स्टोर पर उपलब्ध कराये जाने की योजना बनाई है। हिन्द-युग्म ने इन एल्बमों को ऑनलाइन बेचने का भी प्रबंध किया है और मूल्य केवल लागत मूल्य के बराबर रखा है।

हिन्द-युग्म की आवाज़-टीम अपनी इस सफलता से बहुत उत्साहित है और नये और पुराने कवियों की कविताओं के साथ एक साथ प्रयोग करना चाहती है। हिन्द-युग्म वर्ष 2010 में कविता पर लघु फिल्म बनाने की भी योजना बना रहा है। हिन्द-युग्म कुछ महान कविताओं पर फिल्म निर्माण के बाद उसे दुनिया के सभी लघु फिल्म समारोहों में प्रदर्शित करना चाहती है। ‘काव्यनाद’ की कुछ संगीतबद्ध कविताओं को लेकर भी हिन्दी भाषा पर एक डाक्यूमेंटरी फिल्म बनाने की योजना पर काम कर रहा है।

‘काव्यनाद’ के बनने की कहानी भी अपने आप में अभूतपूर्व है। शैलेश बताते हैं- ‘मई 2010 में डैलास, अमेरिका से साहित्यप्रेमी आदित्य प्रकाश का फोन आया, बातों-बातों में उन्होंने कहा कि शैलेश आपकी आवाज़ टीम वाले इतने सारे गीतों को कम्पोज करते हैं, कभी उनसे कविता को संगीतबद्ध करने को कहिए। और उसी समय मैंने उनके साथ मिलकर गीतकास्ट प्रतियोगिता को आयोजित करने की योजना बनाई। आदित्य प्रकाश ने अपनी ओर से विजेताओं को नगद इनाम भी देने का वचन दिया। जब इस प्रतियोगिता के पहले अंक के लिए (यानी जयशंकर प्रसाद की कविता ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा’ के लिए) प्रविष्टियाँ आईं तो मेरे साथ-साथ आदित्य प्रकाश भी बहुत खुश हुए। उन्होंने इन प्रविष्टियों को रेडियो सलाम नमस्ते के ‘कवितांजलि’ कार्यक्रम में बजाया और पूरी दुनिया के साहित्य प्रेमियों ने इस प्रयोग को सर-आँखों पर बिठा लिया। उसी समय आदित्य प्रकाश के साथ मिलकर हमने यह तय किया के छायावादी युगीन चारों स्तम्भ कवियों की 1-1 कविताओं के साथ यह प्रयोग किया जाय। इसके लिए शेर बहादुर सिंह, डॉ॰ ज्ञान प्रकाश सिंह और अशोक कुमार से सहयोग मिला और इन्होंने पहले आयोजन से दोगुनी राशि को इनाम में देने का हमारा आवेदन स्वीकार कर लिया और श्रोताओं ने खुद सुना कि गीकास्ट प्रतियोगिता के हर नये अंक की प्रविष्टियाँ अपने पिछले अंक से बेहतर थीं।“

शैलेश ने आगे बताया कि जब हमने छायावादी युगीन कवियों तक इस प्रयोग को सफल बना लिया तो आदित्य प्रकाश के साथ यह तय किया कि आने वाले विश्व पुस्तक मेला में क्यों न इन कविताओं को एक एल्बम निकाला जाय। हमें लगा कि एल्बम निकाले जाने के लिए 4 कविताएँ कम हैं इसलिए कमल किशोर सिंह, दीपक चौरसिया 'मशाल', डॉ॰ शिरीष यकुन्डी, डॉ॰ प्रशांत कोले, डॉ॰ रघुराज प्रताप सिंह ठाकुर और शैलेश त्रिपाठी की मदद से रामधारी सिंह दिनकर और मैथिली शरण गुप्त की एक-एक कविता को संगीतबद्ध किये जाने की प्रतियोगिता रखी गई। लेकिन इतने मात्र से तो एल्बम की समाग्री ही बनी, एल्बम को बज़ार तक लाने के लिए भी धन की आवाश्यकता थी। लेकिन मैं आदित्य प्रकाश, ज्ञान प्रकाश सिंह और बिस्वजीत का धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने इस काम के लिए भी हमारी हर सम्भव मदद की।

आवाज़ के संचालक सजीव सारथी कहते हैं कि हमें उम्मीद है कि हमारे इन सभी साहित्यानुरागियों का सहयोग पहले की तरह यथावत बना रहेगा और और हम जल्द ही कुछ और अभिनव और पहले से कई गुना बेहतर गुणवत्ता के प्रयोग करेंगे। हमने काव्यनाद की समीक्षा की भी शुरूआत की है। काव्यनाद की समीक्षा अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने सुजॉय के साथ मिलकर 'ताज़ा सुर ताल' में की है। भविष्य में अन्य संगीत विशेषज्ञों से भी हम इसकी समीक्षा करवायेंगे।

Saturday, October 17, 2009

एक ऑडियो-वीडियो पुस्तक अमृता-इमरोज़ के नाम

रश्मि प्रभा
अमृता-इमरोज़ के प्रेम-सम्बन्धों को अमृता की कविताओं और इमरोज़ की पेंटिंगों के माध्यम से देखने वालों ने जितना महसूसा है, वह उन्हें भावातिरेक से उपजी यूटोपिया पर पहुँचा देता है, जहाँ जिस्मानी आकर्षण का ज़ादू भी आध्यात्मिक प्यार की डगर की तरह दिखता है। अमृता की कविताओं के रसज्ञ कविताओं को पढ़कर न तो अपनी बेचैनी ज़ाहिर कर पाते हैं और न किसी तरह का सुकूँन महसूस कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि घर की दीवारें, हवा, पानी मौसम, दिन-रात सब तरफ अमृता-इमरोज़ के किस्सों के साये हैं।

प्यार के रुहानी सफर की प्रसंशक यदि कोई महिला हो और वह भी कवि हृदयी, तो यह लगभग तयशुदा बात है कि अमृता की नज्मों में वह खुद को उतारने लगती है। अमृता-इमरोज के सम्बंधों में उसे हर तरह के आदर्श प्रेम संबंधों की छाया दिखती है। अमृता की हर अभिव्यक्ति उसे अपनी कहानी लगती है और इमरोज़ की पेंटिंगों से भी कोई न कोई आत्मिक सम्बंध जोड़ लेती है।

इसी तरह की एक अति सम्वेदनशील कवयित्री रश्मि प्रभा की आडियो-पुस्तक का विमोचन आज हम अपने श्रोताओं के हाथों करा रहे हैं। रश्मि प्रभा की कविताओं के इस संग्रह (कुछ उनके नाम) की ख़ास बात यही है कि इसकी हर कविता अमृता और इमरोज़ को समर्पित है। इनकी कविताओं में प्रेम का विहान है, सुबह है, दोपहर, शाम और रात है और इसके बाद शुरू होती प्रेम की अनंत यात्रा के संकेत हैं।

रश्मि की दृष्टि में अमृता के जीवन के किसी भी आयाम का हर सफहा इमरोज़ के नाम है। इमरोज़ अमृता का बिस्तर भी है, भोजन भी है, खुदा भी है, आदि भी है और अंत भी।

मेरा मानना है कि अमृता की कविताएँ प्रेम की जो दुनिया बनाती हैं, लगभग उसी दुनिया का विस्तार प्रस्तुत ऑडियो-बुक की नज़्मों में हमें मिलता है।

--शैलेश भारतवासी


कविता-प्रेमियो,

आज आप इसी ऑडियो-किताब का लोकार्पण अपने हाथों कीजिए। माउस को कैची समझकर नीचे दिख रहे एलबम का फीता काटिए॰॰॰



हमने अमृता-इमरोज़ को और अधिक समझने के लिए अमृता की कविताओं और इमरोज़ की पेंटिंगों को नज़दीक से महसूसने वालीं रंजना भाटिया और जेन्नी शबनम से संपर्क किया। रंजना भाटिया एक प्रसिद्ध ब्लॉगर हैं और 'अमृता प्रीतम की याद में' नाम से एक ब्लॉग चलाती हैं। जेन्नी शबनम इमरोज़ से अक्सर मिलती रहती हैं और इमरोज़-अमृता के रुहानी सफर की चश्मदीद भी हैं, शायद जेन्नी इमरोज़ की पेंटिंगों के संदेशों को बहुत अच्छे से समझती हैं। तो पढ़िए इन दोनों के विचार॰॰॰


जेन्नी शबनम
अमृता जी और इमरोज़ जी मेरे साहित्य सफ़र के प्रेरणा-स्रोत हैं। इमरोज़ जी की वजह से आज यहाँ मैं अपनी रचनाएँ सार्वजनिक रूप से प्रेषित करने का साहस कर सकी हूँ। मेरी ये चंद पँक्तियाँ जो कभी मैं उनके बारे में लिखी थी और सबसे पहले इमरोज़ जी को सुनाई थी-

बहुत तलाशी हूँ,
कोई और अमृता नहीं मिलती,
न कोई और इमरोज़ मिलता।
एक युग में,
एक ही अमृता-इमरोज़ होते,
कोई दूसरा नहीं होता।
प्यार, दोस्ती, नाते, रिश्ते,
सारे बंधनों से परे,
दो रूहानी हमसफ़र...
अमृता और इमरोज़।


-----जेन्नी शबनम
रंजना भाटिया
हर बार अमृता जी के लिखे को पढ़ना एक नया अनुभव दे जाता है ..और एक नई सोच ..वह एक ऐसी शख्सियत थी जिन्होंने ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी ..एक किताब में उनके बारे में लिखा है कि हीर के समय से या उस से पहले भी वेदों-उपनिषदों के समय से गार्गी से लेकर अब तक कई औरतों ने अपनी मर्जी से जीने और ढंग से जीने की जरुरत तो की पर कभी उनकी जरुरत को परवान नहीं चढ़ने दिया गया और अंत दुखदायी ही हुआ! आज की औरत का सपना जो अपने ढंग से जीने का है वह उसको अमृता-इमरोज़ के सपने सा देखती है ..ऐसा नहीं है कि अमृता अपनी परम्पराओं से जुड़ी नहीं थीं ..वह भी कभी-कभी विद्रोह से घबरा कर हाथों की लकीरों और जन्म के लेखो जोखों में रिश्ते तलाशने लगती थीं, और जिस समय उनका इमरोज़ से मिलना हुआ उस वक्त समाज ऐसी बातों को बहुत सख्ती से भी लेता था ..पर अमृता ने उसको जी के दिखाया ..

वह ख़ुद में ही एक बहुत बड़ी लीजेंड हैं और बंटवारे के बाद आधी सदी की नुमाइन्दा शायरा और इमरोज़ जो पहले इन्द्रजीत के नाम से जाने जाते थे, उनका और अमृता का रिश्ता नज्म और इमेज का रिश्ता था। अमृता की नज़में पेंटिंग्स की तरह खुशनुमा हैं, फिर चाहे वह दर्द में लिखी हों या खुशी और प्रेम में वह और इमरोज़ की पेंटिंग्स मिल ही जाती है एक दूजे से !!

मुझे उनकी लिखी इस पर एक कविता याद आई ..

तुम्हें ख़ुद से जब लिया लपेट
बदन हो गए ख्यालों की भेंट
लिपट गए थे अंग वह ऐसे
माला के वो फूल हों जैसे
रूह की वेदी पर थे अर्पित
तुम और मैं अग्नि को समर्पित
यूँ होंठो पर फिसले नाम
घटा एक फिर धर्मानुष्ठान
बन गए हम पवित्र स्रोत
था वह तेरा मेरा नाम
धर्म विधि तो आई बाद !!


अमृता जी ने समाज और दुनिया की परवाह किए बिना अपनी ज़िंदगी जी। उनमें इतनी शक्ति थी की वह अकेली अपनी राह चल सकें। उन्होंने अपनी धारदार लेखनी से अपन समय की सामजिक धाराओं को एक नई दिशा दी थी!!बहुत कुछ है उनके बारे में लिखने को ....पर जितना लिखा जाए उतना काम है ...

अभी उन्हीं की लिखी एक सुंदर कविता से अपनी बात को विराम देती हूँ ..

मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए
सितारों की मुट्ठियाँ भरकर
आसमान ने निछावर कर दीं

दिल के घाट पर मेला जुड़ा,
ज्यूँ रातें रेशम की परियाँ
पाँत बाँध कर आईं......

जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
काग़ज़ के ऊपर उभर आयीं
केसर की लकीरें

सूरज ने आज मेहंदी घोली
हथेलियों पर रंग गयी,
हमारी दोनो की तकदीरें


--रंजना भाटिया


कवयित्री की ही आवाज़ में सुनिए सम्पूर्ण पुस्तक-


आवाज़ की इंजीनियर खुश्बू ने पूरी पुस्तक का चित्रों से भरा एक वीडियो बनाया है। आशा है यह भी आपको पसंद आयेगा।

Thursday, November 20, 2008

शिवानी की कविताएँ, रूपेश के स्वर और संगीत

२ महीने पूर्व आवाज़ ने शिवानी सिंह की कविताओं का एल्बम 'मेरे ज़ज़्बात' ज़ारी किया था, आज हम उसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं और सुनवा रहे हैं शिवानी सिंह दो संगीतमयी कविताएँ रूपेश ऋषि के स्वर में। यदि यह प्रयास श्रोताओं को भाता है तो हम इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

नाविक




बहुत आसान होता है ,
तमन्नाओं का मचल जाना !
बहक जाना ,बहल जाना ,
किसीकी चाहत में मिट जाना !
बहुत आसान होता है ,
तमन्नाओं का मचल जाना !
है मुश्किल दिल के अरमानों का
मंजिल तक पहुँच पाना !
संभल जाना ,सिमट जाना,
किसीके दिल में उतर जाना !
बहुत आसान होता है,
तमन्नाओं का मचल जाना !
बहुत कम हैं वो खुशकिस्मत,
की पूरी हों तमन्नाएं !
कब मंजिल तक पहुँच पायी हैं,
अरमानों की नौकाएं !
समुन्दर में ही रह जाती हैं,
या फंस जाती भंवर में ही !
बहुत कम होते हैं वो नाविक
जो साहिल तक पहुंचते हैं !
बहुत कम होते हैं वो नाविक
जो साहिल तक पहुंचते हैं !

मेरे आँसू



मेरे आंसू न रोके कोई
आज इन्हें बह जाने दो !
कल तक थे ये साथी मेरे,
इनको भी अब जाने दो !
मेरे आंसू न रोके कोई
आज इन्हें बह जाने दो !
टूटे रिश्तों की दुनिया में
कौन किसी का होता है
बस अपना एक साया समझो
साथ हमेशा रहता है !
टूटे रिश्तों की दुनिया में
कौन किसी का होता है !
बस अपना एक साया समझो
साथ हमेशा रहता है !
बहने पर आमादा हैं ये
इनको भी बह जाने दो !
कब तक रोकूंगा मैं इनको
जाते हैं तो जाने दो !
कब तक रोकूंगा मैं इनको
जाते हैं तो जाने दो !

Tuesday, September 23, 2008

सुनिए 'हाहाकार' और 'बालिका से वधू'

सूखी रोटी खायेगा जब कृषक खेत में धरकर हल,
तब दूँगी मैं तृप्ति उसे बनकर लोटे का गंगाजल।
उसके तन का दिव्य स्वेदकण बनकर गिरती जाऊँगी,
और खेत में उन्हीं कणों से मैं मोती उपजाऊँगी।
फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदी से जग की अमा मिटा जाऊँ।-विश्चछवि ('रेणुका' काव्य-संग्रह से)


उपर्युक्त पंक्तियाँ पढ़कर किस कवि का नाम आपके दिमाग में आता है? जी हाँ, जिसने खुद जैसे जीव की कल्पना की जीभ में भी धार होना स्वीकारा था। माना था कि कवि के केवल विचार ही बाण नहीं होते वरन जिसके स्वप्न के हाथ भी तलवार से लैश होते हैं। आज यानी २३ सितम्बर २००८ को पूरा राष्ट्र या यूँ कह लें दुनिया के हर कोने में हिन्दी प्रेमी उसी राष्ट्रकवि रामधारी दिनकर की १००वीं जयंती मना रहे हैं। आधुनिक हिन्दी काव्य राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का शंखनाद करने वाले युग-चारण नाम से विख्यात, "दिनकर" का जन्म २३ सितम्बर १९०८ ई. को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया घाट नामक गाँव में हुआ था. इन की शिक्षा मोकामा घाट के स्कूल तथा फिर पटना कॉलेज से हुई जहाँ से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बी. ए. (ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की. एक विद्यालय के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जन-संपर्क विभाग के उप निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया. साहित्य-सेवाओं के लिए उन्हें डी. लिट. की मानक उपाधि, विभिन्न संस्थाओं ने उनकी पुस्तकों पर पुरस्कार ( साहित्य अकादमी तथा ज्ञानपीठ ) और भारत सरकार ने पद्मभूषण के उपाधि प्रदान कर उन्हें समानित किया.

कभी इसी कवि ने कहा था-

प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों के शृंगार माँगता हूँ। -- 'आग की भीख' ('सामधेनी' से)


इसी सप्ताह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अग्रयुवक शहीद भगत सिंह की भी जयंती है। क्या संयोग है कि एक ही सप्ताह में राष्ट्रकवि और राष्ट्रपुत्र का जन्मदिवस है! शायद राष्ट्रकवि ने भगत सिंह के सम्मान में और उनके जैसे वीरों में देशप्रेम की आग भरने के लिए ही कहा होगा-

यह झंडा, जिसको मुर्दे की मुट्ठी जकड़ रही है,
छिन न जाय, इस भय से अब भी कसकर पकड़ रही है,
थामो इसे, शपथ लो, बलि का कोई क्रम न रुकेगा,
चाहे जो हो जाय, मगर यह झण्डा नहीं झुकेगा।
इस झण्डे में शान चमकती है मरनेवालों की,
भीमकाय पर्वत से मुट्ठी भर लड़नेवालों की। --- 'सरहद के पार' से ('सामधेनी' से)


इस राष्ट्रकवि ने कविता को परिभाषित करते हुए कहा था-

बड़ी कविता कि जो इस भूमि को सुंदर बनाती है,
बड़ा वह ज्ञान जिससे व्यर्थ की चिन्ता नहीं होती।
बड़ा वह आदमी जो जिन्दगी भर काम करता है,
बड़ी वह रूह जो रोये बिना तन से निकलती है।---- 'स्वप्न और सत्य' ('नील कुसुम' से)



"दिनकर" के कुछ काव्य संकलन :

१ रश्मिरथी
२ कुरुक्षेत्र
३ चक्रवाल
४ रसवंती
५ नीम के पत्ते
६ संचयिता
७ आत्मा की आँखें
८ उर्वशी
९ दिनकर की सूक्तियां
१० मुक्ति - तिलक
११ सीपी और शंख
१२ दिनकर के गीत
१३ हारे को हरिनाम
१४ राष्मिलोक
१५ धुप और धुंआ
१६ कोयला और कवित्व ..... इत्यादि ..

हम रामधारी जी के साहित्य की मीमांसा करें तो छोटी मुँह बड़ी बात होगी। हमने सोचा कि आवाज़ के माध्यम से इस महाकवि को कैसे श्रद्धासुमन अर्पित करें। जिन खोजा, तिन पाइयाँ, अमिताभ मीत मिले, जो साहित्यकारों में सबसे अधिक दिनकर से प्रभावित हैं। मीत का परिवार भी साहित्य का रसज्ञ था। मीत को बचपन में इस राष्ट्रकवि का सानिध्य भी मिला। मीत का सपना ही है कि दिनकर की 'रश्मिरथी' को इस मंच से दुनिया के समक्ष 'आवाज़' के रूप में लाया जाय।

मीत ने दिनकर की दो प्रसिद्ध कविताओं 'हाहाकार' ('हुंकार' कविता-संग्रह से) और 'बालिका से वधू' ('रसवन्ती' कविता-संग्रह से) अपनी आवाज़ दी है। सुनें और राष्ट्रकवि को अपनी श्रद्धाँजलि दें।

हाहाकार


बालिका से वधू




प्रस्तुति- अमिताभ 'मीत'


कविता पृष्ठ पर पढ़ें वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश रावतानी की कलम से 'दिनकर-चंद स्मृतियाँ'


कलम आज उनकी जय बोल- शोभा महेन्द्रू की प्रस्तुति

Tuesday, September 16, 2008

शिवानी सिंह की कविताओं का एल्बम सुनें

हिन्द-युग्म की शिवानी सिंह जिनकी एक ग़ज़ल 'ये ज़रूरी नहीं' हिन्द-युग्म के पहले म्यूजिक एल्बम 'पहला सुर' में भी शामिल थी, और जिनकी दूसरी ग़ज़ल 'चले जाना' को हमने पिछले महीने आवाज़ पर रीलिज किया था, पहला सुर में रूपेश ऋषि की आवाज़ में रिकॉर्डेड कविताओं को सुनकर उनसे इतना प्रभावित हुईं कि इन्होंने अपने कविताओं का एक एल्बम ही बनाने का मन बना लिया।

रूपेश जी से संपर्क साधा और आठ गीतों से सजे एक काव्यमयी, साहित्यिक एल्बम का जन्म हुआ। इस एल्बम को शिवानी जी ने 'मेरे ज़ज़्बात' नाम दिया है। आठ कविताओं को एक साथ सुनें और बतायें कि शिवानी जी का यह प्रयास कैसा है।
1. तन्हाई2. आदत3. दिलकश तराना4. मन की वेदना
5. एक बूँद 6. जिंदगी-एक सवाल7. जीवन यात्रा8. रेत के घर


संगीत और गायन रुपेश जी का है। दिलकश तराना में अनुराधा ने अपनी आवाज़ दी है। शिवानी सिंह को 'पहला सुर' की कविताओं को सुनकर लगा कि पढ़ने और सुनने में बहुत अंतर होता है, कविता सुनने में अपना प्रभाव अधिक डालती है।

नीचे के प्लेयर से सुनें, यह प्ले होते ही ५ सेकेण्ड के समय-अंतराल के साथ सभी कविताएँ प्ले कर देगा। आप प्ले-लिस्ट से एक-एक कविताओं को अलग-अलग या अपनी वरियता देकर भी सुन सकते हैं।

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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