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Thursday, September 1, 2016

नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था...... 'कहकशाँ’ में आज छाया की माया

 महफ़िल ए कहकशाँ 11


छाया गाँगुली 
दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है छाया गाँगुली की आवाज़, इब्राहिम अश्क के बोल और भूपिंदर सिंह का संगीत




मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी




Thursday, June 9, 2016

नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था...... 'कहकशाँ’ में आज छाया की माया



कहकशाँ - 11
छाया गांगुली, इब्राहिम अश्क़, भूपेन्द्र सिंह 
"नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है छाया गांगुली की आवाज़, इब्राहिम अश्क़ के बोल और भूपेन्द्र सिंह का संगीत।




मुज़फ़्फ़र अली की एक फ़िल्म आई थी "गमन"। फ़ारूख शेख और स्मिता पाटिल की अदाकारियों से सजी इस फ़िल्म में कई सारी दिलकश गज़लें थीं। यह तो सभी जानते हैं कि मुज़फ़्फ़र अली को संगीत का अच्छा-ख़ासा इल्म है, विशेषकर ग़ज़लों का। इसलिए उन्होंने गज़लों को संगीतबद्ध करने का ज़िम्मा उस्ताद अली अकबर ख़ाँ के शागिर्द जयदेव वर्मा को दिया। और मुज़फ़्फ़र अली की दूरगामी नज़र का कमाल देखिए कि इस फ़िल्म के लिए "जयदेव" को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया। भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में अब तक केवल तीन ही संगीतकार हुए हैं जिन्हें तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार (रजत कमल) पाने का गौरव प्राप्त है: जयदेव, ए आर रहमान और इल्लैया राजा। हाँ तो हम "गमन" की गज़लों की बात कर रहे थे। इस फ़िल्म की एक गज़ल "आप की याद आती रही रात भर", जिसे "मक़दू्म मोहिउद्दिन" ने लिखा था, के लिए मुज़फ़्फ़र अली को एक नई आवाज़ की तलाश थी और यह तलाश हमारी आज की फ़नकारा पर खत्म हुई। इस गज़ल के बाद तो मानो मुज़फ़्फ़र अली इस नई आवाज़ के दीवाने हो गए। यूँ तो मुज़फ़्फ़र अली अपनी फ़िल्मों (गमन, उमराव जान) के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कम ही लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि इन्होंने कई सारी ही ग़ज़लों को संगीतबद्ध भी किया है। "रक़्स-ए-बिस्मिल","पैग़ाम-ए-मोहब्बत", "हुस्न-ए-जानां" ऐसी ही कुछ ख़ुशकिस्मत ग़ज़लों की एलबम हैं, जिन्हें मुज़फ़्फ़र अली ने अपनी सुरों से सजाया है। बाकी एलबमों की बात कभी बाद में करेंगे, लेकिन "हुस्न-ए-जानां" का ज़िक्र यहाँ लाज़िमी है। अमिर ख़ुसरो का लिखा "ज़िहाल-ए-मस्कीं" न जाने कितनी ही बार अलग-अलग अंदाज़ में गाया जा चुका है, यहाँ तक कि "ग़ुलामी" के लिए गुलज़ार साहब ने इसे एक अलग ही रूप दे दिया था, लेकिन कहा जाता है कि इस गाने को हमारी आज की फ़नकारा ने जिस तरह गाया है, जिस अंदाज में गाया है, वैसा दर्द वैसा ग़म-ए-हिज्र आज तक किसी और की आवाज़ में महसूस नहीं होती। ऐसी है मुज़फ़्फ़र अली की परख और ऐसा है इस फ़नकारा की आवाज़ का तिलिस्म!

उस फ़नकारा के नाम से पर्दा हटाने के पहले मैं आज की गज़ल से जुड़े एक और हस्ती के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। आज की ग़ज़ल को साज़ों से सजाने वाला वह इंसान ख़ुद एक कामयाब ग़ज़ल-गायक है। गज़लों से परे अगर बात करें तो कई सारे फ़िल्मी-गानों को उन्होंने स्वरबद्ध किया है। एक तरह से वे गु्लज़ार के प्रिय रहे हैं। "दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात-दिन", "नाम गुम जाएगा", "एक अकेला इस शहर में", "हुज़ूर इस क़दर भी न इतराके चलिए" कुछ ऐसे ही मकबूल गाने हैं, जिन्हें गुलज़ार ने लिखा और "भूपिन्दर सिंह" ने अपनी आवाज़ दी। जी हाँ, हमारी आज की गज़ल के संगीतकार "भूपिन्दर सिंह" जी ही हैं। तो अब तक हम ग़ज़ल के संगीतकार से रूबरू हो चुके है, अब इस महफ़िल में बस ग़ज़लगो और गायिका की ही कमी है। दोस्तों, मुझे उम्मीद है कि मैने गायिका की पहचान के लिए जो हिंट दिए थे, उनकी मदद से आपने अब तक गायिका का नाम जान ही लिया होगा। आप हैं "छाया गांगुली"। छाया गांगुली से जुड़ी मैंने कई सारी बातें आपको पहले ही बता दी हैं, अब उनके बारे में ज़्यादा लिखने चलूँगा तो आलेख लंबा हो जाएगा। इसलिए अच्छा होगा कि मैं अब ग़ज़ल की ओर रूख़ करूँ।

कई साल पहले "नाज़ था ख़ुद पर मगर ऐसा न था" नाम से ग़ज़लों की एक एलबम आई थी। आज हम उसी एलबम की प्रतिनिधि गज़ल आपको सुना रहे हैं। प्रतिनिधि ग़ज़ल होने के कारण यह तो साफ़ ही है कि उस ग़ज़ल के भी बोल यही है..."नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था" । इस सुप्रसिद्ध गज़ल के बोल लिखे थे "इब्राहिम अश्क़" ने। कभी मौका आने पर "इब्राहिम अश्क" साहब के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगे, अभी अपने आप को बस इस गज़ल तक ही सीमित रखते हैं। इस गज़ल की ख़ासियत यह है कि बस चार शेरों में ही पूरी दुनिया की बात कह दी गई है। गज़लगो कभी खुद पर नाज़ करता है, कभी जहां की तल्ख निगाहों का ब्योरा देता है तो कभी अपने महबूब पर गुमां करता है। भला दूसरी कौन-सी ऐसी गज़ल होगी जो चंद शब्दों में ही सारी कायनात का जिक्र करती हो। शुक्र यह है कि इश्क़-वालों के लिए कायनात बस अपने इश्क़ तक ही सिमटा नहीं है। वैसे इसे शुक्र कहें या मजबूरी, क्योंकि इश्क़-वाले तो ख़ुद में ही डूबे होते हैं, उन्हें औरों से क्या लेना। अब जब औरों को इनकी खुशी न पचे तो ये दुनिया की शिकायत न करें तो क्या करें।

इश्क-वालों ने किए जब अलहदा हैं रास्ते,
राह-भर में खार किसने बोए इनके वास्ते।

तो लीजिए आप सबके सामने पेश-ए-ख़िदमत है आज की ग़ज़ल, लुत्फ़ लें और अगर अच्छी लगे तो हमारे चुनाव की दाद दें:

नाज़ था खुद पर मगर ऐसा न था,
आईने में जब तलक देखा न था।

शहर की महरूमियाँ मत पूछिये,
भीड़ थी पर कोई भी अपना न था।

मंजिलें आवाज़ देती रह गईं,
हम पहुँच जाते मगर रस्ता न था।

इतनी दिलकश थी कहाँ ये ज़िंदगी,
हमने जब तक आपको चाहा न था।




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Tuesday, August 9, 2011

आपकी याद आती रही...."अलाव" में जलते दिल की कराह

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 718/2011/158



'एक पल की उम्र लेकर' - सजीव सारथी की लिखी कविताओं की इस शीर्षक से किताब में से चुनकर १० कविताओं पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की आठवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। हमें आशा है कि अब तक इस शृंखला में प्रस्तुत कविताओं और गीतों का आपने भरपूर स्वाद चखा होगा। आज की कविता है 'अलाव'।



तुम्हारी याद

शबनम

रात भर बरसती रही

सर्द ठंडी रात थी

मैं अलाव में जलता रहा

सूखा बदन सुलगता रहा

रूह तपती रही

तुम्हारी याद

शबनम

रात भर बरसती रही



शायद ये आख़िरी रात थी

तुमसे ख़्वाबों में मिलने की

जलकर ख़ाक हो गया हूँ

बुझकर राख़ हो गया हूँ

अब न रहेंगे ख़्वाब

न याद

न जज़्बात ही कोई

इस सर्द ठंडी रात में

इस अलाव में

एक दिल भी बुझ गया है।




बाहर सावन की फुहारें हैं, पर दिल में आग जल रही है। कमरे के कोने में दीये की लौ थरथरा रही है। पर ये लौ दीये की है या ग़म की समझ नहीं आ रहा। बाहर पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, सब रिमझिम फुहारों में नृत्य कर रहे हैं, और यह क्या, मैं तो बिल्कुल सूखा हूँ अब तक। काश मैं भी अपने उस प्रिय जन के साथ भीग पाती! पर यह क्या, वह लौ भी बुझी जा रही है। चश्म-ए-नम भी बह बह कर सूख चुकी है, बस गालों पर निशान शेष है। जाने कब लौटेगा वो, जो निकला था कभी शहर की ओर, एक अच्छी ज़िंदगी की तलाश में। जाने यह दूरी कब तक जान लेती रहेगी, जाने इंतज़ार की घड़ियों का कब ख़ातमा होगा। शायर मख़्दूम महिउद्दीन नें नायिका की इसी बेकरारी, बेचैनी और दर्द को समेटा था १९७९ की फ़िल्म 'गमन' की एक ग़ज़ल में। जयदेव के संगीत में छाया गांगुली के गाये इस अवार्ड-विनिंग् ग़ज़ल को आज की इस कविता के साथ सुनना बड़ा ही सटीक मालूम होता है। लीजिए ग़ज़ल सुनने से पहले पेश है इसके तमाम शेर...



आपकी याद आती रही रातभर,

चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रातभर।



रातभर दर्द की शमा जलती रही,

ग़म की लौ थरथराती रही रातभर।



बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा,

याद बन बन के आती रही रातभर।



याद के चाँद दिल में उतरते रहे,

चांदनी जगमगाती रही रातभर।



कोई दीवाना गलियों में फ़िरता रहा,

कोई आवाज़ आती रही रातभर।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - लता जी की आवाज़ है.

सूत्र २ - गीतकार ही खुद निर्देशक है.

सूत्र ३ - "शाख" शब्द मुखड़े की पहली दोनों पंक्तियों में आता है.



अब बताएं -

फिल्म के नायक कौन हैं - ३ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक

गीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

कल क्षिति जी ने ३ अंकों पर कब्ज़ा किया, इस शृंखला में पहली बार अमित जी से ये हक छीना है किसी ने बधाई



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Friday, October 16, 2009

आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है...."सुरेश" की आवाज़ में पूछ रहे हैं "शहरयार"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५४

की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की दूसरी गज़ल लेकर। आज की गज़ल जिस फ़िल्म से(हाँ, यह फ़िल्मी-गज़ल है) ली गई है, उस फ़िल्म की चर्चा महफ़िल-ए-गज़ल में न जाने कितनी बार हो चुकी है। चाहे छाया गांगुली की "आपकी याद आती रही रात भर" हो, हरिहरण का "अजीब सानेहा मुझपे गुजर गया" हो या फिर आज की ही गज़ल हो, हर बार किसी न किसी बहाने से यह फ़िल्म महफ़िल-ए-गज़ल का हिस्सा बनती आई है। १९७९ में "मुज़फ़्फ़र अली" साहब ने इस चलचित्र का निर्माण करके न सिर्फ़ हमें नए-नए फ़नकार (गायक और गायिका) दिये, बल्कि "नाना पाटेकर" जैसे संजीदा अभिनेता को भी दर्शकों के सामने पेश किया। यह फ़िल्म व्यावसायिक तौर पर कितनी सफ़ल हुई या फिर कितनी असफ़ल इसकी जानकारी हमें नहीं है, लेकिन इस फ़िल्म ने लोगों के दिलों में अपना स्थान ज़रूर पक्का कर लिया। तो चलिए हम बढते हैं आज की गज़ल की ओर। आज की गज़ल को संगीत से सजाया है "जयदेव" साहब ने जिनके बारे में ओल्ड इज़ गोल्ड और महफ़िल-ए-गज़ल में बहुत सारी बातें हो चुकी हैं। यही बात इस गज़ल के गायक यानि की सुरेश वाडेकर साहब पर भी लागू होती है। इसलिए आज की महफ़िल को हम इस गज़ल के गज़लगो "शहरयार" साहब के सुपूर्द करते हैं। "शहरयार" साहब के बारे में "आज के प्रसिद्ध शायर : शहरयार" पुस्तक में जानेमाने लेखक "कमलेश्वर" लिखते हैं: हिन्दुस्तानी अदब में शहरयार वो नाम है जिसने छठे दशक की शुरूआत में शायरी के साथ उर्दू अदब की दुनिया में अपना सफ़र शुरू किया। यह दौर वह था जब उर्दू शायरी में दो धाराएँ बह रही थीं और दोनों के अपने अलग-अलग रास्ते और अलग-अलग मंज़िलें थीं। एक शायरी वह थी जो परम्परा को नकार कर बगा़वत को सबकुछ मानते हुए नएपन पर ज़ोर दे रही थी और दूसरी अनुभूति, शैली और जदीदियत की अभिव्यक्ति के बिना पर नया होने का दावा कर रही थी और साथ ही अपनी परम्परा को भी सहेजे थी ! शहरयार ने अपनी शायरी के लिए इस दूसरी धारा के साथ एक नए निखरे और बिल्कुल अलग अन्दाज़ को चुना—और यह अन्दाज़ नतीजा था और उनके गहरे समाजी तजुर्बे का, जिसकी तहत उन्होंने यह तय कर लिया था कि बिना वस्तुपरक वैज्ञानिक सोच के दुनिया में कोई कारगर-रचनात्मक सपना नहीं देखा जा सकता। उसके बाद वे अपनी तनहाइयों और वीरानियों के साथ-साथ दुनिया की खुशहाली और अमन का सपना पूरा करने में लगे रहे!

कुँवर अख़लाक मोहम्मद खाँ उर्फ शहरयार का जन्म ६ जून १९३६ को आंवला, जिला बरेली में हुआ। वैसे क़दीमी रहने वाले वह चौढ़ेरा बन्नेशरीफ़, जिला बुलंदशहर के हैं। वालिद पुलिस अफसर थे और जगह-जगह तबादलों पर रहते थे इसलिए आरम्भिक पढ़ाई हरदोई में पूरी करने के बाद इन्हें १९४८ में अलीगढ़ भेज दिया गया। वह कद-काठी से मज़बूत और सजीले थे। अच्छे खिलाड़ी और एथलीट भी थे और वालिद की यह इच्छा थी कि ये उन्हीं के क़दमों पर चलते हुए पुलिस अफसर बन जाएँ। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद ऐसा हो न सका। आगे चलकर सन् १९६१ में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए. किया। विद्यार्थी जीवन में ही अंजुमन-ए-उर्दू-मुअल्ला के सैक्रेटरी और ‘अलीगढ़ मैगज़ीन’ के सम्पादक बना दिए गए और तभी से इनके इरादों ने पकना शुरू कर दिया। अपने इलाके की सांझी तहजीब ने इनके लिए मज़हब का रूप अख्तियार कर लिया! उर्दू और हिन्दी भाषा के बीच दीवार बनावटी नज़र आने लगी। सन् १९६६ में ही शहरयार विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हुए जबकि सन् १९६५ में ही इनका पहला काव्य संग्रह ‘इस्मे-आज़म’ प्रकाशित हो चुका था! इसके बाद १९८३ में रीडर और १९८७ में वहीं प्रोफ़ेसर हो गए! सन् १९६९ में इसका दूसरी काव्य-संग्रह ‘सातवाँ दर’ छपा। फिर ‘हिज़्र के मौसम’ १९७८ में, फिर १९८५ में ‘ख्याल का दर बन्द है’ प्रकाशित हुआ और इसे साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाज़ा गया ! इसके बाद १९९५ में ‘नींद की किरचें’ प्रकाशित हुआ। सिलसिला अब भी ज़ारी है और शहरयार बदस्तूर शे’र कह रहे हैं। और अब तो इनका समूचा काव्य लेखन नागरी लिपि में भी आ गया है और हिन्दीभाषी लोगों ने भी भरपूर स्वागत किया।
तो ये थे उस पुस्तक के कुछ अंश। इन पंक्तियों के माध्यम से शहरयार साहब के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। फिर भी हम चाहते हैं कि उनकी आपबीती उन्हीं के शब्दों में सुनें। तो ये रहे हमारे "शहरयार" साहब:

मेरे घर में दूर-दूर तक शायरी का कोई सिलसिला नहीं था। सब लोग पुलिस फोर्स में थे। बस इत्तेफ़ाक है कि मेरी मुलाकात सन्‌ १९५५ में खलीलुर्रहमान आजमी साहब से हुई जो उर्दू के बड़े शायर और नक्काद (आलोचक) थे। उन्हीं की सोहबत में मैंने शेर कहना शुरू किया। सन्‌ १९५७-५८ में बाकायदा संजीदगी से शायरी करने लगा। मेरे एक मित्र थे, हैदराबाद के, जो अच्छे शायर भी थे उन्होंने मुझे लिखा कि मेरा नाम (कुँवर अखलाक मुहम्मद खान) बहुत अजीब-सा नाम है, कहीं से शायराना नाम नहीं लगता है। मैं ग़जल में कुँवर का तखल्लुस करता था। कुँवर के मानी प्रिन्स के होते हैं। खलीलुर्रहमान आजमी ने कहा कि तुम शहरयार रख लो, तो इस तरह मैंने अपना नाम शहरयार रख लिया।

मेरी सोच यह है कि साहित्य को अपने दौर से अपने समाज से जुड़ा होना चाहिए, मैं साहित्य को मात्र मन की मौज नहीं मानता, मैं समझता हूँ जब तक दूसरे आदमी का दुख दर्द शामिल न हो तो वह आदमी क्यों पढ़ेगा आपकी रचना को। जाहिर है दुख दर्द ऐसे हैं कि वो कॉमन होते हैं। जैसे बेईमानी है, झूठ है, नाइंसाफी है, ये सब चीजें ऐसी हैं कि इनसे हर आदमी प्रभावित होता है। इसका कारण यह है कि हर हिन्दुस्तानी का दिल आज भी वही है, जो पहले था। मुद्दा हिंदुस्तानी संस्कृति/तहजीब या सांप्रदायिक सौहार्द्र की भावनाओं को सहेजने वाले दिल का हो या आम हिंदुस्तानी के जजबातों का; दिल अब भी वही है; जहां पहले था। इसकी धड़कनें हिंदुस्तान की पुरानी वैल्यूज के साथ आज भी जिंदा हैं। यह जरूर है कि बहुत से लोग उसकी धड़कनों को अनसुना करने की असफल कोशिशें करते रहते हैं। फिलहाल, हम आज हिंदुस्तान में जो भी बुरा बदलाव देख रहे हैं-चाहे वो सामाजिक हो राजनीतिक या सांप्रदायिक; वह ताउम्र यथावत नहीं रहने वाला। राजनीति की बात करें, तो चुनावों के दौरान हिंदुस्तानी जिस गुस्से/भावना का इजहार करते हैं, वह यह दर्शाता है कि ज्यादातर लोग हिंदुस्तान को उसी शक्ल में देखना चाहते हैं, जैसा पहले था, पवित्र और सौहार्द्रपूर्ण।


यह पूछने पर कि उन्होंने फिल्मों तक का रास्ता कैसे तय किया, उनका जवाब कुछ यूँ था(साभार: अमर उजाला): मुजफ्फर अली पेंटर थे और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मेरे जूनियर भी। वे शायरी पसंद करते थे। उन दिनों (वर्ष १९६५ में) मेरा पहला गजल संग्रह `इस्मे आजम´ छपा, जो उनके पास था। उससे वे प्रभावित थे। पांच-छह साल बाद उनका एक खत मिला कि वे `गमन´ फिल्म में मेरी दो गजलें रखना चाहते हैं। इस तरह मेरी दो गज़लें इस फिल्म में शामिल हो गईं। इन गजलों के कैसेट रिलीज के मौके पर मुजफ्फर ने मुझे मुंबई बुलाया और लखनवी अदब पर फिल्म बनाने की बात कही। मैं फिक्शन पढ़ाता था और उमराव जान उपन्यास उस समय बन रहा था। मैंने इस किताब की बुनियाद पर फिल्म बनाने का सुझाव दिया। इस फिल्म में मेरी पांच गजलें हैं। इस तरह शहरयार साहब के बारे में आज हमने बहुत कुछ जाना। तो चलिए इस आलेख को खत्म करने से पहले उनका एक शेर देख लेते हैं:

हमराह कोई और न आया तो क्या गिला
परछाई भी जब मेरी मेरे साथ न आयी।


अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। हमें पूरा यकीन है कि यह आपको बेहद पसंद आएगी। तो लुत्फ़ उठाने के लिए तैयार हो जाईये:

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यूँ है

तन्हाई की ये कौन सी मन्ज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है

हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो ज़ूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यूँ है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

यहाँ ___ की कीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम दे...


आपके विकल्प हैं -
a) गिलास, b) लिबास, c) शराब, d) गिलाफ

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "खामोश" और शेर कुछ यूं था -

भड़का रहे हैं आग लब-ए-नगमागर से हम,
खामोश क्या रहेंगे जमाने के डर से हम..

यूँ तो महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुए सुमित जी, लेकिन सही मायने में साहिर लुधियानवी के लिखे इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "शरद" जी ने। सुमित जी "चुप" और "खामोश" में कन्फ़्युज्ड से दिखे और इस कारण उन्होंने दोनों शब्दों पर शेर कह दिया। हम यहाँ पर "खामोश" शब्द पर कहा गया शेर पेश कर रहे हैं:

हर तरफ एक पुरसरार सी खामोशी है,
अपने साये से कोई बात करे, कुछ बोले.
तल्खिये मय में जरा तल्खिये दिल भी घोले.. (पुरसरार= full of secrets, तल्खी= कड़वाहट)

और यह रहा शरद जी का स्वरचित शेर:

खामोश रह के तुमने बहुत कह दिया सनम
हम बोल के भी तुमसे कभी कुछ न कह सके। (वाह...माशा-अल्लाह, दिल जीत लिया आपने..)

शरद जी के बाद महफ़िल में नज़र आईं सीमा जी। यह रही आपकी पेशकश:

रास्ते ख़ामोश हैं और मंज़िलें चुपचाप हैं
ज़िन्दगी मेरी का मकसद, सच कहूं तो आप हैं। (तेजेन्द्र शर्मा)

ठीक है - जो बिक गया, खामोश है
क्यों मगर सारी सभा खामोश है

यह बड़े तूफान की चेतावनी
जो उमस में हर दिशा खामोश है (ऋषभ देव शर्मा)

महफ़िल की शमा बुझते-बुझते मंजु जी भी दिख हीं गईं। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

गुनहगार हो तुम मेरी जिन्दगी के ,
खामोश जुबान का दिया उपहार तुमने .

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, September 22, 2008

ख़ुसरो निज़ाम से बात जो लागी

भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित सूफ़ी संगीत की विधाओं में सबसे लोकप्रिय है क़व्वाली. इस विधा के जनक के रूप में पिछली कड़ी में अमीर ख़ुसरो का ज़िक़्र भर हुआ था.

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली गांव में १२५३ में जन्मे अमीर खुसरो का असली नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद था. कविता और संगीत के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां अपने नाम कर चुके अमीर खुसरो को तत्कालीन खिलजी बादशाह जलालुद्दीन फ़ीरोज़ खिलजी ने को तूती-ए-हिन्द का ख़िताब अता फ़रमाया था. 'अमीर' का बहुत सम्मानित माना जाने वाला ख़िताब भी उन्हें खिलजी बादशाह ने ही दिया था.

भीषणतम बदलावों, युद्धों और धार्मिक संकीर्णता का दंश झेल रहे तेरहवीं-चौदहवीं सदी के भारतीय समाज की मूलभूत सांस्कृतिक एकता को बचाए रखने और फैलाए जाने का महत्वपूर्ण कार्य करने में अमीर खुसरो ने साहित्य और संगीत को अपना माध्यम बनाया.

तब तक भारतीय उपमहाद्वीप में सूफ़ीवाद अपनी जड़ें जमा चुका था और उसे इस विविधतापूर्ण इलाक़े के हिसाब से ढाले जाने के लिये जिस एक महाप्रतिभा की दरकार थी, वह अमीर ख़ुसरो के रूप में इस धरती पर आई. सूफ़ीवाद के मूल सिद्धान्त ने अमीर खुसरो को भी गहरे छू लिया और वे इस बात को जान गये कि बरबादी की कगार पर पहुंच चुके भारतीय समाज को बचाने का इकलौता रास्ता हिन्दू-मुस्लिम समरसता में निहित है. इसी बीच उन्होंने दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को उन्होंने अपना रूहानी उस्ताद मान लिया था. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का उनके जीवन पर ताज़िन्दगी असर रहा. गुरु को ईश्वर से बड़ा दर्ज़ा दिए जाने की ख़ास उपमहाद्वीपीय परम्परा का निर्वहन अमीर ख़ुसरो ने जिस शिद्दत से किया, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है.

गंगा-जमनी ख़ून उनके रक्त तक में इस लिहाज़ से मौजूद था कि उनके पिता मुस्लिम थे और मां हिन्दू राजपूत. घर पर दोनों ही धर्मों के रस्म-त्यौहार मनाए जाने की वजह से अमीर ख़ुसरो साहब को इन दोनों धर्मों की नैसर्गिक रूप से गहरी समझ थी. सोने में सुहागा इस बात से हुआ कि उनकी काव्य प्रतिभा बहुत बचपन में ही प्रकट हो गई थी. उनकी असाधारण काव्यप्रतिभा और प्रत्युत्पन्नमति के बारे में सैकड़ों क़िस्से-कहानियां प्रचलित हैं. सो उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों की धार्मिक और अन्य परम्पराओं को गहरे समझते हुए कविता की सान पर जो ज़मीन तैयार की उसमें साहित्य के शुद्धतावादियों द्वारा बिसरा दी जाने वाली छोटी-छोटी डीटेल्स को जगह मिली और सूफ़ीवाद को नया रास्ता.

उनके जीवन का एक क़िस्सा यूं है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को एक बार स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए. इस के बाद उन्होंने अमीर ख़ुसरो से कृष्ण-चरित्र को आमफ़हम हिन्दवी ज़ुबान में लिखने का आदेश दिया. 'हालात-ए-कन्हैया' नामक यह ग्रन्थ अब उनकी काव्य-यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में अपनी जगह बना चुका है.

बाद में क़व्वाली जैसी पारलौकिक संगीत विधा को रच देने के बाद उन्होंने जो काव्य रचा वह अब काल-समय की सीमाओं से परे है. पहले सुनिये नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब की आवाज़ में उन्हीं की एक बहुत विख्यात रचना:



क़व्वाली को स्थापित कर चुकने के बाद उन्होंने भाषा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रयोग करने आरम्भ किये - ग़ज़ल, मसनवियां, पहेलियां बोल-बांट और तक़रार इत्यादि विधाओं में उनका कार्य देखा जाए तो एकबारगी यक़ीन नहीं होता कि फ़क़त बहत्तर साल की उम्र में एक शख़्स इतना सारा काम कर सकता है.

उनके सारे रचनाकर्म में सूफ़ीवाद की गहरी छाया होती थी और वे उस निराकार परमशक्ति को अपना मेहबूब मानते थे जिस तक पहुंचना ही सूफ़ीवाद का मुख्य उद्देश्य माना गया है. अन्य सूफ़ीवादियों से वे इस मायने में अलहदा थे कि वे भाषा के स्तर पर भी सतत प्रयोग करते रहे. मिसाल के तौर पर सुनिये छाया गांगुली के स्वर में एक और रचना, जिसकी उत्कृष्टता इस बात में निहित है कि ग़ज़ल का रदीफ़ फ़ारसी में है और क़ाफ़िया हिन्दवी में. आप की सहूलियत के लिए इसका अनुवाद भी किये दे रहा हूं:



ज़ेहाल-ए-मिस्किन मकुन तग़ाफ़ुल, दुराये नैना बनाए बतियां
कि ताब-ए-हिज्रां नदारम अय जां, न लेहो काहे लगाए छतियां

चो शाम-ए-सोज़ां चो ज़र्रा हैरां हमेशा गिरियां ब इश्क़ आं माह
ना नींद नैनां ना अंग चैना ना आप ही आवें ना भेजें पतियां

यकायक अज़ दिल बज़िद परेबम बबुर्द-ए-चश्मश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाएं प्यारे पी को हमारी बतियां

शबान-ए-हिज्रां दराज़ चो ज़ुल्फ़ वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह
सखी़ पिया को जो मैं ना देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां

(आंखें फ़ेरकर और कहानियां बना कर यूं मेरे दर्द की अनदेखी न कर
अब बरदाश्त की ताब नहीं रही मेरी जान! क्यों मुझे सीने से नहीं लगा लेता

मोमबत्ती की फड़फड़ाती लौ की तरह मैं इश्क़ की आग में हैरान-परेशान फ़िरता हूं
न मेरी आंखों में नींद है, न देह को आराम, न तू आता है न कोई तेरा पैगाम

अचानक हज़ारों तरकीबें सूझ गईं मेरी आंखों को और मेरे दिल का क़रार जाता रहा
किसे पड़ी है जो जा कर मेरे पिया को मेरी बातें सुना आये

विरह की रात ज़ुल्फ़ की तरह लम्बी, और मिलन का दिन जीवन की तरह छोटा
मैं अपने प्यारे को न देख पाऊं तो कैसे कटे यह रात)

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