Showing posts with label bulo c rani. Show all posts
Showing posts with label bulo c rani. Show all posts

Monday, February 7, 2011

हम इश्क़ के मारों को दो दिल जो दिए होते....एक और खूबसूरत ख्याल सुर्रैय्या की खनकती आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 587/2010/287

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों हम आप तक पहुँचा रहे हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध सिंगिंग् स्टार सुरैया पर केन्द्रित लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा'। दोस्तों, हमने इस शृंखला में आपको बताया था कि सुरैया ने फ़िल्मों में बाल कलाकार के रूप में क़दम रख था। बतौर बालकलाकार उनकी पहली फ़िल्म थी 'उसने क्या सोचा', जो बनी थी १९३७ में। जब वो १२ साल की थीं, उन्होंने फ़िल्म 'ताज महल' में अभिनय किया था जिसका श्रेय उनके मामाजी को जाता है। आइए आज इसी वाक्या के बारे में जान लेते हैं सुरैया के जुबाँ से जो उन्होंने शमिम अब्बास के उसी इंटरव्यु में कहा था। "इसमें भी एक इत्तफ़ाक़ है, मेरा कोई इरादा नहीं था फ़िल्म जॊयन करने का। लेकिन मेरे एक अंकल हैं जो फ़िल्मों में काम किया करते थे, 'ऐज़ ए विलन'। He was a very popular actor of his time। तो मैं स्कूल में पढ़ा करती थी, उस वक़्त छुट्टियाँ थी, वकेशन था, तो मैं उनके साथ शूटिंग् देखने चली गई। तो मोहन स्टुडियो में उनकी शूटिंग् थी। वहाँ एक डिरेक्टर थे नानुभाई वकील। तो वो उस वक़्त एक ऐतिहासिक फ़िल्म बना रहे थे जिसका नाम था 'ताज महल'। उन्हें एक छोटी बच्ची की ज़रूरत थी जो मुमताज़ महल के बचपन का रोल कर सके। तो उन्होंने मुझे देखा तो अंकल से मेरे बारे में पूछने लगे। मेरी आँखें क्योंकि मुग़लीयात जैसे हैं, उनको पसंद आईं, वो कहने लगे कि छोटा रोल है, कुछ ही दिनों की बात है, कर लो। मैं तो नर्वस हो गई। हालाँकि मुझे फ़िल्में देखने का बड़ा शौक था, बचपन से ही हर एक फ़िल्म देखा करती थी, लेकिन जब मुझसे यह पूछा गया कि तुम काम करो, तो मैं नर्वस हो गई। फिर एक टेम्प्टेशन भी हुआ, छुट्टियाँ भी है स्कूल में, तो कर लिया जाए, it will be fun। तो मैंने फ़िल्म की, सब ने फ़िल्म देखी, प्रकाश पिक्चर्स के विजय भट्ट और शंकर भट्ट ने भी फ़िल्म देखी, पूछा कि कौन है यह लड़की, ज़बान बहुत अच्छी है इसकी, उनको भी चाइल्ड रोल के लिए एक बच्ची की ज़रूरत थी, इस तरह से सिलसिला शुरु हो गया।"

सुरैया की जिस फ़िल्म का गीत आज हम आपको सुनवाने के लिए लाये हैं, वह है 'बिल्वामंगल' का। १९५४ की यह फ़िल्म थी जिसमें सुरैया के नायक बने थे सी. एच. आत्मा। डी. एन. मधोक के गीत और बुलो. सी. रानी का संगीत था। इस फ़िल्म में सुरैया के दो गीत बहुत मशहूर हुए थे, जिनमें एक था "परवानों से प्रीत दीख ली शमा से सीखा जल जाना, फिर दुनिया को याद रहेगा तेरा मेरा अफ़साना", और दूसरा गाना था "हम इश्क़ के मारों को दो दिल जो दिए होते, हमने ना कभी उनके अहसान लिए होते", और यही गीत आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शान है। क्या ग़ज़ब का मुखड़ा है साहब कि सुन कर दिल कह उठता है 'वाह!' इस ग़ज़ल के दो और शेर ये रहे...

"एक दिल जो कभी रोता दूजे से बहल जाते,
आहें ना भरी होती, शिकवे ना किए होते।"

"आते कि ना आते परवाह किसे होती,
उल्फ़त में किसी की ना मर मर के जिए जाते।"

फ़िल्म 'बिल्वामंगल' के साथ सुरैया की एक ख़ास याद जुड़ी हुई है, आइए उसी के बारे में जान लेते हैं 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम के माध्यम से। "सन् १९५२ के फ़िल्म फ़ेस्टिवल में हॊलीवूड के डिरेक्टर फ़्रैंक काप्रा आये थे। बातचीत के दौरान मैंने उनसे कहा ग्रेगरी पेक की फ़िल्में मुझे बहुत पसंद है और आप उनसे यह ज़रूर कह दीजिएगा। और फिर जब मिस्टर काप्रा ने मेरा फ़ोटो और पता ले जाकर ग्रेगरी पेक को दिया तो उन्होंने मुझे एक ख़त लिखा कि अगर मौका हुआ हिंदुस्तान आकर आपसे ज़रूर मुलाक़ात करूँगा। मैं तो यह समझी थी कि वो क्या आयेंगे और क्या मुलाक़ात करेंगे! फिर दो साल बाद एक दिन मैं फ़िल्म 'बिल्वामंगल' की शूटिंग् से थकी-हारी घर आई और सो गई। रात के करीब १२ बजे मम्मी मुझे जगाने लगी कि 'उठो उठो, देखो बाहर कौन आया है, ग्रेगरी पेक तुमसे मिलने आये हैं'। पहले मैं ख़्वाब समझी, मगर जब नींद टूटी तो यह हक़ीक़त थी। ख़ैर दूसरे दिन जब यह बात अख़बारों में छपी तो मैं 'बिल्वामंगल' का ही गीत पिक्चराइज़ कर रही थी।" तो लीजिए दोस्तों, सुनिए सुरैया की आवाज़ में 'बिल्वामंगल' की एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल को।



क्या आप जानते हैं...
कि सुरैया ने अपने छोटे से फ़िल्मी सफ़र में क़रीब ७१ फ़िल्मों में काम किया, और इस दौरान उस दौड़ के लगभग सभी जानेमाने संगीतकारों के लिए गानें गाये और अलग अलग मूड्स के गीत गाकर अपने फ़न के जोहर दिखाये।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ये मुकाबला तो लगता है आखिरी सिरे तक जाएगा....अमित जी और अंजना जी जबरदस्त मुकाबला कर रहे हैं....विजय जी और अवध जी आपने भी सही पहचाना

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, August 31, 2010

हमें तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों ने...फ़िल्म 'अल-हिलाल' की मशहूर सदाबहार क़व्वाली जो आज कव्वाल्लों की पहली पसंद है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 473/2010/173

मज़ान के मुबारक़ मौक़े पर आपके इफ़्तार की शामों को और भी ख़ुशनुमा बनाने के लिए इन दिनों हर शाम हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल को रोशन कर रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कुछ शानदार क़व्वालियों के ज़रिए। और इन्ही क़व्वालियों के ज़रिए ४० के दशक से ८० के दशक के बीच क़व्वालियों का मिज़ाज किस तरह से बदलता रहा, इसका भी आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा पाएँगे और महसूस भी करेंगे एक के बाद एक इन क़व्वालियों को सुनते हुए। पिछली दो कड़ियों में आपने ४० के दशक की दो क़व्वालियाँ सुनी, आइए आज एक लम्बी छलांग मार कर पहुँच जाते हैं साल १९५८ में। इस साल एक ऐसी क़व्वाली आई थी जिसने इतनी ज़्यादा लोकप्रियता हासिल की कि आने वाले सालों में बहुत से क़व्वालों ने इस क़व्वाली को गाया और आज भी गाते हैं। इस तरह से इस क़व्वाली के बहुत से संस्करण बन गए हैं लेकिन जो मूल क़व्वाली है वह १९५८ के उस फ़िल्म में थी जिसका नाम है 'अल-हिलाल'। जी हाँ, "हमें तो लूट लिया मिलके हुस्नवालों ने, काले काले बालों ने, गोरे गोरे गालों ने"। इस्माइल आज़ाद और साथियों की गाई इस क़व्वाली को लिखा था शेवन रिज़्वी ने। फ़िल्म में संगीत था बुलो सी. रानी का। १९५४ में 'बिलवामंगल' फ़िल्म में लोकप्रिय संगीत देने के बाद 'अल-हिलाल' की यह क़व्वाली उनकी मशहूर हुई थी। वैसे यह बताना मुश्किल है कि इस क़व्वाली में उनका योगदान कितना था और इस्माइल आज़ाद के क़व्वाली वाले अंदाज़ का कितना! लेकिन इस कामयाबी के बावजूद बुलो सी. रानी का करीयर ग्राफ़ ढलान पर ही चलता गया और धीरे धीरे वो फ़िल्म जगत से दूर होते चले गए। 'अल-हिलाल' के निर्देशक थे राम कुमार, और फ़िल्म के नायक नायिका थे महिपाल और शक़ीला।

और आइए अब कुछ बातें की जाए क़व्वाली के विशेषताओं की। कल हमने आपको क़व्वाली के उत्स की जानकारी दी थी, आज बात करते हैं कि किन किन भाषाओं में क़व्वाली गाई जाती है। वैसे तो सामान्यत: क़व्वाली में उर्दू और पंजाबी भाषा का ज़्यादा इस्तेमाल होता है, लेकिन बहुत सी क़व्वालियाँ परशियन, ब्रजभाषा और सिरैकी में भी गाई जाती है। कुछ स्थानीय भाषाओं में भी क़व्वालियाँ बनती है, मसलन, बंगला में छोटे बाबू क़व्वाल की गाई हुई क़व्वालियाँ मशहूर हैं, हालाँकि ये संख्या में बहुत कम है। इन बंगला क़व्वालियों की गायन शैली भी इस तरह की है कि उर्दू क़व्वालियों से बिल्कुल अलग सुनाई देती है। इनमें बाउल गायन शैली का ज़्यादा प्रभाव महसूस किया जा सकता है। आज ये बंगला क़व्वालियाँ बंगलादेश में ही गाई और सुनी जाती है। किसी भी क़व्वाली का उद्देश्य है आध्यात्म की खोज। क़व्वाली का जो मूल अर्थ है, वह यही है कि इसे गाते गाते ऐसे ध्यानमग्न हो जाएँ कि ईश्वर के साथ, अल्लाह के साथ एक जुड़ाव सा महसूस होने लगे। क़व्वाली केन्द्रित होती है प्रेम, श्रद्धा और आध्यात्म के खोज पर। वैसे हल्के फुल्के और सामाजिक क़व्वालियाँ भी ख़ूब मशहूर हुआ करती हैं। हिंदी फ़िल्मों में मज़हबी और सामाजिक, दोनों तरह की क़व्वालियों का ही चलन शुरु से रहा है। हम इस शृंखला में ज़्यादातर सामाजिक क़व्वालियाँ ही पेश कर रहे हैं, जिनमें है प्यार, मोहब्बत, हुस्न-ओ-इश्क़ की बातें हैं, मीठी नोक झोक और तकरार की बातें हैं, जीवन दर्शन की बातें भी होंगी आगे चलकर किसी क़व्वाली में। लेकिन प्यार मोहब्बत और इश्क़ भी तो ईश्वर से जुड़ने का ही साधन होता है। इसलिए ये हुस्न-ओ-इश्क़ की क़व्वालियों में भी स्पिरिचुअलिटी समा ही जाती है। तो आनंद लेते रहिए इस शुंखला का और अब सुनिए फ़िल्म 'अल-हिलाल' की मशहूर सदाबहार क़व्वाली।



क्या आप जानते हैं...
कि मशहूर बैनर रणजीत मूवीटोन के जानेमाने संगीतकारों में शुमार होता है बुलो सी. रानी का। रणजीत मूवीटोन में स्वतंत्र संगीतकार बनने से पहले वो ज्ञान दत्त और खेमचंद प्रकाश जैसे संगीतकारों के सहायक हुआ करते थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये है एक क्लास्सिक एतिहासिक फिल्म की मशहूर कव्वाली, फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
२. किस संगीतकार गीतकार जोड़ी ने रचा है ये गीत - २ अंक.
३. लता का साथ किस गायिका ने दिया है इस कव्वाली में - ३ अंक.
४ मुखड़े में शब्द है -"नजदीक". फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी, नवीनजी, प्रतिभा जी, और किशोर जी को बधाई, दादी और शरद जी ने आकर महफ़िल की शान दुगनी की है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, November 23, 2009

ए री मैं तो प्रेम दीवानी....मीरा के रंग रंगी गीता दत्त की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 271

२३ नवंबर १९३०। स्थान बंगाल का फ़रीदपुर, जो आज बंगलादेश का हिस्सा है। एक ज़मीनदार परिवार में जन्म हुआ था एक बच्ची का। १९४२ के आसपास वो परिवार साम्प्रदायिक दंगों से अपने आप को बचते बचाते आ पहुँची बम्बई नगरी। लाखों की सम्पत्ति और ज़मीन जायदाद को युंही छोड़कर बम्बई आ पहुँचे इस परिवार ने दो कमरे का एक मकान भाड़े पर लिया। गायन प्रतिभा होने की वजह से यह बच्ची हीरेन्द्रनाथ नंदी से संगीत की तालीम ले रही थी। दिन गुज़रते गए और यह बच्ची भी बड़ी होती गई। १६ वर्ष की आयु में एक रोज़ यह लड़की अपने घर पर रियाज़ कर रही थी जब उसके घर के नीचे से गुज़र रहे थे फ़िल्म संगीतकार पंडित हनुमान प्रसाद। उसकी गायन और आवाज़ से वो इतने प्रभावित हुए कि वो कौतुहल वश सीधे उसके घर में जा पहुँचे। पंडित हनुमान प्रसाद से उसकी यह मुलाक़ात उसकी क़िस्मत को हमेशा हमेशा के लिए बदलकर रख दी। पंडित प्रसाद ने फ़िल्म 'भक्त प्रह्लाद' में इस लड़की को पहला मौका दिया और इस तरह से फ़िल्म जगत को मिली एक लाजवाब पार्श्व गायिका के रूप में गीता रॉय, जो आगे चलकर गीता दत्त के नाम से मशहूर हुईं। दोस्तों, आज २३ नवंबर, गीता जी के जनम दिवस के उपलक्ष पर हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं दस कड़ियों की एक ख़ास लघु शृंखला 'गीतांजली'। गीता दत्त के चाहने वालो की जब बात चलती है, तो इंटरनेट से जुड़े संगीत रसिकों को सब से पहले जिस शख्स का नाम याद आता है वो हैं हमारे अतिपरिचित पराग सांकला जी। गीता जी के गीतों के प्रति उनका प्रेम, जुनून और शोध सराहनीय रहा है। और इसीलिए प्रस्तुत शृंखला के लिए उनसे बेहतर भला और कौन होता जो गीता जी के गाए १० गानें चुनें और उनसे संबंधित जानकारियाँ भी हमें उपलब्ध कराएँ। और उन्होने बहुत ही आग्रह के साथ हमारे इस अनुरोध को ठीक वैसे ही पूरा किया जैसा हमने चाहा था। तो आज से अगले दस दिनों तक हम सुनेंगे पराग जी के चुने हुए गीता जी के गाए १० ऐसे गानें जो फ़िल्माए गये हैं सुनहरे दौर के दस अलग अलग अभिनेत्रियों पर। इस पूरी शृंखला के लिए शोध कार्य पराग जी ने ही किया है, हमने तो बस उनके द्वारा उपलब्ध कराई हुई जानकारी का हिंदी में अनुवाद किया है।

जब गीता रॉय शुरु शुरु में आईं थीं तो उन्होने कई फ़िल्मों में भक्ति रचनाएँ गाईं थीं। उनकी आवाज़ में भक्ति गीत इतने पुर-असर हुआ करते थे कि उन रचनाओं को सुनते हुए ऐसा लगता था कि जैसे ईश्वर से सम्पर्क स्थापित हो रहा हो! तो क्यों ना हम 'गीतांजली' की शुरुआत एक भक्ति रचना के साथ ही करें। और ऐसे में १९५० की फ़िल्म 'जोगन' का ज़िक्र करना अनिवार्य हो जाता है। जी हाँ, आज गीता जी की आवाज़ सज रही है नरगिस के होंठों पर। रणजीत मूवीटोन की इस फ़िल्म का निर्देशन किया था किदार शर्मा ने और नायक बने दिलीप कुमार। संगीतकार बुलो सी. रानी के करीयर की सब से चर्चित फ़िल्म रही 'जोगन' जिसमें उन्होने एक से एक मीरा भजन स्वरबद्ध किए जो गीता जी की आवाज़ पाकर धन्य हो गए। "घूंघट के पट खोल रे", "मत जा मत जा जोगी", "ए री मैं तो प्रेम दीवानी", "प्यारे दर्शन दीजो आए" और "मैं तो गिरिधर के घर जाऊँ" जैसे मीरा भजन एक बार फिर से जीवित हो उठे। मीरा भजनों के अतिरिक्त इस फ़िल्म में किदार शर्मा, पंडित इंद्र और हिम्मतराय शर्मा ने भी कुछ गीत लिखे। लेकिन आज हम सुनेंगे मीरा भजन "ए री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरो दर्द ना जाने कोई"। पाठकों की जानकारी के लिए हम बता दें कि इस फ़िल्म का "मत जा जोगी" भजन गीता जी के पसंदीदा १० गीतों की फ़ेहरिस्त में शोभा पाता है जो उन्होने जारी किया था सन् १९५७ में। दोस्तों, क्योंकि आज गीता जी के साथ साथ ज़िक्र हो रहा है अभिनेत्री नरगिस जी का, तो उनके बारे में भी हम कुछ बताना चाहेंगे। नरगिस हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक चमकता हुआ सितारा हैं जिन्होने सिनेमा के विकास में और सिनेमा को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। १९३५ में बाल कलाकार के रूप में फ़िल्म 'तलाश-ए-हक़' में पहली बार नज़र आईं थीं, लेकिन उनका अभिनय का सफ़र सही मायने में शुरु हुआ सन् १९४२ में फ़िल्म 'तमन्ना' के साथ। ४० और ५० के दशकों में वो छाईं रहीं। युं तो वो एक डॊक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन क़िस्मत उन्हे फ़िल्म जगत में ले आई। उनकी यादगार फ़िल्मों में शामिल है 'बरसात', 'अंदाज़', 'जोगन', 'आवारा', 'दीदार', 'श्री ४२०', 'चोरी चोरी' और इन सब से उपर १९५७ की फ़िल्म 'मदर इंडिया'। १९५८ में सुनिल दत्त से विवाह के पश्चात उन्होने अपना फ़िल्मी सफ़र समाप्त कर दिया और अपना पूरा ध्यान अपने परिवार पे लगा दिया। कैंसर की बीमारी ने उन्हे घेर लिया और ३ मई १९८१ को उन्होने इस संसार को अलविदा कह दिया। और इसके ठीक ५ दिन बाद, ७ मई १९८१ को प्रदर्शित हुई उनके बेटे संजय दत्त की पहली फ़िल्म 'रॉकी'। इस फ़िल्म के प्रीमीयर ईवेंट में एक सीट ख़ाली रखी गई थी नरगिस के लिए। और आइए अब सुनते हैं नरगिस पर फ़िल्माया गीता रॉय की आवाज़ में फ़िल्म 'जोगन' से यह मीरा भजन जिसे सुनते हुए आप एक दैवीय लोक में पहुँच जाएँगे। आज गीता जी के जनम दिवस पर हम हिंद-युग्म की तरफ़ से उन्हे अर्पित कर रहे हैं अपने विनम्र श्रद्धा सुमन!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत है गीता जी का गाया मीना कुमारी के लिए.
२. गीतकार हैं अंजुम जयपुरी.
३. मुखड़े में शब्द है - "नस".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -

नयी विजेता हमें मिली है इंदु जी के रूप में, इंदु जी आपका खता खुला है ३ अंकों से, बधाई, अवध जी आपने बहुत ही दिलचस्प बात बताई, क्या शांति माथुर के बारे में आपके पास और कोई जानकारी उपलब्ध है ? मतलब वो इन दिनों कहाँ है क्या कर रही हैं आदि, उनके बारे में हम सब बहुत कम जानते हैं...पाबला जी और निर्मला जी आभार..

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ