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Saturday, January 24, 2015

बातों बातों में - INTERVIEW OF LYRICIST ANAND BAKSHI'S SON RAKESH BAKSHI

 बातों बातों में - 04

 गीतकार आनन्द बक्शी के पुत्र राकेश बक्शी से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत

"ज़िन्दगी के सफ़र में..." 






नमस्कार दोस्तों! हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते! काश इनकी ज़िन्दगियों के बारे में कुछ मालूमात हो जाती! काश इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते! ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने बीड़ा उठाया है फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का। फ़िल्मी अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार के दिन। आज जनवरी 2014 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार आनन्द बक्शी साहब के बेटे राकेश बक्शी से गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। यह साक्षात्कार वर्ष 2011 में ली गई थी।




राकेश जी, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से, हमारे तमाम पाठकों की तरफ़ से, और मैं अपनी तरफ़ से आपका हमारे इस मंच पर हार्दिक स्वागत करता हूँ, नमस्कार! यह हमारी ख़ुशनसीबी है कि आपसे मिलने और बातचीत करने का मौका मिला।

राकेश जी - नमस्कार! मुझे भी यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा है।


सच पूछिये तो हम अभिभूत हैं आपको हमारे बीच में पाकर। फ़िल्म संगीत के सफलतम गीतकारों में से एक थे आनंद बक्शी जी, और आज उनके बेटे से बातचीत करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है, जिसके लिए आपको हम जितना भी धन्यवाद दें, कम होगी।

बहुत बहुत धन्यवाद!


राकेश जी, वैसे तो बक्शी साहब के बारे में, उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी के बारे में, उनके करीयर के बारे में हम कई जगहों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए इस बातचीत में हम उस तरफ़ न जाकर उनकी ज़िंदगी के कुछ ऐसे पहलुयों के बारे में आपसे जानना चाहेंगे जो शायद पाठकों को मालूम न होगी। और इसीलिए बातचीत के इस सिलसिले का नाम हमने रखा है 'बेटे राकेश बक्शी की नज़रों में गीतकार आनंद बक्शी'।

जी ज़रूर!


कैसा लगता है 'राकेश आनंद बक्शी' होना? मान लीजिए आप कहीं जा रहे हैं, और अचानक कहीं से बक्शी साहब का लिखा गीत बज उठता है, किसी पान की दुकान पे रेडियो पर, कैसा महसूस होता है आपको?

उनके लिखे सभी गीत मुझे नॉस्टल्जिक बना देता है। उनके लिखे न जाने कितने गीतों के साथ कितनी हसीन यादें जुड़ी हुईं हैं, या फिर कोई पर्सनल ईक्वेशन। कहीं से उनका लिखा गीत मेरे कानों में पड़ जाये तो मैं उन्हें और भी ज़्यादा मिस करने लगता हूँ।


अच्छा राकेश जी, किस उम्र में आपको पहली बार यह अहसास हुआ था कि आप 'आनंद बक्शी' के बेटे हैं? उस आनंद बक्शी के, जो कि फ़िल्म जगत के सबसे लोकप्रिय गीतकारों में से एक हैं? अपने बालपन में शायद आपको अंदाज़ा नहीं होगा कि बक्शी साहब की क्या जगह है लोगों के दिलों में, लेकिन जैसे जैसे आप बड़े होते गये, आपको अहसास हुआ होगा कि वो किस स्तर के गीतकार हैं और इंडस्ट्री में उनकी क्या जगह है। तो कौन सा था वह पड़ाव आपकी ज़िंदगी का जिसमें आपको इस बात का अहसास हुआ था?

यह अहसास एक पल में नहीं हुआ, बल्कि कई सालों में हुआ। इसकी शुरुआत उस समय हुई जब मैं स्कूल में पढ़ता था। मेरे कुछ टीचर मेरी तरफ़ ज़्यादा ध्यान दिया करते। या डॉक्टर के क्लिनिक में, या फिर बाल कटवाने के सलून में, कहीं पर भी मुझे लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ता। बड़ा होने पर मैंने देखा कि पुलिस कमिशनर और इन्कम टैक्स ऑफ़िसर, जिनसे लोग परहेज़ ही किया करते हैं, ये मेरे पिताजी के लगभग चरणों में बैठे हैं, और उनसे अनुरोध कर रहे हैं उनके लिखे किसी नये गीत या किसी पुराने हिट गीत को सुनवाने की।


वाक़ई मज़ेदार बात है!

जब मैं पहली बार विदेश गया और वहाँ पर जब NRI लोगों को यह बताया गया कि मैं बक्शी जी का बेटा हूँ, तो वो लोग जैसे पागल हो गये, और मुझे उस दिन इस बात का अहसास हुआ कि कभी विदेश न जाने के बावजूद मेरे पिताजी ने कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया है। और यह सफ़र है असंख्य लोगों के दिलों तक का। मैं आपको यह बता दूँ कि उनका पासपोर्ट बना ज़रूर था, लेकिन वो कभी भी विदेश नहीं गये क्योंकि उन्हें हवाईजहाज़ में उड़ने का आतंक था, जिसे आप फ़्लाइंग-फ़ोबिआ कह सकते हैं। लेकिन यहाँ पर यह भी कहना ज़रूरी है कि सेना में रहते समय वो पैराट्रूपिंग्‍ किया करते थे अपनी तंख्वा में बोनस पाने के लिए।


इस तरह के और भी अगर संस्मरण है तो बताइए ना!

जब हम अपने रिश्तेदारों के घर दूसरे शहरों में जाते, तो वहाँ हमारे ठहरने का सब से अच्छा इंतज़ाम किया करते, या सब से जो अच्छा कमरा होता था घर में, वह हमें देते। एक वाक़या बताता हूँ, एक बार मैंने कुछ सामान इम्पोर्ट करवाया और उसके लिए एक इम्पोर्ट लाइसेन्स का इस्तमाल किया जिसमें कोई तकनीकी गड़बड़ी (technical flaw) थी। कम ही सही, लेकिन यह एक ग़ैर-कानूनी काम था जो सज़ा के काबिल था। और उस ऑफ़िसर ने मुझसे भारी जुर्माना वसूल करने की धमकी दी। लेकिन जाँच-पड़ताल के वक़्त जब उनको पता चला कि मैं किनका बेटा हूँ, तो वो बोले कि पिताजी के गीतों के वो ज़बरदस्त फ़ैन हैं। उन्होंने फिर मुझे पहली बार बैठने को कहा, मुझे चाय-पानी के लिए पूछा, जुर्माने का रकम भी कम कर दिया, और मुझे सलाह दी कि भविष्य में मैं इन बातों का ख़याल रखूँ और सही कस्टम एजेण्ट्स को ही सम्पर्क करूँ ताकि इस तरह के धोखा धड़ी से बच सकूँ। उन्होंने यह भी कहा कि अगर मैं पुलिस या कस्टम्स में पकड़ा जाऊँगा तो इससे मेरे पिताजी का ही नाम खराब होगा। उस दिन से मैंने अपना इम्पोर्ट बिज़नेस बंद कर दिया। इन सब सालों में और आज भी मैं बहुत से लोगों का विश्वास और प्यार अर्जित करता हूँ, जिनसे मैं कभी नहीं मिला, जो मेरे लिए बिल्कुल अजनबी हैं। यही है बक्शी जी का परिचय, उनकी क्षमता, उनका पावर। और मैंने भी हमेशा इस बात का ख़याल रखा कि मैं कभी कोई ऐसा काम न करूँ जिससे कि उनके नाम को कोई आँच आये, क्योंकि मेरे जीवन में उनका नाम मेरे नाम से बढ़कर है, और मुझे उनके नाम को इसी तरह से बरकरार रखना है।


वाह! क्या बात है! अच्छा, आपने ज़िक्र किया कि स्कूल में आपको स्पेशल अटेंशन मिलता था बक्शी साहब का बेटा होने के नाते।

जी!


तो क्या आपको ख़ुशी होती थी, गर्व होता था, या फिर थोड़ा एम्बरेसिंग्‍ होता था, यानी शर्म आती थी?

मैं आज भी बहुत ही शाई फ़ील करता हूँ जब भी इस तरह का अटेंशन मुझे मिलता है, हालाँकि मुझे उन पर बहुत बहुत गर्व है। अगर मैं ऐसे किसी व्यक्ति से मिलता हूँ जो स्टेटस में मुझसे नीचे है, तो मैं अपना सेलफ़ोन या घड़ी छुपा लेता हूँ या उन्हें नहीं जानने देता कि मैं किस गाड़ी में सफ़र करता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि मैं उनके साथ घुलमिल जाऊँ और उनसे सहजता से पेश आ आऊँ और वो भी मेरे साथ सहजता अनुभव करें।


बहुत ही अच्छी बात है यह, और कहावत भी है कि फलदार पेड़ हमेशा झुके हुए होते हैं। आनंद बक्शी साहब भी इतने बड़े गीतकार होते हुए भी बहुत सादे सरल थे, और शायद यही बात आप में भी है। अच्छा, यह बताइए कि एक पिता के रूप में बक्शी साहब कैसे थे? किस तरह का रिश्ता था आप दोनों में?

वो एक सख़्त पिता थे। सेना में एक सिपाही और रॉयल इण्डियन नेवी के कडेट होने की वजह से उन्होंने हमें भी अनुशासन, पंक्चुअलिटी और अपने पैरों पर खड़े होने की शिक्षा दी। वो मुझे लेकर पैदल स्कूल तक ले जाते थे जब कि घर में गाड़ियाँ और ड्राइवर्स मौजूद थे। कॉलेज में पढ़ते वक़्त भी मैं बस और ट्रेन में सफ़र किया करता था। जब मैं काम करने लगा, तब भी मैं घर की गाड़ी और ड्राइवर को केवल रात की पार्टी में जाने के लिए ही इस्तमाल किया करता। पिताजी कभी भी सिनेमा घरों के मैनेजरों या मालिकों को फ़िल्म की टिकट भिजवाने के लिए नहीं कहते थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि वो पैसे नहीं लेंगे। इसलिए हम भी सिनेमाघरों के बाहर लाइन में खड़े होकर टिकट खरीदते। सिर्फ़ प्रीमियर या ट्रायल शो के लिए हमें टिकट नहीं लेना पड़ता और वो परिवार के सभी लोगों को साथ में लेकर जाते थे।


वाह! बहुत मज़ा आता होगा उन दिनों!

जी हाँ! रात को जब वो घर वापस आते और हमें सोये हुए पाते, तो हमारे सर पर हाथ फिराते। वो चाहते थे कि हम इंजिनीयर या डॉक्टर बने। वो नहीं चाहते थे कि हम फ़िल्म-लाइन में आये।


राकेश जी, आप किस लाइन में गये, उसके बार में भी हम आगे चलकर बातचीत करेंगे, लेकिन इस वक़्त हम और जानना चाहेंगे कि बक्शी साहब किस तरह के पिता थे?

दिन के वक़्त, जब उनके लिखने का समय होता था, तब वो बहुत ही कम शब्दों के पिता बन जाते थे, लेकिन रात को खाना खाने से पहले वो हमें अपने बचपन और जीवन के अनुभवों की कहानियाँ सुनाया करते। उन्हें किताब पढ़ने का शौक था और ख़ुद पढ़ने के बाद अगर उन्हें अच्छा लगता तो हमें भी पढ़ने के लिए देते थे; ख़ास कर मासिक 'रीडर्स डाइजेस्ट'। हम देर रात तक घर से बाहर रहे, यह उन्हें पसंद नहीं था। जब हम स्कूल में थे, तब रात को खाने के वक़्त से पहले हमारा घर के अंदर होना ज़रूरी था। खेलकूद के लिए वो हमें प्रोत्साहित किया करते थे। हम पढ़ाई या करीयर के लिए कौन सा विषय चुनेगे, इस पर उनकी कोई पाबंदी नहीं थी, उनका बस यह विचार था कि हम पढ़ाई को जारी रखें और पोस्ट-ग्रैजुएशन करें। उनको उच्च शिक्षा का मोल पता था और वो कहते थे कि यह उनका दुर्भाग्य है कि वो सातवीं कक्षा के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख सके, देश के बँटवारे की वजह से। उनका इस बात पर हमेशा ध्यान रहता था कि हम अपनी माँ की सब से ज़्यादा इज़्ज़त करें क्योंकि उन्होंने अपनी माँ को बहुत ही कम उम्र में खो दी थी। जिन्हें माँ का प्यार मिलता है, वो बड़े ख़ुशनसीब होते हैं, ऐसा उनका मानना था।


राकेश जी, आपने बताया कि किस तरह से बक्शी साहब ने आप सब को माँ की अहमीयत बतायी। किसी की सफलता के पीछे उसके जीवन-संगिनी का बड़ा हाथ होता है। तो बताइए बक्शी साहब की जीवन-संगिनी, यानी आपकी माताजी के बारे में।

शादी के बाद पिताजी की आमदनी इतनी नहीं थी कि बम्बई में घर किराये पर लेते। इसलिए शादी के बाद भी कुछ सालों तक मेरी माँ उनके माता-पिता के घर में ही रहती थीं, लखनऊ में। वो महिलाओं के कपड़े सीती थीं ताकि अपने पिता, जो एक रिटायर्ड आर्मी मैन थे, को कुछ आर्थिक मदद कर सके। एक दिन जब मैं मेरी माताजी के साथ गुस्से से पेश आया, तब पिताजी ने मुझे बताया कि बचपन में मेरी माँ अण्डे इसलिए नहीं खाती थीं ताकि हम बच्चों को अण्डे खाने के मौके मिले। उन दिनों हमारी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि अच्छा नाश्ता कर पाते। इसलिए मेरी माताजी ने काफ़ी त्याग और समर्पण किये अपने चार बच्चों को बड़ा करने के लिए। और पिताजी ने उस दिन हम बच्चों को आगाह किया और चेतावनी भी दी कि हम कभी भी अपनी माँ के साथ बदतमीज़ी से पेश न आये।


सही बात है! अच्छा राकेश जी, ये तो थी उन दिनों की बातें जब आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। जब बक्शी साहब को दौलत और शोहरत हासिल हुई, उस वक़्त आपकी माताजी के व्यवहार में किसी तरह का परिवर्तन आया?

पिताजी के स्थापित होने के बाद और अमीर बनने के बाद भी माँ अपनी पुरानी साड़ियों और पुराने कपड़ों को पहनना नहीं छोड़ीं, क्योंकि वो जानती थी कि पिताजी जो कमाते थे, उसकी कीमत क्या थी। उसका मूल्य उन्हें मालूम था, और कितनी मेहनत से यह धन आता था, वह भी वो ख़ूब समझती थी। इसलिए कभी अपव्यय नहीं की। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी पिताजी से किसी चीज़ की फ़रमाइश नहीं की। बल्कि पिताजी को ज़बरदस्ती से उन्हें कुछ अपने लिए दिलाना पड़ता था। बस एक बार मेरी माँ ने कुछ खरीदना चाहा था। यह बात थी उस वक़्त की जब पिताजी गुज़र गये थे और उन्हें हमारे रिश्तेदारों की Toyota Innova में बैठना पड़ा था, उस वक़्त उन्होंने कहा था कि हमें भी ऐसी एक गाड़ी खरीदनी चाहिये ताकि वो उसमें बैठकर हमारे पंचगनी के घर में जा सके।


बक्शी साहब जब गीत लेखन के कार्य में बाहर जाते थे, या कभी दूसरे शहर में, या फिर कहीं हिल-स्टेशन में, तो क्या आपकी माताजी भी साथ जाया करतीं?

ज़्यादातर समय पिताजी अपने बेड-रूम में बैठ कर ही गीत लिखते थे, और कभी लिविंग्‍-रूम में बैठ कर। उनके 99% गीत उन्होंने घर में बैठ कर ही लिखे हैं, न कि किसी पर्वत, वादी या नदी या झील के किनारे बैठ के, जैसा कि कुछ फ़िल्मों में दिखाया जाता है। इस वजह से माँ ने अपना सोशल-लाइफ़ भी बहुत सीमित कर लिया था ताकि घर में रह कर पिताजी की ज़रूरतों की तरफ़ ध्यान दे सके, ताकि गीत-लेखन कार्य में उन्हें कोई कठिनाई न हो।


यही बात मैं कह रहा था कि जीवन-संगिनी का उसकी सफलता के पीछे बहुत बड़ा हाथ होता है। अच्छा इसका मतलब यह हुआ कि आपके माताजी की सखी-सहेलियों का दायरा बहुत ही छोटा होगा?

उनकी बस एक सहेली थी और दो तीन रिश्तेदार थे जिनके वो करीब थीं। वो इनके घर महीने दो महीने में एक बार जाती थीं। पिताजी के गुज़र जाने के बाद उन्होंने एक महाशून्य महसूस किया अपनी ज़िंदगी में।


और मेरे ख़याल से यह एक ऐसा शून्य है जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता, अपने बच्चे भी नहीं।

1947 में सरहद के इस पार आते समय बस यही एक तसवीर वो साथ ला पाए थे
बिलकुल सही! और पिताजी फ़िल्म जगत से जुड़े लोगों से ज़रा दूर दूर ही रहा करते थे, इसलिए कम्पोज़र, प्रोड्युसर और डिरेक्टर्स के परिवार वालों से हमारा ज़्यादा मेल-मिलाप नहीं हुआ। और इसलिए माँ भी फ़िल्मी पार्टियों में और अवार्ड फ़ंक्शन में नहीं जाती थीं। पिताजी की मृत्यु के बाद जब प्रेस वाले अपने न्युज़ कैमेरों से हमारे घर के अंदर शूट करना चाह रहे थे और पिताजी की पार्थिव शरीर को हमारे लिविंग्‍-रूम में रखा गया था, हमने उनसे पूछा कि क्या हमें प्रेस को अंदर कैमरों से शूट करने की अनुमति देनी चाहिये, तब उन्होंने कहा कि पिताजी अपनी पूरी ज़िंदगी प्रेस और पब्लिसिटी से दूर ही रहे ताकि उनका ध्यान लेखन से न हट जाये, और अब जब वो घर आना चाह रहे हैं, यह तुम्हारे पिताजी की उपलब्धि है, और यह उनका हक़ भी है, इसलिए उन्हें आने दो।


राकेश जी, आपकी स्मृतियों में आनन्द बक्शी साहब राज करते होंगे। उनमें से कुछ के बारे में बताइए न!

एक नहीं हज़ार हैं स्मृतियाँ, कौन कौन सा बताऊँ। हाँ, एक जो मैं बताना चाहूँगा, वह यह कि जब वो कभी रात को देर से घर लौटते थे और हमें सोया पाते थे, तो वो हमारे बगल में बैठ जाते और हमारे सर पे अपना हाथ फेरते। कभी कभी मैं जगा ही रहता था जब वो हाथ फेरते, लेकिन मैं सोने का नाटक करता था ताकि उनके हाथ फेरने का आनन्द लेता रहूँ।


वाह! वाक़ई अपने माता-पिता के छुवन से मुलायम दुनिया की और कोई चीज़ नहीं हो सकती। अच्छा राकेश जी, आप सब मिल कर, पूरा परिवार, कभी छुट्टी मनाने जाते थे? जैसे मान लीजिये कि किसी पर्वतीय स्थल पर गये हों, और वहाँ पर बक्शी जी को यकायक किसी गीत की प्रेरणा मिल गयी हो? इस तरह का वाकया कभी हुआ है?

हम हर साल महाबलेश्वर और पंचगनी जाते थे। हम अपनी गाड़ी लेकर जाते थे। उन सर्पीले रास्तों पर चढ़ाई करते हुए उनका जो फ़ेवरीट गाना था, वह था "Walk Don't Run, 64", यह 'The Ventures' का गाना है। वो अक्सर अपने फ़ेवरीट सिगरेट 555 के पैकिट के उपर झट से कोई भाव लिख लिया करते थे। ऐसा इसलिए कि भले ही वो अपना नोट-बूक भूल जायें साथ लेना, लेकिन 555 का पैकिट कभी नहीं भूलते थे। लगभग ५ से १० गीत ऐसे होंगे जो उन्होंने हिल-स्टेशन में लिखे होंगे। जैसा कि मैंने बताया था कि वो अधिकतर गीत बेडरूम और लिविंग्‍-रूम में बैठ कर ही लिखे हैं, और कभी कभी म्युज़िक डिरेक्टर्स के सिटिंग्‍ रूम में। और यह बात भी है कि छुट्टी में जाकर वो कभी नहीं लिखते थे। वो लिखते वक़्त कभी शराब नहीं पीते थे क्योंकि वो इसे माँ सरस्वती का अपमान मानते थे।


वो घर पर शराब पीते थे?

अगर कभी पीते भी थे तो रात के ९ बजे के बाद पीते थे, लेकिन डिनर के बाद कभी नहीं। यहाँ पर ऐसी मान्यता है कि शायर को लिखने के लिए पीना ज़रूरी होता है। लेकिन देखिये, पिताजी ने लिखते वक़्त शराब का कभी सहारा नहीं लिया। वो सिगरेट ज़रूर पीते थे या पान चबाते थे लिखते वक़्त। लिखते वक़्त वो व्हिसल भी बजाते थे। और मेरा ख़याल है कि कभी कभी वो ख़ुद धुन भी बनाने की कोशिश करते होंगे या व्हिसलिंग्‍ के माध्यम से मीटर पर लिखने की कोशिश करते होंगे। म्युज़िक डिरेक्टर्स भी कई बार उन्हें धुन बता देते थे, इसलिए भी वो उस धुन को व्हिसल कर उसपे बोल बिठाते। लेकिन बहुत बार उन्हें संगीतकार ने धुन नहीं भी दी। तब वो ख़ुद ही अपने बोलों को ख़ुद धुन पर बिठाते होंगे व्हिसलिंग्‍ के ज़रिये।


ऐसा कोई गीत आपको पता है जिसकी धुन बक्शी साहब ने ख़ुद बनायी या सुझायी होगी?

कुछ संगीतकारों ने ख़ुद मुझे यह बात बतायी है कि किस तरह से पिताजी उनका काम आसान बना देते थे। लेकिन मैं न उन संगीतकारों के नाम लूँगा और न ही उन गीतों के बारे में कुछ कहना चाहूँगा जिनकी धुने पिताजी ने बनाये थे। यह हक़ केवल पिताजी को था और उन्होंने कभी यह बात किसी को नहीं बतायी। इसलिए बेहतर यही होगा कि यह राज़ दुनिया के लिए राज़ ही बना रहे।


हम भी सम्मान करते हैं आपके इस फ़ैसले का। और बहुत सही किया है आपने। 

पिताजी उन्हें गीतों के साथ साथ धुने भी दे दिया करते, लेकिन कभी भी निर्माता से धुनों के लिए क्रेडिट या पब्लिसिटी की माँग नहीं की। और यही कारण है कि वो लोग उन्हें दूसरे गीतकारों की तुलना में इतना ज़्यादा सम्मान क्यों करते थे! मुझे उन संगीतकारों से ही पता चला कि पिताजी कभी कभी एक ही गीत के लिए १० से २० अंतरे लिख डालते थे, जब कि उनसे माँग दो या तीन की ही होती थी। यह उनकी प्रतिभा की मिसाल है। निर्माता और निर्देशक द्वंद में पड़ जाते थे कि उन १०-२० अंतरों में से किन तीन अंतरों को चुनना है क्योंकि सभी के सभी अंतरे एक से बढ़कर एक होते थे और उनमें से श्रेष्ठ तीन चुनना आसान काम नहीं होता था। यहाँ तक कि कई बार तो रेकॉर्डिंग्‍ के दिन तक यह फ़ैसला नहीं हो पाता था कि कौन कौन से अंतरे फ़ाइनल हुए हैं। उन्हें ऐसा लगता कि जिन अंतरों को वो नहीं ले रहे हैं, उनके साथ अन्याय हो रहा है। आज भी जब वो पुराने लोग मुझे मिलते हैं तो इस बात का ज़िक्र करते हैं।


अच्छा क्या ऐसा कभी हुआ कि आप ने जाने अंजाने उन्हें कोई गीत लिखने का सुझाव दिया हो या आपने कोई मुखड़ा या अंतरा सुझाया हो? या उन्होंने कभी आप बच्चों से पूछा हो कि भई बताओ, इस गीत को किस तरह से लिखूँ?

नहीं, कभी भी नहीं! लेकिन मुझे मालूम है कि एक गीत है १९८७ की फ़िल्म 'हिफ़ाज़त' का, "बटाटा वडा, बटाटा वडा, प्यार नहीं करना था, करना पड़ा"।


हा हा हा

यह गीत उन्होंने इसलिए लिखा था क्योंकि उनकी पोती को बटाटा वडा बहुत ज़्यादा पसंद थी।


क्या आप कभी रपने पिताजी के साथ रेकॉर्डिंग्‍ पर जाते थे?

जी हाँ, मैं रेकॉर्डिंग्‍ पर जाता था। और बहुत ही अच्छा अनुभव होता था और मुझे बहुत गर्व होता था। लेकिन साथ ही साथ अंतर्मुखी होने की वजह से मैं म्युज़िशियन्स, कम्पोज़र्स और सिंगर्स से शर्माता था और वो लोग मुझे प्यार करते थे। कुछ लोग तो बिना यह जाने कि मैं किनका बेटा हूँ, मुझे प्यार करते।


राकेश जी, आनंद बक्शी वो गीतकार हैं जिन्होंने फ़िल्मों में सब से ज़्यादा गीत लिखे हैं। इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि वो बहुत ज़्यादा व्यस्त भी रहते होंगे। तो किस तरह से वो 'वर्क-लाइफ़ बैलेन्स' को मेण्टेन करते थे? परिवार के लिए समय निकाल पाना क्या मुश्किल नहीं होता था?

वो सुबह ७ बजे से सुबह ११ बजे तक, और फिर शाम ४ बजे से रात ९ बजे तक लिखते थे। रात ९ बजे के बाद उनका समय हमारे लिए होता था। रात १०:३० बजे वो खाना खाते थे, और ९ से १०:३० तक का समय वो हमें देते थे। वो हमें ढेर सारी कहानियाँ सुनाते थे अपनी ज़िंदगी के तमाम तजुर्बों की, और तमाम उर्दू के उपन्यासों की, अंग्रेज़ी उपन्यासों की। वो रोज़ाना Readers' Digest पढ़ते थे। वो कहा करते थे कि हर किसी को हर रोज़ कोई न कोई नई चीज़ पढ़नी चाहिये। जिसने यह काम किसी रोज़ नहीं किया, तो उसने जीना छोड़ दिया। वो हर रोज़ एक नई कहानी पढ़ते थे। और शायद यही वजह है कि उन्हें फ़िल्मी कहानियों और दृश्यों की इतनी अच्छी समझ थी। बहुत से निर्माता और निर्देशक अपनी फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले पिताजी को अपनी फ़िल्म दिखाते थे ताकि वो अपने विचार और सुझाव उनके सामने रख सकें।


आपने बताया कि बक्शी साहब को पढ़ने का बेहद शौक था और रोज़ नई कहानी पढ़ते थे। किन किन लेखकों की किताबें उन्हें ज़्यादा पसंद थी?

सिडनी शेल्डन और डैनियल स्टील। वो कुछ उर्दू मासिक पत्रिकाएँ भी पढ़ते थे, ख़ास कर दिल्ली के शमा ग्रूप के। Readers' Digest उनकी पहली पसंद थी। He believed any person who has not read anything new in 24 hours, has nothing to contribute to society, to life.


अब मैं एक सवाल मैं आपसे पूछना चाहूँगा अगर आप उसे अन्यथा न लें तो।

पूछिये।


क्या आपको लगता है कि बक्शी साहब के इतने ज़्यादा गीत लिखने की वजह से उनके लेखन के स्तर में उसका असर पड़ा है? क्या आपको लगता है कि अगर वो क्वाण्टिटी के बदले क्वालिटी पर ज़्यादा ध्यान देते तो और उम्दा काम हुआ होता?

हाँ, कभी कभी मैं इस बात को मानता हूँ। मैं उन्हें पूछता भी था कि वो कुछ निर्देशकों के लिए हमेशा अच्छे गीत लिखते और कुछ निर्देशकों के लिए हमेशा बुरे गीत लिखते, ऐसा क्यों? और उनका जवाब होता कि कुछ निर्देशक उनके पास अच्छी कहानी और सिचुएशन लेकर आते थे, अच्छे किरदार लेकर आते थे, और उससे उनको प्रेरणा मिलती थी अच्छा गीत लिखने की। यानी वो यह कहना चाहते थे कि वो सिर्फ़ आइने का काम करते थे, जो जैसी चीज़ लेकर उनके पास आते थे, वो वैसी ही चीज़ उन्हें वापस करते।


अच्छा राकेश जी, आपने बताया कि आपका इम्पोर्ट का बिज़नेस था। क्या आपके परिवार के किसी और सदस्य ने बक्शी साहब के नक्श-ए-क़दम पर चलने का प्रयास किया है?

मैं ख़ुद एक राइटर-डिरेक्टर हूँ, और कोशिश कर रहा हूँ मेरी पहली हिंदी फ़ीचर फ़िल्म बनाने की। और कोई इस लाइन में नहीं है। मेरा भाई फ़ाइनन्शियल मार्केट में है, मेरी दो बहनों की शादी हो चुकी है वो अपना अपना घर सम्भालती है।


यह तो बहुत अच्छी बात है कि आप फ़िल्म-निर्माण में क़दम रख रहे हैं। लेकिन इस राह में आपने कुछ अनुभव भी हासिल किये हैं? 

जी हाँ, इस लाइन में मैने अपना करीयर १९९९ में शुरु किया था। इस वर्ष मैंने दो स्क्रिप्ट्स लिखे - सिनेविस्टा कम्युनिकेशन्स के लिए टीवी धारावाहिक 'सबूत', और धारावाहिक 'हिंदुस्तानी' में मैंने बतौर प्रथम सहायक निर्देशक काम किया। इसी साल फ़रवरी और अगस्त के दरमीयाँ मैं 'मुक्ता आर्ट्स' में बतौर सहायक निर्देशक काम किया, उनकी फ़िल्म 'ताल' में।


'मुक्ता आर्ट्स' यानी कि सुभाष घई की बैनर?

जी हाँ। 'ताल' में मैं 'शॉट कण्टिन्युइटी' के लिए ज़िम्मेदार था, और एडिटिंग्‍ के वक़्त डिरेक्टर के साथ तथा 'प्रीमिक्स' व 'फ़ाइनल मिक्स' में ऐसोसिएट डिरेक्टर के साथ था। फिर 'मुक्ता आर्ट्स' की ही अगली फ़िल्म 'यादें' में कास्टिंग्‍ और शेड्युलिंग्‍ से जुड़ा था, और तमाम तकनीकी पक्ष संभाला था।


यह तो थी फ़िल्म-निर्माण के तकनीकी पक्षों में आपका अनुभव। आपने यह भी बताया कि आप लिखते भी हैं। तो इस ओर आपने अब तक क्या काम किया है?

साल २००३ में मैंने निर्माता वाशु भगनानी के लिए अंग्रेज़ी में एक ऑरिजिनल फ़िल्म-स्क्रिप्ट लिखी, जिसका शीर्षक था 'दि इमिग्रैण्ट'। इसी के हिंदी ऐडप्टेशन पर बनी हिंदी फ़िल्म 'आउट ऑफ़ कण्ट्रोल'। मेरी खुद की लिखी और मेरे ही द्वारा बनाई और निर्देशित जो लघु फ़िल्में हैं, उनके नाम हैं - 'कीमत - दि वैल्यु', 'एनफ़ - वी आर नेवर टू पूओर टू शेयर', 'आइ विल बी देयर फ़ॉर यू - कीपिंग्‍ लव अलाइव' और 'सीकिंग्‍ - इन सर्च ऑफ़ ब्यूटी'। २००३ में ही मैं एक हिंदी लघु फ़िल्म में निर्देशक अभय रवि चोपड़ा के साथ मिलकर उसकी स्क्रिप्ट लिखी, जिसका शीर्षक था 'इण्डिया, १९६४'। अभय की यह फ़िल्म 'दि न्यु यॉर्क स्कूल ऑफ़ विज़ुअल आर्ट्स' में उनके ग्रैजुएशन यीअर की फ़िल्म थी। इस फ़िल्म को 'स्टुडेण्ट्स ऑस्कर' के लिए नामांकन मिला था। फ़िल्म में अभिनय है रणबीर ऋषी कपूर और शरद सक्सेना का।


वाह! अच्छा सुभाष घई के साथ और किन किन फ़िल्मों में आपने काम किया था?

स्क्रिप्ट-रीडिंग्‍ और स्क्रिप्ट-एडिटिंग्‍ में मैंने उन्हें ऐसिस्ट किया 'एक और एक ग्यारह', 'जॉगर्स पार्क', 'ऐतराज़', 'इक़बाल' और '३६ चायना टाउन' में। 'किस्ना' में मैं स्क्रिप्ट-ऐसिस्टैण्ट था जिसमें मैंने सचिन भौमिक, फ़ारुख़ धोंडी और सुभाष घई के साथ स्क्रिप्ट-कूओर्डिनेशन का काम किया।


बहुत ख़ूब! आपने ज़िक्र किया था कि आप अपनी पहली हिंदी फ़ीचर फ़िल्म की राह पर बढ़ रहे हैं। इसके बारे में कुछ बताइये।

फ़िल्म का नाम है 'फ़ितरत', जिसका मैं राइटर-डिरेक्टर हूँ। कास्ट की तलाश कर रहा हूँ। इसके अलावा एक ऐडवेंचर थ्रिलर 'एवरेस्ट' भी प्लान कर रहा हूँ। मैंने एक ऐनिमेशन फ़िल्म 'लिबर्टी टेकेन' को लिखा व निर्देशित भी किया है।


बहुत सही है! और हमारी आपके लिए यह शुभकामना है कि आप एक बहुत बड़े फ़िल्म-मेकर बने और अपने पिता से भी ज़्यादा आपका नाम हो, और आप उनके नाम के मशाल को और आगे लेकर जा सकें।

बहुत शुक्रिया!


राकेश जी, बक्शी साहब एक आला दर्जे के गीतकार तो थे ही, पर हमने सुना है कि वो गाते भी अच्छा थे?

बक्शी जी को गायन से प्यार था और अपने आर्मी और नेवी के दिनों में अपने साथियों को गाने सुना कर उनका मनोरंजन करते थे। और आर्मी में रहते हुए ही उनके साथियों ने उनको गायन के लिए प्रोत्साहित किया। उन साथियों ने उन्हें बताया कि वो अच्छा गाते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं, इसलिए उन्हें फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़मानी चाहिये। मेरा ख़याल है कि वहीं पे उनके सपनों का बीजारोपण हो गया था। आर्मी के थिएटर व नाटकों में वो अभिनय भी करते थे और गीत भी गाते थे। फ़िल्मी पार्टियों में नियमीत रूप से वो अपनी लिखी हुई कविताओं और गीतों को गा कर सुनाते थे।


वाह! अच्छा, ये तो आपने बताया कि किस तरह से वो सेना में रहते समय साथियों के लिए गाते थे। लेकिन फ़िल्मों में उन्हें बतौर गायक कैसे मौका मिला?

दरसल क्या हुआ कि पिताजी अक्सर अपने गीतों को प्रोड्युसर-डिरेक्टर्स को गा कर सुनाया करते थे। ऐसे में एक दिन मोहन कुमार साहब ने उन्हें गाते हुए सुन लिया और उन्हें ज़बरदस्ती अपनी फ़िल्म 'मोम की गुड़िया' में दो गीत गाने के लिए राज़ी करवा लिया। इनमें से एक सोलो था और एक लता जी के साथ डुएट, जिसे आपने पिछली कड़ी में सुनवाया था।


जी हाँ, और क्या ग़ज़ब का गीत था वह। उनकी आवाज़ भले ही हिंदी फ़िल्मी नायक की आवाज़ न हो, लेकिन कुछ ऐसी बात है उनकी आवाज़ में कि सुनते हुए दिल को अपने मोहपाश में बांध लेती है।

पता है "बाग़ों में बहार आयी" गीत की रेकॉर्डिंग्‍ पर वो बहुत सज-संवरकर गये थे। जब उनसे यह पूछा गया कि इतने बन-ठन के क्यों आये हैं, तो उन्होंने कहा कि पहली बार लता जी के साथ गाने का मौका मिला है, इसलिए यह उनके लिए बहुत ख़ास मौका है ज़िंदगी का।


बहुत सही है!

लेकिन वो लोगों के सामने गाने से कतराते थे। पार्टियों में वो तब तक नहीं गाते जब तक उनके दोस्त उन्हें गाने पर मजबूर न कर देते। पर एक बार गाना शुरु कर दिया तो लम्बे समय तक गाते रहते।


राकेश जी, बक्शी साहब ने हज़ारों गीत लिखे हैं, इसलिए अगर मैं आपसे आपका पसंदीदा गीत पूछूँ तो शायद बेवकूफ़ी वाली बात होगी। बताइये कि कौन कौन से गीत आपको बहुत ज़्यादा पसंद है आपके पिताजी के लिखे हुए?

"मैं शायर तो नहीं" (बॉबी), "गाड़ी बुला रही है" (दोस्त), "एक बंजारा गाये" (जीने की राह), "अच्छा तो हम चलते हैं" (आन मिलो सजना), "आदमी जो कहता है" (मजबूर), "ज़िंदगी हर क़दम एक नई जंग है" (मेरी जंग), "ये रेश्मी ज़ुल्फ़ें" (दो रास्ते), "हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें" (अमर अकबर ऐन्थनी), "भोली सी सूरत आँखों में मस्ती" (दिल तो पागल है), और इसके अलवा और ३०० गीत होंगे जहाँ तक मेरा अनुमान है।


इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं!

उनके गीतों में गहरा दर्शन छुपा होता था। उनके बहुत से चाहनेवालों और निर्माता-निर्देशकों ने मुझे बताया और अहसास दिलाया कि सरल से सरल शब्दों के द्वारा भी वो गहरी से गहरी बात कह जाते थे। उनके लिखे तमाम गीत ले लीजिये, जैसे कि "चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये", "यहाँ मैं अजनबी हूँ", "रोते रोते हँसना सीखो, हँसते हँसते रोना", "ज़िंदगी हर कदम एक नई जंग है", "तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो", "गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है", "कैसे जीते हैं भला हम से सीखो ये अदा", "दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है", "ज़िंदगी क्या है एक लतीफ़ा है", "आदमी मुसाफ़िर है" (जिसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला था), "दुनिया में रहना है तो काम कर प्यारे", "शीशा हो या दिल हो टूट जाता है", "ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम, वो फिर नहीं आते", "माझी चल, ओ माझी चल", "हाथों की चंद लकीरों का, ये खेल है सब तकदीरों का", "चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन सा देस, जहाँ तुम चले गये", "इक रुत आये इक रुत जाये, मौसम बदले, ना बदले नसीब", "जगत मुसाफ़िरखाना है", "आदमी जो कहता है", "दुनिया में ऐसा कहाँ सबका नसीब है", और भी न जाने कितने कितने उनके दार्शनिक गीत हैं जो कुछ न कुछ संदेश दे जाते हैं ज़िंदगी के लिए।


बिलकुल बिलकुल! अच्छा राकेश जी, आपने बहुत सारे गीतों का ज़िक्र किया। अब हम आपसे कुछ चुने हुए गीतों के बारे में जानना चाहेंगे जिनके साथ कुछ न कुछ ख़ास बात जुड़ी हुई है। इस तरह के कुछ गीतों के बारे में बताना चाहेंगे?


उनका लिखा गीत है 'बॉबी' का "मैं शायर तो नहीं"। वो मुझे कहते थे और बहुत से लेखों में भी मैंने उन्हें कहते पढ़ा है कि वो अपने आप को एक शायर नहीं, बल्कि एक गीतकार मानते थे, साहिर साहब को वो शायर मानते थे। 'अमर प्रेम' के गीत "कुछ तो लोग कहेंगे" को ही ले लीजिये; जावेद साहब इस कश्मकश में थे कि क्या उन्हें अपनी शादी को तोड़ कर एक नया रिश्ता कायम कर लेनी चाहिये, और इस गीत ने उन्हें परिणाम की परवाह किये बिना सही निर्णय लेने में मददगार साबित हुई। जावेद साहब से ही जुड़ा एक और क़िस्सा है, "ज़िंदगी के सफ़र में" गीत को सुनने के बाद जावेद साहब ने पिताजी से वह कलम माँगी जिससे उन्होंने इस गीत को लिखा था। पिताजी ने अगले दिन उन्हें दूसरा कलम भेंट किया। जावेद साहब ने ऐसा कहा था कि अगर यह दुनिया उन्हें एक सूनसान द्वीप में अकेला छोड़ दे, तो केवल इस गीत के सहारे वो अपनी ज़िंदगी के बाक़ी दिन काट सकते हैं।


वाक़ई एक लाजवाब गीत है, और मैं समझता हूँ कि यह गीत एक यूनिवर्सल गीत है, और हर इंसान को अपने जीवन की छाया इस गीत में नज़र आती होगी। "कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं, वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं, बाद में चाहे लेके पुकारा करो उनका नाम, वो फिर नहीं आते", कमाल है!!! राकेश जी, बहुत अच्छा लग रहा है जो आप एक एक गीत के बारे में बता रहे हैं, और भी कुछ इसी तरह के क़िस्सों के बारे में बताइये न!

"नफ़रत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में", इस गीत में एक अंतरा है "जब जानवर कोई इंसान को मारे.... एक जानवर की जान आज इंसानो ने ली है, चुप क्यों है संसार", पिताजी कभी भी मुझे किसी पंछी को पिंजरे में क़ैद करने नहीं दिया, कभी मछली को अक्वेरियम में सीमाबद्ध नहीं करने दिया। वो कहते थे कि क्योंकि वो ब्रिटिश शासन में रहे हैं और उन्हें इस बात का अहसास है कि ग़ुलामी क्या होती है, इसलिए वो कभी नहीं चाहते कि किसी भी जीव को हम अपना ग़ुलाम बनायें।


वाह! राकेश जी, चलते चलते अब हम आपसे जानना चाहेंगे बक्शी साहब के लिखे उन गीतों के बारे में जो उन्हें बेहद पसंद थे।

यहाँ भी एक लम्बी लिस्ट है, कुछ के नाम गिना देता हूँ - "मैंने पूछा चांद से" (अब्दुल्ला), "परदेसियों से न अखियाँ मिलाना" (जब जब फूल खिले), "चिंगारी कोई भड़के" (अमर प्रेम), "मेरे दोस्त क़िस्सा ये क्या हो गया" (दोस्ताना), "डोली ओ डोली", "खिलौना जान कर तुम तो", "जब हम जवाँ होंगे", "बाग़ों में बहार आयी", "मैं ढूंढ़ रहा था सपनों में", "सुन बंटो बात मेरी", "जिंद ले गया वो दिल का जानी", "वो तेरे प्यार का ग़म", "सावन का महीना पवन करे सोर", "राम करे ऐसा हो जाये", "जिस गली में तेरा घर न हो बालमा", "ज़िंदगी के सफ़र में", "मेरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं", "प्रेम से क्या एक आँसू", "दीवाने तेरे नाम के खड़े हैं दिल थाम के", "क्या कोई सूरत इतनी ख़ूबसूरत हो सकती है", "तेरे नाम के सिवा कुछ याद नहीं", "दुनिया में कितना ग़म है", "आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं", "चिट्ठी आयी है", "पनघट पे परदेसी आया", "मैं आत्मा तू परमात्मा", "घर आजा परदेसी तेरा देस बुलाये रे", "जब जब बहार आयी", "कुछ कहता यह सावन", "वो क्या है, एक मंदिर है", "हर एक मुस्कुराहट मुस्कान नहीं होती", "यहाँ मैं अजनबी हूँ", "मैं तेरी मोहब्बत को रुसवा करूँ तो", आदि।


राकेश जी, क्या बताऊँ, किन शब्दों से आपका शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा। इतने विस्तार से आपने बक्शी जी के बारे में हमें बताया कि उनकी ज़िंदगी के कई अनछुये पहलुओं से हमें अवगत कराया। चलते चलते कुछ कहना चाहेंगे?

"मैं बर्फ़ नहीं हूँ जो पिघल जाऊँगा", यह कविता उन्होंने अपने लिए लिखी थी। बहुत अरसे बाद इसे फ़िल्मी गीत का रूप दिया सुभाष घई साहब ने। यह कविता उन्हें निरंतर अच्छे अच्छे गीत लिखने के लिए प्रेरीत करती रही। It is the essence of his life, his attitude to his profession, his soul.


वाह! अच्छा तो राकेश जी, बहुत अच्छा लगा आपसे लम्बी बातचीत कर, आपको एक उज्वल भविष्य के लिए हमारी तरफ़ से ढेरों शुभकामनाएँ, आप फ़िल्मनिर्माण के जिस राह पर चल पड़े हैं, ईश्वर आपको कामयाबी दे, और आनन्द बक्शी साहब के नाम को आप चार-चांद लगायें यही हमारी कामना है आपके लिए, बहुत बहुत शुक्रिया।

बहुत बहुत शुक्रिया आपका।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 


Saturday, December 27, 2014

बातों बातों में - INTERVIEW OF ACTOR, MODEL & FORMER CRICKETER SAJIL KHANDELWAL

 बातों बातों में - 03

फिल्म अभिनेता व पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

" मेहनत ज़रूर रंग लाती है..." 






नमस्कार दोस्तों। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते। काश, परदे से इतर इनके जीवन के बारे में कुछ मालूमात हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने बीड़ा उठाया है फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का। फ़िल्मी अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार के दिन। आज दिसम्बर, 2014 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है अभिनेता, मॉडल और पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। सजिल खण्डेलवाल अपने क्रिकेट करीयर में रणजी ट्रॉफ़ी खेल चुके हैं, और अब फ़िल्म जगत में उनका पदार्पण होने वाला है फ़िल्म 'Confessions of a Rapist' से जिसमें वो नायक की भूमिका में नज़र आयेंगे। तो आइए स्वागत करते हैं सजिल खण्डेलवाल का। 




सजिल, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है, और आपका बहुत-बहुत धन्यवाद हमारे इस निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए।

धन्यवाद!

आपकी पहली फ़िल्म और वह भी नायक की भूमिका में जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही है - Confessions of a Rapist' । इस फ़िल्म के लिए आप हमारी अग्रिम शुभकामनाएँ स्वीकार करें।

बहुत बहुत धन्यवाद!

हम आपकी इस फ़िल्म की विस्तृत चर्चा इस साक्षात्कार में आगे चलकर करेंगे, लेकिन शुरूआत हम शुरू से करना चाहते हैं। तो बताइए अपने जन्म और बचपन के बारे में। कैसे थे बचपन के वो दिन?

मेरी पैदाइश लखनऊ, उत्तर प्रदेश की है। एक बड़े ही इज़्ज़तदार घराने में मेरा जन्म हुआ। शुरू से ही मेरा स्वभाव सरल सहज रहा; मैं चालाक नहीं था पर हर चीज़ का ज्ञान था। कभी कभार शरारतें भी करता था जब दूसरे दोस्त शरारत करते। बचपन के वो दिन भी क्या दिन थे। सबसे पहली बात तो यह कि मैं कभी भी स्कूल ठीक समय पर नहीं पहुँच पाता था, हमेशा लेट। और इसलिए पनिशमेण्ट भी ख़ूब मिलता था मुझे। ट्यूशन में भी वही हाल था। कई बार ऐसा हुआ कि मेरे मम्मी-डैडी को मेरी शिकायत आ जाया करती, और फिर डैडी से मुझे डाँट पड़ती। जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई, मैं और ज़्यादा शरारती और होशियार होता चला गया। मेरे टीचर्स हमेशा मेरे मम्मी-डैडी को कहते कि आपका बेटा होशियार और तेज़ है, पर शरारती बहुत है। और यह भी कहते कि अगर सही दिशा मिले तो आपका बेटा कमाल कर सकता है।

अच्छा अपने बचपन के दोस्तों के बारे में भी बताइए?

मेरे बहुत ही कम दोस्त हुआ करते थे, दो या तीन। हम एक साथ पढ़ाई करते, एक साथ खेलते-कूदते, एक साथ क्लास बंक करते, आपस में अपने-अपने मसले भी सुलझाते। मतलब हमने साथ में हर एक पल का भरपूर आनन्द लिया।

आपने बताया कि आप शरारती बहुत थे; तो क्या अपनी शरारत भरी कोई घटना याद है?

जी हाँ, शायद 15 साल पहले की बात होगी। मैंने सीढ़ियों में तेल डाल दिया था ताकि मेरा क्लास टीचर जैसे ही सीढ़ियों से उतरने लगे तो वो गिर पड़े, क्योंकि मुझे वो बिल्कुल भी पसन्द नहीं थीं। पर अफ़सोस (हँसते हुए) कि वो नहीं गिरीं।

अच्छा सजिल, ये तो थी आपके बिल्कुल बचपन के दिनों का हाल, यह बताइए कि आपने क्रिकेट खेलना, मेरा मतलब है, गम्भीरता से क्रिकेट खेलना कब शुरू किया?

गम्भीरता से क्रिकेट खेलना मैंने 8 वर्ष की आयु से शुरू किया था। मेरे डैडी हमेशा यह चाहते थे कि मैं एक क्रिकेटर बनूँ और उसमें बहुत दूर तक जाऊँ। मैं स्कूल में क्रिकेट खेलता था, घर के आस-पड़ोस में दोस्तों के साथ खेलता था, और मैं काफ़ी अच्छा खेल लेता था शुरू से ही। मुझे आउट करना मुश्किल होता था। क्रिकेट को लेकर मेरे अन्दर एक दॄढ़ संकल्प था शुरू से ही। धीरे धीरे मेरे दोस्तों और आस-पड़ोस के लोगों को यह आभास हो गया कि मैं वाक़ई अच्छा खेलता हूँ और उन सब ने मुझसे कहा कि मुझे क्रिकेट को गम्भीरता से लेनी चाहिए। सबने यह भी सुझाव दिया कि मुझे किसी क्रिकेट अकादमी में एक अच्छे कोच से इसकी तालीम लेनी चाहिए। जब मैंने यह बात अपने मम्मी-डैडी को बताई तो मेरे डैडी मुझे के. डी. सिंह बाबू  स्टेडियम ले गए जहाँ मुझे श्री संजीव पन्त और श्री शशिकान्त सिंह जैसे गुरु मिले। और वहीं से शुरू हुआ क्रिकेट का औपचारिक सफ़र।

वाह! उस वक़्त आपके फ़ेवरीट प्लेअर कौन होते थे?

ऑस्ट्रेलिआ के मार्क वा।

सजिल, क्रिकेटर बनने का आपका औपचारिक सफ़र शुरू हो गया। लेकिन एक सफल क्रिकेटर बनने और रणजी ट्रॉफ़ी में जगह बनाने के लिए किस तरह का संघर्ष आपको करना पड़ा, यह हम जानना चाहेंगे।

क्रिकेटर बनने की राह पर चलना आसान नहीं रहा। कड़ी मेहनत करनी पड़ी। सुबह बहुत जल्दी उठ कर दौड़ना पड़ता था अपने आप को फ़िज़िकली फ़िट रखने के लिए। उस वक़्त मैं स्कूल में था। तो वापस लौट कर स्कूल के लिए तैयार होकर जाना पड़ता था। स्कूल के बाद प्रैक्टिस सेशन में जाता; वहाँ से लौट कर पढ़ाई, और फिर आठ घंटे की नींद। यह मेरी दिनचर्या हुआ करती थी। जैसा कि कहा जाता है कि मेहनत रंग ज़रूर लाती है, मेरे साथ भी यही हुआ। मैं कानपुर गया जहाँ उत्तर प्रदेश क्रिकेट ऐसोसिएशन का मुख्य कार्यालय स्थित है। हर साल वहाँ ट्रायल होता है, यानी कि नए खिलाड़ियों की खोज। मुझे भी वहाँ 'Under 12 Trial' में जाने का मौका मिला। मैं बहुत घबराया हुआ था क्योंकि मेरी उम्र उस वक़्त सिर्फ़ दस साल थी। मैं ख़ुशनसीब था जो मुझे एक बहुत ही अच्छा कोच मिला जिन्होंने मुझे हर वक़्त उत्साह दिया और मेरी मदद की। मुझे याद है कि उस वक़्त कानपुर में मैं रो रहा था क्योंकि सीटें बहुत कम थीं और 500 से 1000 खिलाड़ी आए हुए थे। पर मैंने अपने आप को सम्भाला, आत्मविश्वास को वापस लाया और खेल के मैदान में उतर गया। करीब 1000 खिलाड़ियों में 40 का सीलेक्शन हुआ, और मैं उनमें से एक था। उस कैम्प का नाम था  'Uttar Pradesh Under 12 Top 40'। कैम्प चार दिनों का था। फिर मैं 12 खिलाड़ियों के टीम में चुन लिया गया। उन शुरुआती मैचों में मैंने 51 और 70 रन बनाए, यानी कि मेरा प्रदर्शन सराहनीय रहा। फिर मेरा सफ़र शुरू हुआ Under 14, 16, 19, 22 से होते हुए रणजी तक का। मैंने कुछ चार या पाँच मैच खेले, मेरा प्रदर्शन ठीक-ठाक था, बहुत अच्छा भी नहीं और बहुत ख़राब भी नहीं। मैं अपनी बल्लेबाज़ी की शुरुआत ऑफ़-ब्रेक से किया करता था। रणजी ट्रॉफ़ी की टीम में शामिल होने के लिए किसी भी खिलाड़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से फ़िट होना पड़ता है, और मैं हमेशा इस तरफ़ ध्यान देता था। और मैंने अपने स्टेट लेवेल 'Under 16' और 'Under 19' के मैचों में क्रम से 56, 78, 43 और 65 स्कोर किया था। मेरे अन्दर हमेशा अच्छी नेट्रुत्व-क्षमता थी, तो ये सब तमाम चीज़ें काम आयी रणजी टीम में शामिल होने में।

बहुत ख़ूब! आपकी बातों से ऐसा लग रहा है कि आप एक अच्छा क्रिकेटर बनने की क्षमता रखते थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि आपने क्रिकेट को अलविदा कह दिया और मॉडेलिंग की दुनिया में आ गए?

मैं कभी अपना प्रोफ़ेशन बदलना नहीं चाहता था, मैं एक क्रिकेटर ही रहना चाहता था, पर वह कहते हैं ना कि नसीब में जो रहता है वही होता है। सबसे बड़ी बात जो मेरे साथ हुई वह यह कि मैंने अपने पीक टाइम में अपने डैडी को हमेशा के लिए खो दिया। और इससे क्रिकेट खेलने की जो प्रेरणा मुझे उनसे मिलती थी, वह ख़तम हो गई, और मेरा इन्टरेस्ट भी ख़तम हो गया।

बहुत ही अफ़सोस की बात है! क्या उम्र रही होगी आपकी उस वक़्त?

मैं उस वक़्त 19 साल का था।

बहुत ही कठिन समय रहा होगा यकीनन। फिर मॉडेलिंग और फ़ैशन जगत में क़दम रखने के लिए आपने अपने आप को किस तरह से तैयार किया?

मैं यह मानता हूँ कि किसी भी प्रोफ़ेशन में सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत और लगन ज़रूरी होता है। अगर आप फ़ैशन जगत में एन्टर कर रहे हो तो आपका चेहरा, शारीरिक गठन, बॉडी लैंगुएज, कम्युनिकेशन स्किल्स बहुत ज़रूरी होता है। और अपने आप पर भरोसा होना भी बेहद ज़रूरी है; मन में यह विश्वास बनाए रखना कि चाहे कोई भी रोल हो, उसे आप निभा सकते हो। यह ज़रूर है कि एक नवागन्तुक होने की वजह से आप अपने काम और किरदार ख़ुद चुन नहीं सकते, पर आपको अपने आप को हर किरदार और हर काम के लिए तैयार रहना है। मैं हमेशा आइने के सामने घंटों खड़े हो कर प्रैक्टिस किया करता था।

क्रिकेटर बनने का स्ट्रगल तो आपने बताया था, मॉडल बनने के लिए भी ज़रूर एक बार फिर से स्ट्रगल करना पड़ा होगा?

पहली बात तो यह कि मैं बेशक़ मॉडेलिंग की दुनिया में आया, पर मेरा मक़सद एक मॉडल बनना नहीं था। मैं शुरू से ही एक अभिनेता बनना चाहता था। मैंने 21 वर्ष की आयु में अपनी ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही मॉडेलिंग्‍ शुरू की। मैं अक्सर मॉडल कोर्डिनेटर्स के पीछे भागता रहता, उन्हें अपनी तस्वीरें दिखाता, और फ़ॉलो-अप करता रहता। यह एक 24-घंटों का प्रोफ़ेशन है। इसमें आपका शारीरिक गठन, उच्चता, चेहरे की बनावट, फ़ोटोजेनिक होना, ये सब चीज़ें ज़रूरी होती हैं।

कहते हैं कि ग्लैमर की दुनिया के इन चकाचौंध के पीछे का जो अन्धेरा है वह लोगों को दिखाई नहीं देता। मेरा मतलब है कि इस लाइन में सुनने में आता है कि नवागन्तुक युवाओं का शोषण और उत्पीड़न होता है। आपके क्या विचार हैं इस बारे में?

मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि यह डीपेन्ड करता है कि इस तरह की चीज़ों को कोई कितनी समझदारी और होशियारी से हैन्डल कर सकता है। यह सच है कि लोग इस प्रोफ़ेशन के बारे में बहुत सी बातें करते हैं, पर मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमें प्रैक्टिकल होना चाहिए और सिर्फ़ अपनी मेहनत पर भरोसा रखना चाहिए, बस! किसी से कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए; अगर आपमें वह बात है, अगर आपकी मेहनत में सच्चाई है तो काम ज़रूर मिलेगा। वैसे इस प्रोफ़ेशन में उतार-चढ़ाव बहुत हैं। बहुत से लड़के लड़कियों को समझौता करने को कहा जाता है। बहुत धोखेबाज़ लोग भी भर गए हैं इस लाइन में जो युवा लड़कों और लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं। ऐसे बहुत सी घटनाएँ हैं जो यहाँ कहना मुमकिन नहीं।

जी, मैं समझ सकता हूँ। आपकी इन बातों से युवा-वर्ग को जो सन्देश मिलना था, वह मिल चुका होगा। अच्छा अब यह बताइए कि आपने अपना पहला रैम्प शो किस तरह से हासिल किया? इसके बारे में कुछ बताइए?

वह मेरे कॉलेज का ही शो था जहाँ मुझे Mr. Prince का ख़िताब दिया गया। फिर उसके बाद मेरा पहला डिज़ाइनर शो था मुम्बई में उमैर ज़फ़र का।

दिल की क्या हालत रही होगी उस पहले पहले शो को करते हुए?

मुझे घबराहट नहीं हुई, पर मैं उत्तेजित ज़रूर था। मैंने रिहर्सल्स ठीक तरह से किए और स्टेज को हिट करने के लिए तैयार हो गया। (हँसते हुए)

यानी वही आत्मविशास एक बार फिर नज़र आया, जो क्रिकेट के मैदान में दिखता था। फिर किन किन डिज़ाइनर्स और ब्रैण्ड्स के फ़ैशन शोज़ आपने किए?

उमैर ज़फ़र के साथ
उमैर ज़फ़र के शोज़ मैं नियमित रूप से करता हूँ। मुम्बई के ही डिज़ाइनर ख़ुशीज़ के शोज़ मैंने किए। लखनऊ के डिज़ाइनर अभिजीत साईप्रेम के लिए रैम्प शोज़ मैंने किए। दिल्ली के डिज़ाइनर सदन पाण्डे के फ़ैशन शो में भी जल्दी ही काम करने जा रहा हूँ। इस तरह से जब जो शोज़ आ रहे हैं मैं करता चला जा रहा हूँ।

प्रिन्ट मीडिया में आपका पहला विज्ञापन कौन सा था?

मेरा पहला प्रिन्ट-शूट 'मदर्स डे प्रोमो शूट' था ब्लैकबेरी फ़ोन के लिए। वह एक बहुत बड़ा शूट था जिसके लिए 117 लड़के ऑडिशन के लिए आए हुए थे। सभी की टेस्ट ली गई और उनमें से मैं सीलेक्ट हुआ। मुझे अपने आप पर बहुत गर्व महसूस हुआ, और मेहनताना भी बहुत अच्छा मिला मुझे। उस ऐड को करते हुए मुझे बहुत मज़ा आया पर मैं घबराया हुआ था। पर यह ज़िन्दगी की सच्चाई ही है कि जब आप अपना 100% देते हो, तभी उसका परिणाम भी उतना ही अच्छा होता है।

और कौन कौन से विज्ञापन में आप नज़र आए हैं?

टेलीविज़न पर जो ऐड्स आते हैं, उनमें से 99% स्थापित फ़िल्म कलाकारों द्वारा किए जाते हैं, या फिर सीनियर टीवी कलाकार उन्हें करते हैं। मैंने प्रिन्ट शूट्स किए हैं लेनिन, ग्रासिम सूटिंग्स, वेडिंग टाइम्स मैगज़ीन, ब्लैकबेरी जैसे ब्राण्ड्स के लिए। फ़ैशन मैगज़ीन के कवर पेज पर भी मैं आ चुका हूँ। कैटलॉग शूट्स भी किए हैं। अब तक मुझे अच्छा रेस्पॉन्स मिला है। अगले साल जनवरी-फ़रवरी में कुछ अच्छे काम मुझे मिल रहे हैं।

एक मॉडल के लिए एक नियमित दिनचर्या का होना बहुत आवश्यक होता है शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए। आप किस तरह से इस बात को ध्यान में रखते हैं?

दिनचर्या... मेरा दिन शुरू होता है सुबह 9 या कभी कभी 10 बजे से। मैं हेवी ब्रेकफ़ास्ट करता हूँ और फिर छोटे-छोटे मील्स लेता हूँ लंच, मिड-मील, डिनर के साथ साथ। मैं एक फ़िटनेस-फ़्रीक हूँ, ईश्वर का मुझ पर आशीर्वाद ही रहा है कि मुझे एक अच्छा शरीर मिला है। और यह शूट पर भी डीपेन्ड करता है। और एक बात यह भी है कि आजकल सिर्फ़ इस प्रोफ़ेशन के लिए ही फ़िट रहना ज़रूरी नहीं बल्कि आजकल की ज़िन्दगी में हर किसी को फ़िट रहना चाहिए। जब मैं जिम जाता हूँ तो 40 मिनट वेट ट्रेनिंग करता हूँ और 20 मिनट कार्डियो और रनिंग करता हूँ।

आपने अपने फ़ूड-हैबिट की बात की; इसके बारे में और ज़रा सा विस्तार से बताइए?

मैं बहुत ही पौष्टिक आहार लेता हूँ। ब्रेकफ़ास्ट में एक सेब, दो केले, दो अन्डे का सफ़ेद हिस्सा और एक प्रोटीन शेक विथ मल्टिविटामिन लेता हूँ। लंच में एक कटोरी दाल, तीन रोटियाँ, हरी सब्ज़ियाँ, दही और चावल। जिम से निकल कर दूध और अन्डे लेता हूँ। डिनर में दो रोटियाँ और सब्ज़ियाँ लेता हूँ। दिन में तीन लिटर पानी पीता हूँ और आठ घंटे सोता ज़रूर हूँ जो एक स्वस्थ जीवन के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

मॉडल से एक अभिनेता कैसे बने आप? क्या पहले भी कभी आपने कहीं अभिनय किया था? 'Confessions...' फ़िल्म का रोल आपको कैसे मिला?

मेरे हिसाब से हर किसी के अन्दर एक अभिनेता छुपा हुआ है। आपको बस इसका अहसास होना चाहिए, यही मेरे लिए अभिनय है। मैंने इससे पहले कभी कहीं अभिनय नहीं किया था। जैसे ही इस फ़िल्म की और इस रोल की ख़बर सुनी मुझे ऐसा लगा कि यह रोल सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लिए है और मैं यह रोल किसी भी अन्य नए अभिनेता से बेहतर निभा सकता हूँ। यह रोल बोल्ड था और उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। मैंने ’लूक टेस्ट’ दिया, फिर मुझे ऑडिशन का बुलावा आया। दस ऑडिशन देने के बाद आख़िरकार इस ऑडिशन में मैं चुन लिया गया। प्रोडक्शन टीम ने मुझे सुबह सवा दस बजे फ़ोन किया और उनके दफ़्तर में जाकर उनसे मिलने को कहा। मैं वहाँ पहुँचा तो निर्देशक महोदय ने कहा कि सजिल, बधाई हो, आप फ़िल्म में नायक के रोल के लिए चुन लिए गए हो। मुझे जैसे एक झटका लगा, कुछ देर के लिए मैं बिल्कुल ख़ामोश सा हो गया और सोचने लगा कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा। फिर मुझे यकीन हुआ कि अपने जीवन के अब तक का सबसे बड़ा मुहुर्त मैं अनुभव कर रहा था। मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि क्या बताऊँ। मैंने तुरन्त अपनी मम्मी को फ़ोन किया और उन्हें यह ख़ुशख़बरी दी।

वाह! वाक़ई बड़ा ही सुखद अनुभव रहा होगा। अच्छा सजिल, अब आप इस फ़िल्म के बारे में ज़रा विस्तार में बताइए कि फ़िल्म की विषयवस्तु क्या है?

जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि फ़िल्म की कहानी बलात्कार पर केन्द्रित है। मैं इस फ़िल्म में एक दोहरा-किरदार निभा रहा हूँ। पहले किरदार में मेरी थोड़ी सी दाढ़ी है, एक पोनी टेल है, और पतला शरीर है। और दूसरे किरदार में मैं क्लीन शेव और सामान्य छोटे बालों वाला हूँ। फ़िल्म की शूटिंग् दिल्ली, गोरखपुर और कानपुर में हुई है। यह फ़िल्म समाज को एक सशक्त सन्देश देगा बलात्कार विरोधी अभियान के बारे में, जो आज के भारतीय समाज के सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। साथ ही नारी सुरक्षा का भी सन्देश है इस फ़िल्म में। मैं इससे ज़्यादा इस वक़्त नहीं बता सकता फ़िल्म के बारे में। बस इतना कहूँगा कि फ़िल्म में दो लड़कियाँ हैं जो मुख्य किरदारों में हैं, एक जो मेरी बहन का रोल निभा रही है और दूसरी जो एक रिपोर्टर है। मेरी ही तरह इस फ़िल्म के निर्देशक भी फ़िल्म जगत में अपना पहला क़दम रख रहे हैं। He is a chilled out guy and also very young. उन्हें भी इस फ़िल्म से बहुत सारी उम्मीदें हैं और उनका यह मानना है कि यह फ़िल्म हर किसी को पसन्द आएगी।

फ़िल्म के सह-कलाकारों और ख़ास कर निर्देशक के साथ आपकी ट्युनिंग् कैसी रही? पहली फ़िल्म होने की वजह से आपको बहुत कुछ सीखने को भी मिला होगा न?

मुझे पूरी टीम यूनिट के साथ काम करते हुए बहुत ही मज़ा आया, ख़ूब मस्ती की। साथी कलाकारों और निर्देशक साहब के साथ काम करके बहुत अच्छा लगा। इस यूनिट के साथ जुड़ने का जो मौका मुझे मिला, इसे मैं अपनी ख़ुशक़िस्मती समझता हूँ। भविष्य में फिर कभी मौका मिले तो इस यूनिट का दोबारा हिस्सा बनना चाहूँगा। हम जैसे एक ही परिवार के सदस्य बन गए थे। इस फ़िल्म को करते हुए मुझे बहुत ही ख़ूबसूरत तजुर्बे हुए, पर मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि एक अभिनेता बनने के लिए प्रतिबद्धता के साथ-साथ भाग्य भी साथ में होना चाहिए। जब बात ना बन रही हो और टेक के बाद टेक हो रहे हों तो आदमी झल्ला जाता है। और कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आता है कि आपको लगता है कि सबसे उपर हो। शूटिंग के दौरान पूरे यूनिट की निगाह आप पर होती है। तो कभी कोई शॉट इतना बेकार होता है कि आप झल्ला जाते हो। फिर यह भी कहा गया है कि practice makes a man perfect। मुम्बई में हर रोज़ लाखों लोग क़दम रखते हैं फ़िल्म जगत में अपने सपनों को पूरा करने के लिए। पर बहुत कम लोग ही कुछ कर पाते हैं। मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे यह मौका मिला और भविष्य में भी मैं अच्छे प्रोजेक्ट्स में काम कर सकूँ, उसकी कोशिश मैं करता रहूँगा। अभी तो करीअर की बस शुरूआत ही है।

और हम आपको इसके लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं।

धन्यवाद!

अच्छा सजिल, इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि से तो आपने हमें अवगत करवाया, लेकिन हमने ऐसा सुना है कि फ़िल्म को लेकर कोई विवाद चल रहा है और इसके रिलीज़ की भी तारीख़ अभी निर्धारित नहीं हो पायी है, क्या यह सही है?

जी हाँ, फ़िल्म की रिलीज़ डेट अभी तय नहीं हो पायी है। फ़िल्म विवादित है, पर मेरा इसके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं रहेगा। बस इतना कहूँगा कि कि बलात्कार जैसे सेन्सिटिव विषय पर होने की वजह से सेन्सर बोर्ड ने अभी तक अनुमति नहीं दी है। पर जल्दी ही मामला निपट जाएगा और उसके बाद ही रिलीज़ डेट तय की जाएगी।

क्या आपको यह लगता है कि यह विवाद आपके मात्र शुरू हुए करीअर पर बुरा असर कर सकता है? या फिर इस विवाद से फ़िल्म को पब्लिसिटी मिलने की उम्मीद दिखाई देती है?

कोई भी विवाद किसी कलाकार को चोट नहीं पहुँचा सकता। कलाकार का विवाद से क्या लेना देना? कलाकार विवाद के लिए ज़िम्मेदार नहीं होता। और रही पब्लिसिटी स्टण्ट की बात, तो इसका भी कोई मतलब नहीं बनता क्योंकि इस फ़िल्म से कई लोगों का करीअर शुरू होने जा रहा है। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि हर किसी को पता है कि क्लास स्थायी होता है, मुझे ऑफ़र्स मिल रहे हैं। मेरी इच्छा है कि भविष्य में मुझे अच्छे-अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिले। फ़िलहाल तो जैसे ही सेन्सर बोर्ड का यह मामला सुलझ जाता है, हम फ़िल्म का प्रोमोशन शुरू करेंगे और इसकी रिलीज़ के लिए जुट जायेंगे।

जी बिल्कुल! जैसा कि आपने बताया कि फ़िल्म का विषय बोल्ड है, तो क्या अपनी पहली फ़िल्म के लिए ऐसे बोल्ड सब्जेक्ट पर काम करने से आपको डर नहीं लगा? एक पल के लिए भी आपने यह नहीं सोचा कि यह आपके हित में नहीं भी हो सकता है?

यह सच है कि मैंने एक बोल्ड करैक्टर निभाया है इस फ़िल्म में और बहुत चुनौतीपूर्ण भी रहा। पर कोई भी अभिनेता ऐसे रोल करने से डरेगा क्यों भला? अगर आपको एक सफल अभिनेता बनना है तो हर तरह के किरदार आपको निभाने पड़ेंगे। और यह रोल तो आज के समाज को एक बहुत ही ज्वलन्त मुद्दे को लेकर एक बड़ा सन्देश दे रहा है। हाल ही में दिल्ली में हमने एक भयानक बलात्कार का हादसा देखा जिसने पूरे देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। उसके बाद भी बलात्कार के मामले कम नहीं हुए हैं। हमारा देश, हमारी सरकार क्या क़दम उठा रही है इस तरफ़, यही सब कुछ हमने इस फ़िल्म में कैप्चर किया है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स सीन में हम एक सशक्त सन्देश देने जा रहे हैं। मैं इस फ़िल्म से बहुत ख़ुश हूँ और हम सभी का यह मानना है कि देशवासियों को यह फ़िल्म पसन्द आएगी, ना कि वो इस फ़िल्म को नकारात्मक्ता से देखेगी।

चलिए इस फ़िल्म के बारे में तो हमने जाना, अब यह बताइए कि आप एक अभिनेता के रूप में किस तरह से पनपना चाहते हैं? आपकी किस तरह की उम्मीदें हैं इस फ़िल्म इंडस्ट्री से?

यहाँ पर पनपने का जो सबसे उत्तम तरीका है, वह है कड़ी मेहनत और अपने आप पर भरोसा। मुझे बहुत कुछ करना है आगे, मैं बहुत तरह के किरदार निभाना चाहता हूँ, सिर्फ़ नायक की भूमिका में ही नहीं बल्कि खलनायक और हास्य अभिनेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाना चाहता हूँ। मैं मधुर भण्डारकर जी के साथ काम करना चाहता हूँ क्योंकि वो मेरे सबसे पसन्दीदा निदेशक रहे हैं। और मेरे आइडॉल हैं शाहरुख़ ख़ान। वो मेरे सब कुछ हैं।

सजिल, यह बताइए कि पहले क्रिकेट, फिर मॉडलिंग्, उसके बाद फ़िल्म अभिनेता, अब इसके बाद क्या??

कुछ भी नहीं (हँसते हुए), मैं ख़ुशनसीब हूँ कि क़िस्मत ने मुझे इतना कुछ करने का मौका दिया है। पर इस वक़्त मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अभिनय को लेकर सीरियस हूँ और इसे ही अपना करीअर मानता हूँ और इसी पर अपना पूरा ध्यान लगा रहा हूँ।

आप एक युवा क्रिकेटर, मॉडल और अभिनेता हैं, और निश्चित रूप से युवाओं के लिए एक लाइट-हाउस की तरह भी हैं। क्या सन्देश देना चाहेंगे आप उन युवाओं को जो आप ही की तरह एक क्रिकेटर या अभिनेता/मॉडल बनना चाहते हैं?

मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि किसी भी शॉर्ट-कट में विश्वास नहीं करनी चाहिए और ना ही किसी से कोई भी उम्मीद रखनी चाहिए। अपने जीवन में आप जो भी करना चाहें, उस तक पहुँचने के लिए कड़ी मेहनत कीजिए और अपना पूरा ध्यान उस पर लगाए रखिए। ईश्वर पर भरोसा कीजिए, वो आपको फल ज़रूर देगा। हमेशा ख़ुश रहिए और चीज़ों को हल्के अंदाज़ में ग्रहण कीजिए। कोई भी प्रोफ़ेशन आप चुनिए, क्रिकेट, मॉडलिंग् या ऐक्टिंग्, सभी में आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। सफलता अगर पाना है तो कोई भी शॉर्ट-कट नहीं चलेगा, there is no shortcut to success, मैं ऐसा मानता हूँ।

बहुत अच्छी बात बताई आपने और यह बिल्कुल सही भी है। और सजिल, अन्त में हम यह जानना चाहेंगे कि सजिल उस वक़्त क्या कर रहे होते हैं जब वो ना तो अभिनय कर रहे होते हैं, ना ही मॉडलिंग और ना ही जिम में वर्क आउट?

मुझे बहुत सी चीज़ों का शौक है, जैसे कि मैं क्रिकेट खेलता हूँ अपने निकट के दोस्तों के साथ जब भी मुझे समय मिलता है। बान्द्रा में या फिर जब मैं लखनऊ में होता हूँ तो दोस्तों के साथ हैंग-आउट करता हूँ। मैं अपने प्ले-स्टेशन में भी ख़ूब गेम्स खेलता हूँ। मुझे गाड़ियाँ चलाने का भी बड़ा शौक है। और अपने परिवार के साथ ढेर सारा समय बिताना मुझे बेहद अच्छा लगता है।

बहुत बहुत शुक्रिया सजिल जो आपने हमें अपना कीमती समय दिया और अपने बारे में, और अपनी आने वाली फ़िल्म के बारे में इतना कूछ बताया। आपको फ़िल्म की कामयाबी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए आपसे विदा लेते हैं, नमस्कार!

आपको बहुत बहुत धन्यवाद, ढेर सारा प्यार, नमस्कार।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



Saturday, October 25, 2014

बातों बातों में : Interview with Pranay Dixit, Actor of Film 'Roar - Tigers of the Sundarbans'

बातों बातों में

फिल्म 'रोर - टाइगर ऑफ सुन्दरवन' से अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु करने वाले टीवी अभिनेता प्रणय दीक्षित से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

सपनों को अगर जीना है तो पागलपन का होना ज़रूरी है... 





आगामी शुक्रवार, 31 अकतूबर, 2014 को प्रदर्शित होने जा रही है इस साल की सबसे अनोखी फ़िल्म - 'रोर - टाइगर ऑफ सुन्दरवन'। अबीस रिज़वी निर्मित व कमल सदाना निर्देशित इस ऐक्शन थ्रिलर में अभिनय करने वाले कलाकारों में एक नाम लखनऊ के प्रणय दीक्षित का भी है। टेलीविज़न जगत में 'मिस्टर जुगाड़ूलाल', 'लापतागंज', 'एफ.आई.आर.', 'चिड़ियाघर', 'हम आपके हैं इन-लॉज़', 'बच्चन पाण्डे की टोली', 'गिलि गिलि गप्पा' जैसे धारावाहिकों में अपने हास्य अभिनय से हम सब का मनोरंजन करने वाले प्रणय दीक्षित इस फ़िल्म के माध्यम से अब बड़े परदे पर क़दम रख रहे हैं। आज प्रणय जी 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर मौजूद हैं इसी फ़िल्म से सम्बन्धित कुछ दिलचस्प बातें बताने के लिए। साथ ही अपने करीयर का शुरू से लेकर अब तके के सफ़र की दास्तान भी वो हमारे साथ बाँट रहे हैं। तो आइए मिलिए अभिनेता प्रणय दीक्षित से, साक्षात्कार आधारित 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के स्तम्भ 'बातों बातों में' की इस कड़ी में। प्रणय दीक्षित से यह बातचीत आपके सुपरिचित स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने की है।



प्रणय जी, सबसे पहले तो आपको हार्दिक बधाई, आपकी पहली फ़िल्म 'रोर - टाइगर ऑफ सुन्दरवन' के लिए। साथ ही शुभकामनाएँ इस फ़िल्म की कामयाबी के लिए, जो कि कुछ ही दिनों में रिलीज़ होने जा रही है। तो बताइये कि कैसा लग रहा है छोटे परदे से बड़े परदे पर पहुँचते हुए?

आपको लाखों धन्यवाद इस साक्षात्कार के लिए। यह मेरे लिए बहुत ही सौभाग्य की बात है कि मैं खुद को प्रणय दीक्षित के नाम से परिचय देने में समर्थ हुआ हूँ। मैं एक मैनेजमेंट के स्नातक होने और इस क्षेत्र में सफल होने के बाद अभिनय के क्षेत्र में आया हूँ। मैं नवाबों के शहर से ताल्लुक रखता हूँ, वह शहर जो अपनी नज़ाकत, नफासत और लजीज खानपान के लिए मशहूर है, यानी कि लखनऊ।
टेलीविज़न मेरा स्कूल रहा है। मैंने अभिनय का पहला पाठ यहीं पर पढ़ा, मेरी नीव बनी, और इसी ने आगे चलकर मुझे विश्वविद्यालय भेजा। जी हाँ, फिल्म 'रोर - टाइगर ऑफ सुन्दरवन' मेरा विश्वविद्यालय रहा। मैं विश्व की सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री, बॉलीवूड का आभारी हूँ जिसने मुझ पर भरोसा किया इस चुनौती के लिए। मैं अभिभूत हूँ। यह एक ऐसी अनुभूति है जिसे शब्दों में उल्लेख कर पाना असम्भव है। मुझे यह तो मालूम था कि एक दिन मुझे अपना बिग ब्रेक मिलेगा, पर इतना बड़ा ब्रेक अशातीत था। 'रोर...' नामक यात्रा के मंज़िल तक पहुँचने के लिए मैंने जी-जान लगा दिया और मुझ पर ईश्वर की कृपा रही जिन्होंने मेरा ख़याल रखा और मुझे विश्व के कुछ सर्वश्रेष्ठ प्रोफ़्रेशनल्स की निगरानी में काम करने का मौका मिला। बड़ों के आशिर्वाद से मुझे अपनी पहली फ़िल्म में एक सशक्त चरित्र को निभाने का मौका मिला। इस फ़िल्म में काम करते हुए मैंने बहुत कुछ सीखा, यूनिट के हर शख़्स से कुछ ना कुछ सीखने को मिला।

बहुत ख़ूब! प्रणय जी, मैं आपसे यह पूछना चाहूँगा कि आपको यह रोल कैसे मिला, पर उससे पहले मैं आपके सफर की शुरुआत से जानना चाहूँगा। मतलब आपका अब तक का सफ़र कैसा रहा? अभिनय का बीज कब बोया गया था, और यह बीज कब और कैसे अंकुरित हुआ? अभिनेता के रूप में कौन सा शो या धारावाहिक पहला था? तो उन शुरुआती दिनों का हाल बताइये ज़रा।

मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मैं चौथी कक्षा में था, तब दीवाली के फ़ंक्शन में एक लघु-नाटक में मैंने एक पण्डित का रोल किया था जो विवाह करवाता है। मेरे उस अभिनय को देख कर सभी आंटी, अंकल और युवा वर्ग मुझसे प्यार करने लगे। पर उसी फ़ंक्शन के एक अन्य आइटम में जब मैंने "चोली के पीछे क्या है..." गीत गाकर सुनाया तो सभी कुछ अटपटा सा महसूस करने लगे, जिनमें मेरे माता-पिता भी शामिल थे। पर चौथी कक्षा का वह छोटा बच्चा पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय तो बन ही गया था। इस तरह से अभिनय मेरे अन्दर शायद जन्म से ही था। उसके बाद एक लम्बा अन्तराल रहा और मैं बतौर ऑल-राउन्डर पूरी तरह से क्रिकेट के साथ जुड़ा रहा, कुछ सालों तक। उसके बाद बारहवीं की परीक्षा पास कर जब होस्टल लाइफ़ में प्रवेश किया तो पूरी शिद्दत से तरह-तरह के एक्स्ट्रा-करिकुलर ऐक्टिविटीज़ में भाग लेने लगा; पर अपने पारिवारिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए अभिनेता बनने के सपने को तूल नहीं दिया और अपनी उच्च शिक्षा और फिर उसके बाद कॉरपोरेट नौकरी की तरफ़ ध्यान देने लगा। लेकिन मेरे द्वारा जीते हुए तमाम ट्रॉफ़ी और सर्टिफ़िकेट मेरे सामने प्रश्नवाचक चिह्न बन कर दिन-प्रतिदिन खड़े हो जाते। जीवन में आगे चलकर मैं अफ़सोस नहीं करना चाहता था, इसलिए अपने पिताजी को भरोसा दिलाकर मैंने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी और साल 2010 में सपनों के शहर मुम्बई आ गया, अपने जीवन का सबसे बड़ा रिस्क लेकर। मेरी माँ सोच में पड़ गईं कि फ़िल्म इंडस्ट्री में बिना किसी जान-पहचान के मैं कैसे कुछ कर पाऊँगा। पर मेरा आत्मविश्वास हमेशा मुझसे यह कहता था कि एक दिन मैं कमयाब ज़रूर बनूँगा। और अब मैं हर चुनौती के लिए एकदम तैयार हूँ।

वाह, क्या बात है! तो अब आप मायानगरी मुम्बई पहुँच गए। यहाँ पर किस तरह से यह लड़ाई आपने शुरू की?

मैंने लगभग 18 महीने अपने बचपन के एक दोस्त के साथ थाणे में गुज़ारे। उसने मेरी हर सम्भव मदद की, यकीन मानिए हर तरह से। मैं रोज़ चार घंटे का सफ़र करता; थाणे से मुम्बई आता ओपेन ऑडिशन के लिए, और फिर थाणे वापस चला जाता, और यह मैं छह महीनों तक लगातार करता रहा। 


अच्छा, आगे बढ़ने से पहले क्या मैं यह जान सकता हूँ कि क्या आपने कभी थिएटर के साथ जुड़ने का नहीं सोचा था लखनऊ में?

जी नहीं! मैनेजमेण्ट की पढ़ाई करते हुए कभी मौका ही नहीं मिला क्योंकि उसमें काफ़ी समय देना पड़ता है, काफ़ी सीरियस होना पड़ता है। मेरे अन्दर जो अभिनय की प्रतिभा है वह ईश्वर प्रदत्त है। मैंने कहीं से नहीं सीखा, यह मेरे अन्दर ही था। पर मुम्बई आने के बाद मैं हिन्दी थिएटर के साथ जुड़ा। अनभिज्ञ होने की वजह से मुझे स्टेज पर परफ़ॉर्म करने का मौका नहीं मिलता था, बैक-स्टेज ही सँभाला करता, कभी ब्लैक-आउट के दौरान बैकड्रॉप की सेटिंग्स बदलता तो कभी कलाकारों को चाय-समोसे सर्व करता। केवल देख-देख कर उन कलाकारों से मैंने बहुत कुछ सीखा पर कम से कम एक बार स्टेज पर जाने की लालसा बार-बार मन-मस्तिष्क पर हावी रहता। कॉलेज में जितने भी बार मैं स्टेज पर गया, पहला पुरस्कार (या कम से कम दूसरा) लिए बगैर नहीं लौटा। मेरे दोस्त इस बात की शर्त लगाया करते थे। अपने कॉलेज का एक परफ़ॉर्मर होने के बावजूद मैंने यहाँ इस तरह के काम करने का निर्णय लिया ताकि मैं अन्दर से और भी ज़्यादा मज़बूत बन जाऊँ। मुझे अब भी याद है कि जब भी मैं किसी को अपने प्रोफ़ेशनल बैकग्राउण्ड के बारे में बताता था तो वो चौंक पड़ते और कहते कि आप पागल हैं जो इतना अच्छा करीयर छोड़ कर ऐक्टिंग करने आ गए। यकीन मानिये कि अपने सपनों को अगर जीना है तो पागलपन का होना ज़रूरी है।


बिल्कुल सही बात है! अच्छा फिर उसके बाद क्या हुआ?

उसके बाद शुरू से ही मेरी नज़र अपने लक्ष्य पर ही थी। मैं फ़िल्मों से शुरुआत नहीं करना चाहता था, मैंने यह निर्णय लिया कि फ़िल्म में काम तभी करूँगा जब मुझे कोई यादगार किरदार निभाने का मौका मिलेगा। मैं ऐसा कोई रोल नहीं करना चाहता जिस पर किसी का ध्यान ही ना जाये। इसालिए मैंने धैर्य से काम लिया। मैंने अपना ऐक्टिंग करीयर टेलीविज़न से शुरू किया। फ़िल्म के मुकाबले टीवी में प्रेशर बहुत ज़्यादा है क्योंकि इनका दैनिक प्रसारण होता है। इस तरह से टीवी में काम करते हुए कलाकार शारीरिक और मानसिक तौर पर मज़बूत बन जाता है। मेरे सेल्स/मार्केटिंग की नौकरी में भी बहुत प्रेशर रहता था, और मेरी कई उपलब्धियाँ भी वहाँ रही। कॉलेज में मैं स्किट्स, नाटक वगैरह करता था और बहुत सारे ट्रॉफी और सर्टिफ़िकेट जीते। अब समय था कि उन तमाम अनुभवों को अपने ऐक्टिंग में लगाने का। अनगिनत ऑडिशन देने के बाद मुझे अहसास हुआ कि कैमरे के सामने अभिनय करना बिल्कुल अलग चीज़ है और चुनौती भरा भी।


आपका पहला ऑडिशन कौन सा था?

मैंने अपना पहला ऑडिशन यहीं मुम्बई में दिया एक नामी टैल्कम पाउडर ब्रैण्ड के विज्ञापन के लिए और सौ से भी अधिक कलाकारों के बीच में से मैं शॉर्टलिस्ट हुआ। इससे मेरा आत्मविश्वास और भी बढ़ गया और मैंने सोचा कि आज अगर मैं शॉर्टलिस्ट हुआ हूँ तो कल सेलेक्ट भी हो जाऊँगा। छह महीने मैंने जी-तोड़ मेहनत की। इन छह महीनों में मैंने लगभग 300+ ऑडिशन्स दिये पर कुछ 50 में फ़िट हो सका, 15-20 में मैं शॉर्टलिस्ट हुआ, पर फ़ाइनल सीलेक्शन एक में भी नहीं हुआ। मेरी समझ में यह आ गया कि यह दुनिया की सबसे ज़्यादा मुश्किल जगह है, पर मेरा शॉर्ट-लिस्ट होना मुझे ऊर्जा देता रहा और वही मेरी एकमात्र आशा की किरण थी। एक समय ऐसा भी आया कि जब एक के बाद एक नाकामयाबी मुझे नसीब हो रही थी और सारी जमा-पूँजी भी खतम हो चुकी थी। ऐसी स्थिति में मैंने अँधेरी स्थित एक कम्पनी में नाइट शिफ़्ट की मामूली सी नौकरी कर ली। मेरी योग्यता के हिसाब से मुझे अच्छी नौकरियाँ मिल रही थीं पर मैं दोबारा उनमें उलझ कर अपना मकसद फिर से खोना नहीं चाहता था। मैंने डेढ़ महीने तक वह नौकरी की।


प्रणय जी, आपकी इस तपस्या को सलाम करता हूँ। अच्छा, फिर कैसे आगे बढ़े आप?

अन्त में एक दिन आया जब टेलीविज़न ने मुझे आवाज़ दी और मुझे 'लापतागंज' धारावाहिक में ब्रेक मिला। एक छोटा सा रोल था उसमें पर एक ही सप्ताह के अन्दर मुझे मेरा पहला बड़ा रोल, जुगाड़ूलाल का, जो मुख्य चरित्र था, वह मुझे मिल गया। उसके बाद फिर मुझे पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी।


बहुत ख़ूब! बहुत लोकप्रिय रहा है 'जुगाड़ूलाल'। अच्छा यह बताइये कि शुरू-शुरू में टीवी धारावाहिक में काम करते हुए किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा आपको?

शुरू-शुरू में मुझे यह भी मालूम नहीं था कि संवाद के लाइन कैसे याद किये जाते हैं, संवाद कैसे बोले जाते हैं, मूवमेण्ट कैसे ली जाती है, परछाई को कैसे काबू में किया जाता है, रीफ़्लेक्टर का सामना कैसे किया जाता है, कन्टिन्यूइटी कैसे मेनटेन की जाती है, आवाज़ को कैसे मोडुलेट किया जाता है, उसमें कैसे वेरिएशन लाई जाती है, टाइमिंग वगैरह, यह सब कुछ भी मुझे मालूम नहीं था। पर मेरी किस्मत अच्छी थी कि मुझे बहुत ही अच्छे लोग मिले जिन्होंने मेरी बिना किसी शर्त के मदद की। टीवी मेरा स्कूल बन गया और कुछ ही महीनो में मेरा हर शॉट निर्देशकों, निर्माताओं, एडिटर, सह-कलाकारों और दर्शकों की वाह-वाही लूटने लगा। बहुत जल्द मैंने टीवी के हास्य जगत में नाम कर लिया, और आज कॉमेडी जौनर के हर निर्देशक और सीनियर कलाकार मुझे पहचानते हैं और मेरे काम को सराहते हैं। और इन बड़े कलाकारों के साथ स्क्रीन स्पेस शेअर करते हुए मुझे गर्व और आभार का अहसास होता है। और बताना ज़रूरी है कि वो सभी 'रोर...' के लिए काफ़ी उत्साहित हैं।


और हम सब भी उतने ही उत्साहित हैं। इससे पहले कि हम फिल्म 'रोर...' की चर्चा करें, यह बताइये कि किन-किन टीवी धारावाहिकों में आपने काम किया और उनमें से कौन सा किरदार आपके दिल के सबसे करीब है?

मिस्टर जुगाड़ूलाल, लापतागंज, एफ.आई.आर., चिड़ियाघर, हम आपके हैं इन-लॉज़, बच्चन पाण्डे की टोली, गिलि गिलि गप्पा, आदि। इन सभी में मेरा काम लोगों ने सराहा, पर जुगाड़ूलाल मेरे दिल के सबसे करीब है। शायद इसलिए कि इसी से मेरे अभिनय सफ़र की शुरुआत हुई थी। उन 85 एपिसोड्स को करते हुए मैं काफ़ी मँझ गया। जब कोई बाहरवाला सेट पर आता, तो मुझे देख कर हैरान रह जाता क्योंकि कैमरे के बाहर मैं एक बिल्कुल अलग शख़्सियत होता, दिखने में, और बोलचाल में भी। यहाँ तक कि मेरी नायिका की सहेलियाँ भी धोखे में रहती कि क्या यही जुगाड़ू है, ये तो बिल्कुल अलग दिखता है और बोलता भी बहुत अच्छा है।


यही तो एक अच्छे अभिनेता की ख़ासियत होती है कि वो उस चरित्र में बिल्कुल ढल जाता है। प्रणय जी, अब यह बताइये कि टीवी में काम करते करते फ़िल्म जगत में पदार्पण का जो यह ट्रान्ज़िशन था, वह कैसे सम्भव हुआ?

मैं फ़िल्में एक संक्रमण की तरह देखा करता था। साथ-साथ ऑबज़र्वेशन और लर्निंग भी जारी था। जब भी मुझे समय मिलता मैं जाकर ऑडिशन दे आता अपना आकलन करने के लिए। और एक समय जाकर मैंने यह महसूस किया कि टीवी में अभिनय और फ़िल्मों में अभिनय दो बिल्कुल अलग चीज़ें हैं। फ़िल्मों में अभिनय करना बच्चों का खेल नहीं, यह बात समझ में आ गई और इसलिए मैंने सोचा कि अब समय आ गया है कि और मेहनत से अपने अभिनय को अगले स्तर तक पहुँचाया जाए। इसलिए ऑडिशन जारी रखा, और करीब करीब 1500 ऑडिशन्स मैंने दिए, और ढाई साल बाद मुझे 'रोर...' के ऑडिशन के लिए बुलावा आया। कास्टिंग डिरेक्टर का कॉल आया और उन्होंने मुझे बताया कि इस फ़िल्म में एक चरित्र के लिए वो एक ऐसे अभिनेता की तलाश कर रहे हैं जो काफ़ी डायनामिक हो। तो क्या आप इस चरित्र को निभाने के लिए ऑडिशन दोगे? मैं वहाँ गया, उन्होंने मुझे उस किरदार के बारे में विस्तार में बताया। ऑडिशन टेक से पहले मैंने अपने बालों को भिगोया और अलग ही स्टाइल में कंघी की (जो इस फिल्म में मेरी हेअर स्टाइल बनी)। और फ़ाइनल टेक के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि परिणाम वो मुझे बाद में सूचित करेंगे। अगले दिन मुझे उनका फ़ोन आया और उन्होंने मुझसे पूछा कि ये तुमने क्या किया? उन्होंने बताया कि निर्देशक महोदय मुझसे कल मिलना चाहते हैं। अगले दिन जब मैं कमल सदाना जी के दफ़्तर पहुँचा तो उन्होंने मुझे देखते ही कहा, "वेलकम मधु" उनके बाद निर्माता अबीस रिजवी साहब आए और कहा, "अरे मधु, कैसे हैं आप?" फिर प्रोडक्शन हेड अन्दर आए और कहने लगे कि क्या आप ही मधु हैं? मेरी समझ में आ गया कि ऑडिशन सुपरहिट रहा है। मुझे दो और सीन अदा करने को कहा गया, और उसके बाद निर्देशक साहब आए और कहा कि "यू आर इन"। और अब मैं 31 अक्तुबर को आप सबके बीच "आउट" हो जाऊँगा।

अच्छा प्रणय जी, 'रोर...' का ट्रेलर हमने देखा है। फ़िल्म की जो ओवरऑल पैकेजिंग है, वह बहुत ही ज़्यादा लुभावना है, और लग रहा है कि फ़िल्म लीक से अलग हट कर होगी। आपको क्या लगता है कि वह कौन सी बात है इस फ़िल्म की जो इसे कामयाबी की बुलन्दी तक लेकर जा सकती है?

अबीस रिजवी इस फ़िल्म के केवल निर्माता ही नहीं हैं, बल्कि वो इस पूरे प्रोजेक्ट में एक ढाल बन कर खड़े रहे और उनके बिना किसी के लिए एक क़दम भी आगे चलना सम्भव नहीं होता। मेरे लिए तो वो एक बड़े भाई से कम नहीं हैं और रिज़वी साहब और कमल साहब, दोनों ने इस पूरे हसीन सफ़र में हम सब का पूरा-पूरा ख़याल रखा। इस फ़िल्म में रिज़वी साहब की बहुत बड़ी पूँजी दाव पर तो लगी है ही, उससे भी बड़ी बात है कि वो फ़िल्म के हर वी.एफ.एक्स. शॉट की पूरी-पूरी जानकारी रखते थे और स्क्रिप्ट की हर लाइन उन्हें पता थी। मैंने पहले कभी ऐसा नहीं सुना था कि किसी निर्माता और निर्देशक ने वी.एफ.एक्स. का कोर्स किया हो। यह 800 वी.एफ.एक्स. शॉट्स की फ़िल्म है और यह निर्माता और निर्देशक के प्रोफ़ेशन्लिज़्म का ही उदाहरण है जो पूरी दुनिया के सामने बहुत जल्द ही आने वाला है। रिज़वी साहब ने विश्व के सर्वश्रेष्ठ टेक्निशियनों को इस फ़िल्म में लिया है अपने सपने को साकार करने के लिए। मैंने बहुत सी वी.एफ.एक्स. फ़िल्में देखी हैं पर 'रोर...' में वी.एफ.एक्स. का स्तर बहुत ही ऊँचा है। इसके लिए श्रेय जाता है जेश कृष्णमूर्ति जी (हॉलीवुड के साथ जिनका अच्छा अनुभव रहा है) और उनके 400 कर्मचारियों को जिन्होंने रात-दिन कठिन परिश्रम कर आश्चर्यचकित कर देने वाली वी.एफ.एक्स. डिज़ाइनिंग की है। लॉस ऐंजेलेस के मिस्टर माइकल वाटसन, जो वी.एफ.एक्स. के विशेषज्ञ हैं, उन्हें इस फ़िल्म में फोटोग्राफी निर्देशक लिया गया है, जिन्होंने 'स्काईलाइन', 'स्टेप अप 2' जैसी फिल्मों की फोटोग्राफी की है। उन्होंने सुन्दरवन के जंगलों को बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ कैमरे में क़ैद किया है। मुझे रसूल पूकुट्टी की निगरानी में काम करके भी बहुत अच्छा लगा। पूकुट्टी जी भारत की शान तो हैं ही, विश्व के श्रेष्ठ साउण्ड डिज़ाइनरों में से एक होने का भी उन्हें गौरव प्राप्त है। 'स्लमडॉग मिलिओनेअर' के लिए वो ऑस्कर भी जीत चुके हैं। उनके साउण्ड इफ़ेक्ट्स का महत्वपूर्ण योगदान है इस फ़िल्म में। फ़िल्म के सभी सहयोगी अभिनेताओं के साथ काम करके मुझे बेहद आनन्द आया और सभी ने एक दूसरे का अन्त तक साथ दिया। कुछ दिनों की शूटिंग के बाद मुझे अहसास हुआ कि अब हम महज़ अभिनेता नहीं रहे, बल्कि 'रोर...' नामक परिवार में अपना योगदान कर रहे हैं।


प्रणय जी, इस फ़िल्म का मूल उद्येश्य क्या है? 

इस फ़िल्म के ज़रिए हम पूरी दुनिया को पश्चिम बंगाल के सुन्दरवन का हाल बताना चाहते हैं जहाँ आदमख़ोर बाघ मछुआरों और शहद निकालने वाले लोगों पर हमला करते हैं और उनकी मौत के कारण बनाते हैं। उन लोगों के परिवारों की दुर्दशा को दिखाया गया है जो अपनी जान जोखिम में डाल कर इस भयानक जंगल के अन्दर जाते हैं, अपने पेट की आग को शान्त करने के लिए। इसके साथ ही बाघों और शेरों के संरक्षण (Save the Tiger) का उपयोगी सन्देश भी है इस फ़िल्म में जो कि अब एक ग्लोबल मुद्दा है। इंसान और शेर के बीच जो रिश्ता है उसे पहली बार एक अलग ही नज़रिये से दिखाया गया है इस फ़िल्म में। और जब इस फ़िल्म को पूरी दुनिया भर से ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली, 2014 के कान फ़िल्म महोत्सव में, तो हमारा हौसला और भी बढ़ गया। दुनिया भर के जाने-माने फ़िल्म वितरकों ने इस फ़िल्म के ट्रेलर को देख कर इस फ़िल्म में गहरी रुचि दिखाई है। 'रोर...' विश्व के सबसे ख़तरनाक जंगलों में से एक - सुन्दरबन - पर केन्द्रित है। वहाँ के सुन्दर लोकेशन्स को फ़िल्म के परदे पर दर्शकों को पहली बार देखने का मौका मिलेगा, यह भी अपने आप में बड़ी बात है। और मैं आप सब को दावत देता हूँ पॉप-कॉर्न के साथ सुन्दरबन, हमारे कमांडोज़, हमारी हिरोइन और वहाँ के आकर्षक सफ़ेद बाघों से मिलने के लिए। आइए और इन सबसे आकर मिलिए। बाघ, मगरमच्छ, साँप, जैसे डरावने जन्तुओं और विशालकाय जंगल के बीच दिल दहलाने वाले ऐक्शन के गवाह बनिए। ये सब आपका इन्तज़ार कर रहे हैं।


बहुत ही सुन्दर तरीके से आपने इस फ़िल्म का वर्णन किया। यह सब जान कर हम भी बेहद उत्सुक हो उठे हैं फ़िल्म को देखने के लिए। अच्छा आपने ज़िक्र किया था कि आपके चरित्र का नाम "मधु" है। प्रणय जी, ये मधु, मेरा मतलब है कि यह तो लड़कियों का नाम होता है, माफ़ी चाहता हूँ पर यह कैसा नाम है आपके चरित्र के लिए?

हा हा हा.... नाम लड़की का ज़रूर है पर चरित्र शत-प्रतिशत पुरुष का है। मधुसूदन बंकिमचन्द्र सेनगुप्ता एक किलोमीटर लम्बा बांग्ला नाम है। इसलिए लोग मुझे मधु कह कर बुलाते हैं। मधु हिन्दी में ही बात करता है पर उसमें बांग्ला उच्चारण का स्पर्श भी है। मधु सुन्दरबन में पर्यटकों के लिए स्थानीय गाइड का काम करता है। एक युवा फ़ोटोग्राफ़र के सहायक के रूप में उसने काम किया था जो एक सफ़ेद शेरनी के द्वारा मारा गया। ईश्वर से डरने वाला और बहुत ही सच्चे दिल वाला मधु अपने स्वभाव के ख़िलाफ़ जाकर उस फ़ोटोग्राफ़र के अवैध शिकार में उसका साथ देता है। फ़ोटोग्राफ़र के मरने के बाद मधु को लगने लगता है कि वह शेरनी उसे भी मार डालेगी। मधु उस शेरनी को मारने की सोचता है। आगे क्या होता है, यह तो आपको थिएटर में जाकर ही पता चलेगा।


प्रणय जी, अब हम आप से जानना चाहेंगे फ़िल्म के निर्देशक कमल सदाना साहब के बारे में। उनके बारे में कुछ बताइए।

कमल जी मेरे करीयर के अब तक के बेस्ट बॉस रहे हैं। उनको मुझे डिरेक्ट करते हुए अच्छा लगा और मैंने भी उन्हें हर सीन में चौंका दिया। सुन्दरबन में रोज़ सुबह 6 बजे से रात 1 बजे तक उनके काम करने का जो पैशन था, उससे मैं बहुत मुतासिर हुआ। मुझे अब भी उनका कही पंक्ति याद है - "Lets make a movie"; जो बाद में यूनिट के हर किसी की पसंदीदा पंक्ति बन गई। शुरू से ही वो प्रोडक्शन और डिरेक्शन, दोनो सँभाल रहे थे क्योंकि हमारे प्रोडक्शन हेड स्वास्थ्य कारणों से सुन्दरबन नहीं जा सके थे। कैसे भूल सकता हूँ वह क्षण कि जब नायिका को एक सीन में एक गहरे खाल में छलाँग मार कर और काफ़ी दूर तक उसमें तैर कर एक नाव तक पहुँचना था, तो इस सीन को करने के लिए नायिका का डरना बिल्कुल स्वाभाविक था। नायिका के डर को देख कर कमल जी ने ख़ुद छलाँग मार कर सीन को कर दिखाया जिससे नायिका का डर निकल गया। कमल जी भीगे कपड़ों में काँप रहे थे, वैसे ही मौनिटर के पीछे जाकर कमान सम्भाला और वह सीन एक ही बार में ओके हो गया। इससे ज़ाहिर होता है कि कमल जी और उनकी पूरी टीम ने इस फ़िल्म के पीछे कितनी कड़ी मेहनत की है। कमल जी अक्सर कहते थे कि Respect Nature। मुझे याद है कि जब उन्होंने मुझे 'रोर...' का ऑफ़र दिया था, तब मैंने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा था कि "I will not let you down sir", उनका तुरन्त जवाब था "I will not let you to let us down"। इस तरह उनका मुझ पर विश्च्वास रहा है। फ़िल्म को बेहद ख़ूबसूरती से उन्होंने शूट तो किया ही है, उससे भी अच्छा काम उनका एडिटिंग टेबल पर रहा है। हम सब ने उन्हें हर सीन को एडिट करते हुए देखा है और बहुत कुछ सीखा भी है। कमल जी का दिल सोने का है। उनका सेन्स ऑफ़ ह्यूमर भी कमाल का है। अपने आप में वो एक रचनात्मक संस्था है जिनमें निर्देशन, पटकथा, एडिटिंग, पार्श्वसंगीत, और प्रोमोशन के गुण कूट-कूट कर भरे हुए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने फ़िल्म के कलाकारों से केवल अभिनय ही नहीं करवाया, बल्कि फ़िल्म निर्माण के सभी पक्षों के बारे में सिखाया है।


वाह! क्या बात है! ऐसे बहुत कम ही निर्देशक होंगे जो अभिनेताओं को इस तरह की सीख देते होंगे। अच्छा प्रणय जी, सुन्दरबन में इतने दिन आप सब रहे, वहाँ के अनुभव भी बेहद रोमांचक रहे होंगे। तो सुन्दरबन से जुड़ी कुछ मज़ेदार और रोमांचक क़िस्से बताइए।

150 लोगों का यूनिट चार बड़े क्रूज़ में 'No man's land' में ठहरे हुए थे।


माफ़ कीजिएगा, पर 'No man's land' मतलब???

मतलब समुद्र का वह इलाका जो ना भारत का है ना बांग्लादेश का।


अच्छा अच्छा!

तो बिना इन्टरनेट, बिना मोबाइल नेटवर्क के हम सब रहे। एक नहीं, दो नहीं बहुत सारी घटनाएँ यादों में समेट कर हम सब वापस लौटे हैं। हमें बांग्लादेश सरकार से 25 रेंजर मिले हुए थे जो रोज़ तीन-चार राउण्ड गोलियाँ हवा में चलाकर ख़ूंखार जानवरों को हमारे शूटिंग्‍ के इलाके से दूर भगाया करते थे। एक दिन जब हम बंगाल की खाड़ी में शूट कर रहे थे, कैमरा टीम का एक सदस्य बोट से नीचे समन्दर में गिर गया। उसे तैरना भी नहीं आता था। पर वहाँ मौजूद एक स्थानीय नाविक ने तुरन्त पानी में छलाँग मार कर उन्हें बचा लिया। हम सब बहुत डर गए थे और उस बांग्लादेशी नाविक को धन्यवाद दिया। उन स्थानीय नाविकों ने हमारा पूरा-पूरा साथ दिया और कई बार ऐसे मुश्किल की घड़ियों में हमारी नैया को किनारे लगाया। ना उन्हें हिन्दी आती थी और ना हमें बांग्ला, पर एक दूसरे की बात परस्पर पहुँचाने में मुश्किल नहीं हुई। यूनिट के सभी लोग रोज़ अपने पाँव डीज़ल से धोया करते थे क्योंकि कीचड़ और कीटों के बीच शूटिंग करने से कोई न कोई इन्फ़ेक्शन हो ही जाता था। और शूट के अन्तिम दिन में तो एक क्रूज़ पर आग ही लग गई। क़िस्मत अच्छी थी कि हमारी टीम, कैमरे और अन्य सामान सब सुरक्षित थे और हम सब आसपास ही थे, इसलिए जल्द से जल्द आग पर काबू पा लिया गया। अगर हम जंगल के अन्दर शूटिंग कर रहे होते तो बहुत ज़्यादा नुक्सान हो सकता था। उस जहाज़ में रहने वाले यूनिट के सदस्यों को एक होटल में पहुँचाया गया और कुछ को तो अस्पताल में भर्ती करवा कर ऑक्सीज़न भी देना पड़ा। हम सब मिल कर अस्पताल गए, और अगले ही दिन हम भारत के लिए रवाना हो गए।


वाक़ई बड़ा हादसा होते होते बचा। अच्छा यह बताइए कि क्या रात को भी शूटिंग होती थी?

जी नहीं, हम सुबह 4 बजे से शाम 4 बजे तक लगभग 5 सप्ताह तक शूटिंग करते रहे। रात को शूटिंग करना खतरे से खाली नहीं था। मतलब दिन में जंगल के अन्दर, और रातों को समन्दर में। भाटे के वक़्त जब हमारे 15 छोटे-छोटे नाव कीचड़ में फँस जाते थे तब यूनिट को घंटों ज्वार का इन्तज़ार करना पड़ता समन्दर के बीच खड़े जहाज़ों तक पहुँचने के लिए। ऐसे में समय निकालने के लिए हम गाना गाते, नकल उतारते, चुटकुले सुनाते।


आपके साथ कोई हादसा हुआ?

एक बार मेरे दाहिने हाथ में चोट लग गई थी, जिसकी वजह से एक सीन में मैंने हाथों को फ़ोल्ड कर रखा था ताकि उस पर लगा बैंडेज दिखाई न दे। अन्तिम दिन के शूट के दौरान मेरी दाहिने आँख में भी चोट लग गई। वापस लौट कर अपने शहर लखनऊ में एक छोटा सा ऑपरेशन करवाना पड़ा। 


वहाँ पर यूनिट में कोई डॉक्टर नहीं था?

जी हाँ, डॉक्टर थे, और वो निरन्तर पूरी यूनिट को फ़र्स्ट-ऐड देने में दिन-रात जुटे रहते थे।


और कोई याद जो आप बताना चाहें?

शूटिंग खतम हो जाने के बाद हम सब इतने ख़ुश थे कि हमने अचानक यह तय किया कि हम अपने जहाज़ों के साथ रेस खेलेंगे। तो हम सब नारे लगाते हुए विशाल समन्दर में रेस लगाई और जैसे एक असम्भव को सम्भव बनाने का जो आनन्द है उसे सेलिब्रेट किया। वहाँ मौजूद सैलानी हमें देख रहे थे और अचम्भित हो रहे थे।


वाह! प्रणय जी, अभी हाल ही में इस फ़िल्म का ट्रेलर जारी हुआ है सलमान ख़ान के कर-कमलों से। 

यह जैसे एक सपना था मेरे लिए जब सलमान ख़ान ने 'रोर...' का थिएट्रिकल ट्रेलर लौंच किया। मैं बचपन से उनका डाइ-हार्ड फ़ैन रहा हूँ और सदा उनके डान्स के स्टेप्स और तौर-तरीकों को अपनाया है। इस ट्रेलर लौंच में जाकर मुझे लगा कि आइ ऐम बैक। 2002-07 के दौरान कालेज के स्टेज पर सैंकड़ों युवक-युवतियों की तालियाँ मैंने सुनी है, नोटिस बोर्ड पर अपनी तस्वीरें देखी हैं; और आज 2014 में 70mm स्क्रीन, नामी फ़िल्म-जगत की हस्तियाँ, मीडिया, हज़ारों कैमरों की चकाचौंध, दुनिया भर के लाखों-करोड़ों दर्शकों की यू-ट्यूब पर सराहना, अखबारों के मुख्य-पृष्ठ पर ज़िक्र, मुझ पर यकीनन ईश्वर की कृपा है, बस यही कह सकता हूँ।


ज़रूर ज़रूर, और प्रणय जी, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ से और हमारी तरफ़ से भी इस अनोखी और रोमांचक फ़िल्म की सफलता के लिए शुभकमानाएँ आपको देते हैं। फ़िल्म जगत में इस फ़िल्म से आपकी यात्रा शुरू हो रही है, आगे भी आप ढेर सारी फ़िल्मों में अभिनय करें, सफल हों जीवन में, यही ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।


सुजॉय जी, मैं तहे दिल से आपका और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जो इतने अच्छे-अच्छे सवाल आपने मुझसे पूछे और मुझे पूरी दुनिया के सामने पेश होने का मौका दिया। आपके इन सवालों के माध्यम से मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी को सबके सामने रख पाया और मुझे बेहद अच्छा लगा। आपको और आपकी टीम को भी बहुत शुभकामनाएँ।



यह अगले सप्ताह प्रदर्शित होने वाली फिल्म 'रोर - टाइगर ऑफ सुन्दरवन' के अभिनेता प्रणय दीक्षित से सुजॉय चटर्जी की अन्तरंग बातचीत के सम्पादित अंश की प्रस्तुति है। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अभिनेता प्रणय दीक्षित को शुभकामना सन्देश भी भेज सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है - radioplaybackindia@live.com  


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
 सम्पादक : कृष्णमोहन मिश्र



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नए साल 2015 में शनिवार के नियमित स्तम्भ रूप में आप कौन सा स्तम्भ पढ़ना सबसे ज़्यादा पसन्द करेंगे?

1.  सिने पहेली (फ़िल्म सम्बन्धित पहेलियों की प्रतियोगिता)

2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


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