Showing posts with label anvita dutt guptan. Show all posts
Showing posts with label anvita dutt guptan. Show all posts

Thursday, May 3, 2018

चित्रकथा - 66: हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-3)

अंक - 66

हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-3)

"उतरा ना दिल में कोई उस दिलरुबा के बाद..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! फ़िल्म जगत एक ऐसा उद्योग है जो पुरुष-प्रधान है। अभिनेत्रियों और पार्श्वगायिकाओं को कुछ देर के लिए अगर भूल जाएँ तो पायेंगे कि फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में ना के बराबर रही हैं। जहाँ तक फ़िल्मी गीतकारों और संगीतकारों का सवाल है, इन विधाओं में तो महिला कलाकारों की संख्या की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। आज ’चित्रकथा’ में हम एक शोधालेख लेकर आए हैं जिसमें हम बातें करेंगे हिन्दी फ़िल्म जगत के महिला गीतकारों की, और उनके द्वारा लिखे गए यादगार गीतों की। पिछले अंक में इस लेख का दूसरा भाग प्रस्तुत किया गया था, आज प्रस्तुत है इसका तीसरा और अंतिम भाग।



Rani Malik
’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ की दूसरी कड़ी माया गोविंद पर जा कर समाप्त हुई थी। 90 के दशक में माया गोविंद के अलावा जिन महिला गीतकार ने अपने सुपरहिट गीतों से धूम मचाई, वो हैं रानी मलिक। 1990 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म रही ’आशिक़ी’, जिसे फ़िल्म संगीत की प्रचलित धारा को मोड़ने वाली trend-setter फ़िल्म मानी जाती है। इस फ़िल्म से समीर और नदीम-श्रवण कामयाबी की बुलन्दी पर पहुँच गए थे। इसी फ़िल्म के चार गीतों में समीर के साथ रानी मलिक ने भी अपना सहयोग दिया। ये चार गीत हैं - "धीरे धीरे से मेरी ज़िन्दगी में आना...", "तू मेरी ज़िन्दगी है, तू मेरी हर ख़ुशी है...", "अब तेरे बिन जी लेंगे हम, ज़हर ज़िन्दगी का पी लेंगे हम", और "मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में..."। अपनी पहली ही फ़िल्म में इस ज़बरदस्त कामयाबी के चलते रानी मलिक को फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा। पुरुष-प्रधान इस क्षेत्र में वो अपनी गीत लेखन का लोहा मनवाती चली गईं। अगले एक दशक तक रानी मलिक के कलम से बहुत से सुपरहिट गीत निकले - "छुपाना भी नहीं आता, बताना भी नहीं आता" (बाज़ीगर), "तेरे चेहरे पे मुझे प्यार नज़र आता है" (बाज़ीगर), "चुरा के दिल मेरा गोरिया चली" (मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी), "दिल में है तू, धड़कन में तू" (दावा), "चोरी चोरी दिल तेरा चुराएंगे" (फूल और अंगार), "तुमसे मिलने को दिल करता है रे बाबा" (फूल और कांटे), "हम लाख छुपाएँ प्यार मगर दुनिया को पता चल जाएगा" (जान तेरे नाम), "मैंने ये दिल तुमको दिया" (जान तेरे नाम), "एक नया आसमाँ, आ गए दो दिल जहाँ" (छोटे सरकार), "उतरा ना दिल में कोई उस दिलरुबा के बाद" (उफ़ ये मोहब्बत), "मेले लगे हुए हैं हसीनों के शहर में" (हक़ीक़त)। बाबुल बोस के संगीत में 1998 की फ़िल्म ’मेहन्दी’ के सभी गीत रानी मलिक ने लिखे। नायिका प्रधान इस फ़िल्म के लिए महिला गीतकार का चुनाव अर्थपूर्ण था। फ़िल्म के ना चलने से इसके गीतों की तरफ़ ज़्यादा ध्यान लोगों का नहीं गया, लेकिन अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "बाबा की बिटिया हुई परायी" को सुनते हुए आँखों में पानी ज़रूर आ जाते हैं। परवीन सुलताना की आवाज़ में 1993 की फ़िल्म ’अनमोल’ का गीत "कोई इश्क़ का रोग लगाये ना" भी रानी मलिक की एक उल्लेखनीय रचना मानी जाएगी। फ़िल्मी गीतों की बढ़ती व्यावसायिक्ता के चलते रानी मलिक को भी कई चल्ताऊ क़िस्म के गाने लिखने पड़े। "एक चुम्मा तू मुझको उधार देइ दे" (छोटे सरकार), "तु रु रु तु रु रु, कहाँ से करूँ मैं प्यार शुरू" (ऐलान), "मेरी पैंट भी सेक्सी" (दुलारा) जैसे गीत इसके कुछ उदाहरण हैं। रानी मलिक अब भी सक्रीय हैं, और इसी वर्ष 2018 में ’उड़न छू’ नामक फ़िल्म में गीत लिख रही हैं।

Ila Arun
इला अरुण एक ऐसी कलाकार हैं जो बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। राजस्थानी लोक-संगीत को आधुनिक रूप देकर देश-विदेश में लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हें तो जाता ही है, साथ ही अपने अभिनय, गायन, संगीत और लेखनी से उन्होंने अपने लिए एक अलग मुकाम हासिल किया है। हालाँकि उनके अधिकतर गीत प्राइवेट ऐल्बमों के लिए ही लिखे हुए हैं, कुछ हिन्दी फ़िल्मों में भी उनके लिखे गीत सुनाई पड़े हैं। 1986 में महेश भट्ट निर्देशित एक कलात्मक फ़िल्म आई थी ’आशियाना’। मार्क ज़ुबेर, दीप्ति नवल, सोनी राज़दान अभिनीत इस फ़िल्म में जगजीत सिंह - चित्रा सिंह ने संगीत दिया था। फ़िल्म के कुल चार गीतों में से एक गीत इला अरुण का लिखा था। इला अरुण की ही आवाज़ में यह गीत "याद क्यों तेरी मुझे सतावे" रिकॉर्ड हुआ। वैसे इसी फ़िल्म में मदन पाल का लिखा एक गीत भी था "जवानी रे" जिसे इला अरुण और आनन्द कुमार ने गाया था। 1999 में आई थी फ़िल्म ’भोपाल एक्सप्रेस’ जिसमें नसीरुद्दीन शाह, के के मेनन और ज़ीनत अमान जैसे कलाकार थे। शंकर-अहसान-लॉय के संगीत में फ़िल्म के छह गीत छह अलग अलग गीतकारों ने लिखे - फ़ैयाज़ हाशमी, नासिर काज़मी, पीयूष झा, प्रसून जोशी, सागरिका और इला अरुण। इला अरुण का लिखा व उन्हीं का गाया "उड़न खटोलना" एक राजस्थानी लोक संगीत आधारित रचना है। "तेरा उड़न खटोलना रे बालमा, तेरा लाल सा बंगला देख के दौड़त चली आई रे बालमा" दरसल ऋतुओं पर आधारित लोक गीत है, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर प्रदेश में ’बारामासा’ गाया जाता है। इस गीत के तीन अन्तरों में गर्मी, वर्षा और सर्दी का वर्णन है। गीत के अन्त में शास्त्रीय संगीत का ताल गायन भी है। शास्त्रीयता की छाया लिए यह लोक गीत यकीनन लीक से हट कर गीत है जिसे सुनने का अपना अलग मज़ा है। 2010 में श्याम बेनेगल की फ़िल्म आई थी ’वेल डन अब्बा’। शान्तनु मोइत्र के संगीत में फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में से तीन गीत लिखे अशोक मिश्र ने, और एक-एक गीत स्वानन्द किरकिरे और इला अरुण ने लिखे। डैनिएल बी. जॉर्ज और इला अरुण की आवाज़ में वह गीत है "ओ मेरी बन्नो होशियार, साइकिल पे सवार, चली जाती सिनेमा देखने को..."। बड़ा ही मज़ेदार गीत है जो शादी के मौके पर गाया जा रहा है, और ख़ास बात यह कि फ़िल्म के परदे पर भी चश्मा पहनी इला अरुण ही नज़र आती हैं। इला अरुण के गीतों की यह ख़ासियत रही है कि उनके गीत हमेशा रंगीन और असरदार होते हैं, जिन्हें सुन कर हमेशा एक "feel good" और एक "positive feeling" का अहसास होता है। अपनी ख़ास आवाज़ और अभिनय का अपना अलग अंदाज़ इला अरुण को भीड़ से अलग करती है।

Anvita Dutt Guptan
वर्तमान दशक में महिला गीतकारों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जो अच्छा ख़ासा काम कर रही हैं पुरुष गीतकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए। 20 फ़रवरी 1972 को जन्मीं अनविता दत्त गुप्तन एक गीतकार होने के साथ-साथ फ़िल्मों के संवाद, पटकथा, और कहानी लेखन में भी सक्रीय हैं। आदित्य चोपड़ा के ’यश राज फ़िल्म्स’ और करण जोहर के ’धर्मा प्रोडक्शन्स’ की अग्रणी लेखकों में एक हैं अनविता। पिता भारतीय वायु सेना में कार्यरत होने की वजह से अनविता देश के कई हिस्सों में रहीं जैसे कि हिंडन, गुवाहाटी, जोधपुर, सहारनपुर आदि। विज्ञापन जगत में चौदह वर्ष काम करने के बाद जानीमानी संवाद लेखिका रेखा निगम ने अनविता का परिचय आदित्य चोपड़ा से करवाया, और इस तरह से आदित्य ने उन्हें पहला मौका दिया 2005 की फ़िल्म ’नील ऐन्ड निक्की’ में संवाद और गीत लिखने का। इस फ़िल्म में उनका लिखा "मैं शायद चार साल का था" उनका लिखा पहला फ़िल्मी गीत है जिसे काफ़ी लोकप्रियता मिली थी। 2008 में ’बचना ऐ हसीनों’ फ़िल्म में उनका लिखा "ख़ुदा जाने के मैं फ़िदा हूँ" ज़बरदस्त कामयाब गीत रहा और साल के शीर्ष के गीतों में शामिल हुआ। 2012 में करण जोहर की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’Student of the Year’ में गीत लिख कर अनविता एक नए मुकाम पर पहुँचे। वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा की पहली फ़िल्म के रूप में यह फ़िल्म ज़बरदस्त हिट रही और फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाई। "इश्क़ वाला लव", "राधा ऑन दि डान्स फ़्लोर", "रट्टा मार", "अस्सी वेले सब वेले" जैसे नए ज़माने के गीतों ने युवा पीढ़ी पर राज किया। फ़िल्म ’क्वीन’ का "लंदन ठुमकदा" हो या ’पटियाला हाउस’ का "लौंग दा लश्कारा" हो, या फिर ’दोस्ताना’ का "जाने क्यों", अनविता के ये तमाम गीत लोगों की ज़बान पर ऐसे चढ़े कि देर तक बने रहे। अनविता दत्त गुप्तन के लिखे गीत कई फ़िल्मों में आ चुके हैं जिनमें शामिल हैं ’अनजाना अनजानी’, ’मुझसे फ़्रेन्डशिप करोगे’, ’तीस मार खान’, ’प्यार इम्पॉसिबल’, ’कहानी’, ’लक’, ’टशन’, ’बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप’, ’कमबख़्त इश्क़’, ’बदमाश कंपनी’, ’एक था टाइगर’, ’गोरी तेरे प्यार में’, ’शानदार’, ’I Hate Luv Storys’, और ’Bang Bang'। वर्ष 2017 में फ़िल्म ’फिल्लौरी’ में उनका लिखा "साहिबा" गीत काफ़ी चर्चित हुआ और इस गीत के लिए उन्हें ’मिर्ची म्युज़िक अवार्ड्स’ के तहत ’सर्वश्रेष्ठ गीतकार’ के पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। 2014 में भी ’मिर्ची म्युज़िक अवार्ड्स’ के तहत फ़िल्म ’क्वीन’ के गीतों को ’ऐल्बम ऑफ़ दि यीअर’ के लिए नामांकन मिला था। फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कारों में 2015 में फ़िल्म ’क्वीन’ के संवाद के लिए और 2016 में फ़िल्म ’गुलाबो’ के गीत के लिए उन्हें नामांकन मिला था। अनविता दत्त गुप्तन गीत लेखन के साथ-साथ संवाद और पटकथा भी लिख रही हैं, और इस तरह से इस दौर की फ़िल्मों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। आने वाले समय में उनसे और अर्थपूर्ण फ़िल्मों और गीतों की उम्मीदें की जा सकती हैं।

Kausar Munir
वर्तमान फ़िल्म गीतकारों में एक जानामाना नाम है कौसर मुनीर। मुंबई में जन्मीं कौसर ने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक करने के बाद वो मीडिया से जुड़ीं और कुछ शोध कार्य करने लगीं। गीत-संगीत से उन्हें बचपन से ही लगाव था। बतौर लेखिका, उनका सफ़र टेलीविज़न से शुरू हुआ था धारावाहिक ’जस्सी जैसी कोई नहीं’ से। इसके बाद फ़िल्म ’टशन’ में उनका लिखा गीत "फ़लक तक चल साथ मेरे" की सफलता ने उन्हें कई और फ़िल्मों में गीत लिखने के मौके हासिल करवाए। ’इशकज़ादे’, ’एक था टाइगर’, ’धूम 3’, ’बजरंगी भाईजान’ और ’डियर ज़िन्दगी’ जैसी फ़िल्मों में गीत लिखते हुए कौसर मुनीर ने हर बार अपने आप को सिद्ध किया है। उनकी अंग्रेज़ी क्षमता को देखते हुए फ़िल्म ’इंगलिश विंगलिश’ के लिए उन्हें ’language consultant’ के रूप में लिया गया था। फ़िल्म ’यंगिस्तान’ में उनका लिखा "सुनो ना संगेमरमर" ख़ूब लोकप्रिय हुआ था। कौसर मुनीर का मानना है कि वो कभी भी गीतकार बनने नहीं आई थीं, इसलिए इस विधा में उनका कोई प्रेरणास्रोत नहीं हैं, लेकिन वो गुलज़ार साहब की बहुत बड़ी फ़ैन हैं। चाहे "इशकज़ादे" हो या "तेरा ध्यान किधर है", "परेशान" हो या "संगेमरमर", "भर दो झोली मेरी या मुहम्मद" हो या "माशा-अल्लाह", कौसर मुनीर के गीत लगातार चार्टबस्टर्स रहे हैं। एक साक्षात्कार में कौसर मुनीर साफ़ बताती हैं कि वो कभी भी सस्ते आइटम गीत नहीं लिखेंगी, फिर चाहे उन्हें काम मिले या ना मिले। साथ ही वो बताती हैं कि हमारे फ़िल्म जगत में आज के दौर में गीत लेखन के क्षेत्र में पुरुष और महिला में कोई भेदभाव नहीं है, और उन्हें उनके काम के लिए पूरा पूरा क्रेडिट मिलता है। कौसर मुनीर के गीतों से सजी कुछ और फ़िल्में हैं ’हीरोपन्ती’, ’चश्म-ए-बद्दूर’, ’बुलेट राजा’, ’मैं तेरा हीरो’, ’जय हो’, ’गोरी तेरे प्यार में’, ’दावत-ए-इश्क़’, ’तेवर’, ’राज़ रीबूट’, और ’नौटंकी साला’। आने वाले समय में कौसर मुनीर से और भी बहुत से अच्छे गीतों की उम्मीदें की जा सकती हैं।


Priya Saraiya, Jasleen Royal, Sneha Khanwalkar, Sangeeta Pant, Hard Kaur

प्रिया सरैया ना केवल आज के दौर की एक जानीमानी पार्श्वगायिका हैं, बल्कि वो एक गीतकार भी हैं। पलक शाह के नाम से जन्मीं प्रिया छह वर्ष की आयु से गाना सीखना शुरू किया और गंधर्व महाविद्यालय मुंबई से शास्त्रीय गायन की तालीम हासिल की। उन्होंने प्रिया पांचाल के नाम से अपने करीअर की शुरुआत की, आगे चल कर संगीतकार जिगर सरैया (सचिन-जिगर जोड़ी वाले) से विवाह के पश्चात वो बन गईं प्रिया सरैया। प्रिया ने अपना प्रशिक्षण Trinity College of London से पूरा किया। बतौर पार्श्वगायिका, उन्हें पहला ब्रेक मिला 2011 में। इस साल उनका लिखा ’Shor in the City' फ़िल्म का "साइबो" गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। इसी साल फ़िल्म ’ये दूरियाँ’ में उनका लिखा शीर्षक गीत भी मशहूर हुआ था। इस सफलता के चलते उन्हें 2012 की दो फ़िल्मों - ’अजब ग़ज़ब लव’ और ’तेरे नाल लव हो गया’ में गीत लिखने के मौके मिले। 'ABCD 2' फ़िल्म में उन्होंने दो गीत लिखे और गाए - "सुन साथिया" और "बेज़ुबान फिर से"। इन गीतों की ख़ूब प्रशंसा हुई थी। हाल में उन्होंने संजय दत्त अभिनीत फ़िल्म ’भूमि’ और कंगना रनौत अभिनीत फ़िल्म ’सिमरन’ में गीत लिखे हैं। अपनी आवाज़ और कलम के जादू से प्रिया सरैया लगातार अपने करिअर में ऊपर चढ़ रही हैं। उनके लिखे गीतों से सजी कुछ और उल्लेखनीय फ़िल्मों के नाम हैं - ’रमैया वस्तावैया’, ’बदलापुर’, ’हैप्पी एन्डिंग्’, ’ए फ़्लाइंग् जट’, ’जयन्तभाई की लवस्टोरी’, ’जीना जीना’, ’गो गोवा, गॉन’, ’मुंबई दिल्ली मुंबई’, आदि। जसलीन कौर रॉयल (जसलीन रॉयल) एक स्वतंत्र गायिका, गीतकार और संगीतकार हैं जो पंजाबी, हिन्दी और अंग्रेज़ी में गाती हैं। 2013 में पंजाबी के जानेमाने कवि शिव कुमार बटालवी की कविता "पंछी हो जावा" को कम्पोज़ कर और गा कर जसलीन ने MTV Video Music Awards India 2013 में Best Indie Song का पुरस्कार जीता था। लुधियाना के Sacred Heart Convent School से स्कूली शिक्षा पूरी कर जसलीन दिल्ली चली गईं आगे की पढ़ाई के लिए। हिन्दी कॉलेज से B.Com पूरी करने के बाद वो 2009 में India's Got Talent में भाग लिया और सेमी-फ़ाइनल तक पहुँची। एक साथ कई वाद्य यंत्र बजाने की क्षमता पूरे देश ने देखा इस शो के माध्यम से। उस शो के जज सोनाली बेन्द्रे, किरन खेर और शेखर कपूर ने उन्हें 'one woman band' कह कर संबोधित किया था। जसलीन एक साथ गिटार, माउथ ऑरगन और टैम्बुरिन बजा लेती हैं गाते हुए। की-बोर्ड पर भी उन्हें महारथ हासिल है। कई और टीवी शोज़ में कामयाबी हासिल करने के बाद 2014 जसलीन को सोनम कपूर - फ़वाद ख़ान अभिनीत फ़िल्म ’ख़ूबसूरत’ में "प्रीत" गाने का मौका मिला, जिसे लिखा अमिताभ वर्मा ने और स्वरबद्ध किया स्नेहा खनवलकर ने। जसलीन के लिखे गीत जिन फ़िल्मों में सुनाई दिए हैं, उनमें शामिल हैं ’बार बार देखो’, ’हरामखोर’, ’शिवाय’, ’फिल्लौरी’, ’फ़ुकरे रिटर्न्स’ और ’हिचकी’। स्नेहा खनवलकर आज के दौर की एक जानीमानी महिला संगीतकार हैं। लेकिन अपनी कुछ फ़िल्मों में संगीत के साथ-साथ उन्होंने गीत लेखन में भी हाथ आज़माया है। ’ख़ूबसूरत’ फ़िल्म में ही उनका लिखा "माँ का फ़ोन" को काफ़ी सराहा गया है। इसके अलावा ’सिंह इज़ ब्लिंग्’, ’लव सेक्स और धोखा’, और ’डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’ में उन्होंने कुछ गीत लिखे हैं। इसी तरह से पंजाबी हिप-हॉप गायिका और रैपर हार्ड कौर ने भी कुछ गीतों के लिए बोल लिखे हैं। पहली बार उन्हें यह मौका 2009 की फ़िल्म ’अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी’ में मिला। प्रीतम के संगीत में उन्होंने "फ़ॉलो मी, लक नु हिला दे" लिखा और ख़ुद गाया। 2012 की फ़िल्म ’रश’ में आशिष पंडित और ऐश किंग् के साथ मिल कर हार्ड कौर ने एक गीत लिखा "होते होते जाने क्या हो गया" जिसे ऐश किंग् और हार्ड कौर ने गाया। 2015 में ’कागज़ के फ़ूल्स’ नामक फ़िल्म की संगीतकार थीं संगीता पंत। इस फ़िल्म के कुल तीन गीतों में से दो गीत उन्हीं के लिखे हुए थे - तोचि रैना की आवाज़ में "लफ़ड़ा पड़ गया" और उनकी ख़ुद की आवाज़ में "नशा है जाम का"। संगीता भी बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। 2012 की फ़िल्म ’गांधी की ज़मीन पर’ में उन्होंने ना केवल संगीत दिया बल्कि अभिनय भी किया। 2011 की फ़िल्म ’रेडी’ में वो बतौर पार्शगायिका गीत गा चुकी हैं। महिला गीतकारों की यह जो नई पौध फ़िल्म जगत में धीरे धीरे नया मुकाम हासिल कर रही है, इससे यही लगता है कि आने वाले समय में और भी महिलाएँ फ़िल्मी गीतकारिता के क्षेत्र में क़दम रखेंगी, और जो रवायत जद्दनबाई जैसी फ़िल्म इतिहास के पहले दौर की महिलाओं ने शुरू की थी, उसे आज के दौर की महिलाएँ आगे बढ़ाएंगी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, September 7, 2010

अंजाना अंजानी की कहानी सुनाकर फिर से हैरत में डाला है विशाल-शेखर ने.. साथ है गीतकारों की लंबी फ़ौज़

ताज़ा सुर ताल ३४/२०१०

विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' में आज उस फ़िल्म की बारी जिसकी इन दिनों लोग, ख़ास कर युवा वर्ग, बड़ी बेसबरी से इंतज़ार कर रहे हैं। रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा अभिनीत फ़िल्म 'अंजाना अंजानी', जिसमें विशाल शेखर के संगीत से लोग बहुत कुछ उम्मीदें रखे हुए हैं।

सुजॊय - और अक्सर ये देखा गया है कि जब इस तरह के यूथ अपील वाले रोमांटिक फ़िल्मों की बारी आती है, तो विशाल शेखर अपना कमाल दिखा ही जाते हैं। और इस फ़िल्म के निर्देशक सिद्धार्थ आनंद हैं जिनकी पिछली तीन फ़िल्मों - सलाम नमस्ते, ता रा रम पम, बचना ऐ हसीनों - में विशाल शेखर का ही संगीत था, और इन तीनों फ़िल्मों के गानें हिट हुए थे।

विश्व दीपक - ये तीनों फ़िल्में, जिनका ज़िक्र आपने किया, ये यश राज बैनर की फ़िल्में थीं, लेकिन 'अंजाना अंजानी' के द्वारा सिद्धार्थ क़दम रख रहे हैं यश राज के बैनर के बाहर। यह नडियाडवाला की फ़िल्म है, और इस बैनर ने भी 'हाउसफ़ुल', 'हे बेबी', 'कमबख़्त इश्क़' और 'मुझसे शादी करोगी' जैसी कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में दी हैं। इसलिए 'अंजाना अंजानी' से लोगों की बहुत उम्मीदें हैं।

सुजॊय - विशाल शेखर की पिछली फ़िल्म थी 'आइ हेट लव स्टोरीज़'। फ़िल्म तो ख़ास नहीं चली, लेकिन फ़िल्म के गानें पसंद किए गए और उन्हें हिट का दर्जा दिया जा चुका है। देखते हैं 'अंजाना अंजानी' उससे भी आगे निकल पाते हैं या नहीं। 'अंजाना अंजानी' की बातें आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत - "अंजाना अंजानी की कहानी"।

गीत - अंजाना अंजानी की कहानी


विश्व दीपक - निखिल डी'सूज़ा और मोनाली ठाकुर की आवाज़ों में यह गाना था। इस गीत के बारे में कम से कम शब्दों में अगर कुछ कहा जाए तो वो है 'पार्टी मटिरीयल'। गीटार, ड्रम्स, ब्रास, रीदम, और गायन शैली, सब कुछ मिलाकर ७० के दशक के "पंचम" क़िस्म का एक डान्स नंबर है यह, जो आपकी क़दमों को थिरकाने वाला है अगले कुछ दिनों तक। हिंग्लिश में लिखा हुआ यह गीत नीलेश मिश्रा के कलम से निकला हुआ है। निखिल और मोनाली, दोनों ही नए दौर के गायक हैं। मोनाली ने इससे पहले फ़िल्म 'रेस' में "ज़रा ज़रा टच मी" और 'बिल्लू' में "ख़ुदाया ख़ैर" जैसे हिट गीत गा चुकी हैं। आज कल वो 'ज़ी बांगला' के 'स रे गा मा पा लिट्ल चैम्प्स' शो की जज हैं।

सुजॊय - और इस गीत में विशाल शेखर की शैली गीत के हर मोड़ पे साफ़ झलकती है। और अब 'अंजाना अंजानी' के टीम मेम्बर्स के नाम। साजिद नडियाडवाला निर्मित और सिद्धार्थ राज आनंद निर्देशित इस फ़िल्म में रणबीर और प्रियंका के अलावा ज़ायेद ख़ान ने भी भूमिका अदा की है। संगीतकार तो बता ही चुके है, गानें लिखे हैं नीलेश मिश्रा, विशाल दादलानी, शेखर, अमिताभ भट्टाचार्य, अन्विता दत्तगुप्तन, कुमार , इरशाद कामिल और कौसर मुनीर। और गीतकारों की तरह गायकों की भी एक पूरी फ़ौज है इस फ़िल्म के साउण्डट्रैक में - निखिल डी'सूज़ा, मोनाली ठाकुर, लकी अली, शेखर, कारालिसा मोण्टेरो, मोहित चौहान, श्रुति पाठक, विशाल दादलानी और शिल्पा राव।

विश्व दीपक - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गीत सुना जाए लकी अली की आवाज़ में।

गीत - हैरत


सुजॊय - पहले गीत ने जिस तरह से हम सब के दिल-ओ-दिमाग़ के तारों को थिरका दिया था, "हैरत" की शुरुआत तो कुछ धीमी लय में होती है, लेकिन एक दम से अचानक इलेक्ट्रॊनिक गीटार की धुनें एक रॊक क़िस्म का आधार बन कर सामने आती है। लकी अली की आवाज़ बहुत दिनों के बाद सुनने को मिली, और कहना पड़ेगा कि ५१ वर्ष की आयु में भी उनकी आवाज़ में उतना ही दम अब भी मौजूद है। 'सुर' और 'कहो ना प्यार है' में उनके गाए गानें सब से ज़्यादा मशहूर हुए थे, हालाँकि उन्होंने कई और फ़िल्मों में भी गानें गाए हैं।

विश्व दीपक - इस गीत को लिखा था ख़ुद विशाल दादलानी ने, और अच्छा लिखा है। इससे पहले भी वे कई गानें लिख चुके हैं। विशाल के बोल और लकी अली की आवाज़ के कॊम्बिनेशन का यह पहला गाना है, शायद इसी वजह से इस गीत में एक ताज़गी है। इस गीत के प्रोमो आजकल टीवी पर चल रहे हैं और इस गीत के फ़िल्मांकन को देख कर ऐसा लग रहा है कि इस गीत की तरह फ़िल्म भी दमदार होगी।

सुजॊय - तो कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि लकी अली और विशाल-शेखर की "हैरत" ने हमें "हैरत" में डाल दिया है। और इस गीत से जो नशा चढ़ा है, उसे बनाए रखते हुए अब सुनते हैं तीसरा गीत राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में। एक और बेहतरीन गायक, एक और बेहतरीन गीत।

गीत - तू ना जाने आस-पास है ख़ुदा


विश्व दीपक - आजकल राहत साहब एक के बाद एक फ़िल्मी गीत गाते चले जा रहे हैं और कामयाबी की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। उनका गाया हर गीत सुनने में अच्छा लगता है। अभी पिछले ही दिनों फ़िल्म 'दबंग' में उनका गाया "तेरे मस्त मस्त दो नैन" आपको सुनवाया था, और आज ये गीत आप सुन रहे हैं। लेकिन एक बात ज़रूर खटकती है कि राहत साहब से हर संगीतकार एक ही तरह के गीत गवा रहे हैं। ऐसे तो भई राहत साहब बहुत जल्दी ही टाइपकास्ट हो जाएँगे!

सुजॊय - हाँ, और हमारे यहाँ लोग आजकल की फ़ास्ट ज़िंदगी में किसी एक चीज़ को बहुत ज़्यादा दिनों तक पसंद नहीं करते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि राहत फ़तेह अली ख़ान अपनी मौलिकता को बनाए रखते हुए अलग अलग तरह के गीत गाएँ, तभी वो एक लम्बी पारी फ़िल्म संगीत में खेल पाएँगे। इस गीत के बारे में यही कहेंगे कि एक टिपिकल "राहत" या "कैलाश खेर" टाइप का गाना है।

विश्व दीपक - सूफ़ी आध्यात्मिकता लिए हुए इस गीत को लिखा है विशाल दादलानी और शेखर रविजानी ने। इसी गाने का एक 'अनप्लग्ड' वर्ज़न भी है जिसमें श्रुति पाठक की आवाज़ भी मौजूद है। बहरहाल आइए सुनते हैं 'अंजाना अंजानी' का अगला गीत शेखर और कारालिसा मोण्टेरो की आवाज़ों में।

गीत - तुमसे ही तुमसे


सुजॊय- विशाल दादलानी और शेखर, दोनों अच्छे गायक भी हैं। जहाँ एक तरफ़ विशाल की आवाज़ में बहुत दम है, रॊक क़िस्म के गानें उनकी आवाज़ में ख़ूब जँचते हैं, उधर दूसरी तरफ़ शेखर की आवाज़ में है नर्मी। बहुत ही प्यारी आवाज़ है शेखर की और ये जो गीत अभी आपने सुना, उसमें भी उनका वही नरम अंदाज़ सुनने को मिलता है। कारालिसा ने अंग्रेज़ी के बोल गाए हैं और गीत की आख़िर में उनकी गायकी गीत में अच्छा इम्पैक्ट लाने में सफल रही है। कुल मिलाकर यह गीत एक कर्णप्रिय गीत है और मुझे तो बहुत अच्छा लगा।

विश्व दीपक - हाँ, और इस गीत में भी एक ताज़गी है और एक अलग ही मूड बना देता है। बस अपनी आँखें मूंद लीजिए और अपने किसी ख़ास दोस्त को याद करते हुए इस गीत का आनंद लीजिए। इस गीत के अंग्रेज़ी के बोल कारालिसा ने ख़ुद ही लिखे है। हिन्दी के बोल अन्विता दत्त गुप्तन और अमिताभ भट्टाचार्य की कलमों से निकले हैं। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं। श्रुति पाठक और मोहित चौहान की आवाज़ों में यह एक और ख़ूबसूरत गीत है इस फ़िल्म का - "तुझे भुला दिया फिर", आइए सुनते हैं।

गीत - तुझे भुला दिया फिर


विश्व दीपक - एक हौंटिंग प्रील्युड के साथ गीत शुरु हुआ और श्रुति के गाए पंजाबी शब्द सुनने वाले के कान खड़े कर देते हैं। और ऐसे में मोहित की अनोखी आवाज़ (कुछ कुछ लकी अली के अंदाज़ की) आकर गीत को हिंदी में आगे बढ़ाती है। बिना रीदम के मुखड़े के तुरंत बाद ही ढोलक के ठोकों का सुंदर रीदम और कोरस के गाए अंतरे "तेरी यादों में लिखे जो...", इस गीत की चंद ख़ासियत हैं। यह तरह का एक्स्पेरीमेण्ट ही कह सकते हैं कि एक ही गीत में इतने सारे अलग अलग प्रयोग। कुल मिलाकर एक सुंदर गीत।

सुजॊय - जी हाँ, ख़ास कर धीमी लय वाले मुखड़े के बाद इंटरल्युड में क़व्वाली शैली के ठेके और कोरस का गायन एक तरह का फ़्युज़न है क़व्वाली और आधुनिक गीत का। आपको बता दें कि इस गीत को विशाल दादलानी ने लिखा है, लेकिन क़व्वाली वाला हिस्सा लिखा है गीतकार कुमार ने। यह गीत सुन कर एक "फ़ील गुड" का भाव मन में जागृत होता है।

विश्व दीपक - "फ़ील गूड" की बात है, तो अब जो अगला गाना है उसके बोल ही हैं "आइ फ़ील गुड"। एक रॊक अंदाज़ का गाना है विशाल दादलानी और शिल्पा राव की आवाज़ों में, आइए इसे सुनते हैं।

गीत - आइ फ़ील गुड


सुजॊय - विशाल और शिल्पा के रॊक अंदाज़ से हम सभी वाकिफ़ हैं। वैसे शिल्पा से अब तक संगीतकार दबे हुए गीत ही गवाते आ रहे हैं, सिर्फ़ "वो अजनबी" ही एक ऐसा गीत था जिसमें उनकी दमदार आवाज़ सामने आई थी। "आइ फ़ील गुड" में भी उनकी आवाज़ खुल के बाहर आई है। और इसके बाद शायद अनुष्का मनचंदा की तरह उन्हें भी इस तरह के और गानें गाने के अवसर मिलेंगे।

विश्व दीपक - इस गीत को भी विशाल ने ही लिखा है, लेकिन अगर फ़ील गुड की बात करें तो पिछला गाना इससे कई गुना ज़्यादा बहतर था। ख़ैर, अब हम आ पहुँचे हैं आज के अंतिम गीत पर। और इसे भी विशाल और शिल्पा ने ही गाया है। "अंजाना अंजानी" फ़िल्म का एक और शीर्षक गीत, इस बार सॊफ़्ट रॊक शैली में, जिसे लिखा है कौसर मुनीर ने। वैसे इस गीत का मुखड़ा इरशाद कामिल ने लिखा है। सिद्धार्थ आनंद की हर फ़िल्म में इस क़िस्म का एक ना एक रोमांटिक युगल गीत ज़रूर होता है, जैसे 'सलाम नमस्ते' का "माइ दिल गोज़ म्म्म्म", 'ता रा रम पम' का "हे शोना", या फिर "ख़ुदा जाने" 'बचना ऐ हसीनों' का।

सुजॊय - भई मुझे तो इस गीत में "सदका किया" की छाप मिलती है। चलिए, जो भी है, गाना अच्छा है, अपने श्रोताओं को भी सुनवा देते हैं।

गीत - अंजाना अंजानी


सुजॊय - इन तमाम गीतों को सुनने के बाद फिर एक बार वही बात दोहराउँगा कि ये गानें कुछ ऐसे बनें हैं कि अगर फ़िल्म चल पड़ी तो ये गानें भी चलेंगे। और फ़िल्म पिट गई तो चंद रोज़ में ही ये भी गुमनामी में खो जाएँगे। 'बचना ऐ हसीनों' फ़िल्म नहीं चली थी, लेकिन "ख़ुदा जाने" गीत बेहद मक़बूल हुआ और आज भी सुना जाता है। लेकिन "ख़ुदा जाने" वाली बात मुझे इस फ़िल्म के किसी भी गाने में नज़र नहीं आई, लेकिन सभी गाने अपनी अपनी जगह पे अच्छे हैं। मुझे जो दो गीत सब से ज़्यादा पसंद आए, वो हैं "तुमसे ही तुमसे" और "तुझे भुला दिया फिर"। मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३ की रेटिंग, और 'अंजाना अंजानी' की पूरी टीम को इस फ़िल्म की कामयाबी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैं आपकी बातों से सहमत भी हूँ और असहमत भी। सहमत इसलिए कि मुझे भी वही दो गाने सबसे ज्यादा पसंद आए जो आपको आए हैं और असहमत इसलिए कि मुझे बाकी गाने भी अच्छे लगे इसलिए मेरे हिसाब से इस फिल्म के गाने इतनी आसानी से गुमनामी के गर्त में धंसेंगे नहीं। इस फिल्म के सभी गानों में विशाल-शेखर की गहरी छाप है, हर गाने में उनकी मेहनत झलकती है। इसलिए मैं अपनी तरफ़ से विशाल-शेखर को "डबल थंब्स अप" देते हुए आपके दिए हुए रेटिंग्स में आधी रेटिंग जोड़कर इसे साढे तीन बनाने की गुस्ताखी करने जा रहा हूँ। संगीतकार के बाद गीतकार की बात करते हैं। सच कहूँ तो मैंने और किसी फिल्म में गीतकारों की इतनी बड़ी फौज़ नहीं देखी थी। ७ गानों के लिए नौ गीतकार.. जबकि विशाल चार गीतों में खुद मौजूद हैं गीतकार की हैसियत से। मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि एक गीत तीन गीतकार मिलकर कैसे लिख सकते हैं। "तुमसे हीं तुमसे" के अंग्रेजी बोलों के लिए कारालिसा की जरूरत पड़ी, यह बात तो पल्ले पड़ती है, लेकिन यह बात मुझे अचंभित कर रही है कि बाकी बचे हिन्दी के कुछ लफ़्ज़ों के लिए अन्विता दत्त गुप्तन और अमिताभ भट्टाचार्य जैसे दिग्गज मैदान में उतर गए। "तुझे भुला दिया फिर" और "अंजाना अंजानी हैं मगर" ये दो ऐसे गीत हैं, जिनका मुखरा एक गीतकार ने लिखा है और अंतरे दूसरे ने.. ये क्या हो रहा है भाई? जहाँ कभी पूरी फिल्म के गाने एक हीं गीतकार लिखा करते थे, वहीं एक गीत में हीं दो-दो, तीन-तीन गीतकार .. तब तो कुछ दिनों में ऐसा भी हो सकता है कि एक-एक पंक्ति एक-एक गीतकार की हो.. एक गीतकार के लिए उससे बुरा क्षण क्या हो सकता है! अगर ऐसा हुआ तो हम जैसे भावी गीतकारों का भविष्य अधर में हीं समझिए :) खैर, कितने गीतकार रखने हैं और कितने संगीतकार- यह निर्णय तो निर्माता-निर्देशक का होता है.. हम कुछ भी नहीं कर सकते.. बस यही कर सकते हैं कि जितना संभव हो सके, अच्छे गाने चुनते और सुनते जाएँ। तो चलिए इन्हीं बातों के साथ हम आज की समीक्षा को विराम देते हैं। अगली बार हम एक लीक से हटकर एलबम के साथ हाज़िर होंगे.. नाम जानने के लिए आप अगली कड़ी का इंतज़ार करें।

आवाज़ रेटिंग्स: अंजाना अंजानी: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १००- कौसर मुनीर का लिखा वह कौन सा युगल गीत है जिस फ़िल्म में सैफ़ अली ख़ान थे और जिस गीत में एक आवाज़ महालक्ष्मी की है?

TST ट्रिविया # १०१- राहत फ़तेह अली ख़ान ने हिंदी फ़िल्म जगत में सन्‍ २००४ में क़दम रखा था और उस साल फ़िल्म 'पाप' में "लागी तुमसे मन की लगन" गीत मक़बूल हुआ था। इसी साल एक और फ़िल्म में भी उन्होंने गीत गाया था, बताइए उस फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # १०२- विशाल-शेखर के शेखर ने इससे पहले भी एक गीत गाया था जो परेश रावल पर फ़िल्माया गया था। क्या आप बता सकते हैं वह गीत कौन सा था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "कुछ मेरे दिल ने कहा" (तेरे मेरे सपने)
२. मधुश्री
३. 'पद्म शेशाद्री हायर सेकण्डरी स्कूल'।

एक बार फिर सीमा जी ने तीनों सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, June 1, 2010

बस प्यार का नाम न लेना, आइ हेट लव स्टोरीज़, यही गुनगुनाते आ पहुँचे हैं विशाल, शेखर, कुमार और अन्विता

ताज़ा सुर ताल २०/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के आज के अंक में आप सब का स्वागत है। विश्व दीपक जी, पिछले हफ़्ते फ़िल्म 'काईट्स' प्रदर्शित हुई, लेकिन आश्चर्य की बात रही कि फ़िल्म को वो लोकप्रियता हासिल नहीं हो सकी जिसकी उम्मीदें की गईं थी। ऐसा सुनने में आया है कि जिन लोगों को अंग्रेज़ी फ़िल्में देखने का शौक है, उन्हे यह फ़िल्म पसंद आई, लेकिन बॊलीवुड मसाला फ़िल्मों के दर्शकों को यह फ़िल्म ज़्यादा हज़म नहीं हुई। आपके क्या विचार हैं 'काइट्स' को लेकर?

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैंने अभी तक काईट्स देखी नहीं है, इसलिए कुछ भी कहने की हालत में नहीं हूँ। इस शनिवार देखने का विचार है, उसी के बाद अपने विचार जाहिर करूँगा। हाँ, लेकिन यह तो है कि ज्यादातर दर्शकों को फिल्म की कहानी में कुछ भी नया नज़र नहीं आया है, उन सब का कहना है कि ऋतिक रोशन का इस फिल्म के लिए ढाई साल का ब्रेक लेना हजम नहीं होता। वहीं मुझे एकाध ऐसे भी लोग मिले हैं जिन्हें यह फिल्म "फिल्मांकन" (सिनेमाटोग्राफी) के कारण पसंद आई है तो दो-चार ऐसे भी हैं जिन्हें बारबारा मोरी के अभिनय ने प्रभावित किया है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस फिल्म को इसी के हाईप (हद से ज्यादा प्रचार और उम्मीदों) से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।

सुजॊय - चलिए, हम काईट्स से आगे बढते हैं। आज हम जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं, उस फ़िल्म से भी लोगों की उम्मीदें हैं। और क्यों ना हो जब फ़िल्म करण जोहर के 'धर्मा प्रोडक्शन्स' के बैनर तले बन रही हो! जी हाँ, आज 'ताज़ा सुर ताल' में ज़िक्र 'आइ हेट लव स्टोरीज़' के संगीत की।

विश्व दीपक - इस फ़िल्म के संगीत की चर्चा तो हम करेंगे, लेकिन आपने ग़ौर किया है कि फ़िल्म के टाईटल को किस तरह से स्पेल किया गया है? 'I Hate Luv Storys' - जिस तरह से हम SMS में टाइप करते हैं, उसी शैली को अपनाया गया है, शायद टाईटल के ज़रिये भी आज के युवा वर्ग को आकर्षित करने का प्रयास हुआ है। ख़ैर, 'आइ हेट लव स्टोरीज़' में इमरान ख़ान और सोनम कपूर ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। मूलत: यह एक रोमांटिक कॊमेडी है जिसका निर्देशन किया है नवोदित निर्देशक पुनीत मल्होत्रा ने, जो मशहूर डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा के भतीजे हैं और जिन्होने पहले करण जोहर के सहायक के रूप में काम कर चुके हैं। यह फ़िल्म प्रदर्शित हो रही है २ जुलाई के दिन।

सुजॊय - इस फ़िल्म में संगीत है विशाल-शेखर का, और गानें लिखे हैं अन्विता दत्त गुप्तन, कुमार और विशाल दादलानी। विशाल-शेखर का ट्रैक-रिकार्ड अच्छा रहा है। 'ओम शांति ओम', ’दोस्ताना’ और 'बचना ऐ हसीनों' के हिट संगीत के बाद अब देखना है कि क्या उनका कमाल इस फ़िल्म में भी चलता है। वैसे काफ़ी यंग फ़िल्म है और म्युज़िक भी भी उसी अंदाज़ का है। तो सुनते हैं पहला गीत जिसे विशाल दादलानी ने गाया है और लिखा है अन्विता ने।

गीत: जब मिला तू


सुजॊय - यह एक पेप्पी नंबर था, और कई ईलेक्ट्रॊनिक इन्स्ट्रूमेण्ट्स के इस्तेमाल से एक शार्प फ़ील आया है गीत में। "रु तु रु तु" गीत का कैच लाइन है जो गीत को दिल-ओ-दिमाग़ पर बसाने का काम करता है। विशाल ने अपने जानदार गायकी से गीत को वही रफ़ फ़ील दिया है जिसकी इस गीत को ज़रूरत थी। अच्छी बात यह भी है कि पाश्चात्य और पेपी नंबर होते हुए भी गीत के बोल वज़नदार हैं। कहने का मतलब यह कि सिर्फ़ संगीत पर ही नहीं, बल्कि बोलों पर भी ध्यान दिया गया है। और विश्व दीपक जी, अन्विता के लिखे इस गीत को सुनते हुए यकायक फ़िल्म 'दोस्ताना' के "जाने क्यों दिल चाहता है" गीत की याद आ ही जाती है। कुछ कुछ वैसा अंदाज़ मिलता है इस गीत में। मेरे ख़याल से तो इस गीत को अच्छा रेस्पॊन्स मिलने वाला है।

विश्व दीपक - जी सुजॊय जी, मेरा भी यही ख्याल है। जहाँ विशाल अपनी अलग तरह की आवाज़ के लिए जाने जाते हैं तो अन्विता भी इन दिनों अपने शब्दों का लोहा मनवा रही हैं। मेरे जहन में अन्विता का लिखा "खुदा जाने" (बचना ऐ हसीनों) अभी तक जमा हुआ है। तब से मैं इनकी लेखनी का फैन हूँ। अभी हाल में हीं "बदमाश कंपनी" का "चस्का" भी इनके लफ़्ज़ों के कारण लीक से हटकर साबित हुआ है। गौरतलब है कि बालीवुड में महिला गीतकारों की बेहद कमी है, इसलिए दुआ करता हूँ कि अन्विता इस पुरूष-प्रधान संगीत की दुनिया में अपना स्थान पक्का कर लें।

सुजॊय - आमीन! चलिए अब सुना जाए दूसरा गीत जिसे शफ़ाक़त अमानत अली और सुनिधि चौहान ने गाया है, गीतकार हैं विशाल दादलानी। जी हाँ, विशाल आज के दौर के उन गिने चुने कलाकारों में से हैं जो एक संगीतकार भी हैं, एक गायक भी, और एक गीतकार के हैसियत से भी अच्छा परिचय दे रहे हैं। कोरस और अकॊस्टिक गिटार के साथ गीत आरम्भ होता है। शफ़ाक़त अमानत अली, जो करण जोहर की कई फ़िल्मों में गीत गा चुके हैं ("मितवा" - कभी अलविदा ना कहना, "तेरे नैना" - माइ नेम इज़ ख़ान), इस गीत में भी उनकी आवाज़ ने वही असर किया है, और इस गीत के मूड के मुताबिक उनकी आवाज़ अच्छी जमी है।

गीत: बिन तेरे


विश्व दीपक - गीत को सुनकर यह कहना ही पड़ेगा कि विशाल दादलानी एक बहुत ही अच्छे गीतकार हैं। उन्होंने इस गीत में रोमांस का माहौल बनाने के लिए उर्दू का जिस तरह इस्तेमाल किया है, वैसा इस्तेमाल आजकल के गीतों में बहुत कम ही सुनाई देता है। सुनिधि की आवाज़ इस गीत में अंतिम हिस्से में आतॊ है और बहुत ही नाज़ुकी के साथ उन्होने गाया है। दर=असल सुनिधि के आवाज़ के दो रूप हैं, एक रूप वह जिसमें वो "धूम मचाले" और "ऐसा जादू डाला रे" जैसे गीत गाती हैं और दूसरा रूप वह जिसमें वो इस तरह की नरमी वाले गानें गाती हैं। और दोनों ही में उन्हे महारथ हासिल है। इसमें कोई शक़ नहीं कि इस दौर की अग्रणी गायिका हैं सुनिधि। लेकिन जहाँ तक इस गीत की बात है, कुछ कमी सी लगती है, वह एक्स-फ़ैक्टर मिसिंग है जो गीत को हिट बनाने के लिए ज़रूरी होता है। देखते हैं कैसा चलता है यह गीत।

सुजॊय - और अब इस फ़िल्म का शीर्षक गीत और एक बार फिर विशाल दादलानी की आवाज़। इस बार गीतकार हैं कुमार। गीत एक डान्स नंबर है जिसकी धुन बहुत ही कैची है, बहुत ही ऐडिक्टिव है, जिसे फ़िल्म के परदे पर इमरान ख़ान एक क्लब में डान्स करते हुए नज़र आएँगे। 'जाने तू या जाने ना' के "पप्पु काण्ट डान्स साला" के लोकप्रिय डान्स के बाद अब देखना यह है कि क्या इस डान्स नंबर को भी वही सफलता प्राप्त होती है। चलिए गीत सुन लेते हैं, फिर इस गीत की थोड़ी और चर्चा करते हैं।

गीत: आइ हेट लव स्टोरीज़


सुजॊय - "मिल गए जो छोरा छोरी, हुई मस्ती थोड़ी थोड़ी, बस प्यार का नाम ना लेना, आइ हेट लव स्टोरीज़" - शायद आज की युवा पीढी को काफ़ी रास आएँगे ये बोल। जो भी है, विशाल दादलानी ने फिर एक बार गायक और संगीतकार की दोहरी भूमिका निभाई है। कुमार के शब्द हास्यप्रद होते हुए भी रचनात्मक सुनाई देते हैं। जिस तरह का चलन आज कर फ़िल्मी गीतों में छाया हुआ है कि हर गीत में कुछ कुछ अंग्रेज़ी के शब्द डाले जा रहे हैं, तो इस फ़िल्म के गीतों में भी मौजूद हैं, और विशाल शेखर एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिन्होने इस शैली का काफ़ी इस्तेमाल किया है।

विश्व दीपक - जी सही कह रहे हैं आप। मज़े की बात तो यह है कि अन्विता की तरह "कुमार" भी विशाल-शेखर के काफी प्रिय हैं। आप ’दोस्ताना’ का ’माँ दा लाडला’ कैसे भूल सकते हैं! कुमार इस तरह के गाने लिखने में खासे माहिर हैं। इन दिनों तो "कुमार" लगभग हर फिल्म में नज़र आ रहे हैं। जैसे कि "आल द बेस्ट", "जश्न", "दिल दोस्ती इटीसी", "चांस पे डांस", "गोलमाल", "गोलमाल रिटर्न्स", "सिकंदर" और "लाईफ़ पार्टनर"। वैसे क्या आपको यह पता है कि "ओम शांति ओम" में "जावेद अख्तर" और "विशाल दादलानी" (आँखों में तेरे) के अलावा एक और गीतकार थे और वो थे "कुमार"। उन्होंने उस फिल्म का सबसे ज्यादा सोलफुल नंबर (जग सूना-सूना लागे) लिखा था। मुझे यह बात जानकर बड़ा हीं सुखद आश्चर्य हुआ और मैं इस बात को आपसे शेयर किए बिना नहीं रह पाया।

सुजॊय - अरे वाह! मुझे तो यह पता हीं नहीं था। हम आगे बढेंगे तो हमें ऐसी हीं और भी बातें मालूम चलेंगी। तो चलिए फ़िल्म का चौथा गीत सुनते हैं जिसमें आवाज़ें हैं श्रेया घोषाल और सोना महापात्रा की। श्रेया का नाम सुनते ही सॊफ़्ट रोमांटिक गीत की कल्पना हम करते हैं। इस गीत में भी वही बात है। ९० के दशक में कई गीत ऐसे बने थे जिनमें इला अरुण ने राजस्थानी लोक शैली में कुछ कुछ पंक्तियाँ गाईं थीं जैसे कि फ़िल्म 'लम्हे' में "मोरनी बागा मा बोले आधी रात मा" या फिर "मेघा रे मेघा", फ़िल्म 'बटवारा' में "हाए उसके डंक बिछवा का", आदि। इन सभी गीतों में मुख्य गायिका रहीं लता जी। अब 'आइ हेट...' के इस गानें में मुख्य गायिका हैं श्रेया और राजस्थानी के शब्द गाईं हैं सोना महापात्रा ने। इन दोनों की आवाज़ों में जो कॊन्ट्रास्ट है, वही है गीत का आकर्षण। "बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार है", सुनते हैं यह गीत और देखें कि आपका दिल भी बहारा हो पाता है या नहीं। और इस गीत के ज़रिए इस चिलचिलाती गरमी में हम निमंत्रण देते हैं सावन को। गीतकार हैं कुमार।

गीत: बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार है


विश्व दीपक - सुजॊय जी, आपने तो इस गीत के बारें में सब कुछ हीं कह दिया है। इसलिए मेरे कहने के लिए कुछ ज्यादा नहीं बचता। फिर भी मैं सोना महापात्रा के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। सोना कालेज आफ़ इन्जीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी, भुवनेश्वर से अभियांत्रिकी स्नातक (बी०ई०) हैं, उन्होंने पुणे के सिम्बायोसिस से एम०बी०ए० की डिग्री हासिल की है और वो मारिको, इंडिया में बांड मैनेजर भी रह चुकी हैं। उनकी छोटी बहन प्रतीचि महापात्रा "विवा" बैंड के लिए गाती हैं। विशाल-शेखर की प्रिय "अनुश्का मनचंदा" भी इसी बैंड की हैं। सोना का पहला वीडियो सिंगल "बोलो ना" एम०टी०वी० पे सबसे ज्यादा देखा गया और फरमाईश किया गया वीडियो है। वहीं "तेरे इश्क़ नचाया" तो इतना ज्यादा म़क़बूल हुआ कि इसे विश्व के अमूमन हर चैनल पर प्रसारित किया गया। कुल मिलाकर "सोना" को ब्युटी विद व्याएस एंड ब्रेन कहा जा सकता है।

सुजॊय - जी। वैसे क्या आपको यह पता है कि "सोना" का नया एलबम "दिलजले" हिन्दुस्तान का पहला और एकमात्र ऐसा डिजीटल एलबम है जिसे पूरे विश्व के नोकिया म्युज़िक स्टोर्स में एक साथ रीलिज किया गया/जा रहा है। इस एलबम में संगीत है "राम संपत" का और बोल लिखे हैं "मुन्ना धीमन" और "राम संपत" ने। खैर ये सब बातें कभी और। अभी तो इस फ़िल्म के अंतिम गीत की बारी है। सूरज जगन और महालक्ष्मी अय्यर की आवाज़ों में "सदका किया यूँ इश्क़ का", बोल अन्विता के। साधारणत: सूरज जगन ने अब तक तेज़ और हार्ड हिटिंग रॊक शैली के गाने गाए हैं, लेकिन इस गीत में उनके आवाज़ के नरम पक्ष का परिचय हमें मिलता है। लगता है इस गीत को वही कामयाबी मिलेगी जो कामयाबी "ख़ुदा जाने ये क्या हुआ है" को मिली है। विश्व दीपक जी, आपका क्या कहना है इस गीत के बारे में?

विश्व दीपक - इस गीत की जो बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई, वह है इस गीत का "कैची फ्रेज" यानि कि "सदका किया"। "अन्विता" ने बहुत हीं प्यारा लेकिन अनूठा शब्द हमारे बीच रखा है। मैं ज्यादा गहराई में तो नहीं जाना चाहूँगा लेकिन इतना बताता चलूँ कि सदका करने का अर्थ होता है ईश्वर या अल्लाह के नाम पर दान करना, किसी पर कुछ निछावर करना। आपने "सदके जाऊँ" का इस्तेमाल तो कई जगह देखा और सुना होगा। तो वहाँ भी यही सदका है। अरे, सदका करते-करते तो मैं "सूरज जगन" को भूल हीं गया। माफ़ कीजिएगा। तो जहाँ तक "सूरज" का सवाल है तो हमने उन्हें पहली मर्तबा "प्यार में कभी-कभी" में "हम नवजवां" गाते हुए सुना था। लेकिन वह गाना कुछ ज्यादा चला नहीं, इसलिए सूरज का भी नाम न हुआ। सही मायनें में सूरज को जाना गया "दिल दोस्ती ईटीसी" के "दम लगा" के कारण। उसके बाद "रॊक ऒन" के "जहरीले" ने तो उन्हें "रॊक स्टार" हीं बना दिया। आगे की कहानी तो जगजाहिर है। तो चलिए हम इसी बात पर "सदका किया" का लुत्फ़ उठाते हैं।

गीत: सदका किया


"आइ हेट लव स्टोरीज़" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - इस पूरे एल्बम की बात करें तो मुझे इसके ज़्यादातर गानें पसंद आए हैं, ख़ास तौर से "जब मिला तू", "बहारा बहारा" और "सदका किया"। विशाल शेखर ने हमें निराश नहीं किया।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, निराश करना तो दूर की बात है, उल्टे मैं यह कहूँगा कि विशाल-शेखर उम्मीदों से बढकर साबित हुए हैं। मुझे इस फिल्म के सारे गाने पसंद आएँ। इन पाँच गानों के अलावा एलबम में दो और गाने हैं- पहला शेखर की आवाज़ में बिन तेरे (रिप्राईज) और दूसरा राहत फतेह अली खान की आवाज़ में बहारा (चिल वर्सन)। ये दोनों वर्सन्स भी कमाल के बन पड़े हैं। मैं सभी पाठकों/श्रोताओं से यह आग्रह करूँगा कि वे इन दोनों गानों को भी जरूर सुनें, खासकर शेखर की आवाज़ में "बिन तेरे"। इस गाने में "शेखर" की आवाज़ को बेहद सराहा गया है।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५८- फ़िल्मी संगीतकार बनने से पहले विशाल दादलानी किस मशहूर बैण्ड में गाया करते थे(आज भी गाते हैं)?

TST ट्रिविया # ५९- आपने पहली बार फ़िल्म 'फ़ैमिली' में गीत गाया था। उसके बाद फ़िल्म 'जम्बो' में सोनू निगम के साथ आपने अपना पहला युगल गीत गाया था। आपने इंजिनीयरिंग् की हुई है और आप एम.बी.ए. भी हैं। बताइए हम किस गायक/गायिका की बात कर रहे हैं?

TST ट्रिविया # ६०- सूरज जगन ने हाल में एक ब्लॊकबस्टर फ़िल्म में एक गीत गाया था जो बेहद बेहद कामयाब हुई थी। गीत के बोल अंग्रेज़ी के थे जिसका भाव कुछ ऐसा था कि मुझे एक मौका और दे दो, मैं फिर से एक बार छोटे से बड़ा होना चाहता हूँ। बहुत आसान है, बताइए हम सूरज जगन के गाए किस गीत की बात कर रहे हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. किशोर कुमार की जीवनी पर बनने वाली फ़िल्म में रणबीर किशोर दा का चरित्र निभाएँगे। लता से किशोर दा की शख़सीयत के कुछ पहलुओं से अपने आप को अवगत करवाने के लिए वो लता जी से मिलने वाले थे।
२. फ़िल्म 'बाबुल' का "कहता है बाबुल ओ मेरी बिटिया"।
३. फ़िल्म 'हिप हिप हुर्रे' में।

सीमा जी, आपने पहले सवाल का सही जवाब दिया है। तीसरे सवाल में आप बहुत नज़दीक थीं। बधाई स्वीकारें!!

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ