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Monday, April 1, 2013

संगीत की सुरीली बयार – अमन की आशा

प्लेबैक वाणी -40 - संगीत समीक्षा - अमन की आशा

दोस्तों, आज हम चर्चा करेंगें एक और एल्बम की, अमन की आशा के पहले भाग को श्रोताओं ने हाथों हाथ लिया तो इस सफलता ने टाईम्स म्यूजिक को प्रेरित किया कि इस अनूठे प्रयास को एक कदम और आगे बढ़ाया जाए. आज के इस दौर में जब फ़िल्मी संगीत में नयेपन का अभाव पूरी तरह हावी है, अमन की आशा सरीखा कोई एल्बम संगीत प्रेमियों की प्यास को कुछ हद तक तृप्त करने कितना कामियाब है आईये करें एक पड़ताल.

एल्बम में इतने बड़े और नामी कलाकारों की पूरी फ़ौज मौजूद है कि पहले किसका जिक्र करें यही तय नहीं हो पाता, बहरहाल शुरुआत करते हैं आबिदा परवीन की रूहानी सदा से. गुलज़ार साहब फरमाते हैं कि ये वो आवाज़ है जो सीधे खुदा से बात करती है, वाकई उनके तूने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना...को सुनकर इस बात का यकीन हो ही जाता है. इस कव्वाली को जब आबिदा मौला की सदा से उठाती है तभी से श्रोताओं को अपने साथ लिए चलती है और होश वालों की दुनिया से दूर हम एक ऐसे नशीले से माहौल में पहुँच जाते हैं जहाँ ये आवाज़ हमें सीधे मुर्शिद से जोड़ देती है....बहतरीन...बहतरीन...आबिदा की आवाज़ का जादू इस एल्बम में आप तीन बार और सुन सकते हैं प्रीतम मत परदेस जा और बुल्ले नुं सम्झावां भी उतने ही असरकारक हैं, जब आवाज़ ही ऐसी हो कोई क्या करे, पर तूने दीवाना बनाया की बात तो कुछ और ही है.

चलिए अब बात राहत साहब की करें. फ़िल्मी गीतों में बेशक बेहद लोकप्रिय है इन दिनों पर जब एस तरह की एल्बम के लिए वो तान खींचते हैं तो यकीं मानिये उनकी आवाज़ की कशिश कई गुना बढ़ जाती है. वो नुसरत साहब के नक़्शे कदम पर चलते सानु एक पल चैन न आवे गाते हैं तो वहीँ मैं तैनू समझावा की में तो जैसे वो कहर ढा देते हैं. इस गीत में इतना ठहराव है कि आप आँखें मूँद कर सुनते जाईये और गीत खत्म होते होते आपकी पलकें भी नम हो उठेगीं. यही असर है इस बेमिसाल गीत का.

तीन दिग्गज अपनी आवाज़ का हुस्न बखेर कर मौहोल को सुर गुलज़ार कर देते हैं, तीनों के मूड अलग अलग हैं पर हर अंदाज़ अपने आप में दिलकश दिलनशीं. नुसरत साहब की कव्वाली अली द मलंग झूमने को मजबूर कर देगा तो अब के हम बिछड़े में मेहदी हसन साहब, एहमद फ़राज़ के शब्दों में जान फूंकते मिलते हैं, तो वहीँ गुलाम अली साहब दिल में एक लहर सी उठी है अभी में अपनी चिर परिचित मुस्कान होंठों पर लिए सुनने वालों के दिलों की लहरों में हलचल मचाते सुनाई देते हैं.

अत्ता उल्लाह खान साहब की आवाज़ इस एल्बम में एक सुखद आश्चर्य है, जिस तरह मुकेश की आवाज़ में शब्दों में छुपा दर्द और गहराई से उभर कर आता है उसी तरह अत्ता उल्लाह की आवाज़ में छुपी दर्द की टीस को श्रोता शिद्दत से महसूस कर पाते हैं ये कैसा हम पे उमर इश्क का जूनून है....

चलिए अब बात करें भारतीय फनकारों की. छाप तिलक का पारंपरिक अंदाज़ पूरी तरह से नदारद मिलता है कविता सेठ के गाये संस्करण में, मुझे तो मज़ा नहीं आया. पर इस कमी को हरिहरण साहब पूरी तरह से पूरी करते नज़र आते हैं. जब भी मैं एक आधुनिक भजन है जिसमें सुन्दर शुद्ध हिंदी के शब्दों में कवि ने सुन्दर चित्र रचा है और हरी की आवाज़ ने गीत की सुंदरता को बरकरार रखते हुए भरपूर न्याय किया है.

रशीद खान के स्वरों में राजस्थानी लोक रस का माधुर्य झलकता है सतरंगी मोरे अंगना में पधारो में, नूरजहाँ की दिलकश आवाज़ पहले संस्करण की तरह यहाँ भी मौजूद है, पर लता जी की जगह ले ली है आशा ताई ने. इनके अलावा वाडली बंधू भी अपनी मौजूदगी से श्रोताओं को सराबोर करते सुनाई देते हैं. अजब तेरा कानून देखा खुदाया में फिर एक बार शब्द और स्वरों की दिलकश अदायगी का उत्कृष्ट संगम सुनने को मिलता है. दोस्तों पहले संस्करण की भांति ये एल्बम भी हर संगीत प्रेमी के लिए संग्रहनीय है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस नायाब एल्बम को ४.९ की रेटिंग ५ में से.          

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी


यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:


संगीत समीक्षा - अमन की आशा


Wednesday, October 27, 2010

मेरा दिल तड़पे दिलदार बिना.. राहत साहब की दर्दीली आवाज़ में इस ग़मनशीं नज़्म का असर हज़ार गुणा हो जाता है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०२

भी कुछ महीनों से हमने अपनी महफ़िल "गज़लगो" पर केन्द्रित रखी थी.. हर महफ़िल में हम बस शब्दों के शिल्पी की हीं बातें करते थे, उन शब्दों को अपनी मखमली, पुरकशिश, पुर-असर आवाज़ों से अलंकृत करने वाले गलाकारों का केवल नाम हीं महफ़िल का हिस्सा हुआ करता था। यह सिलसिला बहुत दिन चला.. हमारे हिसाब से सफल भी हुआ, लेकिन यह संभव है कि कुछ मित्रों को यह अटपटा लगा हो। "अटपटा"... "पक्षपाती"... "अन्यायसंगत"... है ना? शर्माईये मत.. खुलकर कहिए? क्या मैं आपके हीं दिल की बात कर रहा हूँ? अगर आप भी उन मित्रों में से एक हैं तो हमारा कर्त्तव्य बनता है कि आपकी नाराज़गी को दूर करें। तो दोस्तों, ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि वे सारी महफ़िलें "बड़े शायर" श्रृंखला के अंतर्गत आती थीं और "बड़े शायर" श्रृंखला की शुरूआत (जिसकी हमने विधिवत घोषणा कभी भी नहीं की थी) आज से ८ महीने और १० दिन पहले मिर्ज़ा ग़ालिब पर आधारित पहली कड़ी से हुई थी। ७१ से लेकर १०१ यानि कि पूरे ३१ कड़ियों के बाद पिछले बुधवार हमने उस श्रृंखला पर पूर्णविराम डाल दिया। और आज से हम "फ़्रीलासिंग" की दुनिया में वापस आ चुके हैं यानि कि किसी भी महफ़िल पर किसी भी तरीके की रोक-टोक नहीं, कोई नियम-कानून नहीं.. । अब से गायक, ग़ज़लगो और संगीतकार को बराबर का अधिकार हासिल होगा, इसलिए कभी कोई महफ़िल गुलुकार को पेश-ए-नज़र होगी तो कभी ग़ज़लगो के रदीफ़ और काफ़ियों की मोमबत्तियों से महफ़िलें रौशन की जाएँगीं.. और कभी तो ऐसा होगा कि संगीतकार के राग-मल्हार से सुरों और धुनों की बारिसें उतरेंगी ज़र्रा-नवाज़ों के दौलतखाने में। और हर बार महफ़िल का मज़ा वही होगा.. न एक टका कम, न आधा टका ज्यादा। तो इस दुनिया में पहला कदम रखा जाए? सब तैयार हैं ना?

अगर आप में से किसी ने कल का "ताज़ा सुर ताल" देखा हो तो एक शख्स के बारे में मेरी राय से जरूर वाकिफ़ होंगे। ये शख्स ऐसे हैं जिनके लिए सात सुर इन्द्रधनुष के सात रंगों की तरह हैं.. इन सात रंगों के बिखरने से जो रंगीनी पैदा होती है, वही रंगीनी इनके मिज़ाज़ में भी नज़र आती है और इन सात रंगों के मिलने से जो सुफ़ेदी उभरती है, वो सुफ़ेदी, वो सादापन, वो सीधापन इनके दिल का अहम हिस्सा है या यूँ कहिए कि पूरा का पूरा दिल है। नुसरत साहब के बाद अगर इन्हें कव्वालियों का बादशाह कहा जाए तो कोई ज्यादती न होगी। अलग बात है कि आजकल ये कव्वालियाँ कम हीं गाते हैं। मैंने इसी बात को ध्यान में रखते हुए लिखा था कि "राहत साहब के बारे में कोई नया क्या कह सकता है, वे हैं हीं बेहतरीन। मुझे भी यह बात हमेशा खटकती थी(है) कि उन्हें उनके माद्दे जितना मौका नहीं मिल रहा। मैंने उनकी पुरानी कव्वालियाँ सुनी हैं। कुछ सालों पहले तक हिन्दी फिल्मों में भी कव्वालियाँ बनती थीं, जिन्हें साबरी बंधु गाया करते थे अमूमन.. लेकिन अब बनती हीं नहीं। अब बने तो राहत साहब से बढकर कोई उम्मीदवार न होगा। मेरी तो यही चाहत है कि हिन्दी फिल्मों में फिर से ऐसे सिचुएशन तैयार किये जाएँ।" जी हाँ, मैं राहत फ़तेह अली खान की हीं बात कर रहा हूँ। आज की महफ़िल इन्हीं शख्सियत को समर्पित है। यूँ तो राहत साहब ने आजकल हर फिल्म में एक सुकूनदायक गाना देने का बीड़ा उठाया हुआ है, लेकिन मेरी राय में यह इनकी क्षमता से हज़ारों गुणा कम है। इन्होंने "पाप" के "मन की लगन" से जब हिन्दी फिल्मों में पदार्पण किया था तो यकीनन हमारे भारतीय संगीत उद्योग को एक बेहद गुणी कलाकार की प्राप्ति हुई थी, लेकिन उसी वक़्त सूफ़ी संगीत ने एक अनमोल हीरा खो दिया था। अगर आप राहत साहब के "पाप" के पहले की रिकार्डिंग्स देखेंगे तो खुद-ब-खुद आपको मेरी बात समझ आ जाएगी कि कल के राहत और आज के राहत में क्या फ़र्क है और कहाँ फ़र्क है। मैं आज भी राहत साहब का बहुत बड़ा मुरीद हूँ, लेकिन मैं हर पल यही दुआ करता हूँ कि जिस तरह नुसरत साहब अपनी विशेष गायकी के लिए याद किए जाते हैं, वैसे हीं राहत साहब को भी उनकी बेमिसाल गलाकारी के लिए जाना जाए। इन्हें इनकी कव्वालियों, ग़ज़लों और गैर-फिल्मी गीतों से प्रसिद्धि मिले, ना कि फिल्मी गानों से, क्योंकि कालजयी तो वही होता है जो दिल को छू ले और आजकल दिल को छूने वाले फिल्मी गीत बिरले हीं बनते हैं।

यह तो सभी जानते हैं कि राहत साहब नुसरत साहब के वंश के हैं, लेकिन कई सारे लोगों को यह गलतफ़हमी है कि राहत नुसरत के बेटे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि राहत नुसरत के भतीजे हैं। राहत साहब के अब्बाजान फ़ार्रूख फ़तेह अली खान अपने दूसरे भाईयों के साथ नुसरत साहब की मंडली का हिस्सा हुआ करते थे.. पूरे परिवार की एक मंडली सजती थी। उसी मंडली में अपने छुटपन से हीं राहत बैठा करते थे और नुसरत साहब की हर ताल में ताल मिलाते थे। नुसरत साहब इन्हें मौका भी पूरा देते थे। किसी एक आलाप की शुरूआत करके आलाप निबाहने का काम राहत को दे देते थे और राहत भी उस आलाप को क्या खूब अंज़ाम देते थे। छुटपन से हीं चलता यह सिलसिला तब खत्म हुआ, जब नुसरत साहब इस जहां-ए-फ़ानी से रूख्सत कर गए। उसके बाद इन्होंने हीं नुसरत साहब की जगह ली।

राहत साहब का जन्म १९७४ में फ़ैसलाबाद में हुआ था। इन्होंने अपना पहला पब्लिक परफ़ॉरमेंश ११ साल की उम्र में दिया जब ये अपने चाचाजान के साथ ग्रेट ब्रिटेन गए थे। २७ जुलाई १९८५ को बरमिंघम में हुए इस कन्सर्ट में इन्होंने कई सारे एकल ग़ज़ल गाए, जिनमें प्रमुख हैं: "मुख तेरा सोणया शराब नलों चंगा ऐ" और "गिन गिन तारें लंग गैयां रातां"। मैंने पहले हीं बताया कि बॉलीवुड में इन्होंने अपना पहला कदम "पाप" के जरिये रखा था। वहीं हॉलीवुड में इनकी शुरुआत हुई थी फिल्म "डेड मैन वाकिंग" से, जिसमें संगीत दिया था नुसरत साहब और अमेरिकन रॉक बैंड पर्ल जैम के एड्डी वेड्डर ने। फिर २००२ में "जेम्स होमर" के साथ इन्होंने "द फ़ोर फ़ेदर्स" के साउंडट्रैक पर काम किया। २००२ में हीं "द डेरेक ट्र्क्स बैंड" के एलबम "ज्वायफ़ुल न्वायज़" में इनका एक गीत "मकी/माकी मदनी" शामिल हुआ। अभी कुछ सालों पहले हीं "मेल गिब्सन" की "एपोकैलिप्टो" में इनकी आवाज़ गूंजी थी। भले हीं बॉलीवुड और हॉलीवुड में इन्होंने काम किया हो, लेकिन इस दौरान वे अपने मादर-ए-वतन पाकिस्तान को नहीं भूले। तभी तो पाकिस्तान जाकर इन्होंने दो देशभक्ति गीत "धरती धरती" और "हम पाकिस्तान" रिकार्ड किया। अभी हाल में हीं इन्होंने "हिन्दुस्तान-पाकिस्तान" की एकता के लिए "अमन की आशा" एलबम का शीर्षक गीत गाया है। ये पाकिस्तान की आवाज़ थे जबकि हिन्दुस्तान की कमान संभाली थी शंकर महादेवन ने। संगीत में राहत साहब के इसी योगदान को देखते हुए "यू के एशियन म्युज़िक अवार्ड्स" की तरफ़ से इन्हें साल २०१० के "बेस्ट इंटरनेशनल एक्ट" की उपाधि से नवाज़ा गया है। हम कामना करते हैं कि ये आगे भी ऐसे हीं पुरस्कार और उपाधियाँ प्राप्त करते रहें और हमारी श्रवण-इन्द्रियों को अपनी सुमधमुर अवाज़ का ज़ायका देते रहें।

बातें बहुत हो गईं..अब वक़्त है आज की नज़्म से रूबरू होने का। चूँकि इस गाने के अधिकतर शब्द पंजाबी के हैं और मुझे कहीं भी इस गाने के बोल हासिल नहीं हुए, इसलिए अपनी समझ से मैंने शब्दों को पहचानने की कोशिश की है। अब ये बोल किस हद तक सही हैं, इसका फैसला आप सब हीं कर सकते हैं। मैं आपसे बस यही दरख्वास्त करता हूँ कि जिस किसी को भी सही लफ़्ज़ मालूम हों, वह टिप्पणियों के माध्यम से हमारी सहायता जरूर करें। या तो रिक्त स्थानों की पूर्ति कर दें या फिर पूरा का पूरा गाना हीं टिप्पणी में डाल दें। उम्मीद है कि आप हमें निराश नहीं करेंगे। चलिए तो हम भी आपको निराश न करते हुए आज की महफ़िल की लाजवाब नज़्म का दीदार करवाते हैं। मुझे भले हीं इसका पूरा अर्थ न पता हो, लेकिन राहत साहब की आवाज़ में छिपे दर्द को महसूस कर सकता हूँ। आवाज़ में उतार-चढाव से इन्होंने दु:ख का जो माहौल गढा है, आप न चाहते हुए भी उसका एक हिस्सा बन जाते हैं। "मेरा दिल तड़पे दिलदार बने"- यह पंक्ति हीं काफ़ी है, आपके अंदर बैठे नाज़ुक से दिल को मोम की तरह टुकड़े-टुकड़े करने को। दिल का एक-एक टुकड़ा आपको रोने पर बाध्य न कर दे तो कहना!

हाल सुनावां किसनु दिल दा, दिल नईं लगदा यार बिना,
मेरा दिल तड़पे दिलदार बिना..

सोचा मैंके प्यार जता दें (.....)
हाथे खोके जावन वाला.. सोंचा पा गया पल्ले
ईंज मैं रोई, जी मैं ______ के खोई,
कूंज (गूंज) तड़प दीदार बिना,
मैरा दिल तड़पे दिलदार बिना

दिन तो लेके शामत(?) आई, रांवां तकदी रैंदी,
वो की जाने, रोंदी(?) कमली, की की दुखरे सहदीं
मेड़ें चलदी, जीवे नाल पइ बलदी,
(...)
मेरा दिल तड़पे दिलदार बिना

खपरांदे वीच फंस गई जाके आसां वाली बेरी
समझ न आए केरे वेल्ले हो गई ये फुलकेरी
मोरे केड़ा, मेरे नाल जेड़ा
रुस बैठा तकरार बिना,
मेरा दिल तड़पे दिलदार बिना

हाल सुनावां किसनु दिल दा, दिल नईं लगदा यार बिना,
मेरा दिल तड़पे दिलदार बिना..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आरज़ू" और शेर कुछ यूँ था-

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

आरजू है हमारी आप से जनाब !
यूँ लंबी छुट्टी न किया करें जनाब . (मंजु जी)

ये दिल न कोई आरजू ऐसी कभी कर
कि दम तोड़ दे तेरे अंदर ही वो घुटकर. (शन्नो जी)

आरजू ही ना रही सुबह वतन की अब मुझको,
शाम ए गुरबत है अजब वक्त सुहाना तेरा (अनाम)

न आरज़ू ,न तमन्ना,न हसरत-ओ-उम्मीद
मुझे जगह न मिली फिर भी सर छुपाने को (जनाब सरवर)

दिल की यह आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले,
लो बन गया नसीब कि तुम हम से आ मिले. (हसन कमाल)

आरज़ू तो खूब रही कि आप जल्दी लौट आयें,
देर से ही सही, खैर मकदम है आपका (पूजा जी)

पिछली महफ़िल की शुरूआत हुई सजीव जी और शन्नो जी की शुभकामनाओं के साथ। हम आप दोनों का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। शन्नो जी, आप आईं तो पहले लेकिन शान-ए-महफ़िल का खिताब मंजु जी ले गईं क्योंकि आपके बताए हुए शब्द पर इन्होंने चार पंक्तियाँ लिख डालीं। महफ़िल फिर से पटरी पर आ गई है, यह सूचना शायद सभी मित्रों के पास सही वक़्त पर नहीं पहुँची थी, इसलिए तो २-३ दिनों तक बस आप तीन लोगों के भरोसे हीं महफ़िल की शमा जलती रही। फिर जाकर सुमित जी का आना हुआ। सुमित जी के बाद अवध जी आए जिन्होंने अपने पसंदीदा गुलुकार की ग़ज़ल को खूब सराहा और इस दौरान हमें शुक्रिया भी कहा। अवध जी, शुक्रिया तो हमें आपका करना चाहिए, जो आपने हबीब साहब की कुछ और ग़ज़लों से हमारी पहचान करवाई। हम जरूर हीं उन ग़ज़लों का महफ़िल का हिस्सा बनाएँगे। वैसे यह बताईये कि "गजरा बना के ले आ मलिनिया" और "गजरा लगा के ले आ सजनवा" एक हीं ग़ज़ल या दो मुख्तलिफ़? अगर दो हैं तो हम दूसरी ग़ज़ल ढूँढने की अवश्य कोशिश करेंगे। और अगर आपके पास ये ग़ज़लें हों (ऑडिया या फिर टेक्स्ट) तो हमें भेज दें, हमें सहूलियत मिलेगी। महफ़िल की आखिरी शमा पूजा जी के नाम रही, जो अंतिम दिन ज़फ़र के दरबार का मुआयना करने आई थीं :) चलिए आप आईं तो सही.. महफ़िल को "रिस्टार्ट" करने के साथ-साथ मुझे मेरे जन्मदिवस की भी बधाईयाँ मिलीं। मैं आप सभी मित्रों का इसके लिए तह-ए-दिल से आभारी हूँ।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, March 1, 2010

"अमन की आशा" है संगीत का माधुर्य, होली पर झूमिए इन सूफी धुनों पर

ताज़ा सुर ताल ०९/२०१०

सुजॊय - सभी पाठकों को होली पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ और सजीव, आप को भी!
सजीव - मेरी तरफ़ से भी 'आवाज़' के सभी रसिकों को होली की शुभकामनाएँ और सुजॊय, तुम्हे भी।
सुजॊय - होली का त्योहार रंगों का त्योहार है, ख़ुशियों का त्योहार है, भाइचारे का त्योहार है। गिले शिकवे भूलकर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं, चारों तरफ़ ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है।
सजीव - सुजॊय, तुमने भाइचारे की बात की, तो मैं समझता हूँ कि यह भाइचारा केवल अपने सगे संबंधियों और आस-पड़ोस तक ही सीमित ना रख कर, अगर हम इसे एक अंतर्राष्ट्रीय रूप दें, तो यह पूरी की पूरी पृथ्वी ही स्वर्ग का रूप ले सकती है।
सुजॊय - जी बिल्कुल! आज कल जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय उग्रवाद बढ़ता जा रहा है, विनाश और दहशत के बादल इस पूरी धरा पर मंदला रहे हैं। ऐसे में अगर कोई संस्था अगर अमन और शांति का दूत बन कर, और सीमाओं को लांघ कर दो देशों को और ज़्यादा क़रीब लाने का प्रयास करें, तो हमें खुले दिल से उसकी स्वागत करनी चाहिए।
सजीव - हाँ, और ऐसी ही दो संस्थाओं ने मिल कर अभी हाल में एक परियोजना बनाई है भारत और पाक़िस्तान के रिश्तों को मज़बूत करने की। ये संस्थाएँ हैं भारत का सब से बड़ा मीडिया ग्रूप 'टाइम्स ग्रूप', पाक़िस्तान का मीडिया जायण्ट 'जंग ग्रूप', तथा 'जीओ टीवी ग्रूप', और इस परियोजना का शीर्षक है 'अमन की आशा'। ये मीडिया जायण्ट्स मिल कर दोनों देशों के बीच राजनैतिक और सांस्कृतिक संबंधों में सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ तक सांस्कृतिक पक्ष का सवाल है, तो इन दोनों देशों के जानेमाने कलाकारों के गीतों का एक संकलन हाल ही में जारी किया गया है।
सुजॊय - डबल सी डी पैक वाले 'अमन की आशा' ऐल्बम में ऐसे ऐसे कालजयी कलाकारों की रचनाएँ शामिल किए गए हैं कि कौन सा गीत किससे बेहतर है बताना मुश्किल है। इनमें से कुछ फ़िल्मी रचनाएँ हैं तो कुछ ग़ैर-फ़िल्मी, लेकिन हर एक गीत एक अनमोल नगीने की तरह है जो इस ऐल्बम में जड़े हैं। और क्यों ना हो जब लता मंगेशकर, गुलज़ार, भुपेन्द्र सिंह, शंकर महादेवन, हरीहरण, रूप कुमार राठोड़, नूरजहाँ, गु़लाम अली, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, अबीदा परवीन, मेहदी हसन, राहत फ़तेह अली ख़ान, वडाली ब्रदर्स जैसे अज़ीम फ़नकारों के गाए गानें इसमें शामिल हों। इनमें से कुछ गानें नए हैं तो कुछ कालजयी रचनाएँ हैं। और कुछ पारम्परिक गानें तो आप ने हर दौर में अलग अलग गायकों की आवाज़ों में सुनते आए हैं।
सजीव - इस ऐल्बम में कुल २० गानें हैं, जिनमें से हम ५ ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं को आज के इस 'ताज़ा सुर ताल' की कड़ी में शामिल कर रहे हैं। बाक़ी गीत आप समय समय पर 'आवाज़' के अन्य स्तंभों में सुन पाएँगे। तो सुजॊय, चलो बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाने से पहले एक गीत हो जाए अबीदा परवीन का गाया हुआ!

गीत - मैं नारा-ए-मस्ताना


सजीव- वाह ये तो कोई जादू था सुजॉय, मैं तो अभी तक झूम रहा हूँ...
सुजॊय -बिलकुल ठीक, अबीदा परवीन का जन्म १९५४ में हुआ था पाकिस्तान के सिंध के लरकाना के अली गोहराबाद मोहल्ले में। संगीत की तालीम उन्होने शुरुआती समय में अपने पिता उस्ताद ग़ुलाम हैदर से ही प्राप्त किया। बाद में शाम चौरसिया घराने के उस्ताद सलामत अली ख़ान से उन्हे संगीत की शिक्षा मिली। अपने पिता के संगीत विद्यालय में जाते हुए अबीदा परवीन में संगीत के जड़ मज़बूत होते चले गए। उनका प्रोफ़ेशनल करीयर रेडियो पाक़िस्तान के हैदराबाद केन्द्र से शुरु हुआ था सन् १९७३ में। उनका पहला हिट गीत एक सिंधी गीत था "तूहींजे ज़ुल्फ़न जय बंद कमंद विधा"। सूफ़ियाना संगीत में अबीदा जी का एक अलग ही मुक़ाम है। मूलत: वो ग़ज़लें गाती हैं, लेकिन उर्दू प्रेम गीत और ख़ास तौर पर काफ़ी पर उनका जैसे अधिकार सा बना हुआ है। वो उर्दू, सिंधी, सेरैकी, पंजाबी और पारसी में गाती हैं।
सजीव - व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो अबीदा परवीन ने रेडियो पाक़िस्तान के सीनियर प्रोड्युसर ग़ुलाम हुसैन शेख़ से शादी की, जिनका अबीदा जी के शुरुआती करीयर में एक गायिका के रूप में उभरने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। पुरस्कारों की बात करें तो अबीदा परवीन को १९८२ में 'प्राइड ऒफ़ परफ़ॊर्मैंस' का 'प्रेसिडेण्ट ऒफ़ पाक़िस्तान अवार्ड' मिला था। अभी कुछ वर्ष पहले २००५ में उन्हे 'सितारा-ए-इमतियाज़' के सम्मान से नवाज़ा गया था।
सुजॊय - वैसे तो अबीदा जी के असंख्य ऐल्बम बनें हैं, उनमें से कुछ के नाम हैं आपकी अबीदा, अरे लोगों तुम्हारा क्या, बेस्ट ऒफ़ अबीदा परवीन (१९९७), बाबा बुल्ले शाह, अबीदा परवीन सिंग्स् सॊंग्स् ऒफ़ दि मिस्टिक्स, अरीफ़ाना क़लाम, फ़ैज़ बाइ अबीदा, ग़ालिब बाइ अबीदा परवीन, ग़ज़ल का सफ़र, हर तरन्नुम, हीर बाइ अबीदा, हो जमालो, इश्क़ मस्ताना, जहान-ए-ख़ुसरो, कबीर बाइ अबीदा, काफ़ियाँ बुल्ले शाह, काफ़ियाँ ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद ख़ज़ाना, कुछ इस अदा से आज, लट्ठे दी चादर, मेरे दिल से, मेरी पसंद, रक़्स-ए-बिस्मिल, सरहदें, तेरा इश्क़ नचया, दि वेरी बेस्ट ऒफ़ अबीदा, यादगार ग़ज़लें, आदि। इन नामों से ही आप अंदाज़ा ल्गा सकते हैं कि अबीदा परवीन किन शैलियों में महारथ रखती हैं।
सजीव - अबीदा परवीन के बारे में अच्छी बातें हमने जान ली, और अब 'अमन की आशा' में आगे बढ़ते हुए दूसरा गीत रूप कुमार राठोड़ और देवकी पंडित की आवाज़ों में, यह एक आध्यात्मिक गीत है, दैवीय सुर गूंजते हैं इस भक्ति रचना में जिसके बोल हैं "अल्लाहू"। 'अमन की आशा' सूफ़ी संगीत को एक और ही मुक़ाम तक ले जाती है।

गीत - अल्लाहू


सजीव - अगला गीत है वडाली ब्रदर्स का गाया "याद पिया की आए"। ये दोनों भाई जब किसी महफ़िल में गाते हैं तो एक ऐसा समा बंध जाता है कि महफ़िल के ख़त्म होने तक श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हे सुनते हैं, और महफ़िल के समापन के बाद भी जिसका असर लम्बे समय तक बरक़रार रहता है। सुजॊय, इन दो भाइयों के बारे में कुछ बताना चाहोगे?
सुजॊय - ज़रूर! पूरनचंद वडाली और प्यारेलाल वडाली भी सूफ़ी गायक व संगीतज्ञ हैं जिनका ताल्लुख़ पंजाब के अमृतसर के गुरु की वडाली से है। वडाली ब्रदर्स सूफ़ी संतों के उपदेशों व विचारों को गीत-संगीत के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने वाले कलाकारो की पाँचवी पीढ़ी के सदस्य हैं। ये दो भाई एक ग़रीब परिवार से ताल्लुख़ रखते थे। बड़े भाई पूरनचंद २५ वर्ष के लम्बे समय तक कुश्ती के अखाड़े से जुड़े हुए थे। छोटा भाई प्यारेलाल अपने घर की अर्थिक स्थिति को थोड़ा बेहतर बनाने के लिए गाँव के रासलीला में श्री कृष्ण की भूमिक निभाया करते थे। भगवान के आशीर्वाद से दोनों भाइयों ने मिलकर आज जो मुक़ाम हासिल किया है, वह उल्लेखनीय है।
सजीव - जहाँ तक मैम्ने सुना है इनके पिता ठाकुर दास ने पूरनचंद को ज़बरदस्ती संगीत में धकेला जब कि उनकी दिलचस्पी अखाड़े में थी। ख़ैर, पूरनचंद ने पंडित दुर्गादास और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान से तालीम ली, जब कि प्यारेलाल को पूरनचंद ने ही संगीत सीखाया। आज भी प्यारेलाल अपने बड़े भाई को ही अपना गुरु और्व सर्वस्व मानते हैं। अपने गाँव के बाहर इन दो भाइयों ने अपना पहला पब्लिक परफ़ॊर्मैंस जलंधर के हरबल्लभ मंदिर में दिया था।
सुजॊय - पता है वडाली ब्रदर्स दरसल जलंधर में आयोजित हरबल्लभ संगीत सम्मेलन में भाग लेने के लिए ही गए थे, लेकिन उनके वेश-भूषा को देख कर उन्हे वहाँ गाने का मौका नहीं दिया गया। निराश होकर इन्होने तय किया कि वो हरबल्लभ मंदिर के बाहर ही अपना संगीत प्रस्तुत करेंगे। और इन्होने ऐसा ही किया। संयोगवश उस वक़्त वहाँ आकाशवाणी जलंधर के संगीत विभाग के एक सदस्य मौजूद थे जिनको उनकी गायकी अच्छी लगी और आकाशवाणी जलंधर में उनकी पहली रिकार्डिंग् हुई।
सजीव - वडाली ब्रदर्स के बारे में अभी और भी बहुत सी बातें हैं बताने को, लेकिन वो हम फिर किसी दिन बताएँगे। यहाँ पर बस यह बताते हुए कि वडाली ब्रदर्स काफ़ी, गुरबाणी, ग़ज़ल और भजन शैलियों में महारथ रखते है, आपको सुनवा रहे है 'अमन की आशा' ऐल्बम में उनका गाया "याद पिया की आए"।
सुजॊय - सजीव, "याद पिया की आए" उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब ने ठुमरी के अंदाज़ में गाया था। लेकिन वडाली ब्रदर्स के गाए इस वर्ज़न में तो उन्होने इसका नज़रिया ही बिल्कुल बदल के रख दिया है। चलिए सुनते हैं इस रूहानी रचना को।

गीत - याद पिया की आए


सजीव - "याद पिया की आए" की तरह एक और पारम्परिक रचना है "दमादम मस्त कलंदर, अली दम दम दे अंदर", जिसे हर दौर में अलग अलग फ़नकारों ने गाए हैं, जैसे कि नूरजहाँ, अबीदा परवीन, रूना लैला, नुसरत फ़तेह अली ख़ान और भी बहुत सारे। 'अमन की आशा' में इस क़व्वाली का जो संस्करण शामिल किया गया है उसे गाया है रफ़ाक़त अली ख़ान ने।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान पाक़िस्तान के अग्रणी गायक हैं जिनका ताल्लुख़ शाम चौरसी घराने से है। गायन के साथ साथ कई साज़ बजाने में वो माहिर हैं और अपने गीतों में पाश्चात्य साज़ों का भी वो ख़ूब इस्तेमाल करते हैं। तबला, ढोलक, हारमोनियम, इलेक्ट्रिक ड्रम और सीन्थेसाइज़र वो ख़ूब बजा लेते हैं। रफ़ाक़त साहब का जन्म लाहौर में हुअ था। संगीत उन्हे विरासत में ही मिली, पिता उस्ताद नज़ाक़त अली ख़ान, चाचा उस्ताद सलामत अली ख़ान, स्व: उस्ताद नौरत फ़तेह अली ख़ान और जवाहर वत्तल जानेमाने गायक हुए हैं।
सजीव - हाल की उनके दो ऐल्बम 'अल्लाह तेरा शुक्रिया' और 'मान' काफ़ी चर्चित रहे। रफ़ाक़त साहब के पसंदीदा फ़नकारों में लता मंगेशकर, किशोर कुमार, हरीहरन और शंकर महादेवन शामिल हैं।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान के बारे में एक और दिलचस्प बात यह कि वो जिम्नास्टिक्स में यूनिवर्सिटी व नैशनल चैम्पियन रह चुके हैं। तो आइए सुनते हैं यह मशहूर पारम्परिक उर्दू सूफ़ी क़लाम।

गीत - दमादम मस्त कलंदर


सजीव - और अब इस ऐल्बम का शीर्षक गीत पेश है शंकर महादेवन और राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ों में। गुलज़ार साहब के लिखे इस गीत को 'अमन की आशा' मिशन का ऐंथेम माना जा रहा है।
सुजॊय - "नज़र में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते, ये सुर बुलाते हैं जब तुम इधर नहीं आते"। २ मिनट का यह गीत दरअसल एक ऐंथेम की तरह ही है, सीधे सादे बोल लेकिन गहरा भाव छुपा हुआ है, शांति का प्रस्ताव भी है, अमन की आशा भी है। शंकर और राहत साहब के अपने अपने अनोखे अंदाज़ से इसमें एक जो कॊण्ट्रस्ट पैदा हुआ है, वही इसकी खासियत है।
सजीव - इस गीत को सुनने से पहले हम बस यही कहेंगे अपने पाठकों व श्रोताओं को कि यह ऐल्बम एक मास्टर पीस ऐल्बम है और अच्छे संगीत के क़द्रदान इसे ज़रूर ख़रीदें। यह उपलब्ध है टाइम्स म्युज़िक पर।
सुजॊय - सभी को एक बार फिर से होली की ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए हम अमन और शांति की आशा करते हैं।

नज़र में रहते हो (अमन की आशा)


"अमन की आशा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग *****
भाई अब जहाँ ऐसे ऐसे फनकार होंगें उस अल्बम की समीक्षा कोई क्या करे, अल्बम का हर गीत अपने आप में बेमिसाल है, खासकर आबिदा के कुछ जबरदस्त सूफी गीतों को इसमें स्थान दिया गया है. संगीत प्रेमियों के लिए अति आवश्यक है ये अल्बम, हर हाल में खरीदें सुनें.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २६- अभी हाल में वडाली ब्रदर्स ज़ी टीवी के किस कार्यक्रम में अतिथि बन कर पधारे थे?
TST ट्रिविया # २७ आबिदा की किस अल्बम पर पीटर मार्श ने टिपण्णी की थी कि वो शौपिंग लिस्ट भी गाकर श्रोताओं को रुलाने की कुव्वत रखती है ?
TST ट्रिविया # २८ अभी हाल ही में देविका पंडित की कौन सी अलबम बाजार में आई है


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी ने जबरदस्त वापसी की है सभी सवालों का सही जवाब देकर, बधाई

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