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Monday, October 1, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१८) ओह माई गॉड, और आपकी बात

संगीत समीक्षा  ओह माई गॉड




प्रेरणा बॉलीवुड का सबसे लोकप्रिय शब्द है...कोई अंग्रेजी फिल्मों से प्रेरित होता है, कोई दक्षिण की फिल्मों की नक़ल घोल कर करोड़ों कमा लेता है. कभी कभार कोई निर्माता अभिनेता साहित्य या थियटर से भी प्रेरित हो जाता है. ऐसे ही एक मंचित नाटक का फ़िल्मी रूपांतरण है “ओह माई गोड”. फिल्म में संगीत है हिमेश रेशमिया का, जो सिर्फ “हिट” गीत देने में विश्वास रखते हैं, चाहे प्रेरणा कहीं से भी ली जाए. आईये देखें “ओह माई गोड” के संगीत के लिए उनकी प्रेरणा कहाँ से आई है. 

बरसों पहले कल्याण जी आनंद जी  का रचा “गोविदा आला रे” गीत पूरे महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दौरान आयोजित होने वाले दही हांडी प्रतियोगिताओं के लिए एक सिग्नेचर धुन बन चुका था, हिमेश ने इसी धुन को बेहद सफाई से इस्तेमाल किया है “गो गो गोविंदा” गीत के लिए. इस साल जन्माष्टमी से कुछ दिन पहले ये गीत एक सिंगल की तरह श्रोताओं के बीच उतरा गया, और इसके लाजवाब नृत्य संयोजन ने इसे रातों रात एक हिट गीत में बदल दिया. इस साल लगभग सभी दही हांडी समारोहों में ये गीत जम कर बजा, और इस तरह फिल्म के प्रदर्शन से दो महीने पहले ही फिल्म को एक जबरदस्त हिट गीत मिला गया. इसमें निर्माता की समझ बूझ तो है ही, पर हिमेश के जबरदस्त संगीत संयोजन की भी तारीफ करनी पड़ेगी. पूरे गीत में उत्सव की धूम और उस माहौल को बखूबी उभरा है. मिका सिंह हमेशा की ही तरह जोशीले हैं यहाँ तो श्रेया भी अपनी उर्जात्मक आवाज़ में कुछ कम नहीं रही. ये गीत इस अल्बम का ही नहीं बल्कि शायद फिल्म की सफलता में भी कारगर सिद्ध होगा ऐसे पूरी उम्मीद है.

 अगला गीत “डोंट वरी (हे राम)” में पंचम के क्लास्सिक “दम मारो दम” की सिग्नेचर गिटार की धुन उठा ली गयी है. हो सकता है कि संगीतकार को अपनी धुन पर बहुत अधिक आत्मविश्वास न रहा हो, इसलिए ऐसा किया गया. गीत की धुन और शब्द सरंचना दोनों ही कमजोर हैं और हिमेश की आवाज़ गीत में बिल्कुल नहीं जमी है. “गो गो गोविंदा” की ऊर्जा के सामने एक बेहद कमतर गीत.

“मेरे निशाँ” कैलाश खेर की आवाज़ में है. यहाँ इश्वर धरती पर आकर यहाँ के लोगों में अपने निशाँ ढूंढ रहा है, जो नदारद है. थीम बहुत अच्छा है मगर एक बार फिर गीत कुछ असर नहीं छोड़ता. धुन में न कोई नयापन है न गायकी में कुछ अलग बात. गीत जरुरत से ज्यादा लंबा भी है और किसी अनूठी बात के अभाव में उबाऊ भी लगता है सुनते हुए...मेरे निशाँ गीत में एक शाब्दिक गलती भी है, "जज़्बात" स्वयं में बहुवचन है, ऐसे में "जज्बातों" शब्द का प्रयोग गलत है. 

“तू ही तू” गीत के कई संस्करण है अल्बम में और वो भी अलग अलग आवाजों में. वास्तव में ये एक भजन ही है जो शायद मोहमद इरफ़ान की आवाज़ में सबसे अच्छा लगा है. तेज रिदम के साथ “हरे रामा हरे कृष्णा” सुनना अच्छा लगता है...धुन मधुर है, और शब्बीर के शब्द भी ठीक ठाक हैं.

अल्बम में एक सुन्दर बांसुरी का वाध्य टुकड़ा भी है, जो बहुत मधुर है. जबकि अल्बम का अंतिम गीत “हरी बोल” भी प्रभावी गीत नहीं है. कुल मिलाकर हिमेश ने उत्सवी रगों से सजाने की कोशिश की है इस अलबम को लेकिन “गो गो गोविंदा’ को छोड़कर कोई भी अन्य गीत उनकी प्रतिभा और लोकप्रियता की कसौटी को छू नहीं पाता, रेडियो प्लेबैक इस अल्बम को दे रहा है २.३ की रेटिंग.    

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Monday, September 24, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१७) हीरोईन, और आपकी बात

संगीत समीक्षा -  हीरोईन



संवेदनशील विषयों को अपनी समग्रता के साथ परदे पर उतारने के लिए जाने जाते हैं निर्देशक मधुर भंडारकर. तब्बू से लेकर रवीना, प्रियंका तक जितनी भी हेरोईनों ने उनके साथ काम किया है अपने करियर की बेहतरीन प्रस्तुति दी है, ऐसे में जब फिल्म का नाम ही हेरोईन हो, तो दर्शकों को उम्मीद रहेगी कि उनकी फिल्म, माया नगरी में एक अभिनेत्री के सफर को बहुत करीब से उजागर करेगी. जहाँ तक उनकी फिल्मों के संगीत का सवाल है वो कभी भी फिल्म के कथा विषय के ऊपर हावी नहीं पड़ा है. चलिए देखते हैं फिल्म “हेरोईन” के संगीत का हाल –

मधुर की फिल्म “फैशन” में जबरदस्त संगीत देने वाले सलीम सुलेमान को ही एक बार फिर से आजमाया गया है “हेरोईन” के लिए. गीतकार हैं निरंजन आयंगर. आईटम गीतों के प्रति हमारे फिल्मकारों की दीवानगी इस हद तक बढ़ गयी है कि और कुछ हो न हो एक आईटम गीत फिल्म में लाजमी है, ऐसे ही एक आईटम गीत से अल्बम की शुरुआत होती है- हलकट जवानी. मुन्नी और शीला की तर्ज पर एक और थिरकती धुन, मगर हलकट जवानी पूरी तरह से एक बनावटी गीत लगता है. चंद दिनों बाद कोई शायद ही इस गीत को सुनना पसंद करेगा. पर न इसमें गलती सलीम सुलेमान जैसे काबिल संगीतकार जोड़ी की है न सुनिधि के गायन की. कमी उस रवायत की है जो आनन् फानन में कोई भी तीखा अनोखा शब्द युग्म लेकर आईटम गीतों को रचने की जबरदस्ती से पैदा हो चली है. अच्छे संगीत संयोजन के बावजूद गीत में आत्मा नहीं है. अल्बम की एक निराशाजनक शुरुआत है ये गीत.

हालाँकि इस गीत सुनने के बाद अल्बम को लेकर बहुत सी उम्मीदें नहीं जगती मगर फिर भी अगला गीत “साईयाँ” जो कि राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ में है उस खोयी हुई उम्मीद में एक चमक जरूर भर देता है. वोयिलन का सुन्दर इस्तेमाल, शब्दों का अच्छा प्रयोग और सलीम सुलेमान की खासियत से भरा संयोजन इस गीत में दर्द और मासूमियत भरता है. राहत की आवाज़ में वही चिर परिचित सोज़ है, जो इस गीत को और भी असरकारक बना देता है.

अदिति सिंह शर्मा की रोबीली आवाज़ में “मैं हेरोईन हूँ” शायद एल्बम का सबसे शानदार गीत है. इस गीत में नयापन भी है, ताजगी भी. रिदम और आवाज़ का तालमेल भी जबरदस्त है. निरंजन के शब्द भी असरदायक हैं. गीत में जो किरदार दर्शाना चाह रहा है वो अदिति की आवाज़ में जम कर सामने आता है. लंबे समय तक याद रखे जाने वाला गीत है ये.

“मैं हेरोईन हूँ” को सुनने के तुरंत बाद जब आप श्रेया की हलकी हस्की टोन वाली आवाज़ में “ख्वाहिशें’ सुनते हैं तो एक बार फिर सलीम सुलेमान की तारीफ किये बिना नहीं रह पायेंगें. हर शुक्रवार को बदलते समीकरणों में एक हेरोईन के संघर्ष, उसकी पीड़ा को दर्शाया था कभी गुलज़ार साहब ने भी फिल्म “सितारा” में, (वो गीत कौन सा था ये हमारे श्रोता हमें सुझाएँ). यहाँ ख्वाह्शों के इसी सफर को बखूबी पेश किया है श्रेया ने अपनी आवाज़ में. शब्द अच्छे जरूर है पर थोड़ी सी मेहनत और हुई होती तो शायद ये गीत एक मील का पत्थर साबित होता, बहरहाल इस रूप में भी ये बेहद कारगर है यक़ीनन.

आखिरी गीत “तुझपे फ़िदा” बेनी दयाल और श्रद्धा पंडित के स्वरों में है, यहाँ फिर वही बनावटीपन है गीत में. एक बेअसरदार गीत. कुल मिलाकर “मैं हेरोईन हूँ”, “ख्वाहिशें” और “साईयाँ” एल्बम के बेहतर गीत हैं, सलीम सुलेमान की इस कोशिश को रेडियो प्लेबैक २.८ की रेटिंग दे रहा है ५ में से. आपकी राय क्या है, हमें अवगत कराएँ.


और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Saturday, June 16, 2012

प्लेबैक वाणी (3) -शंघाई, टोला और आपकी बात

संगीत समीक्षा - शंघाई



खोंसला का घोंसला हो या ओए लकी लकी ओए हो, दिबाकर की फिल्मों में संगीत हटकर अवश्य होता है. उनका अधिक रुझान लोक संगीत और कम लोकप्रिय देसिया गीतों को प्रमुख धारा में लाने का होता है. इस मामले में ओए लकी का संगीत शानदार था, तू राजा की राजदुलारी और जुगनी संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा ताज़े रहेंगें जाहिर है उनकी नयी फिल्म शंघाई से भी श्रोताओं को उम्मीद अवश्य रहेगी. अल्बम की शुरुआत ही बेहद विवादस्पद मगर दिलचस्प गीत से होती है जिसे खुद दिबाकर ने लिखा है. भारत माता की जय एक सटायर है जिसमें भारत के आज के सन्दर्भों पर तीखी टिपण्णी की गयी है. सोने की चिड़िया कब और कैसे डेंगू मलेरिया में तब्दील हो गयी ये एक सवाल है जिसका जवाब कहीं न कहीं फिल्म की कहानी में छुपा हो सकता है, विशाल शेखर का संगीत और पार्श्व संयोजन काफी लाउड है जो टपोरी किस्म के डांस को सप्पोर्ट करती है. विशाल ददलानी ने मायिक के पीछे जम कर अपनी कुंठा निकाली है. अल्बम का दूसरा गीत एक आइटम नंबर है मगर जरा हटके. यहाँ इशारों इशारों में एक बार फिर व्यंगात्मक टिप्पणियाँ की गयी है, जिसे समझ कर भरपूर एन्जॉय किया जा सकता है.  इम्पोर्टेड कमरिया का नौटकी नुमा अंदाज़ श्रोताओं को रास आ सकता है. गीतकार कुमार ने अच्छे शब्द बुने हैं दुआ गीत के लिए वहीँ नंदनी श्रीकर की आवाज़ अच्छी जमी है भरे नैना गीत में. खुदाया अल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत प्रतीत होता है. इस सूफी अंदाज़ के गीत में श्रोताओं को काफी गहराई नज़र आएगी. मोर्चा गीत संभवता फिल्म के क्लाईमेक्स में आता होगा जहाँ, क्रांति का बिगुल है और अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का जज्बा दिखाता रोष है, ये गीत अन्ना और उनकी टीम को निश्चित ही प्रेरित करेगा. भगवान विष्णु के १००० नामों की ध्वनि है मंत्र विष्णु सहस्र्नामम में, जिसको प्रमुख धारा की एक बॉलीवुड अल्बम में शामिल करना वाकई हिम्मत का काम है. विशाल शेखर यहाँ कहानी वाला जादू तो यहाँ नहीं रच पाए मगर निराश भी नहीं करते. कुल मिलाकर शंघाई के संगीत को रेडियो प्लेबैक की और से दी जा रही है २.८ की रेटिंग  


पुस्तक चर्चा - टोला




पिकरेस्क (picaresque) यानी कि स्लमडोग मिलेनियर सरीखी कहानियों का चलन हर भाषा के साहित्य में मिलता है. ऐसा ही एक उपन्यास है रमेश दत्त दुबे लिखित "टोला". यहाँ ये कहानी इस श्रेणी की अन्य कहानियों जैसे निराला की "बिल्लेसुर बकरिहा" और "कुल्लीभाट" या फिर केदारनाथ अग्रवाल की "पतिया" जैसे उपन्यासों से अलग इस मामले में भी है कि ये व्यक्ति केंद्रित न होकर समूह केंद्रित अधिक है. बकौल कांति कुमार जैन रमेश के टोले में रहने वाले वो लोग हैं जो समाज के सबसे निचले स्तर पर है या कहें कि हाशिए पर हैं, उनके होने न होने से किसी को कुछ फरक नहीं पड़ता, वो बीडी और अवैध शराब बनाते हैं, गर्भपात करवाते हैं, स्त्रियां जंगल से लकड़ी बीन कर लाने, देह व्यापार करने, लड़ने झगडने और पति की मार खाने के लिए ही जन्म लेती है यहाँ. बाढ़, सूखा और महामारी में कभी पूरा का पूरा टोला खतम हो जाता है मगर कुछ दिनों बाद फिर से बस भी जाता है. किसी बेहतर जीवन का न कोई वादा, न कोई यकीं, न कोई उम्मीद...मगर लेखक इन घुप्प अंधेरों में भी कहीं मानवीय संवेदना तलाश रहा है. दमयंती और मर्दन के प्रेम में जैसे कोई दबी हुई आस टिमटिमा रही है. लेखक ने अपने रियलिस्टिक अप्रोच से पाठकों को बाँध कर रखा है. पृथ्वी का टुकड़ा और गांव का कोई इतिहास नहीं होता जैसे काव्य संग्रह रचने वाले रमेश दत्त दुबे का ये उपन्यास अँधेरी गलियों में जिंदगी के सहर की तलाश है, जो कुछ अलग किस्म का साहित्य पढ़ने को इच्छुक पाठकों को पसंद आ सकती है. उपन्यास के प्रकाशक हैं राधाकृष्ण प्रकाशन और कुल १०७ पृष्ठों की इस उपन्यास की कीमत है १५० रूपए मात्र    


और अंत में आपकी बात, अमित और दीपा तिवारी के साथ

 

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