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Sunday, July 5, 2020

राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 469 : RAG MEGH MALHAR




स्वरगोष्ठी – 469 में आज



काफी थाट के राग – 13 : राग मेघ मल्हार



पण्डित अजय चक्रवर्ती से राग मेघ मल्हार की एक रचना और येशु दास व हेमन्ती शुक्ला के स्वर में फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित अजय चक्रवर्ती 
येशु दास 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की तेरहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग मेघ मल्हार का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग मेघ मल्हार का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग मेघ मल्हार की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में भी उपयोग किया गया है। राग मेघ मल्हार के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म “चश्मेबद्दूर” से राजकमल का स्वरबद्ध किया एक गीत “कहाँ से आए बदरा...”, येशु दास और हेमन्ती शुक्ला के युगल स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग मेघ मल्हार काफी थाट का और औड़व-औड़व जाति का है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’।

राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



हेमन्ती शुक्ला 
वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपको राग मेघ मल्हार का रसास्वादन करा रहे हैं। भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। आज का गीत हमने 1981 प्रदर्शित फिल्म “चश्मेबद्दूर” से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार एक संगीत गुरु अपनी छात्रा को संगीत सिखा रहे हैं। इस राग पर आधारित गीत गाते समय फिल्म की नायिका अपने प्रेमी की स्मृतियों में खो जाती है। इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने और अपने प्रिय की स्मृतियों को ताज़ा करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादल की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म “चश्मेबद्दूर” के संगीतकार राजकमल और गीतकार इन्दु जैन हैं। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग मेघ मल्हार के साथ राग मध्यमात सारंग का स्पर्श भी हुआ है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से ऋतु के अनुकूल पावस का आनन्द लीजिए। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मेघ मल्हार : “कहाँ से आए बदरा...” : येशु दास और हेमन्ती शुक्ला : फिल्म – चश्मेबद्दूर




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 469वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 11 जुलाई, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 471 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 467वें अंक में हमने आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - वृन्दावनी सारंग और शुद्ध सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले व मुहम्मद रफी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की तेरहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग मेघ मल्हार का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग मेघ मल्हार की एक रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म “चश्मेबद्दूर” से राजकमल का स्वरबद्ध किया एक विख्यात गीत “कहाँ से आए बदरा...”, येशु दास व हेमंती शुक्ला के युगल स्वर में प्रस्तुत किया। इस गीत के संगीतकार राजकमल और गीतकार इंदु जैन हैं।

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 469 : RAG MEGH MALHAR : 5 जुलाई, 2020




Sunday, July 21, 2019

राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 427 : RAG MEGH MALHAR






स्वरगोष्ठी – 427 में आज

वर्षा ऋतु के राग – 1 : मेघ मल्हार

पण्डित अजय चक्रवर्ती से इस राग में खयाल और खुर्शीद बेगम से फिल्मी गीत सुनिए





पण्डित अजय चक्रवर्ती
खुर्शीद  बानो
"रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – “वर्षा ऋतु के राग” आरम्भ हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम मल्हार अंग के राग मेघ मल्हार की चर्चा करेंगे। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। स्वतंत्र रूप से मल्हार नाम से कोई राग नहीं होता। यह भारतीय संगीत का एक अंग माना जाता है। मेघ मल्हार, मियाँ मल्हार, गौड़ मल्हार, सूर मल्हार, रामदासी मल्हार आदि रागों के नाम हैं। रागों के नाम से "मल्हार" शब्द जुड़ जाने से यह मल्हार अंग का राग बनता है। आज हम राग मेघ मल्हार पर चर्चा करेंगे। इस राग में आज हम आपको सबसे पहले राग मेघ मल्हार के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से खुर्शीद बेगम का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं। इसके साथ ही राग का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।

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राग मेघ मल्हार वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन माना जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपको राग मेघ मल्हार का रसास्वादन करा रहे हैं। भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बानो ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। “हिन्दी सिने राग इन्साइक्लोपीडिया” के विद्वान ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग सूर मल्हार और मालकौंस की भी छाया है। आप इस गीत के माध्यम से ऋतु के अनुकूल पावस का आनन्द लीजिए।

राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ : स्वर – खुर्शीद बानो : फिल्म – तानसेन


काफी थाट का राग मेघ मल्हार औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला गायकी में सिद्ध गायक और संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’। आप राग मेघ मल्हार में निबद्ध यह खयाल रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 427वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 27 जुलाई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 429 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

"स्वरगोष्ठी" के 425वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म “भूमिका” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – प्रीति सागर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी का एक उत्तर ही सही है, अतः उन्हें केवल एक अंक ही प्राप्त हुए, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” की पहली कड़ी में आज आपने मल्हार अंग के राग “मेघ मल्हार” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में झपताल में प्रस्तुत एक खयाल का रसास्वादन किया। इससे पहले इसी राग पर आधारित फिल्म “तानसेन” से एक मनमोहक गीत अभिनेत्री और गायिका खुर्शीद बानो के स्वरों में सुनवाया गया। संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश ने इस गीत को राग मेघ मल्हार के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 427 : RAG MEGH MALHAR : 21 जुलाई, 2019

Sunday, October 14, 2018

राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 389 : RAG MEGH MALHAR




स्वरगोष्ठी – 389 में आज


पूर्वांग और उत्तरांग राग – 4 : राग मेघ मल्हार


नायिका और गायिका खुर्शीद बानो से फिल्म का एक गीत और पण्डित अजय चक्रवर्ती से राग मेघ मल्हार सुनिए




पण्डित अजय  चक्रवर्ती
खुर्शीद बानो
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हमने राग मेघ मल्हार चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम नायिका और गायिका खुर्शीद बानो के स्वर में 1942 में प्रदर्शित फिल्म “तानसेन” से राग मेघ मल्हार पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में राग मेघ मल्हार में निबद्ध एक खयाल रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपको राग मेघ मल्हार का रसास्वादन करा रहे हैं। भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बानो ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से ऋतु के विपरीत पावस का आनन्द लीजिए।

राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ : स्वर – खुर्शीद बानो : फिल्म – तानसेन


काफी थाट का राग मेघ मल्हार औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’। आप यह खयाल सुनिए और हमें  आज की इस कड़ी  को यहीं विराम  देने की अनुमति दीजिए।

राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 389वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1974 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 20 अक्तूबर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 391वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 387वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म “आँखें” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मीना कपूर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौथी कड़ी में आपने राग मेघ मल्हार का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में राग का यथार्थ स्वरूप का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग में पिरोया संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश द्वारा स्वरबद्ध फिल्म “तानसेन” का गीत खुर्शीद बानो से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 389 : RAG MEGH MALHAR : 14 अक्तूबर, 2018

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