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Sunday, September 29, 2019

राग अहीर भैरव : SWARGOSHTHI – 436 : RAG AHIR BHAIRAV






स्वरगोष्ठी – 436 में आज

भैरव थाट के राग – 2 : राग अहीर भैरव

परवीन सुल्ताना से राग अहीर भैरव में निबद्ध खयाल और मन्ना डे से फिल्मी गीत सुनिए




परवीन सुल्ताना
मन्ना डे
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “अहीर भैरव” पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के दूसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीत-विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में राग अहीर भैरव में निबद्ध दो खयाल रचनाएँ सुनवाएँगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 1963 में प्रदर्शित फिल्म “मेरी सूरत तेरी आँखें” से शैलेंद्र का लिखा और सचिनदेव बर्मन के संगीतबद्ध किये एक गीत – “पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई...” का रसास्वादन आप करेंगे।



राग ‘अहीर भैरव’ भैरव थाट का एक जन्य राग माना जाता है। इसके नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग भैरव का ही एक प्रकार है। इसमें ऋषभ और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग अहीर भैरव के गायन-वादन का सबसे उपयुक्त समय दिन का प्रथम प्रहर अर्थात प्रातःकाल माना गया है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग के वादी-संवादी स्वरों के निर्धारण के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इस राग में षडज स्वर को वादी और मध्यम स्वर को संवादी मानते हैं। ऐसा मानने पर वादी- संवादी को समय की दृष्टि से अपवाद मानना पड़ेगा। राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल अतः इसे उत्तरांगवादी होना चाहिए। मध्यम के अतिरिक्त किसी अन्य स्वर को वादी नहीं माना जा सकता। पंचम स्वर अल्प है, धैवत स्वर को वादी मानने पर भैरव अंग कम हो जाएगा और निषाद स्वर किसी भी राग में वादी नहीं माना गया है। अतः मध्यम स्वर को ही वादी मानना अधिक उचित है। इससे किसी भी नियम का खण्डन नहीं होता। इस राग में मध्यम और कोमल ऋषभ स्वर की संगति तथा ऋषभ स्वर पर आन्दोलन भैरव अंग का परिचायक है। आलाप करते समय बीच-बीच में ऋषभ स्वर का प्रयोग करते हुए भैरव अंग दिखाते रहना पड़ता है, जिससे राग अहीर भैरव का स्वरूप बना रहता है। राग अहीर भैरव के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपके लिए विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में इस राग के दो खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह वीडियो हम ‘यू-ट्यूब’ से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। विलम्बित खयाल के बोल हैं; “साजन ऐसे बन आए...” और द्रुत खयाल के बोल है; “मोहे छेड़ो ना गिरधारी...”

राग अहीर भैरव : विलम्बित और द्रुत खयाल : विदुषी परवीन सुल्ताना



राग अहीर भैरव के कुछ और विशेषताओं की चर्चा भी आवश्यक है। दरअसल राग अहीर भैरव प्राचीन राग नहीं है, किन्तु आजकल इसका प्रचलन बहुत अधिक हो गया है। राग भैरव सुनने का अवसर भले ही कम हो किन्तु राग अहीर भैरव सुनने को अवश्य मिल जाएगा। कुछ विद्वान इस राग में भैरव और खमाज रागों का मिश्रण तो कुछ इसमें भैरव और काफी रागों का मिश्रण मानते हैं। राग अहीर भैरव के पूर्वांग में भैरव और उत्तरांग में खमाज या काफी के स्वर प्रयोग किये जाते हैं। भैरव अंग अधिक प्रबल होने के कारण इसका प्रत्येक आलाप भैरव अंग से ही समाप्त किया जाता है। वादी और गायन-वादन के समय की दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान है, किन्तु इसका चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होता है। इसमें कोमल ऋषभ, शुद्ध गांधार और शुद्ध मध्यम होने के कारण यह प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश राग कहलाता है। आज हम एक ऐसा फिल्मी गीत प्रस्तुत करेंगे, जिसे राग ‘अहीर भैरव’ के स्वरों में पिरोया गया है। 1963 में संगीतकार सचिनदेव बर्मन द्वारा स्वरबद्ध गीतों से सजी फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का एक सदाबहार गीत- ‘पुछो न कैसे मैंने रैन बिताई....’, राग ‘अहीर भैरव’ पर आधारित था। फिल्मों में इस गीत के अलावा इसी राग पर आधारित कई गीत रचे गए, किन्तु जो लोकप्रियता फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ के गीत को प्राप्त हुई, वह अन्य गीतों को न मिल सकी। अद्धा तीनताल और कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत के गीतकार शैलेन्द्र हैं।आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अहीर भैरव : “पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई...” : मन्ना डे : फिल्म - मेरी सूरत तेरी आँखें




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 436वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका की है।

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 5 अक्तूबर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 438 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 434वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने जन्य राग अहीर भैरव का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात शास्त्रीय गायिका विदुषी परवीन सुलताना के स्वर में इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। राग अहीर भैरव की आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे के स्वर में फिल्म “मेरे सूरत तेरी आँखें” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम भैरव थाट के एक जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। सभी संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग अहीर भैरव : SWARGOSHTHI – 436 : RAG AHIR BHAIRAV : 29 सितम्बर, 2019

Sunday, May 12, 2019

राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 419 : RAG ALHAIYA BILAWAL






स्वरगोष्ठी – 419 में आज

बिलावल थाट के राग – 7 : राग अल्हैया बिलावल

विदुषी किशोरी अमोनकर से इस राग में खयाल और मन्ना डे व साथियों से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी किशोरी अमोनकर
संगीतकार मदन मोहन
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से दूसरा थाट बिलावल है। इस श्रृंखला में हम बिलावल थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में बिलावल थाट के जन्य राग “अल्हैया बिलावल” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में इस राग का एक आकर्षक खयाल सुनवाएँगे। साथ ही 1972 में प्रदर्शित फिल्म “बावर्ची” से राग अल्हैया बिलावल और रागमाला में पिरोया एक मोहक गीत मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के स्वरों में सुनवाएँगे और इसके संगीतकार मदन मोहन के बारे में आपको कुछ जानकारी देंगे।



राग अल्हैया बिलावल का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना गया है और इस थाट के आश्रय राग बिलावल का ही एक प्रकार है। इस राग के आरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस कारण इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। आरोह में शुद्ध और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग अल्हैया बिलावल के गायन-वादन का समय दिन का प्रथम प्रहर होता है। राग के आरोह में ऋषभ और अवरोह में गान्धार स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग आरोह में और कोमल निषाद का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो धैवत के बीच में किया जाता है राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है, अर्थात इसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में आता है। इस राग का चलन भी सप्तक के उत्तरांग में और तार सप्तक में अधिक किया जाता है। आजकल राग अल्हैया बिलावल का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है केवल बिलावल कह देने से लोग अल्हैया बिलावल ही समझते हैं, जबकि राग बिलावल और अल्हैया बिलावल दो अलग-अलग राग हैं। राग अल्हैया बिलावल के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 16 मात्रा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने के गायकी में दक्ष विदुषी किशोरी अमोनकर। इस गायन में उनकी शिष्याओं का योगदान भी है। राग अल्हैया बिलावल की इस बन्दिश के बोल हैं – ‘कवन बतरिया गैलो माई...’। आप यह रचना सुनिए।

राग अल्हैया बिलावल : ‘कवन बतरिया गैलो माई...’ : विदुषी किशोरी अमोनकर


मदन मोहन उन गिने-चुने संगीतकारों में से थे जो नए-नए प्रयोग करने से नहीं कतराते थे। शास्त्रीय रागों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग मदन मोहन ने किए जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’बावर्ची’ का गीत ही ले लीजिए "भोर आई गया अँधियारा..."। यह स्थायी और सात अन्तरों वाला गीत यूँ तो एक रागमाला गीत है किन्तु गीत का शुरुआती भाग मुख्य रूप से राग अल्हैया बिलावल पर आधारित है। ’बावर्ची’ फ़िल्म में एक ऐसा प्रसंग था कि सुबह के वक़्त संयुक्त परिवार में चहल-पहल शुरु हुई है, पिताजी के चरण-स्पर्ष हो रहे हैं, सुबह की चाय पी जा रही है, बावर्ची अपने काम पे लगा है, संगीतकार बेटा अपने सुर लगा रहा है, घर की बेटियाँ घर के काम-काज में लगी हैं। इस प्रसंग के लिए गीत बनाना आसान काम नहीं था। पर मदन मोहन ने एक ऐसे गीत की रचना कर दी कि इस तरह का यह आज तक का एकमात्र गीत बन कर रह गया है। बावर्ची बने फ़िल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए मन्ना डे की आवाज़ ली गई जो इस गीत के मुख्य गायक हैं, जो बिखरते हुए उस परिवार को एक डोर में बाँधे रखने के लिए इस गीत में सबको शामिल कर लेते हैं। पिता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का पार्श्वगायन उन्होंने ख़ुद ही किया, संगीतकार बेटे (असरानी) को आवाज़ दी किशोर कुमार ने, और घर की दो बेटियों (जया भादुड़ी और उषा किरण) के लिए आवाज़ें दीं शास्त्रीय-संगीत की शीर्ष की दो गायिकाओं लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी ने। कैफ़ी आज़मी ने गीत लिखा और नृत्य निर्देशन के लिए चुना गया गोपीकृष्ण को। कलाकारों के इस अद्वितीय आयोजन ने इस गीत को अमर बना दिया। और मदन मोहन ने अल्हैया बिलावल के साथ राग खमाज, मारू बिहाग, नट भैरवी, धानी और हंसध्वनि के अन्तरों से इस गीत को सजाया है। गीत का स्थायी और पहला अन्तरा राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध है। दूसरा अन्तरा “धरती भी झूमें...” लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी और मन्ना डे के स्वर में है और खमाज पर आधारित है। तीसरा अन्तरा “दिन ये सन्देशा लेकर...” भी राग खमाज पर आधारित है और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय की आवाज़ में है। चौथे अन्तरे “देखो कहता है तुमसे...” में पुनः लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी और मन्ना डे के स्वर हैं और यह राग मारू बिहाग पर आधारित है। गीत का अगला अन्तरा “गुड मार्निंग गुड मार्निंग ओ पापा...” किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय की आवाज़ में है। यह भाग राग नट भैरवी पर आधारित है। इन्हीं आवाज़ों में गीत का अगला अन्तरा “द मार्निंग रेज़ आर कमिंग...” राग धानी पर आधारित है। गीत का अन्तिम अन्तरा “आई पनिया भरन की बेला...”, जो लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी के स्वर में है। इसे मदन मोहन ने राग हंसध्वनि का आधार दिया है। गीत का समापन इसी राग के तराना से होता है। हर बदले हुए राग के अन्तरे के बाद राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध स्थायी की पंक्तियाँ वापस आती हैं। आप राग अल्हैया बिलावल से आरम्भ होने वाले इस रागमाला गीत का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अल्हैया बिलावल : "भोर आई गया अँधियारा..." : मन्ना डे और साथी : फिल्म – बावर्ची




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 419वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 420वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 18 मई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 421 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 417वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1956 में प्रदर्शित फिल्म “परिवार” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – हंसध्वनि, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और मन्ना डे

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया  भाग दो का मुखपृष्ठ
मित्रों, पिछले सप्ताह हमने आपका परिचय भारतीय संगीत के एक ऐसे अध्येता से कराया था, जिन्होने अथक परिश्रम कर अब तक 5700 फिल्मों के लगभग 17000 गीतों में प्रयुक्त विविध रागों का अध्ययन और विश्लेषण किया है। भारतीय संगीत के इस पारखी का नाम कन्हैया लाल पाण्डेय (के.एल. पाण्डेय) है। 4 नवम्बर, 1954 को उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद में इनका जन्म हुआ था। हरदोई के ही तत्कालीन संगीत-गुरु पण्डित सुखदेव बहादुर सिंह और पण्डित विद्यासागर सिंह से संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1974 में लखनऊ विश्वविद्यालय से जीव रसायन विषय से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। 1978 में उन्होने रेल यातायात सेवा में पदभार ग्रहण किया। सिविल सेवा की तैयारियों और रेल सेवा में अधिकारी पद पर रहते हुए संगीत से नाता जुड़ा रहा। सेवाकाल के दौरान देश के विभिन्न स्थानों पर अनेक गुणी संगीतज्ञों से सम्पर्क हुआ और फिल्मी गीतों का संकलन और विश्लेषण का कार्य जारी रहा। वर्तमान में श्री पाण्डेय के पास लगभग 2000 फिल्मों और 2 लाख रिकार्डिंग का संकलन है। 1931 में बनी फिल्म “आलम आरा” से फिल्मों ने बोलना सीख लिया था। तब से लेकर 2017 तक की फिल्मों के लगभग 5700 फिल्मों के 17000 गीतों में रागों का विश्लेषण पाण्डेय जी कर चुके हैं। विश्लेषित गीतों का वर्णक्रमानुसार तीन खण्डों में प्रकाशन भी हो चुका है। इस विशाल संकलन का शीर्षक “हिन्दी सिने राग इन्साइक्लोपीडिया” रखा गया है। द्वितीय खण्ड में एच से एम वर्ण से शुरू होने वाले गीतों को 604 पृष्ठों में शामिल किया गया है। इस खण्ड के मुखपृष्ठ का चित्र यहाँ दिया जा रहा है। अन्य खण्डों की जानकारी आगामी अंकों में दी जाएगी। विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए आप kanhayaabha@gmail.com अथवा swargoshthi@gmail.com पर सन्देश भेज सकते हैं।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की सातवीं कड़ी में आज आपने बिलावल थाट के राग “अल्हैया बिलावल” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “बावर्ची” से राग अल्हैया बिलावल और रागमाला में पिरोया एक मोहक गीत मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के स्वरों में सुनवाया। संगीतकार मदन मोहन ने इस गीत को राग अल्हैया बिलावल और रागमाला के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 419 : RAG ALHAIYA BILAWAL : 12 मई, 2019

Sunday, July 22, 2018

राग बागेश्री : SWARGOSHTHI – 377 : RAG BAGESHRI






स्वरगोष्ठी – 377 में आज

राग से रोगोपचार – 6 : रात्रि के दूसरे प्रहर का राग बागेश्री

असामान्य मनःस्थितियों को दूर भगाता है राग बागेश्री




विदुषी मालिनी राजुरकर
मन्ना डे
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के छठे अंक में आज हम राग बागेश्री के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको ग्वालियर परम्परा की सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में राग बागेश्री में निबद्ध एक तराना सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1962 में प्रदर्शित फिल्म “प्राइवेट सेक्रेटरी” से इसी राग में पिरोया एक गीत मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



राग बागेश्री के आरोह के स्वर हैं; सा, ग॒, म, ध, नि॒ सां और अवरोह के स्वर सां, सा, नि॒, ध, म, प, ध, म, ग॒, रे, सा। अभावग्रस्त एवं चिन्ताग्रस्त व्यक्ति की भयानक कष्ट की स्थिति जब सीमा पार कर जाती है तो व्यक्ति हताशा, विषाद और चिन्ताविकृति जैसी असामान्य मानसिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। बीमारी, गरीबी, सामाजिक उपेक्षा एवं संवेदनहीनता ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न करने में सहायक होती हैं। परित्यक्ता या विधवा नारी, उसका विखरा और उजड़ा हुआ जीवन, अनाथ बालक-बालिका की हताशा, विषम सामाजिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न आक्रोश, चिड़चिड़ापन, असामान्य मनःस्थितियाँ आदि के हालात में राग बागेश्री के स्वरों तथा वादी स्वर मध्यम का स्वरात्मक गम्भीर प्रभाव पीड़ित व्यक्ति मर्मस्थल में चोट करते हैं। इन स्वरों के प्रभाव से व्यक्ति को मानसिक शान्ति प्राप्त हो सकती है। राग बागेश्री में श्रेष्ठ कलासाधकों द्वारा प्रस्तुत गायन, सितार, सरोद, इसराज, सारंगी, मयूरवीणा, सुरबहार, विचित्रवीणा वादन की नादात्मक प्रभाव शान्ति और सुखद निद्रा का लाभ प्रदान कर सकते है।

अब हम आपको राग बागेश्री में निबद्ध एक तराना सुनवाते हैं, इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। मालिनी जी के स्वर में राग बागेश्री में निबद्ध तराना अब आप सुनिए।

राग बागेश्री : तीनताल में निबद्ध तराना  : विदुषी मालिनी राजुरकर


राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त है। इस राग को काफी थाट से सम्बद्ध माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ प्रयोक्ता आरोह में पंचम स्वर वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्धति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन आदर्श माना जाता है। इस राग में श्रृंगारपूर्ण रचनाएँ खूब फबतीं हैं।

पाँचवें से आठवें दशक तक हिन्दी और गुजराती फिल्मों के संगीत से जुड़े डी. दिलीप का वास्तविक नाम दिलीप ढोलकिया है। जूनागढ़, गुजरात में 15 अक्तूबर, 1921 में जन्में दिलीप ढोलकिया ने बचपन में ही बाँसुरी और पखावज वादन की शिक्षा प्राप्त की थी। उनके दादा जी पण्डित मणिशंकर ढोलकिया अपने समय के विख्यात कीर्तनकार थे। वे सात वर्ष की आयु से ही जूनागढ़ के स्वामीनारायण मन्दिर में अपने दादा जी के साथ कीर्तन मण्डली में गायन और तबला, पखावज वादन करने लगे थे। दिलीप ढोलकिया के पिता भोगीलाल ढोलकिया कुशल बाँसुरी वादक थे। समृद्ध सांगीतिक परिवेश पाले-बढ़े बालक दिलीप ने बाद में संगीतज्ञ पण्डित पाण्डुरंग अम्बेडकर से विधिवत संगीत सीखा, जो स्वयं विख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमान अली खाँ के शिष्य थे। संगीत से लगाव के कारण उन्होने 1944 में मुम्बई (तब बम्बई) का रुख किया। आरम्भ में दिलीप ढोलकिया ने रेडियो और एच.एम.वी. के लिए गीत गाये। 1944 की फिल्म ‘किस्मतवाला’ में शान्तिकुमार देसाई और रतन लाल के संगीत निर्देशन में और 1946 की फिल्म ‘लाज’ में रामचन्द्र पाल के संगीत निर्देशन में गीत गाये। बाद में संगीतकार चित्रगुप्त के सहायक हो गए और उनके संगीत निर्देशन में बनी फिल्म ‘भक्त पुण्डलीक’ में भी गीत गाये। 1951 में प्रदर्शित गुजराती फिल्म ‘दिवाद्दाण्डी’ में पहली बार पार्श्वगायन किया। 1951 से 1960 के दौरान उनकी पहचान सहायक संगीतकार के रूप में बनी। स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का पहला अवसर उन्हें 1956 में बनी फिल्म ‘बगदाद की रातें’ में मिला। परन्तु इस फिल्म का प्रदर्शन इसके निर्माण के छः वर्ष बाद हुआ। फिल्म में कर्णप्रिय संगीत के बावजूद दिलीप ढोलकिया को तत्काल कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। इस बीच 1960 में तेलुगू फिल्मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता एन.टी. रामाराव अभिनीत फिल्म ‘भक्ति महिमा’ में स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर मिला। उन्होने इस फिल्म में 16 मोहक गीतों की संगीत रचना की थी। 1961 में फिल्म ‘सौगन्ध’ और ‘तीन उस्ताद’ के स्वरबद्ध गीत दिलीप ढोलकिया की प्रतिभा को रेखांकित करने में सफल रहे। 1962 में उनके संगीत से सजी सर्वाधिक उल्लेखनीय फिल्म ‘प्राइवेट सेक्रेटरी’ का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म के गीत अपनी मधुरता और रागों के आधार के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हुए। अशोक कुमार और जयश्री गडकर अभिनीत इस फिल्म के गीतों को मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। आज हमारी चर्चा में इसी फिल्म का एक गीत- ‘जा रे बेईमान तुझे जान लिया...’ है, जिसे दिलीप ढोलकिया ने राग बागेश्री के स्वरों में पिरोया था। प्रेम धवन के गीत को मन्ना डे ने एकताल और दादरा ताल में अपने पूरे कौशल के साथ गाया है। लीजिए, उनके मधुर स्वर में सुनिए, राग बागेश्री पर आधारित यह गीत और मुझे इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बागेश्री : ‘जा रे बेईमान तुझे जान लिया...’ : मन्ना डे : फिल्म - प्राइवेट सेक्रेटरी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 377वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 जुलाई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 379वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 375वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मारूविहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा, और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कोटा, राजस्थान से तुलसी राम वर्मा, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की छठी कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग बागेश्री का परिचय प्राप्त किया।

आज के अंक में हम आपको लोक संगीत विषयक एक अनूठी और दुर्लभ पुस्तक के पुनर्प्रकाशन की सूचना और इस दुर्लभ पुस्तक की संक्षिप्त जानकारी देना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 1977 में लोक संगीत की एक महत्त्वकांक्षी पुस्तक “ऊँची अटरिया रंग भरी” का प्रकाशन किया था। इस पुस्तक के 106 पारम्परिक गीतों का संकलन सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी ने किया था। उन्होने पारम्परिक लोकगीतों का 39 शीर्षक में संकलन ही नहीं, बल्कि उन गीतों का परिचय और स्वरलिपि भी तैयार किया था। लगभग चार दशक पहले इस पुस्तक का प्रकाशन हुआ था। वर्तमान में इस पुस्तक की माँग थी, किन्तु विगत दो दशक से यह संगीत-प्रेमियों के लिए अप्राप्य थी। पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की सुपुत्री नीलम चतुर्वेदी के प्रयत्नों से इस पुस्तक के द्वितीय संस्करण का प्रकाशन केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी ने किया है। 360 पृष्ठों के इस ग्रन्थ का मूल्य 625 रुपए है। अधिक जानकारी के लिए अकादमी के रवीन्द्र भवन, 35, फिरोज शाह रोड, नई दिल्ली 110001 स्थित कार्यालय से अथवा ई-मेल mail@sangeetnatak.gov.in पर सम्पर्क कर सकते हैं।

हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   





रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग बागेश्री : SWARGOSHTHI – 377 : RAG BAGESHRI : 22 जुलाई, 2018

Sunday, September 24, 2017

ठुमरी भैरवी : SWARGOSHTHI – 336 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 336 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 3 : ठुमरी भैरवी

श्रृंगार रस की ठुमरी को मन्ना डे ने हास्य रस में रूपान्तरित किया - “फूलगेंदवा न मारो...”





रसूलन बाई
मन्ना डे
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक में हम आपसे पूरब अंग की एक विख्यात ठुमरी गायिका रसूलन बाई के व्यक्तित्व पर और उन्हीं की गायी एक अत्यन्त प्रसिद्ध ठुमरी- ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में जाय...’ पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस ठुमरी के फिल्म ‘दूज का चाँद’ में संगीतकार रोशन और पार्श्वगायक मन्ना डे द्वारा किये प्रयोग पर भी आपसे चर्चा करेंगे।



ठुमरी भैरवी : “फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में जाय...” : रसूलन बाई
ठुमरी भैरवी : “फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...” : मन्ना डे : फिल्म – दूज का चाँद




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 336वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस विख्यात गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 30 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 338वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 334वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म – “मंज़िल” से लिये गए दादरा का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – पार्श्वगायक – मन्ना डे

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस तीसरी कड़ी में आपने राग भैरवी की ठुमरी का रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।
  
वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, September 17, 2017

भैरवी दादरा : SWARGOSHTHI – 335 : BHAIRAVI DADARA




स्वरगोष्ठी – 335 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 2 : भैरवी दादरा

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का गाया दादरा जब मन्ना डे ने दुहराया- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...”




उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ
मन्ना डे
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक में हम ‘आफ़ताब-ए-मौसिकी’ के खिताब से नवाज़े गए उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। साथ ही उनका गाया भैरवी का एक दादरा- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” और इसी ठुमरी का पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में फिल्म “मंज़िल” में किये गए रोचक उपयोग की चर्चा करेंगे। यह दादरा 1960 में प्रदर्शित, देव आनन्द, नूतन और महमूद अभिनीत फिल्म ‘मंज़िल’ में संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने पहले दादरा ताल में और अन्त में तीनताल में प्रयोग किया था।


भैरवी दादरा : “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ
भैरवी दादरा : “बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...” : मन्ना डे : फिल्म – मंज़िल




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 335वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा राग है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस फिल्मी पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 23 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 337वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 333वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में प्रस्तुत राग झिझोटी की ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग - झिझोटी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल - सोलह मात्रा का तिलवाड़ा अथवा जत ताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस दूसरी कड़ी में आपने राग भैरवी के दादरा का रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, July 9, 2017

राग पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 325 : RAG PAHADI




स्वरगोष्ठी – 325 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 11 : राग पहाड़ी

रोशन की जन्मशती पर उनकी स्मृतियों को शताधिक नमन




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की ग्यारहवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस सप्ताह की 14 जुलाई 2017 को संगीतकार रोशन की जन्मशती पूर्ण हो तही है। यह श्रृंखला हमने इसीलिए रोशन की स्मृतियों को समर्पित की है। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवाया और इनके रागों पर चर्चा भी की। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो”। रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की समापन कड़ी में आज हमने 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दादी माँ’ से एक युगलगीत चुना है, जिसे रोशन ने राग पहाड़ी का आधार दिया है। यह गीत मन्ना डे और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में एक ठुमरी विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।




मन्ना  डे
महेन्द्र कपूर
स सप्ताह की 14 जुलाई को संगीतकार रोशन की जन्मशती पूर्ण हो रही है। जैसा कि उपरोक्त भूमिका में उल्लेख किया गया है कि रोशनलाल नागरथ का जन्म 17 जुलाई, 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में हुआ था। यह श्रृंखला हम उनकी जन्मशती की पूर्णता के उपलक्ष्य में प्रस्तुत कर रहे हैं। 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘नेकी और बदी’ रोशन की संगीतबद्ध पहली फिल्म थी। 1968 की फिल्म ‘अनोखी रात’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। इसी के साथ एक और फिल्म ‘अरमान भरा दिल’ तैयार तो थी, किन्तु प्रदर्शित नहीं हुई थी। रोशन ने फिल्म ‘अनोखी रात’ का संगीत तैयार तो कर दिया था, किन्तु फिल्म का एक गीत, -“महलों का राजा मिला, तुम्हारी बेटी राज करेगी...” रिकार्ड नहीं हो पाया था। इस गीत को उनकी पत्नी इरा रोशन ने उनके निधन के बाद स्वयं रिकार्ड कराया और फिल्म पूरी की। रोशन ने फिल्म ‘दूर नहीं मंज़िल’ का केवल एक गीत, -“लिये चल गड़िया ओ मेरे मितवा दूर नहीं मंज़िल...” रिकार्ड कराया था। उनके निधन के बाद शेष गीत शंकर जयकिशन ने रिकार्ड कराया था। 16 नवम्बर, 1967 को मुम्बई में हरि वालिया की फिल्म ‘लाट साहब’ की सफलता की दावत में रोशन को दिल का दौरा पड़ा और उनका असामयिक निधन हो गया। निधन से कुछ ही दिन पूर्व रोशन ने विविध भारती पर प्रसारित होने वाली विशेष जयमाला कार्यक्रम की रिकार्डिंग की थी, जिसका प्रसारण 2 दिसम्बर, 1967 को हुआ था। इस श्रृंखला की पिछली दस कड़ियों में हमने रोशन के राग आधारित गीतों की सूची से अलग-अलग रागों के गीत चुने है। आज के अंक में हमने रोशन के स्वरबद्ध किये फिल्म ‘दादी माँ’ का एक गीत चुना है, जिसमें राग पहाड़ी की झलक है। पार्श्वगायक मन्ना डे और महेन्द्र कपूर के स्वरों में प्रस्तुत इस युगलगीत के बोल हैं, -“उसको नहीं देखा हमने कभी पर इसकी ज़रूरत क्या होगी...” गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के इस गीत में माँ की ममता और महत्ता का प्रेरक चित्रण है। आइए, अब हम संगीतकार रोशन की जन्मशती पूर्णता के अवसर पर उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए उनका संगीतबद्ध किया राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत सुनते हैं।

राग पहाड़ी : “उसको नहीं देखा हमने कभी...” मन्ना डे और महेन्द्र कपूर : फिल्म – दादी माँ



परवीन सुल्ताना
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर में उपस्थित जो भी दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं। भारतीय संगीत के कई रागों का उद्गम लोक संगीत से हुआ है। इन्हीं में से एक है, राग पहाड़ी, जिसकी उत्पत्ति भारत के पर्वतीय अंचल में प्रचलित लोक संगीत से हुई है। यह राग बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग पहाड़ी में मध्यम और निषाद स्वर बहुत अल्प प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग की जाति का निर्धारण करने में इन स्वरों की गणना नहीं की जाती और इसीलिए इस राग को औड़व-औड़व जाति का मान लिया जाता है। राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका चलन चंचल है और इसे क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, गीत, ग़ज़ल आदि रचनाएँ खूब मिलती हैं। आम तौर पर गायक या वादक इस राग को निभाते समय रचना का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए विवादी स्वरों का उपयोग भी कर लेते हैं। मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली से बचाने के लिए राग पहाड़ी के अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। मन्द्र धैवत पर न्यास करने से राग पहाड़ी स्पष्ट होता है। इस राग के गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का पहला प्रहर माना जाता है। राग पहाड़ी के स्वरूप को स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए अब आप इसी राग में सुनिए, कण्ठ संगीत की एक आकर्षक रचना। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी बेगम परवीन सुलताना। आप राग पहाड़ी की यह ठुमरी अंग की रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक और इस श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पहाड़ी : ‘जा जा रे कगवा मोरा सन्देशवा पिया पास ले जा...’ : विदुषी परवीन सुलताना



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 325वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1942 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 15 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 327वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 323वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – पीलू, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – आशा भोसले

इस अंक की पहेली में हमारे सभी पाँच नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस ग्यारहवें और समापन अंक में हमने आपके लिए राग पहाड़ी पर आधारित फिल्म ‘दादी माँ’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। इस कड़ी के साथ ही हमारी इस श्रृंखला का समापन होता है। आगामी अंक से हम एक नई श्रृंखला का प्रारम्भ कर रहे हैं। हमारी आगामी श्रृंखला एक नए रंग-रूप के साथ प्रस्तुत होगी। आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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