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Sunday, April 15, 2018

राग भैरव और जोगिया : SWARGOSHTHI – 365 : RAG BHAIRAV & JOGIYA




स्वरगोष्ठी – 365 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 4 : भैरव थाट 


राग भैरव और जोगिया के स्वरों में शिव की आराधना




डॉ.प्रभा अत्रे
महेन्द्र कपूर और कमल बारोट
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे भैरव थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरव में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरव थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग जोगिया के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



श्रृंखला की आज की कड़ी में हम भैरव थाट और इसके आश्रय राग पर चर्चा करेंगे। पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान में प्रचलित थाट पद्धति पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित है। भातखण्डे जी ने गम्भीर अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तत्कालीन प्रचलित राग-वर्गीकरण की जितनी भी पद्धतियाँ उत्तर भारतीय संगीत में प्रचार में आईं और उनके काल में अस्तित्व में थीं, उनके रागों के वर्गीकरण के नियम आज के रागों पर लागू नहीं हो सकता। गत कुछ शताब्दियों में सभी रागों में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन हुए हैं, अतः उनके पुराने और नए स्वरूपों में कोई समानता नहीं है। भातखण्डे जी ने तत्कालीन राग-रागिनी प्रणाली का परित्याग किया और इसके स्थान पर जनक मेल और जन्य प्रणाली को राग वर्गीकरण की अधिक उचित प्रणाली माना। उन्हें इस वर्गीकरण का आधार न केवल दक्षिण में, बल्कि उत्तर में ‘राग-तरंगिणी’, ‘राग-विबोध’, ‘हृदय-कौतुक’, और ‘हृदय-प्रकाश’ जैसे ग्रन्थों में मिला।

आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘भैरव’। इस थाट में प्रयोग किये जाने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म, प, ध॒(कोमल), नि । अर्थात ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। थाट ‘भैरव’ का आश्रय राग ‘भैरव’ ही है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग ‘भैरव’ में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। राग में आरोह के स्वर- सा, रे(कोमल), ग, म, प, (कोमल), नि, सां तथा अवरोह के स्वर- सां, नि, (कोमल), प, म, ग, रे(कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग भैरव के स्वर समूह भक्तिरस का सृजन करने में समर्थ हैं। इस राग का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए अब हम आपको विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे के स्वरों में राग भैरव का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में संलग्न प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल में निबद्ध है।

राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिव शंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे


‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- अहीर भैरव, गौरी, नट भैरव, वैरागी, रामकली, गुणकली, कलिंगड़ा, जोगिया, विभास आदि। आज हम आपको राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। अर्थात, यह औड़व-षाड़व जाति का राग है। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे(कोमल), म, प, (कोमल), सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, (कोमल), प, (कोमल), म, रे(कोमल), सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। यह गीत वास्तव में शिव वन्दना है। अनेक विद्वानो का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर...’ : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर : फिल्म - संगीत सम्राट तानसेन



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 365वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 21 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 367वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 363वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म “भूमिका” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – प्रीति सागर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारे एक नए प्रतिभागी जीतेन्द्र शेटे ने पहेली के तीन में से दो सही उत्तर दिया है। हम उनका हार्दिक स्वागत कराते हुए उन्हें दो अंक प्रदान कर रहे है। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध अपने पता के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की चौथी कड़ी में आपने भैरव थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग भैरव में पिरोया भक्तिरस से परिपूर्ण एक खयाल सुविख्यात गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही भैरव थाट के जन्य राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी भक्तिगीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर के युगल स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, October 1, 2017

ठुमरी खमाज और पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 337 : THUMARI KHAMAJ & PAHADI




स्वरगोष्ठी – 337 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 4 : ठुमरी खमाज और पहाड़ी

“कौन गली गयो श्याम...” - श्रृंगार और भक्ति का अनूठा समागम है इस ठुमरी में





डॉ. प्रभा  अत्रे
परवीन सुल्ताना
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक में हम हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं, खमाज की एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी- ‘कौन गली गयो श्याम...’। इस ठुमरी को कई गायक-गायिकाओं ने गाया है। इनमें विदुषी रसूलन बाई, डॉ. प्रभा अत्रे, पण्डित छन्नूलाल मिश्र, विदुषी परवीन सुलताना आदि की प्रस्तुतियाँ रेखांकित की जा सकती है। आज हम आपको पहले यह पारम्परिक ठुमरी डॉ. प्रभा अत्रे द्वारा राग मिश्र खमाज के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद यही ठुमरी बेगम परवीन सुलताना द्वारा राग पहाड़ी के स्वरों में सुनवाएँगे, जिसे उन्होने फिल्म ‘पाकीज़ा’ के लिए गाया था।



ठुमरी मिश्र खमाज : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे
ठुमरी पहाड़ी : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी परवीन सुलताना : फिल्म – पाकीज़ा





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 337वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस विख्यात पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 7 अक्टूबर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 339वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 335वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म – “दूज का चाँद” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – पार्श्वगायक – मन्ना डे

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस तीसरी कड़ी में आपने राग एक ही ठुमरी का राग मिश्र खमाज और पहाड़ी में रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, June 18, 2017

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 322 : RAG BHAIRAVI





स्वरगोष्ठी – 322 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 8 : राग भैरवी

रोशन की जन्मशती वर्ष में विदुषी प्रभा अत्रे और मन्ना डे से राग भैरवी के गीत सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की आठवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल ही तो है’ का एक अनूठा गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग भैरवी के स्वरों में पिरोया है। यह गीत मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में निबद्ध एक भक्तिगीत सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



मन्ना डे
सुरगन्धर्व मन्ना डे से रोशन का साथ 1957 की फिल्म 'आगरा रोड' से हुआ जिसमे मन्ना डे ने गीता दत्त के साथ एक हास्य गीत -"ओ मिस्टर, ओ मिस्टर सुनो एक बात..." गाया था। 1959 में मन्ना डे ने रोशन की तीन फिल्मों -'आँगन', 'जोहरा ज़बीं' और 'मधु' के गीतों को गाया, जिसमें 'मधु' फिल्म का भजन -"बता दो कोई कौन गली गए श्याम..." बहुत लोकप्रिय हुआ। 1960 की फिल्म 'बाबर' की कव्वाली -"हसीनों के जलवे परेशान रहते....." ने भी संगीत प्रेमियों को आकर्षित किया। परन्तु इन दोनों बहुआयामी कलाकारों की श्रेष्ठतम कृति तो अभी आना बाकी था। 1960 में फिल्म 'बरसात की रात' आई, जिसके लिए रोशन ने एक 12 मिनट लम्बी कव्वाली का संगीत रचा। इसे गाने के लिए मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा और एस.डी. बातिश को चुना गया। मन्नाडे को इस जवाबी कव्वाली में उस्ताद के लिए, मोहम्मद रफ़ी को नायक भारत भूषण के लिए और आशा भोसले को नायिका के लिए गाना था। इस कव्वाली के बोल थे -"ना तो कारवाँ की तलाश है...."। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह कव्वाली फिल्म संगीत के क्षेत्र में 'मील का पत्थर' सिद्ध हुआ। रोशन और मन्ना डे, दोनों शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित थे और लोक संगीत की समझ रखने वाले थे। 1963 में रोशन को एक अवसर मिला, अपना श्रेष्ठतम संगीत देने का। फिल्म थी 'दिल ही तो है', जिसमे राज कपूर और नूतन नायक-नायिका थे। यह गाना राज कपूर पर फिल्माया जाना था। फिल्म के प्रसंग के अनुसार एक संगीत मंच पर एक नृत्यांगना के साथ बहुत बड़े उस्ताद को गायन संगति करनी थी। अचानक उस्ताद के न आ पाने की सूचना मिलती है। आनन-फानन में चाँद (राज कपूर) को दाढ़ी-मूंछ लगा कर मंच पर बैठा दिया जाता है। रोशन ने इस प्रसंग के लिए गीत का जो संगीत रचा, उसमे शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत की इतनी सारी शैलियाँ डाल दीं कि उस समय के किसी फ़िल्मी पार्श्वगायक के लिए बेहद मुश्किल काम था। मन्ना डे ने इस चुनौती को स्वीकार किया और गीत -"लागा चुनरी में दाग, छुपाऊं कैसे...." को अपना स्वर देकर गीत को अमर बना दिया। इस गीत का ढांचा 'ठुमरी' अंग में है, किन्तु इसमें ठुमरी के अलावा 'तराना', 'पखावज के बोल', 'सरगम', नृत्य के बोल', 'कवित्त', 'टुकड़े', यहाँ तक कि तराना के बीच में हल्का सा ध्रुवपद का अंश भी इस गीत में है। संगीत के इतने सारे अंग मात्र सवा पाँच मिनट के गीत में डाले गए हैं। जिस गीत में संगीत के तीन अंग होते हैं, उन्हें 'त्रिवट' और जिनमें चार अंग होते हैं, उन्हें 'चतुरंग' कहा जाता है। मन्ना डे के गाये इस गीत को कोई नया नाम देना चाहिए। यह गीत भारतीय संगीत में 'सदा सुहागिन राग' के विशेषण से पहचाने जाने वाले राग -"भैरवी" पर आधारित है। कुछ विद्वान् इसे राग "सिन्धु भैरवी" पर आधारित मानते हैं किन्तु जाने-माने संगीतज्ञ पं. रामनारायण ने इस गीत को "भैरवी" आधारित माना है। गीत की एक विशेषता यह भी है कि गीतकार साहिर लुधियानवी ने कबीर के एक निर्गुण पद की भावभूमि पर इसे लिखा है। आइए इस कालजयी गीत को सुनते हैं।

राग भैरवी : ‘लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे...’ : मन्ना डे : फिल्म – दिल ही तो है


प्रभा अत्रे
राग भैरवी के स्वर-समूह अनेक रसों का सृजन करने में समर्थ होते हैं। इनमें भक्ति और करुण रस प्रमुख हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने एक बातचीत के दौरान बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगी। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध एक नवदुर्गा की स्तुति। इस गीत में देवी के विविध स्वरूपों का वर्णन भी है। आप इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरवी : "जगज्जननी भवतारिणी मोहिनी तू नवदुर्गा..." : डॉ. प्रभा अत्रे




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 320वें अंक की पहेली में आज हम आपको संगीतकार रोशन द्वारा स्वरबद्ध वर्ष 1964 में प्रदर्शित एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग में निबद्ध है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 24 जून, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 324वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 320वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘ताजमहल’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर रोशन की जन्मशती वर्ष पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग भैरवी में निबद्ध एक कालजयी गीत और राग भैरवी की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, May 7, 2017

राग भैरव : SWARGOSHTHI – 316 : RAG BHAIRAV




स्वरगोष्ठी – 316 में आज


संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 2 : राग भैरव में लोरी


राग भैरव में निबद्ध प्रभा अत्रे से शिव-स्तुति और लता मंगेशकर से लोरी सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की नई श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के घर में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हमने 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘संस्कार’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग भैरव के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही इसी राग की एक रचना सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका डॉ. प्रभा अत्रे के स्वरों में हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
र्ष 1949 में रोशन के संगीत निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘नेकी और बदी’ प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्मकार केदार शर्मा द्वारा निर्मित यह फिल्म व्यावसायिक दृष्टि से असफल थी। किन्तु अगले वर्ष प्रदर्शित केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बावरे नैन’ के गीतों ने खूब सफलता अर्जित की। इस फिल्म के संगीत ने रोशन को फिल्म जगत में स्थापित कर दिया। वर्ष 1951 में रोशन के संगीत से सजी तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थी। केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बेदर्दी’ में एक बार फिर मुकेश के लुभावने गीत थे। इसी फिल्म में रोशन ने अभिनेत्री निम्मी से भी एक गीत –“ननदिया जाने ना दर्द...” गवाया था। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘हमलोग’ थी। इस फिल्म में भी मुकेश की आवाज़ थी। फिल्म में मुकेश के अलावा लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और दुर्रानी की आवाज़ों में आकर्षक गीत थे। इसी वर्ष रोशन के संगीत निर्देशन में मुकेश द्वारा निर्मित फिल्म ‘मल्हार’ भी प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के गीतों में रोशन ने रागों का सुखद स्पर्श दिया था। इसी फिल्म से राग ‘गौड़ मल्हार’ पर आधारित गीत पर हम पिछले अंक में चर्चा कर चुके है। अगले वर्ष अर्थात 1952 में रोशन की पाँच फिल्में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म ‘अनहोनी’ ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म थी, जिसमे राज कपूर ने अभिनय किया था। इस फिल्म में रोशन ने राज कपूर के लिए तलत महमूद की आवाज़ का चयन किया और सफल भी हुए। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘संस्कार’ थी। इस फिल्म में भी तलत महमूद के गाये गीत थे। फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र थे, जिन्होने एक से बढ़ कर एक गीतों की रचना की थी। इन गीतों में रोशन के संगीत में भी भरपूर रचनात्मकता के दर्शन होते हैं। सितार, बाँसुरी और सारंगी के अभिनव प्रयोग से इन गीतों को सजाया गया था। अपने संगीत शिक्षा काल में इसराज रोशन का प्रिय वाद्य रहा। गज से बजने वाले एक प्रमुख वाद्य सारंगी की शिक्षा उन्होने उस्ताद बुन्दु खाँ से प्राप्त की थी। इसीलिए उनके गीतों में सारंगी का सार्थक प्रयोग मिलता है। फिल्म ‘संस्कार’ में रोशन ने तलत महमूद की आवाज़ में एक खूबसूरत गजल –“मुहब्बत के झूठे सहारों ने लूटा...” भी स्वरबद्ध किया था। फिल्म में लता मंगेशकर ने भी उल्लेखनीय गीत गाये थे, जिनमें –“दो नैनों ने जाल बिछाया...”, -“दो नैना उलझ गए...” तथा –“हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” काफी लोकप्रिय हुए थे। लता मंगेशकर की आवाज़ में गायी लोरी –हँसे टिम टिम...” में राग भैरव का स्पर्श है। हमारा आज का यही गीत है। पहले आप रोशन का स्वरबद्ध किया गया फिल्म ‘संस्कार’ से राग भैरव पर आधारित गीत सुनिए। शैलेन्द्र के गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।

राग भैरव : “हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – संस्कार


राग भैरव भारतीय संगीत का एक प्राचीन राग है। यह इसी नाम से प्रचलित थाट भैरव से सम्बद्ध माना जाता है। अर्थात राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग होता है। आश्रय राग उसे कहते हैं जब किसी थाट का नामकरण किसी प्रचलित राग के नाम के अनुसार किया गया हो। इस दृष्टि से राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग कहलाता है। राग भैरव में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। विद्वानों ने इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल के सन्धिप्रकाश बेला को माना है। इस नियम के अनुसार राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल 4 से सात बजे के बीच किया जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वरों पर आन्दोलन किया जाता है। अब हम आपको इसी राग में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना सुनवाते हैं।

डॉ.प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर ‘सरगम’ विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल और एकताल में निबद्ध है।

राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिव शंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 316वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 13 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 318वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 313वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको लगभग 66 वर्ष पूर्व की फिल्म ‘मल्हार’ के एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग भैरव पर आधारित रोशन के एक गीत और राग भैरव की की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, October 30, 2016

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 290 : RAG BHAIRAVI


स्वरगोष्ठी – 290 में आज
नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 3 : जोहराबाई के स्वर में दीवाली गीत


“आई दीवाली आई दीवाली, दीपक संग नाचे पतंगा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली के 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



खनऊ से बम्बई (अब मुम्बई) आने के बाद नौशाद ने पियानो वादक और संगीतकारों के सहायक के रूप में काम किया। 1939 में स्वतंत्र रूप से पहला गीत फिल्म ‘कंगन’ के लिए स्वरबद्ध किया। इसके बाद स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर 1940 में प्रेमनगर, 1941 में माला, दर्शन और स्टेशन मास्टर, 1942 में नई दुनिया और शारदा, 1943 में कानून, संजोग, नाटक और नमस्ते के संगीत ने लोगों को लुभाया। 1944 का साल संगीतकार नौशाद के लिए बेहद सफल था। इस वर्ष ‘जेमिनी पिक्चर्स’ के बैनर तले गीतकार मधोक ने बनाई फिल्म ‘रतन’, जिसके प्रदर्शित होते ही चारों तरफ़ इसके गीतों की धूम मच गई और नौशाद प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में शामिल हो गए। नौशाद ने इस फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से गीत गवाकर चारों तरफ़ तहलका मचा दिया। एम. सादिक़ निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे करण दीवान और स्वर्णलता। फ़िल्म में अन्य चर्चित गीतों के साथ ज़ोहराबाई का गाया “आई दीवाली, आई दीवाली, दीपक संग नाचे पतंगा...” जैसे गीतों में भी राग की सुगन्ध थी।

फिल्म ‘रतन’ में कुल दस गीत थे, जिन्हें मधोक ने लिखे, और मधोक ने ही फ़िल्म के संवाद भी लिखे। रागों का आधार, उत्तर प्रदेश की लोकधुनें, मधुर ऑरकेस्ट्रेशन, और ग़ुलाम मोहम्मद की थिरकन भरे तबले और ढोलक के ठेके, कुल मिलाकर फिल्म संगीत की एक ऐसी शैली का जन्म हुआ जिसे लोगों ने हाथों-हाथ ग्रहण किया। कहा जाता है कि ‘रतन’ का निर्माण 80,000 रुपये में हुआ था, जबकि निर्माता को केवल ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड की रॉयल्टी से ही 3,50,000 रुपये की आमदनी हुई थी। नौशाद अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर फिल्म संगीत में अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई गए थे। उनके संगीतकार बन जाने के बाद और सफलता हासिल कर लेने के बाद भी उनके परिवार में इस कामयाबी को अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। उन्हीं के शब्दों में एक मज़ेदार क़िस्से का आनन्द लीजिए यहाँ पर – “माँ का पैग़ाम आया कि शादी के लिए लड़की तय हो गई है, मैं घर आ जाऊँ। उस वक़्त मैं नौशाद बन चुका था। माँ ने कहा कि लड़की वाले सूफ़ी लोग हैं, इसलिए उनसे उन्होंने (नौशाद के पिता ने) यह नहीं कहा कि तुम संगीत का काम करते हो, बल्कि तुम दर्ज़ी का काम करते हो। मैंने मन ही मन सोचा कि संगीतकार से दर्ज़ी की इज़्ज़त ज़्यादा हो गई है। तो शादी में शामियाना लगाया गया, और बैण्ड वाले मेरे ही फिल्म के गाने बजाए जा रहे हैं और मैं दर्ज़ी बना बैठा हूँ।" लीजिए, फिल्म ‘रतन’ से जोहराबाई अम्बालेवाली की आवाज़ में राग भैरवी पर आधारित नौशाद का स्वरबद्ध वह गीत आप भी सुनिए।

राग भैरवी : “आई दीवाली, आई दीवाली,...” : जोहराबाई अम्बालेवाली : फिल्म – रतन




राग भैरवी के स्वर-समूह अनेक रसों का सृजन करने में समर्थ होते हैं। इनमें भक्ति और करुण रस प्रमुख हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगी। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध एक नवदुर्गा की स्तुति। इस गीत में देवी के विविध स्वरूपों का वर्णन भी है। आप दीपावली के पावन पर्व पर इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरवी : "जगज्जननी भवतारिणी मोहिनी तू नवदुर्गा..." : डॉ. प्रभा अत्रे





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग सात दशक पुरानी हिन्दी फिल्म के लोकप्रिय गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक का उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका को आवाज़ को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 नवम्बर 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 292वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 288 की संगीत पहेली में हमने आपको 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल - कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – नूरजहाँ। इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। उपरोक्त सभी चार विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के आज के अंक में पुनः आपने राग भैरवी पर आधारित गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 290 : RAG BHAIRAVI : 30 अक्तूबर, 2016

Sunday, May 3, 2015

भैरव थाट के राग : SWARGOSHTHI – 217 : BHAIRAV THAAT



स्वरगोष्ठी – 217 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 4 : भैरव थाट

राग भैरव और जोगिया के स्वरों में शिव की आराधना


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे भैरव थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरव में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरव थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग जोगिया के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान में प्रचलित थाट पद्धति पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित है। भातखण्डे जी ने गम्भीर अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तत्कालीन प्रचलित राग-वर्गीकरण की जितनी भी पद्धतियाँ उत्तर भारतीय संगीत में प्रचार में आईं और उनके काल में अस्तित्व में थीं, उनके रागों के वर्गीकरण के नियम आज के रागों पर लागू नहीं हो सकता। गत कुछ शताब्दियों में सभी रागों में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन हुए हैं, अतः उनके पुराने और नए स्वरूपों में कोई समानता नहीं है। भातखण्डे जी ने तत्कालीन राग-रागिनी प्रणाली का परित्याग किया और इसके स्थान पर जनक मेल और जन्य प्रणाली को राग वर्गीकरण की अधिक उचित प्रणाली माना। उन्हें इस वर्गीकरण का आधार न केवल दक्षिण में, बल्कि उत्तर में ‘राग-तरंगिणी’, ‘राग-विबोध’, ‘हृदय-कौतुक’, और ‘हृदय-प्रकाश’ जैसे ग्रन्थों में मिला।

आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘भैरव’। इस थाट में प्रयोग किये जाने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म, प, ध॒(कोमल), नि । अर्थात ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। थाट ‘भैरव’ का आश्रय राग ‘भैरव’ ही है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग ‘भैरव’ में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। राग में आरोह के स्वर- सारे(कोमल)गम प(कोमल) निसां तथा अवरोह के स्वर- सांनि(कोमल) पमग रे(कोमल) सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग भैरव के स्वर समूह भक्तिरस का सृजन करने में समर्थ हैं। इस राग का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए अब हम आपको विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे के स्वरों में राग भैरव का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं।

डॉ. प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर सरगम विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिवशंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे




कमल बारोट 
महेन्द्र कपूर
‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- ‘अहीर भैरव’ ‘गौरी’ ‘नट भैरव’ ‘वैरागी’ ‘रामकली’, ‘गुणकली’, ‘कलिंगड़ा’, ‘जोगिया’, ‘विभास’ आदि। आज हम आपको राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा रे(कोमल) म प (कोमल) सां और अवरोह के स्वर हैं- सां नि (कोमल) प (कोमल) म रे(कोमल) सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। यह गीत वास्तव में शिव वन्दना है। अनेक विद्वानो का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर...’ : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पचास के दशक की फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 215वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- अद्धा त्रिताल या पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका प्रीति सागर। इस बार की पहेली में हमारे दो नए श्रोता / पाठकों ने भाग लिया है। दिल्ली की दिशा भटनागर ने दूसरे और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। किसी अज्ञात स्थान से प्रसीत मुखर्जी ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर दिया है। श्री मुखर्जी से अनुरोध है कि भविष्य में पहेली का उत्तर ई-मेल से ही दिया करें। उनका COMMENT में दिया गया उत्तर हमने शनिवार तक प्रकाशित होने से रोक दिया था। इसके साथ ही जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिया है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे भैरव थाट और और उसके रागों पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




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