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Wednesday, January 18, 2012

"सैगल ब्लूज़" - सहगल साहब की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजली एक नए अंदाज़ में


कुंदनलाल सहगल को इस दुनिया से गए आज ६५ वर्ष हो चुके हैं, पर उनकी आवाज़ आज भी सर चढ़ के बोल रहा है। फ़िल्म 'डेल्ही बेली' में राम सम्पत और चेतन शशितल नें सहगल साहब को श्रद्धांजली स्वरूप जिस गीत की रचना की है, उसी की चर्चा सुजॉय चटर्जी के साथ, 'एक गीत सौ कहानियाँ' की तीसरी कड़ी में...

एक गीत सौ कहानियाँ # 3

हिन्दी सिनेमा के प्रथम सिंगिंग् सुपरस्टार के रूप में कुंदनलाल सहगल के नाम से हम सभी भली-भाँति वाक़िफ़ हैं। फ़िल्म-संगीत की जब शुरुआत हुई थी, तब वह पूर्णत: शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और नाट्य संगीत से प्रभावित थी। कुंदनलाल सहगल और न्यु थिएटर्स के संगीतकारों नें फ़िल्म-संगीत को अपनी अलग पहचान दी, और जनसाधारण में अत्यन्त लोकप्रिय बनाया। जब भी कभी फ़िल्म-संगीत का इतिहास लिखा जाएगा, सहगल साहब का नाम सबसे उपर स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। सहगल साहब की आवाज़ और गायकी का ३० और ४० के दशकों में कुछ ऐसा क्रेज़ था कि अगली पीढ़ी के नवोदित गायक उन्हीं की शैली को अनुकरण कर संगीत के मैदान में उतरते थे। तलत महमूद, मुकेश और किशोर कुमार तीन ऐसे बड़े नाम हैं जिन्होंने अपनी शुरुआत सहगल साहब को गुरु मान कर की थी। पर बाद में अपना अलग स्टाइल ज़रूर अख़्तियार कर लिया था। लेकिन अगर किसी गायक नें ता-उम्र सहगल साहब की शैली में गाते रहे, तो वो थे सी. एच. आत्मा। सिर्फ़ वो ही नहीं, उनके बेटे चन्द्रू आत्मा नें भी सहगल अंदाज़ में गीत गाए।

कुंदनलाल सहगल को गुरु मानने वाले या उनसे मुतासिर होने वालों की फ़ेहरिस्त तलत, मुकेश, किशोर, सी. एच. आत्मा और चन्द्रू आत्मा पर आकर ही समाप्त नहीं हो जाती, आज भी सहगल साहब के चाहने वालों की संख्या हज़ारों, लाखों में है। और इनमें एक हैं इस दौर के संगीतकार राम सम्पत। 'आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स' की २०११ की चर्चित फ़िल्म 'डेल्ही बेली' में राम सम्पत नें कुंदनलाल सहगल को श्रद्धांजली स्वरूप एक गीत कम्पोज़ किया है "सैगल ब्लूज़" (Saigal Blues) शीर्षक से। सहगल को दर्द का पर्याय माना जाता है, इसलिए 'सैगल ब्लूज़' भी टूटे हुए दिल की ही पुकार है। सहगल शैली का आधुनिक रूप कहा जा सकता है 'सैगल ब्लूज़' को। सहगल शैली और ब्लूज़ जौनर का फ़्युज़न है यह गीत जिसे राम सम्पत और चेतन शशितल नें मिलकर लिखा है और चेतन शशितल नें बिल्कुल सहगल अंदाज़ में गाया है। गीटार पर कमाल किया है रूडी वलांग और हितेश धुतिया नें। जब भी इस तरह का कोई नवीन प्रयोग किया जाता है, और ख़ास कर किसी महान कलाकार का अनुकरण किया जाता है, तो उस पर मिली-जुली प्रतिक्रियायें मिलती हैं; इस गीत के साथ भी यही हुआ। यूं तो अधिकतर लोगों और समालचकों नें इस गीत को "थम्स-अप" ही दिया, पर कुछ लोगों को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। उन्हें यह सहगल का अपमान महसूस हुआ। इन्टरनेट को खंगालने पर मुझे इसके दो कारण हाथ लगे - पहला यह कि गायक नें सहगल के नैज़ल अंदाज़ की नकल की है, और दूसरी, सहगल शैली के गीत को पाश्चात्य रंग देकर (फ़्युज़न के ज़रिए) सहगल जौनर को दूषित किया है।

"दुनिया में प्यार जब बरसे, न जाने दिल यह क्यों तरसे, हाय, इस दिल को कैसे समझाऊँ, पागल को कैसे मैं मनाऊँ, इस दर्द की न है दवाई, मजनूं है या तू है कसाई...", यही है 'सैगल ब्लूज़' गीत के बोल। जब इसके संगीतकार राम सम्पत से इस बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था - "मैं के. एल. सहगल साहब का बहुत बड़ा फ़ैन हूँ। मैं समझता हूँ कि सहगल साहब भारत का सबसे महान "ब्लूज़ सिंगर" हैं। मैंने 'डेल्ही बेली' फ़िल्म के निर्देशक अभिनय देव और गायक-गीतकार चेतन शशितल से इस बारे में कई साल पहले ही बात की थी कि मैं सहगल साहब को एक "ब्लूज़ ट्रिब्युट" देना चाहता हूँ। पर कोई सिचुएशन या फ़िल्म ऐसी नहीं बन रही थी जिसमें मेरा यह सपना सच हो सके। 'डेल्ही बेली' इस गीत को लौंच करने के लिए सटीक माध्यम मुझे महसूस हुआ। फ़िल्म का साउण्डट्रैक इस गीत के लिए पर्फ़ेक्ट था और आमिर ख़ान जैसे निडर निर्माता के होते मुझे किस बात की फ़िक्र थी! आमिर ख़ान को पुराने समय और इतिहास से बहुत लगाव है। मेरे इस सुझाव को उन्होंने हाथोंहाथ स्वीकार कर लिया। मुझे आशा है कि इस गीत के माध्यम से हम लोगों को, ख़ास कर इस पीढ़ी के लोगों को के. एल. सहगल की गायकी से अवगत करा पाएंगे।" एक अन्य इन्टरव्यू में राम सम्पत नें बताया कि यूं तो 'डेल्ही बेली' के कई गीत हिट हुए हैं जैसे कि "भाग डी के बोस", "स्विट्टी स्विट्टी", "आइ हेट यू", "बेदर्दी राजा", "जा चुड़ैल", लेकिन जो गीत उनके दिल के सबसे करीब है, वह है "सैगल ब्लूज़"। "मुझे ख़ास तौर से 'सैगल ब्लूज़' पर गर्व है क्योंकि लोग यह समझ रहे हैं कि यह सहगल साहब का ही गाया हुआ कोई गीत है जिसका रीमिक्स हुआ है, जबकि हक़ीक़त यह कि यह मेरा ऑरिजिनल कम्पोज़िशन है और गीत के बोल भी बिल्कुल नए हैं", राम सम्पत नें एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में बताया। सम्पत नें यह भी बताया कि इस फ़िल्म के संगीत निर्माण में आमिर ख़ान का भी बड़ा योगदान रहा है।

उधर चेतन शशितल का नाम बहुत अधिक लोगों नें नहीं सुना होगा। आपको याद होगा २००४ में ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेरॉय की फ़िल्म आई थी 'क्यों.. हो गया न!', जिसमें एक गीत था "बात समझा करो", उस गीत में चेतन की आवाज़ थी शंकर महादेवन और जावेद अली के साथ। उसी साल 'दि किंग ऑफ़ बॉलीवूड' फ़िल्म के लिए भी उन्होंने गाया था। उसके बाद चेतन एक बार फिर से गुमनामी में चले गए, पर 'सैगल ब्लूज़' के साथ जैसे रातों रात वो छा गए। हालाँकि इस गीत को वह लोकप्रियता नहीं मिली, या यूं कहे कि इस गीत को फ़िल्म के दूसरे गीतों के मुकाबले कम प्रोमोट किया गया, पर इस फ़िल्म के संगीत से जुड़े सभी कलाकारों को यह गीत अत्यन्त प्रिय है। चेतन शशितल नें बताया कि इस गीत को उन्होंने दो साल पहले ही रेकॉर्ड कर लिया था। चेतन बताते हैं, "राम (सम्पत) 'डेल्ही बेली' के बैकग्राउण्ड पर काम कर रहे थे और वो मुझसे कुछ प्रयोगधर्मी चीज़ चाहते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि क्यों न मैं सहगल साहब की आवाज़ में गाऊँ? उस वक़्त हमें ज़रा सा भी अन्दाज़ा नहीं था कि यह बात हमें किस मुकाम तक ले जायेगी। शुरुआत में जब यह गीत रेकॉर्ड हुआ तो केवल वोकल और ड्रम्स का इस्तमाल हुआ था, पर सम्पत नें बाद में इसे जो रूप दिया, मैं तो हैरान रह गया। मुझे तो अन्त तक यह मालूम ही नहीं था कि इस गीत को 'डेल्ही बेली' के साउण्डट्रैक में शामिल कर लिया गया है। जब भी मेरी राम सम्पत से मुलाक़ात होती तो मैं यह ज़रूर पूछता कि अपने गाने का क्या हुआ? एक दिन उन्होंने मुझे आकर बताया कि आमिर ख़ान और अभिनय देव नें इस गीत को सुना है और उन्हें पसन्द भी आया है। मैंने जब गीत का फ़ाइनल वर्ज़न सुना तो वह बिल्कुल अलग ही बन चुका था।"

चेतन शशितल ख़ुद एक अच्छे गायक हैं, जो पिछले १७ वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत सीख रहे हैं। शशितल नें यह साफ़ बताया कि इस गीत को गाते हुए उनका यह कतई उद्देश्य नहीं था कि सहगल साहब जैसे महान कलाकार की नकल कर उन पर कोई व्यंग किया जाये या उनका मज़ाक उडाया जाये! यह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक श्रद्धांजली थी उस पूरे दौर के नाम। "यह गीत सुनने में बिल्कुल सहगल की शैली का लगता है। उस दौर की यही ख़ास बात थी कि गानें इसी अंदाज़ में गाए जाते थे। उस दौर के अन्य गायक, जैसे जगमोहन, श्याम और सुरेन्द्र, भी इसी अंदाज़ में गाया करते थे। अगर आप इस गीत को सुनें, तो शायद आपको सहगल साहब की याद आये, पर मेरे लिए यह गीत केवल सहगल साहब को ही नहीं, बल्कि उस पूरे दौर को श्रद्धांजली है। For me it was more about recreating the voice of that era. अफ़सोस की बात है कि जब लोग नकल करते हैं, तो वो उस कलाकार के कमी को ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं, और तब ऐसा लगता है जैसे उस कलाकार का व्यंग किया जा रहा हो। पर हमने ऐसा नहीं किया।" आज जहाँ सहगल की आवाज़ केवल 'विविध भारती' के 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में ही सुनाई देती है, ऐसे में आज की युवा पीढ़ी को सहगल से मिलवाने में 'डेल्ही बेली' का यह गीत शायद ज़्यादा कारगर होगा। आज सहगल को गए ६५ वर्ष बीत चुके हैं, पर उनकी आवाज़ का जादू आज भी सर चढ़ कर बोलता है, और इसका प्रमाण है 'डेल्ही बेली' का "दुनिया में प्यार जब बरसे"।

फ़िल्म 'डेल्ही बेली' से "दुनिया में प्यार जब बरसे..." सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, अनुमति दीजिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

Friday, June 10, 2011

डेल्ही बेल्ली - एकदम फ्रेश, अनुसुना, और नए मिजाज़ का संगीत

Taaza Sur Taal (TST) - 17/2011 - DELHI BELLY

फिल्म "खाकी" का वो खूबसूरत गीत आपको याद ही होगा – 'वादा रहा प्यार से प्यार का....". एक बेहद युवा संगीतकार राम संपत ने रचा था इस गीत को. "खाकी" की सफलता के बावजूद राम अभी उस कमियाबी को नहीं छू पाए थे जिसके कि वो निश्चित ही हकदार हैं. आमिर खान की "पीपली लाईव" के महंगाई डायन गीत को जमीनी गीत बनाने में भी उनका योगदान रहा था. शायद वहीँ से प्रभावित होकर आमिर ने अपनी महत्वकांक्षी फिल्म "डेल्ही बेल्ली" में उन्हें बतौर संगीतकार चुना. आईये आज बात करें "डेल्ही बेल्ली" में राम के संगीत की.

कहते हैं फ़िल्में समाज का आईना होते हैं. इस नयी सदी का युवा जिन परेशानियों, कुंठाओं और भावनाओं से उलझ रहा है जाहिर है यही सब आज की फिल्मों में, गीतों में दिखाई सुनाई देगा. अब जो कहते हैं कि आज संगीत बदल गया है कोई उनसे पूछे कि आज दुनिया कितनी बदल गयी है. संगीत भी तो उसके पेरेलल ही चलेगा न. बहरहाल हम आपको बता दें कि डेल्ही बेल्ली एक पूरी तरह से "एक्सपेरिमेंटल" अल्बम है, यानी एक दम कुछ नया ताज़ा, अगर आपके कान इसके लिए तैयार हों तभी इस अल्बम को सुनें. उदाहरण के लिए पहला ही गीत "भाग भाग डी के बोंस" कुछ ऐसा है जो पहली सुनवाई में ही आपको चौका देगा. खुद राम ने इसे अपनी आवाज़ दी है. प्रस्तुत गीत में वो सभी उलझनें, मुश्किलातें, कुंठाएं समाहित है जिसका कि हम ऊपर जिक्र कर चुके हैं. रोक्क् शैली के इस गीत की रिदम बेहद तेज है ऐसा लगेगा जैसे आप किसी रोलर कोस्र्टर में बैठे हैं और भागे जा रहे हैं, गीत के बोल भी तो आखिर भागने की सलाह दे रहे हैं. कुल मिलाकर ये गीत एक चार्ट बस्टर है इसमें कोई शक नहीं.

डैडी मुझे बोला तू गलती है मेरी,
तुझपे जिंदगानी गिल्टी है मेरी,
साबुन की शकल में निकला तू तो झाग....


खुद पर पड़े माँ बाप की भारी भरकम उम्मीदों के बोझ को आज का युवा और किन शब्दों में व्यक्त करेगा....अल्बम की खासियत है इसकी विविधता, अगला गीत "नक्कड़ वाले डिस्को" एकदम अलग पेस का है. सड़क छाप शब्दों से बुना गया है इस गीत को, जिसे गाया है कीर्ति सगाथिया ने. संगीत संयोजन गीत की जान है. इस गीत को हास्य जोनर का कह सकते हैं. पर है कानों के लिए एक नया अनुभव. मुझे तो मज़ा आया.

चेतन शशितल आपको हैरान करते हैं जब सहगल अंदाज़ में गीत की शुरुआत करते है, गीत का नाम ही "सहगल ब्ल्यूस" है. लाउंज म्यूजिक और सहगल का रेट्रो अंदाज़. २०११ में में १९४१ का मज़ा. "इस दर्द की न है दवाई, मजनूं है या है तू कसाई..." हा हा हा...गजब का संगीत संयोजन, एकदम नया इस्टाईल है राम का.

अगर अल्बम के अब तक के गीत आपको फ्रेश लगे हों तो लीजिए पेश है नए अंदाज़ में बॉलीवुड का तडका मार के, पुरविया संगीत का जादू अगले गीत बेदर्दी राजा में जिसे आवाज़ से संवारा है सोना महापात्रा ने. हारमोनियम के स्वरों को हमने कितना मिस किया है इस नए दशक में, भरपूर आनंद देगा आपको ये गीत अगर आपको ठेठ भारतीय संगीत पसंद है तो.

अगला गीत आपको भारत से सीधे अमेरिका ले जायेगा "गन्स एंड रोसेस" और "मेटालिका" स्टाईल का हार्ड रोक्क् गीत है "जा चुड़ैल". नए दौर की लड़कियां भी नयी है. और लड़के अगर इन्हें समझने में भूल करे तो आश्चर्य क्या. ऐसे में "चुड़ैल" जैसे शब्द स्वाभाविक ही जुबान पे आते है और मुझे लगता है कि लड़कियों को भी अब इन नए संबोधनों से कोई परेशानी नहीं है(बेहद व्यक्तिगत राय है). वैसे सूरज जगन अब इस शैली में मास्टर हो गए हैं. गीत हार्ड रोक्क् से चहेतों को ही अधिक भाएगा.

अगला गीत एक सोफ्ट रोमांटिक गीत है खुद राम और तरन्नुम मालिक की युगल आवाजों में. तरन्नुम आपको याद होगा कभी आवाज़ के इसी मंच पर आई थी गीत "एक धक्का दो" लेकर जिसे आप सब श्रोताओं का भरपूर प्यार भी मिला था. हमें लगा इस गीत के बारे में क्यों न कुछ तरन्नुम से ही पूछा जाए. लीजिए पेश है ये संक्षिप्त सा इंटरव्यू-
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सजीव – राम का संगीत इस अल्बम में बेहद "एक्सपेरिमेंटल" है, कैसा रहा उनके साथ काम करना ?

तरन्नुम – मैंने उनके साथ कुछ जिंगल्स भी किये हैं और उनके साथ काम करना हमेशा ही एक रेफ्रेशिंग तजुर्बा रहा है, अब उनके साथ इस फिल्म में काम करना मेरी खुशकिस्मती रही. वो बहुत जबरदस्त संगीतकार है और एक अच्छे इंसान भी.

सजीव – अगर मै पूछूं "तेरे सिवा" के आलावा आपका पसंदीदा गीत कौन सा है फिल्म का ?

तरन्नुम – ये बेहद मुश्किल सवाल है, क्योंकि हर गीत यहाँ बेहद अलग है, "डी के बॉस" एक रोक्क् गीत है जबकि "बेदर्दी राजा" एक आइटम गीत है. जिसे सोना ने बहुत ही बढ़िया गाया है. और देखा जाए तो "तेरे सिवा" इकलौता रोमांटिक गीत है, तो मैं इस अल्बम के गीतों को एक दूसरे से कम्पेयर नहीं कर सकती, मुझे इसके सभी गीत पसंद है क्योंकि सभी बेहद यूनिक हैं.

सजीव – अच्छा इस गीत से जुडी हुई कोई बात जो याद आती हो ?

तरन्नुम – राम ने मुझे फोन किया और अपने स्टूडियो आने को कहा. सबसे बढ़िया बात ये रही कि राम ने मुझे मात्र १० मिनट में ये गीत समझा दिया सिखा दिया, और सिर्फ २५ मिनट बाद मैं डब्बिंग रूम से बाहर थी और गाना पूरा हो चुका था.
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अल्बम में २ गीत और हैं – स्वीटी तेरा प्यार और आई हेट यू लईक आई लव यू....दोनों ही गीत एक दूसरे से एकदम अलग है हैं और अल्बम की विविधता को बढाते हैं. सभी गीत अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं, शाब्दिक लिहाज से गीत और बढ़िया हो सकते थे, पर शायद फिल्म की जरुरत के हिसाब से उन्हें ऐसा रखा गया हो, बहरहाल लंबे समय बाद राम संपत कुछ ऐसे देने में कामियाब रहे हैं जिसकी उनके जैसे बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार से हमेशा ही उम्मीद रहती है. मुझे व्यक्तिगत तौर पर "डी के बॉस" "सहगल ब्ल्यूस" और "बेदर्दी राजा" बेहद पसंद आये. फिर वही बात कहूँगा ये अल्बम आपके लिए है अगर वाकई कुछ अनसुना, अनूठा सुनने की चाहत रखते हों तो.

आवाज़ रेटिंग - 8.5/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

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