रविवार, 29 मार्च 2020

राग बागेश्री : SWARGOSHTHI – 462 : RAG BAGESHRI






स्वरगोष्ठी – 462 में आज

काफी थाट के राग – 6 : राग बागेश्री

विदुषी मालिनी राजुरकर से राग बागेश्री में तराना और लता मंगेशकर व हेमन्त कुमार से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी मालिनी राजुरकर
हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग बागेश्री पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की छठी कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी मालिनी राजुरकर से राग बागेश्री में निबद्ध तराना का रसास्वादन करा रहे हैं और फिर इसी राग पर आधारित 1953 में प्रदर्शित एक फिल्म “अनारकली” से श्रृंगार रस को उकेरता एक गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इस फिल्म के संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं।


राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त है। इस राग को काफी थाट से सम्बद्ध माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ प्रयोक्ता आरोह में पंचम स्वर वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्धति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन अथवा वादन उपयुक्त माना जाता है। इस राग में श्रृंगारपूर्ण रचनाएँ खूब फबतीं हैं।

अब हम आपको राग बागेश्री का एक आकर्षक तराना सुनवाते हैं, इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में गायन प्रस्तुत करने वाली, देश की सुविख्यात विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी राजुरकर का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी और दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही उन्हें दो विषयों; गणित और संगीत से गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु और शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत सम्मान “तानसेन सम्मान” से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ ही मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। मालिनी जी के स्वर में राग बागेश्री में निबद्ध तराना अब आप सुनिए।

राग बागेश्री : तीनताल में निबद्ध तराना : विदुषी मालिनी राजुरकर


राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। भारतीय फिल्म संगीत के बहुआयामी कलासाधकों की सूची में पार्श्वगायक और संगीतकार हेमन्त कुमार का नाम शिखर पर अंकित है। बाँग्ला और हिन्दी के गीतों के गायन और संगीतबद्ध करने में समान रूप से दक्ष हेमन्त कुमार का जन्म 16 जून, 1920 को बनारस स्थित उनके ननिहाल में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा बंगाल में हुई। परिवार में संगीत का शौक तो था, किन्तु इस व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए कोई भी सहमत नहीं था। बालक हेमन्त के स्कूल से प्रायः यह शिकायत मिलती थी कि उनकी रुचि पढ़ाई की ओर कम और गाने में अधिक है। पिता के एक मित्र सुभाष मुखर्जी की सहायता से मात्र 13 वर्ष की आयु में रेडियो के बाल कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलने लगा। कुछ बड़े होने पर हेमन्त कुमार को कोलम्बिया कम्पनी के लिए रवीन्द्र संगीत रिकार्ड करने का अवसर मिला। कम्पनी के संगीत निर्देशक शैलेन दासगुप्त को इतना पसन्द आया कि एक वर्ष में हेमन्त कुमार के बारह रिकार्ड प्रकाशित किये। आगे चल कर हेमन्त कुमार, संगीतकार शैलेन दासगुप्त के सहायक बने और पहली बार बाँग्ला फिल्म ‘निमाई संन्यास’ में उन्हे पार्श्वगायन का अवसर मिला। वर्ष 1944 में उन्हें पं. अमरनाथ के संगीत निर्देशन में पहली बार हिन्दी फिल्म ‘इरादा’ में दो गीत गाने का अवसर मिला। अगले वर्ष ही हेमन्त कुमार को बाँग्ला फिल्म ‘पूर्वराग’ में संगीत निर्देशन का दायित्व मिल गया। इसके बाद उन्होने अनेक छोटी-बड़ी बाँग्ला फिल्मों का संगीत निर्देशन किया। परन्तु 1951 में हेमेन गुप्ता की बाँग्ला फिल्म ‘आनन्दमठ’ में हेमन्त कुमार का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। फिल्म की सफलता से उत्साहित होकर इसी वर्ष ‘आनन्दमठ’ का हिन्दी संस्करण भी बनाया गया। इस संस्करण में भी हेमन्त कुमार का संगीत था। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना ‘वन्देमातरम्’ की विलक्षण धुन और गायन के कारण हेमन्त कुमार की हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में पार्श्वगायक के रूप में धाक जम गई। सचिनदेव बर्मन, सी. रामचन्द्र जैसे प्रतिष्ठित संगीतकारों के निर्देशन में हेमन्त कुमार के गाये अनेक गीत लोकप्रियता और गुणवत्ता की दृष्टि से शिखर पर रहे। आइए, अब हम आपको संगीतकार सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में हेमन्त कुमार का गाया एक सदाबहार गीत सुनवाते हैं। 1953 में प्रदर्शित, सी. रामचन्द्र के राग आधारित गीतों से सुसज्जित फिल्म ‘अनारकली’ में हेमन्त कुमार ने राग बागेश्री पर आधारित एक मनमोहक गीत गाया था। दादरा ताल में निबद्ध यह एक युगलगीत है, जिसमें हेमन्त कुमार का साथ लता मंगेशकर ने दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दें।

राग बागेश्री : “जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग...” : हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर : फिल्म - अनारकली



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 462वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1943 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 4 अप्रैल, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 464 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 292 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ से एक राग केन्द्रित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मुल्तानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – उस्ताद अमीर खाँ

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई।


संवाद


देशवासियों को कोरोना वायरस से बचाव के लिए भारत सरकार ने आपकी सुरक्षा के लिए सम्पूर्ण देश के लिए लॉक डाउन घोषित किया है। सभी देशवासियों से आग्रह है कि वे इसका निष्ठा के साथ पालन करें साथ ही अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा करें।  

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की छठी कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग बागेश्री का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने आज पहले हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर से राग बागेश्री में निबद्ध एक तराना का रसास्वादन कराया और फिर इसी राग पर आधारित 1953 में प्रदर्शित एक फिल्म “अनारकली” से श्रृंगार रस से परिपूर्ण एक गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत किया। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण हैं और फिल्म के संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। संगीत प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग बागेश्री : SWARGOSHTHI – 462 : RAG BAGESHRI : 29 मार्च, 2020 

रविवार, 22 मार्च 2020

राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 461 : RAG BHIMPALASI






स्वरगोष्ठी – 461 में आज


काफी थाट के राग – 5 : राग भीमपलासी


विदुषी गंगूबाई हंगल से भीमपलासी की एक रचना और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी गंगूबाई हंगल
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग भीमपलासी पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी गंगूबाई हंगल से राग भीमपलासी में निबद्ध एक रचना का रसास्वादन करा रहे हैं और फिर इसी राग पर आधारित 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म “नौबहार” से भक्ति और विरह भाव को उकेरता एक गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इस फिल्म के संगीतकार रोशन हैं।


राग भीमपलासी में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर; सा, ग(कोमल), म, प, नि(कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर; सां, नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर क्रमशः मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। इस राग में चूँकि वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है, इस दृष्टि से इसे उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए और दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 से दिन के 12 बजे के बीच गाना या बजाना चाहिए परन्तु व्यवहार में ऐसा होता नहीं। अपवाद रूप में यह पूर्वांग प्रधान राग मान लिया जाता है और दिन के पूर्व अंग में ही गाया या बजाया जाता है। राग भीमपलासी के गायन और वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है।

अब हम आपको राग भीमपलासी की ही एक आकर्षक बन्दिश सुनवाते हैं। यह किराना घराने की गायकी में शीर्षस्थ विदुषी गंगूबाई हंगल की एक रिकार्डिंग है। 5 मार्च, 1913 को धारवाड़, कर्नाटक में उनका जन्म हुआ था। बाल्यावस्था में उन्हें अपनी माँ से दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति की शिक्षा मिली। 1928 में उनका परिवार हुबली स्थानान्तरित हो गया। इससे पूर्व उन्होने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ सवाई गन्धर्व से संगीत में दक्षता प्राप्त की और दत्तोपन्त देसाई से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। पण्डित भीमसेन जोशी इनके गुरूभाई थे। गंगूबाई हंगल ने संगीत को आत्मसात करने के लिए कठिन साधना की थी। उन्हें भारत के उच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्मविभूषण’ से अलंकृत किया गया था। 21 जुलाई, 2002 को इस महान गायिका का हुबली में निधन हो गया था। अब आप विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वर में राग भीमपलासी की यह खयाल रचना सुनिए। इस प्रस्तुति में उनके गायन में उनकी सुपुत्री कृष्णा हंगल ने सहयोग दिया है।

राग भीमपलासी : “गरवा हरवा डारो री...” : तीनताल : विदुषी गंगूबाई हंगल


राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। आज के अंक के लिए हमने 1952 में प्रदर्शित फिल्म “नौबहार” का एक गीत चुना है। फिल्म का कथानक एक अमीर, किन्तु नेत्रहीन युवक (अशोक कुमार) और एक गरीब मालिन (नलिनी जयवन्त) की प्रेमकथा पर केन्द्रित है। फिल्म का जो गीत हमने चुना है, वह राग भीमपलासी पर आधारित है। दरअसल यह गीत मीरा का एक भक्तिपद है, जिसके बोल हैं; “ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...”। फिल्म के प्रसंग के अनुसार गीतकार शैलेन्द्र ने इस भक्तिपद के अन्तरों में परिवर्तन किये हैं। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है। लता मंगेशकर के अलावा फिल्म में तलत महमूद और राजकुमारी की आवाज़ में कई मनभावन गीत हैं। वर्ष 1967 में इस गीत; “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” को अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में चुना था। यह एक सदाबहार गीत सिद्ध हुआ। इस गीत के लिए राग भीमपलासी के स्वर इतने सटीक सिद्ध हुए कि वर्षों बाद जब गुलज़ार ने 1979 में अपनी फिल्म “मीरा” के संगीत निर्देशन का दायित्व पण्डित रविशंकर को दिया था और इसी मीरापद का चुनाव अपनी फिल्म के लिए भी किया था। पण्डित रविशंकर ने इस पद को राग तोड़ी में बाँधा था और वाणी जयराम से गवाया था। गीत के लिए स्वर चुनते समय पण्डित जी की ही टिप्पणी थी; ‘रोशन ने इस पद को राग भीमपलासी का ऐसा आवरण दे दिया है कि वह धुन दिमाग से निकलती ही नहीं’। लता मंगेशकर के स्वर में फिल्म “नौबहार” के इस गीत को सुनिए, साथ ही रोशन के अविस्मरणीय संगीत की सराहना कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म - नौबहार



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 461वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1953 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 28 मार्च, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 463 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 459वें अंक में हमने आपको 1971 में प्रदर्शित फिल्म “पराया धन” से एक राग आधारित होली गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – शिवरंजनी (राग काफी का भी स्पर्श) दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे और आशा भोसले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से किसी भी प्रतिभागी के तीनों उत्तर सही नहीं मिले। डॉ. किरीट छाया के तीन में से केवल एक उत्तर ही सही है, अतः उन्हें केवल एक अंक ही मिलते हैं। शेष प्रतिभागियों को दो उत्तर सही होने पर प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग भीमपलासी का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में पहले हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल से राग भीमपलासी में निबद्ध एक रचना का रसास्वादन कराया और फिर इसी राग पर आधारित 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म “नौबहार” से भक्ति और विरह भाव को उकेरता एक गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत किया। भक्त कवयित्री मीराबाई के इस पद का आंशिक परिवर्तन सत्येन्द्र अथईया ने किया है। फिल्म के संगीतकार रोशन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 461 : RAG BHIMPALASI : 22 मार्च, 2020 


मंगलवार, 17 मार्च 2020

ऑडियो: ताई की बुनाई (दीपक शर्मा)

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने दीपक शर्मा की कथा "मेंढकी" का पाठ पूजा अनिल और अनुराग शर्मा के स्वर में सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार दीपक शर्मा की कथा ताई की बुनाई जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "ताई की बुनाई" का गद्य अटूट बंधन पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 12 मिनट 39 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज की अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष रह चुकीं मिताक्षरी लेखिका दीपक शर्मा के कथा-क्षेत्र का विस्तार, संवेदनाओं की गहराई, शिल्प की सहजता और वर्णन की प्रामाणिकता उन्हें अपने समकालीन लेखकों से अलग धरातल प्रदान करते हैंं। उनकी 200 से अधिक कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें 19 कथा-संग्रहों में संकलित किया गया है।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

अब अपने लिए एक स्वेटर बुनना, अम्मा, तुम्हारे पास एक भी स्वेटर नहीं।
(दीपक शर्मा रचित "ताई की बुनाई" से एक अंश)



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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
ताई की बुनाई MP3

#Ninth Story, Taai Ki Bunaai: Deepak Sharma/Hindi Audio Book/2020/09. Voice: Anurag Sharma

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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