मंगलवार, 10 मार्च 2020

ऑडियो: मेंढकी (दीपक शर्मा)

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा की कथा "मोड़" का पाठ उन्हीं के स्वर में सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार दीपक शर्मा की कथा मेंढकी जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल और अनुराग शर्मा ने।

कहानी "मेंढकी" का गद्य अभिव्यक्ति पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 12 मिनट 25 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज की अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष रह चुकीं मिताक्षरी लेखिका दीपक शर्मा के कथा-क्षेत्र का विस्तार, संवेदनाओं की गहराई, शिल्प की सहजता और वर्णन की प्रामाणिकता उन्हें अपने समकालीन लेखकों से अलग धरातल प्रदान करते हैंं। उनकी 200 से अधिक कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें 19 कथा-संग्रहों में संकलित किया गया है।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

मेंढकी की छोटी बुद्धि है। ज्यादा सोच-भाल नहीं सकती।
(दीपक शर्मा रचित "मेंढकी" से एक अंश)



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मेंढकी MP3

#Eighth Story, Mendhaki: Deepak Sharma/Hindi Audio Book/2020/08. Voice: Pooja Anil, Anurag Sharma

रविवार, 8 मार्च 2020

रंगोत्सव पर आपको हार्दिक मंगलकामना : राग शहाना : SWARGOSHTHI – 459 : RAG SHAHANA : 8 मार्च, 2020


रंगोत्सव पर सभी पाठकों और श्रोताओं को हार्दिक मंगलकामना




स्वरगोष्ठी – 459 में आज

काफी थाट के राग – 3 : राग शहाना

पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी से राग शहाना में होली गीत और विस्मृत गायिका मंजु से फिल्मी ठुमरी सुनिए




पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी
फिल्म "गाली" का एक पोस्टर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में रंगारंग होली पर्व पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग शहाना के बारे में चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की तीसरी कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी के स्वर में राग शहाना में निबद्ध एक होली रचना का रसास्वादन कराएंगे और फिर इसी राग पर आधारित 1944 में प्रदर्शित एक हिन्दी फिल्म “गाली” का गीत पाँचवें दशक की गायिका मिस मंजु के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इस फिल्म का यह गीत पारम्परिक है और संगीतकार हनुमान प्रसाद हैं।


राग शहाना के स्वर काफी थाट के स्वरों से मेल खाते हैं, अर्थात यह राग काफी थाट के जन्य राग है। राग शहाना की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में गान्धार स्वर कोमल, दोनों निषाद तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज माना जाता है। राग के गायन या वादन का सबसे उपयुक्त समय रात्रि का तीसरा प्रहर माना जाता है। राग शहाना एक उत्तरांग प्रधान राग है। इसमें षडज और धैवत स्वरों की संगति बहुत अच्छी लगती है। इस राग में पंचम और तार सप्तक के षडज स्वर बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं। राग शहाना, कान्हड़ा का ही एक प्रकार है। इसके बावजूद इसे केवल शहाना के नाम से सम्बोधित किया जाता है। राग शहाना चूँकि काफी थाट का जन्य राग है, अतः राग काफी की भाँति राग शहाना में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं। राग शहाना का स्पष्ट परिचय देने के लिए अब हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी के स्वर में होली पर्व के उल्लास से परिपूर्ण मध्यलय त्रिताल में निबद्ध एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं। ‘यू-ट्यूब’ के सौजन्य से प्रस्तुत इस रचना के बोल है; “होली की धुनक मोरे कान पड़ी है...”

राग शहाना : “होली की धुनक मोरे कान पड़ी है...” : पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी


राग शहाना में कोमल निषाद और पंचम स्वर की संगति बार-बार दिखाई जाति है। प्रत्येक आलाप का अन्त कान्हड़ा अंग; कोमल गान्धार, मध्यम, ऋषभ और षडज से होता है। उत्तरांग में अधिकतर पंचम से सीधे तार सप्तक को जाते हैं, किन्तु म, प, ध, कोमल नि और सां स्वर समूह अनिष्ट नहीं है। कभी-कभी इसका भी प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद का अल्प प्रयोग आरोह में तार सप्तक के षडज के साथ किया जाता है। विद्वानों ने इसमें बहार, अड़ाना, बागेश्री और मल्हार रागों का मिश्रण माना है। राग सूहा और सुघराई इसके समप्रकृति राग हैं। धैवत के प्रयोग से राग शहाना, राग सूहा से अलग हो जाता है और उत्तरांग प्रधान होने से राग सुघराई से अलग हो जाता है। अब हम आपको 1944 में प्रदर्शित पुरानी फिल्म “गाली” से एक होली गीत मिस मंजु के स्वर में सुनवा रहे हैं। पारम्परिक ठुमरी गीत को हनुमान प्रसाद ने संगीतबद्ध किया है। “फिल्मी गीतों में राग” विषयक शोधकर्ता और संगीत विषयक पुस्तकों के सुप्रसिद्ध लेखक के.एल. पाण्डेय (कन्हैयालाल पाण्डेय) के सुझाव से हम इन गीतों का चुनाव कर रहे हैं। श्री पाण्डेय के अनुसार इस ठुमरी गीत की रचना ‘सगुनपिया’ ने की है। कुछ विद्वानों का मत है कि इस ठुमरी कि रचना अवध का नवाब वाजिद अली शाह ने की है। होली की पूर्व संध्या पर आप यह विस्मृत गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग शहाना : “होली मैं खेलूँगी उन संग डट के...” : मिस मंजू : फिल्म – गाली



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 459वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक और गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 14 मार्च, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 461 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 457वें अंक में हमने आपको 1994 में प्रदर्शित फिल्म “सरदारी बेगम” से एक राग आधारित होली गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पीलू, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आरती अंकलीकर। फिल्म में इस गीत का एक अन्य संस्करण है, जिसे पार्श्वगायिका आशा भोसले ने स्वर दिया है।

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग शहाना का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी के स्वर में इस राग की एक होली रचना का रसास्वादन किया। राग शहाना के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए 1944 में प्रदर्शित फिल्म “गाली” का एक गीत विस्मृत पार्श्वगायिका मिस मंजू के स्वर में प्रस्तुत किया। फिल्म के संगीतकार हनुमान प्रसाद हैं। अथक प्रयासों के बावजूद गीत की गायिका मंजु अथवा संगीतकार हनुमान प्रसाद का कोई भी चित्र हमें प्राप्त नहीं हो सका। इसीलिए आपके अवलोकनार्थ फिल्म का एक पोस्टर लगा दिया है। कुछ तकनीकी समस्या के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग शहाना : SWARGOSHTHI – 459 : RAG SHAHANA : 8 मार्च, 2020 



रविवार, 1 मार्च 2020

राग पीलू : SWARGOSHTHI – 458 : RAG PILU






स्वरगोष्ठी – 458 में आज

काफी थाट के राग – 2 : राग पीलू

विदुषी गिरिजा देवी से राग पीलू में होरी और आरती अंकलीकर से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी आरती अंकलीकर
विदुषी गिरिजा देवी
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग पीलू के बारे में चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की दूसरी कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में राग पीलू में निबद्ध एक उपशास्त्रीय रचना का रसास्वादन कराएंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक हिन्दी फिल्म का गीत सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। 1997 में प्रदर्शित फिल्म “सरदारी बेगम” में इस गीत के दो संस्करण हैं, जिन्हें आशा भोसले और आरती अंकलीकर ने स्वर दिया है। आपको हम आरती अंकलीकर का गाया गीत सुनवा रहे हैं। इस फिल्म के गीतकार जावेद अख्तर और संगीतकार वनराज भाटिया हैं।


राग पीलू का सम्बन्ध काफी थाट से जोड़ा जाता है। आमतौर पर इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित किया जाता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए राग की जाति औड़व सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के कोमल और शुद्ध, दोनों रूप का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन और वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना जाता है। इस राग के प्रयोग करते समय प्रायः अन्य कई रागों की छाया दिखाई देती है, इसलिए राग पीलू को संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल प्रकृति का और श्रृंगार रस की सृष्टि करने वाला राग है। इस राग में अधिकतर ठुमरी, दादरा, टप्पा, गीत, भजन आदि का गायन बेहद लोकप्रिय है। फिल्मी गीतों में भी इस राग का प्रयोग अधिक किया गया है। इस राग में ध्रुपद और विलम्बित खयाल का प्रचलन नहीं है। राग पीलू पूर्वांग प्रधान राग है। इसमे पूर्वांग के स्वर इतने प्रमुख रहते हैं कि प्रायः गायक या वादक मध्यम स्वर को अपना षडज मान कर गाते या बजाते जिससे मन्द्र सप्तक के स्वरों में सरलता से विचरण किया जा सके। राग पीलू के गायन व वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर निर्धारित किया गया है, किन्तु परम्परागत रूप से यह सार्वकालिक राग हो गया है। ठुमरी अंग का राग होने से किसी गायन या वादन के अन्त में राग पीलू की ठुमरी, दादरा या सुगम संगीत से कार्यक्रम के समापन की परम्परा बन गई है। अब आप विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में राग पीलू में निबद्ध एक रसपूर्ण होरी सुनिए।

होरी पीलू : “ऐसी होरी न खेलो कन्हाई...” : विदुषी गिरिजा देवी


यूँ तो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग का एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। फिल्म में यह गीत आशा भोसले और आरती अंकलीकर की आवाज़ में दो अलग-अलग प्रसंगों में फिल्माया गया है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस खूबी से निखरता हैं। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।

राग पीलू : “मोरे कान्हा जो आए पलट के...” : आरती अंकलीकर : फिल्म – सरदारी बेगम



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 458वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1944 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 7 मार्च, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 460 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 456वें अंक में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म “गोदान” से एक राग आधारित नाट्य गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुहम्मद रफी और साथी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।



अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग पीलू का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में इस राग की एक उपशास्त्रीय रचना का रसास्वादन किया। राग पीलू के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए 1994 में प्रदर्शित फिल्म “सरदारी बेगम” का एक गीत शास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वर में प्रस्तुत किया। फिल्म के संगीतकार वनराज भाटिया हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग पीलू : SWARGOSHTHI – 458 : RAG PILU : 1 मार्च, 2020

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