गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

चित्रकथा - 63: अभिनेता राज किशोर को श्रद्धांजलि

अंक - 63

अभिनेता राज किशोर को श्रद्धांजलि

नहीं रहे ’पड़ोसन’ के ’लाहौरी’





फ़िल्म जगत के जानेमाने चरित्र अभिनेता राज किशोर जी का 6 अप्रैल 2018 को 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने बहुत सी फ़िल्मों में छोटी पर यादगार भूमिकाएँ निभाई हैं। यह अफ़सोसजनक बात है कि आज उनके जाने के बाद अधिकांश लोगों ने केवल ’पड़ोसन’ और ’शोले’ के साथ उनके नाम को जोड़ा जबकि उनके द्वारा अभिनीत फ़िल्मों की सूची बहुत लम्बी है। 1949 से 1997 के बीच राज किशोर जी ने 90 से अधिक फ़िल्मों में अभिनय किया है। आइए आज ’चित्रकथा’ में हम एक नज़र डालें राज किशोर अभिनीत फ़िल्मों पर, और उनके द्वारा निभाए महत्वपूर्ण चरित्रों की बातें करें। ’चित्रकथा’ का आज का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय राज किशोर की पुण्य स्मृति को!




कोई अभिनेता दर्शकों के दिलों पर राज करे, इसके लिए यह कत‍ई ज़रूरी नहीं है कि उस अभिनेता द्वारा निभाए गए किरदार लम्बी अवधि के हों। अगर अभिनेता में काबिलियत है तो चन्द मिनटों के अभिनय से ही वो बाज़ी मार सकते हैं। फ़िल्म जगत में ऐसे कई चरित्र अभिनेता हुए हैं जिन्होंने अपने छोटे पर असरदार अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया है। ऐसे ही एक अभिनेता रहे राज किशोर, जिन्होंने अपनी फ़िल्मों में छोटे किरदार निभाए, पर वो उतने ही यादगार रहे और आज भी अच्छे फ़िल्मों के शौकीन उन्हें याद करते हैं। वास्तविक जीवन में अत्यन्त मिलनसार राज किशोर ने अपनी ज़िन्दगी को बेहतरीन तरीके से जिया। राज किशोर की मृत्यु का समाचार देते समय Cine and TV Artists' Association (CINTAA) की सदस्या नुपुर अलंकार ने बताया। राज किशोर का अभिनय सफ़र शुरु हुआ था सन् 1949 में जब उन्होंने ’पतंगा’ और ’अपराधी’ फ़िल्मों में अभिनय किया। अगले पन्द्रह वर्षों तक उन्होंने कई फ़िल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाते हुए इंडस्ट्री में बने रहे। 1951 से 1963 के बीच उनके अभिनय वाली फ़िल्में थीं ’दामाद’, ’औरत’, ’बड़े सरकार’, ’तीन उस्ताद’, ’छोटे नवाब’, ’राष्ट्रवीर’, ’बिजली चमके जमना पार’ और ’एक दिल सौ अफ़साने’। इन सभी फ़िल्मों में उन्होंने जुनियर आर्टिस्ट के किरदार निभाए, कभी नौकर बने, कभी नकली डॉक्टर, कभी रेल-यात्री तो कभी चोर। इस दौर में उनकी सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जैसा भी काम उन्हें मिलता, वो पूरी लगन और मेहनत से करते चले गए।

राज किशोर की मेहनत और लगन रंग लायी वर्ष 1965 में जब केवल कश्यप निर्मित एवं एस. राम शर्मा निर्देशित कालजयी फ़िल्म ’शहीद’ में उनका चुनाव हुआ। भगत सिंह की भूमिका में मनोज कुमार, राजगुरु की भूमिका में आनन्द कुमार, सुखदेव की भूमिका में प्रेम चोपड़ा, चन्द्रशेखर आज़ाद की भूमिका में मनमोहन जैसे कलाकार थे। भगत सिंह - राजगुरु - सुखदेव को जिस "अपराध" के लिए फाँसी की सज़ा हुई थी, उसका सीधा संबंध जय गोपाल नामक व्यक्ति का था। और इस महत्वपूर्ण चरित्र जय गोपाल के लिए चयन हुआ राज किशोर का। इस चरित्र के दो रूप थे - एक देशभक्त का और एक रूप ग़द्दार का। तीनों क्रान्तिकारियों ने जिस दिन स्कॉट को मारने की योजना बनाई, उस दिन जय गोपाल द्वरा उन्हें गोली चलाने के लिए हरी झंडी दिखाना था। लेकिन बदक़िस्मती से स्कॉट उस दिन छुट्टी पर रहे और जय गोपाल ने सौन्डर्स को स्कॉट समझ कर गोलियाँ बरसाने की हरी झंडी दिखा दी। भगत सिंह और राजगुरु की गोलियों से सौन्डर्स छलनी हो गए। यह जय गोपाल की पहली ग़लती थी, लेकिन उसकी दूसरी ग़लती क्षम्य नहीं थी जब उसने मामले के दौरान कोर्ट में यह गवाही दे दी कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने गोलियाँ चलाई थीं। उनके इस गवाही की वजह से 23 मार्च 1931 को तीनों क्रान्तिकारी शहीद हो गए। इस वजह से कहा जाता है कि सुखदेव इतने अधिक नाराज़ हो गए थे कि वो जेल में जय गोपाल के साथ कुछ समय अकेले में बिताना चाहते थे ताकि तो जय गोपाल का गला घोंट सके। जय गोपाल के इस महत्वपूर्ण चरित्र के लिए राज किशोर का चुनाव उनके लिए बड़ी बात थी। और उन्होंने इस चरित्र को सही अर्थ में साकार भी किया।


’शहीद’ के बाद अगले तीन सालों तक राज किशोर फिर से अलग अलग किरदारों में नज़र आने लगे। ’हमराज़’ में होटल रिसेप्शनिस्ट, ’राम और श्याम’ में रेस्तोरां का वेटर, ’मेहरबान’ में गधामहाराज जी के भक्त, ’हरे कांच की चूड़ियाँ’ में नायक का कॉलेज मित्र नट्टू, ’शिकार’ में एक डान्सर तथा ’हम कहाँ जा रहे हैं’ व ’साधु और शैतान’ में भी अभिनय करने के बाद 1968 में उनकी अगली बड़ी फ़िल्म आई ’पड़ोसन’ जिसमें उनके अभिनय ने दर्शकों को ख़ूब गुदगुदाया। इस फ़िल्म का पार्श्व तो सर्वविदित है। किशोर कुमार द्वारा अभिनीत विद्यापति का चरित्र एक संगीत गुरु का था, जिनके तीन भक्त या शागिर्द या चेले थे। इन तीनों के नाम शहरों के नामों पर आधारित थे - बनारसी, कलकत्तिया और लाहौरी। इन तीन छोटे पर महत्वपूर्ण किरदारों के लिए चयन हुआ मुकरी का बनारसी के लिए, केष्टो मुखर्जी का कलकत्तिया के लिए, और राज किशोर का लाहौरी के लिए। हालाँकि भोला के चरित्र में सुनिल दत्त, विद्यापति के चरित्र में किशोर कुमार, मास्टर पिल्लई की भूमिका में महमूद और बिंदु की भूमिका में सायरा बानो ही फ़िल्म के मुख्य पात्र थे, पर विद्यापति के किरदार को बूस्ट-अप करने के लिए इन तीन अतिरिक्त चरित्रों को रखा गया था और इन तीनों ने अपने अपने अंदाज़ से इन चरित्रों को साकार किया। किसी ने इस तिकड़ी के बारे में इंटरनेट पर कुछ यूं लिखा है - "Vidyapati manages a bizarre nautanki drama troupe consisting of a bunch of imbeciles called Banarasi, Kalkattiya and Lahori doing proud to their origins (Mukri, Keshto Mukherjee and Raj Kishore respectively), who don’t mind walking out of stage mid-way through their program unmindful of a hooting audience, when good friend Bhola gate-crashes into the stage seeking their help." निस्संदेह ’पड़ोसन’ राज किशोर के फ़िल्मी सफ़र का अब तक का सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र रहा है। 1969 से 1974 तक राज किशोर फिर से उन्हीं छोटे-मोटे किरदारों में नज़र आते रहे, कभी डाकू, कभी ज्योतिषी, कभी हवलदार तो कभी बार के वेटर के रूप में। ये फ़िल्में हैं ’माधवी’, ’यादगार’, ’शराफ़त’, ’भाई-भाई’, ’मेला’, ’प्रीतम’, ’रखवाला’, ’Johar Mehmood in Hong Kong', 'Bombay to Goa', 'गरम मसाला’, ’Double Cross', 'अनामिका’, ’Mr. Romeo', और 'माँ बहन और बीवी’। 1971 की देव आनन्द की कालजयी कृति ’हरे रामा हरे कृष्णा’ में राज किशोर ने ’सखी’ नामक चरित्र को निभाया था।  


1975 का वर्ष राज किशोर के लिए फिर एक बार स्वर्णिम वर्ष सिद्ध हुआ। इस साल उन्हें अमिताभ बच्चन अभिनीत तीन बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी फ़िल्मों में अभिनय का मौका मिला। ये फ़िल्में थीं ’ज़मीर’, ’दीवार’ और ’शोले’। फ़िल्म ’दीवार’ में उन्होंने ’दर्पण’ नामक किरदार के ज़रिए अमिताभ बच्चन के साथ स्क्रीन शेअर किया। रमेश सिप्पी की कालजयी कृति ’शोले’ में हर एक चरित्र अपने आप में यादगार हो गया है और हर चरित्र की अपनी अलग पहचान बन गई है। इस फ़िल्म में जेल के दृश्यों का बड़ा महत्व रहा। असरानी ने ’ब्रिटिश के ज़माने के जेलर’ के रूप में ख़ूब वाहवाही बटोरी। उसी जेल में एक क़ैदी था जिसे समलैंगिक स्वभाव वाले हास्य चरित्र के रूप में दिखाया गया। राज किशोर अभिनीत इस चरित्र को वीरू (धर्मेन्द्र) की तरफ़ हास्यास्पद तरीके से कमेन्ट पास करता हुआ दिखाया गया। धर्मेन्द्र और अमिताभ के साथ उनका यह दृश्य आज भी दर्शकों को अच्छी तरह से याद है। इसी साल ’दो जासूस’ फ़िल्म में भी राज किशोर नज़र आए मुख्य खलनायक प्रेम चोपड़ा के सहयोगी के रूप में। एक सच्चे अभिनेता की यही पहचान है कि चाहे पात्र कोई भी हो, उसे वास्तविक रूप प्रदान करना ही उसका काम है। और हर बार राज किशोर ने यह सिद्ध किया है अपने जानदार अभिनय से। 1976 में ’दीवानगी’ में एक स्टेज ऐक्टर और ’बंडलबाज़’ में इन्सपेक्टर शर्मा, तथा 1977 में ’इमान धरम’ में मुंशी की भूमिकाएँ निभाने के बाद इसी साल राजेश खन्ना अभिनीत ’अनुरोध’ में वो नज़र आए शायर माहिर लखनवी के किरदार में।

80 के दशक में भी राज किशोर क आभिनय सफ़र जारी रहा। उनके अभिनय से सजी इस दशक की कुछ चर्चित फ़िल्मों के नाम हैं ’ख़ानदान’, ’मन पसंद’, ’आंचल’, ’सनम तेरी क़सम’, ’तेरी क़सम’, ’दर्द का रिश्ता’, ’कलाकार’, ’लव मैरेज’, ’करिश्मा कुदरत का’, ’लल्लु राम’, ’हुकूमत’, ’पुरानी हवेली’ और ’अव्वल नंबर’। 90 के दशक में ’King Uncle’, ’फूल और अंगार’, ’दलाल’ के बाद 1995 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’करण-अर्जुन’ में राज किशोर ने जुगल का किरदार निभाया। राज किशोर के फ़िल्मी सफ़र की एक और ख़ास बात यह थी कि उन्होंने कई हॉरर और सस्पेन्स फ़िल्मों में अभिनय किया है। यह भी उनके अभिनय का ही कमाल था कि इस तरह की कहानियों में जिस तरह के भाव प्रकट होने चाहिए, वैसा वो सहजता से कर लेते थे। और यही कारण है कि हॉरर फ़िल्मों के लिए प्रसिद्ध बैनर ’रामसे ब्रदर्स’ तक ने उन्हें अपनी फ़िल्मों में अभिनय करवाया। इस श्रेणी की फ़िल्मों में उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में हैं ’सनसनी - दि सेनसेशन’ (1981), 'Dial 100' (1982), 'काली बस्ती’ (1985), 'तहख़ाना’ (1986), 'ज़िन्दा लाश’ (1986), ’पुरानी हवेली’ (1989), 'अजूबा कुदरत का’ (1991)। 1997 में राज किशोर के अभिनय वाली आख़िरी फ़िल्म आई ’मिस्टर ऐण्ड मिसेस खिलाड़ी’। अक्षय कुमार - जुही चावला अभिनीत इस फ़िल्म में राज किशोर ने एक प्रकाशक का किरदार निभाया। इस फ़िल्म के बाद राज किशोर ने फ़िल्मों से सन्यास ले लिया। उस समय उनकी उम्र 64 वर्ष थी। अगले बीस सालों तक वो अपना "सेवा-निवृत्त" जीवन यापन कर रहे थे। शारीरिक रूप से सक्रीय राज किशोर पिछले कुछ दिनों से पेट की बीमारी से पीड़ित थे और कुछ ही रोज़ पहले उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। 

राज किशोर भी चले गए। एक एक कर सिनेमा के सुनहरे दौर के नक्षत्र अस्त होते जा रहे हैं। लेकिन उनकी चमक कभी कम नहीं होगी। आने वाली पीढ़ियाँ भी इनके द्वारा निभाए इन अमर किरदारों को देख कर चमत्कृत होती रहेंगी। राज किशोर जी की याद में जानेमाने फ़िल्म समीक्षक पवन झा ने ट्वीट किया - "Good Small-time actors are like the musical instruments in big orchestra who help to create & set ambiance for a scene & still manage to get a glance. RajKishore, 85, will remain a significant happy memory of Two great Ensembles of Hindi Cinema - Sholay & Padosan. Rest in Peace!" ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से हम स्वर्गीय राज किशोर को दे रहे हैं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





आलेख : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

पञ्च परमेश्वर (मुंशी प्रेमचंद)

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में ज्योत्सना सिंह की कहानी 'भावनाओं का सम्बल' सुनी थी।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी प्रेमचंद की एक प्रेरक कथा पञ्च परमेश्वर जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

एक शताब्दी से हिन्दी (एवं उर्दू) साहित्य जगत में मुंशी प्रेमचंद का नाम एक सूर्य की तरह चमक रहा है। विशेषकर, ज़मीन से जुड़े एक कथाकार के रूप में उनकी अलग ही पहचान है। उनके पात्रों और कथाओं का क्षेत्र काफी विस्तृत है फिर भी उनकी अनेक कथाएँ भारत के ग्रामीण मानस का चित्रण करती हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे उर्दू में नवाब राय और हिन्दी में प्रेमचंद के नाम से लिखते रहे। आम आदमी की बेबसी हो या हृदयहीनों की अय्याशी, बचपन का आनंद हो या बुढ़ापे की जरावस्था, उनकी कहानियों में सभी अवस्थाएँ मिलेंगी और सभी भाव भी। उनकी कहानियों पर फिल्में भी बनी हैं और अनेक रेडियो व टीवी कार्यक्रम भी। उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसंबर 1915 के अंक में "सौत" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और उनकी अंतिम प्रकाशित (1936) कहानी "कफन" थी।

प्रस्तुत कथा का गद्य "पेट्रियट्स फ़ोरम" पर उपलब्ध है। "पञ्च परमेश्वर" का कुल प्रसारण समय 26 मिनट 25 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूँ।
 ~ मुंशी प्रेमचंद (1880-1936)

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"कमर झुक कर कमान हो गयी थी। एक-एक पग चलना दूभर था; मगर बात आ पड़ी थी। उसका निर्णय करना जरूरी था।”
 (मुंशी प्रेमचन्द कृत "पञ्च परमेश्वर" से एक अंश)


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#Seventh Story, Panch Parmeshwar: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2018/7. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 8 अप्रैल 2018

राग खमाज और तिलक कामोद : SWARGOSHTHI – 364 : RAG KHAMAJ & TILAK KAMOD




स्वरगोष्ठी – 364 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 3 : खमाज थाट

राग खमाज की बन्दिश -‘कोयलिया कूक सुनावे...’ और तिलक कामोद का गीत -‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’




उस्ताद  निसार हुसेन खाँ
प्रीति सागर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे खमाज थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग खमाज में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे। साथ ही खमाज थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग तिलक कामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



इन दिनों हम भारतीय संगीत के दस थाटों पर चर्चा कर रहे हैं। पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि संगीत के रागों के वर्गीकरण के लिए थाट प्रणाली को अपनाया गया। थाट और राग के विषय में कभी-कभी यह भ्रम हो जाता है कि पहले थाट और फिर उससे राग की उत्पत्ति हुई होगी। दरअसल ऐसा नहीं है। रागों की संरचना अत्यन्त प्राचीन है। रागों में प्रयुक्त स्वरों के अनुकूल मिलते स्वर जिस थाट के स्वरों में मौजूद होते हैं, राग को उस थाट विशेष से उत्पन्न माना गया है। मध्य काल में राग-रागिनी प्रणाली प्रचलन में थी। बाद में इस प्रणाली की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाने पर थाट-वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त रागों को विभाजित किया गया। हमारे शास्त्रकारों ने थाट के नामकरण के लिए ऐसे रागों का चयन किया, जिसके स्वर थाट के स्वरों से मेल खाते हों। थाट के नामकरण के उपरान्त सम्बन्धित राग को उस थाट का आश्रय राग कहा गया। आज का थाट खमाज है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे ग, म, प ध, नि॒। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है।

राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने रामपुर सहसवान घराने के प्रमुख स्तम्भ उस्ताद निसार हुसेन खाँ (1909-1993) द्वारा प्रस्तुत एक दुर्लभ बन्दिश का चुनाव किया है। राग खमाज की यह अनमोल रचना 1929 में रिकार्ड की गई थी। उस्ताद निसार हुसेन खाँ को अपने पिता और गुरु उस्ताद फिदा हुसेन खाँ से संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। बहुत छोटी आयु में उन्हें बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ के दरबारी संगीतज्ञ होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आगे चलकर खाँ साहब ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े। 1977 में उन्हें आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में प्रधान गुरु नियुक्त किया गया। यहाँ रह कर उन्होने उस्ताद राशिद खाँ सहित अनेक योग्य शिष्यो को तैयार किया। भारत सरकार द्वारा 1970 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अलावा खाँ साहब को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान सहित गन्धर्व महाविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गया था। आइए गायकी के इस शिखर-पुरुष की आवाज़ में सुनते हैं, राग खमाज की यह बन्दिश।

राग खमाज : ‘कोयलिया कूक सुनावे...’ : उस्ताद निसार हुसेन खाँ


खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग है- झिंझोटी, कलावती, दुर्गा, देस, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जैजैवन्ती, तिलक कामोद आदि। खमाज थाट का ही एक प्रचलित और लोकप्रिय राग तिलक कामोद है। श्रृंगार रस की रचनाएँ इस राग में खूब मुखर होती हैं। राग तिलक कामोद षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे, ग, सा, रे, म, प, ध, म,प, नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां, प, ध, म, ग, सा, रे, ग, सा, नि। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन खूब खिल उठता है। अब हम आपको राग तिलककामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ से लिया है। फिल्म ‘भूमिका’ 1940 के दशक में मराठी रंगमंच और फिल्मों की बहुचर्चित अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘सांगत्ये आइका’ पर आधारित थी, जिसका निर्देशन प्रख्यात फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था। फिल्म में अभिनय के प्रमुख कलाकार थे- अमोल पालेकर, स्मिता पाटील, नासीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी आदि। फिल्म को दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखन का और स्मिता पाटील को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का। इसके अलावा इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। फिल्म में कुल छः गीत हैं, जिनमे ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ सहित पाँच गीत बसन्त देव ने और एक गीत (‘सावन के दिन आए...’) मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है। बसन्त देव रचित गीत- ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’ में संगीतकार वनराज भाटिया ने राग तिलककामोद के स्वरों का स्पर्श किया है। सितारखानी अर्थात पंजाबी ताल के इस गीत को प्रीति सागर ने बेहद आकर्षक रूप में गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलक कामोद : ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ : प्रीति सागर : फिल्म – भूमिका




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 364वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 14 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 366वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 362वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म “गूँज उठी शहनाई” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारी एक नई प्रतिभागी श्वेता शुक्ला ने अपना उत्तर फेसबुक पर भेजा है। हम उनका भी उत्तर शामिल करते हुए अनुरोध करते हैं कि कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की तीसरी कड़ी में आपने खमाज थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग खमाज में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक उस्ताद निसार हुसेन खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही खमाज थाट के जन्य राग तिलक कामोद पर आधारित एक फिल्मी गीत पार्श्वगायिका प्रीति सागर की आवाज़ में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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