मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

मैजस्टिक मूँछें - सलिल वर्मा, उषा छाबड़ा, अनुराग शर्मा

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में विष्णु प्रभाकर की कहानी रोटी या पाप का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं अनुराग शर्मा की "मैजस्टिक मूँछें", जिसको स्वर दिया है सलिल वर्मा, उषा छाबड़ा, और अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 19 मिनट 45 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

अनुराग शर्मा की कहानी मैजेस्टिक मूँछें का गद्य हिंदी समय पर उपलब्ध है। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

शक्ति के बिना धैर्य ऐसे ही है जैसे बिना बत्ती के मोमबत्ती।
अनुराग शर्मा (पिट्सबर्ग)

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"तुम जबसे गयीं, निपट अकेला हूँ। वही शनिवार, वही तीसरा पहर, वही अड्डा, वही बेंच, वही आवाज़ें।"
(अनुराग शर्मा की "मैजस्टिक मूँछें" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
मैजेस्टिक मूँछें mp3

#Fourth Story: Majestic Moustache; Author: Anurag Sharma; Voice: Salil Varma, Usha Chhabra, Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2018/4.

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS




स्वरगोष्ठी – 355 में आज

पाँच स्वर के राग – 3 : “मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”

राजन-साजन मिश्र से श्रृंगाररस की बन्दिश और मुहम्मद रफी से भक्तिरस का गीत सुनिए





नौशाद, मुहम्मद रफी और शकील बदायूनी
पण्डित राजन और साजन मिश्र
"रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग मालकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात युगल गायक राजन और साजन मिश्र के स्वरों में राग मालकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। अनेक फिल्मी गीतों में राग मालकौंस का प्रयोग किया गया है। राग मालकौंस में ही निबद्ध 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से एक विख्यात गीत –“मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”, मुहम्मद रफी के स्वर में सुनवा रहे हैं।



पाँच स्वर के राग अर्थात औड़व-औड़व जाति के रागों की श्रृंखला के अन्तर्गत आज की कड़ी में हम बेहद लोकप्रिय राग मालकौंस की चर्चा कर रहे हैं। राग मालकौंस भैरवी थाट का एक लोकप्रिय राग है। पहले आपको सुनवाते है, राग मालकौंस का एक आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण। संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए एक कालजयी भक्तिगीत रचा था। नौशाद की भक्तिरस प्रधान गीतों की रचनात्मक कुशलता के बारे में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग, अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “नौशाद के संगीत के दो पहलू रहे हैं- एक तो शास्त्रीय आधार का सरस, सुगम्य रूपान्तरित लोकसंगीत और दूसरा शास्त्रीय आधारित आभिजात्य संगीत जिसमें कभी मुगलिया या लखनऊ की नवाबी संस्कृति की खूबसूरत भंगिमाएँ रहती थीं, तो कभी ईश्वर की आराधना करता उदात्त भक्ति-संगीत। साहित्य में भक्ति-साहित्य भले ही लोकरंजक और लोकसंस्कृति से प्रेरित रहा हो, पर नौशाद के भक्ति-गीतों में शुद्ध, गम्भीर शास्त्रीय सुर ही लगे हैं। नौशाद के संगीत की मूल प्रवृत्ति भारतीय शास्त्रीय संगीत-परम्परा की तरह ही कलावादी रही है।” फिल्म ‘बैजू बावरा’ के भक्तिपरक गीत यदि नौशाद को शिखर तक ले जाते हैं, वहीं गायक मुहम्मद रफी को उनके भावपूर्ण गायन के लिए प्रथम श्रेणी के गायकों में शामिल कराते हैं। प्रस्तुत है, गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायक मुहम्मद रफी द्वारा सृजित आस्था, समर्पण और पुकार से युक्त फिल्म ‘बैजू बावरा’ का यह गीत।

राग मालकौंस : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मुहम्मद रफी : फिल्म - बैजू बावरा



थाट भैरवी, वादी म सा, रखिए रे प वर्ज्य,
तृतीय प्रहर निशि गाइए, मालकौंस का अर्ज।

राग मालकौंस की गणना भैरवी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इसमें ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में सर्वाधिक अनुकूल होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से किया जाता है। सुविख्यात इसराज और मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से इस राग पर हमारी विस्तृत चर्चा हुई। उन्होने बताया कि राग भैरवी के कोमल ऋषभ और पंचम को हटा देने पर बचे हुए भैरवी के स्वरों- कोमल गान्धार, मध्यम, कोमल धैवत और कोमल निषाद में मध्य व तार सप्तक के षडज का संयोग कर देने से जिस राग का रूप निर्मित होता है वह मालकौंस है। औड़व जाति के इस इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस सागर की भाँति है। विविध नदियों का मानों इसमें समागम है। इसके मन्द्र धैवत को षडज मान कर यदि मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली का दर्शन होने लगता है। मन्द्र निषाद को जब षडज मान कर मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाता है तब राग मेघ मल्हार का आभास होने लगता है। इसी प्रकार गान्धार स्वर को यदि षडज मान कर प्रयोग किया जाए तो राग दुर्गा और मध्यम को षडज मान कर चलने पर राग धानी की झलक मिलने लगती है। राग भूपाली का आत्मनिवेदन, मेघ मल्हार का नैसर्गिक गाम्भीर्य, राग दुर्गा में व्याप्त भक्तिभाव की विनयपूर्ण अभिव्यक्ति और राग धानी का वैचित्र्य भाव, इन सभी के समागम से राग मालकौंस का गम्भीर चिन्तनशील स्वरूप कायम होता है। राग मालकौंस में षडज स्वर आधार है। कोमल गान्धार स्वर से पुकार का भाव और मध्यम स्वर पर ठहराव से मन व्यापक चिन्तन की दिशा में अग्रसर होने लगता है। राग मालकौंस में कोमल ऋषभ और पंचम स्वर के न होने से मध्यम के साथ शेष तीनों कोमल स्वर गान्धार, धैवत और निषाद के मिलाप से गाम्भीर्य कायम होता है। कोमल ऋषभ के विषाद भाव और पंचम की जागृति दोनों ही दार्शनिक गाम्भीर्य निर्मित करने में व्यवधान उत्पन्न न करें, इसीलिए इनका प्रयोग निषिद्ध है। राग मालकौंस में प्रयुक्त स्वरों को निरन्तर दुहराने से राग भूपाली, मेघ मल्हार, दुर्गा और धानी झलक जाएँगे। इसलिए राग मालकौंस को बरतना सरल नहीं होता। मध्यम के साथ मिल कर स्वरात्मक व सहयोगी क्रियाकलाप होंगे तो मालकौंस का स्वरूप कायम रहेगा। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग मालकौंस के शास्त्रीय स्वरूप को प्रदर्शित करने के लिए इस राग की एक बन्दिश। अब आप सुनिए, सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में द्रुत तीनताल में निबद्ध एक खयाल रचना। आप इस रचना का आस्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की की अनुमति दें।

राग मालकौंस : “आज मोरे घर आइल बलमा...’ : पण्डित राजन और साजन मिश्र



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 355वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक और गायिका की युगल आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 357वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 353वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

वर्ष 2018 की पहेली क्रमांक 353 का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, आज हम आपको एक चिन्ताजनक सूचना देना चाहते हैं। "स्वरगोष्ठी" की पहेली प्रतियोगिता की पिछले कई वर्षों की महाविजेता और हमारी नियमित पाठक व श्रोता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया अवस्थ हैं। आगामी 12 फरवरी, 2018 को अमेरिका में उनकी स्पाइनल सर्जरी होने वाली है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक और सम्पादक मण्डल के सभी सदस्य उनके इस कष्ट से उदास हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि विजया जी को शीघ्र स्वस्थ करें। ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस अंक में आपने राग मालकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए हमने पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में राग मालकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन कराया। राग मालकौंस के स्वरों का उपयोग करते हुए कई फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “बैजू बावरा” से राग मालकौंस के स्वरों में पिरोए एक चर्चित गीत मुहम्मद रफी के स्वर में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS : 4 Feb., 2018

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

चित्रकथा - 54: अभिनेत्री सुप्रिया चौधरी और उनकी तीन हिन्दी फ़िल्में

अंक - 54

सुप्रिया चौधरी और उनकी तीन हिन्दी फ़िल्में


"जिन रातों की भोर नहीं है..."




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 54-वीं कड़ी है।

26 जनवरी 2018 को बांग्ला सिनेमा की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री सुप्रिया देवी (सुप्रिया चौधरी) का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पद्मश्री, बंग-विभूषण, फ़िल्मफ़ेयर, BFJA आदि पुरस्कारों से सम्मानित सुप्रिया देवी की यादगार बांग्ला फ़िल्मों में उल्लेखनीय नाम हैं ’आम्रपाली’, ’मेघे ढाका तारा’, ’सुनो बरनारी’, ’कोमल गंधार’, ’स्वरलिपि’, ’तीन अध्याय’, ’संयासी राजा’ और ’सिस्टर’ जैसी कालजयी फ़िल्में। सुप्रिया देवी की अदाओं और अभिनय क्षमता की तुलना 50-60 के दशकों में हॉलीवूड अभिनेत्री सोफ़िया लॉरेन से की जाती थी। बांग्ला के मेगास्टार उत्तम कुमार और सुप्रिया देवी की जोड़ी भी ख़ूब पसन्द की गई। हिन्दी फ़िल्म जगत की बात करें तो सुप्रिया चौधरी ने 60 के दशक की तीन फ़िल्मों में बतौर नायिका काम किया है। ये फ़िल्में हैं ’बेगाना’, ’दूर गगन की छाँव में’ और ’आप की परछाइयाँ’। आइए, आज ’चित्रकथा’ में सुप्रिया चौधरी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी इन्हीं तीन हिन्दी फ़िल्मों की बातें करें। आज का यह अंक सुप्रिया जी को समर्पित है।






8 January 1933 – 26 January 2018

सुप्रिया देवी का जन्म बर्मा (म्यानमार) के मिचकिना नामक छोटे से शहर में हुआ था। उनके पिता गोपाल चन्द्र बनर्जी एक सफ़ल वकील थे। उनकी माँ किरणबाला देवी एक गृहणी थीं जिन्हें संगीत और नृत्य से बहुत अधिक लगाव था। इस तरह से बचपन से ही सुप्रिया देवी एक अच्छी नृत्यांगना बन गईं और उस समय के बर्मा के प्रधानमंत्री थाकिन नु से पुरस्कार भी प्राप्त किया। देश स्वाधीन होने के बाद बनर्जी परिवार बर्मा से कलकत्ता स्थानान्तरित हो गए। 1942 में जब जापान ने बर्मा पर कब्ज़ा कर लिया तब यह परिवार रिफ़्युजी बन गए और तमाम ख़तरों को झेलते हुए पैदल बर्मा से कलकत्ते का सफ़र तय किया। कलकत्ता आकर सुप्रिया देवी ने गुरु मुरुतप्पन पिल्लाई, और बाद में गुरु प्रह्लाद दास से नृत्य की शिक्षा जारी रखा। उनके पड़ोस में उस ज़माने की जानीमानी चरित्र अभिनेत्री चन्द्रावती देवी रहा करती थीं। उनके सहयोग से सुप्रिया देवी को बांग्ला सिने संसार में प्रवेश मिला और बाकी अब स्वर्णिम इतिहास बन चुका है।

1952 से लेकर 1963 तक एक के बाद एक सफ़ल बांग्ला फ़िल्मों में अभिनय करने के बाद सुप्रिया चौधरी ने हिन्दी फ़िल्म जगत में अपनी क़िस्मत आज़माने का फ़ैसला लिया। 1963-64 में उनकी एक के बाद एक कुल तीन फ़िल्में आईं जिनमें उन्होंने मुख्य नायिका का किरदार निभाया। ये फ़िल्में हैं धर्मेन्द्र के साथ ’बेगाना’ और ’आप की परछाइयाँ’ तथा किशोर कुमार के साथ ’दूर गगन की छाँव में’। 1963 की फ़िल्म ’बेगाना’ एक मनोरंजक पर भावुक ड्रामाई कहानी पर आधारित है। कहानी के केन्द्रबिन्दु में एक तरफ़ एक माँ है, उसका पति है, और उसका बच्चा है जो उसके पति का नहीं है, तो दूसरी तरफ़ एक पत्नी है, एक पति है और उसके शादी से पहले का प्रेमिक है (जिसका वह बच्चा है)। इन्हीं रिश्तों का ताना-बाना है फ़िल्म ’बेगाना’ की कहानी। धर्मेन्द्र, सुप्रिया चौधरी, शैलेश कुमार और मास्टर बबलू के जानदार और प्राकृतिक अभिनय की वजह से कहानी में जान आ गई और इस फ़िल्म को ख़ूब सराहा गया। क्योंकि यह सुप्रिया चौधरी की पहली हिन्दी फ़िल्म थी, इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण था कि वो सही फ़िल्म का चुनाव करें हिन्दी सिने जगत में पदार्पण के लिए। बिन विवाह माँ का यह किरदार उस ज़माने के हिसाब से काफ़ी "बोल्ड" था, और इस किरदार के ज़रिए हिन्दी फ़िल्म जगत में क़दम रखना ख़तरे से ख़ाली नहीं था। फिर भी सुप्रिया चौधरी ने साहस का परिचय देते हुए इसी फ़िल्म को चुना और यह सिद्ध भी किया कि हिन्दी फ़िल्मों में भी वो अपनी उसी असरदार अभिनय क्षमता का परिचय दे सकती हैं जो वो बांग्ला फ़िल्मों में एक दशक से देती आई हैं। ’बेगाना’ फ़िल्म बनी थी ’सदाशिव चित्र’ के बैनर तले और इसका निर्देशन सदाशिव राव कवि ने किया था। शैलेन्द्र ने फ़िल्म के गीत लिखे और सपन जगमोहन का संगीत था। फ़िल्म के तमाम गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ रफ़ी का गाया "फिर वो भूली सी याद आई है..."। उस वर्ष ’बंदिनी’, ’मेरे महबूब’, ’ताज महल’, ’मुझे जीने दो’, ’गुमराह’, ’दिल एक मंदिर’ जैसी कामयाब फ़िल्मों की भीड़ में ’बेगाना’ की तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं गया, और एक अच्छी फ़िल्म होने के बावजूद इस फ़िल्म को लोगों ने धीरे धीरे भुला दिया।

’बेगाना’ ख़ास नहीं चली, लेकिन अभिनेत्री सुप्रिया चौधरी के अभिनय की तरफ़ फ़िल्मकारों का ध्यान ज़रूर गया। और यही कारण है कि प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक मोहन कुमार ने जब 1964 की अपनी अगली फ़िल्म ’आप की परछाइयाँ’ प्लैन की, तब उन्होंने धर्मेन्द्र और सुप्रिया चौधरी की जोड़ी को ही चुना। साथ में दूसरी अभिनेत्री के रूप में शशिकला का चुनाव हुआ। फ़िल्म में संगीत दिया मदन मोहन ने और इस फ़िल्म के सभी गीत सुपरहिट हुए। "यही है तमन्ना तेरे घर के सामने", "अगर मुझसे मोहब्बत है", "मैं निगाहें तेरे चेहरे से हटाऊँ कैसे" जैसे गीत उस ज़माने में गली गली गूंजा करते थे और आज भी अक्सर रेडियो पर सुनाई दे जाते हैं। गीतों के चल पड़ने से फ़िल्म को भी पब्लिसिटी मिल जाती है। ’बेगाना’ के गीतों ने जो कमाल नहीं दिखा सके, वो कमाल ’आप की परछाइयाँ’ के गीतों ने दिखा दी और नतीजा यह हुआ कि अब की बार दर्शकों ने धर्मेन्द्र और सुप्रिया चौधरी की जोड़ी को पिछली बार से अधिक ध्यान से देखा और सराहा। ’आप की परछाइयाँ’ फ़िल्म में सुप्रिया चौधरी द्वारा निभाए चरित्र की बात करें तो यह चरित्र आशा नामक लड़की का चरित्र है जो एक सुरुचिपूर्ण, शिष्ट और आकर्षक लड़की है और नायक चन्द्रमोहन (धर्मेन्द्र) की प्रेमिका भी। इस किरदार में सुप्रिया चौधरी ने अपने आप को बख़ूबी साबित किया और इस किरदार में इस क़दर घुलमिल गईं कि फ़िल्म को देखते हुए ऐसा लगा कि जैसे वो ख़ुद ही उस किरदार को जी रही हों। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वो केवल एक नर्म-ओ ख़ूबसूरत बब्ली लड़की का रोल निभा रही हों, चन्द्रमोहन के बुरे समय में वो एक सख़्त खम्बे के रूप में नज़र आती हैं। नरमी और सख़्ती का सुन्दर संतुलन सुप्रिया चौधरी के इस किरदार में महसूस की जा सकती है। सिर्फ़ यह किरदार ही नहीं, सुप्रिया हक़ीक़त में बेहद ख़ूबसूरत थीं। लम्बा कद, सुन्दर गठन और ख़ूबसूरत आँखों की धनी सुप्रिया चौधरी की आवाज़ भी बेहद गम्भीर पर सुमधुर थी। ’बेगाना’ और ’आप की परछाइयाँ’ फ़िल्मों के बाद कुछ फ़िल्म समीक्षकों ने यह राय दी कि सुप्रिया कभी कभी बहुत कठोर (stiff) नज़र आई हैं, लेकिन सभी को यह बात याद रखनी चाहिए कि एक ग़ैर हिन्दी भाषी के लिए एक नई इन्डस्ट्री में पहली बार काम करना उतना आसान नहीं होता जितना प्रतीत होता है। फिर भी इन छोटी-मोटी कमियों के बावजूद उनके द्वारा निभाए आशा का किरदार बेदाग़ है, बेमिसाल है। यह कहते हुए ज़रा सी भी हिचकिचाहट नहीं कि ’आप की परछाइयाँ’ में सुप्रिया चौधरी का होना एक सुखद अनुभूति है, जो इस पूरी फ़िल्म को सुन्दर बनाती है।

1964 में सुप्रिया चौधरी की बतौर नायिका तीसरी और अन्तिम हिन्दी फ़िल्म आई ’दूर गगन की छाँव में’। यह पूरी तरह से किशोर कुमार की फ़िल्म थी। निर्माता, निर्देशक, लेखक, संगीतकार, गायक और अभिनेता के रूप में किशोर कुमार ने इस फ़िल्म के हर कोने में अपनी छाप छोड़ दी। फ़िल्म की मुख्य भूमिकाओं में हैं किशोर कुमार, अमित कुमार और सुप्रिया चौधरी। फ़िल्म की कहानी बहुत सीधी है। शंकर (किशोर) एक सैनिक है जो एक युद्ध से वापस लौट कर देखता है कि उसका घर तबाह हो चुका है, उसकी पत्नी आग में जल रही है, और इस भयानक हादसे से उसका बेटा रामू (अमित कुमार) अपने बोलने की शक्ति गँवा चुका है। यह फ़िल्म पूर्णत: पिता-पुत्र की कहानी है। यह कहानी है एक लाचार पिता द्वारा अपने बेटे की आवाज़ वापस दिलवाने के प्रयासों की। पिता-पुत्र की इस भावुक दर्द भरी कहानी में किसी तीसरे चरित्र का अपने अभिनय से छाप छोड़ जाना कोई आसान काम नहीं था। ऐसे में मीरा की भूमिका में सुप्रिया चौधरी का इस फ़िल्म में होना बेहद सुखद अनुभव रहा। ख़ूबसूरत सुप्रिया चौधरी ने अपनी सशक्त स्क्रीन प्रेज़ेन्स के माध्यम से पिता-पुत्र की इस कहानी में भी अपनी अलग जगह बनाई, जिसके लिए ख़ुद किशोर कुमार ने भी उनकी बेहद सराहना की। फ़िल्म में मीरा का चरित्र एक ऐसी उदार औरत का चरित्र था जो मातृहीन रामू को माँ जैसा प्यार करती थीं। रामू के पिता शंकर के लिए भी उसके मन में प्यार था। इस फ़िल्म में आशा भोसले के गाए दो बेहद ख़ूबसूरत गीत थे जो सुप्रिया चौधरी पर फ़िल्माए गए। पहला गीत एक लोरी है "खोया खोया चंदा खोये खोये तारे", रामू द्वारा मीरा को पहली बार माँ कहे जाने पर मीरा ख़ुशी से यह लोरी गाती है। पहली बार "माँ" कहे जाने पर एक औरत को किस तरह की ख़ुशी मिल सकती है, सुप्रिया चौधरी ने इस गीत के शुरुआती शॉट में यह दर्शाया है। और दूसरा गीत एक ग़मज़दा नग़मा है "पथ भूला इक आया मुसाफ़िर", जो स्वयं आशा भोसले का पसन्दीदा गीत रहा है। शैलेन्द्र के असरदार बोलों और किशोर कुमार के भावुक संगीत ने फ़िल्म के हर एक गीत को बहुत ऊँचे मुकाम तक पहुँचाया है।

यह तो सर्वविदित है कि किशोर कुमार बंगाली खाने के बहुत शौकीन थे। उन्हें यह भी पता था कि सुप्रिया चौधरी बहुत अच्छा खाना बनाती हैं। बस फिर क्या था, ’दूर गगन की छाँव में’ की शूटिंग् के दिनों किशोर दा की फ़रमाइश पर सुप्रिया देवी अक्सर मछली के तरह तरह के पकवान बना कर अपने साथ ले आती थीं सेट पर। यही नहीं, किशोर कुमार जब भी कोलकाता जाते थे, वो अभिनेता उत्तम कुमार के घर पर मछली खाने जाते। अगर उत्तम कुमार और सुप्रिया देवी मुंबई के दौरे पर भी क्यों ना हो, अगर किशोर उस समय कोलकाता में होते, तो भी वो उत्तम कुमार के घर जाकर मछली बनवाते। सुप्रिया चौधरी ने एक साक्षात्कार में बताया था कि किस तरह से एक बार किशोर दा उनके बनाए झिंगा मछली और भेटकी मछली के पकवानों को खा कर तृप्त हुए थे। किशोर कुमार के अलावा मुंबई के एक और शख़्स जो सुप्रिया चौधरी के "पाक दक्षता" के कायल थे, वो थे अभिनेता संजीव कुमार। वो भी कोलकाता दौरों के समय एक दिन उत्तम-सुप्रिया के घर पर खाना ज़रूर खाते। एक बार सुप्रिया देवी के बनाए काजु चिकन खा कर वो इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने कहा था कि ऐसा पकवान उन्होंने ज़िन्दगी में इससे पहले कभी नहीं खाया, किसी पाँच सितारा होटल में भी नहीं।

ख़ैर, वापस आते हैं सुप्रिया चौधरी अभिनीत हिन्दी फ़िल्मों की चर्चा पर। इसे क़िस्मत का खेल ही समझिए या फिर कुछ और, इन तीनों फ़िल्मों में उनके अभिनय की भूरी भूरी प्रशंसा तो हुई, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर इन फ़िल्मों के पिट जाने की वजह से सुप्रिया चौधरी हिन्दी सिने जगत की पहली श्रेणी की नायिका का दर्जा ना हासिल कर सकीं। उन्हें लगा कि बांग्ला फ़िल्म उद्योग ही उनके लिए सही है, और उन्होंने एक बार फिर वहीं का रुख़ कर लिया। और इस तरह से हिन्दी सिनेमा में सुप्रिया चौधरी केवल तीन फ़िल्मों की नायिका बन कर रह गईं। सुप्रिया चौधरी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन रुपहले परदे पर उनकी शख़्सियत हमेशा जगमगाती रहेंगी। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से स्वर्गीया सुप्रिया चौधरी को विनम्र श्रद्धा-सुमन!!

आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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