शनिवार, 7 नवंबर 2015

"एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने..." - जानिए गुलज़ार और पंचम के नोक-झोक की बातें इस गीत के बनने के दौरान


एक गीत सौ कहानियाँ - 69
 

'एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 69-वीं कड़ी में आज जानिए 1977 की फ़िल्म ’किनारा’ के गीत "एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने..." के बारे में जिसे भूपेन्द्र और हेमा मालिनी ने गाया था। बोल गुलज़ार के और संगीत राहुल देव बर्मन का।


गुलज़ार उन गीतकारों में से हैं जो अपने गीतों का फ़िल्म की कहानी का हिस्सा बनाते हैं। दूसरे शब्दों में, उनके गीत फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाते हैं। आम तौर पर फ़िल्मी गीतों को आइटम नम्बर्स के तौर पर फ़िल्मों में डाला जाता है। कहानी गीत के लिए रुक जाती है, और गीत समाप्त पर फिर से चल पड़ती है और अगले गीत पे जाकर दोबारा रुक जाती है। पर गुलज़ार जैसे गीतकार हमेशा लीक से अलग रहे हैं। इस तरह के कहानी को आगे बढ़ाने वाले गीतों में एक गीत है फ़िल्म ’किनारा’ का, "एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने..."। हालाँकि यह गीत कोई ट्रेन्ड-सेटर गीत नहीं सिद्ध हुआ, पर इस गीत की ख़ूब सराहना ज़रूर हुई थी। गुलज़ार के शब्दों में यह गीत एक गीत नहीं था, बल्कि एक दृश्य (सीन) था जिसे संगीत की दृष्टि से फ़िल्माया गया था। इस गीत में "टिकू की बच्ची, will you shut up?" जैसे बोल हैं। जब गुलज़ार इस गीत को पंचम के पास ले गए तो पंचम की पहली प्रतिक्रिया थी "क्या है यह... गाना है या सीन है?" गुलज़ार का जवाब था, "यह सीन है, पर इसे गाना है।" यह सुनने के बाद पंचम अपना हाथ अपने माथे पे मारते हुए कहा, "कोई काम सीधा नहीं करता है"। काफ़ी देर तक बड़बड़ाने के बाद पंचम पूरा पढ़ने के लिए तैयार हुए। पर दूसरी ही पंक्ति पे जा कर उनके माथे का शिकन गहराया क्योंकि पंक्ति थी "तूने साड़ी में उड़स ली हैं मेरी चाबियाँ घर की"। पंचम हारमोनियम को पीछे धकेलते हुए फिर से शुरू हो गए, "यह कोई गीत है? चाबियाँ कोई पोएट्री है?" मुखड़े की धुन को गुनगुनाते हुए हर बार पंचम "चाबियाँ" पे रुक जाया करते, थोड़ा बड़बड़ाते और गुलज़ार से इस शब्द को बदलने के लिए कहते। पर गुलज़ार भी अपने निर्णय पे अटल थे। पंचम के लाख चिल्लाने पर भी गुलज़ार इस शब्द को हटाने के लिए राज़ी नहीं हुए। आलम यह हुआ कि इसके बाद एक लम्बे समय तक पंचम गुलज़ार को ’चाबियाँ’ कह कर बुलाया करते थे। जब भी गुलज़ार म्युज़िक रूम में घुसते, पंचम कह उठते, "लो चाबियाँ आ गईं"। और इसके बाद जब भी गुलज़ार कोई इस तरह का शब्द अपने गीतों में इस्तेमाल करते, पंचम उनके पीछे पड़ जाते।



"एक ही ख़्वाब..." भूपेन्द्र और हेमा मालिनी ने गाया था। हेमा मालिनी ने इस गीत को बहुत ही अच्छी और सुरीली तरीके से निभाया जिससे यह हुआ कि भूपेन्द्र को थोड़ी परेशानी होने लगी। गुलज़ार साहब बताते हैं कि एक बार तो भूपेन्द्र अपने आप को रोक नहीं सके और बोल ही पड़े कि "She's too good, yaar!" ऐसा ही हुआ था मन्ना डे और मीना कुमारी के बीच फ़िल्म ’पिंजरे के पंछी’ फ़िल्म के गीत में। मन्ना दा मीना जी से तो कुछ नहीं बोले, पर गुलज़ार और साउन्ड्र रेकॉर्डिस्ट के पास जाकर शिकायत करने लगे कि "यार उनके सामने खड़े होकर गाना बहुत मुश्किल है। मैं उनको देखूँ, या उनसे बात करूँ, या गाना गाऊँ?" ख़ैर, वापस आते हैं ’एक ही ख़्वाब..." पर। गाना रेकॉर्ड होने के बाद पंचम को लगा कि गाने में कुछ कमी सी है, थोड़ा डल लग रहा है। इसलिए उन्होंने भूपेन्द्र को हेडफ़ोन दिया और उनसे अपने गीटार को अनायास बजाते रहने को कहा। सब को हैरान करते हुए भूपेन्द्र ने एक ही टेक में यह काम कर डाला। भूपेन्द्र एक और टेक देना चाहते थे पर पंचम को लगा कि पहला टेक ही उत्तम है। अन्तिम निर्णय हमेशा पंचम का ही होता था। हर किसी को पता था कि उन्हें अपना काम अच्छी तरह से पता है और इस पर उनसे कोई सवाल नहीं कर सकता। इस गीत से पहले हेमा मालिनी ने 1974 की फ़िल्म ’हाथ की सफ़ाई’ में किशोर कुमार के साथ "पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए..." गीत गा चुकी थीं। इसलिए इस गीत में उनकी आवाज़ को लेने का निर्णय लेने में कोई परेशानी नहीं हुई। इन दो गीतों के अलावा एक तीसरा गीत भी है जिसमें हेमा मालिनी की आवाज़ सुनाई दी है, वह है फ़िल्म ’शोले’ का "कोई हसीना जब रूठ जाती है तो...", जिसमें उनकी गाती हुई आवाज़ तो नहीं पर गाली देती हुई आवाज़ ("चल हट साले") सुनाई दी है।


अब आते हैं गीत के फ़िल्मांकन पर। इस गीत का एक फ़्लैशबैक गीत के रूप में प्रयोग में लाया जाने वाला था जिसके लिए एक स्टार कलाकार की तलाश चल रही थी। गुलज़ार हेमा मालिनी से इस रोल के लिए धर्मेद्र से बात करने के लिए कहने से थोड़ा हिचहिचा रहे थे। हालाँकि हेमा और धर्मेन्द्र के प्यार की ख़ुशबू उन दिनों हवाओँ में सुगन्ध फैला रही थी, पर औपचारिक रूप से दोनों ने इसे स्वीकारा नहीं था और एक-दूसरे को बस "अच्छा दोस्त" कहते थे। पर जब वहाँ इस रोल के लिए अलग-अलग नायकों के नाम लिए जा रहे थे तब गुलज़ार को चौंकाते हुए हेमा मालिनी ने शर्माते हुए उनसे पूछा, "मेरा दोस्त क्यों नहीं इस रोल को निभा सकता?" हेमा मालिनी ने अपनी ज़बान से धर्मेन्द्र का नाम नहीं लिया पर उनके पूरे चेहरे पर सिर्फ़ उन्हीं का नाम लिखा हुआ था। इसके बाद गुलज़ार ने धर्मेन्द्र को फ़ोन किया और उसी फ़ोन-कॉल में धर्मेन्द्र ने यह रोल अदा करने के लिए हामी भर दिया। धर्मेन्द्र को गुलज़ार की फ़िल्में अच्छी लगती थी और वो उनके साथ आगे भी काम करना चाहते थे, तभी एक दिन वो गुलज़ार से कहने लगे कि "क्या गेस्ट रोल ही करवाओगे मुझसे?" गुलज़ार ने जब ’देवदास’ बनाने का निर्णय लिया तो देवदास के रूप में धर्मेन्द्र का ही विचार उनके मन में आया। यह किरदार धर्मेन्द्र के करीयर का सबसे महत्वपूर्ण किरदार साबित हो सकता था, पर दुर्भाग्यवश दो शेड्युल के बाद इस फ़िल्म का निर्माण बन्द हो गया। फिर इसके बाद गुलज़ार और धर्मेन्द्र कभी साथ में काम नहीं कर सके और दोनों की एक दूसरे के साथ काम करने की ख़्वाहिश अधूरी ही रह गई, बस एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने...। लीजिए अब आप फिल्म 'किनारा' का यही गीत सुनिए। 


फिल्म - किनारा : 'एक ही ख्वाब कई बार देखा है मैंने...' : भूपेन्द्र और हेमा मालिनी : संगीत - राहुलदेव बर्मन



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




मंगलवार, 3 नवंबर 2015

काजल कुमार की लघुकथा आढ़तिया

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में उषा छाबड़ा की लघुकथा "बचपन का भोलापन" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं काजल कुमार लिखित लघुकथा आढ़तिया, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी आढ़तिया का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 45 सेकंड है। इसका गद्य कथा-कहानी ब्लॉग पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कवि, कथाकार और कार्टूनिस्ट काजल कुमार के बनाए चरित्र तो आपने देखे ही हैं। उनकी व्यंग्यात्मक लघुकथायेँ "समय", "एक था गधा", "ड्राइवर", "लोकतनतर", और कुत्ता आप पहले सुन चुके हैं। काजल कुमार दिल्ली में रहते हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"कमाई इतनी भी नहीं हो रही थी कि खर्च निकल आए।”
 (काजल कुमार की लघुकथा "आढ़तिया" से एक अंश)


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आढ़तिया MP3

#Twenty Second Story, Adhatiya; Kajal Kumar; Hindi Audio Book/2015/22. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 1 नवंबर 2015

जगजीत सिंह और राग : SWARGOSHTHI – 242 : JAGJEET SINGH AND RAGAS


स्वरगोष्ठी – 242 में आज

संगीत के शिखर पर – 3 : जगजीत सिंह के गजल, गीत और भजन

जगजीत सिंह के बेमिसाल मगर कमचर्चित राग प्रयोग की एक झलक




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमारा विषय है, गजल गायकी और इस विधा में अत्यन्त लोकप्रिय रहे गायक जगजीत सिंह और उनकी गजल, गीत और भजन की राग आधारित प्रस्तुतियाँ। आज के अंक में हम जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत राग दरबारी कान्हड़ा में निबद्ध एक द्रुत रचना, राग भैरवी में ठुमरियाँ और राग दरबारी कान्हड़ा के स्वरों में एक कीर्तन सुनवाएँगे।



गजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी,1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी सरकारी कर्मचारी थे। जगजीत सिंह का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गाँव का रहने वाला है। उनकी प्रारम्म्भिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में माध्यमिक शिक्षा के लिए जालन्धर आ गए। डी.ए.वी. कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूर्ण की और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। जगजीत सिंह को बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला था। गंगानगर मे ही पण्डित छगनलाल शर्मा से दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखा। बाद में सेनिया घराने के उस्ताद जमाल खाँ से ख्याल, ठुमरी और ध्रुवपद की बारीकियाँ सीखीं। आगे चल कर उन्होने ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में कुछ नये प्रयोग कर संगीत की इसी विधा में आशातीत सफलता प्राप्त की, परन्तु जब भी उन्हें अवसर मिला, अपनी शास्त्रीय संगीत शिक्षा को अनेक संगीत सभाओं में प्रकट किया। जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत किये गए अधिकतर ग़ज़लों, गीतों और भजनों में रागों का स्पर्श स्पष्ट परिलक्षित होता है। राग दरबारी और भैरवी उनके प्रिय राग थे। आइए, आपको सुनवाते हैं, जगजीत सिंह के स्वर में राग दरबारी, द्रुत एकताल में निबद्ध एक खयाल रचना।


राग दरबारी : “नज़रें करम फरमाओ...” : जगजीत सिंह




जगजीत सिंह 1955 में मुम्बई आ गए। यहाँ से उनके संघर्ष का दौर आरम्भ हुआ। मुम्बई में रहते हुए विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर, वैवाहिक समारोह अथवा अन्य मांगलिक अवसरों पर गीत-ग़ज़लें गाकर अपना गुजर करते रहे। उन दिनों देश के स्वतंत्र होने के बावजूद ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में दरबारी परम्परा कायम थी। संगीत की यह विधा रईसों, जमींदारों और अरबी-फारसी से युक्त क्लिष्ट उर्दू के बुद्धिजीवियों के बीच ही प्रचलित थी। जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को इस दरबारी परम्परा से निकाल कर जनसामान्य के बीच लोकप्रिय करने का प्रयत्न किया। उस दौर में ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेग़म अख्तर, तलत महमूद और मेंहदी हसन जैसे दिग्गजॉ के प्रयत्नों से ग़ज़ल, अरबी और फारसी के दायरे से निकल कर उर्दू के साथ नये अंदाज़ में सामने आने को बेताब थी। ऐसे में जगजीत सिंह, अपनी रेशमी आवाज़, रागदारी संगीत का प्रारम्भिक प्रशिक्षण तथा संगति वाद्यों में क्रान्तिकारी बदलाव कर इस अभियान के अगुआ बन गए। अब आपको सुनवाने के लिए हमने चुना है, जगजीत सिंह की आवाज़ में दो ठुमरी रचनाएँ। एक मंच प्रदर्शन के दौरान उन्होने पहले भैरवी के स्वरों में थोड़ा आलाप किया, फिर बिना ताल के नवाब वाजिद आली शाह की रचना- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...’ और फिर तीनताल में निबद्ध पारम्परिक ठुमरी भैरवी- ‘बाजूबन्द खुल-खुल जाए...’ प्रस्तुत किया है। अन्त में उन्होने तीनताल में निबद्ध तराना का एक अंश भी प्रस्तुत किया है। आइए सुनते हैं, जगजीत सिंह की विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण।


राग भैरवी : ठुमरी और तराना : जगजीत सिंह




पुत्र विवेक और पत्नी चित्रा सिंह के साथ
जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब सरल और सहज अंदाज़ में गाना आरम्भ किया तो जनसामान्य की अभिरुचि ग़ज़लों की ओर बढ़ी। उन्होने हुस्न और इश्क़ से युक्त पारम्परिक ग़ज़लों के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम आदमी की ज़िंदगी को भी अपने सुरों से सजाया। जैसे- ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूँ..’, ‘मैं रोया परदेश में...’, ‘ये दौलत भी ले लो...’, ‘माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...’ जैसी रचनाओं में आम आदमी को अपने जीवन का यथार्थ नज़र आया। प्राचीन ग़ज़ल गायन शैली में केवल सारंगी और तबले की संगति का चलन था, किन्तु जगजीत सिंह ने सारंगी का स्थान पर वायलिन और सन्तूर को अपनाया। उन्होने संगति वाद्यों में गिटार को भी जोड़ा। ग़ज़ल को जनरुचि का हिस्सा बनाने के बाद 1981 में उन्होने फिल्म ‘प्रेमगीत’ से अपने फिल्मी गायन का सफर शुरू किया। इस फिल्म का गीत- ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो...’ वास्तव में एक अमर गीत सिद्ध हुआ। 1990 में एक सड़क दुर्घटना में जगजीत सिंह के इकलौते पुत्र विवेक का निधन हो गया। इस रिक्तता की पूर्ति के लिए उन्होने अपनी संगीत-साधना को ही माध्यम बनाया और आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गए। इस दौर में उन्होने अनेक भक्त कवियों के पदों सहित गुरुवाणी को अपनी वाणी दी। अब हम आपको जगजीत सिंह के स्वर में एक भक्तिगीत सुनवा रहे हैं। यह भक्तिगीत कीर्तन शैली में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रस्तुति में भी आपको राग दरबारी कान्हड़ा की झलक मिलेगी। आप जगजीत सिंह की आवाज़ में यह भक्तिगीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग दरबारी : भजन - “जय राधा माधव जय कुंजबिहारी...” : जगजीत सिंह




 संगीत पहेली 



‘स्वरगोष्ठी’ के 242वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत के एक सम्मानित गायक की आवाज़ में प्रस्तुत कण्ठ-संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग में निबद्ध है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 7 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 244वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


 पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 240 की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका बेगम अख्तर की आवाज़ में प्रस्तुत ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न के उत्तर में हमे दो उत्तर, 'खमाज' और 'तिलंग', प्राप्त हुए हैं। ठुमरी का जो अंश सुनवाया गया था, उसमें दोनों रागों का भ्रम हो रहा है। दरअसल दोनों राग खमाज थाट के हैं, दोनों रागों में दोनों निषाद का प्रयोग होता है और दोनों रागों का वादी और संवादी स्वर क्रमशः गान्धार और निषाद होता है। हमने दोनों उत्तरों को सही माना है। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा की लग्गी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका बेगम अख्तर

सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। अगले अंक में हम चौथी श्रृंखला के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे।


 अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह तीसरा अंक था। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 





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