शनिवार, 8 अगस्त 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 05 - कानन देवी


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 05

 
कानन देवी


’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है फ़िल्म जगत के प्रथम दौर की मशहूर गायिका-अभिनेत्री कानन देवी को।  
 
22 अप्रैल 1916 को कोलकाता के पास हावड़ा में एक छोटी बच्ची का जन्म हुआ। माँ ने नाम रखा कानन। पूरा नाम कानन बाला। बेहद ख़ूबसूरत दिखने वाली इस प्यारी बच्ची को क्या पता था कि इस दुनिया में उसका आना समाज के बनाए हुए कानूनों के ख़िलाफ़ था। बिन ब्याही लड़की की बेटी बन कर जन्म लेना ही उस बच्ची का अपराध था।  कानन की माँ राजोबाला का जिस लड़के के साथ प्रेम था, वह राजोबाला के गर्भवती होते ही रिश्ता ख़त्म कर भाग खड़ा हुआ। साहसी राजोबाला ने कोख में पल रहे संतान को जन्म देने का कठिन निर्णय तो लिया पर समाज का मुंह बन्द कर पाना उनके बस में नहीं था। इसलिए "अवैध" शब्द कानन के साथ जुड़ गया। माँ और बेटी की सामाजिक ज़िन्दगी आसान नहीं थी। फिर भी राजोबाला ने हिम्मत नहीं हारी और कानन को पालने लगी। कुछ समय बाद एक बार फिर राजोबाला की ज़िन्दगी में प्रेम का संचार हुआ और रतन चन्द्र दास नामक एक युवक से उनकी आत्मीयता बढ़ी। राजोबाला और रतन ने विवाह कर ली। रतन अच्छा लड़का था और कानन को पिता का प्यार देने लगा। राजोबाला और कानन की ज़िन्दगी संभली ही थी कि एक दिन अचानक जैसे फिर एक बार बिजली गिर पड़ी। रतन का अकस्मात निधन हो गया। माँ-बेटी फिर से असहाय हो गई। पिता के घर से राजोबाला को कोई मदद नहीं मिली, हर तरफ़ से दरवाज़े बन्द हो गए। अपना और बेटी का पेट पालने के लिए राजोबाला को लोगों के घरों में बरतन माँजने और पोछा लगाने का काम करना पड़ा। पर बेटी को इस राह पर चलने नहीं दिया। कुछ लोग कहते हैं कि कानन की शिक्षा हावड़ा के St. Agnes' Convent School से हुई थी, पर इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है। रतन की मृत्यु के बाद बहुत ज़्यादा दिनों तक कानन की पढ़ाई नहीं चल सकी और वो स्कूल से बाहर निकल गई।  

क़िस्मत हर किसी को कम से कम एक बार मौक़ा ज़रूर देती है। कानन को भी यह मौका मिला जब तुलसी बनर्जी नामक एक सज्जन, जिन्हें कानन काका बाबू (चाचा जी) कह कर बुलाती थी, ने उन्हें ’मादन थिएटर्स’ और ’ज्योति स्टुडियोज़’ में ले गए। कानन उस समय मात्र 10 वर्ष की थीं पर बहुत ही सुन्दर युवती के रूप में परिणित हो रही थीं। यह 1926 की बात थी। उस ज़माने में अच्छे घर की लड़कियों का फ़िल्मों में अभिनय करना ख़राब माना जाता था। पर जिस लड़की को जन्म से लेकर कभी समाज ने उचित सम्मान ही नहीं दिया, उस समाज के इस एक और पाबन्दी से कैसा डर? कानन के सौन्दर्य को देख उन्हें 1926 की मूक फ़िल्म ’जयदेव’ में एक छोटे रोल के लिए चुन लिया गया। इसके अगले ही साल ’शंकराचार्य’ फ़िल्म में भी उन्होंने अभिनय किया। 1932 की फ़िल्म ’विष्णु माया’ और ’प्रह्लाद’ में तो उन्होंने नायक की भूमिका निभाई। 1933 से 1936 तक ’राधा फ़िल्म्स’ में काम करने के बाद 1937 में वो जुड़ीं ’न्यु थिएटर्स’ से और वहीं पर उन्हें सबसे अधिक प्रसिद्धि मिली। गायक-अभिनेताओं में अगर कुन्दलाल सहगल शीर्ष पर थे तो गायिका-अभिनेत्रियों में कानन देवी चोटी पर थीं। राय चन्द बोराल ने उनकी गायकी को सँवारा, निखारा और उन्हें एक बेहतरीन गायिका बनने की तमाम बारिकियाँ सिखाई। बचपन से समाज की अशोभनीय टिप्पणियों को झेलने वाली कानन अब फ़िल्म जगत की नामचीन स्टार बन चुकी थीं। जैसे जैसे समय बीतता गया, अच्छे घरों की लड़कियों का आगमन फ़िल्मों में होने लगा, और कानन देवी को भी उसके समाज ने स्वीकार कर लिया। कानन देवी की कहानी से हमें यह सीख ज़रूर लेनी चाहिए कि अगर मन में विश्वास है, मेहनत करने की नियत है, तो कोई उसे रोक नहीं सकता। उपलब्धियाँ समाज को झुकने पर मजबूर कर ही देती हैं। अवैध संतान के रूप में जन्म लेने वाली, और बचपन में समाज के कटाक्ष झेलने वाली कानन की अपार सफलता को देख कर हम यही कह सकते हैं कि कानन, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



रविवार, 2 अगस्त 2015

सावन की कजरी : SWARGOSHTHI – 230 : KAJARI SONGS




स्वरगोष्ठी – 230 में आज

रंग मल्हार के – 7 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय रूप

‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ 

   

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला में अब तक आप वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाएँ सुन रहे थे और हम उन पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक में हम वर्षा ऋतु की मनभावन लोक शैली कजरी पर चर्चा करेंगे। कजरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है, किन्तु इसके कुछ विशेष गुणों के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी यह प्रतिष्ठित हुई। आज के अंक में हम कजरी गीतों के उपशास्त्रीय रूप की चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको काशी के सुविख्यात विद्वान बड़े रामदास की एक कजरी रचना को चार सुप्रसिद्ध गायक कलाकारों की आवाज़ों में प्रस्तुत करेंगे।


भारतीय संगीत की प्रत्येक विधाओं में वर्षा ऋतु के गीत-संगीत उपस्थित हैं। लोक संगीत के क्षेत्र में कजरी एक सशक्त विधा है। भारतीय पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास से लेकर आश्विन मास तक पूरे चार महीने उत्तर प्रदेश के ब्रज, बुन्देलखण्ड, अवध और पूरे पूर्वांचल और बिहार के प्रायः सभी हिस्से में कजरी गीतों की धूम मची रहती है। मूल रूप से कजरी लोक-संगीत की विधा है, किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जब बनारस (अब वाराणसी) के संगीतकारों ने ठुमरी को एक शैली के रूप में अपनाया, उसके पहले से ही कजरी परम्परागत लोकशैली के रूप विद्यमान रही। उपशास्त्रीय संगीत के रूप में अपना लिये जाने पर कजरी, ठुमरी का एक अटूट हिस्सा बनी। इस प्रकार कजरी के मूल लोक-संगीत का स्वररोप और ठुमरी के साथ रागदारी संगीत का हिस्सा बने स्वररोप का समानान्तर विकास हुआ। अगले अंक में हमारी चर्चा का विषय कजरी का लोक-स्वरूप होगा, किन्तु आज के अंक में हम आपसे कजरी के रागदारी संगीत के कलासाधकों द्वारा अपनाए गए स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

गिरिजा देवी 
रवि किचलू 
भारतीय लोक-संगीत के समृद्ध भण्डार में कुछ ऐसी संगीत शैलियाँ हैं, जिनका विस्तार क्षेत्रीयता की सीमा से बाहर निकल कर, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी और मीरजापुर जनपद तथा उसके आसपास के पूरे पूर्वाञ्चल क्षेत्र में कजरी गीतों की बहुलता है। वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभियक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित है। आज की संगोष्ठी का प्रारम्भ हम विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी, वर्षा ऋतु के रस-रंग से अभिसिंचित एक कजरी से करते है। यह प्रस्तुति युगल गीत रूप में है, जिसमें विदुषी गिरिजा देवी के साथ गायक रवि किचलू की आवाज़ भी है।

कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू


छन्नूलाल मिश्र
मूलतः लोक-परम्परा से विकसित कजरी आज गाँव के चौपाल से लेकर प्रतिष्ठित शास्त्रीय मंचों पर सुशोभित है। कजरी-गायकी को ऊँचाई पर पहुँचाने में अनेक लोक-कवियों, साहित्यकारों और संगीतज्ञों का स्तुत्य योगदान है। कजरी गीतों की प्राचीनता पर विचार करते समय जो सबसे पहला उदाहरण हमें उपलब्ध है, वह है- तेरहवीं शताब्दी में हज़रत अमीर खुसरो रचित कजरी-‘अम्मा मोरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया...’। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की एक रचना- ‘झूला किन डारो रे अमरैया...’, आज भी गायी जाती है। कजरी को समृद्ध करने में कवियों और संगीतज्ञों योगदान रहा है। भोजपुरी के सन्त कवि लक्ष्मीसखि, रसिक किशोरी, शायर सैयद अली मुहम्मद ‘शाद’, हिन्दी के कवि अम्बिकादत्त व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेमधन’ की कजरी रचनाएँ उच्चकोटि की हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने तो ब्रज, भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरियों की रचना की है। भारतेन्दु की कजरियाँ विदुषी गिरिजा देवी आज भी गाती हैं। आज के अंक में जो कजरी हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे बनारस घराने के विद्वान पण्डित बड़े रामदास ने रचा है। विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू के युगल स्वरों में आपने बड़े रामदास की रचना का रसास्वादन किया है। यही कजरी अब आप वर्तमान में विख्यात गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से सुनिए।

कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित छन्नूलाल मिश्र


विद्याधर मिश्र
कवियों और शायरों के अलावा कजरी को प्रतिष्ठित करने में अनेक संगीतज्ञों की भी स्तुत्य भूमिका रही है। वाराणसी की संगीत परम्परा में बड़े रामदास जी का नाम पूरे आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होने भी अनेक कजरियों की रचना की थी। अब हम आपको बड़े रामदास जी द्वारा रचित एक कजरी का रसास्वादन कराते है। इस कजरी को उन्हीं के प्रपौत्र और गायक पण्डित विद्याधर मिश्र प्रस्तुत कर रहे हैं। विद्याधर जी बनारस घराने के सुप्रसिद्ध विद्वान, बड़े रामदास जी के पौत्र और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय के यशस्वी प्रोफेसर पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र के पुत्र हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। अब आप पण्डित विद्याधर मिश्र से दादरा ताल में निबद्ध अपने प्रपितामह बड़े रामदास की यह कजरी सुनिए। इस कजरी में आपको राग देस के साथ ही अन्य रागों की झलक भी मिलेगी आप यह कजरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित विद्याधर मिश्र



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय वाद्य संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक के उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह कौन सा वाद्य है? वाध्य का नाम बताइए।

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल या तालों के नाम बताइए।

3 – वाद्य संगीत के वादक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 8 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 232वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 228 की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित विनायक राव पटवर्धन की आवाज़ में प्रस्तुत राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार की एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित विनायक राव पटवर्धन। इस बार की पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में से हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दो-दो प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया का केवल एक उत्तर ही सही रहा, उन्हें केवल एक अंक ही अंक मिलेगा। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। आज के अंक में आपको लोक संगीत कजरी का उपशास्त्रीय स्वरूप के दर्शन हुए। अगले अंक में आपका साक्षात्कार कजरी गीत के लोक व अन्य स्वरूप से होगा। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
 

शनिवार, 1 अगस्त 2015

'मेरी आशिक़ी अब तुम ही हो...' - क्यों फ़िल्म से हटने वाला था यह ब्लॉकबस्टर गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 64

 

'मेरी आशिक़ी अब तुम ही हो...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 64-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’आशिक़ी 2’ के ब्लॉकबस्टर गीत "तुम ही हो, अब तुम ही हो" के बारे में जिसे अरिजीत सिंह ने गाया था।


2011 वर्ष के सितंबर में मीडिआ में यह ख़बर आई कि महेश भट्ट और भूषण कुमार 1990 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’आशिक़ी’ का रीमेक बनाने में इच्छुक हैं। भूषण कुमार ने महेश भट्ट को ’आशिक़ी’ का सीकुईल बनाने का सुझाव दिया, पर भट्ट साहब तभी राज़ी हुए जब शगुफ़्ता रफ़ीक़ की लिखी स्क्रिप्ट को पढ़ कर उन्हें लगा कि कहानी में ’आशिक़ी’ से टक्कर लेने वाली दम है। ’आशिक़ी’ फ़िल्म की कामयाबी को ध्यान में रखते हुए इस फ़िल्म का रीमेक या सीकुईल बनाने का विचार बहुतों को आत्मघाती लगा। उस पर फ़िल्म के गीत-संगीत के पक्ष को भी बेहद मज़बूत बनाने का सवाल था जो ’आशिक़ी’ के गीतों का मुक़ाबला कर सके। शुरू शुरू में ’आशिक़ी’ के गीतों को ही इस्तमाल करने का विचार आया ज़रूर था, पर इसे रद्द किया गया और ’आशिक़ी-2' में नए गीतों को रखने और उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी भट्ट साहब ने अपने सर ली। और इस तरह से ’आशिक़ी-2’ का काम शुरू हुआ। फ़िल्म में संगीत के लिए चुना गया मिथुन, जीत गांगुली और अंकित तिवारी को। गीत लिखे इरशाद कामिल, संजय नाथ, संजय मासूम और मिथुन ने। यूं तो फ़िल्म के सभी गीत पसन्द किए गए, पर मिथुन के लिखे और स्वरबद्ध किए तथा अरिजीत सिंह के गाए "तुम ही हो..." गीत ने सफलता के झंडे गाढ़ दिए और साल का सर्वश्रेष्ठ गीत बना।


Mithoon
"तुम ही हो..." गीत का ऑडियो 16 मार्च 2013 को जारी किया गय था। अगर यह कहें कि इस गीत ने ही इस फ़िल्म की पब्लिसिटी कर दी तो ग़लत नहीं होगा। गीत को समालोचकों से ख़ूब तारीफ़ें मिली। ग्लैमशैम ने लिखा, "It is indeed an exhilarating experience listening to the songs of Aashiqui 2 and in this age of mundane and average/repetitive musical fares that are being churned out, the audio of Aashiqui 2 is surely a treat for all music buffs. "Tum Hi Ho" and "Sunn Raha Hai" (both versions) are our favourites, but "Chahun Main Ya Naa" and "Piya Aaye Na" end up as a close second. A chartbusting musical experience indeed." इसमें कोई संदेह नहीं कि इस गीत में मिथुन का छाप हर टुकड़े में सुनाई देता है। जितना मेलोडियस इसकी धुन है, उतने ही ख़ूबसूरत इसके बोल हैं। पियानो, स्ट्रिंग्स और बीट्स का बेहद सुरीला प्रयोग मिथुन ने किया और अपनी दिलकश आवाज़ से अरिजीत सिंह ने गाने में चार चाँद लगा दिए। यह कहते हुए ज़रा सा भी हिचक नहीं होगी कि मिथुन और अरिजीत ने "तुम ही हो..." के ज़रिए समीर, नदीम-श्रवण और कुमार सानू के "सांसों की ज़रूरत है जैसे..." को सीधी टक्कर दे दी है। इस गीत के सफलता की बात करें तो गीत के यू-ट्युब पर जारी होने के दस दिनों के अन्दर ही पचास लाख हिट्स दर्ज हुए। Big Star Entertainment Awards 2013 और Zee Cine Awards 2014 में इस गीत को Most Entertaining Song of the year का ख़िताब दिया गया। अरिजीत सिंह को इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिला तो मिथुन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का। 20th Screen Awards 2014 में अरिजीत को एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का पुरस्कार मिला। मिथुन को इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का नामांकन भी मिला था पर पुरस्कार गया प्रसून जोशी को ’भाग मिलखा भाग’ के "ज़िन्दा" गीत के लिए।


Arijit Singh
और अब "तुम ही हो..." गीत के बनने की कहानी से जुड़ा एक दिलचस्प क़िस्सा। दरसल शुरू-शुरू में इस गीत का कॉनसेप्ट इस तरह से सोचा गया था कि यह एक डबल वर्ज़न गीत होगा और फ़ीमेल वर्ज़न मेल वर्ज़न से ज़्यादा असरदार होगा फ़िल्म की कहानी को ध्यान में रखते हुए। गीत के दोनों संस्करण रेकॉर्ड हुए। पर जब सबसे दोनों वर्ज़न सुने तो मुश्किल में पड़ गए। मुश्किल इस बात की थी कि मेल वर्ज़न फ़ीमेल वर्ज़न से ज़्यादा अच्छा लगने लगा। कई बार सुनने के बाद सब ने यह स्वीकारा कि यह गीत दरसल महिला कंठ में नहीं बल्कि पुरुष कंठ में ही अधिक प्रभावशाली सुनाई दे रहा है। और अगर यह बात सच है तो फिर इस गीत का जो कॉनसेप्ट था कि फ़ीमेल वर्ज़न ज़्यादा असरदार होना चाहिए, वह ज़रूरत पूरी नहीं हो रही थी। इसलिए सवाल यह खड़ा हो गया कि क्या इस गीत को रद्द करके कोई नया गीत बनाया जाए जो महिला कंठ में ज़्यादा असरदार लगे? पर इस पर किसी की सहमती नहीं मिली, कारण यह था कि अरिजीत और मिथुन ने "तुम ही हो..." में जो कमाल कर चुके थे, उसके बाद इस गीत को रद्द करने का ख़याल ही ग़लत था। सबको लग रहा था कि गीत ज़बरदस्त हिट होगा। अत: सर्वसम्मति से इस गीत को फ़िल्म में रख लिया गया, फ़ीमेल वर्ज़न को रद्द करके एक डुएट वर्ज़न बनाया गया जिसे अरिजीत सिंह के साथ पलक मुछाल ने गाया। इस संसकरण के बोल मिथुन नहीं बल्कि इरशाद कामिल ने लिखे। यह संस्करण भी सराहा गया पर अरिजीत सिंह का एकल संस्करण ही सर चढ़ कर बोला। लीजिए, अब यही गीत आप भी सुनिए। 


फिल्म  - आशिक़ी 2 : "तुम ही हो अब तुम ही हो..." : अरिजीत सिंह : गीत और संगीत - मिथुन 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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